नहीं का मतलब नहीं

Submitted by editorial on Tue, 01/08/2019 - 16:44
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ग्रीन सिग्नल्स, 2015

मेरे पदभार सम्भालने के पहले 99.99 प्रतिशत अनुमति ‘हाँ’ वर्ग के थे। मैंने ‘हाँ लेकिन’ और ‘नहीं’ वर्गों की संख्या बढ़ा दी। हालांकि,आम समझ के विपरीत पर्यावरणीय अनुमति के करीब 95 प्रतिशत प्रस्तावों को आगे बढ़ाने के साथ ही वन अनुमति के प्रस्तावों में करीब 85 प्रतिशत को हरी झंडी मिल गई जिसमें अधिक समय भी नहीं लगा। पारिस्थितिकीय सुरक्षा और उच्च विकास में सन्तुलन कायम करने में ‘हाँ लेकिन’ वर्ग हमसे अधिक जुडता है क्योंकि अधिकांश अनुमति इसी वर्ग की होती है।

मैंने अपना अधिकांश पेशेवर जीवन (चाहे सरकार या पार्टी में) उच्च आर्थिक विकास प्रदान करने वाले क्रियाकलापों पर ध्यान केंद्रित रखते हुए गुजारा है। मैं उदारीकरण के उत्साही समर्थक से कहीं अधिक था और जुलाई 1991 के ‘महा विस्फोटक’ सुधारों में अहम् भूमिका भी अदा की थी। लेकिन पर्यावरणीय सरोकारों को उच्च विकास के प्रति हमारी प्रतिबद्धता के लिये दरकिनार नहीं किया जा सकता।उच्च विकास एक अनिवार्यता है लेकिन हम रोजगार सृजन की आवश्यकता और रेवेन्यू जेनेरेशन के स्रोतों के निर्माण की अनदेखी नहीं कर सकते। स्वास्थ्य,शिक्षा जैसी अधिसंरचनाओं के विकास के लिये अतिरिक्त फंड की आवश्यकता को भी दरकिनार नहीं किया जा सकता है। विकास के इस सफर में पर्यावरणीय जोखिमों का प्रबन्धन करना भी हमारी रणनीति का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए। दूसरे शब्दों में उच्चतर विकास दर की आवश्यकता को निश्चित तौर पर पर्यावरणीय संरक्षण से एकीकृत होना चाहिए। हम नहीं भूल सकते कि गरीबी पर्यावरण के विनाश का कारण और परिणाम दोनों है। बात को आरम्भ करने और तर्कपूर्ण ढंग से विस्तार देने के लिये तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह का 1991 का बजट भाषण उल्लेखनीय है ‘हम सम्पन्नता के अपने रास्ते को वन विहीन नहीं कर सकते और हम सम्पन्नता के अपने रास्ते को प्रदूषित नहीं कर सकते।’

इस तथ्य से भागने की कोई गुंजाइश नहीं है कि विकास और औद्योगिक गतिविधियाँ पर्यावरण का विनाश कर सकती हैं। तब उपाय यह है कि हम आज की माँग, उच्च विकास और इससे संलग्न फायदों के साथ कल की अनिवार्यता ‘पारिस्थितिकीय विनाश’ की कीमत और प्रभाव के साथ सन्तुलन बिठाएँ। यही सन्तुलन टिकाऊ विकास का सारतत्व है। यह सन्तुलन हानिकारक पर्यावरणीय प्रभाव को न्यूनतम करने के हस्तक्षेपों के माध्यम से हासिल किया जा सकता है।

महज पच्चीस साल पहले हमने आर्थिक सुधारों को वित्तीय तौर पर टिकाऊ बनाने की आवश्यकता महसूस की, अब समय आ गया है कि उच्च आर्थिक विकास को पारिस्थितिकीय तौर पर टिकाऊ बनाने के उपाय खोजे जायें। मैं नहीं समझता कि उच्च विकास की रणनीति और पारिस्थितिकीय सुरक्षा के बीच कोई मतभेद है, मामला सन्तुलन प्राप्त करने का है। इस सन्तुलन को प्राप्त करने के प्रयास में ‘पर्यावरणीय सरोकार’ का आर्थिक फैसलों में निवेश जरूरी है। मैं परियोजनाओं की पर्यावरणीय अनुमति देने में दोहरे ढंग को छोड़कर तीन तरफा वर्गीकरण को अपनाना चाहता हूँ - हाँ, हाँ लेकिन, और नहीं।

मेरे पदभार सम्भालने के पहले 99.99 प्रतिशत अनुमति ‘हाँ’ वर्ग के थे। मैंने ‘हाँ लेकिन’ और ‘नहीं’ वर्गों की संख्या बढ़ा दी। हालांकि,आम समझ के विपरीत पर्यावरणीय अनुमति के करीब 95 प्रतिशत प्रस्तावों को आगे बढ़ाने के साथ ही वन अनुमति के प्रस्तावों में करीब 85 प्रतिशत को हरी झंडी मिल गई जिसमें अधिक समय भी नहीं लगा। पारिस्थितिकीय सुरक्षा और उच्च विकास में सन्तुलन कायम करने में ‘हाँ लेकिन’ वर्ग हमसे अधिक जुडता है क्योंकि अधिकांश अनुमति इसी वर्ग की होती है। उन्हें इसी वर्ग में होना चाहिए और यही वह जगह है जहाँ सन्तुलन अनिश्चित होता है। जिन शर्तों के अन्तर्गत परियोजनाओं को आगे बढ़ने की अनुमति दी जाती है, उनमें पर्यावरणीय नुकसानों को सीमित और न्यूनतम करने के हस्तक्षेपों को प्रमुख होना चाहिए।

नियमगिरी पहाड़ियों में बॉक्साइट खनन को ‘नहीं’ कहना तर्कपूर्ण था क्योंकि जिस मात्रा में बॉक्साइट का खनन होता, वह अपने पूरे जीवन चक्र में अल्युमिनियम रिफाइनरी की आवश्यकता का बहुत छोटा हिस्सा होता। वहीं नवी मुम्बई हवाईअड्डा ‘हाँ लेकिन’ वर्ग का था। यह हवाई परिवहन की बढ़ती माँग का प्रबन्धन करने की आवश्यकता और मैंग्रोव के विनाश को न्यूनतम करने के बीच सन्तुलन बिठाने का मामला था। मैंग्रोव, प्राकृतिक आपदाओं के समय मुम्बई की सुरक्षा करने का काम करते हैं। साथ ही मीठी नदी के प्राकृतिक प्रवाह में ज्यादा छेड़छाड़ नहीं होने देना था जो मुम्बई महानगर के प्राकृतिक जलनिकासी प्रणाली को प्रभावित करे।

कई बार बड़ी आर्थिक अनिवार्यताएँ दूसरे सरोकारों पर प्रभावी हो जाती हैं जैसे सेल को चिड़िया खदान विकसित करने की अनुमति देना। यह झारखंड के सारंडा में सखुआ के घने जंगलों में स्थित है। सारंडा जंगल में खनन की अनुमति देने का फैसला कठिन था, लेकिन मैंने सेल के जीवित रहने और उसके स्वास्थ्य को जोखिम में डालने के व्यापक आर्थिक प्रभाव के साथ इसका सन्तुलन बिठाया। इस्पात के इस प्रमुख कारखाने को ‘हाँ लेकिन’ वर्ग में अनुमति मिली जिसमें ऐसी शर्तें रखी गई थी जिससे न्यूनतम पारिस्थितिकीय प्रभाव को सुनिश्चित किया जा सके।

किसी परियोजना में हस्तक्षेप के फायदों और कीमतों का नियमित आकलन होना चाहिए। कुछ मामलों में आर्थिक विकास का पक्ष मजबूत होता है तो कुछ में पर्यावरण का नियंत्रण रहता है। इस आकलन को परियोजना विशेष और क्षेत्र विशेष दोनों आधार पर किया जाता है। इसमें पारिस्थितिकीय और आर्थिक तौर पर टिकाऊ निर्णय करने का प्रयास करना होता है जैसाकि अलकनंदा और भागीरथी नदियों समेत अनेक नदी घाटियों और पश्चिमी घाट के मामलों में हुआ। ऐसे आकलन को परियोजना अनुमति प्रणाली में सामान्य तौर पर शामिल होना चाहिए।1

अपेक्षित सन्तुलन हासिल करने का दूसरा पहलू है, स्थानीय कानून की भावनाओं का अक्षरशः पालन करना।2 विकास और पारिस्थितिकी सुरक्षा के बीच सन्तुलन की यह आवश्यकता, हमारे पर्यावरणीय कानूनों में अन्तर्निहित हैं लेकिन दुर्भाग्य से इन कानूनों की अधिकतर अवहेलना ही होती है। कई मामलों में जैसेकि आदर्श हाउसिंग सोसायटी, लवासा टाउनशिप का विकास और वेदांता के लांजिगढ़ रिफाइनरी के विस्तार में स्थानीय कानूनों की अवहेलना एकदम स्पष्ट थी जिससे असन्तुलन पैदा हुआ। स्थिति को दुरुस्त करने के प्रयास को विकास में अवरोध पैदा करनेवाली कार्रवाई बताया गया जबकि वह प्रयास केवल सन्तुलन कायम करने लिये था।

आर्थिक और विकासपरक गतिविधियों को गतिमान रखने के साथ पारिस्थितिकीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये अक्सर छोटे रास्ते अपनाने का दबाव बहुत ज्यादा होता है। कम समय में आर्थिक विकास और पारिस्थितिकीय सुरक्षा पहली नजर में एक-दूसरे के उलट नजर आते हैं,लेकिन गहराई से देखने पर यह साफ हो जाता है कि पर्यावरणीय सुरक्षा, विकास को टिकाए रखने में सहायक होता है। इस तथ्य ने मेरी धारणा में बदलाव किया। मैं यह मानने लगा कि आर्थिक विकास जो पर्यावरण के लिहाज से अनुकूल न होने के साथ,पारिस्थितिकी के लिहाज से भी सुरक्षित न हो, वह टिकाऊ नहीं होता।

यह अध्याय पर्यावरण और विकास की बहस पर केंद्रित है। यह अनुमति देने के तीन स्तरीय वर्गीकरण के व्यावहारिक स्वरूप को एक-साथ लाकर प्रदर्शित करता है। ऐसा करने में दुविधाएँ तो होती हैं, पर विकास का परिस्थितिकीय सुरक्षा के साथ सन्तुलन बिठाना असम्भव नहीं लगता है। वास्तव में देखा गया है कि अधिकांश मामलों में पारिस्थितिकीय सुरक्षा और आर्थिक विकास एक दूसरे के खिलाफ नहीं होते।

‘‘वैश्वीकरण और पारिस्थितिकीय सुरक्षा’ (Globalisation and Ecological Security) विषय पर फाउंडेशन फॉर इकोलॉजिकल सिक्यूरिटी (Foundation for Ecological Security) द्वारा इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, नई दिल्ली में आयोजित व्याख्यान।

31 अक्टूबर 2002

मैं पर्यावरणीय सतत विकास आन्दोलन की मुख्यधारा में नहीं रहा। और जब मुझसे पूछा गया कि मैं क्या बोलने वाला हूँ तो मैंने कुछ हद तक विवादास्पद विषय-‘वैश्वीकरण और पारिस्थितिकीय सुरक्षा’ का सुझाव दिया क्योंकि माना जा रहा है कि यह आर्थिक व्यवस्था, पारिस्थितकीय सुरक्षा का क्षरण कर रही है।

वैश्वीकरण और पारिस्थितिकीय सुरक्षा के बारे में परम्परागत समझ यह है कि दोनों बुनियादी तौर पर परस्पर विरोधी लक्ष्य हैं। वैश्वीकरण वास्तव में पारिस्थितिकीय सुरक्षा की अधिसंरचनाओं का नुकसान कर रहा है। यह शायद सर्वाधिक सारगर्भित और भावपूर्ण वर्णन है जिसे मैंने कभी पढ़ा है। साथ ही यह इस विषय पर सर्वाधिक भ्रमपूर्ण और गलत कथन भी है।

मैं यह कहते हुए आरम्भ करना चाहता हूँ कि आज दो मुद्दे हैं। यह कहना एकदम उपयुक्त है कि हम यह बातचीत जलवायु परिवर्तन सम्मेलन की पृष्ठभूमि में कर रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में जो कुछ घटित हुआ है वह केवल वैश्वीकरण और पारिस्थितिकीय सुरक्षा का प्रश्न नहीं है बल्कि वह पारिस्थितिकीय सुरक्षा का वैश्वीकरण है। सचमुच यह ऐसा मुद्दा है जिसे विकासशील और विकसित देशों का सार्वजनिक एजेंडा समझकर सुलझाया जाना चाहिए। हम वैश्वीकरण और पारिस्थितिकीय सुरक्षा के बीच के अन्तर्सम्बन्धों को कम ही समझते हैं और इस मुद्दे बीच उलझकर रह जाते हैं। मैं इन दोनों में फर्क करना चाहता हूँ क्योंकि इसके अपने आर्थिक और राजनीतिक परिणाम हैं।

अधिकांश समस्याएँ जिन्हें हम पारिस्थितिकीय असुरक्षा से जोड़ते हैं, प्राकृतिक संसाधनों के अतिशय दोहन, जल प्रणाली के नुकसान और प्रदूषण के सभी अवस्थाओं जैसे वायु,जल और भूमि प्रदूषण के रूप में प्रकट होती हैं। उपरी जलग्रहण क्षेत्रों में वन विनाश, वनभूमि का क्षरण, ये सभी वैश्वीकरण के पहले घटित हुए हैं। ये प्रक्रियाएँ पिछले कुछ वर्षों से चलती आ रही हैं। शायद इन पर लोगों का ध्यान पिछले दशक या उसके थोड़ा पहले गया। लेकिन इसे स्वीकार करने में कोई झिझक नहीं होनी चाहिए कि तथाकथित योजनाबद्ध विकास का सुनहरा काल वास्तव में वह समय था जिसमें पारिस्थितिकीय सुरक्षा की समूची बुनियाद का बहुत बड़ा नुकसान हुआ।

मैं यह चर्चा बीती घटनाओं की आलोचना करने के लिये नहीं कर रहा बल्कि इस तथ्य की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिये कर रहा हूँ कि अक्सर हम मान लेते हैं कि ‘बाजार आधारित अर्थव्यवस्था’ पर्यावरण विरोधी है और ‘योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था’ पर्यावरण हितैषी। परन्तु वास्तविकता यह है कि पर्यावरण को सबसे बड़ा नुकसान बीसवीं सदी में मध्य एशिया में कम्यूनिस्ट शासन के दौरान हुआ। वास्तव में, दुनिया में अब तक पर्यावरण-विरोधी शासन यूरोप और मध्य एशिया के कम्यूनिस्ट शासन रहे हैं।जिस तरह का पारिस्थितिकीय विनाश अरल सागर (कज़ाकिस्तान और उज्बेकिस्तान बीच स्थित विशाल झील) में हुआ वैसा उदाहरण बाजार हितैषी माहौल में मिलना सम्भव नहीं है। इस प्रकार, लोगों की यह धारणा कि जब ‘योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था’ से ‘बाजार अर्थव्यवस्था’ की ओर संक्रमण होता है तो पर्यावरण या पारिस्थितिकीय सुरक्षा का नुकसान होना तय है, यह तथ्यों पर आधारित नहीं है। दुनिया में ऐसी ‘बाजार अर्थव्यवस्थाएँ’ और ‘योजनाबद्ध अर्थव्यवस्थाएँ’ मौजूद हैं जिनमें पर्यावरण के साथ रियायत हुई है। मैं समझता हूँ कि यह मामला देशों पर निर्भर करता है। ऐसे देश जो विकास से जुड़े कार्यों में पर्यावरणीय नीतियों का पूरी तरह पालन करते हैं और वे जो इस प्रक्रिया में पर्यावरणीय आयामों को गम्भीरता से नहीं लेते। बाजार अर्थव्यवस्था में भी अनेक महत्त्वपूर्ण पर्यावरणीय आन्दोलन हुए, जो बाजार की ताकतों के परिणाम न होकर न्यायिक घोषणाओं या नियामक उपायों की वजह से हुए जिन्हें नागरिक समाज के लोकप्रिय दबाव में सरकारों को अपनान पड़ा। इसलिये यह कहना जायज है कि बाजार अर्थव्यवस्था में भी नियमों, तकनीकों और जनता के दबाव की परस्पर-क्रिया ने दुनिया के कई देशों को पर्यावरणीय व्यवहार की पद्धतियों को अपनाने के लिये मजबूर किया।

इस प्रकार, पहली बात जो मैं कहना चाहता हूँ कि हमें ‘बाजार अर्थव्यवस्था’ को खलनायक के रूप में देखने की मानसिकता से निकलने और ‘योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था’ का पारिस्थितिकीय सुरक्षा का हितैषी होने के रोमांटिक भाव से उबरने की आवश्यकता है।


अब मैं दूसरे मुद्दे पर आता हूँ जिसके बारे में मैं बात करना चाहता हूँ। वैश्वीकरण क्या है? इसकी विषयवस्तु के बारे में पहले कुछ कहना होगा क्योंकि इस शीर्षक के अन्तर्गत आज सब कुछ आ जाता है। यह सबको पसन्द आने वाला पद बन्ध है जिसके अन्तर्गत कुछ भी आ सकता है। मैं यह दलील देना चाहता हूँ कि अगर आप वैश्वीकरण की ओर देखना चाहते हैं और उसके मायने निकालने के साथ ही पारिस्थितिकीय सुरक्षा के साथ इसके सम्बन्ध को देखते हैं, तो आपको इसे चार अलग-अलग आयामों में देखना होगा। ये चार आयाम हैं-- व्यापार का वैश्वीकरण, वित्त का वैश्वीकरण, लोगों में वैश्वीकरण (जो श्रमशक्ति के देश के भीतर और बाहर आवागमन के रूप में सामने है) और अन्तिम सांस्कृतिक वैश्वीकरण।

यह महत्त्वपूर्ण है कि प्रत्येक अवयव को अलग-अलग देखा जाए, क्योंकि मेरा मानना है कि व्यापार के वैश्वीकरण को पूंजी की गतिशीलता के साथ, लोगों के आवागमन और सांस्कृतिक वैश्वीकरण के व्यापक मसले के साथ जोड़ देने से समूची अवधारणा के साथ न्याय नहीं हो पाएगा। डॉ. अमृता पटेल3 के व्याख्यान के जिस पैराग्राफ को मैंने पढ़ा है, वह वास्तव में व्यापार के वैश्वीकरण के बारे में है। दूसरे शब्दों में इसका सम्बन्ध बाजार को खोलने,वस्तु और सेवाओं के आवागमन के साथ ही एक देश की उत्पादकता को दूसरे देश के उपभोक्ता से जोड़ने से है। ....जब हम वैश्वीकरण कहते हैं तो मोटे तौर पर हमारा मतलब वस्तु और सेवाओं का भौगोलिक सीमाओं के भीतर और भौगोलिक सीमाओं के पार आवागमन से होता है।

मैं एक सवाल पूछना चाहता हूँ कि इसका क्या प्रमाण है कि वस्तु और सेवाओं का यह आवागमन आर्थिक और पारिस्थितिकीय हित में है? मैं सोचता हूँ कि इन मसलों को अलग करने की जरूरत है। स्पष्ट है कि अगर यह देशों या समुदायों के आर्थिक हित में नहीं है तो इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का कोई मतलब नहीं है। ऐसे में पारिस्थितिकीय सुरक्षा का प्रश्न भी पीछे रह जाता है। आर्थिक लाभ प्राप्त होने की स्थिति में, लाभ की सम्भावनाओं तक अपनी पहुँच बनाने में पारिस्थितिकीय मूल्य चुकाने की सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। ऐसी परिस्थिति में इन दोनों के बीच चुनाव में दुविधा उत्पन्न होती है। इसीलिये मैं समझता हूँ कि इस पूरे प्रश्न को समझने की कोशिश में कुछ समय देना महत्त्वपूर्ण है। इस बेहद विवादास्पद प्रश्न पर विचार करना भी आवश्यक है कि वस्तु और सेवाओं का व्यापार में वैश्वीकरण का स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं पर क्या प्रभाव पड़ता है?

