कार्यक्रमों का फायदा नहीं मिल पाता किसानों को

Submitted by editorial on Sat, 10/06/2018 - 17:42
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राष्ट्रीय सहारा (हस्तक्षेप), 06 अक्टूबर, 2018

कृषि जिंस की खरीदकृषि जिंस की खरीद देश के सम्मुख दो नीतिगत मुद्दे प्रमुख हैं। पहला, किसानों पर खर्च करने के लिये नियत पैसा क्या लक्षित हितग्राहियों तक पहुँच पाता है? कहना यह कि क्या बाजार उन्हें उनकी उपज का मूल्य दे पाता है। दूसरा, किसानों के लिये ढाँचागत निर्माण पर खर्च किया जाने वाला पैसा क्या उनके लिये सम्भावनाओं के द्वार खोलता है? दोनों ही गम्भीर मुद्दे हैं।

दो नीतिगत मुद्दे मेरे कानों में गूँजते रहते हैं और मैं अपने आलेखों में हमेशा उनका उल्लेख करता रहा हूँ। पहला, किसानों पर खर्च करने के लिये नियत पैसा क्या लक्षित हितग्राहियों तक पहुँच पाता है? कहना यह कि क्या बाजार उन्हें उनकी उपज का मूल्य दे पाता है। दूसरा, किसानों के लिये ढाँचागत निर्माण पर खर्च किया जाने वाला पैसा क्या उनके लिये सम्भावनाओं के द्वार खोलता है? दोनों ही गम्भीर मुद्दे हैं। इनका आसान समाधान होता, जैसा अनेक राजनेता अक्सर दावा करते हैं, तो यकीनन काफी पहले ही किसान समुदाय शोषण-मुक्त हो चुका होता। जब मैं सरकार के साथ था, तब मेरी एक आदत थी जो मुझे कृषि मूल्य आयोग (अब इसे कृषि लागत एवं मूल्य आयोग के नाम से जाना जाता है) का बहुत कम उम्र में अध्यक्ष बनने के दौरान पड़ गई थी। कृषि मंत्रालय का आँकड़ा विभाग देश भर की मंडियों से विभिन्न फसलों के मू्ल्यों से सम्बन्धित सूचना एकत्रित करता है। इन आँकड़ों को सतत अद्यतन किया जाता है। मुझे उस समिति की अध्यक्षता करने का मौका मिला था, जिसकी सिफारिशों के आधार पर अन्तिम बार इन आँकड़ों में संशोधन किया गया था। मैं हमेशा न्यूनतम समर्थन मूल्य से ‘नीचे रहे मूल्य’ पर गौर करता हूँ। जिन्हें मैं वित्तीय अखबारों से ही जान पाता हूँ। क्योंकि स्थानीय मूल्य ही नीति-निर्माताओं को हर सुबह उपलब्ध कराए जाते हैं, लेकिन मैं उनमें से नहीं हूँ।

नजर बताती है सच

ऐसे में यदि आप पारखी नजरों से आँकड़ों पर गौर करें तो जान सकेंगे कि कर्नाटक के केन्द्रों पर मूँग की दाल न्यूनतम समर्थन मूल्य के एक-तिहाई से दो-पंचाई दाम पर बिक रही थी। बेल्लारी से यह सिलसिला शुरू हुआ और देखते-ही-देखते जंगल की आग की तरह अनेक जिलों में फैलता गया। स्थानीय अधिकारी केन्द्रीय एजेंसियों से चिरौरी करने में जुटे रहे क्योंकि उनमें से अनेक के पास न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कृषि जिंस की खरीद के लिये समुचित धन तक नहीं बचा था। न्यूनतम समर्थन मूल्य उच्च रखे जाने के पीछे मंशा थी कि पचास प्रतिशत अतिरिक्त लागतों की भरपाई हो जाए, लेकिन इससे उनकी परेशानियाँ ही बढ़ीं क्योंकि भुगतान के लिये धन कम पड़ने लगा। यह समस्या पड़ोस के महाराष्ट्र तक भी पहुँच गई। व्यापारी कृषि मंडियों में खुलकर मुनाफाखोरी पर उतर आए थे। उनके पास पैसा था और वे जानते थे कि जब एजेंसियों के पास पैसा पहुँचेगा तब हम ही उन्हें मूँग बेच रहे होंगे। इसी प्रकार की समस्या से तुअर, जो पश्चिमी भारत की प्रमुख उपज है, किसानों का सामना हुआ। यहाँ भी तमाम खबरें थीं कि तुअर घोषित दामों से कम पर बिकी।

मेरा एक अनुभव है: सरदार सरोवर परियोजना। सरदार, जिनकी विशाल प्रतिमा का अनावरण कृतज्ञ राष्ट्र की ओर से प्रधानमंत्री करेंगे, एक व्यावहारिक नेता थे जैसा कि बारदोली आन्दोलन से स्पष्ट हुआ था। उन्होंने पट्टाभि सीतारमैया से तलाला तालुका का अध्ययन करने को कहा था ताकि जाना जा सके कि औपनिवेशिक शासक गरीबों का किस कदर शोषण कर रहे थे। सांख्यिकी में रुचि रखने के कारण मैं ऐसे अध्ययन समय-समय पर करता रहा हूँ। कहना यह कि हमारे पास एक सदी के तीन हिस्सों के इस एक ब्लॉक के लिये समुचित आँकड़े मौजूद हैं। लेकिन उस महान व्यक्ति की विशाल प्रतिमा जिस पर सरदार जीवित होते तो हँस दिए होते और जानना चाहते कि क्या नर्मदा से जल का प्रवाह बढ़ा है। सोलह वर्ष होने को आए जब नदी से जल के प्रवाह को मुख्य कैनाल में मोड़ा गया। मैं जानता हूँ कि यह इंजीनियरिंग की चमत्कारिक उपलब्धि है, क्योंकि मैंने इसकी रूपरेखा तैयार की थी। सरदार सरोवर प्रणाली से निकाली गई कैनाल भारत और विदेश की प्रमुख सिंचाई परियोजनाओं की कैनाल शाखाओं से अनेक मामलों में बड़ी और बेहतर है।

लाभान्वित नहीं हो पाए किसान

लेकिन हमारे किये गए इस कार्य से किसान लाभान्वित न हो सके। उन्हें जल नहीं मिलता तो कई दफा वे इस कैनाल की शाखाओं और उपशाखाओं से पानी पम्प के जरिए निकालते हैं। पकड़े जाने पर जेल जाना पड़ता है। लेकिन अभी 57 लघु कैनाल का निर्माण किया जाना है, इसलिये किसानों के पास पम्प से पानी निकाले जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। हाँ, वे खेतों में चैनल जरूर बना सकते हैं, सरकार ने नरमी दिखाते हुए उनसे कहा भी है कि उनके लिये जल चैनलों का वह स्वयं निर्माण कराएगी लेकिन तकरीबन तिहाई चैनलों का निर्माण अभी तक नहीं किया जा सका है। बताया गया है कि यह कार्य तीन साल में पूरा कर लिया जाएगा। मेरा विश्वास है कि जतन से प्रयास किया जाए तो यह कार्य सम्भव है। पहले भी हम ऐसे कामों को अंजाम दे चुके हैं। यदि ऐसा कर पाए तो महान नेता सरदार को यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

लेखक पूर्व केन्द्रीय मंत्री हैं।

 

 

 

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