सरस्वती की तरह कहीं विलुप्त न हो जाएँ गंगा, यमुना - प्रदीप टम्टा

Submitted by editorial on Sat, 08/04/2018 - 18:11

टिहरी बाँध

छात्र राजनीति से अपने जीवन की राजनीतिक पारी शुरू करने वाले राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा से प्रेम पंचोली ने उत्तराखण्ड के प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, संवर्धन और दोहन से जुड़े मुद्दों पर लम्बी बातचीत की। इस क्रम में उन्होंने कई गम्भीर विषयों पर बड़ी ही बेबाकी से अपनी राय रखी। प्रस्तुत है उनसे बातचीत के प्रमुख अंश

हिमालय में पर्यटन

सुन्दर लाल बहुगुणा जी भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में हिमालय और तमाम प्राकृतिक सम्पदा को बचाने के संघर्ष के क्रम में हुए आन्दोलनों के प्रणेता रहे। वे आइडल हैं। उनकी हर बात में योजना है पर दुर्भाग्य है कि हम उन बातों पर गौर नहीं करते। वहीं दुनिया के कई देशों में उनके विचारों की सराहना की जाती है।

भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय द्वारा एक बैठक का आयोजन किया गया था देश के अन्य हिमालय क्षेत्रों सहित उत्तराखण्ड के सभी सांसद आमंत्रित थे। वहाँ मैंने कहा था कि हिमालय पर सबकी निगाह है चाहे वह पर्यटन मंत्रालय हो या बड़ी मल्टीनेशनल कम्पनियाँ। पर्यटन मंत्रालय, इस देश की सभ्यता और संस्कृति को एक ब्रांड के रूप में प्रचारित करना चाहता है जबकि हिमालय का मूल प्राकृतिक स्वरूप ही पर्यटन का मूल आधार है।

प्राकृतिक संसाधन और विकास योजनाएँ

आज मैं सांसद हूँ, कल कोई और होगा। सांसद होना बड़ी बात नहीं है। बड़ी बात तो अपने परिवेश से जुड़े रहना है। वैसे भी मैं छात्र जीवन से जंगल के आन्दोलनों से साथ जुड़ा रहा हूँ। हिमालय पर बड़ा संकट है। मध्य हिमालय से निकलने वाली नदियों जैसे गंगा, यमुना, काली और गौरी आदि के अस्तित्व पर सवाल खड़ा हो गया है।

सभ्यता और संस्कृति का स्रोत नदियाँ ही हैं जिसमें गंगा, यमुना का महत्त्वपूर्ण स्थान है। ये नदियाँ हिमालय से निकलकर देश के करोड़ों लोगों को जीवन देती हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल सभी हिमालय से निकलने वाली इन्हीं नदियों पर निर्भर हैं। हिमालय के जो तीन महत्त्वपूर्ण मुद्दे हैं वो, जल, जंगल और जमीन के हैं।

हमारे जंगल हमारी माता-बहनों और नौजवानों द्वारा चलाए गए आन्दोलन जिसे आप चिपको आन्दोलन और वन बचाओ आन्दोलन के नाम से जानते हैं, से ही बचे। अगर ये आन्दोलन न चले होते तो आज हिमालय के जंगल न बचे होते और न ही देश के अन्य जंगल। इसी आन्दोलन का परिणाम है कि इस देश में जंगल को लेकर नए विचार अपनाए गए। फॉरेस्ट कंजर्वेशन एक्ट लागू हुआ।

सरकारी अधिनियम और लोक मान्यताएँ

आज इस देश में फॉरेस्ट कंजर्वेशन एक्ट में ढील दी जा रही है जिसकी बड़ी वजह ओड़िशा, झारखण्ड और छत्तीसगढ़ के प्राकृतिक सम्पदा पर सबकी नजर। त्रासदी देखिए कि इन्हीं राज्यों में अकूत सम्पदा के साथ सबसे ज्यादा गरीबी भी है। हमारी सरकार ने भी अपनी ही जनता के दमन के लिये पूरी ताकत लगा दी है। ग्रीन हंट सहित और न जाने कितने हंटों का प्रयोग किया जा रहा है।