अगर हम आजीविका को आधार के तौर पर लें तब ऐसे प्रमाण लगातार मिल सकते हैं जो बताएँगे कि वैश्वीकरण के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रकार के प्रभाव हुए हैं। यहाँ मैं देश को विश्लेषण की इकाई के तौर पर ले रहा हूँ। देश को इकाई के तौर पर लेने से ऐसे ढेर सारे प्रमाण मिलते हैं जो बताते हैं कि व्यापार के वैश्वीकरण ने वास्तव में देश की अर्थव्यवस्था को अधिक लचीला बनाया। इसने बहुत ही बुनियादी किस्म की सुरक्षा प्रदान किया जो रोजगार की सुरक्षा है। ऐसा कोई अनुभजन्य प्रमाण नहीं है जो बताए कि व्यापार के वैश्वीकरण ने वास्तव में देश की आर्थिक अवस्था को कमजोर किया, सिवा कुछ अफ्रीकी देशों के जो अलग वर्ग में आते हैं। यहाँ अलग वर्ग के होने का मतलब अधिकांश अफ्रीकी देशों में कृषि के क्षणभगुंर किस्म की होने से है। वहाँ एक फसल या एक ही उत्पादन पर आधारित अर्थव्यवस्था है। बुनियादी तौर पर अफ्रीका की आर्थिक संरचना का विविधिकरण कभी हुआ ही नहीं जैसाकि लैटिन अमेरिकी और एशियाई के देशों में हुआ। जब हम पिछले बीस वर्षों के अनुभवजन्य प्रमाणों पर नजर डालते हैं और प्रश्न करते हैं कि वैश्वीकरण ने देशों को गरीब बनाया या अमीर? मेरा मानना है कि प्रमाण साफ हैं। व्यापार में वैश्वीकरण ने नए बाजारों को खोलने के अर्थों में अन्तरराष्ट्रीय उत्पाद बाजारों के एकीकरण का मार्ग प्रशस्त किया जिसके परिणामस्वरूप स्थानीय स्तर पर देशों में नए रोजगार के अवसर पैदा हुए और देश अमीर हुए । वैश्वीकरण की इस प्रक्रिया का असर लोगों की आजीविका पर भी पड़ा जिसमें कुछ लोग और ज्यादा अमीर हुए, कुछ की आमदनी में थोड़ी कमी आयी और कृषि से सम्बन्ध रखने वाले लोगों की संख्या भी काम हुई। मैं यहाँ यह बता देना चाहता हूँ कि हम इकलौते मामले की चर्चा नहीं कर रहे, हम व्यापक मैक्रो-इकोनॉमी (Macro Economy) की बात कर रहे हैं। मैं यह भी बता देना चाहता हूँ कि देशों की अर्थव्यवस्था पर वैश्वीकरण का कोई भी अनुभवजन्य नकारात्मक प्रमाण देखने को नहीं मिला है, केवल अफ्रीकी देशों के अनोखे मामलों को छोड़कर।

इसके दो बेहतरीन उदाहरण मूलतः भारत और चीन हैं। भारत के मुकाबले चीन अधिक नाटकीय ढंग से। पिछले दस-पंद्रह वर्षों में भारत की अर्थव्यवस्था में आये बदलाव निश्चित तौर पर यह बताते हैं कि मुक्त व्यापार की व्यवस्था ने भारतीय अर्थव्यवस्था को अधिक मजबूत,लचीला और अन्तरराष्ट्रीय झटकों के प्रति कम जोखिमग्रस्त बनाया।

अब मैं वित्त, श्रम और संस्कृति के वैश्वीकरण की चर्चा करने जा रहा हूँ, क्योंकि मैं मानता हूँ कि ये हमें पूरी तरह दूसरे आयाम में ले जाते हैं और वहाँ पारिस्थितिकीय सुरक्षा के साथ इनके सम्बन्धों की स्पष्टता काफी धुँधली है। मेरे व्याख्यान का फोकस विशेष तौर पर व्यापार के वैश्वीकरण पर है जिस पर देश के भीतर और बाहर होनेवाली अधिकतर बहसें केन्द्रित हैं।

प्रश्न है कि पारिस्थितिकी मजबूत हुई या नहीं? यहाँ यह कहना उचित है कि,चाहे वह वैश्वीकरण की प्रक्रिया हो,एकीकरण की प्रक्रिया हो और श्रम और पूंजी के अन्तरराष्ट्रीय पुनर्विन्यास की प्रकिया हो सभी ने स्थानीय पारिस्थितिकीय संरचना को वास्तव में कमजोर किया है। यह उल्लेख करना भी आवश्यक है कि पिछले तीस-चालीस वर्षों में हमने कई तरह की समस्याएँ इकठ्ठा कर ली हैं जो हमारे द्वारा अपनायी गयी विकास की पद्धति का परिणाम हैं। लोग पंजाब में हुए जल जमाव को भारत द्वारा विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organisation, WTO) के लिये अपना दरवाजा खोल देने की घटना को जिम्मेवार ठहरा देते हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि पंजाब के जल जमाव और विश्व व्यापार संगठन के बीच कोई सम्बन्ध नहीं है। ठीक इसी तरह,पिछले पैंतीस वर्षों से जारी वनों की कटाई और डब्लूटीओ के साथ एकीकरण के बीच कोई सम्बन्ध नहीं है।

ऐसा कहना इसलिये सही है कि भारत के अन्तरराष्ट्रीय व्यापार की बनावट पर नजर डालने पर पता चलता है कि हमारे निर्यात व्यापार का बहुत ही कम हिस्सा वन या प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े उत्पादों पर आधारित है। यह अफ्रीका के बारे में सच हो सकता है पर भारत के लिये निश्चित तौर पर नहीं। प्रश्न है कि व्यापार के वैश्वीकरण ने क्या सचमुच पारिस्थितिकीय सुरक्षा पर हानिकारक प्रभाव डाला? इस प्रश्न का उत्तर देना कठिन है। कारण है विकास की अलग-अलग पद्धतियों को अपनाने की वजह से कई तरह की समस्याएँ हमें विरासत में मिली हैं। मैं समझता हूँ कि यही वह जगह है जहाँ भंडार और उसके प्रवाह के बीच फर्क करने की जरूरत होती है। किसी खास समय में कुछ खास किस्म की समस्याएँ इकट्ठी होती हैं जैसे ग्रीनहाउस गैसों का एकत्रित भंडार। वास्तविक प्रश्न यह है कि यह प्रवाह किस तरह का है?

क्या भंडार में वृद्धि हो रही है,कमी हो रही है या वह स्थिर है? वैश्वीकरण की प्रक्रिया समस्याओं के एकत्रित भंडार के साथ क्या कर रही है? यही वास्तविक मुद्दा है जिसे हमें सुलझाना है।

डॉ. अमृता पटेल के अनुसार आर्थिक एकीकरण की प्रक्रिया,उन इलाकों में हानिकारक पारिस्थितिकीय और पर्यावरणीय परिणामों की ओर अग्रसर हो रही है जिनमें प्राकृतिक संसाधनों का दोहन हो रहा है। मेरी दलील होगी कि व्यापार के वैश्वीकरण का बुनियादी प्रभाव, साक्ष्यों के अनुसार पर्यावरण पर कम है और रोजगार पर अधिक। वैश्वीकरण एक रणनीति है जो वास्तव में रोजगार बढ़ाती है। मेरी समझ में वह पारिस्थितिकीय सुरक्षा की बुनियाद को भी मजबूत करती है। भारतीय सन्दर्भ में ऐसा कहा भी जा रहा है कि अधिकांश पारिस्थितिकीय समस्याएँ गरीबी की वजह से उत्पन्न होती हैं। दूसरे शब्दों में अधिकांश पारिस्थितिकीय समस्याएँ आर्थिक संसाधनों तक पहुँच नहीं होने से उत्पन्न होती हैं। समुदायों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने से पारिस्थितिकी के लिहाज से सुरक्षित अवस्था खुद-ब-खुद प्राप्त हो जाती है। इस प्रकार मैं यह दलील दूंगा कि वैश्वीकरण,देश में व्यापार के विशेषीकरण के अवसरों को बढ़ाता है। इस अवस्था में देश में बहुतायत में उपलब्ध चीजों का विकास होता है। रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं जो बृहत्तर पारिस्थितिकीय सुरक्षा हासिल में सहायक होगी।

इस सन्दर्भ में भारत ने चीन की तुलना में बहुत बेहतर नहीं किया है। हम वैश्वीकरण से उत्पन्न अवसरों का फायदा उठाने में बहुत सफल नहीं हो सके हैं। इसका कारण हमारी अपनी नीतियाँ हैं। भारत और चीन के बीच तुलना करें और दोनों देशों की दस साल पूर्व की अवस्था को देखें तो हम पाएँगे कि चीन ने उन क्षेत्रों में ज्यादा प्रगति की जिनमें भारत तुलनात्मक रूप से बेहतर स्थिति में था। जैसे कपड़ा उद्योग और उपभोक्ता वस्तुओं के निर्माण का श्रम प्रधान काम। इन्हीं उद्योगों में बुनियादी तौर पर स्थानीय रोजगार उत्पन्न हुए। चीन इसे करने में सफल रहा और भारत नहीं। चीन की सफलता का मुख्य कारण है अपनी घरेलू नीतियों पर ज्यादा ध्यान जबकि बाहरी अड़चनों पर कम। हम अपनी असफलताओं के लिये बाहरी दुनिया को जिम्मेवार ठहराने की प्रवृत्ति के शिकार हैं जबकि स्पष्ट प्रमाण हैं कि कई देश उनके बाजारों का लाभ उठाने में बहुत सफल रहे।

आधी शताब्दी से भी पहले प्रमुख ब्रिटिश भौतिकी-विज्ञानी लेखक सीपी स्नो ने बीबीसी पर रीथ लेक्चर देते हुए कहा था कि कैसे आधुनिक समाज की ‘दो संस्कृतियाँ’ विज्ञान की संस्कृति और मानविकी की संस्कृति’ के बीच संवाद टूटना,अत्यंत आवश्यक सार्वजनिक मसलों की समझदारी में व्यवधान बन गया। यह व्याख्यान बाद में एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ जिसे ‘टाइम्स लिटरेरी सप्लिमेंट’ ने 2008 में एक सौ पुस्तकों की अपनी सूची में शामिल किया।

मैं कहूँगा कि व्यापार का वैश्वीकरण उन देशों के लिये निश्चित ही बृहत्तर आर्थिक अवसरों का सृजन कर रहा है जो वैश्वीकरण की प्रक्रिया में हिस्सेदार हो गए हैं। यह आज के समय का निर्णय है। इसके पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध हैं कि बन्द अर्थव्यवस्थाएँ खुली अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में धीमी गति विकास कर रही हैं। अब मैं वित्तीय वैश्वीकरण और व्यापार के वैश्वीकरण के बीच फर्क कर रहा हूँ। जिन अर्थव्यवस्थाओं ने अन्तरराष्ट्रीय व्यापार के साथ एकीकरण की प्रक्रिया में हिस्सा लिया है उन्होंने अपनी आर्थिक सम्पदा में बढ़ोत्तरी करने के साथ ही पारिस्थितिकीय सुरक्षा को बेहतर करने की योग्यता भी विकसित कर ली है।

इसका यह मतलब नहीं होता कि जो देश वैश्वीकरण की वजह से आर्थिक रूप से अधिक लचीले हो गए, उन्होंने अपनी पारिस्थितिकीय संरचना को स्वयं ही अधिक मजबूत कर लिया। मैं सोचता हूँ कि कोई भी सही दिमागी स्थिति में यह तर्क नहीं दे सकता कि आर्थिक विकास और पारिस्थितिकीय सुरक्षा के बीच कोई स्वचालित सम्बन्ध है। अगर कोई वास्तव में ऐसी दलील देता है तो वह गलत है। प्रश्न है कि सुरक्षात्मक उपाय क्या हैं और वे कौन से औजार हैं जिन्हें पर्यावरणीय और पारिस्थितिकीय संरक्षण के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये अपनाया जाये? आर्थिक विकास के उद्देश्यों को भी अधिकतम किया जा सके।

मैं सोचता हूँ कि इस देश में ऐसा माना जाता है कि उच्च विकास करने वाली अर्थव्यवस्था के मुकाबले निम्न दर से विकास करने वाली अर्थव्यवस्था पर्यावरण के प्रति अधिक प्रतिरक्षात्मक होती है। लोगों में ऐसा विश्वास है कि सात या आठ प्रतिशत की दर से विकसित होने के साथ तेजी से औद्योगिकृत हो रही अर्थव्यवस्था पर्यावरण पर अधिक बोझ डालती है। लेकिन मैं सोचता हूँ और उपलब्ध प्रमाण भी यह दिखाते हैं कि मामला वास्तव में ऐसा है नहीं। मेरी समझ से आगामी वर्षों में वास्तविक चुनौती, वैश्वीकरण बनाम पारिस्थितिकीय सुरक्षा की बहस को वैश्वीकरण और आर्थिक सुरक्षा की चर्चा में बदलना है। यह स्वीकार करके कि व्यापार के वैश्वीकरण का देश की आर्थिक अवस्था पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यह देश को एक अवसर प्रदान करता है कि हम पर्यावरण प्रतिरक्षण की आवश्यकताओं को पूरा करने के औजार और नीतियों को विकसित कर सकें।

दूसरा मामला पारिस्थतिकीय सुरक्षा के वैश्वीकरण का है। यह बहुत ही उपयुक्त है कि हम आज ऐसे समय में मिल रहे हैं जब पृष्ठभूमि में जलवायु परिवर्तन पर वार्तालाप और विचार विमर्श हो रहे हैं।यह ऐसा मामला है जो वास्तव में पिछले दस या पंद्रह वर्षों में सार्वजनिक सोच-विचार के दायरे में आया है। यह उस बात की ओर संकेत करता है जिसे मैं कहना चाहता हूँ, ‘पारिस्थितिकीय सुरक्षा आज ज्यादा वैश्विक हो गई है’।

इस दौर में वे कौन से मसले हैं जिनको लेकर हमें चिंतित होना चाहिए? मैं सोचता हूँ कि सबसे महत्त्वपूर्ण मसला है व्यापार का पर्यावरणीय सरोकारों के साथ सम्बन्ध जोड़ने का प्रयास,जो निश्चित तौर पर किया जाना चाहिए। ऐसे लोगों का खासकर पश्चिमी देशों में एक बहुत बड़ा समुदाय है जो मानते हैं कि पारिस्थितिकीय सुरक्षा को सुनिश्चित करने का इकलौता उपाय व्यापार प्रतिबन्ध है। वास्तव में डब्लूटीओ के सन्दर्भ में व्यापार और पर्यावरण के बीच की समूची बहस इसी पर केंद्रित है। अब हमारे पास बहुत बड़ी मात्रा में न्यायिक अभिलेख और कानून उपलब्ध हैं जो यह दिखा सके कि वैश्वीकरण और मुक्त व्यापार को प्रोत्साहित करना और पर्यावरणीय उदेश्यों को पूरा करना परस्पर विरोधाभासी हैं।

अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित झींगा-कछुआ मुकदमा (Shrimp-Turtle Case) से आपमें से कई लोग परिचित होंगे। यह व्यापार और पर्यावरण के बीच सम्बन्धों को पुनर्परिभाषित करता है।अमेरिका ने भारत जैसे देशों से झींगा आयात करने पर पाबन्दी इस आधार पर लगा दी थी कि यहाँ प्रचलित झींगा पकड़ने का तरीका कछुओं को मार डालता है।

पहला फैसला भारत, मलेशिया और थाईलैंड के पक्ष में गया लेकिन अमेरिका फिर डब्लूटीओ के अपीलीय प्राधिकरण में गया। अपीलीय प्राधिकरण ने ऐसा फैसला दिया मानो घरेलू पर्यावरणीय मानदंडों का अन्तरराष्ट्रीय व्यापार के मामले में प्रयोग जायज हो। अब बड़ा सवाल यह है कि क्या वास्तव में डब्लूटीओ ने घरेलू पर्यावरणीय लक्ष्यों को पूरा करने और पर्यावरणीय सुरक्षात्मक उपायों के प्रयोग में व्यापार पर पाबन्दी लगाने की अनुमति दे दी है?

