भविष्य के हर्बल किंग है राकेश

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कृषि परिवर्तन

राजस्थान में एलोवेरा की खेती के बीच राकेश चौधरी। राजस्थान में एलोवेरा की खेती के बीच राकेश चौधरी।

सन् 1966 में आई एक फिल्म ‘बादल’ का मन्ना डे द्वारा गया गया एक गीत बहुत चर्चित हुआ। गीत के बोल थे, ‘खुदगर्ज दुनिया में, ये इंसान की पहचान है, जो पराई आग में जल जाए वो इंसान है। अपने लिए जिये तो क्या जिये, तू जी ऐ दिल, जमाने के लिये।’ आज की तारीख में लोग सिर्फ अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिये जीते हैं, ऐसे बहुत कम लोग होते हैं जो औरों के लिए जीना पसंद करते हैं।  राजस्थान की कुचामन सिटी के राजपुरा गांव में रहने वाले राकेश कुमार चौधरी ऐसे ही एक बिरले युवा किसान हैं जो कम उम्र में ही किसानों के लिए जीते आ रहे हैं। राकेश को आज राजस्थान में औषधीय खेती के विकल्प के रूप में देखा जाने लगा है। बीते दिनों ‘कृषि परिवर्तन’ के लिए उनसे विस्तृत चर्चा हुई। प्रमुख अंश प्रस्तुत हैं ..........

बचपन से पढ़ाई तक

बकौल राकेश, ‘मेरा जन्म 16 सितंबर 1983 को राजपुरा गांव में हुआ। पिताजी सीआरपीएफ में रहे। मैं गावं  के सरकारी स्कूल के अलावा पास ही के शिव गांव स्थित स्कूल में भी पढ़ा। रोजाना 10 किलोमीटर का सफर घर से स्कूल के लिए पैदल तय करता था। इस पैदल यात्रा का फायदा यह हुआ कि बचपन से ही खेतों, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों से गहरा लगाव हो गया। खेतों की पगडंडियों से गुजरते हुए वहां उगी हुई जड़ी बूटियों से भी अपनापन बढ़ने लगा। उम्र बढ़ी तो समझ बढ़ी। आगे चलकर बी.एससी, बीसीए और बीएड किया।

2004 में बदली जिंदगी

एक बार की बात है। प्राइवेट बीमा कंपनी में इंटरव्यू देने निकले मेरे गांव के शिवपालजी और उनके साथी दुलीचंद हर्षवाला रात को हाॅस्टल में मेरे कमरे में रुकने आये। दुलीचंद जी ने बताया कि उनके मित्र किसानों को औषधीय पादपों की खेती के लिए प्रोत्साहित करते हैं, सरकारी अुनदान भी दिलवाते हैं। मैं आपकों उनसे मिलवाता हूं, आप किसान तो हैं ही, पढ़ाई के साथ-साथ यह काम भी कर सकते हैं। मैं उनके दोस्त डा. गोपाल चैधरी से मिलने चला गया। वे ‘पर्यावरण चेतना एवं शोक संस्थान’ चलाते थे और ‘मरुधर हर्बल सीड’ नामक कंपनी के माध्यम से किसानों को बीज मुहैया करवाया करते थे। मिलने पर उन्होंने मुझे भी प्रोत्साहित किया, मुझे लगा कि जब मेरे जान पहचान वाले सभी किसान ही हैं, मुझे तो यह काम कर ही लेना चाहिए। उनके संपर्क में आने पर मालूम हुआ कि मेडिसिनल प्लांट बोर्ड का कार्यालय पंत कृषि भवन, जयपुर में है और हमको वहां अपना पंजीकरण करवाकर काम शुरू करना चाहिए। मैंने सर्वप्रथम पिताजी और अपने कुछ रिश्तेेदारों का रजिस्ट्रेशन करवाया। 2005 में ही बोर्ड की विज्ञप्ति भी जारी हुई। रूचि रखने वाले किसान काॅंट्रेक्चुअल फार्मिंग के लिए सपंर्क करें। बोर्ड वाले अुनदान राशि भी देते थे, उनके द्वारा कुछ औषधीय फसलें भी चयनित की हुई थीं, लेकिन क्षेत्रवार उनका वर्गीकरण नहीं था। 2005 में मैंने अपने 14 जानकारों के परियोजना प्रस्ताव जमा करवाए। जब मुझमें अनुभव की कमी थी। ‘कलिहारी’, ‘सफेद मुसली’, ‘स्टीविया’ जो कि हमारे इलाके में हो ही नहीं सकती थी, हमने इसे भी उगा दिया। हमने अपनी पहली ही परियोजना में वे फसलें चयनित कीं, जो हमारे स्थानीय क्लाइमेट के विरुद्ध थीं। सारी की सारी फसलें चैपट हो गई, घोर निराशा हाथ लगी। फिर लोगों ने बताया-मुलैठी में मुनाफा होता है, मैने इसकी खेती की, बेहतरीन पैदावार हुई। मैं इलाके का पहला किसान बना, जिसने कामयाबी का स्वाद चखा।

