दृश्य चित्रण एवं पर्यावरण का अन्तःसम्बन्ध

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कला एवं पर्यावरण - एक अध्ययन मध्य प्रदेश के प्रमुख दृश्य चित्रकारों के सन्दर्भ में (पुस्तक), 2014
पेंटिंगपेंटिंग ईश्वरीय सृष्टि में अनन्त सौन्दर्य समाया हुआ है। मनुष्य की सृजनात्मक प्रवृत्ति ने कला के विभिन्न आयामों को जन्म दिया। जैसे प्रकृति चित्रण, संयोजन, व्यक्ति चित्रण, छापा चित्रण तथा अमूर्त चित्रण आदि। दृश्य कला ही एक ऐसी विधा है, जिसमें प्रकृति में समाहित सौन्दर्य को स्मरणीय और आनन्ददायक बनाया जा सकता है। चित्रकार को अनन्त प्रकृति में से कुछ ही बिन्दु आकर्षित कर पाते हैं। इन आकर्षक बिन्दुओं को जब वह चित्र रूप में परिणित करता है, तो वह दृश्य चित्र कहलाता है। चित्रकार इसे जल रंग, तेल रंग, एक्रेलिक, पेस्टल, छापा कला के माध्यम से सृजित करता है।

दृश्य चित्रण का अर्थ है हमारी आँखें जो भी जीवित-अजीवित रूपों को देखती हैं उसका कलात्मक चित्रण जो भूमि और असीमित आकाश के मध्य विद्यमान है। प्लेटो ने कहा है कि ‘कला सत्य की अनुकृति की अनुकृति है’। उनका भाव यह था कि सत्य ईश्वर है प्रकृति उसकी अनुकृति और इसी प्रकृति की नकल करता है। अतः दृश्य चित्रण में भी प्रकृति या पर्यावरण की नकल ही की जाती है। चित्रकार इसमें कल्पना और कलात्मकता का प्रयोग कर अधिक सौन्दर्यपूर्ण बना देता है। अतः यह कहा गया है कि कलाकृति निसर्ग से अधिक श्रेष्ठ है। “भारतीय दृश्य कलाओं का इतिहास बहुत पुराना है। गुफा चित्र के अन्तर्गत अजन्ता में दूसरी से सातवीं सदी को भारतीय भित्ति चित्रण में स्वर्णकाल (Golden Period) के नाम से जाना जाता है। ये पेंटिंग मुख्यतः जातक कहानियों पर थी। बुद्ध की पुनर्जन्म की कथाओं पर आधारित थे। ये चित्रण महलों के अलावा घर, Foliage और मनुष्य का बहुतायत से प्रतिनिधित्व करते थे। यही कारण है कि अजन्ता के चित्रों को वास्तुकला-दृश्य चित्रण के रूप में स्वीकारा है। इसके अलावा भारतीय मध्यकालीन लघुचित्रों को विद्वानों ने भारतीय कला के इतिहास में शानदार पृष्ठ के रूप में माना है। ये चित्र परिष्कृत और Delicate होते हैं और मनोवैज्ञानिक प्रभाव छोड़ते हैं। भारतीय दृश्य चित्र युद्ध, आखेट, तैराकी, नृत्य, सामुद्रिक नृत्य, संगीत और आनन्द विषयों पर आधारित बने हैं।”

“यथार्थवादी चित्रण में दृश्य चित्रों में विशेषतः वातावरण के चित्रण पर दृष्टि डाली। उनमें अवनींद्रनाथ टैगोर, गगनेन्द्र नाथ टैगोर, रविन्द्रनाथ टैगोर तथा नन्दलाल बोस आदि थे। अवनींद्रनाथ ने रेखाओं और रंगों के माध्यम से विशिष्ट स्थानों के दृश्य चित्र बनाए। दृश्य चित्रण परम्परा में जिन चित्रकारों को सफलता मिली, उनमें इन्द्रा दुगार, बी.आर. पानेसर, सुहास राय, गणेश हलोई आदि हैं। भारतीय दृश्य चित्रण में समुद्री दृश्य, शहरी दृश्य, ग्रामीण दृश्य और प्राकृतिक दृश्य बनाए जाते हैं।”

राज्याश्रयों और धर्म के प्रभाव-मुक्ति से स्वतंत्र दृश्य चित्र बनाए जाने लगे। दृश्य चित्रण पर पश्चिमी देशों का प्रभाव भी दिखाई देता है।

पश्चिमी देशों में दृश्य चित्रण बहुत पहले से बनता चला आ रहा है। 16वीं सदी में डच में पहली बार 1598 में दृश्य चित्रण का उल्लेख किया गया है।

“The Dutch World Landscape had earlier meant simply ‘region’ tract of land but had a acquired the artistic sense, which it brought over in to english of a picture depicting on land’

अंग्रेजी में ‘Landscape’ शब्द के स्थान पर View, Vista या Natural Scenery शब्द का उपयोग किया जाता था। इस समय जीवन में पहली बार Landscape शब्द से परिचित हुए।

शक्तिशाली राज्य ‘रोम’ में भित्ति चित्रों में प्रभाववादी शैली के दर्शन होते हैं। यह तकनीकी यहाँ की विशिष्ट तकनीक में से है। इसमें शीघ्रता से लगाए तूलिका घातों से दृश्य चित्रों में प्रकाश का क्षणिक प्रभाव इन चित्रकारों ने सुन्दरता से रंगों में दर्शाया है। ऑडिसी दृश्य, पाम्पियाई प्रभाववादी शैली का सर्वश्रेष्ठ चित्र है। इसी पद्धति से बना ‘ट्रोजन-अश्व’ में रात्रि का रहस्यमयी वातावरण और उसमें अग्रभूमि में काष्ठ के अश्व को खींचती हुई प्रकाशयुक्त आकृतियों का चित्र नाटकीय लगता है। ये दृश्य चित्र उस स्थान विशेष और तत्कालीन वातारवरण को दर्शाते हैं। यूरोप में अधिकाशतः ठंडा और धुन्ध भरा वातावरण होता है अतः चित्रों में अधिकाशतः शीत और धुंधले रंगों का प्रयोग होता है। रोमांटिज्म (स्वच्छन्दतावाद) में शास्रीय नियमों की शिथिलता से दृश्य चित्र बने और 19वीं सदी में प्रभाववाद आने से दृश्य चित्रों का महत्व बढ़ गया। टर्नर मोने, माने और जार्ज स्यूरत ने विशिष्ट (Pointelism) में दृश्य चित्र बनाए। इन दृश्य चित्रकारों ने रेखाओं और रंगों के सामंजस्य से द्विआयामी तल पर त्रिआयामी दृश्य चित्र परिप्रेक्ष्य सहित बनाए।

पूर्वी देशों में भारत के साथ ही चीन और जापान में भी दृश्य चित्रण प्रमुखता से हुआ है। भारत में प्रकृति और पुरूष की कल्पना की उसी प्रकार चीनी चित्रकला दर्शन में यीन और यांग की कल्पना की। यीन भूमि तत्व होने के कारण भूमि, जल, पेड़, पहाड़ तथा स्त्री को ‘यीन’ प्रतीकात्मक रूप दर्शाता है। ‘यांग’ स्वर्ग अग्नि तथा पुरूष का प्रतीक माना गया है। यीन और यांग एक दूसरे के पूरक हैं। चीनी चित्रकला में यीन और यांग के अतिरिक्त पंच तत्व जल, अग्नि, लकड़ी, धातु एवं भूमि का भी महत्व है। जिनसे यहाँ का पर्यावरण बनता है। यीन और यांग के सन्तुलन में जब भी असन्तुलन होता है, तो इसका प्रभाव मौसम पर होता है। जल (यीन) में ताप (यांग) का प्रभाव बढ़ता है, तो वह भाप बनकर आकाश की ओर उठता है क्योंकि ‘यांग’ आकाशीय तत्व है। चीनी पर्यावरण के पंच तत्व के पाँच दिशाओं, पाँच रंगों और पाँच पवित्र पशुओं से जोड़ा गया। यीन और यांग की गतिविधियाँ ही विश्व निर्माण का कारण हैं।

चीनी कला-पर्यावरण का विश्व के कला इतिहास और विकास में महत्त्वपूर्ण स्थान है। भारतीय कला के साथ ही चीनी कला में विशिष्ट सौन्दर्यबोध के साथ ही दार्शनिक पक्ष भी प्रभावशील रहा है। यहाँ प्रचलित धार्मिक मान्यताओं में दार्शनिक दृष्टिकोण के सम्यक निरूपण के कारण यह मान्यता रही है कि कलाभिव्यक्ति के माध्यम से आत्मिक उन्नति के साथ ही चित्त भी शान्त रहता है। चीन में सामान्यतया कन्फ्यूशवाद, ताओवाद, बौद्ध धर्म तथा चीनी रूप ध्यान सम्प्रदाय प्रचलित था। कन्फ्यूशियश (551-479 ई.पू.) का मुख्य सिद्धान्त था व्यक्ति का पूर्णरूपेण सुसंस्कृत विकास करना और सर्वोत्तम मानवीय व्यवहार करना।

इसके पश्चात ताओवाद का प्रारम्भ ‘लाओ-त्से’ (Lao-Tze) ने किया। इस सिद्धान्त का उद्देश्य है ‘ताओ’ से पूर्ण सामंजस्य प्राप्त करने के लिये मनुष्य को प्रकृति की ओर उन्मुख होना चाहिए। अर्थात ‘प्रकृति में अन्तर्दृष्टि’। चीनी दर्शन के अनुसार प्रकृति सर्वोपरि है। इसी विचार को लेते हुए कलाकारों ने दृश्य चित्रण में आत्माभिव्यक्ति की। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु साधु कलाकारों ने वनों में भी रहकर कला साधना की।

यहाँ के दार्शनिक पक्ष अनुसार ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति से ही प्रकृति निर्मित है इसके लिये प्रचलित किवदन्ती है- प्राचीन काल में संसार एक दीर्घ अंडे के समान था। एक दिन अंडे का विस्फोट हो गया। ऊपरी भाग आकाश और निचला भाग पृथ्वी बना। उसमें से आदिवर्ती मनुष्य फान-कू (Pan Ku) निकला। प्रतिदिन वह दस फुट बढ़ जाता था। आकाश दस फुट ऊँचा हो जाता था और पृथ्वी दस फुट मोटी। 18,000 वर्ष के पश्चात फान कू की मृत्यु हो गई। उसका सिर फटने से सूर्य चन्द्र बन गए, उसके रक्त से समुद्र तथा नदियाँ, उसके बालों से जंगल तथा घास के मैदान बने, पसीने से वर्षा, श्वास से हवा, आवाज से गर्जन और पिस्सुओं से पूर्वज बने। चीनी कला में प्रकृति का जितना महत्व है उतना अन्य देश में नहीं।

उत्तरी चीनी वासी ‘फान-कू’ को सृष्टि के आदि तत्व का प्रतीक माना है। सृष्टि के समस्त सौन्दर्य- नदियों, पर्वतों, घाटियों, मेघों, जल प्रपातों, वृक्षों तथा पुष्पों आदि में वही प्रतिबिम्बित है। मनुष्य सृष्टि की एक साधारण कृति मात्र है। मिथकीय वीर फू-जो ने लगभग 3000 ई.पू. ने प्रकृति के आठ तत्वों की खोज की। इन्हें इन तत्वों को भिन्न संयोजनों की तीन रेखाओं (Trigrams) के द्वारा चिन्हित किया। इसमें स्वर्ग, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, गर्जन, कुहरा तथा पर्वत आठ तत्व हैं। दृश्य चित्रण के संयोजन में शीहो द्वारा कु-हुआ-पिन-लू में उल्लेखित पाँचवां सिद्धात कलात्मक-संयोजन में स्पष्ट उल्लेख किया है कि प्राकृतिक दृश्यों का तीन स्तर पर विभाजन कर चित्रण किया। पहले स्तर पर भूमि दूसरे स्तर पर वृक्ष व तीसरे स्तर पर पर्वत को महत्व दिया है। चीनी चित्रकारों में सामान्यतः पर्वत की ऊँचाई का 1/10 भाग, ऊँचा वृत्त अंकित किया। उसका भी 1/10 भाग भवन तथा मानव को मटर के दाने के बराबर चित्रित किये जाने का विधान था।

चीन में दृश्य-चित्रण बहुतायत से हुआ है। यहाँ अनुकरण का सिद्धान्त विशेषतः अपनाया गया। यही कारण है कि बहुत से दृश्य चित्र एक जैसे बने दिखाई देते हैं। चित्रकार बनाते-बनाते जब सिद्धहस्त हो जाता है तब वह निजी शैली में कार्य करता है। चित्र बनाने की प्रक्रिया में चित्रकार की मनःस्थिति का भी हाथ रहता है। जब तक उसका मन हो वह चित्र में हाथ नहीं लगाता। यहाँ रेशम के कपड़े पर ऋतुओं के चित्र और कुण्डली चित्र मिले हैं। चीनी दृश्य चित्रों में प्राकृतिक दृश्यों को अधिक महत्व दिया है। प्रकृति प्रेम एवं प्रकृति के विचारों में बने सैरा चित्रों में मनुष्य का स्थान क्षुद्र बताया गया है।