मेरी नजर में बड़ा मसला यह है कि खास ढंग के पर्यावरणीय व्यवहार को सुनिश्चित करने के लिये व्यापार प्रतिबन्द्ध किस हद तक लगाये जा सकते हैं। कई महत्त्वपूर्ण मसले लम्बित हैं। यूरोप में, भारत द्वारा चमड़े के प्रसंस्करण के लिये प्रयोग में लाये जाने वाले रसायनों को कैंसरकारी करार देकर यहाँ से चमड़े के आयात पर प्रतिबन्ध लगाने की कोशिश की जा रही है। ऐसे उदाहरणों की बड़ी संख्या है जिनमें पारिस्थितिकीय सुरक्षा के लक्ष्यों को हासिल करने में व्यापार प्रतिबन्ध का इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है।

बहुत से लोग वास्तव में इसका स्वागत करते हुए कहते हैं कि विकास प्रक्रिया के साथ पर्यावरण के एकीकरण का इकलौता उपाय व्यापार प्रतिबन्ध का उपयोग करना है। मेरी समझ में बाजार को नियंत्रित करने के लिये व्यापार प्रतिबन्ध का इस्तेमाल आने वाले समय में बहुत ही विवादास्पद राजनीतिक मसला बनने जा रहा है। मैं मौजूदा स्थिति में इतना ही कह सकता हूँ कि अगले तीन-चार वर्ष अन्तरराष्ट्रीय वार्तालापों के लिहाज से बेहद निर्णायक होने जा रहे हैं।

दूसरा मसला जलवायु परिवर्तन का है। पारिस्थितिकीय सुरक्षा के वैश्वीकरण के जिन सिद्धांतों की मैं चर्चा कर रहा हूँ, यह उनका मामला है। समूचा ‘क्योटो प्रोटोकॉल’ जो विवादग्रस्त विषय रहा है, वह भंडार और प्रवाह के बुनियादी विभेद पर आधारित है। ऐसे देश हैं जिन्होंने ग्रीनहाउस गैसों के भंडार में योगदान किया है। ऐसे भी देश हैं जो ग्रीनहाउस गैसों के प्रवाह में योगदान कर रहे हैं। अतः ग्रीनहाउस गैसों के प्रवाह वाले देशों की तुलना में भण्डारण वाले देशों पर इस समस्या को सुलझाने की जिम्मेवारी सबसे ज्यादा है। मैं सोचता हूँ कि भंडार और प्रवाह में योगदान कर रहे देशों के बीच समस्या से निपटने हेतु जिम्मेवारी का उचित वितरण नहीं होने की वजह से अनेक देश मानते हैं कि क्योटो प्रोटोकॉल से विश्व स्तर पर राजनीतिक विवाद पैदा हुआ है। लेकिन मुझे विश्वास है कि यह मसला सुलझने जा रहा है।

यहाँ प्रमुख मुद्दा है कि डब्लूटीओ या क्योटो प्रोटोकॉल के कारण पर्यावरणीय व पारिस्थितिकीय सुरक्षा, संरक्षणवाद का औजार बन गया है। मेरी समझ में यहाँ यही वास्तविक मुद्दा है।असली खतरा यह है कि अगर पारिस्थितिकीय सुरक्षा को देवतुल्य स्तर तक उपर उठा दिया जाता है तो कई देश पर्यावरणीय व पारिस्थितिकीय दलीलों को बुनियादी तौर पर नव-संरक्षणवाद के औजार के तौर पर इस्तेमाल करने लगेंगे।

यह भी खतरा है कि व्यापार के वैश्वीकरण के सकारात्मक प्रभावों को देखने के बाद, पारिस्थितिकीय सुरक्षा को बाजार तक पहुँच बनाने की अनिवार्य शर्त मानकर मुक्त व्यापार को अ-मुक्त कर दिया जाये। यदि ऐसा हुआ तो कई देश वैश्वीकरण की प्रक्रिया का लाभ उठाने से वंचित रह जाएँगे।

इस प्रकार, निष्कर्ष के तौर पर मैं कहना चाहता हूँ कि पारिस्थितिकीय सुरक्षा वास्तव में घरेलू नीति का मसला है। पारिस्थितिकीय सुरक्षा आर्थिक नीति, कृषि नीति का मसला है। आप पानी, हवा और भूमि के साथ कैसा बर्ताव करते हैं, इसका मामला है। वैश्वीकरण की प्रक्रिया, मोटे तौर पर पूंजी और श्रम उत्पादन के कारकों में विशेषज्ञता हासिल करने का अवसर होने के साथ ही देश के लिये बुनियादी तौर पर अन्तरराष्ट्रीय बाजार में अपनी उपस्थिति बढ़ाने का अवसर है। यह घरेलू स्तर पर रोजगार पैदा करने, सम्पन्नता बढ़ाने का भी अवसर है जो पारिस्थितिकीय सुरक्षा के प्रश्नो को सुलझाने की परिस्थिति पैदा करती है।

मेरे मत में ऐसा नहीं है कि जब देश वास्तव में बहुत अधिक वैश्विक हो जाएँगे तब पारिस्थितिकीय चिंताओं का अपने आप ही समाधान हो जाएगा। पारिस्थितिकीय चिन्ताओं का समाधान उनको अपनी शर्तों के आधार पर करना होगा। भारत जैसे देशों के लिये वास्तविक चुनौती, वैश्वीकरण की प्रक्रिया के अन्तर्गत आर्थिक सम्पदा में बढ़ोतरी के साथ पारिस्थितिकीय सन्तुलन कायम करने की है। इस प्रकार, मैं कहना चाहूँगा कि वैश्वीकरण और पारिस्थितिकीय सुरक्षा के लक्ष्य एक दूसरे के विपरीत नहीं हैं। वास्तव में समुचित आर्थिक संरचना में उनका मेल-मिलाप हो सकता है और मैं उम्मीद करता हूँ कि यह विलम्ब के बजाय जल्दी हो।

दो संस्कृतियों का पुर्नावलोकन : “भारत में पर्यावरण बनाम विकास बहस की कुछ झलक” ग्यारहवाँ इसरो-जेएनसीएएसआर, सतीश धवन मेमोरियल लेक्चर, जवाहर लाल नेहरू सेंटर फॉर एडवाँस साइंटिफिक रिसर्च, बंगलोर

28 सितम्बर 2010

मैं एक विलक्षण भारतीय, उत्कृष्ट अभियंता-प्रशासक, महान संगठन निर्माता, बेहद प्रेरणादायक शिक्षक और बुद्धिजीवी, जिन्होंने मानवीय मूल्यों के प्रति बेहद संवेदनशील और प्रगतिशील प्रतिबद्धता का प्रदर्शन किया, के प्रति समर्पित यह प्रतिष्ठित व्याख्यान देते हुए सम्मानित महसूस कर रहा हूँ।

मैं प्रोफेसर सतीश धवन को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता पर मेरे विकास में उनकी पूरी भागीदारी थी क्योंकि वे और मेरे पिता सहकर्मी थे। हालांकि, दोनों अलग-अलग संस्थानों में थे। बीते वर्षों में मैंने उनके बारे में पढ़ा है और उनके दो असामान्य विषेशताओं से अत्यन्त प्रभावित हुआ। पहला, वे मनुष्य के सच्चे निर्माता थे क्योंकि अपनी टीम के पक्ष में खड़े होते थे और असफलताओं की जिम्मेवारी स्वयं लेते थे जबकि सफलताओं का श्रेय उदारतापूर्वक दूसरों को देते थे। यह सेटेलाइट लॉन्च व्हीकल (Satellite Launch Vehicle एसएलवी) के प्रकरण में बहुत ही स्पष्ट हुआ और डॉ अब्दुल कलाम ने इसे हृदयस्पर्शी ढंग से लिखा है। दूसरे, वे एक विश्वसनीय सलाहकार थे जो कभी उत्पीड़क नहीं होते। भारतीय विज्ञान का अभिशाप (वास्तव में उद्योग,राजनीति और इस देश के अन्य अनेक क्षेत्रों में है) है कि अग्रणी लोग उच्च स्थिति में रहते हुए अपने उत्तराधिकारियों की नई पीढ़ी तैयार करने में अनिच्छुक रहते हैं। और उससे भी महत्त्वपूर्ण है कि वे उन्हें काम करने की पूरी आजादी नहीं देते।

चूँकि, इस व्याख्यान का सह-प्रयोजक भारतीय अन्तरिक्ष शोध संगठन (इसरो) है इसलिये मैं याद दिलाना चाहता हूँ कि मैंने वन एवं पर्यावरण मंत्रालय और इसरो के बीच साझीदारी कायम करने के लिये सतर्कतापूर्वक प्रयास किया। भारत ग्रीनहाउस गैस और एयरोसोल उत्सर्जन की निगरानी करने के लिये 2012 में अपना समर्पित उपग्रह छोड़ेगा। 2013 में भी वानिकी के लिये समर्पित उपग्रह छोड़ा जाएगा ताकि देश में वनविनाश और वनीकरण दोनों की निगरानी की जा सके। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय, राष्ट्रीय जलवायु और पर्यावरण अध्ययन संस्थान का सह-वित्त प्रदाता भी है जिसकी स्थापना इसरो ने की है। हिमालय के ग्लेशियरों के स्वास्थ्य की निगरानी और मॉडलिंग में ‘स्पेस एप्लीकेशन सेंटर’ (Space Application Centre) के साथ मिलकर काम कर रहा है। मंत्री का पद सम्भालने के बाद मेरा शुरुआती फैसला इसरो को जलवायु परिवर्तन और जलवायु विज्ञान पर वार्तालाप करने वाले समूह का अविभाज्य हिस्सा बनाना था क्योंकि इसने इस क्षेत्र में जबरदस्त सक्षमता हासिल कर ली है।

आधी शताब्दी से भी पहले प्रमुख ब्रिटिश भौतिकी-विज्ञानी लेखक सीपी स्नो ने बीबीसी पर रीथ लेक्चर देते हुए कहा था कि कैसे आधुनिक समाज की ‘दो संस्कृतियाँ’ विज्ञान की संस्कृति और मानविकी की संस्कृति’ के बीच संवाद टूटना,अत्यंत आवश्यक सार्वजनिक मसलों की समझदारी में व्यवधान बन गया। यह व्याख्यान बाद में एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ जिसे ‘टाइम्स लिटरेरी सप्लिमेंट’ (Times Literary Supplement) ने 2008 में एक सौ पुस्तकों की अपनी सूची में शामिल किया। ये वो पुस्तक थे जिन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पश्चिमी सार्वजनिक विचार विमर्श को सर्वाधिक प्रभावित किया।


आज इस दुपहरी में मैं इन ‘दो संस्कृतियों’ के लक्षणों की चर्चा करना चाहता हूँ। ऐसे लोगों के बीच प्रत्यक्ष दूरी है जो तेज आर्थिक विकास को अपना चुके हैं और जो पर्यावरण संरक्षण पर अधिक ध्यान देने की वकालत कर रहे हैं, जोकि होनी नहीं चाहिए। तेज आर्थिक विकास के खिलाफ कौन बहस कर सकता है क्योंकि केवल यही बहुत रोजगार पैदा कर सकता है। इसके साथ ही अपनी अनगिनत नदियों, झीलों, पहाड़ों और खूबसूरत जैव-विविधता के संरक्षण के खिलाफ कौन बहस कर सकता है क्योंकि केवल यही विकास को टिकाऊ बना सकता है। लेकिन मैं चिंतित हूँ क्योंकि दोनों समूहों के पक्षधर एक दूसरे से बात नहीं करते बल्कि वे एक दूसरे के बारे में बात करते हैं । इस तरह हर दिन उनके बीच की दूरी बढ़ती जा रही है। ऐसा अनेक कारणों से हो रहा है। एक कारण है, हमारी विकास की अभिलाषा स्पष्ट रूप से बदल गई है और सकल घरेलु उत्पाद में प्रतिवर्ष 8-9 प्रतिशत की दर से कम वृद्धि दर को ‘मंदी‘ माना जाने लगा है। दूसरा कारण है एक उर्जावान और उल्लासपूर्ण पर्यावरणीय समुदाय का विकसित होना जो अग्रिम कतार में खड़े ढेर सारे उच्च शिक्षा प्राप्त नौजवान हैं। ये पर्यावरण प्रबन्धन के भारतीय इतिहास से अपने-आप को बहुत ज्यादा प्रेरित महसूस नहीं करते।

दबाव देने पर विकास के समर्थक कहेंगे कि पर्यावरण और जीडीपी विकास के बीच समुचित सन्तुलन होना चाहिए। पर्यावरणविद भी कहेंगें कि जीडीपी विकास और पर्यावरण के बीच सन्तुलन निश्चित ही रहना चाहिए। दोनों वक्तव्यों के क्रम के इस फर्क पर गौर करें। दोनों ही वक्तव्यों में पर्यावरण और विकास के बीच सन्तुलन कायम करने पर फोकस किया जा रहा है। इस प्रकार यह कहना गलत नहीं होगा कि पर्यावरण और जीडीपी विकास के बीच ‘सन्तुलन’ कायम करना प्रगति की सबसे महत्त्वपूर्ण कुंजी है। दोनों पक्ष तेज आर्थिक विकास के महत्त्व को स्वीकार करेंगे। दोनों पक्ष इस पर भी सहमत होंगे कि तेज आर्थिक विकास के दौरान पारिस्थितिकीय सरोकारों को साधने और प्रतिबिम्बित करने की आवश्यकता है। फिर समस्या कहाँ है? फिर संवाद के बजाय इतना विवाद क्यों?

समस्या तब होती है जब आप ‘सन्तुलन’ की साधारण दार्शनिक अवधारणा से आगे बढ़ते हैं और इसे कुछ कार्यकारी अर्थ देने का प्रयास करते हैं। ऐसी बड़ी परियोजनाएँ जिन्हें आर्थिक विकास की धुरी माना जाता है उनकी स्थापना के लिये चुनाव की कठोर प्रक्रिया से गुजरने की आवश्यकता होती है क्योंकि वे पर्यावरण के लिये हानिकारक होती हैं। यदि हम सभी थोड़ी देर के लिये स्वीकार कर लें कि विकास और पर्यावरण के बीच निःसन्देह एक दुविधा है तो इसे सुलझाते हुए निर्णय पर पहुँचने में तीन विकल्प सामने आते हैं। जैसा कि मैंने पहले भी चर्चा की है, वे हैं- हाँ, हाँ लेकिन और नहीं। असली समस्या है कि विकास के समर्थक हाँ का उपयोग करते हैं और ‘हाँ लेकिन’ को स्वीकार कर सकते हैं। वे ‘नहीं’ को बहुत खराब कहेंगे। पर्यावरण समर्थक ‘नहीं’ से हर्षित होंगे,अनिच्छापूर्वक ‘हाँ लेकिन’ को स्वीकार कर लेंगे, लेकिन ‘हाँ’ को बहुत खराब कहेंगे। इस प्रकार इस प्रकरण का स्पष्ट निचोड़ है कि जहाँ तक सम्भव हो ‘हाँ लेकिन’ की संख्या को बढ़ाया जाये।

पर्यावरणीय और वन अनुमति की बहुत बड़ी संख्या ‘हाँ लेकिन’ वर्ग की है लेकिन वे उतने चर्चित नहीं होते जितनी चर्चा ‘हाँ’ या ‘नहीं’ वर्ग के निर्णयों की होती है। निःसन्देह जैसा कि हमें अनुभव हुआ है ‘लेकिन’ को निश्चित ही ‘हाँ लेकिन’ में बदलना चाहिए। यह ‘लेकिन’ अक्सर शर्त के रूप में होता है जिसे पहले निर्माण के दौरान और परियोजना आरम्भ होने के बाद पूरा करना होता है। मैं विश्वास करता हूँ कि इन शर्तों को निर्धारित करने में हमें निश्चित ही तीन चीजों पर जोर देना चाहिए। पहला, शर्त को निश्चित ही वस्तुनिष्ठ और मापने योग्य होना चाहिए ताकि यह स्पष्ट रहे कि क्या किया जाना है और क्या इसका अनुपालन किया गया है? दूसरा, शर्त को निश्चित ही सुसंगत और न्यायोचित होना चाहिए अर्थात समान किस्म की परियोजना को समान किस्म की शर्त पूरा करने के लिये कहा जाना। तीसरे और आखिरी शर्त में प्रस्तावक पर अतिरिक्त वित्तीय और समय की लागत नहीं थोपना चाहिए (जो उन्हें अव्यावहारिक बना देंगे।)।

वास्तव में पिछले पन्द्रह महीनों में हमारे सामने आए अधिकांश मामलों के साथ हमारा यही व्यवहार रहा है। उदाहरण के लिये हमने गैर-सरकारी संगठनों के विरोध के बावजूद रत्नागिरी में एक बिजली परियोजना लगाने की अनुमति प्रदान की क्योंकि उसका कार्यान्वयन काफी आगे बढ़ गया था। हमने जो शर्तें लगायी उनके अनुपालन की निगरानी करने की हमारी क्षमता को भी तत्काल बढ़ाने की आवश्यकता है। इस मामले में हमारी वर्तमान क्षमता पूरी तरह अपर्याप्त है। इन क्षमताओं को उन्नत बनाने में हमें नवोन्मेषकारी और विचारवान होना पडे़गा, जिससे हम परम्परागत निरीक्षण आधारित पद्धति से आगे बढ़ सकें। इस विषय पर मैं आगे चर्चा करुँगा।

पिछले दशक के दौरान एक बहुत ही दिलचस्प नवोन्मेष सामने आया है जो परियोजना की पारिस्थितिकीय लागत का मूल्याँकन करना है। यह पहल जिसका पूरा श्रेय निश्चित ही सुप्रीम कोर्ट को जाता है। कैम्पा (Compensatory Afforestation Management and Planning Authority, CAMPA) नाम से प्रचलित अवधारणा है। कैम्पा क्षतिपूरक वनीकरण प्रबन्धन और योजना प्राधिकरण का संक्षिप्त नाम है जिसके लिये सुप्रीम कोर्ट ने 2002 में आदेश दिया था। इसके अनुसार गैर-वानिकी उद्देश्य से वन क्षेत्र का उपयोग करने पर सम्बन्धित पक्ष चाहे सरकार या निजी क्षेत्र से सम्बन्ध रखता हो, प्रति हेक्टेयर वन विनाश से पारिस्थितिकी को हुए नुकसान के मूल्य के समतुल्य रकम जमा कराएगा। पारिस्थितिकी के नुकसान का मूल्य निर्धारण कुल वर्तमान मूल्य (एनपीवी), क्षतिपूरक वनीकरण के लिये निर्धारित रकम और जलग्रहण क्षेत्र के विकास के लिये सौंपी गई योजना की लागत को मिलाकर किया जाएगा। इस तरीके का परिणाम अच्छा रहा और आज राज्य सरकारों के पास लगभग 11,000 करोड़ रूपए का कोष, प्राकृतिक वनों के पुर्नसृजन और पुर्नवनीकरण के लिये उपलब्ध है। इस फॉर्मूले की नियमित अन्तराल पर समीक्षा करने की भी आवश्यकता है जिससे यह वनभूमि के विचलन का मूल्य और उसके सही मूल्य को प्रतिबिम्बित कर सके। पर्यावरणीय लागत वाली दूसरी परियोजनाओं पर भी समान किस्म की शर्त लगाने की जरूरत है भले ही उनमें वनों का विचलन सम्मिलित नहीं हो।