देश के सबसे कमजोर लोगों के साथ ही राज्य सरकारें भी भिड़ी हुई हैं। किस चीज के लिये भिड़ी हुई हैं ये सरकारें? क्या आदिवासियों के विकास के लिये? नहीं! दरअसल इसकी मूल वजह मल्टीनेशनल कम्पनियों को बिजली पैदा करने के साधन उपलब्ध कराना। इन क्षेत्रों के संसाधनों पर सभी की नजर है उत्तराखण्ड में हाइड्रोपावर से जुड़ी सम्भावनाओं के बारे में भी यही कहा जा सकता है। सरकार भी इन्हीं का साथ दे रही है।

ऊर्जा के अन्य विकल्प

अगर हम चाहते हैं कि देश विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में आगे बढ़े तो क्यों नहीं हम सोलर एनर्जी के क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं? जिन लोगों और किसानों को हम अनपढ़ और विज्ञान विरोधी कहते हैं उन्होंने भी अपनी साधारण बुद्धि का इस्तेमाल कर सौर ऊर्जा के प्रयोग से अपने खाद्य पदार्थों को 6-6 महीने तक सुरक्षित रखते थे।

चीन आज सौर ऊर्जा के क्षेत्र में दुनिया में एक बड़ी ताकत बन रहा है। आपको बिजली की जरूरत है तो विज्ञान को आगे बढ़ाएँ, तकनीक को बेहतर बनाएँ। जब विज्ञान आगे बढ़ रहा है तो ऊर्जा की जरूरतों के लिये हमें पानी से दूर क्यों किया जा रहा है। मैं न्यूक्लियर एनर्जी के पक्ष में था लेकिन जब जापान के फुकुशिमा में जो हुआ उसके बाद मेरे विचार में बदलाव आया और मैंने नए तरीके से सोचना शुरू कर दिया।

जल, जंगल और जमीन

मैं जिन तीन मुख्य सवालों जल, जंगल और जमीन की बात कर रहा था उसमें जंगल तो जन आन्दोलनों के दवाब में बने अधिनियमों के कारण बचा। लेकिन अब इनकी निगाह हमारे जल और जमीन पर है। आज उत्तराखण्ड में कोई नदी नहीं बची होगी जो सुरंगों में नहीं जा रही है। एक वक्त था कि हमने टिहरी जैसे बड़े डैम प्रोजेक्ट को सँवारा।

आज पूरी दुनिया बड़े डैम के खिलाफ है। मैंने तो सुना है कि यूरोप और अमरीका में डैमों को तोड़ा जा रहा है लेकिन हमारे देश में अभी भी बड़े डैम के प्रति जो मोह है उससे मुक्ति नहीं मिली है। टिहरी से बड़े डैम पंचेश्वर के निर्माण के लिये ताने-बाने अभी भी बुने जा रहे हैं। आज नदियाँ टनल में जा रही हैं फिर भी हमारी चेतना नहीं जागी है। सवाल यह है कि जब एक नदी टनल से होकर गुजरती है तो उसका प्राकृतिक स्वरूप समाप्त हो जाता है।

गौर किजिए यदि नदी 20 किलोमीटर लम्बे टनल के अन्दर जाएगी तो उस क्षेत्र में जो आबादी है उनकी क्या स्थिति होगी? इस पर हम सबको विचार करने की जरूरत है। मेरा मानना है कि पानी न हमारी देन है ना ही सरकार की। यह नेचर की देन है। कोई इसे ईश्वर कहे कोई खुदा कहे, मैं इसे नेचर कहता हूँ।

जब यह नेचर की देन है तो इसे इसके प्राकृतिक रूप में ही रहने दीजिए। इन्हीं नदियों के अस्तित्व पर भारत की सभ्यता और कृषि टिकी है। हमारे देश के बड़े-बड़े वैज्ञानिकों ने नदियों को जोड़ने का सुझाव दिया है। मैं भी कहता हूँ कि यह केवल सुझाव के तौर पर अच्छा है! यह कैसी विडम्बना है कि नदियों में पानी ही नहीं है और उनको जोड़ने की स्कीम चल रही है। यह पूरी तरह से नेचर के खिलाफ है।

