पिथौरागढ़ के मालदार

Submitted by editorial on Sat, 03/30/2019 - 16:55
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पहाड़, पिथौरागढ़-चम्पावत अंक (पुस्तक), 2010
पिथौरागढ़ शहर को पूरे जुनून के साथ जिन्होंने प्यार किया ऐसे पुराने लोग कौन थे, यह पूछने पर मोष्टमानु के हर सिंह विष्ट कहते हैं- एक बार मोष्टमानु के जाने माने अध्यापक हैदर मास्टर के पिता कादर बख्श ने इसी तरह के सवाल का जवाब दिया कि जिनकी चमक से ये पिथौरागढ़ रोशन हुआ, उनमें एक थीं मिस मैरी रीड। चण्डाक में उनकी उपेक्षित कब्र के पास आने पर शान्ति का एहसास होता है। मैनेजर उस समय डाली मार्च थीं। दूरसे थे लॉरी बेकर। तीसरे थे प्रेम बल्लभ खर्कवाल। चौथे थे वी सी ग्रीन वोल्ड। पाँचने दानसिंह और छठे चंचल सिंह मालदार। सातवें हैं बाबा कच्चाहारी।

आए विदेश से हो गए यहाँ के

मिस रीड ने चण्डाक आकर कोढ़ियों की सेवा की और स्थानीय समाज के स्वास्थ्य की भी चिन्ता की। केतली से पानी दे देकर उन्होंने चण्डाक के आस-पास के देवदार के पौधों को पाला। आज उनकी छाया और गरिमा मिस रीड की उपस्थति को शालीनता से दर्ज करती है। हालाँकि उनमें उनका नाम नहीं खुदा है पर उनसे चलती हवाओं में मिस रीड का ही भाव आता है। उन्होंने अनाथों को भी पाला। उस समय अवैध सन्तान, खराब नक्षत्र में हुए छोड़े बच्चे और अनाथों को यह अंग्रेज मिशनरी ही पालतीं थीं। ऐसा ही एक बच्चा, जो मिस रीड ने पाला था, राजा रायसिंह के नाम से प्रसिद्ध हुआ और बाद में उसने आईसीएस किया और डायरेक्टर एजुकेशन सहित अनेक पदों पर रहा। अन्त में मिस केकयंग 1954-55 में यहाँ आईं। पर मिस मैरी रीड का कर्जदार पिथौरागढ़ को हमेशा रहना चाहिए।

लॉरी बेकर तो अवतारी आदमी थे। टीवी का इलाज सबसे पहले उन्होंने ही पिथौरागढ़ में चलाया। उन्होंने मोष्टमानु में प्राइमरी स्कूल खोला और पोस्ट ऑफिस भी। अपनी डॉक्टर पत्नी के साथ जो उन्होंने फार्मसिस्ट की भूमिका निभाते हुए काम किया वह भी पिथौरागढ़ की धरती पर अमर है। मिक्स्चर देकर समझाते- एक रतै, एक छकाल, एक ब्याल। एक आर्किटैक्ट के रूप में उन्होंने जो किया, उसकी कहीं भी स्मृति पिथौरागढ़ में न देखकर कृतघ्नता का बोध होता है। उनके नाम का कोई तो स्मारक यहाँ होता? उनकी पत्नी की लिखी पुस्तक बैकसाइड ऑफ दी लॉरी को पढ़कर इस गाँधी भक्त का व्यक्तित्व सामने आता है। खैर जमाने को कहाँ तक इलजाम दें। इलजामों से तो यह धरती दागदार कर दी गई है।

प्रेम बल्लभ से रजनीकान्त

रायबहादुर प्रेम बल्लभ खर्कवाल वह व्यक्ति थे, जो अपने पैसों और मेहनत से 6 मील दूर चण्डाक (मैला) से पानी पिथौरागढ़ लाए। वैसे ही वी सी ग्रीन वोल्ड पिथौरागढ़ की शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में एक विशिष्ट व्यक्ति थे। सिलथाम से दौला तक उनके पास हजार नाली जमीन थी पर कभी भी एक नाली जमीन उन्होंने अपने लिए नहीं ली। उनकी मदद किए हुए हजारों शिष्य आज सर्वत्र अच्छी स्थितियों में हैं। उन्होंने ही सबसे पहले शिक्षालयों के माध्यम से सांस्कृतिक जागृति का काम किया।