यहाँ के दृश्य चित्रों में परिपेक्ष्य का सफलतापूर्वक अंकन दिखाई देता है इनमें रेखीय और वातावरणीय परिप्रेक्ष्य दोनों ही दिखाई देते हैं। एक ही तूलिका से विभिन्न गुणों वाले तूलिकाघात लगाकर चित्र बनाने का विधान चीन में है। यहाँ विशेषकर मसि (स्याही) चित्रण ही मिलता है। चीनी कला ही बाद में जापान और कोरिया पहुँची।

जापान नाम चीनी भाषा के ‘जिह-पेन-कुओं’ से विकसित हुआ, जिसका अर्थ है सूर्योदय का देश। जापान के प्राकृतिक पर्यावरण का प्रभाव यहाँ की कला पर दिखाई देता है। इस देश का निर्माण चार प्रमुख द्वीपों से मिलकर हुआ है, होन्शू, शीकोकू तथा क्यूशू। यहाँ पर्वतीय क्षेत्र अधिक हैं। मैदानी भूमि बहुत कम है। सागर तट कटा-फटा और अनेक टापुओं से भरा है। पर्वतों के गर्भ में अनेक ज्वालामुखी छिपे हुए हैं। वहीं इनके शिखरों पर बर्फ जमी रहती है। साथ ही तीव्र गति से बहने वाली नदियाँ प्रवाहित होती रहती हैं। पहाड़ी पर हरियाली दिखाई देती है। आकाश और जल का नीला रंग, क्षितिज के किंचित गुलाबी रंग के साथ मिलकर प्रकृति की अपूर्व शोभा निर्मित होती है। सागरीय वाष्प और ऋतुओं में नित नवीन परिवर्तन होते दिखाई देते हैं, जो प्राकृतिक-सौन्दर्य के रहस्यमय आवरणों को एक के बाद एक खोलते जाते हैं। ज्वालामुखी के कारण भूकम्प आने की सम्भावना भी सदैव बनी रहती है। यही कारण है कि यहाँ के रहवासियों ने स्वयं के रहने के लिये बाँस तथा लकड़ी के भवन निर्मित किये। इन्हें विविध प्रकार के पटचित्रों से अलंकृत किया।

इस सुन्दर वातावरण का प्रभाव यहाँ की कला पर भी दिखाई देता है। रेशमी पटों पर यहाँ के दृश्य चित्र लपेटकर रखे जाते हैं। इसमें अधिकांशतः प्राकृतिक दृश्यों को बनाया जाता है। वर्ष के बारह मास के बने चित्रों को ‘त्सुकीनामी-ए’ कहते हैं। प्रमुख चार ऋतुओं के बने चित्रों को शीकी-ए कहा जाता है। प्राकृतिक दृश्यों के साथ ही पशु चित्रण भी बनाना इन्हें भाता है।

इसके अलावा यहाँ की सागरीय प्रकृति को भी चित्रकारों ने प्रेरित किया। लहरें, मछलियां, नौकायन, मछुआरे और सागरीय दृश्य इन कलाकारों के प्रिय विषय रहे। बाँस, बेर, अमरकन्द तथा गुलदाउदी वृक्षों को चार सज्जनों की उपाधि दी। बाँस के चित्रण में अधिक रूचि दिखाई देती है।

यहाँ की चित्रकला, भित्ति चित्र, रेशम के कुंडलित पटचित्र काष्ठ मुद्रण पर आधारित छापा चित्र प्रचलित हैं। ‘ऊकियो-ए’ शैली में इस क्षण भंगुर संसार के दृश्य चित्रों में एक रंग के और बहुत से रंगों से छापा चित्र बनाए, जिसे ‘सुमिजुरि-ए’ और ‘निशिकी-ए’ कहा गया। होकुसाई और हिरोशिगे ने प्राकृतिक दृश्य चित्र बनाए। प्राकृतिक दृश्यों की सामग्री की खोज में भ्रमण किया। फूजी-पर्वत के छत्तीस दृश्य, प्रसिद्ध पुलों के दृश्य, जापान के झरने, जल के हजारों रूप के प्रिंट प्रकाशित करवाए।

पेंटिंगपेंटिंगजापान की दृश्य कला यहाँ के पर्यावरण से प्रभावित दिखाई देती है।

कला जगत में दृश्य चित्रण प्रकृति अर्थात पर्यावरण की देन है। प्रकृति में सौन्दर्य की खोज का परिणाम दृश्य चित्र के रूप में दिखाई देता है। भारतीय चित्रकला में सौन्दर्य निरूपण के लिये प्रकृति ही उसका आदर्श रही है। प्रकृति ने विभिन्न समयों में चित्रकारों को अलग-अलग तरह से प्रभावित किया है। विभिन्न प्रकार की प्रकृति भिन्न-भिन्न पर्यावरणों का निर्माण करती है। स्थलमण्डल, जलमण्डल, वायुमण्डल और जीवमण्डल के कारण ही पर्यावरण में पृथकता दिखाई देती है। इस विस्तृत सृष्टि के रहस्यों को पहचानना आसान नहीं है। फिर भी विद्वानों, भू-वैज्ञानिकों, कलाकारों, कवियों ने इसे जानने का प्रयास किया है। प्रकृति के रहस्यमयी स्वरूप का अवलोकन किया। उसमें उसने पाया कि विशाल धरती पर ऊँचे-ऊँचे पहाड़, पर्वत शृंखलाएँ, कलकल करती नदियाँ, पहाड़ों को चीर कर ऊँचाई से प्रवाहित झरने, हरीतिमायुक्त धरती तो कहीं लाल तो कहीं धूसर रंग की धरती, घने जंगल जिसमें शक्तिशाली पशुओं का विचरण, घास के मैदान, विस्तृत समुद्र और आकाश, आकाशीय और जलीय पशु-पक्षी तथा अनेक प्रकार के जीव-जन्तु विद्यमान हैं। साथ ही अनेकों परिस्थितियाँ और मौसम भी। वर्षा, शिशिर, बसन्त, गर्मी, रात-दिन, सुबह-शाम, आँधी-तूफान, झंझावात, प्रलय, जलप्लावन, भूकम्प आदि विद्यमान हैं। सृष्टि में सभी स्थितियाँ पर्यावरण के नियमन से ही उत्पन्न होती हैं। मानव पर्यावरण का एक हिस्सा है, जो अधिक संवेदनशील है। इस कारण उसे महसूस करने की क्षमता सर्वाधिक है।

कलाकार की विशिष्ट दृष्टि प्रकृति का अन्तर्मन से अवलोकन करती है, जिससे उसके अचेतन मन में प्रकृति के प्रति साहचर्य भाव उत्पन्न होता है। उसे आत्मसात कर उसमें सौन्दर्य के गुण ढूँढती है, जिससे उसे आनन्द की अनुभूति होती है। तब कहीं वह विभिन्न माध्यमों चित्र, मूर्ति, संगीत और काव्य से अभिव्यक्त कर पाती है।

जिस प्रकार रचनात्मक प्रक्रियाएँ जिनका आधार भावात्मक है, वह मन का ही परिणाम है। मन की सृष्टि के मूल में उत्प्रेरित हो रहा है। कला भी मन का विस्तार है। व्यक्ति में मानसिक प्रतिक्रियाएँ होती रहती हैं और वे अपना विस्तार विभिन्न पहलुओं से, विभिन्न दिशाओं में और विभिन्न कोणों से करती रहती है। इस महत्व को ही अभिव्यक्ति कहा जा सकता है।

अर्थात ललित कला से सम्बन्धित कलाएँ जैसे चित्रकला, मूर्तिकला, काव्य और नाट्यकला भावपूर्ण कलाएँ होती हैं। यह कलाकारों के मन में रहने वाले उद्गारों को बाह्य रूप में व्यक्त करने का प्रयास ही है। चित्रकार रंगों-रेखाओं के माध्यम से, संगीतकार कंठ और वाद्य यंत्र से, मूर्तिकार-पत्थर, लकड़ी, धातु और कल्पना से, कवि शब्दों और अलंकारों से, नाटककार धारण किये पात्र की मुद्राओं से अपने हृदय के उद्गारों को व्यक्त करता है। इसके लिये चित्रकार जल रंग, तेल रंग, एक्रेलिक, पेस्टल, पेन्सिल आदि माध्यमों में से चुन लेता है और इसे दृश्य चित्रण, संयोजन, व्यक्ति चित्रण या अमूर्तन के माध्यम को चुनकर सौन्दर्यपूर्ण सृजन करता है। चित्रण में सृजनकर्ता के अन्तर्मन के भाव छिपे होते हैं। उन्हें ही विस्तार देकर अभिव्यक्त किया जाता है। विभिन्न भाव के मूल में कोई-न-कोई ‘रस’ छिपा होता है।

कला की मूल शक्ति का स्रोत प्रकृति में निहित है। प्रकृति से ही पर्यावरण निर्मित होता है। अनन्त शक्ति ने चेतन और अचेतन दोनों को ही बनाया है। प्रकृति से अर्थ उन समस्त पदार्थों से है, जो हमें इस संसार में चर्म-चक्षुओं से दृष्टिगत होते हैं। उन समस्त क्रियाओं से है, जो हमारे अनुभव और ज्ञान के भौतिक संसार से परिपूर्ण हैं तथा उन समस्त मनोवैज्ञानिक क्रियाओं से है, जो जीवन में निम्न एवं उच्च स्तर पर जन्म लेती है। इस प्रकार प्रकृति के विषय में मौलिक पदार्थ के उस ज्ञान से सम्बन्धित है, जो हमारी जिज्ञासा का आधार है। इसमें वे सभी वस्तुएँ सम्मिलित होती हैं, जिसे हम वैज्ञानिक सिद्धान्तों के रूप में प्रतिपादित करते हैं। प्रकृति का सम्पूर्ण जगत व्यक्ति और समष्टि से मिलकर बनता है।

अर्थात कला सदैव प्रकृति से ही प्रेरणा पाती रही है। यदि प्रकृति न होती तो पर्यावरण भी नहीं होता। ईश्वर ने ही जीवित अजीवित दोनों को ही बनाया है, जो इस पर्यावरण का हिस्सा हैं, जिन्हें हम हमारे नेत्रों से देखते हैं। उन देखे हुए दृश्यों, क्रिया-कलापों से हम आनन्दित होते हैं, विस्मित होते हैं, दुखी होते हैं, क्रोधित होते हैं, प्रेम करते हैं आदि-आदि। इस प्रकार प्रकृति के सम्बन्ध में उन मौलिक पदार्थों को जानने की इच्छा है, जिससे प्रकृति निर्मित हुई है। इसे वैज्ञानिक सिद्धान्तों के रूप में प्रतिपादित किया जा सकता है, जैसे जल का वाष्पित होकर बादलों का बनना और वर्षा के रूप में पुनः धरती पर आना। इससे धरती का हरीतिमायुक्त होना एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव उत्पन्न करता है। प्रकृति में व्यक्ति और समष्टि दोनों ही विद्यमान हैं। प्रकृति सभी के लिये ग्राह्य है। यह सभ्य-असभ्य, मूर्ख-विद्वान, धनी-निर्धन सभी के लिये अपना सौन्दर्य प्रस्तुत करती है।

जिस प्रकार रचनात्मक क्रियाएँ भाव और मन से सम्बन्धित हैं, उसी प्रकार से दृश्य चित्रण और पर्यावरण भी अन्तः सम्बन्धित है, जिस प्रकार दूध और पानी को कभी अलग नहीं किया जा सकता उसी प्रकार दृश्य चित्रण और पर्यावरण को भी अलग करके व्याख्या नहीं की जा सकती। किसी भी कला पर पर्यावरण और समय का प्रभाव पड़ता ही है। जहाँ शीत अधिक होती है और रातें लम्बी तथा अंधेरी होती हैं कला में वैसा ही वातावरण चित्रित किया जाता है। इसी वातावरण के साथ समुद्री किनारा हो तो वहाँ के लोगों में अनेक रहस्यपूर्ण भावनाएँ, अन्धविश्वास तथा साहसिक आदि के भाव उदय होते हैं। गर्म प्रदेश में शरीर रचना का विशेष ध्यान रखा जाता है। वहाँ की कलाओं में वानस्पतिक सौन्दर्य भी दिखाई देता है। जहाँ जीवन के साधन सरलता से उपलब्ध होते हैं वहाँ विलासिता अधिक पनपती है। खुले तथा विशाल मैदानों की कला में स्थिरता, दृढ़ता और स्पष्टता होगी। इसी प्रकार जहाँ पत्थर की खानें होंगी वहाँ मूर्ति और स्थापत्य कला अधिक उन्नत होगी। जो लोग कृषि कार्य करते हैं, उनकी कला में कृषि सम्बन्धित देवताओं तथा समझौतावादी दृष्टिकोण का समावेश होगा। वंश परम्परा से तंग गलियों और अंधेरी कोठरियों में रहने वालों का दृष्टिकोण भिन्न होगा। खुली प्रकृति की गोद में रहने वाला कलाकार प्राकृतिक सौन्दर्य का अंकन करेगा। शहरी कलाकार कामनी कंचन को अधिक महत्व देगा।