‘हाँ लेकिन’ मामलों से अलग निश्चित ही ऐसे उदाहरण कमोवेश जरूर होंगे जब कठोरतापूर्वक ‘नहीं’ की आवश्यकता होगी। ऐसे मामले जिनके पेचीदा वैज्ञानिक, पारिस्थितिकीय और सामाजिक आयाम होंगे उनका निर्णय करने में परामर्श आधारित पारदर्शी ढंग को अपनाना होगा। यही वह चीज है जिसे हमने बीटी-बैंगन और ओडिशा में वेदांता खनन परियोजना के मामले में अपनाया, जहाँ मैंने व्यापक रूप से परामर्श किए और अपने निर्णय को बहुत ही विस्तृत रूप से सार्वजनिक किया। मैं दुविधाओं को स्पष्ट करने में विश्वास रखता हूँ भले वह कुछ लोगों को अरुचिकर लगे। एकदम यही, इंदिरा गाँधी ने करीब तीन दशक पहले पारिस्थितिकी के लिहाज से भारत के एक सर्वाधिक संवेदनशील क्षेत्र में साइलेंट वैली पनबिजली परियोजना के लिये निर्णायक ‘नहीं’ कहकर किया था। उनका ‘नहीं’ एकतरफा नहीं बल्कि असन्दिग्ध था।

समस्या का एक हिस्सा इस तथ्य से उत्पन्न होता है कि हमारे पास हरित लेखा (ग्रीन एकाउंटिंग) की व्यवस्था नहीं है। अर्थशास्त्री जीडीपी का आँकलन करते हैं जो सकल घरेलू उत्पाद के तौर पर राष्ट्रीय आय का एक व्यापक पैमाना है। वे एनडीपी या कुल घरेलू उत्पाद का आकलन भी करते हैं जो भौतिक पूंजी के उपयोग का हिसाब होता है। लेकिन अभी तक हमारे पास आमतौर पर स्वीकृत ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जो सकल घरेलू उत्पाद को हरित घरेलू उत्पाद में बदल सके जिससे राष्ट्रीय आय उत्पन्न करने की प्रक्रिया में कीमती प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग का पता चल सके। वर्षों पहले प्रमुख भारतीय पर्यावरणविद अनिल अग्रवाल ने आमतौर पर व्यवहृत सकल राष्ट्रीय उत्पाद (जीएनपी) की जगह सकल प्राकृतिक उत्पाद की अवधारणा का प्रयोग करने की वकालत की थी। समूची दुनिया के अर्थशास्त्री पिछले काफी समय से हरित राष्ट्रीय लेखा की एक मजबूत पद्धति विकसित करने में लगे हैं लेकिन हम अभी वहाँ नहीं पहुँच सके हैं। आदर्श रूप में अगर हम सकल घरेलू उत्पाद और हरित घरेलू उत्पाद दोनों का आकलन कर सकते तो हमारे सामने आर्थिक विकास की प्रक्रिया से जुड़ी दुविधाओं के बारे में अधिक साफ तस्वीर होती।

विकल्प के रूप में जैसाकि कुछ अर्थशास्त्री कहते हैं कि वास्तविक कुशलक्षेम में सुधार को मापने के लिये हमें वैकल्पिक सूचकों की आवश्यकता है। ऐसा इसलिये है कि हरित जीडीपी, टिकाऊपन या भविष्य में उपभोग में होने वाली बढ़ोतरी को मापने का सर्वोत्तम सूचक नहीं है। ‘वास्तविक बचत/निवेश’ और ‘वास्तविक सम्पदा प्रति व्यक्ति’ जैसे सूचकों को वैकल्पिक सूचक के तौर पर विकसित किया जा रहा है। हमें सटीक संख्या की आवश्यकता नहीं है। एक मोटा आँकलन भी ‘टिकाऊ विकास’ की अवधारणा को व्यावहारिक अर्थ देने में एक बड़ा कदम साबित होगा जिसके प्रति हम सभी सिद्धांत रूप में वचनबद्ध हैं।

‘‘टिकाऊ विकास’’ की परिभाषा संयोग से सबसे पहले भारतीय अर्थशास्त्री, नितिन देसाई द्वारा विश्व पर्यावरण और विकास आयोग की रिपोर्ट ‘हमारा साझा भविष्य’ में दिया गया था। इसे आमतौर पर नार्वे के तत्कालीन प्रधानमंत्री और आयोग के अध्यक्ष के नाम पर ‘ब्रंटलैंड रिपोर्ट’ (Brundtland Report) के नाम से जाना जाता है। परिभाषा बेहतरीन ढंग से स्पष्ट होने के साथ ही अमूर्त भी है। यह कहती है कि ‘‘टिकाऊ विकास” ऐसा विकास है जो वर्तमान की आवश्यकताओं को तो पूरा करता ही है, साथ ही भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता के साथ भी कोई समझौता नहीं करता।

पिछले कुछ महीनों में मैंने इस दिशा में काम आगे बढ़ाने का प्रयास किया है जिससे कम से कम 2015 तक हमारे पास हरित राष्ट्रीय लेखा की एक पद्धति हो। वास्तव में हम एकदम साफ स्लेट पर लिखना आरम्भ नहीं कर रहे। इस विषय में दुनिया के एक अग्रणी विद्वान प्रोफेसर सर पार्थ दासगुप्ता (कैंब्रिज यूनिवर्सिटी) ने इस बारे में काफी कुछ प्रकाशित किया है। नोबेल पुरस्कार विजेता केनेथ एैरो ने भी गणना की है कि भारत में वास्तविक घरेलू निवेश दर से पर्यावरणीय लागत का हिसाब लगाने पर 1970 से 2001 के कालखंड में लगभग वह 2.3 प्रतिशत प्वाइंट कम ठहरता है। वे आगे बताते हैं कि इस कालखंड में भारत का वार्षिक विकास दर अनुमानित प्रति व्यक्ति 2.96 प्रतिशत की बजाय प्रति व्यक्ति वास्तविक सम्पदा में वार्षिक वृद्धि अर्थात पर्यावरणीय लागत का हिसाब लगाने पर 0.31 प्रतिशत वार्षिक ठहरता है। ऐसे विश्लेषण से हमारी विकास-प्रक्रिया के पर्यावरणीय लागत को संख्या में बताने में सहायता मिलती है।

प्रोफेसर दासगुप्त के कामों के आधार पर विश्वबैंक ने एक पैमाना तैयार किया है जिसे ‘अडजस्टेड नेट सेविंग’ (Adjusted Net Saving) कहा जाता है। यह मानवीय पूंजी में निवेश, प्राकृतिक संसाधनों के नुकसान और प्रदूषण के कारण क्षति का ध्यान रखते हुए अर्थव्यवस्थाओं में बचत की ‘सच्ची’दर को मापता है। इसे अर्थव्यवस्था में वास्तविक सम्पत्ति निर्माण का सूचक और टिकाऊ विकास एवं उसकी क्षमता का पैमाना माना जाता है। समायोजित कुल बचत, विकास और पर्यावरण के बीच दुविधा को स्पष्ट करता है क्योंकि जो देश पर्यावरण की कीमत पर विकास को प्राथमिकता देना तय करते हैं, उनकी समायोजित कुल बचत दर कम होती है। एक उदाहरण के तौर पर विश्व बैंक के अनुसार भारत का सकल राष्ट्रीय बचत, जीडीपी के प्रतिशत के रूप में 2008 में 34.3 प्रतिशत था लेकिन इसका समायोजित कुल बचत उस वर्ष 24.2 प्रतिशत ही था। यह अन्तर प्राकृतिक संसाधनों में क्षति और प्रदूषण के कारण नुकसान की वजह से हुआ। इसके अतिरिक्त देश की पूंजीगत सम्पदा का मूल्याँकन करने में मुद्रास्फिति के परम्परागत मापन का भी योगदान रहा।

यह पर्यावरण को स्वच्छ हवा या बाघ संरक्षण जैसे कुलीन या उच्च मध्यवर्गीय मसला समझने की बजाय सार्वजनिक स्वास्थ्य का मसला समझने के बारे में है। आर्थिक विकास के मामले में भारत भले नई उंचाईयाँ प्राप्त कर रहा है पर यह अपनी आबादी के स्वास्थ्य की कीमत पर ऐसा नहीं कर सकता जो सबसे बड़ी सम्पदा है। ताजा रिपोर्ट बताते हैं कि भारत के विभिन्न हिस्सों के लोग हवा,पानी और औद्योगिक प्रदूषण की वजह से उत्पन्न स्वास्थ्यगत समस्याओं पर गम्भीर चिंता व्यक्त कर रहे हैं।

दूसरा बेहद दिलचस्प और मूल्यवान कार्य विभिन्न प्रकार के इकोसिस्टम के आर्थिक फायदों और उनके नुकसान से जुड़ी लागत का आकलन करना है जिसे पवन सुखदेव संयोजित कर रहे हैं। यह वैश्विक अध्ययन है जिसे ‘द इकोनॉमिक्स ऑफ इकोसिस्टम एंड बायोडायवर्सिटी’( The Economics of Ecosystem and Biodiversity टीईईबी) कहा जाता है। इसे संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम,जर्मनी सरकार, यूरोपीय संघ और दूसरे संस्थानों की सहायता प्राप्त है। अभी तक दो खंड प्रकाशित हो चुके हैं। भारत के लिये टीईईबी अध्ययन वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की सहायता से आरम्भ होने वाला है। यह दिखाएगा कि सम्पन्नता और गरीबी न्यूनीकरण क्यों इकोसिस्टम से फायदों का प्रवाह जारी रहने पर निर्भर करता है? क्यों जैव-विविधता का संरक्षण और प्रतिरक्षण विलासिता नहीं है बल्कि वास्तव में विकास परक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये भी अनिवार्य है। दिल्ली के ‘इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ’ (Institute of Economic Growth) के प्रोफेसर कंचन चोपड़ा के कार्यों ने कुल वर्तमान मूल्य की अवधारणा को स्थापित करने में सहायता की है।

मैं इस नई ‘दो संस्कृति’ की परिघटना का सामना करने के लिये एक अन्य तरीके का सुझाव दे रहा हूँ। यह पर्यावरण को स्वच्छ हवा या बाघ संरक्षण जैसे कुलीन या उच्च मध्यवर्गीय मसला समझने की बजाय सार्वजनिक स्वास्थ्य का मसला समझने के बारे में है। आर्थिक विकास के मामले में भारत भले नई उंचाईयाँ प्राप्त कर रहा है पर यह अपनी आबादी के स्वास्थ्य की कीमत पर ऐसा नहीं कर सकता जो सबसे बड़ी सम्पदा है। ताजा रिपोर्ट बताते हैं कि भारत के विभिन्न हिस्सों के लोग हवा,पानी और औद्योगिक प्रदूषण की वजह से उत्पन्न स्वास्थ्यगत समस्याओं पर गम्भीर चिंता व्यक्त कर रहे हैं। जलवायु परिवर्तन पहले से मौजूद गम्भीर सार्वजनिक स्वास्थ्य की समस्याओं को बढ़ाने वाला होगा। उद्योगों और वाहनों की संख्या में अभूतपूर्व बढ़ोतरी से लेकर रासायनिक कचरा और रिहायशी कचरे का नदियों में डाले जाने से सार्वजनिक स्वास्थ्य की तबाही पहले से जारी है। भारत में कैंसर और सांस सम्बन्धी बीमारियों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होने की सम्भावना है। पर्यावरण के क्षरण की वजह से अधिकांश शहरी भारत किसी न किसी रूप में विषाक्त स्वास्थ्यगत समस्या से ग्रस्त है।

अगर पर्यावरणीय नियंत्रण को सार्वजनिक स्वास्थ्य को संवर्द्धित करने वाले हस्तक्षेप के तौर पर देखा जाए तो मैं समझाता हूँ कि पर्यावरण बनाम विकास को लेकर यह कोलाहल का बहुत हद तक थम जाएगा। यही कारण है कि हाल में मैंने वन एवं पर्यावरण मंत्रालय, भारतीय आयुर्विज्ञान शोध परिषद और पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के बीच साझीदारी कायम करने की पहल की है। इस पहल के उद्देश्यों के केन्द्र में ‘पर्यावरणीय सार्वजनिक स्वास्थ्य’ को अकादमिक और व्यावहारिक विषय के रूप में विकसित करना और प्रशिक्षित पेशेवरों का नया संवर्ग तैयार करना है। एक औपचारिक अकादमिक विषय के रूप में ‘पर्यावरणीय सार्वजनिक स्वास्थ्य’ में विभिन्न विषय क्षेत्रों के ज्ञान और परिप्रेक्ष्य को समाहित होना चाहिए। इसमें लाइफसाइंस विशेषकर मानवीय जीवविज्ञान, प्रतिरक्षण विज्ञान, पारिस्थितिकी के अलावा परिमाणात्मक विज्ञान जैसे इपिडिमोलॉजी, बायोस्टैटिस्टिक्स, डेमोग्राफी और सामाजिक विज्ञान, ‘पर्यावरणीय स्वास्थ्य अर्थशास्त्र और नीति’ कचरा प्रबन्धन और पेशेगत स्वास्थ्य इत्यादि शामिल होंगे।

भारत में पर्यावरणीय संरक्षण का एक सर्वाधिक दृष्टिगोचर और सफल प्रयास प्रोजेक्ट टाइगर है जिसे इंदिरा गाँधी के नेतृत्व में अप्रैल 1973 में आरम्भ किया गया था। यह सही है कि आज देश के जंगलों में महज 1400-1600 बाघ बचे हैं। यह दुनिया भर के जंगलों में बचे बाघों की संख्या का लगभग आधा है। अब यह तर्क प्रबल हो रहा है कि इन प्रोजेक्ट टाइगर अभयारण्यों का संरक्षण इतनी तत्परता से क्यों की जाना चाहिए, जबकि वे हमारे कोयला भंडारों का इस्तेमाल करने में अड़चन बनते हैं। वहीं कोयले की जरूरत बढ़ती जनसंख्या के लिये बिजली पैदा करने में है। मेरी समझ में ‘‘ बाघों का संरक्षण बनाम नए कोयला खदानों की राह खोलने’’ की बहस में हम किसी निश्चित उत्तर पर नहीं पहुँच सकेंगे। लेकिन जब हम इस तथ्य को रेखांकित करेंगे कि 39 टाइगर प्रोजेक्ट संरक्षित वन हमारे कुल वन क्षेत्र का 5 प्रतिशत हिस्सा हैं और ये केवल बाघों का निवास स्थल हैं जैव-विविधता का क्षेत्र नहीं। साथ ही ये अनेक नदियों के उदगम स्थल हैं जो हमारी आजीविका के लिये बेहद महत्त्वपूर्ण हैं। इन तथ्यों पर गौर करते हुए मैं विश्वास करता हूँ कि यहाँ ‘दो संस्कृतियों’ के बीच की दूरी को पाटने की सम्भावना बनती है।

इसके बाद मैं आधुनिक समय की ‘दो संस्कृतियों’ की मूल प्रस्थापना की ओर लौटना चाहता हूँ। क्या सचमुच यह बहस,पर्यावरण बनाम विकास का है या यह नियमों, नियमावलियों और कानूनों का पालन करने बनाम नियमों, नियमावलियों और कानूनों को ठेंगे पर रखने का मामला है? मैं सोचता हूँ कि बाद वाला अधिक सटीक है और वास्तवकिता को प्रस्तुत करने का बेहतर ढंग है। जब कोई एलुमिना रिफाइनरी अपनी क्षमता को दस लाख टन प्रतिवर्ष से बढ़ाकर 60 लाख टन प्रतिवर्ष करने के लिये निर्माण आरम्भ करने में कानून के अनुसार पर्यावरणीय अनुमति लेने की परवाह नहीं करता, तो यह ‘पर्यावरण बनाम विकास’ का प्रश्न नहीं है। यहाँ प्रश्न यह है कि संसद द्वारा बनाए गए कानून का सम्मान किया जाएगा या नहीं? जब किसी डिस्टीलरी या कागज कारखाना या चीनी कारखाना को भारत की पवित्र नदियों में जहरीला कचरा छोड़ने की वजह से बन्दी की नोटिस दी जाती है तो यह ‘पर्यावरण बनाम विकास’ का प्रश्न नहीं बल्कि यह कानून द्वारा निर्धारित मानदंडों का कारगर ढंग से अनुपालन किया जाएगा या नहीं इसका प्रश्न है। जब कोई बिजली प्रकल्प संरक्षित इलाके से पानी लेना चाहता है या कोई कोयला खदान किसी टाइगर रिजर्व के बफर जोन में खनन आरम्भ करना चाहता है, दोनों काम कानून के विपरीत हैं तो यह ‘पर्यावरण बनाम विकास’ का प्रश्न नहीं है बल्कि कानून का पालन किये जाने अथवा नहीं किये जाने का प्रश्न है।

भारत, इस मामले में भाग्यशाली है कि उसके पास अपनी पारिस्थितिकी की सुरक्षा करने के लिये मजबूत व प्रगतिशील कानून हैं। वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम (Wildlife Conservation Act) 1972, जल अधिनियम (Water Act) 1974 , वन (संरक्षण) अधिनियम (Forest Conservation Act) 1980, वायु अधिनियम (Air Act)1981, पर्यावरण(संरक्षण) अधिनियम (Environment Protection Act) 1986 और सबसे नया वनाधिकार कानून (Forest Rights Act) 2006 सभी काफी विचार विमर्श के बाद संसद द्वारा पारित हुए हैं। देश के सामने बहुत ही सरल प्रश्न है क्या ये कानून लागू किये जाने हैं या ये कानून की किताबों की शोभा बढ़ने के लिये बनाए गये हैं क्योंकि इनके अनुपालन की बजाय इनके उल्लंघन में अधिक दिलचस्पी है। यह लार्ड स्नो के कथन को भारतीय परिप्रेक्ष्य में प्रस्थापित करने का अधिक बौद्धिक रूप से ईमानदार ढंग है।