नाकोट के अम्बादत्त कटियाल ने जी.आई.सी.के लिए उस समय अकेले सोलह हजार रुपए दिए। यह उस समय के हिसाब से छोटी बात न थी। और भी लोगों का नाम इस महानता की श्रेणी में आता है। देवलथल के तेजसिंह सामंत ने असम राइफल की नींव डाली तो चन्दन सिंह बसेड़ा ने कुमाऊँ रेजीमेन्ट की स्थापना का ईनाम अपनी बहादुरी के ऐवज में अंग्रेजों से माँगा। हर सिंह विष्ट बताते हैं कि इस पिथौरागढ़ में बहुत से भले लोगों का वास रहा। पर हम अपने ही लोगों की महानता को भूल गए। मोहन सिंह चन्द जैसे ईमानदार एस.डी.एम.भी थे, जिन्होंने अपने ही बेटे का चालान कर दिया था। उनके एहसानों के प्रति हमने कभी कृतज्ञता नहीं दिखलाई यह अफसोस की बात है। रजनीकांत जोशी जैसे समाजसेवी कम होते हैं। पर उन्हें कोई अब जानता भी नहीं। ये सब लोग किसी ईनाम या सम्मान के लिए नहीं काम करते थे। वह तो उनका बस स्वभाव था।

रायसिंह तथा उनके वंशज

पिथौरागढ़ की धरती में एक ऐसा व्यापारी परिवार भी रहा जो अद्वितीय था। वह था मालदार परिवार। आज तो यह परिवार अपनी पूरी जायदाद के बारे में ही नहीं जानता। पारिवारिक सम्पत्ति के झगड़े सरे आम हैं। मुगदमेबाजी है पर व्यापार का जो साम्राज्य इस परिवार ने स्थापित किया वह अन्यतम उदाहरण है। हमारी ईजा कहती थी कि उनके परिवार में किसी को मणि मिली थी। उसी मणि से वे माला माल हो गए थे। अनेक लोग इस मिथ पर पूरी श्रद्धा से विश्वास करते थे। कदाचित वह उत्तराखण्ड के प्रथम करोड़पति थे। दानसिंह मालदार कुमाऊँ के पहले महान व्यापारी कहे जा सकते हैं। मालदार परिवार के पास कोई डिग्री नहीं थी। पढ़ाई दर्जा चार पाँच तक भी नहीं थी पर ऐतिहासिक परिस्थितियों तथा अपना व्यापारिक बुद्धि से वे छा गए।

रायसिंह के पूर्वज मण से आ कर क्वीतड़ बस गए थे। वह मूलतः सौन थे। सौन दो किस्म के थे। काले और गोरे। वह काले सौन थे। राय सिंह ने अपना जीवन संघर्ष में बिताया। वह अपने पुरुषार्थ के बल पर आगे बढ़े। घी के व्यापार में प्रथम विश्वयुद्ध में उन्होंने अच्छा पैसा कमाया। राय सिंह के दो पुत्र हुए- देवसिंह और चंचल सिंह। देवसिंह ने अपने पिता की व्यापार क्षमता को क्षीण नहीं होने दिया। उन्होंने इसे और भी बढ़ाया। बाद में उनके पुत्र दानसिंह ने इसका और विस्तार किया। चौकोड़ी और बेरीनाग की जायदाद भी उन्होंने खरीदी। देवसिंह के दूसरे पुत्र हुए मोहनसिंह। दानसिंह का कोई पुत्र न था, पुत्रियाँ ही थीं। मोहन सिंह के तीन पुत्र और नौ पुत्रियाँ हुई। चंचलसिंह के पुत्र हुए नरेन्द्र सिंह, देवराज सिंह और रवीन्द्र सिंह।

प्रथम विश्वयुद्ध में भारतीय सेना को घी की जरूरत पड़ी। नेपाल से उस समय घी पर्याप्त मात्रा में था। रायसिंह को किसी ने कहा कि आर्मी को घी सप्लाई करो। घी का डिपो वड्डा में स्थापित किया गया। घी सेना को उस समय इतना सप्लाई किया जाता था कि एक पुराने रिटायर्ड सुबेदार मेजर कहते थे कि हमें तरी मत देना। तरी देने में बर्तन खूब मांजने पड़ते और तब तक परेड में फालेन नहीं हुआ जाता था। घी की बहार थी। घी राशन में मिलता था। इस तरह देव सिंह ठेकेदार बन गए। राय सिंह कहा करते हमर देबुआ लै ठेकेदार हैग्योछ। देवसिंह जानकार और सम्बन्ध बनाने में माहिर थे। उस समय ठेकेदारी प्रतिष्ठा और जिम्मेवारी का सबब होती थी। देवसिंह ने अपनी प्रतिष्ठा कायम की।

एडवोकेट देवराज सिंह कहते हैं- उस समय विक्टोरिया के पैसे थे। नगद पैसे खच्चरों में लादकर लाने पड़ते थे। बीस-बीस खच्चर लदकर आते थे। एक तोले का एक सिक्का होता था। बेल्चों से रुपए को निकाला जाता था। 22 गाँवों का हक मालदार साहब ने ले लिया। बेरीनाग, चौकोड़ी चाय बागान खरीदा गया। यह चाय चीनी मूल की थी। पौधें छोटे होते थे। पर चाय असमी पद्धति से लगाई जाती थी। इस चाय के फ्लेवर की कोई मिसाल न थी। दान सिंह ने व्यापार इतना बढ़ाया कि जंगल की पाँच करोड़ की लीज होती थी। उस समय के मुताबिक यह बहुत बड़ी राशि थी। साल का एक करोड़ का टर्न ओवर होता था।