पारंपरिक खेती में दो फसलों में सारे खर्चे निकाल कर किसान को 25000 रुपये से ज्यादा का लाभ नहीं मिल पाता था, जबकि एक हेक्टेयर में ग्वार पाठे की खेती से ही किसान को आज दो से ढाई लाख रुपयों का शुद्ध मुनाफा हो रहा है। ग्वार पाठे की खेती के साथ इंटरक्राॅपिंग की शुरुआत की। खेतों की मेड़ पर गुड़मार, दमाबेल, कौंच बीज, गिलोय आदि लगाने के लिए भी किसानों को प्रेरित किया, ताकि उनकी आय में अतिरिक्त वृद्धि हो। बरसाती दिनों में अपने आप उगने वाली वनस्पतियों को संग्रहित करने की आदत भी किसानों में डाली। नीमपत्ती पहले कचरे के रूप में देखी जाती थी मुझसे जुड़ने पर किसान इसे भी सहेजने लगे हैं, क्योंकि ये भी अतिरिक्त लाभ दे रही है। इस तरह के कई फायदे किसानों को होने लगे हैं। 

जिंदगी आगे बढ़ती चली गई

2007 में मन बना लिया कि चाहे जो हो जाए, मैं औषधीय खेती करुंगा व करवाऊंगा, किसानों की फसलों को खरीदकर आगे फार्मेसियों को बेचूंगा। सबसे पहला फोकस ग्वार पाठे यानी एलोवेरा की खेती पर किया। आगे की राहें भी इतनी आसान नहीं रही। ये वो दौर था, जब किसान आधा बीघा, 2 बीघा में एलोवरा की खेती करते थे। पूरे राज्य में घूमने पर 20-22 किसान मिले, जिन्होंने ग्वार पाठे की खेती कर रखी थी। ये किसान भी लापरवाह ही थे, क्योंकि तब ग्वार पाठे का कोई क्रेज नहीं था। किसान तो फसल को पानी तक नहीं पिलाते थे क्योंकि ग्वार पाठे का कोई खरीददार नहीं होता था। अब समस्या यह थी कि ग्वार पाठे की खेती के लिए किस तरह प्रोत्साहित किया जाए ? मैंने सोचा मेरे से से जुड़े जिन 14 किसानों को नुकसान हुआ, उनको ग्वार पाठे की खेती करवाकर उनके घाटे को मुनाफे में बदला जाए। इस पर भी हजारों बातें सुनने को मिलीं। बेवकूफ हो गए हो, इसकी खेती करता है कोई ? यह तो बंजर भूमि में होता है, इसको लगाएंगे तो खेत बंजर हो जाएंगे। यह कब्रिस्तान में उगता है, खेतों को कब्रिस्तान बनाने पर तुले हो क्या ? मुझ पर किसी बात का कोई असर नहीं हुआ। मैंने जैसे तैसे कुछ किसानों को राजी कर लिया। पर उनकी भी शर्तें थीं, वे प्लाटिंग मैटेरियल का पैसा नहीं देंगे, मैंने तय किया कि जब पैदावार होगी तो प्लाटिंग मैटेरियल का पैसा रख लूंगा।


