नीतियों की कमी और खामियों से पैदा संकट

Submitted by editorial on Thu, 12/13/2018 - 17:50
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राष्ट्रीय सहारा (हस्तक्षेप), 08 दिसम्बर, 2018

स्वामीनाथन कमीशन ने उचित दाम सी 2 प्लस 50 प्रतिशत माना है। यह सिफारिश 2007 की है, जिसे न तो तत्कालीन यूपीए सरकार ने माना न ही एनडीए सरकार मानने को तैयार है। सी 2 का मुद्दा तो बाद में आएगा, फिलहाल तो स्थिति यह है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य जो सरकार तय करती है, वह भी किसानों को देने को तैयार नहीं है। पिछले एक वर्ष में अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति ने जब मंडी में बिक्री का दाम और न्यूनतम समर्थन मूल्य के अंतर को मंडियों में जाकर जोड़ा तब पता चला कि 50,000 करोड़ रुपए की लूट केवल एक वर्ष में किसानों से 14 कृषि उत्पादों में की गई है।

किसानों की मूल समस्या क्या है? और उसका समाधान क्या हो सकता है? क्या नीति बनाने वालों को किसानों की मूल समस्या आजादी से लेकर अभी तक समझ में नहीं आई है इसलिये किसानों की दुर्गति हो रही है। मूल प्रश्न विकास की अवधारणा से जुड़ा हुआ है। देश का विकास कैसे हो सकता है? अब तक सरकारें मानती रही हैं कि खेती पर आश्रित लोगों को जब तक खेती से अलग नहीं किया जाएगा, देश तरक्की नहीं कर सकता। इस सोच के तहत खेती को घाटे का पेशा बनाकर रखा गया ताकि लोग खेती छोड़ दें। इसका परिणाम यह हुआ कि नई पीढ़ी खेती नहीं करना चाहती।

खेती को मारा गया है, जबकि देश की खाद्य सुरक्षा, जैव विविधता, आत्मनिर्भरता, रोजगार की दृष्टि से खेती को फिर से जिन्दा करना जरूरी है। सरकारों द्वारा यह मानसिकता बनाई गई की परम्परागत खेती से अधिक आमदनी नहीं ली जा सकती। अगर लेना है तो औद्योगिक खेती को अपनाना पड़ेगा। अधिक से अधिक पूँजी लगाकर नकदी फसल निर्यात करने के लिये पैदा करनी होगी, तभी किसान तरक्की कर सकेगा। किसानों को बाजार की आवश्यकता अनुसार उत्पादन करना चाहिए, अपनी आवश्यकता अनुसार नहीं जबकि वास्तविकता यह है कि देश के 80 प्रतिशत किसान खुद अपने जीविकोपार्जन के लिये अन्न, सब्जी, फल, दूध पैदा करते हैं। बाकी समय मजदूरी करते हैं।

सरकारों के नीति-नियन्ताओं की यह भी सोच रही कि देश की आबादी लगातार बढ़ती जा रही है; इसलिये अधिक से अधिक उत्पादन की जरूरत है। यह जीन संशोधित बीजों से ही सम्भव है, परम्परागत बीज बेकार हो चुके हैं। अधिक उत्पादन के लिये अधिक खाद और कीटनाशक की जरूरत है। नीति-निर्माताओं की इसी सोच के चलते किसान और किसानी दोनों डूबते गए हैं। रासायनिक खाद और कीटनाशक के अधिक उपयोग से पानी तक जहरीला हो गया है। अन्न, सब्जी, फल तो जहरीले हो ही चुके हैं। इसके चलते पंजाब जैसे उन्नत कृषि प्रधान राज्य में कैंसर घर-घर की बीमारी बन गया है।

मॉडल गलत

अमरीका और यूरोप में जिस तरह खेती को खत्म कर औद्योगीकरण किया गया, वही विकास का मॉडल सभी पार्टियों का है इसलिये चुनाव में भी पार्टियाँ कुछ शहरों को सिंगापुर और पेरिस बनाने के दावे करती हैं। सरकार की नीतियों का दिवालियापन और खोखलापन नहीं होता तो आप ही बताइए, एक दाने से 100 या 1000 दाने तैयार करने वाले किसान की आमदनी क्यों 20,000 रुपए साल या 1700 रुपए महीना होती? देश के 80 प्रतिशत से अधिक किसान एक हेक्टेयर यानी ढाई एकड़ से कम जोत वाले किसान हैं। आज भी अधिकतर किसान बरसात पर आधारित खेती के लिये मजबूर हैं। आजादी से लेकर आज तक किसानों को उनकी उपज का उचित दाम नहीं मिला है। स्वामीनाथन कमीशन ने उचित दाम सी 2+50 प्रतिशत माना है। यह सिफारिश 2007 की है, जिसे न तो तत्कालीन यूपीए सरकार ने माना न ही एनडीए सरकार मानने को तैयार है। सी-2 का मुद्दा तो बाद में आएगा, फिलहाल तो स्थिति यह है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य जो सरकार तय करती है, वह भी किसानों को देने को तैयार नहीं है।