देवराज कहते हैं- हमारे वहाँ पढ़ाई-लिखाई को एक तरह से डिसक्वालीफिकेशन माना गया। नरेन्द्रसिंह विष्ट, जो सालों तक पिथौरागढ़ के एम.एल.ए. और अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ के सांसद और प्रदेश के डिप्टी मिनिस्टर भी रहे, जब शिक्षा ग्रहण करने गए तो दानसिंह ने हंस कर कहा- बांजक पेड़ खिन गुलाब लागग्यान। यह सारा परिवार बहुत कम पढ़ा लिखा था पर प्रबुद्ध और प्रयोगशील था।

दान सिंह मालदार

दान सिंह ने अपना कारोबार बढ़ाया। वह व्यापार में माहिर थे। उन्होंने लकड़ी के कारोबार में कश्मीर, नेपाल, आसाम तथा तराई में काम किया। सबसे अधिक धन उन्होंने ही अर्जित किया। उनका मुख्यालय नैनीताल में बीरभट्टी बना। रेलवे के स्लीपर सप्लाई करने में वह माहिर थे। वह धीर गम्भीर थे। पर कोई दान माँगने आ गया तो बिना बोले चैक काट देते थे। दान देने के अपने पिता के गुण उनमें थे। मालदार परिवार ने बहुत से स्कूल बनाकर दानवीर की उपाधि पाई।

पूरा पिथौरागढ़ मालदार परिवार ने ही खरीदा था। यह सारी जमीन लीज की थी। आजादी के बाद सारी सम्पत्ति को अपने रिश्तेदारों में बाँट गया। पर यह सम्पत्ति अकूत थी। आज भी उनकी संतानों को मालूम नहीं कि उनकी सम्पत्ति कहाँ- कहाँ है।

दान सिंह मौजी तबियत के आदमी थे। वह क्लबों में जाते थे। उन्होंने ही लकड़ी बगान पद्धति का सफल प्रयोग असम तथा कश्मीर में किया। उस समय चिरान से ही लकड़ी का काम होता था। उसके लिए उत्तराखण्ड में मजदूर नहीं मिलते थे। अतः चिरानी कांगड़ा से बुलाए जाते थे। दान सिंह ने मानव संसाधन का बेहतरीन प्रयोग किया। उन्हें मनोविज्ञान की भी निश्चय ही समझ थी। आदमियों से काम कराने की लियाकत उनमें खूब थी। श्रमिकों से उस समय भी उनका मानवीय व्यवहार होता था। उनके रहने तथा राशनिंग का उत्तम प्रबन्ध होता था। पर मुनाफे के मामले में पूरे पूँजीवति थे। नफे नुकसान की उनकी आर्थिक समझ गजब की थी। बेरीनाग की चाय विदेश सप्लाई करने की कल्पना उन्हीं की थी, पर उन्होंने कार्य का श्रेय हमेशा अपने पिता को ही दिया।

1918 में उन्होंने जेम्स जौर्ज स्टीवैंस से चौकोड़ी और बेरीनाग की जायदाद खरीदी। 22 गाँवों का हक भी खरीदा गया। बेरीनाग की चाय की उस समय धाक दूर-दूर तक थी। इसके जैसा फ्लेवर किसी चाय का नहीं था। खुद चाहे अधिक शिक्षा न पा सके हों पर उन्होंने औरों की शिक्षा के लिए बहुत कार्य किया। दानसिंह अपने पिता देवसिंह और माता सरस्वती देवी के प्रति बहुत श्रद्धा भाव रखते थे। 1950 में उन्होंने अपनी माँ सरस्वती देवी और पिता देवसिंह के नाम पर पिथौरागढ़ का देवसिंह स्कूल खोला। नैनीताल का प्रसिद्ध महाविद्यालय भी उनकी दानशीलता का उदाहरण है। वह जितने दबंग थे उतने ही उदार भी। रास्ता चलते भी लोग उनसे अपना रोना रो कर कुछ ले ही लेते थे। वह कभी-कभी ठगे जाने का भी आनन्द लेते थे।