संषर्घ से घबराया नहीं

वर्ष 2007 तक मुझसे 62 किसान जुड़ चुके थे। बोर्ड में परियोजना अधिकारी रहे डा. श्रीराम तिवाड़ी ने मुझसे कहा, ‘‘संघर्ष से घबराकर हार मत जाना राकेश! आने वाला समय आयुर्वेद का है। तुम बहुत कामयाब होने वाले हो।’ उन्होंने मुझे एक नसीहत भी दी जो भविष्य में अनमोल तोहफा साबित हुई। कहा, इस काम को ईमानदारी से करना। किसानों की सोच सारी अनुदान राशि को हजम करने तक की रहती है, तुम ऐसी सोच मत रखना। तुमसे जुड़े किसनों को भी यही बात समझाना कि इस पैसे को खाना नहीं है, पौधे लगाने, पानी पिलाने, बाड़बंदी, निराई-गुड़ाइई में काम लेना है। फिर देखना पैदावार अनुदान से कहीं अधिक होगी। मुझे इस बात की खुशी है कि अनुदान को लेकर हम सब किसानों ने अपनी सोच बदली, एक भी किसान ने इस राशि का दुरुपयोग नहीं किया। इस बाीच ग्वार पाठे की हमारी फसलें साल-डेढ़ साल की हो चुकी थीं, कटने वाली थीं। हम मार्केट ढूंढ रहे थे कि इस उपज को किधर बेचा जाए ?

मनीष मित्तल जीवन के पहले ग्राहक थे

एक बार फिर तिवाड़ी जी ने राह दिखलाई। उन्होंने बताया कि एक बार फिर तिवाड़ी जी ने राह दिखलाई। उन्होंने बताया कि एक सहारनपुर से आगे बिहारीगढ़ छुटलपुर में मनीष मित्तल एलोवरो की खरीद में रूचि रखते हैं। इधर मनीष मित्तल जी ने भी दिल्ली मेडिसनल प्लांट बोर्ड में संपर्क किया तो राजस्थान बोर्ड के बारे में पता चला। राजस्थान बोर्ड ने मेरे बारे में बताया, इस तरह बात बन गई। मनीष मित्तल जीवन के पहले ग्राहक थे, इसलिए मैं उनसे किसी तरह को कोई मोलभाव वाली स्थिति में नहीं था। इस बात की खुशी तो थी कि हमारी फसलों का कोई खरीददार तो आया। जो रेट मिली, हमने माल बेच दिया। पूरे राजस्थान में डेढ़ महीने तक घूम-घूम के किसानों से जितना एलोवेरा मिल सका, खरीद लिया। 1 रुपया 40 पैसे में हमने आगे बेचा, दाम कम थे, लेकिन हमारे लिए काफी था क्योंकि हमारे काम की शुरुआत हो चुकी थी।

नए किसानों से संपर्क हुए

इसी बीच ऐसे भी कई किसानों से संपर्क हुआ, जिनको कई एजेंटों ने एलोवेरा लगवा दिया था, लेकिन वे खरीद के वक्त गायब हो गए। मैंने उनकी फसली भी खरीदी। विद्याधर ढाका से जब उनके गांव नरसास, जिला सीकर में मिला तो वे ग्वार पाठे के नाम से ही आग बबूला हो गए। हमको बांधने और बांधकर मारने तक पर उतारू हो गए। बातचीत की तो बात बनी। एक एकड़ खेत में लगी फसल पर वे हमारे सामने ही प्लाउ चलाने की धमकी देने लगे। उनको लगा कि मैं भी उसी एजेंट की तरह होऊंगा जो लगवा तो गया, पर खरीदने नहीं आया। मैंने उनको हफ्ते-दस दिन खड़ी फसल को पानी पिलाने के लिए कहा तो वे नहीं माने। मैंने 5000 रुपए एडवांस दिए। कुछ दिन बाद उनकी फसल खरीदने पहुंचा। एक लाख रुपए दिए। यह बात 2006 की है। उस वक्त विद्याधरजी से जो संबंध बने, वो आज तक कायम हैं। उस वक्त उन्होंने मेरे कहने पर पूरे 30 बीघा खेत में ग्वार पाठा उगाया था। 