आदिवासी कलाकारों ने विशिष्ट प्रकार की अलंकरणात्मक शैली अपनाई। वे जंगलों में निवास करते थे और प्रकृति से उनका विशेष लगाव था। उन्होंने प्राकृतिक रूपों को अपने घर आँगन को सजाने के साथ ही शरीर अलंकरण परम्परा को भी अपनाया। सरलतम रूपाकारों से आस-पास के पर्यावरण को सुशोभित किया।

इसी प्रकार लोक अंचल में ‘लोक-कला’ प्रचलन मेें आई। विभिन्न पर्वों, शादी-विवाह के समय वे प्रकृति के विभिन्न रूपों से धरती और दीवारों को अंलकृत करते हैं। प्रत्येक आकार की अपनी विशिष्ट जगह होती है। मालवा, बुन्देलखण्ड, बघेलखण्ड, निमाड़ मेें लोक परम्पराएँ प्रचलित हैं। यह सब वहाँ के भौतिक पर्यावरण के कारण अपनी विशिष्ट पहचान बनाती हैं। अतः कहा जा सकता है कलाओं पर सामाजिक पर्यावरण का प्रभाव पड़ता है।

भारतीय चित्रकार का प्रधान लक्ष्य रस की व्यंजना रहा है। ग्रामीण आदिवासी क्षेत्रों में लोक परम्परा और आदिवासी परम्परा विद्यमान रही। ललित कला, लोककला और आदिम कलाएँ मनुष्य की सौन्दर्यवृत्ति की परिणाम है जो अपने चारों और के पर्यावरण से प्रेरित होकर मनुष्य में जो सौन्दर्य धारणा उत्पन्न होती है, वहीं कलाओं में प्रतिपादित होती है। वातावरण और परिस्थितियाँ सामाजिक विकास की गति निश्चित करती हैं। यह पृथक वातावरण में प्राचीन परम्पराओं को अक्षुण्ण रखने वाली कला है। इस वातावरण का प्रभाव आकृतियों, शैली, उपकरणों, धार्मिक क्रियाओं, मनोरंजन, जन्म, विवाह एवं मृत्यु आदि संस्कारों तथा फसल के उत्सवों आदि में विकसित होता दिखाई देता है। लोक कलाकृतियाँ लोक सापेक्ष होती हैं, लोक कलाकार ऐसे वातावरण में कार्य करता है जहाँ उसकी परम्पराओं का कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं होता। लोक कला के रूप दैनिक जीवन से पूर्णतः सम्बन्धित होते है।

सन 1933 में क्रोचे ने लोक साहित्य को लोक वातावरण से पृथक देखने की चेष्टा की, किन्तु वास्तव में लोक कला भी वातावरण से पृथक नहीं रह सकी। वातावरण तथा परिस्थितियों का प्रभाव भौगोलिक परिवेश एवं बाह्य सम्पर्कों से भी सम्बन्धित है। मध्य प्रदेश में मध्यकालीन चित्र में कुछ प्रमुख शैलियाँ विकसित हुईं जो मालवी, बुन्देली, बघेली तथा ग्वालियरी के नाम से जानी जाती है।

मालवा मध्य प्रदेश का अत्यन्त सम्पन्न अंचल है इस कारण मालवा की लोक परम्परा भी समृद्ध है। विंध्य पठार के ठंडे जलवायु और उर्वरा शस्य श्यामल भूमि के कारण मालवा की लोक-व्यापी संस्कृति का केन्द्रीय भाव जीवन के हर क्षेत्र में दिखाई देती है। पारम्परिक लोक कला का आधार व्रत, अनुष्ठान पूजा-पाठ है और व्यावसायिक चित्रकला का आधार सामाजिक सौन्दर्य बोध है।

मालवा की चित्रकला में हरियाली अमावस्या पर दिवासा नागपंचमी को नाग चित्र, श्रावणी पर सरवण चित्र जन्माष्टमी पर कृष्ण जन्म के भित्ति चित्र, श्राद्ध पक्ष में संजा, नवरात्रि में नवरत, दशहरा पर्व पर दशहरे का भूमि-चित्र, दीपावली पर गेरू खड़िया के मांडने, देव प्रबोधिनी एकादशी पर चौक, शीतला सप्तमी पर हल्दी कुमकुम के हाते, जन्मोत्सव पर पगल्या साती भरना, विवाह में मायमाता का मिथकीय चित्र, पिठौरा-पिठोरी, गंगापूजन का भित्ति चित्र आदि विभिन्न अलंकरण है। ग्राम्य बालाएँ घर आँगन द्वार को सजाती हैं। कार्तिक माह में कन्याएँ प्रातः उठकर जलाशय में स्नान करती हैं और मन्दिर में जाकर पूजन करती हैं। पूजन के साथ लोकगीतों का भी महत्व है जैसे पर्यावरण को महत्व प्रदान करता हुआ मालवी लोकगीत-

बड से बंधी पालन्यों, पीपर से बंधी डोर रे।
आवत जावत दऊँ, मचोका, झूले हैं नन्दलाल जी।।


इस प्रकार लोग गीतों के आधार पर लोक चित्रों का भी निर्माण हुआ है। लोक चित्र कथानकों पर निर्भर होते हैं। इन चित्रों को बनाने के लिये प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया जाता है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को चित्रों में स्थान दिया है उपरोक्त उदाहरणों से यह निश्चित होता है कि पर्यावरण और मनुष्य एक दूसरे के पूरक हैं इनको अलग नहीं किया जा सकता। उसी प्रकार दृश्य चित्रण और पर्यावरण को भी अलग नहीं किया जा सकता, क्योंकि दृश्य चित्रण में भी पंच तत्वों का समावेश किया जाता है।

मालवा शैली के प्रमुख केन्द्र, इंदौर, उज्जैन, देवास, धार, मंदसौर, राजगढ़ तथा नरसिंहगढ़ है। इन केन्द्रों पर अलग-अलग समय राजवंश बदलते रहे। अतः मालवा की चित्रकला धार्मिक और राजसी पर्यावरण के अनुरूप चित्रित की जाती रही। 15-17 शती में चित्रकला में बहुत बड़ा बदलावा आया। इस लोकप्रियता का कारण सरल भाषा में साहित्य का निर्माण किया। रीति काव्य के प्रचार के कारण 16वीं शती में केशवदास के ‘रसिक प्रिया’ बारहमासा के चित्र बने हैं। इसके साथ माधवदास के अमरूशतक तथा रागमाल के चित्र भी लोकप्रिय हुए। प्रकृति को पृष्ठभूमि के रूप में चित्रांकित किया है।

19वीं सदी में यूरोपीय शैली के प्रभाव से स्वतंत्र दृश्य चित्रों का निर्माण किया गया। आधुनिक काल में अनेकों दृश्य चित्रकारों ने मालवा की धरती को गौरवान्वित किया। डी.जे.जोशी, अफजल पठान, चन्द्रेश सक्सेना आदि के दृश्य चित्रों में मालवा के चटक रंगों के दृश्य चित्रों के दर्शन होते हैं।

बुन्देली लोक कला में शौर्य और शृंखला से सम्बन्धित चित्र बने हैं। बुन्देली लोकचित्र परम्परा में पर्व-त्योहारों और भित्ति चित्रों और भूमि अलंकरण की बहुलता है। चौक-पूरना और आँगन में एपन बनाने की प्रथा है। यहाँ नाग पचैया, नेवला अष्टमी, शीतला सप्तमी के हाथे, हलछठ, गूँगा नवमी, हरतालिका, राधा अष्टमी, सांझी, जिरतिया, महालक्ष्मी, मुलिया, करवा चौथ, अहोई अष्टमी, सुअटा, भाई दूज, दिवाली पर सुरैती आदि कला के श्रेष्ठ उदाहरण हैं। जिनमें बुन्देली साहित्य के दर्शन होते हैं।

पेंटिंगपेंटिंगचित्रकला के क्षेत्र में भी चन्देलों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। चन्देल राजा मदन वर्मन के संरक्षण में अपभ्रंश शैली में वैष्णव मन्दिर के चित्र बने हैं। बुन्देलखण्ड शैली का प्रारम्भ ओरछा से माना जाता है। यहाँ की शैली पर मालवा, राजस्थान शैली का प्रभाव देखने को मिलता है। शत्रुजीत सिंह के समय एक नवीन शैली विकसित हुई, जिसमें राधाकृष्णन का प्रणय तथा ऋतुओं पर आधारित बारहमासा में पृष्ठभूमि में दृश्य चित्रण दिखाई देता है। ओरछा में चित्र परम्परा नहीं थी परन्तु यहाँ कलाकारों को प्रश्रय अवश्य दिया जाता था। यह नवांकुरित शैली दतिया से विकसित हुई। इस चित्रण में वृक्षों, मानवों और पशु समूहों का अंकन दिखाई देता है तथा परिप्रेक्ष्य का अभाव दिखाई देता है।

इसी प्रकार बघेलखण्ड में भी ललित कला की जगह लोक कला का ही प्रचलन रहा है।

अन्तः भारत में हमें विभिन्न प्रकार के पर्यावरण दिखाई देते हैं, जो कि उस क्षेत्र की जलवायु, खनिज सम्पदा और वनस्पति पर निर्भर करती है। यही भौगोलिक पर्यावरण हमें दृश्य चित्रों में दिखाई देता है। इस पर्यावरण को मुख्यतः दो भागों में विभक्त किया जा सकता है-

1. प्राकृतिक पर्यावरण
2. सांस्कृतिक पर्यावरण

प्राकृतिक पर्यावरण

प्राकृतिक पर्यावरण को भौतिक पर्यावरण भी कहा जाता है क्योंकि यह भौतिक जगत से सम्बन्धित हैं, जो कि नाशवान होता है। चित्रकार उस दृश्य का सृजन कर उसे यादगार बना देता है। संसार का सम्पूर्ण दृश्य पर्यावरण पर ही आधारित होता है। प्राकृतिक पर्यावरण वह पर्यावरण होता है, जिस पर मनुष्य का कोई नियंत्रण नहीं होता। यदि मनुष्य को पृथ्वी से पृथक कर दिया जाए तो जिन प्रक्रियाओं-क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं पर कोई अन्तर न आए, उन सब कारकों को भौतिक या प्राकृतिक पर्यावरण के अन्तर्गत रखा गया है, जिसका आशय यह है कि जिसका निर्माण और नियंत्रण मनुष्य से परे है जो प्रकृति प्रदत्त है, वह सब कुछ भौतिक पर्यावरण के अन्तर्गत आता है। जैसे- सूर्य-ताप, ऋतु परिवर्तन स्थिति, भू-वैज्ञानिक संरचना, भूकम्प, ज्वालामुखी, उद्भेदन, मृदा, खनिज, वनस्पति जीव-जन्तु आदि ऐसे तथ्य हैं, जो प्रकृति द्वारा उत्पन्न हुए हैं। अतः उक्त सभी तथ्यों को प्राकृतिक अथवा भौतिक पर्यावरण के अन्तर्गत रखा जाता है।

प्रकृति में ही पर्यावरण निहित है। जहाँ पर वनस्पति अधिक होगी। वहाँ का हरित पर्यावरण दर्शक का मन मोह सकेगा। पचमढ़ी, माण्डव, तामिया जैसे पर्यटन स्थल पर दर्शकों के आकर्षित होने का कारण ही यही है। दृश्य चित्रकारों ने भी यहाँ की हरीतिमा के मध्य ऐतिहासिक और पुरातत्वीय महत्व के स्थानों को उकेरा है। सम्पूर्ण प्रकृति को ईश्वर ने बनाया है। विशाल पर्वत श्रेणी, अथाह समुद्र, आकाश का अतुलनीय विस्तार, काले घुमड़ते हुए मेघ, बिजली का कड़कना एक उदात्त भावना उत्पन्न करता है। इसमें एक ओर मानव मन में भय उत्पन्न होता है, तो वहीं दूसरी ओर वह उसमें सौन्दर्य पूर्ण स्वरूप की खोज भी करता है। मानव की लघुता और ईश्वर की महानता के दर्शन इन्हीं प्राकृत रूपों में होते हैं। राजस्थानी चित्रों मुगल चित्रों में इन प्राकृत रूपों के दर्शन होते हैं।