जमीन-जायदाद खरीदने का उनको शौक था। नैनीताल में साह लोगों के मुकाबले जायदाद वही खरीद सकते थे। उन्होंने पुरानी बियर फैक्ट्री (बीरभट्टी) की जायदाद खरीद ली। फिस ग्रासमेर तथा मेविया भी खरीदा। दान सिंह मालदार को पहली बार टिम्बर स्टार की उपाधि अंग्रेजों ने दी। अंग्रेज उन्हें विशेष इज्जत देते थे। बताया जाता है कि जंगल नीलामी के समय उनके लिए अलग से सोफा लगाया जाता था। उनकी शान ही निराली थी। हालाँकि उनके पेशे को लेकर बहुत से लेखकों ने उन पर इल्जाम भी लगाए। पर आम जनता का कहना है कि उस समय जंगल को लेकर कोई पर्यावरण वाला विचार था भी नहीं। नेपाल के जंगल के काम में उन्हें बहुत लाभ हुआ तो कश्मीर में भी, जहाँ राजा हरिसिंह के खास आदमी नारायण सिंह रावत उनके बहनोई थे। एक बार उन्होंने चुनाव भी लड़ा। 1935 एक्ट के बाद हुए चुनाव में उन्होंने हरगोविंद पंत के खिलाफ चुनाव लड़ा। बहुत धन खर्च किया पर बुरी तरह हार गए और जमानत जब्त हो गई। इसी चुनाव के बाद गोविंद बल्लभ पंत संयुक्त प्रान्त के मुख्यमंत्री बने थे। एक तनाव उनके तथा पंत जी के बीच रहा। पर 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में जब गोविन्द बल्लभ पंत जेल गए तो उनके परिवार को उन्होंने संरक्षण दिया।

पंत उनकी इन दरियादिली को कभी नहीं भूले। और कहा जाता है कि एक बार तो सारे कुमाऊँ के जंगल के ठेके लिए यह प्रयास किया गया कि कोई टेंडर नहीं होगा सिर्फ वही टेंडर देंगे। पर उस समय के जाने माने दबंग ठेकेदार किशनचंद ने साफ कहा कि मैं टेंडर भरुँगा। बात आ गई होगी। पर पंत उनके आखिर तक मुरीद बने रहे। भारत विभाजन के समय जब झेलम में लकड़ी बहने से काफी हानि हुई तो बताया जाता है कि पंत जी ने उनकी मदद की। उनकी परोपकार की भावना हमेशा तरंग में रही। वह अक्खड़ मिजाज आदमी थे। उन्होंने कभी भागलत माल को लेकर समझौता नहीं किया। कहा जाता है एक बार गुणवत्ता में खरा न उतरने पर उन्होंने हजारों टन लकड़ी के आर्डर को निरस्त कर दिया।

उनको आँकड़े तथा जंगलों की स्थिति जुबानी याद रहती थी। कब क्या करना है, क्या नहीं, वह अच्छी तरह जानते थे। बस चीनी मिल तथा फैक्ट्री वाले मामले में ही उन्होंने मात खाई। बाद में वह अधिक मद्यप हो गए थे।

चम्बल सिंह

चंचल सिंह पिथौरागढ़ में ही रहे। उन्होंने घी-कपड़े का व्यापार सम्भाला। चंचलसिंह दर्शनीय व्यक्ति थे। चूड़ीदार पैजामा और वास्कट पहने खूब जमते थे। उन्होंने अथाह सम्पत्ति जोड़ी। साथ ही वह उदार व्यक्तित्व के थे। जिसकी कोई जमानत नहीं देता था, वह देते थे। सोरियाली के अतिरिक्त उन्होंने कभी हिन्दी नहीं बोली। उन्हें लोग ठगते भी थे तो वह अपने को ठगे जाने देते थे। एक बार किसी ने इस धोखाधड़ी का बयान उनसे किया तो उन्होंने कहा- जांण छूँ। उनके किस्से बहुत थे। वह यों ही मकान बना देते थे। काम निकालते रहते थे। उनका उद्देश्य रहता था कि लोग रोजगार पाएँ। मिट्टी तक खरीद लेते। किसी फेरी वाले का माल नहीं बिका तो बड़े मोलभाव कर वह भी खरीद लेते। किसी की फिस नहीं होती तो फिस दे देते। कहते हम तो पढ़ नहीं पाए, तेरा लड़का ही पढ़ लेगा। वह अपराधियों को तक छुड़ा लाते थे। उनके कागज घर ही ले आते। कहते थे-अरे गरीबी सबसे बड़ा अपराध हुआ। वह दरोगा को कहते जब तक इसका फैसला नहीं होता, तब तक मेरे काम में इन्हें लगा दो। उनके वहाँ जाति पाति का कोई बंधन न था। जो चावल उनके या मेहमानों के लिए बनता वहीं मजदूरों के लिए बनता था। बस यह जरूर था कि वह एक कटोरी घी अलग से खाते थे। खूब तगड़ा शरीर था। घोड़े में बैठ गए तो घोड़ा बैठ जाता था।