पिछले एक वर्ष में अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति ने जब मंडी में बिक्री का दाम और न्यूनतम समर्थन मूल्य के अन्तर को मंडियों में जाकर जोड़ा तब पता चला कि 50,000 करोड़ की लूट केवल एक वर्ष में किसानों से 14 कृषि उत्पादों में की गई है। यहाँ उल्लेख करना आवश्यक है कि भारत सरकार का कृषि बजट 46,000 करोड़ रुपए है। यानी सरकार जितना साल में किसानों को देती है, उससे अधिक केवल न्यूनतम समर्थन मूल्य न देकर वापस ले लेती है। महत्त्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि समर्थन मूल्य केवल 24 कृषि उत्पादों का तय किया जाता है। अर्थात कुल उत्पादन का केवल 9 प्रतिशत ही समर्थन मूल्य के दायरे में आता है। इस कारण हम यह कह सकते हैं कि मूल समस्या सभी कृषि उत्पादों की लाभकारी मूल्य की गारंटी पर खरीद न होना है। जिन कृषि उत्पादों के समर्थन मूल्य घोषित किए जाते हैं, उनकी खरीद भी भारत सरकार सुनिश्चित नहीं करती। किसानों का 91 प्रतिशत उत्पादन समर्थन मूल्य की खरीद के दायरे में ही नहीं आता।

समर्थन मूल्य का गणित आजकल देश भर से 50 पैसे किलो बन्द गोभी, बैगन और टमाटर बिकने की खबरें आ रही हैं। प्याज को लेकर भी नासिक से प्याज सड़कों पर फेंकने और आगरा से आलू सड़कों पर फेंकने की खबरें साल दर साल आती रहती हैं। इसके बावजूद सरकारों के कान पर जूँ नहीं रेंगती दिखलाई पड़ती है। मेरे यहाँ मुलताई में (मुलताई कांड के लिये विख्यात है) 24 किसान शहीद हुए थे। 150 को गोली लगी थी, वहाँ से साल के 3 महीने 200 ट्रक गोभी रोज निकलती है, पिछले वर्ष जो 18 से 20 टन का ट्रक ढाई लाख रुपए में बिका था, वही ट्रक 5 हजार से 8 हजार में गया। वह भी व्यापारी और किसान के निजी सम्बन्धों के कारण अन्यथा अधिकतर किसानों को अपनी गोभी जानवरों को खिलानी पड़ी। मजदूरी का पैसा भी नहीं निकला, जबकि लागत खर्च 77 हजार रुपए प्रति एकड़ आता है। सी 2+50 प्रतिशत 1लाख 15 हजार रुपए तक बैठता है।

यदि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद सुनिश्चित करनी है तो कानून की आवश्यकता होगी। उस कानून का पालन सरकार को कराना पड़ेगा। मतलब यदि कोई व्यापारी मंडी के अन्दर या बाहर कम दाम पर खरीदेगा तो उसका लाइसेंस निरस्त किया जाएगा या जेल और जुर्माने का प्रावधान होगा। 29-30 नवम्बर की किसान मुक्ति रैली में यही कानून बनाने के लिये 21 विपक्षी पार्टियों ने सरकार से विशेष सत्र बुलाने की माँग की है। कहा जाता है किसान कर्ज में पैदा होता है, कर्ज में ही मर जाता है। यह सच है। लेकिन सरकारें कर्ज को समस्या नहीं समाधान के तौर पर देखती हैं।

