ग्लोबल वॉर्मिंग का जन्तर गाँधी के पास

Submitted by editorial on Mon, 12/24/2018 - 12:58
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राष्ट्रीय सहारा (हस्तक्षेप), 22 दिसम्बर, 2018

गाँधी अध्ययन के कुछ अध्येताओं ने छानबीन की तो पता चला कि गाँधी के लेखन या चिन्तन में ‘पर्यावरण’ शब्द का प्रयोग नहीं मिलता है। वैसे यह एक भाषागत मुद्दा है न कि वैचारिक। बहरहाल, पर्यावरण को लेकर आज जो भी आशय प्रकट किए जाते हैं या चिन्ता जताई जा रही है, गाँधी उससे पूरी तरह जुड़े दिखाई पड़ते हैं। आज जो सबसे बड़ा संकट-दुविधा दुनिया के सामने है, वह है तकनीक और विकास के अटूट साझे का उभरना।

आज जिस दौर में हम जी रहे हैं, वह आर्थिक तरक्की की ऐसी भूख का दौर है, जिसमें प्राकृतिक संसाधनों का दोहन बर्बरता तक की सीमा को लाँघ चुका है। बहुत पहले महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने चेतावनी दी थी कि मानव जाति को जीवित रहना है, तो उसे एक नई तरह की सोच की दरकार होगी। यह सोच दुनिया से विदा तो नहीं हुई है पर इस पर अमल से जरूर सभी दूर खड़े हैं। नतीजतन, ग्लोबल वॉर्मिंग, अप्रत्याशित जलवायु का खतरा, समुद्री जल-स्तर में वृद्धि और ओजोन परत के कमजोर पड़ते जाने निरन्तर खतरों के बीच गरीबी, बेरोजगारी और आर्थिक-सामाजिक गैर-बराबरी जैसे खतरों से दुनिया घिरती जा रही है। आलम यह है कि हवा, पानी और मिट्टी तक जहरीली होती जा रही है, शहरों और नदियों का प्रदूषण एक नए खतरे के तौर पर सामने आ रहा है। मानव सभ्यता और विकास की इस नियति को आधुनिक समय में जिस व्यक्ति ने सबसे पहले और सर्वाधिक गम्भीरता व व्यापकता से समझा, वे थे महात्मा गाँधी।

गाँधी अध्ययन के कुछ अध्येताओं ने छानबीन की तो पता चला कि गाँधी के लेखन या चिन्तन में ‘पर्यावरण’ शब्द का प्रयोग नहीं मिलता है। वैसे यह एक भाषागत मुद्दा है न कि वैचारिक। बहरहाल, पर्यावरण को लेकर आज जो भी आशय प्रकट किए जाते हैं या चिन्ता जताई जा रही है, गाँधी उससे पूरी तरह जुड़े दिखाई पड़ते हैं। आज जो सबसे बड़ा संकट-दुविधा दुनिया के सामने है, वह है तकनीक और विकास के अटूट साझे का उभरना। यह उभार व्यवहार से लेकर सोच तक में समान रूप से नजर आता है। मशीनीकरण को लेकर गाँधी के बीज विचार ‘हिंद स्वराज’ में प्रकट हुए हैं।

1909 में प्रकाशित यह पुस्तिका गाँधी विचार की कुंजी मानी जाती है। इसमें मशीनीकरण की अन्धी दौड़ को लेकर वे दो टूक कहते हैं, ‘‘ऐसा नहीं था कि हमें यंत्र वगैरह की खोज करना आता नहीं था। लेकिन हमारे पूर्वजों ने देखा कि लोग यंत्र वगैरह की झंझट में पड़ेंगे तो गुलाम ही बनेंगे और अपनी नीति को छोड़ देंगे।” उन्होंने सोच-समझ कर कहा, ‘‘हमें अपने हाथ-पैरों से जो काम हो सके वही करना चाहिए। हाथ-पैरों का इस्तेमाल करने में ही सच्चा सुख है, उसी में तन्दुरुस्ती है।”