जाड़ों में एक बार एक नेपाली चार बन्डल (कम्बल) चुरा ले गया। वड्डा में उन्हें किसी गड्ढे में डाल आया। उस समय दरोगा कोई खंडूरी था। उसे माल सहित दरोगा ने पकड़ लिया तो चंचल सिंह ने कहा- अरे तुझे जरूरत थी तो माँग लेता। अकल नहीं थी तुझे। उसे छुड़ा कर उन्होंने दो कम्बल के साथ दो कम्बल और दे दिए। बोले ये दो और ले जा। कल फिर तू अपने परिवार के लिए चोरी करेगा। खूब मकान बनाए और बहुत कम पैसों में उनमें किराएदार रखे जो बाद में परिवार के लिए परेशानी का कारण बने। आग लगने से ही मालदार परिवार को इस संकट से छुटकारा मिला।

एक बार कहते हैं कि उनके मुनीम ने कहा- आपका किराएदार मुसलमान बूचड़ किराया माँगने पर गाली दे रहा है। तो उन्होंने कहा कि देने दो। हम मालदार हैं तो गाली सहने में भी मालदार होना चाहिए। जो भी हो पिथौरागढ़ के इन मालदारों के किस्मों को आज भी पुराने पिथौरागढ़वासी पूछने पर रस ले लेकर सुनाते हैं। पर दिल के धनी मालदारों की बात तो बहुत कम बुजुर्ग जानते हैं। शायद इसलिए कि उनका काम आम आदमी की जिन्दगी के भौतिकवाद से न जुड़ा था।

मिस मैरी रीड

न सतायश की तमन्ना न सिले की परवाह, गर मेरे माइने में माइने न सही, यह गालिब कह गए। इस शेर में उनकी यश की चाहत झलकती है। पर कुछ ऐसे व्यक्ति भी होते हैं जो खामोशी से काम करते हैं अपना काम करके चले जाते हैं। मुहावरा तो है कि ऐसे लोग लोगों के दिलों में रहते हैं। ऐसे लोगों के दम से ही यह दुनिया चलती है, सुकून पाती है।

मिस रीड को आज पिथौरागढ़ में इक्का दुक्का लोग ही जानते हैं। उनकी चण्डाक की कब्र में खरपतवार उग आए हैं। प्रकृति से ही उसका तादात्म्य है। कोई आदमजात उस कब्र में छिपी सख्शियत को नहीं पहचानता। मैंने जब उस कब्र में देखा तो आँखें अपने आप ही बन्द हो गई। श्रद्धांजलि के लिए नहीं। ऐसे शख्स को श्रद्धांजलि या किसी दुनियावी छलावे की जरूरत नहीं होती। बस इसी एहसास के लिए काश मैं भी ऐसा होता।

बुजुर्ग हर्बिड सिंह कहते हैं कि जब मिस मैरी रीड को मैंने देखा तब मैं बच्चा था। जब वे बूढ़ी हो गईं तो मैंने उन्हें देखा। उनका चेहरा मदर टैरेसा का जैसा हो गया। वह किसी से बात नहीं करती थीं। अपनी ही दुनिया में रहती थी। कद उनका करीब पाँच फीट पाँच इच का होगा। गोरा, सौम्य चेहरा, कुछ उदासी वाली गम्भीरता लिए हुए।

मिस मैरी रीड अमरीका के किसी सम्पन्न परिवार की बेटी थीं। शिक्षाविद थीं।भारत घूमने आई और पहुँच गई चण्डाक। चण्डाक के सौन्दर्य से वह मुग्ध हुईं पर इससे ज्यादा वह व्यथित हुई, वहाँ दूर-दूर से खेदेड़े गए कोढ़ियों से। वे चण्डाक, पनाघर तथा ओडियारों में रहते थे। यही पनाघर उनका पनाहघर था। बस मिस मैरी रीड फिर यहीं की होकर रह गई और उनकी सेवा में लग गई। वह अपने पिता से धन माँगती रहीं और सेवा कार्य करती रहीं । कहते हैं कि कोढ़ियों के बीच रहकर उनके हाथ में भी कोढ़ हो गया और वह उसे सफेद लम्बे दस्ताने से ढकी रहती थी। कोई भी आए नहीं मिलती थी। अगर मिलना ही पड़ा तो हाथ नहीं मिलाती थीं। बाद में वह अमरीका गई। वहाँ उन्होंने जड़ी-बूटियों का अध्ययन किया। एक किताब भी लिखी। फिर अपने औषधि ज्ञान से उन्होंने उन असहाय कोढ़ियों का इलाज किया। उन्होंने सेवा में ही जिन्दगी गुजार दी। वह किसी मिशनरी संस्था से नहीं जुड़ी थीं। बाद में उन्होेंने चण्डाक में एक बैथेल चर्च बनाया जो बहुत खूबसूरत था। उसकी छत त्रिकोणीय थी। बाद में जब डॉक्टर राय आए तो उन्होंने उसका पुनर्रुद्धार किया। उनके सहयोग कारिंदे स्टोर कीपर सभी कुछ पुनेड़ी के मोतीराम पुनेठा रहे। वह भी खामोश कार्यकर्ता थे।