सरकारों की समझ है कि पूँजी के अभाव में खेती नहीं हो पा रही है। इसलिये किसान को अधिक-से-अधिक कर्जदार बनाया जा रहा है जबकि यह सर्वविदित है कि कर्ज ही किसानों की आत्महत्या का मूल कारण है। इसके साथ बीमारी और शिक्षा भी जुड़ी हुई है। देखने में आता है कि किसान क्रेडिट कार्ड से जो पैसा किसान कर्ज पर लेता है, उसको अचानक परिवार में किसी सदस्य के बीमार होने या बच्चों की उच्च शिक्षा या शादी ब्याह में खर्च हो जाने के कारण कर्ज के जाल में फँस जाता है। इस समस्या का हल शासकीय स्वास्थ्य और शिक्षा की व्यवस्था है। सरकार दोनों जिम्मेदारियों से पीछे हट रही है। शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों क्षेत्रों का निजीकरण किया जा रहा है। महँगी स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाओं के चलते किसानों की कर्ज में फंसने की आशंका दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। औसतन किसान पर 55 हजार का कर्ज है।

दाम नहीं मिलते

हम मानते हैं कि किसानों के कर्जदार होने का मुख्य कारण उसको आजादी के बाद से उचित मूल्य नहीं मिलना है। दाम लगातार कम करके (दबाकर) रखे गए हैं। यही किसान और गाँव की गरीबी का मुख्य कारण है। अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग के अध्य्क्ष स्वर्गीय बीडी शर्माजी के अध्ययन के मुताबिक आजादी के बाद से देश के साढ़े पाँच करोड़ गाँव से औसतन 1 करोड़ रुपया शहर में गया। अर्थात साढ़े पाँच लाख करोड़ रुपए की सालाना लूट किसानों से की गई।

71 वर्ष का हिसाब जोड़ा जाए तो यह 50 लाख करोड़ से अधिक होगा। एक तरफ 45 लाख करोड़ की छूट उद्योगपतियों को दी गई दूसरी तरफ उससे अधिक राशि किसानों से लूटी गई। 1970 में गेहूँ 56 रुपए क्विंटल था। गेहूँ के दाम अब 30 गुना बढ़े जबकि कर्मचारियों की पगार 200 से 300 गुना बढ़ी। किसान मानता है कि वह सरकार की किसान विरोधी नीतियों के कारण से कर्जदार हुआ है। इस कारण एक बार उसका सम्पूर्ण कर्ज समाप्त किया जाना चाहिए। सरकार को एक बार किसानों की कर्ज मुक्ति करनी चाहिए। कर्ज मुक्ति को लेकर अभी तक सरकारों का ट्रैक रिकॉर्ड ठीक नहीं है। महाराष्ट्र में किसानों ने आन्दोलन किया, सरकार ने 40,000 करोड़ के कर्ज को खत्म करने का समझौता किया लेकिन महाराष्ट्र के किसान आज भी कर्जदार बने हुए हैं।

उत्तर प्रदेश में भाजपा ने और पंजाब में कांग्रेस ने कर्ज माफी के मुद्दे पर चुनाव जीता परन्तु किसानों की कर्ज की समस्या हल नहीं हुई। अब मध्य प्रदेश में कांग्रेस ने 2 लाख तक के कर्ज माफी की घोषणा की है। जब तक कर्ज मुक्ति का कोई कानून नहीं बनता तब तक वास्तविक तौर पर किसानों की कर्ज मुक्ति सम्भव दिखलाई नहीं देती। किसानों का तर्क है कि यदि मोदी सरकार 100 कम्पनियों को 14 लाख करोड़ की छूट दे सकती है तो देश की 65 प्रतिशत खेती पर आश्रित आबादी का कर्जा माफ क्यों नहीं कर सकती?

देश में न्यूनतम मजदूरी कानून लागू है। रोजगार गारंटी में भी न्यूनतम मजदूरी तय है। फिर किसानों की न्यूनतम आय तय क्यों नहीं की जाती? केन्द्र सरकार के किसी भी कर्मचारी को 25 हजार रुपए प्रति माह से कम भुगतान सातवाँ वेतन समझौता लागू होने के बाद नहीं किया जा सकता। मनरेगा में 177 रुपए से कर्मचारियों को न्यूनतम 850 रुपए प्रति दिन, उच्च अधिकारियों को, जिलाधीश, पुलिस अधीक्षक, विधायक या सांसद को 1000 से 5 हजार रुपए दिन पारिश्रमिक दिया जाता है मगर आज भी भारत सरकार का कृषि लागत और मूल्य आयोग किसान की दिहाड़ी प्रतिदिन मनरेगा रेट के बराबर भी लगाने को तैयार नहीं हैं। कृषि कार्य कुशल कारीगर की तरह का कार्य है। जिस दिन किसान को कुशल कारीगर का रेट मिलने लगेगा, उसी दिन किसानों की हालत सुधर जाएगी।

