जलवायु परिवर्तन की भेंट चढ़ रहे बांग्लादेश के गाँव

Submitted by UrbanWater on Sat, 03/18/2017 - 11:11
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द गार्जियन, 20 जनवरी 2017

जलवायु परिवर्तन का सबसे बुरा असर दक्षिण पूर्व एशिया में देखने को मिलेगा और वर्ष 2050 तक समुद्र के जलस्तर के बढ़ने से बांग्लादेश के 2.5 करोड़ लोग प्रभावित होंगे। विडम्बना ये है कि जलवायु परिवर्तन की सबसे अधिक कीमत वे लोग चुका रहे हैं, जिनकी जलवायु परिवर्तन में नगण्य भूमिका है। कुतुब्दिया में कार्बन का उत्सर्जन नहीं के बराबर होता है। इस क्षेत्र के लोगों को नियमित बिजली भी नहीं मिलती है लेकिन अभावों और अनिश्चितताओं के बीच जी रहे ये लोग भली प्रकार समझ रहे हैं कि वक्त उनके हाथों से निकलता जा रहा है।बंगाल की खाड़ी का कुतुब्दिया द्वीप कभी गुलजार हुआ करता था, लेकिन आज वहाँ एक मातमी सन्नाटा पसरा हुआ है। द्वीप के कछार में सुन्दरी (मैंग्रोव) के कुछ मुर्दा पेड़ देखे जा सकते हैं और कुछ निशानियाँ भी जो बताती हैं कि कभी इस द्वीप में एक खुशहाल दुनिया आबाद रही होगी।

इस छोटे से द्वीप में 250 परिवारों का बसेरा था लेकिन समुद्र के जलस्तर के बढ़ने से द्वीप की जमीन का कटाव होने लगा और पाँच वर्ष पहले अन्ततः इसका एक बड़ा हिस्सा समुद्र की आगोश में समा गया। हालांकि ऐसा नहीं है कि ऐसा एकबारगी हुआ। स्थानीय लोग बताते हैं कि कई दशकों से समुद्र इस द्वीप को रफ्ता-रफ्ता लील रहा था लेकिन पाँच साल पहले आये एक भीषण ज्वार ने इसे उजाड़ बना दिया।

इसी द्वीप के एक गाँव अली अकबर दियाल के लोग मुरदा पेड़ों को देखते हैं, तो यह सोचकर सिहर उठते हैं कि उन्होंने क्या खो दिया और आने वाले दिनों में और क्या खोना है।

बताया जाता है कि कुतुब्दिया द्वीप विश्व का एकमात्र द्वीप है जिस पर समुद्र के जलस्तर के बढ़ने का असर तेजी से पड़ रहा है। यहाँ के बचे-खुचे लोग निहत्थे एक ऐसी लड़ाई लड़ रहे हैं, जिस लड़ाई में उनकी हार तय है।

सुन्दरी के पेड़ की तरफ इशारा करते हुए 25 वर्षीय नौजवान ओनू दास कहते हैं, ‘मेरा जन्म यहीं हुआ था। मुझसे पहले मेरे माता-पिता और पुरखों ने भी यही जन्म लिया था। कभी यहाँ हमारे आम, सुपारी और नारियल के पेड़ हुआ करते हैं लेकिन अब हम भूमिहीन हो गए हैं। जिन्दगी बेहद जद्दोजहद भरी है। हमें नियमित भोजन नहीं मिल पाता है। मछलियाँ पकड़ते हैं, तो किसी तरह घर का चूल्हा जलता है।’ वह आसमान की तरफ देखते हुए कहते हैं, ‘किसी तरह बची-खुची जिन्दगी गुजारने के लिये संघर्ष कर रहे हैं।’

बेहद निराश होकर पुष्पा रानी दास कहती हैं, ‘यह जो सागर है न, हमें प्रताड़ित करता है, लेकिन इसे हम रोक तो नहीं सकते। जब भी सागर में ज्वार आता है, तो मेरे घर के भीतर पानी घुस जाता है, खासकर बारिश के दिनों में तो मुश्किलें और बढ़ जाती हैं।’ 28 वर्षीय पुष्पा रानी के तीन बच्चे हैं। समुद्र का जलस्तर बढ़ने के कारण उसे चार बार अपना घर छोड़कर दूसरी जगह ठौर लेना पड़ा।