इस प्रकार मनुष्य कभी भयभीत हुआ तो कभी इसे ईश्वर मानकर पूजा। यहीं से धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यावरण निर्मित होता है। प्राकृतिक तत्व जल, थल, अग्नि, आकाश और वायु को ईश्वर के रूप में पूजा जाता है। वैदिक काल में हवन कर ऋषियों द्वारा इनका आवाह्न करने की परम्परा प्रचलन में रही है। इसके प्रमाण हमें ऋग्वेद में मिलते हैं। हमारा धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक पर्यावरण प्राकृतिक पर्यावरण पर ही अवलम्बित होता है। प्रकृति के सूक्ष्म भावों के चित्रण भारतीय चित्रकला में दिखाई देते हैं। इनके सशक्त उदाहरण पहाड़ी चित्रण, राजस्थानी चित्रण, अजन्ता एवं अन्य शैलियों से दिखाई देते हैं। मुगल एवं अपभ्रंश शैली में प्रकृति को अलंकरणात्मक शैली में बनाया है। जल, थल, वायु, आकाश और वनस्पति, धूप आदि को अधिक चैतन्य अवस्था में बनाया जाता है। इन कलाकारों के लिये प्रकृति जड़ नहीं, वरन मानवीय सुख-दुखों से निकलने वाली चेतन सत्ता है। चित्र में जो भाव नायक-नायिका के मन में होता है। प्रायः उसी का प्रतिबिम्ब प्रकृति में भी पाया जाता है।

चित्रों के मात्र पेड़-पौधे ही नहीं वरन पशु-पक्षी भी साहचर्य के रूप में रहकर एक सामंजस्य की भावना को उजागर करता है। इस प्रकार चित्रकार प्रकृति के सभी जीव घटकों को उद्दीपन के रूप में अकिंत करता है। थोर ने ‘प्रकृति को सर्वोच्च कलाकार माना है, जिससे सभी अनुपात के सिद्धान्त प्राप्त होते हैं।’

प्रकृति सौन्दर्य के परम उपासक रस्किन ने शुभ्र प्रकाश में व्याप्त सात रंगों में सात नैतिक गुणों को प्रतिबिम्बित होते देखा है और लिखा है ‘प्रकृति का सौन्दर्य चरित्र के सौन्दर्य का प्रतिबिम्ब है।’

प्रकृति में धूप, हवा, अग्नि, माटी, आकाश की छवि कला के सृजन हेतु जगत को स्पन्दित करती रहती है। बादलों की गड़गड़ाहट, बिजली की चकाचौंध, पक्षियों का कलरव, पुष्पों की महक, फलियों की चटक, पत्तियों की लहक, जल के बिम्ब, चाँद की उजियारी, सूरज की धूप, शंख और सीपी का सृजन, पर्वतों का उन्नयन, सागर की लहरों का नर्तन आदि अन्याय रूपों में ये रूपाकार धरती की अभिव्यक्ति है।

धरती पर उपस्थित रूपों पर जब सूर्य की किरणें आरोपित होती हैं तो झरना, नदी, वृक्ष, पहाड़, मैदान, बाग-बगीचे तथा श्यामल धरती पर सौन्दर्य की जगमगाहट उभरती है। वहीं प्रकृति की चित्रशाला में ग्रीष्म, वर्षा, हेमन्त-बसन्त और शिशिर के परिवर्तन के साथ ही नवीन पर्यावरण होता है। यही परिवर्तन हमें कलाकार की कृतियों में भी दृष्टिगत होता है। चित्रों में वातावरण का प्रभाव आकारों और रंगों में दिखाई देता है। पर्यावरण का महत्व तब ही है जब कलाकार उसे मूर्तरूप प्रदान करता है जो भी उसे दिखाई देता है, वह उस स्थल का दृश्य चित्र बनाता है।

यदि हम पर्यावरण और दृश्य चित्रकार की तुलना करते हैं, तो ज्ञात होता है कि हमारे चारों ओर अन्तहीन प्राकृतिक वैभव भरा हुआ है जिसमें से कुछ अंश को ही चित्रकार अपने चित्रों में स्थान दे पाता है।

सूर्योदय में वह जादू न रहा होता अगर कला-कला में उसकी विलक्षणता को चित्रांकित न किया गया होता। बरसते बादलों में वह खूबसूरती नहीं दिखाई देती अगर कवियों ने उसकी अद्भुत व्याख्या न की होती, कोयल की आवाज में वह दर्द न महसूस होता। अगर संगीत की बन्दिशों में वह न गाया गया होता। मध्य काल में काव्य, संगीत तथा चित्रकला में प्रकृति के प्रति प्रेमजन्य सौन्दर्य की व्याख्या की गई है।

सांस्कृतिक पर्यावरण

सांस्कृतिक पर्यावरण प्राकृतिक पर्यावरण पर आधारित होता है। प्राकृतिक संसाधनों के सहयोग से व्यक्ति संस्कारवान होता है। प्राचीन दार्शनिकों के अनुसार ज्ञान का मूल स्रोत भी प्रकृति ही है। वड्स वर्थ के शब्दों में “प्रकृति के विश्लेषणात्मक अध्ययन के लिये विज्ञान ने भी अनेकानेक उपकरणों का निर्माण किया। इन वैज्ञानिक उपकरणों की सहायता से हम प्राप्त प्रकृति की अनेक वस्तुओं का सूक्ष्मातिसूक्ष्म अध्ययन कर ज्ञान प्राप्त करते हैं। प्रकृति के विषय का ज्ञान हमारी जिज्ञासा को शान्त करता है। आज पर्यावरण के दो बिन्दु सहज रूप से प्रकट होते हैं पहला प्राकृतिक औदार्य का उचित लाभ उठाया एवं दूसरा मनुष्य जनित प्रदूषण को कम किया जाए।”

इसके फलस्वरूप प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करते हुए अनेकों सुविधायुक्त एवं सौन्दर्यपूर्ण वस्तुओं का सृजन किया। जैसे भवन, मार्ग, परिवहन, संचार, उद्योग एवं व्यापार आदि। सघन नगरीय क्षेत्रों में सांस्कृतिक पर्यावरण प्राकृतिक पर्यावरण से अधिक प्रभावित होता है फिर भी प्राकृतिक पर्यावरण की सर्वोच्च सत्ता है तथा मानव जीवन के विकास के लिये यह अनुकूल होता है। इस विकास की प्रक्रिया के दौरान मानवीय जीवन में अनेकों परिवर्तन दिखाई देते हैं। प्रागैतिहासिक काल का मानव स्वयं की रक्षा और पेट की क्षुधा शान्त करने तक ही सीमित था। किन्तु इन उद्देश्यों की पूर्णता प्राप्त करने के लिये उसने गुफाओं को चित्रों से सुसज्जित किया। आदिमानव प्राकृतिक पर्यावरण के बहुत समीप था। इसके बाद धीरे-धीरे मनुष्य संस्कारवान हुआ। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो सभ्यता में मानव का परिष्कृत रूप सामने आया। इस समय से ही संस्कृति अपने उच्चतम स्वरूप में आई।

संस्कृति और पर्यावरण का घनिष्ठ सम्बन्ध है। संस्कृति मानवीय चेतना से जुड़ी हुई है। भारत की भौगोलिक रूपरेखा ने सांस्कृतिक एकता बनाए रखने में बहुत बड़ी भूमिका अदा की है। भारत के विभिन्न प्रान्तों में भाषा, पहनावा, रहन-सहन, भोजन धर्म तथा संस्कारों की विविधता पाई जाती है। ये सभी पर्यावरणीय तत्वों पर आधारित होते हैं अर्थात अग्नि, जल, थल, वायु, धरती और आकाश। सांस्कृतिक पर्यावरण को सुदृढ़ करने के लिये जल महत्त्वपूर्ण तत्व है। यह शाश्वत सत्य है कि ‘जल ही जीवन है।’ जल मनुष्य की बहुत बड़ी आवश्यकता है इसके बिना जीवन की कल्पना करना भी कठिन है। जबसे पृथ्वी का निर्माण हुआ तब से जल भी हमारे साथ रहा। पृथ्वी के हर छोटे बड़े प्राणी, जीव, पेड़-पौधों के लिये जल की आवश्यकता होती है। हमारी पृथ्वी में यह तरल अथवा ठोस(बर्फ) रूप में विद्यमान रहता है। यह समुद्र तथा नदियों के रूप में पाया जाता है।

बर्फ के पिघलने से नदियाँ प्रवाहित हुईं और संसार में नदी संस्कृति का विकास हुआ। जैसे भारत में Indus Vally Civilization (सिन्धु घाटी की सभ्यता), नील नदी किनारे मिश्र सभ्यता तथा दजला फरात के किनारे मेसोपोटामिया सभ्यता आदि। विश्व की प्रमुख सभ्यताएँ नदी किनारे ही विकसित हुई। भारतीय नदी संस्कृति में गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु तथा कावेरी नदियाँ प्रमुख रूप से विद्यमान हैं।

गंगेस्चेतै यमुने चैव गोदावरी सरस्वती।
नर्मदे सिन्धु, कावेरी जलेस्मिन सन्निध कुरू।।

भारत का प्राचीन सांस्कृतिक इतिहास तो मुख्यतः सरस्वती, गंगा, यमुना तट का ही इतिहास है। यहाँ न केवल आश्रम संस्कृति की सार्थकता एवं रमणीयता नदियों किनारे पनपी, अपितु नागर सभ्यता का वैभव भी इन्हीं के बल पर बढ़ा। समाज, समूह और व्यक्ति ही सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है जो एक संतति से दूसरी संतति तक जाता है। वह चाहे सभ्य समाज हो या आदिम समाज।

भारत की सिन्धु-घाटी सभ्यता उल्लेखनीय है। सिन्धु नदी किनारे ही मानव ने कृषि करना, समूह में रहना, पशुपालन करना, पकी ईंटों से घर बनाना, सड़क बनाना, पकी ईंटों के बर्तन, मूर्तियाँ बनाना, आग से पका भोजन करना, अन्न भण्डारण और मुद्राओं द्वारा वस्तु विनिमय करना स्वयं के व्यवहार में शामिल किया। इसी समय मानव ने उपयोग में लाई जाने वाली चीजों को और स्वयं को भी अलंकृत करना सीखा। इसके प्रमाण हमें मृदा पात्रों में अलंकृत आलेखनों और अलंकरणों से प्राप्त होते हैं। इन चित्रित पात्रों में मानवाकृतियों के साथ शैलीबद्ध रूप में पशुओं का अंकन है। उस समय के मानव (चित्रकार) सहस्रों वर्षों पहले का सांस्कृतिक पर्यावरण दिखाते हैं। प्रकृति की चिर परिचित वस्तुएँ- यथा पशु-पक्षी, जल तरंगों में तैरती उतराती मछलियों, हरे-भरे वृक्ष व पौधे, फूल-पत्र आदि भीतर की निर्वाक गरिमा से विस्मित एक अवर्णनीय उदात्त भावना व्यंजित करते हुए कला के संस्कार और मार्जन में एकाकार हो उठे हैं। न सिर्फ रात-दिन बरतने वाले बर्तनों, शव के साथ दफनाए गए पात्रों, मिट्टी के भाण्डों आदि पर कलात्मक चित्रकारी की गई है। मधु इकट्ठा करते हुए, जाल में मछली पकड़ते हुए मानव, पक्षियों की पंक्तियाँ, ज्यामितीय अलंकरण आदि मानवीय और पशु-पक्षी सम्बन्धों को उजागर करते हैं। यहाँ प्राप्त मोहरों में भी पशु और मानव को एक साथ दिखाया है। सिन्धु सभ्यता मे पशुपतिनाथ की मुद्रा भी प्राप्त हुई है।

कई सिन्धु मुद्राओं में पीपल वृक्ष के दो फांक मिले हैं जिससे ज्ञात होता है, कि यहाँ पीपल की पूजा भी प्रचलित थी। यहाँ मातृ-देवी की मूर्तियों की आराधना प्रकृति की विभिन्न शक्तियों के रूप में की जाती है। उस समय वृक्ष पशु और जल को भी मान्यता थी एवं यक्ष और राक्षसों पर भी विश्वास था। ये सभी उद्धरण उस समय के आर्य सांस्कृतिक परिवेश को इंगित करते हैं। साथ ही कलाकार और प्रकृति के सम्बन्धों को दर्शाते हैं।

कलाकार ने सिर्फ प्राकृतिक दृश्यों का ही चित्रण नहीं किया, बल्कि सामाजिक दृश्यों और उसमें पनपी अच्छाइयों, बुराइयों और दुष्परिणामों को भी उजागर किया। साथ ही समाज में प्रचलित आचार-विचार, परम्पराएँ तथा क्रिया-कलापों को भी स्थान दिया। इन चित्रों में दृश्य सदैव अबाध रूप से उपस्थित रहा और यही दृश्य चित्रण ग्रामीण परिवेश और नगरीय संस्कृति से अवगत कराता है। प्रारम्भ में चित्रकारों ने विशुद्ध दृश्य चित्र कम ही बनाए हैं वे मात्र सहायक के रूप में ही प्रयुक्त होते रहे हैं।