बहलाते हैं सियासी दल

मैं वापस मूल प्रश्न पर आता हूँ। यदि नीति बनाने वालों की सोच किसान, किसानी और गाँव को खत्म कर देश का विकास करने की है तो जो कुछ किया जा रहा है, वह सोच-समझकर किया जा रहा है। राष्ट्रीय सकल उत्पाद में कृषि क्षेत्र की भागीदारी आजादी के तुरन्त बाद 65 प्रतिशत थी इसलिये भारत की अर्थव्यवस्था को कृषि प्रधान कहा जाता था। लेकिन योजना आयोग ने अब यह भागीदारी घटाकर 16 प्रतिशत कर दी है। अगले 5 वर्षो में इसको 6 प्रतिशत तक सीमित कर देना है। इसी तरह कृषि बजट कुल बजट का 2 प्रतिशत तक सीमित कर दिया गया है। आप स्वयं सोचिए 65 प्रतिशत आबादी को जब 2 प्रतिशत बजट मिलेगा, तब वह क्या खाक तरक्की कर सकेगा? किसानों की जागरुकता के कारण सरकारों को किसान-किसान बोलना पड़ रहा है परन्तु पार्टियों और सरकारों के पास किसानों को उनका हक और न्याय देने का कोई रोडमैप नहीं है।

पार्टियाँ किसानों के सम्बन्ध में लोक-लुभावन घोषणाएँ कर केवल उनके वोट हासिल करने के किए उत्सुक हैं। इस कारण वे कर्जा माफी और लाभकारी मूल्य सम्बन्धी घोषणाएँ कर रही है लेकिन कानूनी प्रावधान करने से बच रही हैं। लेकिन किसान, किसानी को सुधारने और गाँव को बचाने के लिये अपने नीतियों में विशेष कर आर्थिक नीतियों में परिवर्तन करने को तैयार नहीं है। अधिकतर पार्टियाँ विश्व बैंक और डब्लूटीओ की वैश्वीकरण, उदारीकरण और निजीकरण की नीतियों की समर्थक है। पार्टियों और सरकारों का ध्यान शहरीकरण, औद्योगीकरण, बाजारीकरण पर केन्द्रित है, जिससे पूँजी का केन्द्रीकरण होना, गैर-बराबरी, बेरोजगारी, बीमारी बढ़ना, पर्यावरण संकट गहराना तय है। अब तक किसानों की हालत में सुधार होने की बजाए लगातार बिगाड़ होना यह बतलाता है कि सरकारों के पास न तो इच्छाशक्ति है और न ही किसानों की हालत सुधारने की नीतियाँ और संकल्प।

बीमा का लाभ कम्पनियों को

मिसाल के तौर पर प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को देखें। 22 हजार करोड़ का प्रीमियम किसानों से लिया गया। किसानों को मुआवजा 8 हजार करोड़ मिला। बाकी 14 हजार करोड़ बीमा कम्पनियों को मुनाफे में चला गया। भावान्तर योजना का अधिकतम लाभ व्यापारियों को हुआ किसानों को नहीं। जो सरकार कल तक अधिकतम रासायनिक खाद और कीटनाशक के उपयोग के लिये किसानों को प्रेरित कर रही थी, वो आज जैविक खेती को प्रोत्साहन देने को मजबूर हुई है।

किन्तु किसान सरकारों की सोच पर निर्भर नहीं रह सकता। किसानों को खुद ही अपनी हालत सुधारने के लिये संघर्ष और निर्माण के माध्यम से रास्ता निकालना पड़ेगा। खुद अपने लिये नीतियाँ तैयार कर उनको सरकारों से लागू कराना पड़ेगा। यह सशक्त किसान आन्दोलन और किसान एकजुटता से ही सम्भव है। भारत के इतिहास में पहली बार 208 किसान संगठनों की एकजुटता मन्दसौर पुलिस फायरिंग के बाद बनी है। मुम्बई के किसानों के लाँग मार्च के बाद अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के बैनर तले 30 नवम्बर को लाखों किसानों ने दिल्ली में किसान मुक्ति मार्च के माध्यम से देश का ध्यान आकृष्ट किया है। पहली बार नेशन फॉर फार्मर्स के माध्यम से समाज के पेशेवर लोगों ने, मध्यम वर्ग ने भी किसान आन्दोलन का समर्थन किया है।

(लेखक किसान नेता हैं।)


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