समुद्र का दायरा बढ़ रहा है। उसके घर से महज 100 यार्ड दूर स्थित मस्जिद की नींव कमजोर हो गई है और उसे यह चिन्ता सता रही है कि आज नहीं तो कल उसे सपरिवार दूसरी जगह स्थायी ठौर बनाना होगा।

संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के मुताबिक जलवायु परिवर्तन का सबसे बुरा असर दक्षिण पूर्व एशिया में देखने को मिलेगा और वर्ष 2050 तक समुद्र के जलस्तर के बढ़ने से बांग्लादेश के 2.5 करोड़ लोग प्रभावित होंगे। विडम्बना ये है कि जलवायु परिवर्तन की सबसे अधिक कीमत वे लोग चुका रहे हैं, जिनकी जलवायु परिवर्तन में नगण्य भूमिका है। कुतुब्दिया में कार्बन का उत्सर्जन नहीं के बराबर होता है। इस क्षेत्र के लोगों को नियमित बिजली भी नहीं मिलती है लेकिन अभावों और अनिश्चितताओं के बीच जी रहे ये लोग भली प्रकार समझ रहे हैं कि वक्त उनके हाथों से निकलता जा रहा है।

समुद्र से द्वीप की रक्षा के लिये सरकार ने एक दीवार बनाई थी। वह दीवार अब डूब चुकी है और तटबन्ध कई जगह क्षतिग्रस्त हो गया है। समुद्र का बढ़ता दायरा कभी बचे लोगों के घरों को अपनी आगोश में समेट लेगा।

पता चला है कि समुद्र के जलस्तर बढ़ने से इस द्वीप को किस तरह का नुकसान हो सकता है, इसकी वैज्ञानिक तरीके से निगरानी नहीं हुई है लेकिन कोक्स बाजार के मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार प्रतिवर्ष समुद्र के जलस्तर में 8 मिलीमीटर की बढ़ोत्तरी हो रही है, जो विश्व का पाँच गुना है।

अली अकबर दियाल रहने वाले मल्लाह समुदाय ने अब समुद्र के कोप से बचने का कुछ तरीका भी ढूँढ निकाला है। जब भी चक्रवात आता है वे अपने बच्चे और जरूरी सामान लादकर साइक्लोन सेंटर की ओर रवाना हो जाते हैं। चक्रवात आने के पहले चेतावनी दी जाती है इसलिये चक्रवात आने पर जानमाल का नुकसान कम हो गया है, लेकिन इन लोगों को हर साल कई बार राहत शिविरों में दिन गुजारना पड़ता है।

मछुआरों के लिये तो समुद्र ही सम्पत्ति है, लेकिन हाल के वर्षों में समुद्री चक्रवात तीव्र से तीव्रतर होता गया है जिससे इनके सामने कई तरह की चुनौतियाँ आ गई हैं। इन चुनौतियों से निबटना इनके वश की बात नहीं। गाँव के 70 वर्षीय बुजुर्ग जगत हरि जाला कहते हैं, ‘मौसम इतनी तेजी से बदल रहा है कि हम खुद को उसके अनुकूल नहीं कर पा रहे हैं।’ वह आँख चौंधिया देने वाले सूरज की तरफ देखते हुए कहते हैं, ‘अभी ठंड पड़नी चाहिए, लेकिन गर्मी पड़ रही है। यह हमारे लिये संकेत है।’

