पाकुड़ की सीतपहाड़ी का अस्तित्व ही समाप्त

Submitted by UrbanWater on Sat, 05/18/2019 - 17:15
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हिंदुस्तान, 18 मई 2019, धनबाद

काले पत्थर के लिए राष्ट्रीय स्तर पर विख्यात पाकुड़ की सीतपहाड़ी अब इतिहास बन गई है। इसके अलावा भी कई पहाड़िया ऐसी हैं, जिनके सीने विस्फोटों से छलनी हो चुके हैं। पत्थर के अंधाधुंध उत्खनन से पहाड़ पाताल की शक्ल लेते जा रहे हैं। इससे पर्यावरण को गंभीर खतरा है। एक समय था, जब हल्की सी उमस के बाद पाकुड़ में बारिश होती थी, लेकिन आज यह जिला भीषण गर्मी व सूखे जैसी स्थिति से बेहाल है।

जानकार बताते हैं कि करीब 50 साल पहले उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल आदि स्थानों से आए लोगों ने पाकुड़ में पत्थर उद्योग शुरू किया। सस्ते में जमीन की लीज कराकर माइंस व क्रशर प्लांट लगा पहाड़ों से पत्थर निकालने का काम शुरू किया। यहां के पत्थर चिप्स की मांग देश के कोने-कोने से होने लगी। मांग को पूरा करने के लिए कारोबारियों ने पत्थर का उत्खनन बड़े पैमाने पर शुरू किया। इसका नतीजा रहा कि कई पहाड़ियां इतिहास बन गईं। इसमें सीतपहाड़ी, मालपहाड़ी व सुंदरापहाड़ी प्रमुख हैं।

प्रदूषण की मार

पहाड़ों को तोड़ने के लिए उपयोग में लाए जा रहे बारूदों ने इलाके की आबोहवा को पूरी तरह विषैला बना दिया है। इसके अलावा क्रशर प्लांटों से उड़ने वाली धूल से आसमान में धुंध-सा नजारा रहता है।

विस्थापन का दंश

पहाड़ियों पर रहने वाले परिवारों को विस्थापन का दंश झेलने को विवश होना पड़ रहा है। बेहतर सुविधा का सब्जबाग दिखाकर उन्हें विस्थापित किया गया, लेकिन उन्हें वादे के मुताबिक सुविधाएं नहीं दी गईं। केकेएम कॉलेज पाकुड़ के वनस्पति विज्ञान के प्रोफेसर सह पर्यावरणविद् डॉ. प्रसन्नजीत मुखर्जी का कहना है कि पहाड़ों के उत्खनन से पर्यावरण को गंभीर खतरा उत्पन्न हो रहा है। जलवायु परिवर्तन पर भी इसका असर पड़ेगा।

क्या कहते हैं ग्रामीण?

मंझलाडीह की मुखिया शांति मुर्मू कहती हैं कि माइंस एरिया में जिला खनिज फाउंडेशन टस्ट की योजना के तहत ग्रामसभा कर खनन क्षेत्रों में जलमीनार बनाने के लिए प्रस्ताव बीडीओ के माध्यम से भेजा गया था, परंतु अब तक उस पर कोई काम नहीं हुआ। इसके अलावा स्वास्थ्य शिविर, वृक्ष लगाना, फव्वारा लगाना आदि कार्य भी नहीं किए जा रहे हैं। सीतापहाड़ी के सुखदेव भंडारी ने कहा कि सीतापहाड़ी किसी समय में मनोरम दृश्य के लिए जानी जाती थी, लेकिन वर्तमान में पत्थर खनन कर उसे गहरी खाई में बदल दिया गया है। प्रदूषण से गांव के लोगों का रहना दूभर है। अलाउद्दीन मोमिन ने बताया कि सीतापहाड़ी का अस्तित्व खत्म हो गया है। दीपचंद ठाकुर कहते हैं कि सीतापहाड़ी क्षेत्र में पर्यावरण की गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई है।

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