वर्गेल महोदय ने सामाजिक पर्यावरण के सम्बन्ध में कहा है कि- नगरीय समाज विज्ञान पर्यावरण का व्यक्ति पर पड़ने वाले प्रभाव का विशेष अध्ययन है। जीवन चाहे ग्रामीण हो या नगरीय पर्यावरण से अवश्य प्रभावित होता है। जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों को व्यवस्थित रूप से जानकारी योग्य बना दिया जाता है तो इसे नगरीय समाज विज्ञान के नाम से जाना जाता है। इस प्रकार नगरीय अथवा ग्रामीण संस्कृति ने चित्रकारों को प्रभावित किया।

समाज में उपस्थित बुराइयों को दूर करने में राजनैतिक पर्यावरण का सहारा लेना पड़ा। सबसे प्रमुख समस्या है, पर्यावरणीय जिसमें वनों की कटाई, भूमि क्षरण, जल क्षरण, वायु प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण आदि। समाज में उपस्थित बुराइयों को दूर करने के लिये ही राजनैतिक संरक्षण की आवश्यकता होती है। शासन ने पर्यावरण की रक्षा हेतु 5 जून को पर्यावरण दिवस मनाने का निश्चय किया है। आज समाज के बदलते परिवेश में मानव ने प्रकृति का अतिदोहन भी किया है और नष्ट भी करने का प्रयास किया है। ग्लोबल वॉर्मिंग जैसी समस्या के उत्पन्न होने का कारण भी यही है।

श्री सुन्दरलाल बहुगुणा ने इस बात के लिये आगाह किया है कि यदि पर्यावरण को नष्ट किया तो उसका परिणाम मनुष्यों, जानवरों तथा पशु-पक्षियों के लिये बहुत बुरा होगा।

वर्तमान में केदारनाथ में आया प्रलय प्रकृति से की गई छेड़-छाड़ और अत्यधिक दोहन का ही परिणाम है। पर्यावरण प्रदूषण का एक ओर मुख्य कारण मानव द्वारा निर्मित स्थापत्य शृंखला और फैक्ट्रियाँ हैं। इससे वनों को नष्ट कर ऊँची-ऊँची बिल्डिंग्स और फैक्ट्रियाँ बनाई जा रही हैं। भोपाल गैस त्रासदी ऐसा ही एक उल्लेखनीय उदाहरण है। इन दुष्परिणामों से अवगत कराने की जिम्मेदारी चित्रकारों ने उठाई। इससे सम्बन्धित चित्र और पोस्टर बनाने का कार्य किया और लोगों को जागृत किया। श्री सचिदा नागदेव के रेखांकनों और चित्रों से यह स्पष्ट होता है। अतः कहा जा सकता है कि यदि पर्यावरण अच्छा होगा तो सृजन कार्य अच्छा होगा और दूषित पर्यावरण का प्रभाव भी चित्रकला पर पड़ेगा ही। जब भी कोई ट्रेजडी भू-भाग पर आती है चित्रकार की तूलिका सक्रिय हो जाती है। वह भोपाल की गैस त्रासदी हो या केदारनाथ का प्रलय। कला सदा जागरूक करती है।

भारतीय दृश्य कला और पर्यावरण

भारत में आरम्भ से ही प्रकृति की पूजा की जाती रही है अर्थात पर्यावरण की पूजा। प्रागैतिहासिक काल में मानव ने तत्कालीन पर्यावरण में उपस्थित जीव-जन्तुओं को देखा। पर्यावरण के सन्तुलन हेतु जीव-जन्तुओं की एक शृंखला होती है, जिसमें चींटी, कीड़े-मकोड़े, सुअर, गाय, भैंसा, हिरण, शेर, बारहसिंघा, चीतल, मछली, मोर, साँप आदि-आदि। आखेट संस्कृति के अन्तर्गत आदि मानव ने उपत्यकाओं (Caves) में मानव और पशु के सम्बन्धों को चित्रों द्वारा उजागर किया। कहीं मानव जीव-जन्तुओं का साथी रहा तो कहीं पशुओं के आक्रान्त भाव को कम करने के लिये आखेट किया। इन प्रसंगों को उसने सरल रेखाओं द्वारा अंकित किया। उसने अनुकूलता प्रतिकूलता का रहस्य हृदयंगम किया। ऋतुओं, जलवायु, वायुमण्डल, आकाशमण्डल और वनस्पतियों के निरन्तर साहचर्य के कारण आदिम मनुष्य ने उनके प्रभावों, प्रतिक्रियाओं का ज्ञान प्राप्त किया। मनुष्य ने पृथ्वी की जिस अतीत बेला में नेत्रोन्मीलन किया तभी कला के प्रति जिज्ञासा स्वाभाविक रूप से प्रस्फुटित हुई।

थोर ने प्रकृति को सर्वोच्च कलाकार माना जिसमें सभी अनुपात के सिद्धान्त प्राप्त होते हैं। Ecology System में भी शक्तिशाली जीव, शक्तिहीन जीव को मार देता है अतः पर्यावरण में एक सन्तुलन बना रहता है। आदिम काल में आदिमानव ने चित्रों के माध्यम से उजागर किया। साथ ही प्रागैतिहासिक चित्रों में किसी देवी के चित्र और ओझा के चित्रों का उल्लेख मिलता है। सम्भवतः मातृ रूपी शक्ति और पुजारी का स्वरूप हो। कई जगह शूकर, कहीं हाथी को बरछे से अहेर करने का दृश्य है। लिखनिया दरी में हाथियों को पकड़ने का दृश्य है। दूसरी ओर नृत्य में मस्त व्यक्तियों का एक समूह है। कोहरवार, महररिया, विजयगढ़, माणिकपुर, सिंहनपुर, पंचमढ़ी, होशंगाबाद, रायसेन, भोपाल आदि केन्द्र हैं। यहाँ के दृश्य चित्र सरल रेखाओं में तत्कालीन पर्यावरण को इंगित करते हैं।

वन्य जीवन की उन्मुक्तता में आदिम मानव ने अपने मन के उल्लास को भी संगीत के माध्यम से प्रस्तुत किया। जिनमें सह नर्तन एवं समूह नर्तन तथा वाद्य वृन्द का अंकन है। अनेक पशु-पक्षियों का छद्म-रूप धारण करके नर्तन करते हुए भी चित्र प्राप्त हुए हैं। शिला चित्रों में वृक्ष पूजा के भी दृश्य अंकित है। किन्तु सर्प पूजा का अभाव है।

सिन्धु घाटी की सभ्यता की खुदाई के दौरान प्राप्त अवशेष के आधार पर सिन्धु संस्कृति का प्रथम चरण 2600 ई.पू. से 2400 ई.पू. द्वितीय चरण 2400-2150 ई.पू.तृतीय चरण 2150-1800 ई.पू. और चतुर्थ चरण 1800 ई.पू. से 1500 ई.पू. माना गया है। सिन्धु सभ्यता सरल ग्रामीण जीवन से प्रारम्भ होकर विश्व की श्रेष्ठतम महत्त्वपूर्ण नगर सभ्यता के रूप में विकसित हुई। पात्रों पर पर्यावरणीय चित्र बने हुए हैं और मुद्राओं में प्राकृतिक स्वरूपों का अंकन मिलता है। साथ ही मातृदेवी की मूर्तियाँ उर्वरकता के प्रतीक रूप में विद्यमान है। एक पात्र में चित्रित वनस्पतियाँ इस प्रकार बनाई गई है कि वह एक लैण्ड स्केप के रूप में दिखाई देती है।

यूराल पर्वत के दक्षिणी ओर से तीसरी ई.पू. से लेकर दूसरी शती ई.पू. में आर्य जाति के लोगों ने भारत में प्रवेश किया। भारतीय आर्य शाखा के लोग खानाबदोस और युद्ध प्रिय थे। इन्होंने सिन्धु सभ्यता को नष्ट किया और भारत पर अधिकार किया। इस समय साहित्य सृजन प्रचुर मात्रा में हुआ। चित्रकला के प्रमाण सिर्फ जोगीमारा की प्राकृत गुफा में ही दिखाई देते हैं। इस समय का पर्यावरण वैदिक पर्यावरण कहलाया। इस समय वेदों की ऋचाओं की अनुगूंज हवन और शोडष-संस्कारों के प्रचलन से पर्यावरण और आचार-व्यवहार की शुद्धि की जाती थी। इसी प्रकार ऋग्वेद, महाभारत, रामायण, अष्टाध्यायी कामसूत्र आदि साहित्य की रचना हुई, जिसमें चित्र वर्णन किया गया है।

दूसरी शताब्दी में ई.पू. में सातवाहन नामक एक नई शक्ति का उदय हुआ बौद्धकालीन पर्यावरण के रहते चित्रकला के क्षेत्र में अजन्ता और बाघ जैसी गुफाओं में चित्र सृजन हुआ। बौद्ध काल में चित्रकला का स्वर्ण युग माना जाता है इस समय कलाकरों ने जातक कथाओं को विषय स्वरूप चुना। बुद्ध ने जिस उदात्त मानव कल्याणकारी विचारधारा को जन्म दिया उससे सर्वथा नये युग का सूत्रपात हुआ। चैत्य (पूजा के स्थान) और विहार (निवास स्थान) बनाए गए जिसमें समृद्धशाली चित्र बनाए गए। ये चित्र सिर्फ बौद्धकालीन प्रसंग ही नहीं हैं, बल्कि तत्कालीन पर्यारण को परिपोषित करते हैं। जातक कथाओं में बुद्ध जीवन के रूप में जीवों के प्रति करूणा, दया तथा विनम्रता दर्शित होती है। इन चित्रों में पर्यावरण सहायक के रूप में समाहित है। बौद्ध भिक्षुओं ने गुफाओं में रहकर बौद्ध कथानकों का चित्रण किया। चित्रकारों ने भगवान बुद्ध के बचपन के राजसी पर्यावरण का चित्रण किया है, किन्तु जब वे ज्ञान प्राप्ति के लिये वन में गए तो उनकी ध्यानावस्था और वनीय पर्यावरण का चित्रण किया। अतः दृश्य चित्रण में जमीन, बादल, झरना, वृक्ष, पशु-पक्षी के साथ मानवीय क्रियाएँ भी दृश्य चित्रण का हिस्सा होती हैं। इस प्रकार अजन्ता के कलाकारों ने पशु-पक्षियों और वृक्षों के संयोजन से जितना सुन्दर एवं भावपूर्ण चित्रण किया है उस समय की विश्व भर की कला में इतना सुन्दर चित्रण नहीं हुआ। पशुओं के चित्रण में उनकी भाव-भंगिमाओं की अभिव्यक्ति विशेष रूप से की है। इसी प्रकार गज-जातक में जंगल के दृश्य में पेड़-पौधों, सरोवर आदि का चित्रण प्रशंसनीय है। इसी प्रकार 17वीं गुफा में एक युद्ध का चित्र है जिसमें 300 चेहरे रौद्र-रस से भरे हुए चेहरे दृष्टिगोचर होते हैं।

बाघ, बादामी और सित्तनवासल में भी समयानुकूल राजसी, मनोरंजक, युद्ध और काल्पनिक वातावरण के चित्र दिखाई देते हैं। ऐलोरा में बौद्ध, जैन और ब्राह्मण धर्म से सम्बन्धित चित्रों में हमें दो प्रकार के चित्रों की उपलब्धि होती है।

चाहे अजन्ता शैली के समान श्रेष्ठ चित्रों की और दूसरे प्रकार की अपभ्रंश शैली पर आधारित चित्रों की। अतः कहा जा सकता है कि चित्रकारों की ध्यानावस्था में बनाये चित्र उत्तम हैं जबकि बौद्ध धर्म के प्रचारार्थ बने चित्रों में भौंडापन है।

प्रत्येक क्षेत्र की भूमि की प्रकृति अलग है, वनस्पति अलग है अतः उसमें पाए जाने वाले जीवों, मानवों के रंग और उसमें रहने वालों के संस्कारों में भी अन्तर दिखाई देता है। चित्रकार उसी पर्यावरण का ही चित्रण करता है, जो उसे दिखाई देता है। प्रकृति का पर्यावरणाश्रित होती है।

यही कारण है कि भारत में अजन्ता, मुगल, राजस्थानी और पहाड़ी चित्रों को अलग-अलग पहचाना जा सकता है। इन शैलियों में बने चित्र विशुद्ध दृश्य चित्र तो नहीं कहे जा सके, परन्तु कलात्मक-पर्यावरण को समृद्ध बनाने में सहायक सिद्ध हुए हैं। यही नहीं प्रकृति मानवीय भावों की चिरसंगिनी बनकर भावावेगों से प्रफुल्लित अथवा उदास हुई है। भारत में कागज के आगमन के साथ ही कागज की पुस्तकों का सृजन हुआ। अतः लघु चित्रों तथा स्फुट चित्रों के रूप में दृश्य कला जनमानस के समक्ष प्रस्तुत हुई।