यह गाथा अंजान रही , यही उसकी खूबसूरती भी शायद हो। किन्हीं कथाओं का सौन्दर्य अंजान रहने में ही होता है। फिर भी उन्हें याद करना आज की दुनिया में एक आबेहयात का रेगिस्तान में आना है। उस समय डॉक्टर टी.एन. पंत तथा डॉक्टर फिलिप्स वहाँ हर शनिवार को विजिट कर इंजेक्शन लगाते थे। फिर डॉक्टर राय आए। वह गढ़वाल के थे। इस जगह को बाद में मैथोडिक चर्च फिर एम.सी.ए. ने फिर एम.सी.आई.ने लिया। फिर मिशन टु लैपर्स, जो कि विश्व कोढ़ संगठन है, ने इसे लिया। बाद में तो इस संस्था में अधिकतर दक्षिण भारतीय ही आए। यहाँ लंदन के लैप्रोसी मिशन के चीफ सेक्रेट्री डॉ. हैमर और डॉक्टर विलियम बैरी भी आए। पर लॉरी बेकर के यहाँ टिके। और फिर यह क्षेत्र उतना मिशनरी नहीं रहा। लड़ाई-झगड़े होते रहे। आज यह लैप्रोसी संस्था बन्द हो गई है। क्योंकि अब इसकी आवश्यकता नहीं है। घर बैठे कोढ़ का इलाज होता है। इस सुन्दर प्राकृतिक जगह पर बहुत सी लालची निगाहें इसे हस्तगत करने के लिए पड़ी हैं। बाद में मिस रीड की उजाड़ सी कब्र को भी बख्शेंगी या नहीं, पता नही। फिर भी लालच से ऊपर हमेशा त्याग और सेवा का परचम लहराता रहता है यह मिस मेरी की गाथा कहती है।

कच्चाहारी बाबा पिथौरागढ़ की पहचान

किसी एम.बी.बी.एस.डॉक्टर को सन्यासी के वेष में देखना एक अनुभूति ही है। गठा तमतमाता ताम्रवर्णीय शरीर पहली ही दृष्टि में एक दिव्य अनुभूति कराता है। कच्चाहारी बाबा ऐसे ही एम.बी.बी.एस.डॉक्टर हैं। बाबा, कभी मिस्टर एम.बी.बी.एस.कानपुर रहे। वे एथीलीट भी रहे। वे पिथौरागढ़ की पहचान है। सेवा में रत यह सन्यासी मौलिक है। बच्चों के से भोलेपन में वह सब वह कर जाते हैं। उनको सेवानिवृत्त हुए 10 साल हो गए हैं पर सुबह से शाम तक बिना पैसों के जनता में सेवारत रहते हैं। सुबह चार बजे से रात आठ बजे तक उनके वहाँ मरीजों की भीड़ रहती है। आयुर्वेदिक होम्योपैथिक, प्राकृतिक सभी चिकित्सा विधियों से वह इलाज करते हैं। उन्होंने प्रमुखतया कोढ़ पर काम किया है। गेरूआ वस्त्र पहनते हैं जिसमें लिखा है डी.पी.डी.लें कोढ़ का अभिशाप मिटाएँ। सेवा की इस मूर्ति का जन्म 15 अक्टूबर 1935 को इलाहाबाद से 40 किमी.दूर भरवारी कस्बें में हुआ। पिता पण्डित लालमणि मता शिवमती। पिता स्वामी दयानन्द से पूरी तरह प्रभावित थे। पिता का प्रभाव स्वामी जी पर पड़ा। बचपन से ही वह अध्यात्म की ओर झुक गए थे।