विकास के मायने

इस देश को अगर आगे बढ़ना है तो हाइड्रोपावर से बिजली बनाने का सिद्धान्त छोड़ना होगा। इस तरह के दर्शन से मुक्त होना होगा। तभी जाकर खेत और लोगों को पानी मिलेगा। पानी का उपयोग सबसे ज्यादा देश की कृषि और पेयजल की समस्या को दूर करने के लिये है। आज हिमालय की यही त्रासदी है कि वहाँ पानी न पीने के लिये है और न ही खेतों की सिंचाई के लिये। हमारी नदियाँ विलुप्त होती जा रही हैं।

आने वाले समय में नदियों की अगर यही स्थिति रही तो उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल पर सबसे बड़ा संकट आ पड़ेगा। आज से 50 साल पहले हम यही सोचते थे कि सरस्वती देश की एक प्रमुख नदी है लेकिन अब उसका नामों निशान नहीं है। आज सरस्वती केवल लोगों के विचार में है। कहीं ऐसा न हो कि गंगा, यमुना का भी यही हश्र हो। इसीलिये हम सब को गम्भीरता से सोचना होगा। पानी की ही तरह जमीन का भी सवाल है। इस पर मैं ज्यादा नहीं कहूँगा।

दिल्ली में बारिश होती है तो हमारी धड़कन तेज हो जाती है कि हम अपने घरों से कैसे निकलेंगे? वहीं हिमालय क्षेत्र के बाशिन्दों को यह चिन्ता होती है कि न जाने क्या होने वाला है? कितने घरों में तबाही होगी? किस परिवार के साथ क्या होगा? सरकार को आज हिमालय के प्रति नए दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है। मुख्य सवाल यह है कि हिमालय की जो सम्पदाएँ हैं वो प्रकृति प्रदत हैं। अगर हम भविष्य के लिये इसे संरक्षित नहीं कर पाये तो हिमालय में बहुत बड़ा संकट आएगा। आज हिमालय में जो सड़कें बन रही हैं उसके लिये कोई वैज्ञानिक सोच नहीं है।

टिहरी डैम के पास भूस्खलन को रोकने की व्यवस्था की गई है। लेकिन उत्तराखण्ड में कहीं और ऐसी व्यवस्था नहीं है। चाहे वो केन्द्र की सड़क हो या राज्य की। टिहरी डैम में भूस्खलन को रोकने के लिये जो प्रयोग किया गया था तब मैंने ये सवाल किया था कि अन्य जगहों पर इस टेक्नोलॉजी का प्रयोग क्यों नहीं किया जाता? मुझे उत्तर मिला कि यह बहुत खर्चीली टेक्नोलॉजी है। यानी इस देश में खर्चीली टेक्नोलॉजी सिर्फ बड़े लोगों के लिये है।

आम आदमी के लिये सिर्फ साधारण टेक्नोलॉजी! आम आदमी पर अधिक खर्च करने को हम तैयार नहीं हैं! हम सबको हिमालय के लियेे नई सोच के साथ गम्भीरता से विचार करना होगा। चाहे वो हिमालय की कृषि के सन्दर्भ में हो या विकास के संदर्भ में।

संघर्ष बनाम विकास

मुझे याद है कि 6,7,8 अक्टूबर 1974 में जब हम दस बारह लोग नैनीताल की सड़कों पर गिर्दा हुड़का बजाकर यह गा रहे थे कि हिमालय को बचाना है तो लोग सोचते थे कि ये कौन पागल आ गए हैं, हिमालय को बचाने। आज दुनिया कह रही है कि हिमालय को बचाना है।

क्लाइमेट चेंज को लेकर बड़ी-बड़ी संस्थाएँ काम कर रही हैं। सब की चिन्ता में हिमालय आ रहा है। उस वक्त हम पागलों की जमात कहे जाते थे। यह इस बात का प्रतीक है कि जब हम किसी परिवर्तन या नए सोच की बात करते हैं तो कम लोग ही हमारे साथ होते हैं, पर जब उसकी मार्केट वैल्यू बढ़ जाती है तो सारी दुनिया आती है। हमारा वह प्रयास सफल हो रहा है।

 

 

 

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प्रेम पेशे से स्वतंत्र पत्रकार और जुझारु व्यक्ति हैं, विभिन्न संस्थानों और संगठनों के साथ काम करते हुए बहुत से जमीनी अनुभवों से रूबरू हुए। उन्होंने बहुत सी उपलब्धियाँ हासिल की।

 

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