मध्य काल में कलाएँ राज्याश्रय में फलीभूत हुई। अतः राजकीय पर्यावरण दृष्टिगोचर होना स्वाभाविक था। उनके विषयों में आखेट, जुलूस, उत्सव जैसे विषयों को लेकर चित्र बने हैं जिनमें पर्यावरण अलंकारिक और यथार्थवादी शैली में बनाया गया है।

सन 1550 के लगभग चित्रकला में दो मुख्य धाराएँ बह रही थीं। एक ईरानी कला से प्रभावित मुगल कला और दूसरी राजपूत कला। राजपूत कला जो राजस्थानी कला शैली कहलाती है। कुछ विचारक पहाड़ी शैली को भी राजस्थानी शैली के अन्तर्गत मानते हैं परन्तु यह आधुनिक खोज अनुसार भ्रममूलक है क्योंकि जब राजपूत शैली का पतन हो रहा था। तब पहाड़ी शैली का शैशव काल था। अतः लगभग 200 वर्षों का अन्तर है। राजपूत शैली का मूल स्रोत अपभ्रंश शैली है तो पहाड़ी शैली का मुगल कला है। दोनों शैलियों के चित्रों में उसी के अनुरूप पर्यावरणीय भिन्नता दिखाई देती है। राजपूत शैली में प्रकृति अलंकारिक रूप से चित्रित की है। पेड़-पौधों को महीन रेखाओं द्वारा एक-एक पत्ती बनाने की कोशिश की है। चित्रों में क्षितिज रेखा ऊपर तक चली गई है, जिससे वनस्पति को अधिक महत्व दिया जा सके। गहरे आसमान में बादल (कपासी) या चमकती बिजली का सोने के रंग से अंकन दिखाई देता है। राजपूत शैली में पर्यावरण मुख्यतः राग-रागिनी और ऋतु चित्रों में दिखाई देते हैं। मेवाड़ शैली के चित्र उत्तम उदाहरणों में से एक हैं। सम्पूर्ण प्रकृति में अलंकरणात्मक शैली दिखाई देती है। जल को लहरदार रेखाओं से अंकित किया है। वहीं बूँदी शैली में जल की चंचल लहरों को गहरी पृष्ठभूमि पर सफेद रेखाओं से बनाया है। वृक्षों को सुन्दर, सुकोमल, लाल, पीले, पुष्पों से पुष्पित तथा लतिकाओं से आच्छादित बनाया है। कर्कीय प्रदेश की जलवायु वाली प्रकृति को सुन्दर और संवेगात्मक रूप प्रदान किया है। राजपूतानी शैली का शौर्य दर्शाने के लिये हाथी, शेर, चीता आदि का सशक्त एवं सजीव अंकन है। आलेखन को अधिक महत्व दिए जाने के कारण परिप्रेक्ष्य का स्थान गौण हो गया है। दृश्य चित्रण को भी मानवाकृतियों के समान महत्व प्रदान किया गया। दृश्य चित्रणदृश्य चित्रणमुगल परिवेश में पर्यावरणीय दृश्य प्रचुरता के साथ बनाए गए हैं। इस शैली में दो प्रकार के दृश्य दिखाई देते हैं एक राजकीय ऐतिहासिक घटनाओं के और दूसरे वनीय प्रदेश में आखेट, विश्राम, जुलूस, पशु-पक्षियों के अंकन में। यह कला हुमायूँ के कला प्रेम से 15वीं शताब्दी में आरम्भ होती है। अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ और औरंगजेब के समय तक प्रवाहित होती रही है। अकबर के समय में स्वच्छन्द चित्रण हुआ है। साथ ही विभिन्न घटनाओं को चित्रांकित किया है। आखेट के दृश्यों में भूमि, जल, पशु-पक्षियों और वनस्पतियों का चित्रण मनोरम दृश्य प्रस्तुत करता है। इन चित्रों पर ईरानी और यूरोपीय प्रभाव दर्शित है। पेड़ों की हरियाली, हल्के हरे रंग की घास पर फूलों की झाड़ी किसी गलीचे जैसा प्रभाव उत्पन्न करती है। जहाँगीर को पशु-पक्षियों से प्रेम था। जब भी वे शिकार पर जाते उनके साथ चित्रकार अवश्य होते थे। वे तत्कालीन घटनाओं का चित्रण अवश्य करवाते थे। चित्रण में उभार दिखाने के लिये उसी रंग की महीन रेखाओं का प्रयोग करते थे। प्राकृतिक वृक्षों में चीड़ का प्रयोग देखने को मिलता है। शाहजहाँ के समय के चित्र भी उस समय के पर्यावरण को व्यक्त करते हैं। इस समय विशेष यह ‘स्याह कलम’ के चित्र बने हैं जिसे काली स्याही से बनाकर उस पर अंडे का लेप चढ़ा दिया जाता है। औरंगजेब के समय बहुत कम चित्र बने हैं। इस समय की कला पतन की ओर जाने लगी थी। मुगल काल में अनेक पुस्तकों को सचित्र बनवाया। जिनमें पंचतंत्र (अनवारे-सुहेली), रज्मनामा (महाभारत), रामायण, नल दमयन्ती, शकुन्तला, कथा सरित सागर आदि प्रमुख सचित्र पुस्तकें हैं। इनके संग्रह जयपुर संग्रहालय लन्दन के ब्रिटिश संग्रहालय तथा नई दिल्ली संग्रहालय में हैं।

लगभग 18वीं सदी के लगभग पहाड़ी क्षेत्रों में पनपी कला पहाड़ी शैली कहलाई। इस पहाड़ी कला का जन्म ‘गुलेर’ में ही हुआ था। 1780 ई. के लगभग जब गुलेर शैली निखार पर थी तब इसने कांगड़ा में प्रवेश किया। सर्वप्रथम पहाड़ी शैली ने एक लोक कला के रूप में जन्म लिया। फिर वहाँ के राजाओं की धर्म प्रवृत्ति अनुसार संरक्षण मिला, जिसके कारण इसमें निखार आया और यह पहाड़ी कलम के रूप में प्रचलित हुई। यह शैली कांगड़ा, बसौली, गढ़वाल, चम्पा, कुल्लू, मण्डी, कोट, नूरपुर जसेराटा, नाहन तथा सिरमौर आदि स्थानों पर विकसित हुई। पहाड़ी कला को विकसित करने में राजा गोवर्धन चन्द्र एवं राजा संसार चन्द्र की बहुत बड़ी भूमिका रही है। साहित्य में यह समय रीतिकाव्य का समय था। उस समय महान कवि मतिराम, देव, लाल, बिहारी तथा केशव आदि की वाणी से रीतिकाव्य की धारा बही। इन कवियों की कविताओं ने चित्र सृजन में योगदान दिया।

पहाड़ी चित्रकला के विकास में यहाँ की प्राकृतिक छवि तथा सुन्दर वातावरण ने चार चाँद लगा दिए। यहाँ की पहाड़ी और उसमें बने हुए हल्के रंगतो में घर गहरे रंग के वृक्ष जिस पर पक्षी विचरण करते हैं और वृक्षों में पुष्प और फल लगे हुए शोभायमान रहते हैं। हरीतिमा, पीताभ धरती जिस पर विभिन्न प्रकार के पशु-पक्षी जिनमें हिरन, गाय, बक कौआ, बगुले आदि का चित्रण दिखाई देता है। कांगड़ा शैली के चित्रों में वृक्ष, बादल, जल, जंगल आदि का बड़ा मनोहारी चित्रण हुआ है। पृष्ठभूमि में सुन्दर पहाड़ों के दृश्य आकर्षक बनाए गए हैं। कल-कल करते झरने व जल का चित्रण बड़ी सावधानी से किया है। दृश्य चित्रण में काली चाँदनी रात के चित्रण में पूर्ण रूप से कलाकार को सफलता मिली है। दृश्य चित्रों में ऋतुओं का सजीवता से चित्रण हुआ है। सावन में छाए बादल, चमकती हुई बिजली और वर्षा का सजीव चित्रण, होली खेलते हुए नर-नारी फाल्गुन के महीने का मनोहारी वातावरण प्रस्तुत करते हैं। वातावरण नायिका भेद की परिस्थिति अनुसार परिवर्तित होता दिखाई देता है। प्रकृति मानवीय संवेदनाओं के साथ दिखाई देती है। नायक-नायिका के रूप में कृष्ण और राधा के स्वरूप को चित्रांकित किया है। प्रकृति का संयोजन विषय के अनुरूप है। वस्तु सामान्यतया सफेद या फाखताई रंग से बनी है। दृश्य चित्रण की सबसे बड़ी विशेषता परिप्रेक्ष्य (Perspective) होता है किन्तु यहाँ की वास्तु में इसका अभाव है। Arial Perspective और Linear Persapective का कलाकारों ने ध्यान नहीं रखा। यही कारण रहा कि पर्यावरण में सिर्फ प्रफुल्लित रंग दिखाई देते हैं। फिर भी रंग और रेखाओं का सुन्दर समन्वय दिखाई देता है। पहाड़ी चित्रकला में अमिश्रित तथा मिश्रित दोनों प्रकार के रंगों का समन्वय दिखाई देता है। मूल रंगों में सफेद रंग मिला कर मनमोहक रंगों का प्रयोग दिखाई देता है। आकाश का चित्रण भी मनोहारी होता था। आकाश में श्वेत रंग के बादल चित्रित करते हैं, कहीं-कहीं पर चीनी पद्धति के बादल बने हैं। जो पास-पास कुण्डली युक्त है। वर्षा का अंकन श्वेत समानान्तर रेखाओं द्वारा किया जाता है। चम्बा शैली में बिजली आकाश के एक छोर से दूसरे छोर तक चमकती हुई दिखाई जाती है।

इन चित्रों को देखकर मनमोहक रंगों में डूबी कविताओं का अहसास होता है। जो केशव की ‘रसिकप्रिया’, ‘रामचन्द्रिका’, ‘कविप्रिया’, जयदेव की गीत गोविन्द, बिहारी सत्सई भागवत पुराण और रामायण से पहाड़ी चित्रों का प्रवाह निकला है। साथ ही बारह मासा ऋतु चित्रण और रागमाला में प्राकृतिक वातावरण और वहाँ का पर्यावरण दर्शित है।

मध्य प्रदेश एक समृद्धशाली राज्य है। यहाँ का पर्यावरण सर्वप्रथम चित्रकारों को दृश्य चित्रण के लिये प्रेरणादायी रहा है। दृश्य चित्रण पर्यावरण पर ही आश्रित रहा है। यह दोनों एक-दूसरे पर इस तरह आश्रित हैं कि इन्हें कभी अलग नहीं किया जा सकता है। दृश्य चित्रकार अपने चारों ओर जो भी देखता है उसे चित्रित करने का प्रयास करता है। प्रकृति एक कलागुरु रही है, जिसने मध्य प्रदेश के मुख्य पर्यावरण की रचना की। सृजित दृश्य चित्रों में ही दर्शक या कला प्रेमी को तत्कालीन समाज, संस्कृति, भूगोल और ऐतिहासिक घटनाओं के दर्शन करता है। अतः कहा जा सकता है कि दृश्य चित्र अपने अंचल का प्रतिनिधित्व करता है।

मध्य प्रदेश पर्यावरण की दृष्टि से समृद्धशाली है अतः इसका पर्यावरणीय जीवन-स्वरूप यहाँ की धरातलीय संरचना पर निर्भर है। यहाँ की विभिन्न रंगतों वाली धरा इस पर उपस्थित वनस्पति, वन्य प्राणी, पालतू पशु-पक्षी, वन्य-खग जलचर तथा अनन्त आकाश सूर्य-चन्द्र-तारे सौन्दर्य की विभिन्न छवियाँ प्रस्तुत करते हैं। नंदलाल बोस ने अपनी पुस्तक ‘दृष्टि और सृष्टि’ में कहा है कि-

प्राण छन्द के आधार पर शुद्ध पर्यावरण हरियाली, पानी, भूमि और वायु के आधार पर प्राणवान छन्द गति उत्पन्न होती है। रस की प्रेरणा के प्रथम आवेग के साथ छन्द की सृष्टि होती है। इस प्रकार चित्रकार को जो दिखाई देता है उसका वह दृश्य चित्र बनाता है।

मध्य प्रदेश का समृद्धशाली पर्यावरणीय स्वरूप यहाँ की धरातलीय स्थिति पर निर्भर करता है। वर्तमान में मध्य प्रदेश में 2106’ उत्तरी अक्षांश से 26030’ उत्तरी अक्षांश तथा 7409’ पूर्वी देशांतर से 81048’ पूर्वी देशान्तर तक विस्तृत है। यह राज्य पूर्णतः ‘भू-आवेष्ठित’ राज्य है अर्थात इस राज्य की सीमा पाँच राज्यों की भूमि को स्पर्श करती है। ये है राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ तथा उत्तर प्रदेश। अतः इस राज्य के आवेष्ठित पर्यावरण ने यहाँ की प्राकृतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पर्यावरण को अवश्य प्रभावित किया है। इसी पर्यावरण के अनुरूप ही यहाँ की कलाएँ भी होगी।

