तब हम खाएँगे क्या

Submitted by RuralWater on Mon, 04/30/2018 - 14:40
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अमर उजाला (मनोरंजन), 29 अप्रैल, 2018


सूखासूखाधरती की आबोहवा बदल रही है और भविष्य में खाद्यान्न की उपज खतरे में है। 132 करोड़ की जनसंख्या वाले देश के नीति-नियन्ता और वैज्ञानिक परेशान हैं कि बढ़ती आबादी, शहरीकरण, जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण के गिरते स्तर के कारण फसलोत्पादन में होने वाली गिरावट को कैसे रोका जाये।

आईआईटी-गुवाहाटी के वैज्ञानिक डॉ. मनीष गोयल के मुताबिक “जिन क्षेत्रों के पारिस्थितिकीय तंत्र की क्षमता जलवायु परिवर्तन के खतरों से लड़ने के लिहाज से कमजोर पाई गई है, वहाँ इसका सीधा असर खाद्यान्नों के उत्पादन पर पड़ सकता है। भारत जैसे सवा अरब की आबादी वाले देश में खाद्य सुरक्षा के लिये यह स्थिति बेहद खतरनाक है।”

शोधकर्ताओं ने ‘हाई रेजोल्यूशन रिमोट सेंसिंग सेटेलाइट डेटा’ का उपयोग करके भारत की 22 प्रमुख नदी घाटियों के पारिस्थितिक तंत्रों के लचीलेपन का मानचित्र विकसित किया है। इस प्रक्रिया के दौरान प्रत्येक पारिस्थितिक तंत्र की भूमि, वहाँ की नदी घाटियों और जलवायु सहित विभिन्न कारकों के जरिए पानी का दबाव सहन करने की क्षमता को मापा गया है।

अध्ययन में नासा के मॉडरेट-रेजोल्यूशन इमेजिंग स्पेक्ट्रोरेडियोमीटर से प्राप्त पादप उत्पादकता और वाष्पोत्सर्जन के आँकड़ों सहित भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के वर्षा सम्बन्धी आँकड़ों के आधार पर भी निष्कर्ष निकाले गए हैं। पारिस्थितिकीय तंत्र के बायोमास (कार्बनिक पदार्थ जिनसे ऊर्जा पैदा हो सकती है) उत्पादन की क्षमता का आकलन करने के लिये वैज्ञानिकों ने यह प्रक्रिया अपनाई है। वैज्ञानिकों के अनुसार, अगर पेड़-पौधों द्वारा बायोमास उत्पादन करने की क्षमता कम होती है, तो इससे पारिस्थितिकीय तंत्र की सन्तुलन बिगड़ जाता है और उसकी सूखे जैसी समस्याओं से लड़ने की क्षमता कमजोर हो जाती है।

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (Indian Meteorological Department) और पुणे स्थित भारतीय उष्ण कटिबन्धीय मौसम विज्ञान संस्थान (Indian Institute of Tropical Meteorology, Pune) ने तापमान, वर्षा, गर्म तरंगों, ग्लेशियरों, सूखा, बाढ़ और समुद्र के स्तर में वृद्धि के लिये एक समान प्रवृत्ति का अनुमान लगाया है। वैज्ञानिकों के अनुसार, दक्षिण एशियाई क्षेत्र में सतह पर हवा का तापमान वर्ष 2020 तक बढ़कर 0.5-1.2 डिग्री सेल्सियस, वर्ष 2050 तक 0.88-3.16 डिग्री सेल्सियस और वर्ष 2080 तक 1.56-5.44 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच सकता है।

आईआईटी-गुवाहाटी के शोधकर्ताओं के मुताबिक, 22 में से जिन महज छह नदी घाटियों के पारिस्थितिकीय तंत्र में सूखे को सहन करने की क्षमता पाई गई है, उनमें ब्रह्मपुत्र, सिंधु, पेन्नार, लूनी, कच्छ एवं सौराष्ट्र के पश्चिम में बहने वाली नदियाँ कृष्णा और कावेरी के बीच स्थित पूर्व की ओर बहने वाली नदियाँ शामिल हैं।

संयुक्त राष्ट्र के फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन (एफएओ) के अनुमान के मुताबिक, विश्व की आबादी वर्ष 2050 तक नौ अरब हो जाएगी, जिसकी भूख मिटाने के लिये खाद्यान्न उत्पादन में 60 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी करनी होगी। भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद के अनुसार, वर्ष 2010-2039 के बीच जलवायु परिवर्तन के कारण खाद्यान्न उत्पादन में 4.5-9.0 प्रतिशत तक कमी हो सकती है।

भारतीय कृषि अनुसन्धान संस्थान के अनुसार, वर्ष 2020-2030 के दौरान तापमान में प्रति एक डिग्री की बढ़ोत्तरी होने से 40-50 लाख टन गेहूँ उत्पादन कम हो सकता है। दुनिया भर में कृषि तंत्र पहले ही खेती में अधिक संसाधनों का उपयोग किये जाने के दबाव से जूझ रहा है।