चक्रवात के कहर से भागे लोग कोक्स बाजार में एयरपोर्ट के पीछे बाँस की झोपड़ियों से भरी कॉलोनी में रह रहे हैं। इस कॉलोनी को कुतुब्दिया पाड़ा नाम से जाना जाता है। यह कॉलोनी समुद्री तट पर स्थित है। यहाँ रिसॉर्ट भी हैं। विश्व के सबसे बड़े बलुआई इस तट पर स्थानीय पर्यटक घूमने भी आया करते हैं। पता चला है कि सरकार इस कॉलोनी को यहाँ से दूसरी जगह शिफ्ट करना चाहती है ताकि एयरपोर्ट का विस्तार किया जा सके।मछुआरे पहले समुद्र के किनारे से ही पर्याप्त मछलियाँ पकड़ लेते थे लेकिन किनारे अब टूटकर समुद्र में समा गए हैं। जगत हरि जाला कहते हैं, ‘अब तो मछलियाँ पकड़ने के लिये हमें 10 से 15 घंटे का सफर कर गहरे समुद्र में जाना पड़ता है, मगर इस बार चक्रवात की चेतावनी इतनी अधिक बार दी गई कि अधिकांश समय हमें घर में बैठे रहना पड़ा। पहले इतनी ज्यादा चेतावनी नहीं दी जाती थी लेकिन हाल के वर्षों में इसमें बढ़ोत्तरी हुई है।’ वह कहते हैं कि चेतावनी की अनदेखी कर समुद्र में जाना जानलेवा साबित हो जाता है क्योंकि चक्रवात किसी भी क्षण विकराल रूप ले लेता है। समुद्र में नहीं जा पाते हैं तो मछुआरे मछलियाँ भी नहीं पकड़ पाते हैं, जिस वजह से उन्हें भोजन भी नहीं मिल पाता है। जगत हरि जाला कहते हैं, ‘बताइए, हम और कर भी क्या सकते हैं। हम मछली पकड़ते हैं और वही खाते हैं। मछली नहीं पकड़ेंगे तो क्या खाएँगे? समुद्र ही हमारी एक मात्र सम्पत्ति है।’

कहा जा सकता है कि यहाँ रह रहे लोगों की जिन्दगी हमेशा तलवार की धार पर रहती है। वे समुद्र में जाते हैं, तो उन्हें यह डर भी सालता रहता है कि वे सुरक्षित घर लौट पाएँगे कि नहीं। पिछले महीने 89 मछुआरे गहरे समुद्र में गये थे लेकिन वे नहीं लौटे।

समुद्री चक्रवात में इजाफे की तस्दीक कोक्स बाजार के मौसम विज्ञानी भी करते हैं। उनका कहना है कि औसतन साल में एक बार ही चक्रवात आता है लेकिन पिछले वर्ष 4 चक्रवात आये थे। सहायक विज्ञानी नजमूल हक कहते हैं, ‘इस बार चक्रवात की चेतावनी अधिक दी गई थी। यों तो बंगाल की खाड़ी में दो से तीन निम्न दबाव बना करते हैं लेकिन इस बार सात से आठ निम्न दबाव और चार चक्रवात बने। हक ने यह भी माना है कि मौसम में भी बदलाव आ रहा है। मानसून पिछले साल देर से शुरू हुआ था। उन्होंने कहा कि इस पर शोध होना चाहिए कि क्या ऐसा जलवायु परिवर्तन के कारण हो रहा है, या इसके पीछे कोई और वजह है।’

विज्ञानियों का कहना है कि द्वीपों के समुद्र में विलय के पीछे मानव निर्मित व प्राकृतिक कारण जिम्मेवार हैं। चक्रवात के कारण भूखण्ड में स्खलन होता है और इसके लिये ग्लोबल वार्मिंग जिम्मेवार है, मगर समुद्र की सतह का तापमान समुद्र के जलस्तर पर निर्भर करता है, जैसा बंगाल की खाड़ी में हो रहा है। पिछले महीने जारी एक रिपोर्ट में विज्ञानियों ने कहा कि सतही तापमान में बढ़ोत्तरी के कारण भारतीय महासागर में चक्रवात अधिक आ रहे हैं।

जलवायु प्रभावित समुदाय और कुतुब्दिया से विस्थापित लोगों के लिये काम करने वाले संगठन कोस्ट के प्रोजेक्ट को-ऑर्डिनेटर मकबुल अहमद कहते हैं, ‘इस क्षेत्र के लोग जलवायु परिवर्तन के शिकार हैं। ज्वार के वक्त पहले पानी घरों में नहीं घुसता था लेकिन अब द्वीप का एक हिस्सा पूरी तरह समुद्र में समा चुका है। मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि जलवायु परिवर्तन के कारण ही ऐसा हो रहा है।’