मध्य प्रदेश का राजकीय पशु ‘बारहसिंगा’ राजकीय पक्षी दूधराज (पैराडाइज फ्लाइकैचर) और राजकीय वृक्ष ‘बरगद का पेड़’ यहाँ की पर्यावरणीय स्थिति को सुदृढ़ करते हैं। पशु-पक्षी और वृक्ष का संरक्षण और संवर्धन के लिये भूमि, जल और स्वच्छ वायु आवश्यक है। प्रकृति पर्यावरणीय तत्वों के सहयोग से ही सौन्दर्य ग्रहण करती है। इनके बारे में विचारकों ने कहा है- ‘क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा पंच रहित यह अधम सरीरा।’ अर्थात प्रकृति की सजीवता धरती, जल, अग्नि, आकाश और वायु से प्राणवान होती है। मानव शरीर भी इन पाँच तत्वों से बना हुआ है इन पाँच तत्वों के सन्तुलन से ही प्राकृतिक व्यवस्था बनी रहती है। किसी भी तत्व की कमी या अधिकता से शरीर में रूग्णता आती है या प्राकृतिक प्रकोप का सामना करना पड़ता है। स्वस्थ पर्यावरण के लिये सभी तत्वों का समुचित उपयोग किया जाना आवश्यक है।

जलवायु से ही पर्यावरण प्रभावित होता है। यहाँ की समशीतोष्ण जलवायु ही समृद्धशाली राज्य बनाने में सहायक है। यहाँ मुख्यतः तीन मुख्य और तीन सहायक ऋतुओं का आगमन होता है जैसे

1. ग्रीष्म ऋतु (युनाला)
2. शीत ऋतु (सियाला)
3. मानसून या वर्षा ऋतु (चौमासा)

इसके अलावा हेमन्त बसन्त और शिशिर ऋतुएँ भी हैं। यही ऋतुएँ फसलों और वनस्पतियों को प्रभावित करती हैं। वर्षा ऋतु से धरती पर हरियाली रूपी परिधान से सम्पन्न दिखाई देती है और छटा मनमोहक हो जाती है। दृश्य चित्रकारों ने वर्षा के मनमोहक स्वरूप को अपनी कूँची से उकेरा है। ग्रीष्म ऋतु के बाद जब वर्षा का आगमन होता है, तो धरती के प्राणी आनन्द-विभोर हो जाते हैं। मयूर नृत्य करने लगता है। राजपूत शैली में ऋतु वर्णन के अन्तर्गत प्रत्येक ऋतु की उचित अभिव्यक्ति की है। आग तापते व्यक्ति समूह सर्दी का अहसास कराता है तो बारिश में खेलता बाल समूह, नृत्यरत मयूर, वृक्ष के नीचे भीगती युवती वर्षा ऋतु का और इसी प्रकार रसीले फलों का आस्वाद लेते मानव, गर्मी से अलसाए उनींदी से मानवाकृतियाँ या फसल काट कर नृत्य से आनन्दित समूह ग्रीष्म ऋतु का अहसास कराता है। इन ऋतुओं के अनुसार ही पेड़-पौधों की रंगतों में परिवर्तन देखने को मिलता है।

अतः कहा जा सकता है जल महत्त्वपूर्ण तत्वों में से एक है। वर्षा के जल के अलावा मध्य प्रदेश में अनेकों नदियाँ विद्यमान हैं जिनमें से सबसे अधिक विस्तृत नर्मदा नदी है जो जीवन-दायिनी नदियों में से है। इसके अलावा क्षिप्रा, बेतवा, पार्वती, कालीसिन्ध, कूनो, चम्बल, सोन, केन, बैनगंगा तथा गार नदी आदि। इन नदियों के जल से जहाँ कृषि समृद्ध होती है वहीं धार्मिक, समाजिक क्रिया-कलाप सम्पन्न होते हैं। यही चित्रकारों को भी प्रभावित करते हैं। नदियों का जल पृथ्वी के सौन्दर्य में वृद्धि करता है।

मध्य प्रदेश की धरातलीय बनावट एक समान नहीं है। कहीं समतल, पठारी तो कहीं ऊँची-नीची घाटीयुक्त है। यहाँ का अधिकांश भाग दक्षिणी पठार का अंग है, जो अत्यन्त कठोर चट्टानों से बना है। यहाँ पर लाल, हरी, सफेद, भूरी चट्टानें विद्यमान हैं। यहाँ सतपुड़ा, विंध्याचल, महादेव, मैकाल, अमरकंटक कैमूर और भाण्डेर आदि सौन्दर्यपूर्ण पर्वत श्रेणियाँ हैं।

यहाँ काली, पीली, लाल और भूरी मिट्टी तथा मिश्रित मिट्टी विद्यमान है। यहाँ मिट्टी की उर्वरा शक्ति और जल की उपस्थिति के कारण धन-धान्य और वन्य सम्पदा से परिपूर्ण है। यहाँ की कृषि-संस्कृति वर्षा के जल या कृत्रिम जलीय संसाधन पर निर्भर है। कृत्रिम संसाधनों में नहरें, बाँध तथा तालाब आदि उपलब्ध हैं। प्रत्येक क्षेत्र की भूमि की प्रकृति अलग है, वनस्पति अलग है। अतः उसके रंग और वहाँ के रहने वालों के संस्कार में भी अन्तर दिखाई देता है। पर्यावरण और संस्कार में होने वाले परिवर्तनों के कारण दृश्य चित्रों में भी अन्तर दिखाई देता है।

विशेषताओं के आधार पर मध्य प्रदेश को 7 प्राकृतिक भागों में बाँटा है-

(1) Malwa Plateau
(2) Bundelkhan Plateau
(3) Baghelkhand
(4) Vindhya Kagar
(5) Madhya Bharat
(6) Narmada Valley
(7) Satpura Region

मालवा का पठार (Malwa Plateau)

मालवा क्षेत्र उत्पादन और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिये प्रसिद्ध है। यह पठार दक्कन ट्रेप की चट्टानों से निर्मित है। मालवा क्षेत्र में गुना, राजगढ़, इन्दौर, देवास, हरदा, मन्दौस, नीमच, रतलाम, झाबुआ, बड़वानी, शाजापुर, सागर, भोपाल, रायसेन, विदिशा और धार आदि आते हैं। मालवा क्षेत्र में लोक सेवा कला और ललित कला के केन्द्र बिन्दु स्थापित हैं। मालवा की लोक कला के अन्तर्गत साँझा, माँडना आदि लोक कलाएँ प्रचलित हैं। मालवा के रंगों ने भी अपनी पहचान बनाई है। आधुनिक दृश्य चित्रकारों ने भी मालवीय रंगों का प्रयोग किया है।

बुन्देलखण्ड का पठार (Bundelkhan Plateau)

मध्य प्रदेश की उत्तरी भाग में बुन्देलखण्ड स्थित है। यह क्षेत्र यहाँ की शौर्य गाथाओं के लिये प्रसिद्ध है। यहाँ के चित्रों में भी वीरता की कहानियाँ दिखाई देती हैं। यहाँ की भूमि कंकरीली पथरीली है। बुन्देलखण्ड के पठार में छतरपुर, टीकमगढ़, दतिया, शिवपुरी जिले की पिछोर तहसील एवं करेरा तहसील, ग्वालियर की डबरा तहसील तथा भिण्ड की लहार तहसील सम्मिलित है। बघेलखण्ड (Baghelkhand)

बघेलखण्ड पठारी प्रदेश का निर्माण गोंडवाना समूह, विंध्य समूह एवं आधमहाकल्पी चट्टानों से हुआ है। यह सोन नदी के क्षेत्र में आता है कटनी-मुखाड़ा, ब्यौहारी, बाँधवगढ़, सोहागपुर, गोपड़ बानास, देवसर, सिंगरौली, अम्बिकापुर, सूरजपुर, पाल, भरतपुर, बैकुण्ठपुर और मनेन्द्रगढ़ इस क्षेत्र में आते हैं।

विंध्य कगार (Vindhya Kagar)

यह क्षेत्र बुन्देलखण्ड के दक्षिण में है। रीवा-पन्ना पठारी प्रदेश का निर्माण कड़प्पा और विंध्य श्रेणी की चट्टानों से हुआ है। पन्ना में ज्वालामुखी विभेदी चट्टानों से हीरा प्राप्त होता है। इस प्रदेश में रीवा, सतना, पन्ना दमोह जिले और सागर जिले की रेहली एवं बण्डा तहसीलें शामिल हैं। यह पर्वतीय और जंगल का क्षेत्र होने से सुरम्य है। चचई जल प्रपात यहाँ की शोभा है। इसके अलावा अभ्यारण्य भी इस क्षेत्र में स्थित है।

मध्य भारत पठार (Madhya Bherat Plateau)

मध्य भारत का पठार मध्य प्रदेश के उत्तर और उत्तर पश्चिम क्षेत्र को घेरे हुए है। इसके अन्तर्गत भिण्ड, मुरैना, ग्वालियर, शिवपुरी, गुना और मन्दसौर जिले आते हैं। माधव अभ्यारण्य शिवपुरी जिले में है। यह पशुओं के संरक्षण और कलात्मक सौन्दर्य की दृष्टि से भी श्रेष्ठ है। यहाँ का कलात्मक सौन्दर्य महाराजाओं की छतरियों में दिखाई देता है। ग्वालियर क्षेत्र में तो ‘चितेरे’ चित्र बनाने में निपुण हैं।

नर्मदा घाटी (Narmada Valley)

नर्मदा और सोन नदी का प्रवाह क्षेत्र नर्मदा सोन घाटी के नाम से जाना जाता है। यह क्षेत्र सबसे निचला स्थान है। नर्मदा नदी मण्डला, जबलपुर, नरसिंहपुर होशंगाबाद, रायसेन, नेमद, धार और देवास की तहसील में प्रवाहित होती है। नर्मदा नदी मध्य प्रदेश में सौन्दर्य की जननी है।

सतपुड़ा क्षेत्र (Satpura Region)

सतपुड़ा पर्वत श्रेणी नर्मदा घाटी के दक्षिण में स्थित है। यह 74030-8000’ लांगीट्यूड और 210-230 उत्तरी अक्षांश में है। इसका अधिकांश हिस्सा बालाघाट, सिवनी, छिन्दवाड़ा, बैतूल, खण्डवा, खरगौन जिले में है। यह त्रिभुजाकार है। पूर्व में मैकाल पहाड़ी, मध्य में महादेव पर्वतीय क्षेत्र और पश्चिम में सतपुड़ा के नाम से जाना जाता है।

पेंटिंगपेंटिंगइन प्राकृतिक विशेषताओं के अनुरूप ही दृश्य चित्रों में परिवर्तन दिखाई देता है। ऋतुओं के अनुसार ही चित्र की रंगतों में परिवर्तन दिखाई देता है। इस समय चारों ओर हरियाली दिखाई देती है जो सबको आनन्दित करती है। अतः दृश्य चित्रण में हरे रंग की अनेकों रंगतें दिखाई देती हैं। ठंड में ठिठुरते हुए मानवाकृतियाँ या उससे बचाव करते हुए लोग। गर्मी की तपस को कम करने के लिये रसीले फलों का सेवन करते हुए चित्रण में दिखाई देते हैं। गर्मी में भूमि की रंगत पीलापन लिये होती है। वृक्षों की पत्तियाँ झड़ जाती हैं। हरापन कम होता है प्रसिद्ध चित्रकार स्व. श्री विष्णु चिंचालकर ने माण्डव के कुछ चित्रांकनों में माण्डव की सफेद इमली (खुरासन) के वृक्ष का चित्रांकन किया है। दृश्य चित्रों में पर्यारण के प्रत्येक पहलू का चित्रांकन मिलता है।

मध्य प्रदेश में ललित कला, आदिवासी कला और लोक कला आदि सभी प्रकार की कलाएँ पाई जाती हैं। इस क्षेत्र में इन्दौर, उज्जैन, देवास, भोपाल, जबलपुर, ग्वालियर आदि स्थानों पर शास्रीय विधि से शिक्षित कलाकार कार्य कर रहे हैं, जो कि स्वच्छन्द और सिद्धान्त के अनुरूप विधि-विधान से दृश्य चित्रण कर रहे हैं। श्री डी.जे.जोशी. श्री श्रेणिक जैन, श्री चन्द्रेश सक्सेना, श्री सचिदा नागदेव, श्री अफजल, डॉ. आर सी. भावसार, डॉ. कृष्ण जोशी, मालवांचल के चित्रित कलाकार रहे हैं। नर्मदा घाटी को चित्रित करने में भी श्री अमृतलाल वेगड़, श्री रामनोहर सिन्हा, श्री हरि भटनागर, श्री भगवान दास गुप्ता आदि प्रमुख चित्रकार हैं। भोपाल क्षेत्र में श्री सचिदा नागदेव, डॉ. एल.एन. भावसार, श्री सुरेश चौधरी, श्री डी.डी.धीमान, श्री जी. एल. चौरागड़े, श्री विनय सप्रे एवं श्रीमती शोभा घारे आदि ने भोपाल को दृश्य चित्रों से समृद्ध बनाया है। स्व. श्री सुशील पाल का सम्बन्ध भोपाल की भूमि से सदा बना रहा। उन्होंने भोपाल के सुरम्य पर्यावरण को चित्रांकित किया। श्री रूद्रहांगी श्री वासवाणी, श्री हरि भटनागर, उमेश मिश्रा का सम्बन्ध ग्वालियर भूमि से रहा है।