श्रम आधारित उद्योग-शिल्प

वस्तुतः गाँधी की दृष्टि में श्रम आधारित उद्योग-शिल्प ही वह चीज है, जिसकी बदौलत मनुष्य भोजन, वस्त्र, आवास जैसी आवश्यकताओं के लिहाज से स्वावलम्बी रहता आया था और अन्य प्राणी भी सुरक्षित रहते आए थे। इस जीवन संस्कार की ही यह देन रही कि पेयजल संकट, ग्लोबल वॉर्मिंग, पशु-पक्षियों और पेड़ों की कई प्रजातियों के समाप्त होने के खतरे जैसे अनुभव लम्बे दौर में कभी हमारे सामने नहीं आए। ये संकट तो उस आधुनिकता के साथ सामने आए जिसकी शुरुआत यूरोपीय औद्योगिक क्रान्ति से मानी जाती है। औद्योगिक क्रान्ति ने उत्पादन के जिस अम्बार और उसके असीमित अनुभव के लिये हमें प्रेरित किया, उसकी पूरी बुनियाद मजदूरों के शोषण पर टिकी थी।

दिलचस्प है कि ज्यादा उत्पादन और असीमित उपभोग को जहाँ आगे चल कर विकास का पैमाना माना गया, वहीं प्राकृतिक सम्पदाओं के निर्मम दोहन को लेकर सबने एक तरफ से आँखें मूँदनी शुरू कर दी। कार्ल मार्क्‍स ने उत्पादन-उपभोग की इस होड़ में मजदूरों के शोषण को तो देखा लेकिन मनुष्येतर प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को, मशीनीकरण की आँधी से उजड़ते यूरोप को वे नहीं देख सके। इसे किसी ने देखा तो वे थे गाँधी। उन्होंने ‘हिन्द स्वराज’ में साफ शब्दों में कहा, “मशीनें यूरोप को उजाड़ने लगी हैं और वहाँ की हवा अब हिन्दुस्तान में चल रही है। यंत्र आज की सभ्यता की मुख्य निशानी है और वह महापाप है। मशीन की यह हवा अगर ज्यादा चली तो हिन्दुस्तान की बुरी दशा होगी।”

जाहिर है कि गाँधी ने औद्योगीकरण की अविवेकी राह पर चलते हुए मनुष्य और प्रकृति, दोनों के धीरे-धीरे मिटते जाने का खतरा आज से सदी पहले भाँप लिया था। गाँधी जिस ग्राम स्वराज की बात करते हैं, उसकी रीढ़ है कृषि एवं ग्रामोद्योग। इसे ही विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था का नाम दिया गया। गाँधी ने कृषि अर्थव्यवस्था में भारत के चिरायु स्वावलम्बन के बीज देखे थे। ऐसा भला होता भी क्यों नहीं क्योंकि वे दक्षिण अफ्रीका से भारत आने पर सबसे पहले गाँवों की तरफ गए, किसानों के बीच खड़े हुए।

चम्पारण सत्याग्रह इस बात की मिसाल है कि गाँधी स्वराज की प्राप्ति के साथ जिस तर्ज पर अपने सपनों के भारत को देख रहे थे, उसमें किसान महज हरवाहा-चरवाहा या कुछ मुट्ठी अनाज के लिये चाकरी करने वाले नहीं थे, बल्कि देश के स्वावलम्बन का जुआ अपने कन्धों पर उठाने वाले पुरुषार्थी अहिंसक सेनानी थे। गाँधीवादी अर्थ दृष्टि और कृषि-ग्रामोद्योग की उनकी दरकार को तार्किक आधार देने वाले प्रसिद्ध विद्वान डॉ. जेसी कुमारप्पा ने मशीनीकरण के जोर पर बढ़े शोषण की जगह सहयोग और उपभोग की जगह जरूरी आवश्यकता को मनुष्य के विकास और कल्याण की सबसे बड़ी कसौटी माना। सहयोग और आवश्यकता की इस कसौटी से स्वावलम्बी आर्थिक स्थायित्व को तो पाया ही जा सकता है, प्राकृतिक असन्तुलन जैसे खतरे से भी बचा जा सकता है।