जलवायु परिवर्तन का असर पशुपालकों पर भी पड़ रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि तापमान बढ़ने से गाय के दूध में 40 प्रतिशत और भैंस के दूध में 5-10 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की जा सकती है। समुद्री पारिस्थितिक तंत्र भी इससे अछूता नहीं है। जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र के भीतर प्रवाल भित्तियाँ रंगहीन हो रही हैं, जिसके कारण समुद्र आधारित खाद्य शृंखला और मछुआरों की आजीविका खतरे में पड़ सकती है।जलवायु परिवर्तन पर अन्तर-सरकारी पैनल (आईपीसीसी) ने अपनी पाँचवीं रिपोर्ट में बदलते जलवायु चक्र के बारे में चेतावनी देते हुए कहा है कि इस सदी के अन्त तक वैश्विक तापमान में वर्ष 1990 के मुकाबले 1.4-5.8 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोत्तरी हो सकती है। जलवायु में बदलाव की आवृत्ति और उसकी सघनता के कारण अनियमित मानसून, बाढ़, तूफान एवं ग्लेशियरों के पिघलने का क्रम बढ़ सकता है।

भारत में विश्व की करीब एक चौथाई अल्प-पोषित आबादी रहती है और वर्ष 2017 के 119 देशों के वैश्विक हंगर इंडेक्स में हमारा देश 100वें स्थान पर है। कृषि एवं प्राकृतिक संसाधनों पर 50 प्रतिशत से अधिक आबादी की निर्भरता और अनुकूल रणनीतियों के अभाव के कारण भारत जलवायु परिवर्तन के खतरे के प्रति अधिक संवेदनशील माना जा रहा है। सूखे और ग्रीष्म लहर की दोहरी मार एक साथ पड़ने से स्थिति और अधिक गम्भीर हो सकती है।

एफएओ के अनुसार, कृषि को ‘क्लाइमेट स्मार्ट’ बनाना ही एकमात्र समाधान हो सकता है। ‘क्लाइमेट स्मार्ट’ कृषि एक समन्वित दृष्टिकोण पर आधारित है, जिसमें कृषि उत्पादन एवं आय में बढ़ोत्तरी, जलवायु अनुकूलन और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित करना शामिल है।

खाद्य सुरक्षा सिर्फ भोजन की उपलब्धता भर नहीं है, बल्कि इसमें कुपोषण के विभिन्न प्रकार, उत्पादकता, खाद्य उत्पादकों की आय, खाद्य उत्पादन प्रणालियों के लचीलेपन, जैव विविधता और आनुवंशिक संसाधनों के स्थायी उपयोग के लिये समग्र दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है। दो एकड़ से कम भूमि वाले छोटे काश्तकारों के समूह पर विशेष रूप से ध्यान दिये जाने की जरूरत है, जो देश के 80 प्रतिशत से अधिक किसानों का प्रतिनिधित्व करता है।

किसानों का यह समूह देश की कुल कृषि भूमि के करीब 44 प्रतिशत हिस्से पर खेती करता है और कुल कृषि उत्पादन में 50 प्रतिशत से अधिक योगदान, इन्हीं छोटी जोत वाले किसानों का है। खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए बिना पशुपालन, वानिकी और मत्स्य पालन समेत पूरे कृषि तंत्र को कुछ इस तरह रूपान्तरित करने की जरूरत है, जिससे बढ़ती आबादी की भोजन सम्बन्धी जरूरतें पूरी हो सकें और किसानों की आजीविका भी बनी रहे।

रंगहीन होने से प्रवाल कमजोर

तमिलनाडु के तुतीकोरिन स्थित सुगंती देवदासन समुद्री अनुसन्धान संस्थान (Suganthi Devadason Marine Research Institute) के वैज्ञानिकों ने महाराष्ट्र के सिन्धुदुर्ग जिले में स्थित मालवन समुद्री अभयारण्य की प्रवाल प्रजातियों के रंगहीन होने की प्रक्रिया का अध्ययन किया। इसके बाद वह इस नतीजे पर पहुँचे कि रंगहीन होने से प्रवाल कमजोर हो जाते हैं और भित्ति निर्माण की क्षमता प्रभावित होती है। ऐसे में इन पर अन्य गैर-सहजीवी शैवाल हावी हो सकते हैं, जिसका विपरीत असर प्रवाल भित्तियों पर आश्रित समुद्री जीवों पर भी पड़ सकता है।