वह कहते हैं, ‘लोगों के सामने कई चुनौतियाँ हैं। उनकी पुश्तैनी जमीन समुद्र निगल रहा है और उन्हें दूसरी जगह प्रवास लेना पड़ता है। यही नहीं, उन्हें नए वातावरण के अनुकूल खुद को ढालना पड़ता है। कुतुब्दिया में कई लोग पहले अमीर थे। उनके पास मवेशी थे, अपनी नाव और जमीन थी लेकिन अभी उनकी हालत दयनीय है। उनके पास फूटी कौड़ी नहीं है। वे सल्म में कंगालों की जिन्दगी जी रहे हैं। इनकी मदद के लिये सरकार के पास कोई नीति नहीं है।’

आँकड़ों की मानें तो कुतुब्दिया से 10 हजार लोग पलायन कर गए हैं। इनमें से कुछ लोगों को सरकार की तरफ से जमीन व अन्य सुविधाएँ तब मुहैया कराई गई जब 1991 में आये भीषण चक्रवात ने 20 गाँवों को तहस-नहस कर दिया था।

चक्रवात के कहर से भागे लोग कोक्स बाजार में एयरपोर्ट के पीछे बाँस की झोपड़ियों से भरी कॉलोनी में रह रहे हैं। इस कॉलोनी को कुतुब्दिया पाड़ा नाम से जाना जाता है। यह कॉलोनी समुद्री तट पर स्थित है। यहाँ रिसॉर्ट भी हैं। विश्व के सबसे बड़े बलुआई इस तट पर स्थानीय पर्यटक घूमने भी आया करते हैं। पता चला है कि सरकार इस कॉलोनी को यहाँ से दूसरी जगह शिफ्ट करना चाहती है ताकि एयरपोर्ट का विस्तार किया जा सके।

इस बेतरतीब कॉलोनी के बाहर एक प्राइमरी स्कूल है जिसमें बच्चे पढ़ते हैं। 29 वर्षीय दिदारुल इस्लाम रुबेल कहते हैं, ‘मेरे पिता के पास चार कश्ती थी। 1991 के चक्रवात में सब कुछ खत्म हो गया। उन्हें दिहाड़ी मजदूरी कर मछली पकड़ना पड़ता है।’

तंगहाली और अपने बच्चों के भविष्य की चिन्ता ने दिदारुल के पिता को दिल का मरीज बना दिया था और एक दिन हार्टअटैक से उनकी मौत हो गई थी। दिदारुल कहते हैं, ‘अपने गाँव से पलायन कर मेरे पिता की पीढ़ी जीने के ढंग भूल गई और अगर हमें यहाँ से हटा दिया गया, तो एक और पीढ़ी की जिन्दगी बर्बाद हो जाएगी।’

इस पूरे मामले में सवाल यह उठ रहा है कि क्या इन सबके के पीछे जलवायु परिवर्तन ही जिम्मेदार है और कुतुब्दिया में जिन लोगों ने अपनी जमीन खो दी है और दूसरी जगह पलायन कर गए हैं उन्हें जलवायु परिवर्तन से पीड़ित माना जाये?

इंटरनेशनल सेंटर फॉर क्लाइमेट चेंज एंड डेवलपमेंट के निदेशक और इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एनवायरनमेंट एंड डेवलपमेंट के सीनियर फेलो सलीमुल हक कहते हैं, ‘आप इस सच से इनकार नहीं कर सकते हैं कि फिलहाल जो हो रहा है, जलवायु परिवर्तन से इससे और भी बदतर होगा। अगर ज्वार का आकार बढ़ रहा है और इसके परिणाम बुरे आ रहे हैं, तो इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती है। हमारे पूर्व पर्यावरण मंत्री ने इस पर बयान भी दिया है।’

हक ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के रिफ्यूजी या पलायन करने वाले शब्दावली विवाद है क्योंकि यह कहना बहुत मुश्किल है कि लोग पलायन क्यों करते हैं। अलबत्ता यह जरूर कहा जा सकता है कि बांग्लादेश के तटीय क्षेत्रों में 10 मिलियन से अधिक लोग रहते हैं और उन्हें निश्चित तौर पर पलायन करना होगा क्योंकि लोग अपने पुरखे के पेशे से जीविकोपार्जन नहीं कर सकेंगे।

उन्होंने कहा, ‘जलवायु परिवर्तन के विस्थापित का मुद्दा भविष्य का मुद्दा है, जिस पर हमें सोचने और योजना तैयार करने की जरूरत है।’

(अनुवाद – उमेश कुमार राय)

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