इधर लोग पिताजी को भड़काते थे

मेरे जीवन में एक सफलता आती थी तो 3 असफलताएं भी साथ ही चली आती थीं। इस बात से दुखी होने वालों में मेरे पिताजी सबसे आगे थे। एक तो वे मेरे अजीबोगरीब काम को समझ नहीं पा रहे थे, ऊपर से गांव वाले और चिर-परिचित उनको भड़काते थे कि ‘आपके बेटे का दिमाग खराब हो गया है। हम जाट हैं और जाटों का पुश्तैनी काम खेती होता है। आपके बेटे को व्यापार का चस्का लगा है, व्यापार भी जड़ी बूटियों का। ये तो वैद्यों का काम होता है, उसे समझाओं, खुद तो बर्बाद होगा ही गांव के भोले-भाले लोगों को भी बर्बाद करेगा सो अलग।’ मैंने अर्जुन की भांति अपने उद्देश्य पर नजरें टिका रखी थीं, इधर-उधर का सब सुनाई देता था, पर मैं विचलित नहीं होता। इसी बीच 2007  में ‘मारवाड़ औषधीय पादप स्वयं सहायता समूह’ नाम से मैंने अपनी एसएचजी बना ली, जिसके तहत भी मैंने कई प्रस्ताव बनाकर बोर्ड को भेजे। किस्मत को एक बार फिर हम सभी किसानों की परीक्षा लेनी थी। हमारे प्रस्तावों को बोर्ड ने हाॅर्टिकल्चर बोर्ड को सौंप दिया और हाॅर्टिकल्चर वालों ने हमें किसी तरह की कोई सूचना नहीं दी। इस सरकारी उदासीनता के चलते भी कई किसान मुझसे विमुख हुए। कुछ किसान मुझसे भरोसा उठाते हुए पुनः पारंपरिक कृषि की ओर लौट गए। 

और खुशियां लौट आई

इधर ग्वार पाठे की सप्लाई के दौरान मुंबई की एक पार्टी संपर्क में आई। उसे बड़ी तादाद में एलोवेरा की मांग रहती थी और गुणवत्ता उनकी पहली शर्त हुआ करती थी। हमारे माल के पहले लाॅट से ही वे प्रभावित हुए। बातचीत हुई तो उन्होंने पूछा कितना माल है हमारे पास ? मैंने बताया 200 एकड़ में। कुछ किसान जुड़े हुए नहीं हैं, फिर भी संपर्क में हैं। मैंने रोज एक ट्रक देने का वादा कर लिया। पार्टी ने मेरे गांव में फैक्ट्री लगाने का आॅफर दिया। मैनें इसे ईश्वरीय आशीर्वाद मानते हुए हामी भर दी। वे लोग मेरे गांव आ गए, मेरे ही घर रुके। उन्होंने पिजाजी से बात की और कहा उनका बेटा अच्छा काम कर रहा है। गांव में फैक्ट्री लगने से उसकी प्रतिष्ठा और बढ़ेगी। साथ ही गांव के लोगों को भी उसकी वजह से रोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे। पिताजी ने उन्हें कहा, ‘मेरे बेटेे का दिमाग खराब हो गया है। इतनी मात्रा में एलोवेरा नहीं है। कल को फैक्ट्री फेल हो गई तो रही सही साख भी चली जाएगी। लोग हम पर हसेंगे सो अलग‘। इस सब के पीछे पिताजी की मेरे को लेकर चिंताएं थीं कि कल को कुछ ऊंच नीच हो गई तो वो भरपाई कैसे करेगा। आखिर पिता, पिता होते हैं न! पिताजी, भाई और परिवार का आंतरिक सहयोग बरकरार रहा। उस पार्टी ने मुझसे बात की। बोले तुम्हारे पिताजी नहीं चाहते कि तुम जीवन में बड़े कदम उठाओ। पर यह भी तय है कि इस प्रकार के स्वर्णिम अवसर रोज-रोज नहीं आने वाले। सोचने के लिए दो दिन का समय देते हुए उन्होंने मुझ पर फैसला छोड़ दिया। इधर मैंने मन बना लिया कि करना है तो करना है। मैंने काम शुरू किया, ये वो दौर था जब मेरे पास 90 महिला कर्मचारी और 13 पुरुष काम करते थे।