इस प्रकार यहाँ के चित्रकारों ने कला संस्कार की प्रेरणा मध्य प्रदेश की भूमि से ही ली। संस्कृति और पर्यावरण का घनिष्ठ सम्बन्ध है। संस्कृति मानवीय चेतना से जुड़ी है। भारत की भौगोलिक रूपरेखा ने सांस्कृतिक एकता को बनाए रखने में बहुत बड़ी भूमिका अदा की है। भारतीय सौन्दर्य में कालिदास ने दृश्य और दृश्यकार के बीच गहरा सम्बन्ध बताया है-

रम्याणि वीक्षक मधुरोश्च निराभ्य शबुदान
पर्वत्सुविभवति वत्सुखितोपि जन्तुः
तच्चेतसा स्मरित नूनम बोध धूर्व
भावस्थरणि जन्मान्तर सोहृदानि।।


दृश्य चित्रण एक मुश्किल कार्य है क्योंकि पर्यावरण में से सौन्दर्य ढूँढना होता है। दृश्य चित्रण के लिये कुछ सामान्य सिद्धान्त निर्मित किये हैं जिनका पालन दृश्य चित्रकार को करना चाहिए। सबसे प्रथम है प्रकृति का अवलोकन (Observation), द्वितीय अनुभूति या ग्रहण करने की प्रक्रिया (Perception) कल्पना (Imagination) चतुर्थ सृजनात्मक अभिव्यक्ति की प्रक्रिया (Expression)।

अवलोकन के द्वारा ही रूप का साक्षात्कार होता है। यह प्रक्रिया हमारी ज्ञानेन्द्रियों से सम्बन्धित होती है। निरीक्षण के माध्यम से ही किसी वस्तु विशेष के मर्म का बोध होता है। कलाकार को सौन्दर्य तत्व का ज्ञान होता है। वह उसे ग्रहण करता है और सम्पूर्ण परिस्थिति का प्रत्यक्ष बोध एक साथ एक साकार रूप में होता है और इसी के आधार पर कलाकार अपनी नवीन सृष्टि को रूप अथवा आकार प्रदान करता है।

दृश्य चित्रण और पर्यावरण दोनों में ही हमें परिप्रेक्ष्य (Perception) दिखाई देता है। सामान्यतया दो प्रकार के परिप्रेक्ष्य दिखाई देते हैं।

1. वातावरणीय परिप्रेक्ष्य (Arial Perspective)
2. रेखीय परिप्रेक्ष्य (Liner Perspective)

परिप्रेक्ष्य के माध्यम से निकटत्व, दूरत्व और घनत्व का बोध होता है, जो मनोवैज्ञानिक आभास है, जिसका यथार्थ से भ्रामक सम्बन्ध है।

वातावरणीय परिप्रेक्ष्य (Arial Perspective)

यह मुख्यतः रंगों के परिवर्त पर आधारित है, जिसके आधार पर दूरी दिखाई जाती है। पास की वस्तुएँ स्पष्ट और प्रखर रंग वाली होती हैं तथा दूरस्थ वस्तुएँ धुन्धली दिखाई देती हैं। लियोनार्डो-डा-विन्सी ने अपनी नोटबुक में लिखा है-

In an atmosphere of uniform density the most distant things seen through it such as the mountains, in consequence of the greater quantity of atmosphere which is between your eye and them, will appear blue almost of the same colour as the atmosphere when the sun is in the east. Therefore you should make a building which is nearest above the wall of its natural colour and that which is more distance make less defined and bluer.

रेखीय परिप्रेक्ष्य (Linear Perspective)

इसके अन्तर्गत रेखा के माध्यम से वस्तु के निकट या दूरस्थ हिस्से को दर्शाया जाता है। यह Artificial or Scientific Perspective है। इसका प्रयोग इटेलियन आर्किटेक्चर Brunelleschi, Alberh और पुनरुत्थान कालीन कलाकारों जैसे Paolo Uccello, Piero Della Francesce आदि चित्रकारों ने इसका उपयोग किया। चीन के दृश्य चित्रों में भी रेखीय परिप्रेक्ष्य दिखाई देता है।

अतः परिप्रेक्ष्य का मुख्य उद्देश्य द्वि-आयामी तल पर त्रिआयामी प्रभाव दिखाना होता है। भारतीय दृश्य चित्रकारों ने भी इन सिद्धान्तों का पालन किया है।

दृश्य चित्रकार देखे हुये दृश्यों को इच्छित माध्यमों में व्यक्त करता है। जलरंग, तेलरंग, पेस्टल, एक्रेलिक या अन्य कोई भी माध्यम उसकी कल्पनाओं को साकार रूप प्रदान करते हैं। इनमें रंगों की विशिष्ट भूमिका होती है। मन मोहक रंगों का साथ और तूलिका संचालन से दृश्यों में कलात्मकता का समावेश होता है। वह सृजक और दर्शक दोनों को ही आनन्द की अनुभूति कराता है।

प्रत्येक चित्रकार के अपने रंग और अपनी पद्धति (शैली) होती है। श्री डी.जे. जोशी ने वस्तु अथवा प्रकृति पर पड़ने वाले प्रकाश को विशेष महत्व प्रदान किया। इस प्रकार देवास के अफजल पठान को भी भूमि पर आच्छादित सूर्य प्रकाश बनाना पसन्द था।

श्री चन्द्रेश सक्सेना ने अपनी पहचान विशिष्ट रंगों के कारण बनाई। आपके दृश्य चित्रों में रंगों का माधुर्य और ओज गुण विद्यमान है। कई चित्रों में नीले और नारंगी रंग के साथ पीले रंग का प्रयोग किया। वृक्षों के रंग हरे न होकर लाल, नारंगी, नीले, पीले, भूरा या इम्रल्ड ग्रीन हो तो कोई आश्चर्य नहीं। यही कारण था कि उन्हें ‘रंगों के अन्धे’ (Colour Blind) भी कहा जाता था। सचिदा नागदेव तीव्र तूलिका घात के लिये पहचाने जाते हैं। जी.एल.चौरागड़े जल रंगों के जादूगर के रूप में आदि। किसी भी सुन्दर दृश्य चित्र के पीछे सशक्त रेखांकन और उसकी क्रियाशीलता होती है। दृश्य चित्र विभिन्न पद्धतियों से बनाए जा सकते हैं जैसे जल रंग, तेल रंग, एक्रिलिक आदि। इन्हें पारदर्शी और अपारदर्शी माध्यम से बनाया जाता है। प्राकृतिक चित्रण दो प्रकार के होते हैं-

1. बाह्य दृश्य चित्र-

जिसमें बाहरी दृश्यों को बनाया जाता है जैसे पहाड़ निर्झर, नदी पेड़ मैदान आदि।

2. आन्तरिक दृश्य चित्र

ये वे चित्र हैं जिन्हेें कल्पना के आधार पर घर या स्टूडियो में बैठकर बनाया जाता है। कुछ चित्रकार इसके लिये फोटोग्राफी या बाहर बनाए गए लघु दृश्य चित्रों का उपयोग बड़े कैनवास तैयार करने के लिये करते हैं। इसके अन्तर्गत घर के आन्तरिक दृश्यों को भी चित्रित किया जाता है।

दृश्य चित्र और पर्यावरण दोनों एक दूसरे पर अवलम्बित हैं और दोनों का ही संरक्षण आवश्यक है। इन दोनों को ही देखने से आनन्द की अनुभूति होती है। इन चित्रों के माध्यम से हम स्मृतियों को चिरस्थायी करते हैं। ये दृश्य चित्र ही राजमहलों का वैभव, सामाजिक, राजनैतिक व्यवस्था को बताते हैं। यही हमें शान्ति प्रदान करते हैं और लम्बे समय तक सौन्दर्यानुभूति कराते हैं। इन चित्रों के माध्यम से कलाकार कभी दिवंगत नही होता। अतः कला का संरक्षण किया जाना आवश्यक है। यही दृश्य चित्र आज की आपाधापी से भरी जिन्दगी में संस्कार, शान्ति, सौन्दर्य और अलंकरण प्रदान करते हैं।

जिस प्रकार चित्र हमारे हृदय को आनन्दित करते हैं उसी प्रकार ईश्वर की महान कृति (पर्यावरण) भी हमेें आनन्दित करती है। पर्यावरण में निहित उपादान वृक्ष, पेड़, पुष्प, घास, झरने, पहाड़, बादल, पत्थर, नदियाँ अपनी ओर आकर्षित करती हैं। नदी के किनारे उड़ने वाली वाष्प, घास पर जमी ओस, तितलियों का पुष्प पर मंडराना, हिमाच्छादित या हरी-भरी पर्वत शृंखला, समुद्र की लहरें, सूर्योदय तथा सूर्यास्त का अनुभव तो एक सहृदय (चित्रकार) ही कर सकता है। अतः हमें आस-पास का पर्यावरण सुन्दर बनाए रखना चाहिए। बीसवीं एवं इक्कीसवीं सदी का सच विकास और सुख सम्पन्नता के कीर्तिमान बनाने में रत है। इस प्रकार प्रकृति से दूरी भी बढ़ाई है और प्रकृति के नैसर्गिक ढाँचे को तहस-नहस भी किया है। विकास के नाम पर जंगल काटे गए, पर्वतों को बारूद से उड़ाया गया, जीवन-दायिनी नदियों को कारखानों और फैक्ट्रियों के कचरों के साथ विषाक्त कर दिया गया। सब तरफ शोर, धुँआ, जहर और आपाधापी से न हवा बच पायी, न जल बचा न जंगल, न पहाड़ों का नैसर्गिक सौन्दर्य बचा, न झरनों की निर्मल कल-कल।

चित्रकार चित्रों के माध्यम से इस विनाश को रोकने की पहल करता है। जन मानस को पर्यावरण के संरक्षण के लिये प्रेरित करता है। इस पहल में अनेक संस्थाएँ पर्यावरणविदों को पुरस्कृत करती हैं, प्रतियोगिताएँ करवाती हैं, वृक्षारोपण करवाती हैं एवं नष्ट करने के विरोध में नियम बनाती हैं, जिससे पर्यावरण की रक्षा की जा सकें। 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। अनेकों वृक्षारोपण से सम्बन्धित आयोजन किये जाते हैं। इन्दिरा गाँधी मानव संग्रहालय में ‘Bird watching’ और पक्षी मित्र, जैसे आयोजन किये जाते हैं। पशुओं की सुरक्षा के लिये कान्हा किसली, माधव वन्य संग्रहालय, बाँधगढ़, वन बिहार जैसे पार्कों का निर्माण किया है।

जन सामान्य की वृक्ष लगाने की पहल भी चित्रकारों के लिये हरियाली से परिपूर्ण सुन्दर दृश्य निर्मित करता है। यह प्रवृत्ति धरती के क्षरण और ताप को रोकती है। वृक्ष इस महान सृष्टि के फेफड़े (Lungs) हैं जो प्राण वायु को शुद्ध करते हैं। यही कारण है कि मानव सैर हेतु पर्वतीय क्षेत्रों में जाते हैं। साधु सन्यासी शान्ति और साधना हेतु वनों में निवास करते हैं। वृक्षों का सानिध्य मानव ही नहीं पशु-पक्षियों का भी पालन-पोषण करते हैं। वृक्षों के कारण ही वर्षा भी होती है। अतः भूमि, जल, आकाश, वायु और अग्नि पर्यावरण के सभी तत्वों में सामंजस्य होना चाहिए। इन सभी के लिये वृक्षारोपण ही महत्त्वपूर्ण समाधान है। सुन्दरलाल बहुगुणा ने ‘चिपको आन्दोलन’ चलाया। ऐसा नहीं करते हैं तो प्रकृति में असन्तुलन पैदा होता है और उत्तराखण्ड जैसा प्रलय, बाढ़ आदि समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इन सब समस्याओं से आगाह करने के लिये चित्रकार महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

जैसा पर्यावरण होता है दृश्य चित्रकार वैसा ही चित्रण करता है। अतः कहा जा सकता है कि दृश्य चित्र और पर्यावरण का सामंजस्यपूर्ण सम्बन्ध है। मनुष्य को इसे संजोकर रखना चाहिए।

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