सन 1954 में बी.एस.सी करने के बाद अध्यापन व्यवसाय चुना। उर्दू तथा कला पढ़ाए जाने में विशेष रुचि रही 1960 में एम.बी.बी.एस.किया और 1965 में डॉक्टर बने। 1966 में प्रान्तीय मेडिकल सेवा में चयन हुआ। मेडिकल कॉलेज की कक्षा में प्रोफेसर ने हर एक से उनके उद्देश्य के बारे में पूछा। इनसे पूछा गया तो इन्होंने कहा-मोक्ष प्राप्ति...। संयोग से पहली ही नियुक्ति टीवीआइसोलेशन कानपुर में हुई। टीवी मरीजों पर नित्य हवन और शाकाहार का नया प्रयोग किया जिसमें वह सफल रहे। सन 1974 में ताड़ीखेत में मेडिकल ऑफिसर के रूप में नियुक्त हुए। और सन 1986 में जिला कुष्ठ अधिकारी के रूप मे पिथौरागढ़ आए। यहाँ वह कार्यवाहक सी.ए.ओ.भी रहे। उन्होंने अपने विभाग से कहा हुआ था कि जहाँ कोई न जाए मुझे भेज दो। वह पहले व्यक्ति थे जो भगवा वस्त्र में रहते थे। कुष्ठ रोगियों की विशेष सेवा के साथ स्वामी जी आम जनता की सेवा रात दिन करते थे। किसी भी मरीज के लिए वह कभी भी उपस्थित हो जाते। कभी अपनी जेब से भी धन व्यय करते । घर जाने का कभी धन नहीं लेते थे। 25 साल तक वह कच्चा भोजन करने के कारण कच्चाहारी बाबा कहलाए। उनका आर्ट और हस्तलेख इतना सुन्दर था कि लोग उनसे साइन बोर्ड तक लिखवाते थे। इस पर शायद ही किसी को उन्होंने मना किया सिवाय एक खटीक के जो उनसे साइन बोर्ड लिखाने आया। पिथौरागढ़ चौराहें में बोर्ड में सूचनाएँ उन्हीं की लेखनी से अक्सर लिखी जाती है। वे घर के चिकित्सक हैं। उनका हर दिन कुछ परिवारों में एक हफ्ते में बारी-बारी से शाम के भोजन के लिए तय रहता है। पिथौरागढ़ में अपना निवास ही बना लिया है। नेपाल के मरीज उनके वहाँ आते हैं। संस्कृत,अंग्रेजी,हिन्दी, उर्दू सभी भाषाओं में उनकी समान गति है। स्वामी दयानन्द के विचारों को फैलाने का उनका उद्देश्य है। वे मॉरिशस इस कार्य के लिए गये। वे सत्यार्थप्रकाश तथा वेदों का उर्दू अनुवाद भी कर रहे हैं। उनका कहना है, कर्म गणित की तरह नहीं है कि इतने अच्छे कर्म कर लिए तो बुरे कर्म में इतना घट गया। कर्मफल तो भुगतने ही पड़ेंगे। अगर डॉक्टर न होते तो वे मकबूल फिदा हुसेन की तरह एक चित्रकार होना पसन्द करते। लम्बी दौड़ के शौकीन बाबा कहते हैं कि वे अगले जन्म में प्रधानमंत्री बनना चाहेंगे ताकि भारतवर्ष में गरीबी तथा जातिगत भेद को दूर कर सकें।

सलीब पर चढ़ते एक और ईसा

लैप्रोसी मिशन को अल्मोड़ा में अंग्रेजों ने 1835 और पिथौरागढ़ में 1882 में स्थापित किया। मेरी रीड अमरीका के ओहियो राज्य से पिथौरागढ़ में 1891 में आईं थी। दान में दी गई जमीन से उन्होंने लैप्रोसी मिशन स्थापित किया। अंग्रेजी सरकार ने इस कार्य में मदद दी। एक बार मिस मैरी सीढ़ी से फिसली तो फिर बिस्तरे से उठ नहीं पाईं। अंत समय तक वह घोर पीड़ा में रही। उनका देहान्त 1943 में हुआ। रोगियों की सेवा के अतिरिक्त उन्होंने इस क्षेत्र में जंगल विकसित किया। तब वहाँ पानी नहीं था। वह दो किमी. दूर से पानी लाती थीं और केतली से बूँद-बूँद पौधों की जड़ों में डालती थी। आज यह एक सुदर्शनीय जंगल है। देवदार और विभिन्न पेड़ इस सात हजार फिट स्थल को अध्यात्मिक अनुभूति प्रदान करते हैं।

लोक सूचना अधिकारी जिला कार्यालय पिथौरागढ़ के अनुसार चण्डाक लैप्रोसी मिशन के नाम ग्राम मिशन चण्डाक अन्तर्गत यह जमीन कुल 1172 नाली 07 मुट्ठी अंकित है। ऐसा भी कहा गया है कि इसके साथ एक हजार नाली बेनाप जमीन है। यह जमीन वर्ग ख की है। यह क्षेत्र मिश्रित वन से घिरा है, जिसमें देवदार,चीड़,बाँज,काफल,बुराँस,खटीक, लिपटस,आडू,सन्तरा,तुन,नाशपाती,माल्टा,नीबू, पुलम,खुमानी आदि प्रजाति के कुल 3473 पेड़ हैं। इसके अतिरिक्त अन्य हजारों पेड़ बेनाप जमीन में हैं। आज यहाँ लैप्रोसी मिशन बन्द हो गया है। यहाँ अभी भी अस्पताल के भवन हैं। मिशन की सभी जमीनें खरीद फरोख्त के मामलें में हमेशा विवादास्पद रही।