दायरे तो बढ़ते चले गए

इस दौरान मैंने आंवला और अन्य किस्मों पर भी अपना ध्यान केंद्रित किया। यही वह समय था, जब मैं स्वामी बाबा रामदेव जी की दिव्य योग फार्मेसी और पतंजलि आयुर्वेद के संपर्क में आया। मैंने इनको माल सप्लाई किया। इतना ही नहीं, हिमालय, एम्ब्रोसिया, गुरुकुल फार्मेसी तक में मेरी गहरी पैठ बन गई। सब मेरे जुटे रहने का प्रतिफल था। 

अब बदल चुकी हैं किसानों की जिंदगियां

अब मेरा काम 2019 तक आ चुका है। पीछे मुड़कर देखता हूं तो सब समझ से परे है, ये सब कैसे हो गया? मेरा मत है कि मुझ में सच्ची आस्था रखने वाले किसानों के विश्वास की जीत हुई है। आज 250 किसान परिवार तो सीधे तौर पर मुझसे जुड़ चुके हैं। 150 से ज्यादा ऐसे किसानों का काफिला है जो सीधे तौर पर जुड़ाव नहीं रखते, लेकिन अपनी उपज को बेचने और दूसरी तकनीकी मदद के लिए मेरे पास आते हैं। आज राजस्थान के 11 शुष्क जिलों के लगभग सभी किसानों का अच्छा खासा नेटवर्क विकसित हो चुका है, जो औषधीय पौधों की खेती करते हैं या रुचि रखते हैं। एलोवेरा की खेती करने वाले राज्य के प्रायः सभी किसान प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से जुड़े हुए हैं। 

यूं बदला किसानों का जीवन स्तर

पारंपरिक खेती में दो फसलों में सारे खर्चे निकाल कर किसान को 25000 रुपये से ज्यादा का लाभ नहीं मिल पाता था, जबकि एक हेक्टेयर में ग्वार पाठे की खेती से ही किसान को आज दो से ढाई लाख रुपयों का शुद्ध मुनाफा हो रहा है। ग्वार पाठे की खेती के साथ इंटरक्राॅपिंग की शुरुआत की। खेतों की मेड़ पर गुड़मार, दमाबेल, कौंच बीज, गिलोय आदि लगाने के लिए भी किसानों को प्रेरित किया, ताकि उनकी आय में अतिरिक्त वृद्धि हो। बरसाती दिनों में अपने आप उगने वाली वनस्पतियों को संग्रहित करने की आदत भी किसानों में डाली। नीमपत्ती पहले कचरे के रूप में देखी जाती थी मुझसे जुड़ने पर किसान इसे भी सहेजने लगे हैं, क्योंकि ये भी अतिरिक्त लाभ दे रही है। इस तरह के कई फायदे किसानों को होने लगे हैं। 

जीएसीपी तकनीक से करते हैं खेती

आज मोटे तौर पर 107 तरह की जड़ी बूटियों की खेती-संकलन राजस्थान में हो रहा है। मैं मुख्यतःं अश्वगंधा, ग्वार पाठा, गोखरू बड़ा, छोटा गोखरू, बड़ी कंटकारी, काकनाश (बिच्छूफल), अरडू, नीम, सहजन, रामा तुलसी, श्यामा तुलसी, शतावर, भूमि आंवला, गूगल, सरपूंखा (धमासा) आदि की खेती कर रहा हूं और किसानों को भी इसी के लिए प्रेरित करने में जुटा हुआ हूं। सरपूंखा (धमासा) के लिए तो देश की नामी गिरामी ड्रग कंपनी ने मुझसे 3 साल का अग्रीमेंट तक कर रखा है। ड्रग कंपनी या फार्मेसियों को सप्लाई किये जाने वाली उपज को लेकर भी मैं बहुत सावधानी बरतता हूं। ‘गुड एग्रीकल्चर कलेक्शन प्रेक्टिस’ जिसे जीएसीपी तकनीक भी कहा जाता है, के नियमों के तहत कार्य करता हूं। हायजिन तरीके से कटाई की जाती है। सस्टेनेबल हार्वेस्टिंग की जाती है-फसल को जड़ों सहित नहीं उखाड़ा जाता, ताकि अगली बार फिर से फूट सकें। फसल का 35 प्रतिशत भाग उगा रहना चाहिए, ताकि सीड खत्म न हो। चारागाह या शमशान घाट पर कुछ उगा हुआ हो तो उसे नहीं लेते। फसल मंदिर मस्जिद में हो तो भी उसे नहीं लेते। हाइवे पर कार्बन की मात्रा अधिक होती है, इसलिए हाइवे से दूर के खेतों में खेती करते और करवाते हैं। अब यह काम जीवन जीने के लिए नहीं करते, बल्कि अब यह काम हमारी जीवनशैली बन चुका है। अभ्यास करते करते इतने सिद्ध हो गए कि अब किसानों को फसल कटाई की मशीनें मुहैया करवाते हैं। फसल काटने से लेकर सुखाने, पैकिंग तक सभी स्तर पर ट्रेनिंग भी देते हैं। 