मुझे कहना है कि काफी लम्बे समय से हम इन कानूनों और उनके अनुशासन को मामूली ढंग से लेते रहे हैं। उद्योगों ने भी मान लिया कि इन कानूनों को किसी तरह से तोडा-मरोड़ा जा सकता है। सरकार ने भी जोर नहीं दिया कि इन कानूनों को शब्दों और भावना दोनों तरह से लागू किया जाए। अब हम निर्णायक स्थिति में पहुँच गए हैं जहाँ इसके निष्पादन को अधिक टाला नहीं जा सकता। गोपाल गाँधी ने इसे अपने अनोखे ढंग से हाल में मेरे सामने रखा कि चालबाजी के रोमाँच को अब निश्चित तौर से अनुपालन के आनंद से बदल देने जरूरत है।

वास्तव में नियमावलियों को जिस ढंग से लागू किया जाता है उस पर पुनर्विचार करने की जरूरत को स्वीकार करने वाला पहला व्यक्ति मैं होउंगा। हम प्रायः यह मान लेते हैं कि कठोर निमयमावलियों का मतलब उन्हें लागू करने वालों की एक लम्बी फ़ौज। इससे जायज भय जुड़ा होता है जिसे अर्थशास्त्री ‘सुविधा शुल्क’ कहते हैं या आम लोग ‘परेशान करना या भ्रष्टाचार’ कहते हैं। यह सही है कि सूचना के अधिकार (आरटीआई) से सार्वजनिक एजेंसियों में जबाबदेही का भाव कई गुना बढ़ा है लेकिन यह पर्याप्त नहीं हैं। इसीलिये मैं कहता रहा हूँ कि हमें नियमावलियों को लागू करने के लिये बाजार-हितैषी उपायों के बारे में सोचना चाहिए।

अगर आप 1970 के दौरान अमेरिका में अम्लीय वर्षा की समस्या से निपटने के तरीकों पर गौर करेंगे तो देखेंगे कि अमेरिकी एन्वायरमेंटल प्रोटेक्शन एजेंसी (Environmental Protection Agency ईपीए) ने मानदंड स्थापित किए और उत्सर्जन व्यापार प्रणाली की सफलता सुनिश्चित की। इस प्रणाली की विशेषता थी इसका काफी सस्ता होना। हाल में मैंने मेसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (Massachusetts Institute of Technology एमआईटी) और हॉवर्ड के चार अग्रणी अर्थशास्त्रियों को हमारे लिये बाजार आधारित प्रणाली की रूपरेखा बनाने के लिये आमंत्रित किया जिससे वायु गुणवत्ता मानदंडों को अधिक कारगर ढंग से लागू किया जा सके। इस टीम ने एक अवधारणा पत्र तैयार किया जो हमारी वेबसाइट पर उपलब्ध है। टीम द्वारा तैयार किये गए मानदंडों के आधार पर तमिलनाडु एवं गुजरात में हम पायलट प्रोजेक्ट आरम्भ करने जा रहे हैं। ऐसे नए प्रयोगों की सफलता के लिये ऑनलाइन निगरानी निश्चित तौर पर एक महत्त्वपूर्ण शर्त है।

मैं स्वयं पर्यावरणीय शासन विधि को बेहतर बनाने के लिये भी सचेत रहा हूँ ताकि विश्वसनीयता और शुद्धता में वृद्धि हो। इसका नयी ‘दो संस्कृतियों’ के बीच के अन्तर को पाटने में दीर्घकालीन प्रभाव होगा। संसद ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल एक्ट 2010 (National Green Tribunal Act ) को पारित कर दिया है और विशेषज्ञ अदालतों का यह नेटवर्क जल्दी की कार्यरत हो जाएगा। अब हम नेशनल एनवायरनमेंट प्रोटेक्शन ऑथोरिटी (National Environment Protection Authority) (एनईपीए) की स्थापना को अन्तिम रूप दे रहे हैं जो परियोजनाओं का मूल्याँकन करने और अनुपालन की निगरानी करने की स्थाई पेशेवर संस्था होगी। अभी मूल्याँकन तदर्थ विशेषज्ञ समिति द्वारा किया जाता है जो हितों के टकराव जैसे अनेक मामलों से ग्रस्त है। एनईपीए हमारे पर्यावरणीय मूल्याँकन और निगरानी व्यवस्था में फोकस, वस्तुनिष्ठता और पेशेवराना ढंग लाएगा।

मेरे मन में कोई सन्देह नहीं है कि भारत को कम से कम दो-तीन दशकों के लिये उच्च विकास की टेढ़ी राह पर टिके रहने की आवश्यकता है। यह हमारे अनिवार्य सामाजिक लक्ष्यों और प्रमुख रणनीतिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिये नितांत आवश्यक है। इसके साथ ही किसी भी कीमत पर विकास पहले और पर्यावरण बाद में का तरीका स्पष्टतः अस्वीकार्य है। भारत को उन सभी क्षेत्रों के विकास पर जोर देने की आवश्यकता है जिसे वह आधुनिक विज्ञान और तकनीक प्रदान करता है। साथ ही यह विचार कि हम तकनीकी जंजालों को उनके व्यापक पारिस्थितिकीय परिणामों की परवाह किए बगैर और सामाजिक मसलों को सुलझाए बगैर थोप सकते हैं, इसे जारी नहीं रखा जा सकता है। यह और भी मुश्किल हो जाता है जब लोग उसे तर्क के साथ खारिज करें। अनियमित विकास का सबसे ज्यादा प्रभाव समाज में आर्थिक रूप से कमजोर लोगों पर पड़ता है। यह पर्यावरण बनाम विकास के बहस को एकदम नया आयाम प्रदान कर रहा है। वास्तव में यह एक तरीके से प्रतिपादित बहस को अतिरंजित करता है। सुनीता नारायण इसे सही ढंग से रखती हैं जब वे कहती हैं कि भारत का पर्यावरणीय आन्दोलन दरअसल विरोधाभासों और जटिलताओं का प्रबन्धन करना है। मैं इसमें टकराव को भी जोड़ूंगा। सुनीता नारायण के अनुसार यह गरीबों का पर्यावरणवाद है। वहीं मैं इसे दूसरे शब्दों में आजीविका का पर्यावरणवाद कहता हूँ। सुविधाप्राप्त तबकों की जीवनशैली पर्यावरणवाद के विपरीत है। यह राष्ट्रीय परिदृष्य में पहलीबार 1970 के दशक में उत्तराखंड की पहाड़ियों में चिपको आन्दोलन के जन्म और विकास के रूप में प्रकट हुआ। महिलाएँ स्थानीय संसाधनों के उपयोग पर स्थानीय समुदायों के अधिकार का दावा कर रही थी। ऐसी दावेदारियाँ आज देश के विभिन्न हिस्सों में दिखती हैं। हम ऐसी दावेदारियों का गलत अर्थ लगाते हैं और समझते हैं कि वे विकास और पर्यावरण के बीच का विवाद हैं जबकि वास्तव में वो आजीविका सुरक्षा के मौलिक अधिकार को स्थापित करने के बारे में होती हैं। साथ ही ये विकास की प्रकृति को निर्धारित करने के मौलिक अधिकार के बारे में होती हैं जो गरीबों के दैनिक जीवन को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर देती हैं। ऐसी दावेदारियाँ समाज के विभिन्न वर्गों की रस्साकशी के बीच फंसे लोकतंत्र और उससे उत्पन्न सशक्तिकरण की पैदाइश भी हैं जिसके साथ विकास रूढ़िवादी और असहज होते हैं। टिकाऊ विकास जिसे हमेशा याद रखने की जरूरत है वह राजनीति और स्थानीय समुदायों की हिस्सेदारी से उतना ही सम्बन्धित है जितना नवाचारों और नई तकनीकों से। अपनी नई पुस्तक में प्रमुख भारतीय अर्थशास्त्री बीना अग्रवाल ने हरित क्रांति से जुड़े स्थानीय संस्थानों में महिलाओं की केन्द्रीय उपस्थिति और हिस्सेदारी को रेखांकित किया है जो टिकाऊ विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये अनिवार्य है।

मैं अब इस व्याख्यान के अन्त में आता हूँ। कृपया अन्त भी उसी तरह करने दें, जैसे कि मैंने आरम्भ किया था स्व. सतीश धवन को याद करते हुए। उनका अकादमिक जीवन त्रुटिहीन था। वे आधुनिकता से ओत-प्रोत थे। फिर भी वे उस व्यापक सामाजिक सन्दर्भों से कभी बेपरवाह नहीं हुए। यही वह उत्साह है जिसे हमें फिर से हासिल करने की जरूरत है। यह उत्साह विषयों की सीमा को लांघकर लोगों के प्रति वचनबद्धता,अनुशासन और विनम्रता का है। अगर हम दो संस्कृतियों के बीच दूरी पाटना चाहते हैं तो यह वचनबद्धता अनिवार्य है। मैंने पहले ही दोनों पक्षों के बीच संवाद भंग होने के बारे में चर्चा की है। इसे मैंने बहुत ही सजीव ढंग से सार्वजनिक परामर्शों के दौरान देखा जिसे मैंने बीटी-बैंगन के बारे में आयोजित किया था। संयोग से यह दूरी दो महानगरों में अत्यधिक मुखर थी जो स्वयं को नये इंडिया का वैज्ञानिक और तकनीकी चेहरा होने का दावा करते हैं। उनके नाम हैं बंगलोर और हैदराबाद। यहाँ विशेष तौर से और दूसरे महानगरों में भी मैंने पाया कि वैज्ञानिक समुदाय उस भाषा और मुहावरों में संवाद करने में सक्षम नहीं है जिसे व्यापक जनसमुदाय समझता है। लोकतंत्र का अर्थ ही व्याख्या करना, औचित्य बताना, आम सहमति तक पहुँचना, लोगों को अपने साथ एक मेज पर लाना और समझौते करने की आवश्यकता है। जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवाँस साइंटिफिक रिसर्च (Jawaharlal Nehru Centre for Advance Scientific Research) (जेएनसीएएसआर) में बोलते हुए और उस व्यक्ति के संस्मरणों को याद करते हुए मैं वैज्ञानिक समुदाय के साथ ही विकास के अन्धविश्वासी समुदाय, दोनों से अनुरोध करुंगा कि उन्हें इस मामले में विशेष भूमिका निभानी है। उन्हें व्यापक जन समुदाय को अधिक आत्मीयता के साथ जोड़ने की जरूरत है। मैं समझता हैं कि मैं इंदिरा गाँधी के प्रसिद्ध भाषण को उद्धृत कर अपनी बात को बेहतर ढंग से रख सकता हूँ जो उन्होंने मानवीय पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में 13 जून 1972 को दिया था। उस भाषण की एक पंक्ति का आज भी बड़े पैमाने पर प्रयोग होता है -- ‘‘गरीबी सबसे खराब प्रदूषणकारी है’’। यह पंक्ति प्रसिद्ध हो गई, जबकि वास्तव में उन्होंने अधिक नएपन के साथ कहा था ‘क्या गरीबी नहीं, बड़े प्रदूषणकारी आवश्यक हैं?’ उस अत्यंत प्रभावशाली भाषण में उन्होंने यह भी कहा था जो उस सन्देश का सारतत्व है, ‘जन्मजात विरोध विकास और संरक्षण के बीच नहीं बल्कि पर्यावरण और कुशलता के नाम पर मनुष्य एवं धरती का निर्विचार शोषण के बीच है।’

ओडिशा के कालाहांडी और रायगडा जिलों में नियमगिरी पहाड़ियों पर बॉक्साइट खनन के लिये वनक्षेत्र का विचलन करने के बारे में ‘ओडिशा माइनिंग कारपोरेशन लिमिटेड’ के प्रस्ताव को नामंजूर करते हुए मुखर आदेश। (खनन से प्राप्त बॉक्साइट का इस्तेमाल वेदांता के अल्यूमिना रिफाइनरी, लांजिगढ़ में खासतौर से होना था जो नियमगिरी पहाड़ी की तलहटी में स्थित है)

संक्षिप्त पृष्ठभूमि

ओडिशा सरकार ने 28 फरवरी 2005 को बॉक्साइट अयस्क का खनन करने के लिये कालाहांडी और रायगडा जिलों में 660.749 हेक्टेयर वनभूमि का विचलन ओडिशा माइनिंग कारपोरेशन (ओएमसी) के पक्ष में करने की अनुमति देने के प्रस्ताव को आगे बढ़ाया।

वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की वन सलाहकार समिति (Forest Advisory Committee) (एफएसी) ने उसके बाद तीन बैठकें करने के बाद 27 अक्टूबर 2007 को ‘सैद्धांतिक’ तौर पर अनुमोदन करने की सिफारिश की। लेकिन इसके साथ ही एफएसी ने कई शर्तें भी लगायी जैसे समरूप भूमिसुधार, पेड़ों की चरणबद्ध ढंग से न्यूनतम कटाई, संशोधित वन्यजीव प्रबन्धन योजना इत्यादि।

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 23 नवंबर 2007 को निर्णय दिया। अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने कतिपय शर्तें लगाते हुए आदेश दिया कि कम्पनी इन्हें वन अनुमति मिलने के पहले पूरा करेगी। एक शर्त थी कि स्टरलाइट (एसआईआईसी) या ओएमसी को परियोजना के कार्यान्वयन का जिम्मा दिया जाएगा और वेदांता को किसी भी रूप में इसमें सम्मिलित नहीं किया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने 8 अगस्त 2008 को दूसरा निर्णय दिया जिसमें उसने कहा कि उपरोक्त कारणों से और एसआईआईसी द्वारा दाखिल हलफनामें को देखते हुए ओएमसीएल और ओडिशा सरकार द्वारा हमारे 23 नवंबर 2007 को दिए गए निर्णय में शामिल पुनर्वास पैकेज को स्वीकार कर लिया गया है। इसे देखते हुए अब हम बॉक्साइड खनन करने के लिये नियमगिरी पहाड़ी के लांजिगढ़ में 660.749 हेक्टेयर वन भूमि के विचलन की अनुमति प्रदान करते हैं। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के लिये अगला कदम कानून के मुताबिक अनुमोदन प्रदान करना होगा।

इसके बाद वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने औपचारिक रूप से 11 दिसम्बर 2008 को राज्य सरकार को सैद्धांतिक अनुमोदन प्रदान कर दिया। उसने यह उल्लेख भी किया कि सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल इंपावरमेंट कमिटी (Central Empowerment Committee) ने इस परियोजना के बारे में अपनी रिपोर्ट 21 सितम्बर 2005 को सौंपी थी। उसकी राय थी कि वनभूमि के विचलन की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। उसने यह भी सिफारिश की थी कि वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा अल्युमिना रिफाइनरी प्रकल्प के लिये 22 सितम्बर 2004 को दी गई पर्यावरणीय अनुमति रद्द कर दी जाए और सभी कार्य रोक दिए जाएँ।

चरण-2 वन एवं पर्यावरण मंत्रालय में परीक्षण

राज्य सरकार ने 10 अगस्त 2009 को अन्तिम अनुमति के लिये वन एवं पर्यावरण मंत्रालय में आवेदन दिया। एफएसी ने 4 नवंबर 2009 को इस मामले पर विचार किया। इस बैठक में एफएसी ने सिफारिश किया कि अन्तिम अनुमति के बारे में वनभूमि पर सामुदायिक वनाधिकार का निश्चय हो जाने के बाद विचार किया जाना चाहिए। इन अधिकारों को वनाधिकार कानून 2006 (एफआरए) के नाम से जाना जाता है। एफएसी ने स्थल निरीक्षण करने के लिये एक विशेषज्ञ समूह का गठन करने का फैसला लिया। जिसके बाद एक जनवरी 2010 को तीन सदस्यीय समिति का गठन किया गया जिसमें डॉ उषा रामानाथन (जनजातीय मसलों की जानी-मानी विशेषज्ञ), विनोद ऋषि (पूर्व निदेशक प्रोजेक्ट एलिफैंट) और जेके तिवारी (क्षेत्रीय वन-संरक्षक,भुवनेश्वर) शामिल थे। इस समिति को ओएमसी द्वारा दिए गए प्रस्ताव पर विचार करना था और वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के पास सिफारिश करनी थी। समिति ने जनवरी- फरवरी 2010 के दौरान स्थल निरीक्षण किया और 25 फरवरी को वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को तीन रिपोर्टें सौंपी। इनमें जमीनी स्तर की मूल्यवान जानकारी, अनेक मुद्दों पर विस्तृत जाँच-पड़ताल के साथ ही विभिन्न प्रासंगिक मसलों को समन्वित ढंग से देखने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया था।

एफएसी ने रिपोर्टों पर विचार करने के लिये 16 अप्रैल 2010 को बैठक करने के बाद सिफारिश किया कि आदिवासी अधिकारों की अवहेलना से जुडे़ मसलों और एफआरए 2006 के अन्तर्गत वनाधिकारों के निपटारे को देखने के लिये आदिवासी मामलों के मंत्रालय द्वारा विशेष समिति का गठन किया जाए।

इस प्रकार 29 जून 2010 को वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की प्राथमिक जिम्मेवारी और दायित्व का ध्यान रखते हुए आदिवासी मामलों के मंत्रालय के साथ मिलकर 13 अप्रैल 2010 को एक समिति का गठन किया गया। समिति का काम वनाधिकार कानून 2006 के कार्यान्वयन से जुड़े मसलों को देखने का था। मैंने विशेषज्ञों की एक अन्य समिति का गठन करने का भी फैसला लिया। इस समिति को वनवासी समुदायों और आदिम जनजाति समूहों ( Primitive Tribal Groups,पीजीटी) के वनाधिकार कानून 2006 अन्तर्गत अधिकारों का निपटारा तथा आसपास के वन्यजीवों और जैवविविधता पर प्रभाव को देखने का जिम्मा सौंपा गया। इस समिति में डॉ. एनसी सक्सेना, डॉ. अमिता बाविस्कर, डॉ. प्रमोद कांत और डॉ. एस परशुरामन (सभी विशुद्ध पेशेवर के तौर पर जाने जाते हैं) को शामिल किया गया। डॉ. एनसी सक्सेना वनाधिकार कानून 2006 के कार्यान्वयन और प्रभावों का आँकलन करने वाली ‘वन एवं पर्यावरण मंत्रालय’ और ‘आदिवासी मामलों के मंत्रालय’ की संयुक्त समिति के अध्यक्ष भी हैं। डॉ.बाविस्कर एफएसी की सदस्य भी हैं। इस समिति की कार्यसूची इस तरह तैयार की गई कि अध्ययन सम्पूर्णता में हो सके,न की टूकडों में। समिति ने अपनी रिपोर्ट 16 अगस्त 2010 को वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को सौंपा जिसे तत्काल मंत्रालय की वेबसाइट पर डाल दिया गया।

