महिला किसानों की भी सुध लें

Submitted by editorial on Sat, 12/08/2018 - 17:12
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राष्ट्रीय सहारा (हस्तक्षेप), 08 दिसम्बर, 2018

महिला किसानमहिला किसानकृषि क्षेत्र के समक्ष प्रमुख चुनौती है आर्थिक व्यवहार्यता की। भारत के आर्थिक सर्वेक्षण ने ध्यान खींचा है कि कृषि को लाभोन्मुख बनाया जाए। नेशनल कमीशन ऑन फार्मर्स ने भी कृषि क्षेत्र में आय बढ़ाने पर बल दिया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने घोषणा की है कि किसानों की आय दोगुनी करने को हर प्रयास किया जाएगा। लेकिन जहाँ आर्थिक सुरक्षा बढ़ाने की बात कही गई है, वहीं किस तरह यह लक्ष्य हासिल किया जाएगा? इस बाबत विस्तार से कुछ बताया नहीं गया है। इसलिये उन कुछेक क्षेत्रों की पहचान किया जाना आवश्यक है, जिनमें प्रयास करके खेती-किसानी को समृद्ध किया जा सकता है।

अर्ध-शहरी इलाकों में बागवानी क्रान्ति से अभी तक पूरी तरह लाभान्वित नहीं हुआ जा सका है। ये ऐसे इलाके हैं, जहाँ सब्जियों, फूलों और फलों जैसी लाभकारी उपज पैदा की जा सकती है। वर्षों पहले बंगलुरु में इंडो-बुल्गारियन सहयोग कार्यक्रम के तहत एग्रो-इंडस्ट्रियल कॉम्पलेक्स स्थापित किया गया था। इसका उद्देश्य था बागवानी उत्पादों का मूल्य संवर्धन करना और किसान के स्तर पर विपणन सम्बन्धी तौर-तरीकों को प्रोत्साहन देना। अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बागवानी के तहत प्याज, आलू, टमाटर और ऐसी अन्य फसल शामिल हैं, जिनकी शहरी क्षेत्रों में काफी माँग है। प्रयास ऐसा है जिससे कि इन उत्पादों की कीमतों में स्थिरता और उपलब्धता, दोनों सुनिश्चित हो सके।

एक अन्य क्षेत्र है, जिस पर तवज्जो दी जानी चाहिए। यह क्षेत्र है सामुद्रिक तटों पर कृषि, वनस्पति और जल-जीव पालन। विश्व में उपलब्ध जल का 97 प्रतिशत हिस्सा समुद्र जल है। हमारे देश की सामुद्रिक रेखा करीब आठ हजार वर्ग किलोमीटर तक फैली है। इस तटीय क्षेत्र में सामुद्रिक जलजीवों के पालन, वनस्पति और कृषि को बढ़ावा दिया जा सकता है। इससे तटीय समृद्धि कार्यक्रम को प्रोत्साहन मिलेगा। हमारे लिये सकारात्मक पक्ष यह है कि हमारे पास चावल और अन्य ऐसी तमाम फसलें हैं, जो समुद्री जल क्षेत्र में पैदा की जा सकती हैं। अलबत्ता, हमें ऐसी तकनीक की दरकार होगी जिनसे सामुद्रिक बागवानी, जलजीव पालन, जल जीवीय वनस्पति की पैदावार को बढ़ावा मिल सके। इस प्रयास से हमारे समेकित तटीय कृषि कार्यक्रम को प्रोत्साहन मिलेगा।

कृषि में महिलाओं की बढ़ती भूमिका

महिलाओं की कृषि क्षेत्र में भूमिका दिनोंदिन बढ़ रही है। अभी भूमि की स्वामी न होने से उनकी भूमिका के लिये उन्हें श्रेय नहीं मिलता। एक सार्वजनिक नीति विकसित किया जाना महत्त्वपूर्ण है जिससे कृषि, पशु पालन, मछली पालन और वानिकी में संलग्न महिलाओं के सशक्तीकरण में मदद मिल सके। इस लक्ष्य की पूर्ति के लिये मैंने 2012 में राज्य सभा में निजी सदस्य बिल पेश किया था। कृषि में महिलाओं की सहायता के लिये अग्रलिखित सुझावों पर गौर किया जा सकता है :

केन्द्र सरकार महिला किसानों के एक्ट के तहत सेंट्रल एग्रीकल्चरल डेवलपमेंट फंड (सीएडीएफडब्ल्यूएफ) स्थापित करेगी जो महिला किसानों के सशक्तीकरण में उपयोग किया जा सकेगा। तय शुदा नियमों के अनुसार महिला किसान-मित्र तकनीकों, महिला किसानों के प्रशिक्षण, दक्षता संवर्धन, बाजार तैयार करने सम्बन्धी सुविधाओं के निर्माण, बच्चों के क्रेचों एवं देखभाल केन्द्रों, महिला किसानों के लिये सामाजिक सुरक्षा, वृद्धावस्था और अन्य सम्बद्ध मुद्दों पर गौर किया जा सकेगा।

यह कोष केन्द्रीय, राज्य तथा जिला स्तर पर परिचालित होगा। केन्द्रीय स्तर पर केन्द्र सरकार द्वारा नियुक्त सक्षम प्राधिकार इसे प्रशासित करेगा। इसी प्रकार निर्धारित नियमों के अनुसार राज्य और जिला स्तर पर भी कोष का परिचालन किया जाएगा। यह प्राधिकार एक्ट के तहत निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुसार गठित महिला किसान केन्द्रों या महिला किसानों की पंजीकृत महिला सहकारिताओं के रूप में समूहबद्ध महिलाओं और व्यक्तिगत महिला किसानों को सहायता देगा। सक्षम प्राधिकार इस फंड के उपयोग और वितरण के लिये आधिकारिक गजट द्वारा जारी की गई केन्द्र सरकार द्वारा पूर्वानुमति और अधिसूचना के अनुसार दिशा-निर्देश तैयार करेगा। केन्द्र सरकार महिला किसानों की सामाजिक सुरक्षा के लिये योजना का प्रारूप तैयार करेगी। खासकर वृद्धावस्था पेंशन, जैसा कि इस एक्ट द्वारा निर्धारित होगी, के मामले में भी इस योजना का प्रारूप तैयार करेगी।

फंड का सक्षम प्राधिकार सरकार महिलाओं के लिये एक्ट के तहत महिला किसानों के लिये भूमि अर्जन और अन्य संसाधनों के वितरण की दिशा में कार्य करेगा। समय-समय पर नियमित महिला किसानों के प्रशिक्षण और उनकी दक्षता संवर्धन के लिये देश के विभिन्न स्थानों पर कार्यक्रम आयोजित करेगा ताकि एक्ट के तहत उनके लिये नियत अधिकार उन्हें हासिल हो सकें। उनका सशक्तीकरण हो सके। इस्तेमाल नहीं हो सके अवसरों की जाँच-परख महत्त्वपूर्ण है ताकि पेशागत आर्थिक व्यवहार्यता जानी-समझी जा सके। मैं खासतौर पर अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बागवानी, सामुद्रिक तटीय क्षेत्रों में जल कृषि, समुद्र के तटीय निचले स्थानों पर कृषि और कृषि में महिलाओं के तकनीकी और आर्थिक सशक्तिकरण बल देना चाहूँगा।

(लेखक प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक हैं।)


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