विकास की समावेशी दरकार

इस हिंसक विकास को लेकर कोई एतराज किसी स्तर पर कभी जाहिर नहीं हुआ, ऐसा भी नहीं है। खास तौर पर शीतयुद्ध के खात्मे के साथ भूमंडलीकरण का ग्लोबल जोर शुरू होने पर अमेरिका से लेकर भारत तक कई अराजनीतिक जमात, चिन्तक और जागरूक लोगों का समूह इस तार्किक दरकार को सरकारों की नीति पर हावी कराने के संघर्ष में जुटे कि विकास की समझ और नीति मानव अस्मिता और प्रकृति के लिहाज से अकल्याणकारी न हो।

आज अर्थ और विकास की हर उपलब्धि को जिस समावेशी दरकार पर खरे उतरने की बात हर तरफ हो रही है, उसके पीछे का तर्क गाँधी की समन्वयवादी अवधारणा की ही देन है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री गाँधी के पर्यावरण चिन्तन को लेकर यह साफ करते हैं, “गाँधी ऐसे पर्यावरणविद नहीं थे जो सभी प्रकार के जीवन के बीच अन्त:सम्बन्धों को मानते हुए भी मानव जातियों की उत्तरजीविता के प्रति उदासीन थे। वास्तव में पारिस्थितिकीय मामले उनकी सामाजिक व्यवस्था के मूल्य आवश्यकता मॉडल पर ध्यान केन्द्रित करने से उभरे हैं, जो प्रकृति का दोहन अल्पकालीन लाभों के लिये नहीं करेगा, बल्कि इससे केवल वही लेगा जो मानव का अस्तित्व बनाए रखने के लिये अत्यन्त आवश्यक है। गाँधी को स्वीकार करना पड़ा कि न चाहते हुए भी प्रकृति के प्रति कुछ मात्रा में हिंसा करनी पड़ती है। हम बस यह कर सकते हैं कि जहाँ तक हो सके इसे कम-से-कम करें।”

नन्दी गाँधी का ही सन्दर्भ लेकर आगे कहते हैं कि उन्होंने चेताया था, “ऐसा समय आएगा जब अपनी जरूरतों को कई गुना बढ़ाने की अन्धी दौड़ में लगे लोग अपने किये को देखेंगे और कहेंगे, ये हमने क्या किया?” यदि हम जलवायु परिवर्तन सम्बन्धी वर्तमान वाद-विवाद को देखें तो जिस व्यग्रता से पश्चिमी देश उभरते हुए देशों को अपना कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिये समझा रहे हैं और विकसित देशों द्वारा जलवायु परिवर्तन की गति को कम करने के लिये अरबों डॉलर खर्च किये जा रहे हैं, उससे गाँधी की भविष्यवाणी सच होती दिख रही है। यद्यपि ‘स्मॉल इज ब्यूटीफुल’ और ‘लिमिट्स टू ग्रोथ’ जैसी किताबों के जरिए सत्तर के दशक में हमें पर्यावरणीय संकट के बारे में जागरूक किया जा चुका था, तथापि दुनिया को इसकी गम्भीरता को समझने में एक दशक से अधिक का समय लग गया।

आखिर में गाँधी की पर्यावरणवादी दृष्टि की व्यापकता को समेकित तौर पर समझने के लिये प्रसिद्ध लेखक और ‘हिन्द स्वराज’ की पुनर्व्याख्या का जोखिम उठाने वाले वीरेंद्र कुमार बरनवाल का यह कथन गौरतलब है, “गाँधी ने अपनी आधी सदी से अधिक चिन्तन के दौरान यह सिद्ध करने का अनवरत प्रयास किया कि लगातार धरती के पर्यावरण के विनाश की कीमत चुका कर अन्धाधुन्ध औद्योगीकरण आर्थिक दृष्टि से भी निरापद नहीं है। गाँधी हमें यह देखने की दृष्टि देते हैं कि हमारे जल-जंगल-जमीन के लगातार भयावह रूप से छीजने से हो रही भीषण हानि के सहस्रांश की भी भरपाई की क्षमता हमारे सुरसा की तरह बदन बढ़ते उद्योगों में नहीं है। इसका आर्थिक मूल्य अर्थशास्त्र की बारीकियों को बिना जाने भी समझा जा सकता है। गाँधी-चिन्तन का यह प्रबल उत्तर आधुनिक पक्ष है।”

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)


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