ढूँढने होंगे जलवायु अनुकूलन के रास्ते

जलवायु परिवर्तन के कारण हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों के किसान सेब की खेती छोड़ रहे हैं तो हैरानी नहीं होनी चाहिए। सेब ठंडी जलवायु की फसल है और तापमान बढ़ने के कारण अब हिमाचल के किसान कम ठंडी जलवायु में उगाए जाने वाले अनार, कीवी, टमाटर, मटर, फूलगोभी, बन्दगोभी, ब्रोकली जैसे फल और सब्जियों की खेती करने के लिये मजबूर हो रहे हैं। तापमान बढ़ने से सेब उत्पादन में गिरावट होने के कारण किसानों को यह कदम उठाना पड़ रहा है।

निचले एवं मध्यम ऊँचाई (1200-1800 मीटर) वाले पहाड़ी क्षेत्रों, जैसे- कुल्लू शिमला और मंडी जैसे जिलों में यह चलन कुछ ज्यादा ही देखने को मिल रहा है। हिमाचल के शुष्क इलाकों में बढ़ते तापमान और जल्दी बर्फ पिघलने के कारण सेब उत्पादन क्षेत्र 2200-2500 मीटर की ऊँचाई पर स्थित किन्नौर जैसे इलाकों की ओर स्थानान्तरित हो रहा है।

समुद्र तल से 1500-2500 मीटर की ऊँचाई पर हिमालय शृंखला के सेब उत्पादक क्षेत्रों में बेहतर गुणवत्ता वाले सेब की पैदावार के लिये वर्ष में 1000-1600 घंटों की ठंडक होनी चाहिए। लेकिन इन इलाकों में बढ़ते तापमान और अनियमित बर्फबारी के कारण सेब उत्पादक क्षेत्र अब ऊँचाई वाले क्षेत्रों की ओर खिसक रहा है। सर्दियों में तापमान बढ़ने से सेब के उत्पादन के लिये आवश्यक ठंड की अवधि कम हो रही है। कुल्लू क्षेत्र में ठंड के घंटों में 6.385 यूनिट प्रतिवर्ष की दर से गिरावट हो रही है। इस तरह पिछले तीस वर्षों के दौरान ठंड वाले कुल 740.8 घंटे कम हुए हैं। इसका सीधा असर सेब के आकार, उत्पादन और गुणवत्ता पर पड़ता है।

सुदूर पूर्वोत्तर राज्य मिजोरम ने इस क्षेत्र में उदाहरण पेश किया है। मौसम के बदलते पैटर्न को वहाँ गम्भीरता से समझा गया है और स्थानीय लोगों की आजीविका तथा खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित रखने के लिये वैकल्पिक फसलों की खेती की जा रही है। ड्रैगन फ्रूट आमतौर पर थाईलैंड में पैदा होता है। मिजोरम का तापमान बढ़ा, तो थाईलैंड से ड्रैगन फ्रूट के बीज लाकर, वहाँ इसकी पैदावार शुरू की गई है।

कुछ ही सालों में इसके बेहतर परिणाम मिले हैं, किसानों को ज्यादा आमदनी हो रही है, मिजोरम का बदला मौसम अब ड्रैगन फ्रूट की पैदावार के अनुकूल हो सकता है। इसी प्रकार की सम्भावनाएँ हमें पंजाब व दूसरे राज्यों में भी तलाशनी होंगी। पंजाब अगर सिर्फ गेहूँ और चावल की खेती पर ही निर्भर रहा, तो आने वाले समय के लिये यह अच्छा संकेत नहीं होगा। -दिनेश सी. शर्मा, वरिष्ठ विज्ञान पत्रकार ‘द आउटसोर्सर’ और ‘विटनेस टू द मेल्टडाउन’ जैसी चर्चित पुस्तकों के लेखक हैं।

सूखे और ग्रीष्म लहर की दोहरी चुनौती
सूखे की स्थिति के लिये कम वर्षा को जिम्मेदार माना जाता है, पर एक ही समय में ग्रीष्म लहरों का प्रकोप और बरसात में गिरावट होने से इसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। वर्ष 1951 से 2010 तक साठ वर्षों के आँकड़ों के अध्ययन के अनुसार, एक ही समय में होने वाली सूखे एवं ग्रीष्म लहर की घटनाओं की आवृत्ति और उनका दायरा लगातार बढ़ रहा है। -प्रोफेसर पी.पी. मजूमदार, वैज्ञानिक, भारतीय विज्ञान संस्थान, बंगलुरु

सूखा नहीं झेल सकता दो-तिहाई पारितंत्र
तापमान बढ़ने से पेड़-पौधों द्वारा बायोमास उत्पादन करने की क्षमता कम हो जाती है, जिससे पारिस्थितिक तंत्र का सन्तुलन बिगड़ जाता है और सूखे जैसी पर्यावरणीय समस्याओं से लड़ने को पारितंत्र की क्षमता कमजोर हो जाती है। जहाँ भी पारिस्थितिक तंत्र की क्षमता कमजोर है, वहाँ इसका सीधा असर खाद्यान्नों के उत्पादन पर पड़ सकता है। -प्रोफेसर मनीष गोयल, शोधकर्ता-आईआईटी, गुवाहाटी

 

 

 

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