सक्सेना समिति के प्रमुख निष्कर्ष

मैं यहाँ सक्सेना समिति के मुख्य निष्कर्षों का उल्लेख करना चाहता हूँ जो दूसरे चरण की अनुमति देने या नहीं देने के निर्णय पर प्रभावी होगा।

खनन का पारिस्थितिकीय लागत

इस परियोजना में प्रस्तावित तीव्रता की खनन गतिविधियाँ सात वर्ग किलोमीटर से अधिक इलाके में फैली हैं जो इस महत्त्वपूर्ण वन्यजीव वासस्थल को गम्भीर रूप से अशांत करेगा।

खनन के लिये 1 लाख 21 हजार से अधिक पेड़ काटने होंगे।

इसके अलावा कई लाख झाड़ियाँ और जड़ी-बुटी के पौधे नष्ट होंगे।

प्रस्तावित खनन पट्टा (Proposed Mining Lease, पीएमएल) क्षेत्र में खनन से जंगल के मूल्यवान घास के मैदान नष्ट हो जायेंगें और जिससे वन्यजीवों पर बुरा प्रभाव पड़ेगा।

घास के मैदान चार सिघों वाले हिरणों, बार्किंग डीयर और स्पॉटेड डीयर के प्रजनन और भरण-पोषण के क्षेत्र हैं। एक विलुप्तप्राय गिरगिट, सुनहरी छिपकिली प्रस्तावित पट्टा क्षेत्र में पायी जाती हैं। अगर खनन की अनुमति दी जाती है तो इन सभी प्रजातियों की आबादी घट जाएगी।

नियमगिरी पहाड़ी के जंगलों का मूल्य, हाथी के महत्त्वपूर्ण वासस्थल के रूप में स्थापित है। इसे दक्षिण ओडिशा हाथी संरक्षित क्षेत्र में शामिल किया गया है। इस वासस्थल में प्रस्तावित पैमाने पर खनन का हाथियों के बसाव पर गम्भीर प्रभाव होगा और दक्षिण ओडिशा में हाथियों के संरक्षण के कार्य पर संकट आ जाएगा।

प्रस्तावित पट्टा क्षेत्र में खनन गतिविधियों के साथ नियमगिरी पहाड़ी के शिखर पर सात वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र को वन विहीन बना दिया जाएगा जो इस क्षेत्र की जलापूर्ति प्रणाली को जबरदस्त रूप प्रभावित करेगा।इस स्थिति में इलाके में रहने वाले लोगों को जल की कमी से जूझना पड़ेगा।

आदिम जनजातीय समूह के दावों को कानून की उचित प्रक्रिया का पालन किए बगैर जिला या अनुमंडल समितियों द्वारा हतोत्साहित और इनकार करना गैरकानूनी है।राज्य सरकार ने वनाधिकार कानून के प्रावधानों का पालन नहीं किया है जिससे कोंढ़ आदिम जनजातीय समूहों के न्यायसंगत और पूरी तरह स्थापित अधिकारों की अवहेलना की जा रही है। इस तरह वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के पास केवल एक उपाय बचा है कि वन संरक्षण कानून के अन्तर्गत उपरोक्त इलाके के लिये दी गई पहले चरण की अनुमति को वापस ले ले

खनन का मानवीय लागत

पीएमएल क्षेत्र अट्ठाईस कोंढ़ गाँवों के 5148 निवासियों के साथ आर्थिक,धार्मिक और सांस्कृतिक सम्बन्धों के माध्यम से जुड़ा है।प्रभावित लोगों में लगभग 1,453 डोंगरिया कोंढ़ के हैं जो इस आदिवासी समुदाय की कुल आबादी के 20 प्रतिशत है।

अगर खनन से डोंगरिया कोंढ़ आबादी के पाँचवें हिस्से का आर्थिक,सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हो रहा है, तो यह समूचे समुदाय के कुशलक्षेम को संकटग्रस्त करेगा।

चूँकि डोंगरिया और कुटिया कोंढ़ अपनी आजीविका के लिये वनउत्पादों पर अत्यधिक निर्भर हैं। वनाच्छादन में होने वाला नुकसान उनकी आर्थिक अवस्था को नकारात्मक रूप से प्रभावित करेगा।

भूमिहीन दलित जो इन गाँवों में रहते हैं जो कोंढ़ लोगों पर निर्भर हैं वे भी समान रूप से प्रभावित होंगे। जमीन जिसपर डोगरिया कोंढ़ खेती करते हैं, पीएमएल क्षेत्र के काफी नजदीक है। खनन से जुड़ी गतिविधियाँ जैसे पेड़ों को काटना, विस्फोट करना, मिट्टी हटाना, सड़क बनाना और भारी मशीनों की आवाजाही की वजह से वे अपनी जमीन पर नहीं जा सकेंगे जिसका इस्तेमाल वे पीढ़ियों से करते रहे हैं।

इन गतिविधियों का आसपास की ढाल और झरनों पर भी बुरा प्रभाव पड़ेगा जो उनकी खेती के लिये महत्त्वपूर्ण होते हैं।

वनाधिकार कानून का उल्लंघन

यह बिना किसी सन्देह के स्थापित है कि खनन के लिये प्रस्तावित ये इलाके और आसपास के घने जंगल आदिम आदिवासी समूह ‘कोंढ़’ के सांस्कृतिक, धार्मिक और आर्थिक वासस्थल हैं। आदिम जनजातीय समूह के दावों को कानून की उचित प्रक्रिया का पालन किए बगैर जिला या अनुमंडल समितियों द्वारा हतोत्साहित और इनकार करना गैरकानूनी है।राज्य सरकार ने वनाधिकार कानून के प्रावधानों का पालन नहीं किया है जिससे कोंढ़ आदिम जनजातीय समूहों के न्यायसंगत और पूरी तरह स्थापित अधिकारों की अवहेलना की जा रही है। इस तरह वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के पास केवल एक उपाय बचा है कि वन संरक्षण कानून के अन्तर्गत उपरोक्त इलाके के लिये दी गई पहले चरण की अनुमति को वापस ले ले।

समिति द्वारा एकत्र साक्ष्यों के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि ओड़िशा सरकार द्वारा पीएमएल इलाके में वनाधिकार कानून का निष्पक्ष और न्यायपूर्ण ढंग से कार्यान्वयन नहीं हो सकता। चूकिं,यह झूठे प्रमाणपत्रों को अग्रसारित करने के हद तक चली गई है इसीलिये वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के लिये उचित यही होगा कि ओडिशा सरकार की दलीलों को बिना स्वतंत्र छानबीन के स्वीकार नहीं करे। इस काम के लिये भारत सरकार को एक विश्वसनीय और पेशेवर प्राधिकार को नियुक्त करना चाहिए जो पीएमएल इलाके में सामुदायिक अधिकारों का दावा राज्य प्रशासन के सामने प्रस्तुत करने में लोगों की सहायता करे।

संक्षेप में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय वनभूमि के उपयोग की अनुमति नहीं दे सकता जबतक कि

(क.) वनाधिकार कानून के अन्तर्गत अधिकारों को मान्यता देने की प्रक्रिया सन्तोषजनक न हो।

(ख.) सम्बन्धित समुदाय की सहमति मिल गई हो।

(ग.) दोनों बिन्दुओं को इलाके की ग्रामसभा ने प्रमाणित कर दिया हो (अनुसूचित इलाका होने पर उसे निश्चित तौर पर टोला की ग्रामसभा होना चाहिए)

इन सभी शर्तों को एक साथ पूरा किया जाना चाहिए। किसी एक या दो को नहीं। दूसरे शब्दों में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के 3 अगस्त 2009 के निर्देश में कहा कि इन शर्तों का पालन शब्दशः किया जाना चाहिए।

अगर इस स्थल पर खनन की अनुमति दी जाती है तो न केवल गैरकानूनी होगा बल्कि

(क) कोंढ़ आदिम जनजातीय समुदाय का एक सबसे पवित्र स्थल नष्ट हो जाएगा।

(ख) पहाड़ी के शिखर पर सात वर्ग किलोमीटर से अधिक वनभूमि नष्ट हो जाएगी, जिसकी डोंगरिया कोंढ़ समुदाय ने सदियों से ‘नियमराजा के पवित्र स्थान’ के रूप में सुरक्षित रखा है।इस वनभूमि को सुरक्षित रखना इलाके की उर्वरता के लिये अनिवार्य है।

(ग) इससे आदिम जनजातीय समुदाय की वन आधारित आजीविका संकट आ जाएगी।

(घ) सैकड़ों दलित परिवारों की आजीविका को गम्भीर रूप से नुकसान पहुँचेगा जो परोक्ष रूप से इस जमीन पर निर्भर करते हैं क्योंकि इन आदिम जनजातीय समुदायों से उनका आर्थिक सम्बन्ध है।

(च.) डोंगरिया कोंढ़ इलाके से सड़कों का निर्माण होने से वन्यजीवों के शिकारी और लकड़ी तस्करों की पहुँच इस इलाके में आसानी से हो जाएगी जिससे पहाड़ी की समृद्ध जैवविविधता खतरे में पड़ जाएगी।

वन संरक्षण अधिनियम का उल्लंघन

26.123 हेक्टेयर ग्रामीण वनभूमि पर कम्पनी ने गैरकानूनी कब्ज़ा जमा रखा है जो कारखाने के परिसर से घिरा है। कम्पनी द्वारा दावा किया गया है कि उसने केवल राज्य सरकार के आदेशों का पालन किया है और कारखाने के परिसर में पड़ने वाली वनभूमि को सुरक्षा के लिहाज से घेर दिया है। उसने यह भी दावा किया कि वनभूमि के साथ ही आदिवासियों एवं दूसरे ग्रामीणों की आवाजाही पर कोई रोक नहीं लगाई गयी है। हालांकि उसका यह दावा पूरी तरह झूठा है और यह पूरी तरह से कानून की अवहेलना है। इससे कम्पनी और सम्बन्धित अधिकारियों में साँठ-गाँठ की बू भी आती है। निर्धारित मार्ग के समानांतर सड़क बनाने के लिये कम्पनी ने गैरकानूनी ढंग से गाँव की वनभूमि की प्लाट संख्या ‘157 पी’ से एक एकड़ और प्लाट संख्या ‘133’ से 0.11 एकड़ भूमि पर कब्जा जमा लिया है। यह काम भी गैरकानूनी किस्म का ही है, भले इसमें शामिल जमीन काफी कम है।

पर्यावरण प्रतिरक्षण अधिनियम का उल्लंघन

कम्पनी, मेसर्स वेदांता अल्यूमिना लिमिटेड ने अपनी विस्तार योजना के अन्तर्गत निर्माण गतिविधियों को बिना पर्यावरणीय अनुमति प्राप्त किए ही आरम्भ कर दिया है। इस विस्तार से इसकी उत्पादन क्षमता एक एमटीपीए (मिलियन टन प्रति वर्ष) से बढ़कर छह एमटीपीए हो जाएगी। यह निर्माण पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 (एनवायरनमेंट प्रोटेक्शन एक्ट, ईपीए) के प्रावधानों का गम्भीर उल्लंघन है। कम्पनी के इस रवैये से यह साफ़ है कि इस देश के कानून के प्रति उसका व्यवहार बिल्कुल गैर-जिम्मेदाराना किस्म का है।

रिफाइनरी को मिली अनुमति की शर्तों का उल्लंघन

रिफाइनरी को पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के अन्तर्गत अनुमति इस शर्त पर मिली थी कि उसकी स्थापना में किसी वनभूमि का उपयोग नहीं किया जाएगा। लेकिन,अब स्पष्ट है कि कम्पनी ने रिफाइनरी की चाहरदिवारी के भीतर गाँव की 26.123 हेक्टेयर वनभूमि पर अधिकारियों के सांठ-गाँठ से कब्जा कर लिया है। इस प्रकार कम्पनी को रिफाइनरी लगाने के लिये दी गई पर्यावरणीय अनुमति कानूनी तौर पर अमान्य हो गई और निरस्त हो जाएगी।

विस्तारित रिफाइनरी की बेहद सीमित प्रासंगिकता

पीएमएल स्थल पर खनन के विस्तार में लगी रिफाइनरी की उपयोगिता बहुत ही सीमित होगी क्योंकि बढ़ी हुई जरूरत को पूरा करने में यहाँ जमा 72 एमटी अयस्क नाकाफी साबित होंगे। एक अनुमान के मुताबिक ब-मुश्किल से चार साल ही चल पाएँगे। अयस्क का खनन इन जंगलों के निवासी आदिम आदिवासी समुदाय, पर्यावरण, वन और वन्यजीवों को गम्भीर नुकसान पहुँचाएगा।

सक्सेना समिति के निष्कर्षों का निचोड़

उपरोक्त समस्याओं को देखते हुए समिति की स्पष्ट राय खनन पट्टा के पक्ष नहीं था। समिति का मानना था कि दो आदिम आदिवासी समूहों को उनके अधिकारों से वंचित कर खनन पट्टा क्षेत्र में खनन की इजाजत देना देश की कानून व्यवस्था से आदिवासियों के भरोसे को डिगा देगा। चूँकि, सम्बन्धित कम्पनी ने बार-बार कानून का उल्लंघन किया है अतः उसे कुटिया और डोंगरिया कोंढ़ आदिवासियों के अधिकारों की कीमत पर प्रस्तावित खनन क्षेत्र में प्रवेश की इजाजत देने का परिणाम देश की सेहत के लिये अच्छा नहीं होगा।

17 अगस्त 2010 को राज्य सरकार ने सक्सेना समिति द्वारा की गयी शिकायतों के मद्देनज़र वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को लिखा और समिति की रिपोर्ट पर कोई फैसला लेने के पहले उसके पक्ष को सुनने का अवसर देने का अनुरोध किया। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा इस पत्र की एक प्रति समिति के सदस्यों को भेजी गयी ताकि वे आरोपों का उत्तर दे सकें। डॉ. एनसी सक्सेना ने 23 अगस्त 2010 को उत्तर दिया।4 उन्होंने कहा कि समिति के सभी निष्कर्ष राज्य सरकार के अधिकारियों के साथ सीधी बातचीत पर आधारित हैं।

ओडिशा के मुख्यमंत्री और राज्य सरकार के अधिकारियों की बैठक

23 अगस्त 2010 को ओडिशा के मुख्यमंत्री और राज्य के प्रधान सचिव के साथ मेरी मुलाकात नई दिल्ली में हुई। मुख्यमंत्री ने मुझे बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने इस बारे में पहले ही कुछ शर्तों के साथ ‘सैद्धांतिक’ अनुमोदन प्रदान कर दिया है। राज्य सरकार ने पहले ही उन शर्तों को पूरा कर दिया है इसलिये अब वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा अन्तिम अनुमोदन प्रदान किया जाए। उसके बाद 24 अगस्त 2010 को मैं ओडिशा सरकार के अधिकारियों के प्रतिनिधिमंडल से मिला जिन्होंने मुख्यमंत्री द्वारा उठाए मुद्दों पर जोर दिया। इसके अतिरिक्त पाँच खास मुद्दों पर सक्सेना समिति की रिपोर्ट को चुनौती दी- 1. पहाड़ी के शीर्ष पर खनन और एक्वीफर पर प्रभाव 2. हरियाली और जैव विविधता पर खनन का प्रभाव 3. वन्यजीवों पर खनन का प्रभाव 4. आदिम आदिवासी समूह के परम्परागत अधिकार 5. वनाधिकार कानून 2006 के कार्यान्वयन में ग्राम सभा की भूमिका और अन्य प्रक्रियागत मसले। राज्य सरकार के अधिकारी वनाधिकार कानून 2006 के कार्यान्वयन में समिति की टिप्पणियों से बेहद असन्तुष्ट थे।

चरण-2 की अनुमति के बारे में अन्तिम निर्णय के आधार

भारत के एटर्नी जेनरल का स्पष्टीकरण

इस मामले की गुणवत्ता के आधार पर निर्णय करने के पहले वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की भूमिका और उसके द्वारा पालन की जाने वाली प्रक्रिया के बारे में कुछ प्रश्न उठे थे। यह तथ्य है कि सुप्रीम कोर्ट ने 8 अगस्त 2008 के अपने निर्णय में परियोजना को अनुमोदन प्रदान कर दिया था। इस फैसले के बाद यह सन्देह उठा कि वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को कौन सी भूमिका अदा करनी है। पर्याप्त सावधानी बरतते हुए मैंने 19 जुलाई 2010 को इस मामले में भारत के विद्वान एटर्नी जेनरल की राय मंगाने के लिये कानून मंत्री को लिखा। उसके बाद जल्दी ही 20 जुलाई 2010 को एटर्नी जेनरल ने अपनी राय कानून मंत्रालय को सौंप दी। उन्होंने अपनी सुझाव में अन्य बातों के अलावा यह भी बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने 8 अगस्त 2008 के निर्णय में किसी भी तरीके से वन एवं पर्यावरण मंत्रालय पर कोई पाबन्दी नहीं लगाई है। उन्होंने यह भी कहा कि मंत्रालय चाहे तो वह अनुमोदन से इनकार भी कर सकता है। एटर्नी जेनरल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट से अनुमोदन का यह मतलब कतई नहीं है कि केन्द्र सरकार से अनुमोदन प्राप्त करने की आवश्यकता का निराकरण कर दिया है, इसका कोई प्रश्न ही नहीं है।’

मेरे सवाल कि क्या वन अनुमति देने का सुप्रीम कोर्ट का निर्णय अन्तिम और बाध्यकारी है या वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा अनुमोदन और संशोधन की गुंजाइश है? पर उनका सीधा जवाब स्पष्ट ढंग से नकारात्मक था। उनकी राय थी कि वन एवं पर्यावरण मंत्रालय अपनी बुद्धि लगाने और परियोजना को स्वतंत्र अनुमोदन देने के लिये बाध्य है। यह कहने की जरूरत नहीं कि अगर अनुमोदन दिया जाता है तो सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित सभी शर्तों को शामिल करना होगा। हालांकि, प्रमाणिक और किसी ठोस कारण से अनुमोदन नहीं देने का फैसला होता है तो इसका प्रश्न ही नहीं उठता।

