बाजार से जुड़ने की समस्याएँ

Submitted by editorial on Wed, 12/12/2018 - 13:01
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राष्ट्रीय सहारा (हस्तक्षेप), 08 दिसम्बर, 2018

कृषि मंडीकृषि मंडी खेती पर हाहाकार सतत है। लाँग मार्च धरना-प्रदर्शन बरसों से हो रहे हैं, समस्या के हल नहीं मिल रहे हैं। मूल समस्या को समझे और उस पर काम किये बगैर ऐसे धरना-प्रदर्शनों से कुछ खास हल नहीं होने वाला है। खेती-किसानी से जुड़ी समस्याओं का विश्लेषण करें, तो साफ होता है कि उनकी समस्याओं का ताल्लुक बाजार से है, बाजार भावों से है।

मध्य प्रदेश ऐसा राज्य है, जहाँ कृषि की विकास दर दस प्रतिशत से भी ज्यादा रही है कई सालों तक। 2016-17 में मध्य प्रदेश में खेती की विकास दर बीस प्रतिशत से ज्यादा रही। फिर भी मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार के लिये हाल के विधानसभा चुनावों में बड़ी चुनौती यह रही कि किस तरह से नाराज किसानों को मनाया जा सके। कृषि की विकास दर तेज होने का एक परिणाम यह होता है कि खेती से जुड़े तमाम आइटमों की आपूर्ति अधिक हो जाती है और उनके भाव गिर जाते हैं। हाल में प्याज-लहसुन के गिरे भावों से किसान नाराज हैं। इनके भाव जब बहुत ज्यादा हो जाते हैं तो किसान खुश होते हैं, उपभोक्ता नाराज हो जाते हैं। प्याज के बढ़े भावों पर गिरी सरकारें भी इस मुल्क ने देखी हैं।

खेती की विकास दर दस प्रतिशत से ऊपर रखने वाले राज्य में किसान नाराज हैं, समग्र देश के आँकड़े देखें, तो साफ होता है कि 10 प्रतिशत की आधी विकास दर भी खेती के लिये मुश्किल रही है। आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 के मुताबिक खेती की विकास दर में अनिश्चितताएँ रही हैं। 2012-13 में यह विकास दर 1.5 प्रतिशत रही, 2013-14 में यह दर 5.6 प्रतिशत रही। 2014-15 में यह निगेटिव जोन यानी माइनस दशमलव दो प्रतिशत पर चली गई। 2015-16 में यह दशमलव सात प्रतिशत रही। 2016-17 में 4.9 प्रतिशत रही। खेती में जब विकास न हो, तो समस्या और जब विकास हो तो भी समस्या। हाल के आँकड़े बताते हैं कि अगस्त 2018 में एक वर्ष के हिसाब से देखें, तो सब्जियों के भावों में करीब आठ प्रतिशत की गिरावट हुई है, दालों के भावों में करीब सात प्रतिशत की गिरावट हुई है।

सब्जियों, फलों के भाव गिरे, तो किसान खुश नहीं हो सकता। पर छोटा किसान अपने प्याज-लहसुन बहुत दिनों तक स्टोर करके भी नहीं रख सकता। इस चक्कर में होता यह है कि किसान तो नहीं कमाता, पर बिचौलिये बहुत कमाते हैं। ऐसे बिचौलिये जिनके पास स्टोर करने की क्षमता है, वह तमाम आइटम खरीद कर बाद में उन्हे महँगे दामों पर बेच सकते हैं। इसलिये सब्जियों के आढ़तिये, बिचौलिये ये समस्या में नहीं रहते समस्या किसान की होती है। उपभोक्ता को अगर बीस रुपए किलो आलू बाजार में मिल रहा है, तो फिर उस आलू के तीस रुपए वह क्यों देगा? इसी तरह अगर थोक सब्जी कारोबारी को थोक बाजार में तमाम किसान तीन रुपए किलो लहसुन देने को तैयार हैं, तो वह इस लहसुन के बीस रुपए किलो के भाव क्यों देगा, भले ही राज्य सरकार कानून पारित कर दे कि इसके न्यूनतम भाव चौबीस रुपए किलो होंगे, क्योंकि इसकी लागत सोलह रुपए किलो आती है।

कानून बनाकर थोक कारोबारी से कीमत वसूली असम्भव है, क्योंकि थोक कारोबारी खरीदना ही बन्द कर देता है। आप किसी को एक भाव पर खरीदने के लिये मजबूर करने का कानून बना सकते हैं, पर उसे हर हाल में खरीदने के लिये मजबूर नहीं कर सकते। तो इस तरह के इलाज काम नहीं करते। इलाज कुछ ऐसा होना चाहिए कि कि व्यवस्था ऐसी बने, जिससे किसान किसी फसल के आधिक्य का शिकार ना हों। पर ऐसी व्यवस्था बनाएगा कौन।

बड़ी कम्पनियों के हवाले हो कृषि?