चण्डाक के लैप्रोसी मिशन को लेकर पहले जनता की माँग रही कि यहाँ बेस अस्पताल बनाया जाए। इसे सुना नहीं गया। बाद में इसकी कुछ जमीन में विद्युत ग्रिड बनाया गया। यह मामला विवादास्पद रहा। सा.नि.वि, पिथौरागढ़ ने इस पर आपत्ति भी की थी। अब जनता को आशंका है कि यह सुन्दर स्थल कहीं व्यक्तिगत सम्पत्ति न बन जाए और खूबसूरत वन क्षेत्र समाप्त न हो जाए। शहर के जागरूक वर्ग की मंशा है कि सरकार इस जमीन को हस्तगत कर ले और यहाँ मैरी रीड के नाम पर एक बोटानिका गार्डन, जड़ीबूटी संस्थान या योग केन्द्र जनहित में खोला जाए। इसका नाम मैरी रीड वन रखा जा सकता है और यह इकोटूरिज्म का आदर्श स्थल बन सकता है। जिस तरह यहाँ की जनता, नेतृत्व और प्रशासन की लापरवाही से पिथौरागढ़ के ऐतिहासिक किले में जी.जी.आई.सी.बनाया गया, यहाँ भी कुछ ऐसा अनर्थ न हो कि जंगल साफ हो जाए और वहाँ एक होटल खुल जाए।

अब देखिए आगे-आगे होता है क्या? अगर सरकार, प्रशासन, जनता और पर्यावरणविदों को समय पर अकल आ गई तो ठीक वरना-चमन वालों ने तो चमन बहुत पहले ही बेच डाला है। इसके पहले कि यह स्थल व्यक्तिगत सम्पत्ति बने, सरकार इसे जनहित में ग्रहण करे और इस स्थल का नाम मैरी रीड वन रखा जाए। कानाफूसी चल रही है कि इस स्थल को व्यक्तिगत रूप से हस्तगत करने के लिए टेढ़ी नजरें गढ़ चुकी हैं। सौदेबाजी चल गई है। कुछ लोग यहाँ के पेड़ों में कील भी ठोंक रहे हैं ताकि वे सूख जाएँ। समय रहते यदि यह स्थल सुरक्षित नहीं किया गया तो फिर कीलें एक नए ईसा पर ठुकेंगी, जिसका अब तो पुर्जन्म भी नहीं हो पाएगा। सरकार, प्रशासन, राजनीति के साथ पिथौरागढ़ के समाज का दायित्व है कि इस विरासत को नष्ट न होने दे।

बेनीराम पुनेठा

पिथौरागढ़-चम्पावत जिलों में कुछ परिवार अनेक स्थानों पर अपने व्यवसाय के सफल विस्तार तथा दानशीलता के कारण जाने जाते रहे। जहाँ विष्ट-मालदार परिवार गाँवो से पिथौरागढ़ आकर बेरीनाग-चौकोड़ी तथा नैनीताल-वीरभट्टी से आगे निकल गया वहाँ खर्कवाल तथा पुनेठा परिवार टनकपुर से दार्चुला के बीच सक्रिय रहे। इनमें भी जहाँ पुनेठा मुख्यतः चम्पावत- लोहाघाट तथा पिथौरागढ़ में व्यवसाय करते रहे (हालाँकि इनके व्यापार का फैलाव नेपाल से तिब्बत तक था), वहां खर्कवाल टनकपुर चम्पावत-लोहाघाट, पिथौरागढ़ के साथ दार्चुला में सक्रिय रहे और इन स्थानों में बस भी गए। प्रेमबल्लभ खर्कवाल की तरह बेनीराम पुनेठा भी अपने व्यवसाय को बढ़ाने के साथ अपनी दानशीलता और सार्वजनिक कार्यों में हिस्सेदारी के कारण जाने गए और आज भी सार्वजनिक स्मृति में हैं।

बेनीराम पुनेठा (1840-1936) एक प्रकार से पुनेठा परिवार के सर्वाधिक चर्चा के योग्य व्यक्ति थे और व्यापार के विस्तार के साथ दानशीलता के लिए सुप्रसिद्ध थे। उन्होंने कपड़े का व्यापार बरमदेव मण्डी से नेपाल और पिथौरागढ़ से तिब्बत तक फैला दिया था। उनके गुण उनके बेटों में भी उजागर होते चले गए। उनके बेटों में हरिनन्दन व्यवसायी, गंगादत्त शिक्षक और वकील, देवीदत्त वकील और धर्मानन्द तथा गुणानन्द व्यवसायी बने। सभी भाई शिक्षा संस्थाओं, अस्पतालों और सार्वजनिक कार्यों को सदैव सहयोग देते रहे। सभी भाईयों के आर्थिक सहयोग से ही लोहाघाट का बेनीराम पुनेठा इंटर कॉलेज स्थापित हो सका। जो आज एक महत्त्वपूर्ण संस्था है।

देवेन्द्र ओली द्वारा संकलित

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