वन परामर्शदात्री समिति की टिप्पणियाँ, दिनांक 23 अगस्त 2010

20 अगस्त 2010 को सक्सेना समिति की रिपोर्ट को वन संरक्षण अधिनियम 1980 की धारा 3 के अनुसार फॉरेस्ट एडवाइजरी कमिटी (एफएसी) के समक्ष रखा गया। एफएसी ने दर्ज किया कि वनाधिकार कानून, वन संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण कानून के प्रथमदृष्या में उल्लंघन के अकाट्य साक्ष्य मिले हैं। इस प्रकार कोई अनुमोदन उपरोक्त कानूनों के विरोध में होगा। एफएसी ने यह भी दर्ज किया कि वह सुप्रीम कोर्ट का बहुत सम्मान करती है और उसके 23 नवंबर 2007 के निर्णय का कड़ाई के साथ पालन कर रही है।

एफएसी की रिपोर्ट ने निम्नलिखित उल्लंघनों को देखा और दर्ज किया:-

वनाधिकार कानून 2006 का उल्लंघनः- एफएसी ने पाया कि वनाधिकार कानून की धारा 3 (1) (ई) का उल्लंघन हुआ है जो आदिम आदिवासी समूहों के अधिकारों के बारे में है। उसने यह भी पाया कि वनाधिकार कानून के विशेष प्रावधानों के कार्यान्वयन में गम्भीर असफलता साफ दिखती है जो आदिम आदिवासी समूह के डोंगरिया कोंढ़ और कुटिया कोंढ़ लोगों की संस्कृति, आजीविका और अधिकारों, आवास और वासस्थल के सामुदायिक स्वामित्व के बारे में हैं। सक्सेना समिति की रिपोर्ट के आधार पर एफएसी ने निष्कर्ष निकाला कि परियोजना की अनुमति लेने की प्रक्रिया में इस आदिम आदिवासी समूह के साथ परामर्श नहीं किया गया।

वन संरक्षण अधिनियम 1980 का उल्लंघन:- एफएसी ने सक्सेना समिति की रिपोर्ट के निष्कर्षों पर भरोसा किया कि मेसर्स वेदांता अल्यूमिना लिमिटेड जिसे नियमगिरी के खदानों से निकले बॉक्साइट की आपूर्ति जानी है ने लांजिगढ़ में स्थापित अल्यूमिना रिफाइनरी परिसर में 26.123 हेक्टेयर ग्रामीण वन (ग्राम योग्य जंगल) को गैर-कानूनी ढंग से घेर लिया है। जिसके कारण गाँव के लोग उस जंगल में नहीं जा सकते। इसी तरह कन्वेयर कॉरिडोर के समानांतर सड़क बनाने के लिये वेदांता अल्यूमिना लिमिटेड ने गैरकानूनी ढंग से ग्रामीण वन के प्लाट नंबर 157(पी) की एक एकड़ और प्लाट नंबर 133 की 0.11 एकड़ भूमि पर अपना कब्जा जमा लिया है।

पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम (Environmental Protection Act) 1986 का उल्लंघन:- एफएसी ने पाया कि परियोजना के प्रस्तावक मेसर्स वेदांता अल्यूमिना लिमिटेड ने लांजिगढ़ में स्थित अपनी अल्यूमिनियम रिफाइनरी की क्षमता को छह गुना बढ़ाने (एक एमटीपीए से बढ़ाकर छह एमटीपीए) के लिये निर्माण कार्य पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम 1986 के अन्तर्गत ईआईए अधिसूचना 2006 के प्रावधानों के अनुरूप पूर्व अनुमति प्राप्त करने के पहले ही आरम्भ कर दिया है। हमें यह भी जानकारी मिली है कि 60 प्रतिशत अतिरिक्त निर्माण कार्य पूरा हो चुका है।

पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम (1986) के अन्तर्गत निहित पूर्वानुमति लेने के प्रावधान का उल्लंघन

एफएसी ने सक्सेना समिति की रिपोर्ट से सहमत होते हुए यह माना कि परियोजना प्रस्तावक ने पर्यावरणीय अनुमति प्राप्त करने के दौरान तथ्यों को छिपा लिया था। वेदांता अल्यूमिना ने 16 अगस्त 2004 को लांजिगढ़ में रिफाइनरी लगाने और कन्वेयर पट्टी के लिये 58.943 हेक्टेयर वन भूमि के विचलन का प्रस्ताव सौंपा जिसमें 26.123 हेक्टेयर भूमि रिफाइनरी के लिये और बाकी कन्वेयर पट्टी और खनन स्थल तक सड़क के लिये था। लेकिन 19 मार्च 2003 को पर्यावरणीय अनुमति के लिये आवेदन देते समय कम्पनी ने दावा किया कि उसे किसी वनभूमि की आवश्यकता नहीं होगी और प्रस्तावित रिफाइनरी के दस किलोमीटर के दायरे में कोई संरक्षित वन नहीं है। बाद में सीईसी से यह जानकारी मिलने पर कि रिफाइनरी की स्थापना के लिये वनभूमि के विचलन का एक प्रस्ताव मंत्रालय के सामने लम्बित है, वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने 23 मई 2005 को नोटिस देकर मेसर्स वेदांता को निर्देश दिया कि वन (संरक्षण) अधिनियम 1980 के अन्तर्गत आवश्यक अनुमति मिलने के बाद ही आगे के निर्माण कार्य कराया जाना चाहिए। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के इस आदेश का पालन करने की बजाय कम्पनी ने मंत्रालय को सूचित किया कि उन्हें 58.943 हेक्टेयर वनभूमि का उपयोग करने की जरूरत ही नहीं है। उसने यह दावा भी किया कि किसी वनभूमि का उपयोग नहीं किया जायेगा। हालांकि, कम्पनी ने 26.123 हेक्टेयर वनभूमि समेत समूची भूमि पर कब्जा बरकरार रखा जिसकी पूरी जानकारी जिला प्रशासन को भी थी। परियोजना प्रस्तावक द्वारा अपूर्ण और असत्य जानकारी देना समान रूप से गम्भीर मसला है।एफएसी ने सिफारिश की है कि वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा इस मामले की पूरी जाँच कराई जाए और कानून के मुताबिक आवश्यक कार्रवाई की जाए।

जैव विविधता पर प्रभाव:- एफएसी ने पाया कि नियमगिरी पहाड़ियों की उच्च पारिस्थितिकीय और जैव विविधता (जिसपर डोंगरिया कोंढ़ और कुटिया कोंढ़ निर्भर हैं) को खनन से अपूरणीय क्षति होगी। एफएसी ने आगे देखा कि इस इलाके में उन प्रजातियों का निवास है जो वन्यजीव (प्रतिरक्षण) अधिनियम 1972 की अनुसूची 1 में सूचीबद्ध हैं जैसे चार सिंघों वाला मृग। उसने निष्कर्ष निकाला कि पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील इस इलाके में बड़े पैमाने पर खनन आश्रित मानवीय आबादी के आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन पर बुरा प्रभाव होगा।

प्रस्तावित खनन पट्टे की सीमित प्रासंगिकता:- एफएसी ने देखा है कि नियमगिरी के प्रस्तावित खनन पट्टे पर खनन लांजिगढ़ रिफाइनरी के लिये बहुत कम प्रासंगिक होगी जो वर्तमान में अपनी क्षमता को छह गुना बढ़ाने की प्रक्रिया में है। यहाँ जमा 72 एमटी अयस्क, रिफाइनरी की बढ़ी आवश्यकताओं को पूरा करने में सिर्फ चार साल में ही ख़त्म हो जाएँगे।

कम्पनी द्वारा बॉक्साइट अयस्क की सन्देहास्पद खरीद:- एफएसी ने सक्सेना समिति की इस निष्कर्ष पर चिंता व्यक्त की कि वर्तमान विस्तार योजना सन्देहास्पद ढंग से आए बॉक्साइट अयस्क पर निर्भर है। प्रस्तावित विस्तार के पूरा होने पर कम्पनी को इस खदान से बॉक्साइट की आपूर्ति केवल चार साल तक जारी रह सकेगी। एफएसी ने कहा कि यह चिंताजनक है कि रिपोर्ट के अनुसार रिफाइनरी द्वारा वर्तमान में इस्तेमाल हो रहे बॉक्साइट अयस्क का अधिकांश, चौदह खदानों से आता है जिनमें से ग्यारह के पास ताजा सूचनाओं के अनुसार आवश्यक पर्यावरणीय अनुमति नहीं है।

23 अगस्त 2010 की एफएसी की सिफारिश:- एफएसी के विचार से सक्सेना समिति ने साफ तौर पर संकेत किया है कि आसपास के वन क्षेत्र में रहने वाले आदिम आदिवासी समूहों के अधिकारों की सुरक्षा में घोर लापरवाही बरती गयी है। राज्य सरकार इस मामले में जब तक उचित कानूनी प्रक्रिया के पालन के प्रति अपने गम्भीर इरादे के साक्ष्य प्रस्तुत नहीं करती, एफएसी इसे कानून का उल्लंघन मानेगी।इस विश्लेषण के आधार पर एफएसी ने पाया कि यह मामला प्रभावित लोगों को हुई अपूरणीय क्षति को टालने के लिये एहतियाती सिद्धांतों को अपनाने के योग्य है। इसके साथ ही एफएसी ने चरण-1 की अनुमति को अस्थाई तौर पर वापस लेने की सिफारिश भी की। उसका कहना है कि वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने वन संरक्षण अधिनियम 1980 की धारा 2 के अन्तर्गत कालाहांडी और रायगडा जिलों में नियमगिरी पहाड़ी पर बॉक्साइट खनन के लिये 660.749 वनभूमि के विचलन के लिये दी गई है।

एफएसी ने इसके आगे मंत्रालय को सलाह दिया है कि अल्यूमिना रिफाइनरी के लिये प्रदत्त या विचाराधीन पर्यावरणीय अनुमति के चिन्हित उल्लंघनों के मामले में कानून के मुताबिक समुचित कार्रवाई आरम्भ करे।

एफएसी ने सिफारिश किया कि वन एवं पर्यावरण मंत्रालय अन्तिम निर्णय लेने के पहले राज्य सरकार को अपना पक्ष रखने का एक अवसर प्रदान करे। मैंने इसका अनुपालन किया और राज्य के मुख्यमंत्री को भी अपनी बात रखने का मौका दिया।

चरण-2 की अनुमति को निर्देशित करने वाले कारक

अपने निर्णय पर पहुँचने में मैंने तीन व्यापक कारकों पर विचार किया।

आदिवासी समूहों के अधिकारों का उल्लंघन जिसमें आदिम आदिवासी समूह और दलित आबादी शामिल है।

इस इलाके पर अपनी आजीविका के लिये निर्भर आदिवासी और आदिम आदिवासी समूहों के अधिकारों की खुल्लम-खुल्ला अवहेलना परियोजना प्रस्तावक द्वारा की गई है, फिर भी वे अनुमति लेने के लिये आगे बढें हैं, यह दुखद है। आदिम आदिवासी समूहों के लिये वनाधिकार कानून 2006 में विशेष प्रावधान किए गए हैं और इस मामले में किसी तरह का सन्देह नहीं होना चाहिए कि उनके अधिकारों को कानून के अन्तर्गत पूरी सुरक्षा हासिल है। राज्य सरकार द्वारा परियोजना प्रभावित लोगों की संकुचित परिभाषा करना वनाधिकार कानून 2006 की भाषा और आशय के विपरीत है। पहाड़ियों पर वे निवास नहीं करते इसका मतलब यह नहीं है कि उनपर उनका अधिकार नहीं होता। वनाधिकार कानून 2006 विशेष तौर से इन्हें ऐसे अधिकार प्रदान करता है, पर इस तथ्य को स्वीकार करने के बजाय नकारने की कोशिश की जा रही है। इसके अलावा आदिम आदिवासी समूहों की स्थिति के बारे में यह बताने की जरूरत है कि पूरे भारत में और खासतौर से ओडिशा में इस वर्ग के अन्तर्गत कुछ ही समुदाय आते हैं जिनकी वनों पर सम्पूर्ण निर्भरता होती है। उनके वासस्थल को वनाधिकार कानून 2006 के अन्तर्गत विशेष सुरक्षा प्रदान की गई है और उस सुरक्षा का उल्लंघन कतई स्वीकार्य नहीं है। जब वन या पर्यावरणीय अनुमति प्रदान करने का मामला सामने आएगा तो यह आधार अपने आप में सर्वप्रथम विचारणीय होगा। चार सदस्यीय समिति ने बार-बार इसके उल्लंघन के मामलों का उल्लेख किया है।

कम्पनी मेसर्स वेदांता अल्यूमिना लिमिटेड ने अपनी विशालकाय विस्तार योजना के अन्तर्गत निर्माण कार्य पहले ही आरम्भ कर दिया है जो इसकी क्षमता को छह गुना बढ़ाकर यानी एक एमटीपीए से छह एमटीपीए कर देगा। लेकिन कम्पनी ने निर्माण कार्य शुरू करने के पहले पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम के अन्तर्गत ईआईए अधिसूचना 2006 के प्रावधानों के अनुसार पर्यावरणीय अनुमति नहीं ली।

इस इलाके में रहने वाले दलितों की भी अनदेखी नहीं की जा सकती। यद्यपि तकनीकी तौर पर वे वनाधिकार कानून 2006 के अन्तर्गत लाभ लेने के पात्र नहीं हैं, पर वे स्थानीय समाज के साथ इस जटिल ढंग से जुड़े हैं कि उन्हें अलग कर अपात्र करार देना असम्भव है। वैसे भी ये पाँच दशकों से अधिक समय से इन इलाकों के वाशिंदे हैं। समिति ने भी अपनी रिपोर्ट के पेज 40 पर कहा है कि वैसे दलितों का वनाधिकार कानून के अन्तर्गत दावा नहीं बनता पर इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि पिछले अनेक दशकों से उनकी नियमगिरी वनों पर निर्भरता रही है जिसकी अनदेखी केन्द्र और राज्य सरकार केवल सभी भारतीयों के लिये समावेशी विकास, न्याय एवं सम्मान सुनिश्चित करने के वायदे के साथ विश्वासघात करने की कीमत पर कर सकती है। यह टिप्पणी वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को सही लगती है और मंत्रालय के उन प्रयासों को रेखांकित करती है जो यह सुनिश्चित करना चाहता है कि कोई भी फैसला न केवल कानून के शब्दों के मुताबिक हो, बल्कि उसके आशय के अनुसार भी हो।

पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम 1986 का उल्लंघन

सक्सेना समिति की टिप्पणियाँ और वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के रिकार्ड : वनाधिकार कानून 2006 के अन्तर्गत अधिकारों के निपटारे के बारे में अपने निष्कर्षों के अतिरिक्त चार सदस्यीय समिति ने अल्यूमिना रिफाइनरी को दी गई पर्यावरणीय अनुमति के सन्दर्भ में अपनी रिपोर्ट की पेज संख्या 7 में दिनांक 16 अगस्त 2010 को यह भी दर्ज किया कि -

कम्पनी मेसर्स वेदांता अल्यूमिना लिमिटेड ने अपनी विशालकाय विस्तार योजना के अन्तर्गत निर्माण कार्य पहले ही आरम्भ कर दिया है जो इसकी क्षमता को छह गुना बढ़ाकर यानी एक एमटीपीए से छह एमटीपीए कर देगा। लेकिन कम्पनी ने निर्माण कार्य शुरू करने के पहले पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम के अन्तर्गत ईआईए अधिसूचना 2006 के प्रावधानों के अनुसार पर्यावरणीय अनुमति नहीं ली। यह पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम के प्रावधानों का गम्भीर उल्लंघन है। विस्तार का विशाल आकार, उन्नत प्रकृति पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम की पूरी अवहेलना करता है। कम्पनी का देश के कानून के प्रति मौजूदा बर्ताव अवमाननापूर्ण है।

डोंगरिया कोंढ़ द्वारा एनईएए के समक्ष मुकदमा:- पर्यावरणीय अनुमति प्रदान किए जाने के बाद स्थानीय आदिवासी आबादी और दूसरे सम्बन्धित व्यक्तियों जिनमें डोंगरिया कोंढ़ शामिल हैं, ने परियोजना को चुनौती देते हुए राष्ट्रीय पर्यावरणीय अपीलीय प्राधिकरण (National Environment Appllate Authority, एनईएए) में मुकदमा दायर किया।इन मुक़दमों में कुमति माँझी और अन्य बनाम वन एवं पर्यावरण मंत्रालय, श्रब्बू सिका और अन्य बनाम वन एवं पर्यावरण मंत्रालय, प्रफुल्ल सामंतरा बनाम वन एवं पर्यावरण मंत्रालय और अन्य शामिल हैं । इन मुकदमों की अपील संख्या क्रमशः 18,19,20 और 21 थी जो वर्ष 2009 में दायर किये गए थे। मेरे ध्यान में लाया गया है कि यह पहला अवसर है जब डोंगरिया कोंढ़ों ने इस परियोजना को किसी अदालत में प्रत्यक्ष तौर पर चुनौती दी है। अपील में पर्यावरणीय अनुमति की प्रक्रिया में कानून के अनेक उल्लंघनों को रेखांकित किया गया था। प्रमुख आरोपों में कुछ इस प्रकार हैं- पर्यावरणीय प्रभाव आकलन रिपोर्ट को सार्वजनिक सुनवाई के पहले लोगों के समक्ष नहीं रखा गया। लोगों और वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को दी गई रिपोर्टें परस्पर विरोधाभाषी थीं। यह मामला एनईएए में निर्णय के लिये सुरक्षित है।

पूर्वी क्षेत्रीय कार्यालय की निगरानी रिपोर्ट, 25 मई 2010 : वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के पूर्वी क्षेत्रीय कार्यालय के डॉ. वीपी उपाध्याय (निदेशक ‘एस’) ने 25 मई 2010 को अपनी रिपोर्ट वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को सौंपी। निगरानी रिपोर्ट की पारा 2 में विभिन्न उल्लंघनों को सूचीबद्ध किया गया है। उन्होंने दर्ज किया कि मेसर्स वेदांता अल्यूमिना लिमिटेड ने ईआईए अधिसूचना 2006 के प्रावधानों के अनुसार पर्यावरणीय अनुमति प्राप्त किए बगैर विस्तार योजना के लिये निर्माण कार्य आरम्भ कर दिया है जो पर्यावरण प्रतिरक्षण अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन है।