सरकारी दायरे में बनने वाली तमाम व्यवस्थाएँ बहुत वक्त लेती हैं और उनकी सफलता का दायरा कितना होगा, यह भी सवाल बना रहता है। क्या बड़ी कम्पनियों के हवाले की जाए कृषि? यह सवाल अपने आप में बहुत पेचीदा है, गहरा राजनीतिक भी है। बड़ी कम्पनियों के खेती में आने की खबर से राजनीतिक विवाद शुरु होगा। खेती में बड़ी कम्पनियाँ नहीं आएँ, इस बात के लिये कई राजनीतिक दल प्रतिबद्ध हैं। बड़े स्तर पर किसी ब्रांड को बनाकर बेचने की क्षमता कम्पनियों में है या फिर अमूल जैसे सहकारी संगठन में। अमूल ने गुजरात के छोटे डेयरी कारोबारियों को संगठित करके ऐसा संगठन खड़ा किया, जो बड़ी बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को मुकाबला दे रहा है। पर अमूल अपवाद है। उत्तर भारत की अधिकांश सहकारी संस्थाएं अपने सत्कर्मो के लिये नहीं बल्कि अपनी राजनीतिक भ्रष्टाचार, राजनीतिक दखलन्दाजियों के लिये कुख्यात हैं। सहकारी संस्था ठीक ठाक बन पाए, इसके लिये कुछ प्रतिबद्ध और ईमानदार लोग चाहिए होते हैं कुरियन जैसे। प्रतिबद्ध और ईमानदार लोग कम होते हैं, जो अपने लिये मुनाफा देखे बगैर एक लोक संगठन खड़ा कर पाएँ।

धन और मुनाफे को अधिकतम किया जाए, ऐसा लालच सर्व सुलभ है। इस लालच के कारण मुनाफा केन्द्रित कामयाब कम्पनियाँ बहुत हैं। पर समाज की सामूहिक सेवा को समर्पित सहकारी संगठन बहुत ही कम हैं। पर राजनीतिक वजहों से बड़ी कम्पनियों को खेती में आने की छूट नहीं दी जा सकती। कुछ समय पहले किसानों के लिये कम्पनी संगठन के तहत कारोबार करने की योजना आई थी। प्रोड्यूसर कम्पनी के नाम से कम्पनी में तमाम किसान काम करें, ऐसी योजना थी। पर इस योजना की व्यापक सफलता की कथाओं का भी अभी इन्तजार ही है। कुल मिलाकर किसानों के बाजार भाव से जुड़ी समस्याओं का निपटारा जब तक नहीं होता तब तक यह समस्या सतत रहने वाली है। नियमित अन्तराल पर किसान कर्ज माफी की माँग करेंगे और हर राजनीतिक दल को उनकी बात सुननी पड़ेगी। पर यह खेती को सतत बैसाखी की आपूर्ति जैसी बात है। समस्या का हल यहाँ नहीं है।

समस्या का हल बहु आयामी है और सबसे महत्त्वपूर्ण आयाम है कि किसान को उसकी फसल का बाजार आधारित मूल्य मिल सके। किसान इसके लिये प्रोड्यूसर कम्पनियों के बारे में जानकारी, प्रशिक्षण, अमूल जैसे संगठनों का विकास किया जाना आवश्यक है। हाल में पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने एक महत्त्वपूर्ण सुझाव दिया है। इस सुझाव के मुताबिक छोटे और सीमान्त किसानों को 12000 रुपए प्रति वर्ष सरकार दे। इस पर साल में करीब 1 लाख 84 हजार करोड़ रुपए खर्च होंगे। इस योजना का सत्तर प्रतिशत खर्च केन्द्र सरकार को और 30 प्रतिशत खर्च राज्य सरकारों को वहन करना चाहिए।

एक लाख 84 हजार करोड़ रुपए कितनी बड़ी है, यह इससे समझा जा सकता है कि दो महीनों के गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स के संग्रह के बराबर है यह रकम। केन्द्र सरकार इस योजना पर काम कर सकती है, छोटे किसानों के दुख दर्द इससे कम होंगे। मंझोले और बड़े किसानों को प्रोड्यूस कम्पनियों और सहकारी संगठनों की ओर ईमानदारी से लाया जाए। तब बाजार की चुनौतियों को किसान झेल सकते हैं। वरना कर्ज माफी और भावों की कमजोरी के मसले कभी खत्म नहीं होंगे। बाजार से जुड़ी समस्याओं का इलाज बाजार से जुड़े हल लाकर ही हो सकता है। यह बात सभी को समझनी होगी, खास तौर पर उन राजनीतिक दलों को, जो बाजार के प्रति एक दोहरा और फर्जी रवैया अपनाते हैं।

(लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं।)


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