हमारी उपलब्धियां

‘मारवाड़ औषधीय पादप स्वयं सहायता समूह’ ने 2017 में 40 मीट्रिक टन सरपंखा ड्रग कंपनी को बेचकर 5 से 6 लाख रुपये का शुद्ध मुनाफा कमाया। बड़े भाई राजेश की ‘राज अर्बल बायोटेक’ ने 2016-17 में 1 करोड़ रुपये का कारोबार किया। हमारी फर्म ‘विनायक हर्बल’ ने 2017-18 में दो करोड़ रुपये का कारोबार किया। वर्ष 2020 तक 50 करोड़ रुपयों के टर्न ओवर का सपना हम किसानों ने संजोया है। शुरुआती दिनों में तो सिर्फ अनुभव ही कमाया, जो भी लाभ मिला उसे फिर से काम को मजबूत करने के लिए लगा दिया। आज तो हालात ये हैं कि नवंबर 2017 में जीएसटी टैक्स ही 2 लाख 9 हजार रुपये चुकाया। मैं सरकार को टैक्स भरते हुए अपने किसानों की कामयाबी का सपना देखता हूं।

भविष्य की योजनाएं

किसानों के बीच बिचैलियों और ट्रेडर्स का खात्मा चाहता हूं। फार्मेसियों की डिमांड के अनुसार किसानों से फसल लगवाने से लेकर फार्मेसियों तक पहुंचाने का काम करना चाहता हूं। चाहता हूं कि किसानों को उनकी खून पसीने से उपजाई फसलों के 100 फीसद दाम मिलें। अगर फार्मेसियों तक फसल कम कीमत में पहुंचने लग जाए तो ग्राहकों को भी कम कीमतों में दवाएं उपलब्ध होंगी, इसमें कोई दो राय नहीं है। 

मान सम्मान

इस सवाल के जवाब में मुस्कुराते हुए कहते हैं ‘आपक (लेखक के) संपर्क में आने पर ही जीवन को एक नई दिशा मिली। जोधपुर की ‘सीता दुर्गा नाॅलेज फाउंडेशन’ के सीईओ मुकेश बंसलजी ने आपकी अनुशंसा पर पहली बार नवाचारी किसान के रूप में सम्मान दिया। किन्हीं कारणों से समारोह में शामिल नहीं हो पाया तो, आपने रायपुर के सुविख्यात पर्यावरण प्रेमी नवल डागाजी के करकमलों से वो सम्मान दिलवाया। फार्म एन फूड-जाॅन डियर अवार्ड’ राष्ट्रीय अवार्ड उत्तर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री (आबकारी एवं मद्य निषेध) राजा जयप्रकाश सिंह ने प्रदान किया। पंडित दीन दयाल उपाध्याय को समर्पित राष्ट्रीय ‘इंडियन आइडल अवार्ड’  उनके भतीजे विनोद शुक्ला, चंद्रशेखर आजाद के भतीजे सुरजीत आजाद और हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की बहन वीना अरोड़ा के हाथों मिला।

 

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