परियोजना में लाल मिट्टी और राख फेंके जाने वाले तालाब के आसपास की भूजल गुणवत्ता की निगरानी करने के लिये पिएजोमीटर का स्थापना नहीं की है। इस प्रकार अनुमति पत्र में विशेषरुप से दर्ज शर्त संख्या 5 का उल्लंघन होता है।

पर्यावरणीय अनुमति की साधारण शर्तों में शर्त संख्या 1 का उल्लंघन बगैर मंत्रालय की पूर्व-अनुमति प्राप्त किए विस्तार कार्य आरम्भ करने से हुआ है।

इसके अलावा रिफाइनरी के लिये बॉक्साइट उन खदानों से मंगाना था जिन्होंने पहले से पर्यावरणीय अनुमति ले लिया हो। रिपोर्ट ने चौदह खदानों की सूची दी है जिनसे परियोजना प्रस्तावक द्वारा बॉक्साइट मंगाया जा रहा था। इन चौदह खदानों में से ग्यारह को खनन लाइसेंस नहीं मिला,दो को केवल कार्यसूची ( terms of reference, टीओआर) दिया गया और केवल एक खदान को पर्यावरणीय अनुमति मिली।

वन संरक्षण अधिनियम के अन्तर्गत उल्लंघन

सक्सेना समिति ने वन (संरक्षण) अधिनियम 1980 के उल्लंघन के अनेक मामलों का विस्तार से उल्लेख किया है। इन सभी उल्लंघनों का आसपास के इलाके की पारिस्थितिकी और जैव विविधता पर प्रभाव पड़ा है, जो परियोजना प्रस्तावक के कार्य को निंदनीय बनाता है। ये उल्लंघन न केवल बार-बार हुए हैं बल्कि परियोजना प्रस्तावक द्वारा सूचनाओं को जानबूझकर छिपाने के मामले भी सामने आए हैं।

चरण 2 की अनुमति का निर्णय

सक्सेना समिति के साक्ष्य जिसकी एफएसी ने समीक्षा की है अकाट्य हैं। विभिन्न कानून खासकर वन (संरक्षण) अधिनियम 1980, पर्यावरण (सुरक्षा) अधिनियम 1986 और वनाधिकार कानून 2006 की स्थिति अत्यंत ख़राब है जिसे छिपाया नहीं जा सकता। इसके अलावा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 8 अगस्त 2008 के फैसले के बाद ढेर सारे नए और असन्दिग्ध प्रमाण सामने आए हैं। सामने मौजूद तथ्यों पर सर्तकता पूर्वक विचार करने और सौंपी गई सभी रिपोर्ट पर उचित विचार विमर्श करने के बाद एफएसी की सिफारिशों का समर्थन करते हुए मैं निम्नलिखित विचारों पर पहुँचा हूँ :-

ओडिशा के कालाहांडी और रायगढ़ा जिलों में नियमगिरी पहाड़ी पर लांजिगढ़ में ओएमसी और स्टरलाइट बॉक्साइट खनन परियोजना के लिये चरण 2 की वन अनुमति नहीं दी जा सकती। इस प्रकार चरण 2 की वन अनुमति ख़ारिज की जाती है।

चूँकि वन अनुमति ख़ारिज कर दी गई है इसीलिये खनन के लिये पर्यावरणीय अनुमति अप्रभावी हो गई।

ऐसा लगता है कि परियोजना प्रस्तावक एक एमटी की अल्यूमिना रिफाइनरी के लिये झारखंड के ऐसे अनेक खदानों से बॉक्साइट मंगा रहा है जिनके पास वैध पर्यावरणीय अनुमति नहीं है। इस मामले पर अलग से विचार किया जा रहा है।

इसके अलावा वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा परियोजना प्रस्तावक को कारण बताओ नोटिस जारी किया जा रहा है।नोटिस में यह स्पष्ट किया गया है कि क्यों न कम्पनी के एक एमटी अल्यूमिना प्लांट की मान्यता रद्द कर दी जाये।

परियोजना प्रस्तावक को कारण बताओ नोटिस जारी की जा रही है कि एक एमटी से छह एमटी तक विस्तार के लिये पर्यावरण प्रभाव आकलन ( Environment Impact Assessment,ईआईए) रिपोर्ट की कार्यसूची (टीओआर) को क्यों वापस नहीं ले लिया जाए। इस बीच टीओआर और मूल्याँकन प्रक्रिया स्थगित रहेगी।

वन एवं पर्यावरण मंत्रालय भी विचार कर रहा है कि विभिन्न कानूनों के उल्लंघन (जैसाकि सक्सेना समिति ने विस्तार से दर्ज किया है) के लिये परियोजना प्रस्तावक के खिलाफ कैसी दंडात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए।ओडिशा सरकार द्वारा उठाए गए मसलों के बारे में निश्चित रूप से उल्लेख करना चाहिए कि आदिम आदिवासी समूह के प्रथागत अधिकार यद्यपि राष्ट्रीय वन नीति 1988 के अंग नहीं हैं लेकिन वे वनाधिकार कानून 2006 के अविभाज्य अंग हैं। संसद द्वारा पारित एक कानून का महत्त्व किसी नीति वक्तव्य से अधिक है। वनाधिकार कानून, राष्ट्रीय वन नीति के अट्ठारह वर्ष बाद प्रभाव में आया। राज्य सरकार के अधिकारियों द्वारा उठाए गए दूसरे मसले पर जो वनाधिकार कानून 2006 के प्रक्रियागत पहलू के बारे में है उनपर विचार करने के लिये वन एवं पर्यावरण मंत्रालय और आदिवासी मामलों के मंत्रालय की एक संयुक्त समिति गठित की जाये।

राज्य सरकार के अधिकारी सक्सेना समिति द्वारा वनाधिकार कानून 2006 के कार्यान्वयन में उनकी भूमिका पर की गई टिप्पणी से विक्षुब्ध हैं।

राज्य सरकार के अधिकारियों ने भले उल्लंघनों की मौन सहमति दी हो, लेकिन यह अलग मामला है और मेरे फैसले में प्रासंगिक नहीं है। मैं यह मानने के लिये तैयार हूँ कि राज्य सरकार के अधिकारियों ने अपने दायित्वों का निर्वाह अपनी योग्यता के अनुसार सर्वोत्तम ढंग और अच्छी नीयत से किया। राज्य सरकार सक्सेना समिति की अनेक टिप्पणियों का विरोध जरूर कर सकती है। लेकिन इससे यह तथ्य नहीं बदल सकता कि विभिन्न कानूनों का गम्भीर उल्लंघन सचमुच हुआ है।

किसी मंत्रालय की प्राथमिक जिम्मेवारी संसद द्वारा पारित कानून को लागू करना है। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के लिये इसका अर्थ वन (संरक्षण) अधिनियम 1980, पर्यावरण (सुरक्षा) अधिनियम 1986, वनाधिकार कानून 2006 और ऐसे दूसरे कानूनों को लागू करना है। इसी भावना के अनुसार यह निर्णय लिया गया है।

आखिर में राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर उत्पन्न व्यापक दिलचस्पी और चिंताओं को देखते हुए मैं महसूस करता हूँ कि इस अन्तिम निर्णय को पूरा का पूरा सार्वजनिक कर देना मेरा कर्तव्य है। सभी सहयोगी दस्तावेजों को भी मंत्रालय के वेबसाइट पर उपलब्ध कराया जा रहा है।

ओडिशा के जगतसिंहपुर में पोस्को एकीकृत इस्पात प्रकल्प परियोजना पर मुखर आदेश

2 मई 2011

मैंने 31 जनवरी 2011 को घोषणा किया कि ओडिशा में पोस्को प्रकल्प के लिये अन्तिम वन अनुमति राज्य सरकार द्वारा स्पष्ट आश्वासन मिलने के बाद दी जाएगी।5

13 अप्रैल 2011 को राज्य सरकार ने इन आश्वासनों को वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के पास भेजा। 14 अप्रैल 2011 को पोस्को प्रतिरोध संग्राम समिति की ओर से दो पल्ली सभाओं के कथित प्रस्तावों के मिलने के कारण मैंने मामले को दोबारा राज्य सरकार के पास भेज दिया।6 29 अप्रैल 2011 को राज्य सरकार ने मेरे 14 अप्रैल 2011 के पत्र का जबाब दिया।7

ओडिशा सरकार ने 29 अप्रैल 2011 के अपने ताजा जबाब में निम्नलिखित का उल्लेख किया है :-

दो पल्ली सभाओं8 के प्रस्ताव-धिनकिया, दिनांक 21 फरवरी 2011 और गोविंदपुर दिनांक 23 फरवरी 2011-ओडिशा ग्राम पंचायत अधिनियम और वनाधिकार कानून 2006 के कानूनी प्रावधानों के लिहाज से वैध दस्तावेज नहीं हैं। ऐसे प्रस्ताव पर न तो विश्वास किया जा सकता है, न ही उसके अनुसार कार्रवाई की जा सकती है।

धिनकिया के 3,445 वोटरों की पल्ली सभा में केवल 69 व्यक्तियों ने प्रस्ताव पर दिनांक 21 फरवरी 2011 पर हस्ताक्षर किया है। वहीं गोविंदपुर के 1907 वोटरों में से केवल 64 व्यक्तियों कथित तौर पर पल्ली सभा के प्रस्ताव पर दिनांक 23 फरवरी 2011 पर हस्ताक्षर किया है। यह स्पष्ट रूप से दिखाता है कि ‘प्रस्ताव’ अवैध है।

पल्ली सभा में पारित दो प्रस्ताव ग्राम पंचायत की पुस्तिका(ग्राम पंचायत सचिव द्वारा अभिलिखित और सरपंच द्वारा हस्ताक्षरित) में उपलब्ध नहीं हैं और इसलिये फर्जी हैं।

ओडिशा ग्राम पंचायत अधिनियम 1964 के प्रावधानों का उल्लंघन करने के लिये शिशिर महापात्रा (सरपंच) धिनकिया के खिलाफ आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। इन पर आरोप है कि इन्होंने प्राप्त अधिकारों का अतिक्रमण किया और अपने पद का दुरुपयोग करते हुए पोस्को प्रतिरोध संग्राम समिति का हित साधने का कार्य किया जिसके वे सचिव हैं।

मैंने ओडिशा ग्राम पंचायत अधिनियम 1964, वनाधिकार कानून 2006 और वनाधिकार नियमावली 2007 के विभिन्न प्रावधानों का अध्ययन किया है। यहाँ मुख्य मसला यह है कि दो पल्ली सभाओं के तथाकथित प्रस्ताव जो मुझे पोस्को प्रतिरोध संग्राम समिति से प्राप्त हुए और जिन्हें 14 अप्रैल को ओडिशा सरकार के पास कानून के अनुसार निपटारे के लिये भेजा गया, कानूनी तौर पर वैध दस्तावेज हैं या नहीं?

वनाधिकार नियामावली 2007 के नियम 4(2) के अनुसार ग्रामसभा की बैठक की गणपूर्ति में ग्रामसभा के सभी सदस्यों की कुल संख्या के दो तिहाई सदस्यों की उपस्थिति अनिवार्य है। ओडिशा सरकार की रिपोर्ट के अनुसार सदस्यों की संख्या निर्धारित गणपूर्ति से बहुत कम थी।

इसके अलावा वनाधिकार नियमावली 2007 के नियम 3 (1) के अनुसार, ग्रामसभा की बैठक ग्राम पंचायत द्वारा बुलाई जाएगी, जबकि इस मामले में लगता है कि इसे सरपंच द्वारा ग्राम पंचायत की सहमति लिये बगैर बुलाया गया। ओडिशा ग्राम पंचायत नियमावली 1968 का नियम 20(ए) केवल ग्राम पंचायत को पल्ली सभा की बैठक बुलाने के लिये अधिकृत करता है।

आखिर में ओडिशा ग्राम पंचायत नियमावली के नियम 26 के अन्तर्गत पल्ली सभा की कार्यवाही का रिकार्ड एक पुस्तिका में दर्ज होगी। इस मामले में जिला समाहर्ता की रिपोर्ट के अनुसार विवादित प्रस्ताव उपरोक्त पुस्तिका में उपलब्ध नहीं है।


इन कारणों से और राज्य सरकार द्वारा दी गई सूचनाओं के आधार पर मेरे पास इस निष्कर्ष पर पहुँचने के सिवा कोई चारा नहीं था कि वनाधिकारों को मान्यता देने का दावा करते हुए ग्रामसभा का प्रस्ताव कानूनी तौर पर वैध नहीं है जोकि वनाधिकार कानून 2006 की धारा 6(1) के अन्तर्गत आवश्यक है।

अब मेरे पास तीन विकल्प उपलब्ध थे-राज्य सरकार ने जो कहा है उसपर कानूनी परामर्श माँगना, राज्य सरकार और पीपीएसएस (pratirodha sangram samiti) के दावे-प्रतिदावे की छानबीन करने के लिये स्वतंत्र जाँच कराना, उसपर भरोसा करना।

मैंने कानूनी मसले की छानबीन पहले ही कर ली है इसीलिये कानूनी परामर्श माँगने से कुछ खास हासिल नहीं होने वाला। इसी प्रकार, सरपंच द्वारा पारित प्रस्ताव पर गाँव के व्यस्क आबादी की दो-तिहाई के हस्ताक्षर का अभाव। ये प्रमाण इतने प्रत्यक्ष है कि अगली जाँच या छानबीन की आवश्यकता ही नहीं।

इसीलिये मैंने तीसरे रास्ते को अपनाने का फैसला किया क्योंकि वनाधिकार कानून 2006 को लागू करने की प्राथमिक जिम्मेवारी ग्रामसभा, अनुमंडल अधिकारी और जिला समाहर्ता के माध्यम से राज्य सरकार की है। मुझे एसडीओ और जिला समाहर्ता की रिपोर्टों का निश्चित तौर पर सम्मान करना चाहिए। उनके और राज्य सरकार के विचारों को निश्चित तौर पर प्रभावी होना चाहिए जब तक कि इसके खिलाफ व्यापक और पक्का साक्ष्य उपलब्ध न हों।9 इस प्रकार मैंने तय किया कि वनाधिकार कानून 2006 के अन्तर्गत धिनकिया और गोविंदपुर में वनाधिकारों को मान्यता देने का कोई वैध दावा नहीं है।

राज्य सरकार जो कह रही है उसमें निष्ठा और विश्वास सहकारी संघात्मकता के अनिवार्य स्तंभ हैं। यही कारण है कि मैंने दूसरे विकल्प को ख़ारिज कर दिया। एक सीमा के आगे लोकतांत्रिक ढंग से निर्वाचित राज्य सरकार से केन्द्र सरकार लगातार सवाल नहीं कर सकती।

मैं इस तथ्य के प्रति सचेत हूँ कि राज्य सरकार और पोस्को के बीच हुआ सहमति-पत्र (एमओयू) पिछले साल समाप्त हो गया और इसका नवीकरण अभी होना है। इस एमओयू में लौह-अयस्क के निर्यात का प्रावधान था जिसने मुझे इस परियोजना को लेकर काफी बेचैन कर दिया था। मैं अपेक्षा करता हूँ कि राज्य सरकार और पोस्को के बीच संशोधित सहमति-पत्र के लिये बातचीत इस तरह से होगी कि कच्चे माल के निर्यात के प्रावधान से पूरी तरह बचा जा सके। इसके अतिरिक्त पोस्को को कांदाधार लौह-अयस्क खदान का आवंटन रद्द करने का ओडिशा हाईकोर्ट ने दिया था। इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार की अपील अभी तक लम्बित है। मैं सहमति-पत्र के नवीकरण के लिये सुप्रीम कोर्ट के अन्तिम निर्णय का इंतजार करता पर वह अडंगेबाजी लगेगी। इसलिये मैं यह उम्मीद करुंगा कि राज्य सरकार नए सहमति-पत्र के लिये बातचीत इस ढंग से करेगी कि लौह-अयस्क के निर्यात को सम्पूर्ण रूप से टाला जा सके।

इस प्रकार राज्य सरकार के ताजा पत्र दिनांक 29 अप्रैल 2011 को देखते हुए 1253 हेक्टेयर वनभूमि का विचलन पोस्को के पक्ष में करने की अन्तिम अनुमति दी जाती है। यह अनुमति पहले से लगायी गयी शर्तों यथा क्षतिपूरक वनीकरण, एनपीवी के भुगतान के अतिरिक्त इस शर्त के साथ होगी कि पोस्को राज्य सरकार द्वारा निर्धारित किसी जिले में क्षतिग्रस्त वनभूमि पर समतुल्य मात्रा में खुला वन पुर्नसृजित करने का खर्च भी उठाएगी।

मैं यह अपेक्षा भी करता हूँ कि राज्य सरकार ओडिशा ग्राम पंचायत अधिनियम 1964 के अन्तर्गत धिनकिया के सरपंच के खिलाफ कार्रवाई को तत्काल आरम्भ करेगी। अगर तुरन्त कोई कार्रवाई नहीं की गई तो मैं मानता हूँ कि राज्य सरकार की दलीलों पर गम्भीर सवाल उठेंगे।

मैं इस प्रश्न को निपटाना चाहता हूँ कि क्या मेरा निर्णय वनाधिकार कानून 2006 के कार्यान्वयन को कमजोर करेगा? आलोचकों को मेरा जबाब होगा कि मेरे व्यक्तिगत रूप से जोर देने पर वनाधिकार कानून 2006 के अनुपालन को वन संरक्षण अधिनियम 1980 के अन्तर्गत, वनभूमि के गैर-वानिकी कार्यों के लिये विचलन की अनुमति देने में अनिवार्य शर्त बनाया गया। ऐसा करने के लिये मेरे उपर कोई दबाव या दायित्व नहीं था बल्कि यह केवल वनाधिकार कानून 2006 के प्रति मेरी व्यक्तिगत प्रतिबद्धता थी। वनाधिकार कानून 2006 और अगस्त 2009 की निर्देशावलियों दोनों का कार्यान्वयन, सीखने और विकसित करने की प्रक्रिया है क्योंकि इस मामले में हम अभी भी अनिश्चय की अवस्था में हैं। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय इस प्रक्रिया को सुधारने और उन्नत बनाने में लगा रहेगा ताकि कानून का अनुपालन उसमें दिए गए उपबन्धों के अनुसार हो सके। पोस्को प्रकल्प के लिये पर्यावरण और वन अनुमति की प्रक्रिया ने भारत और विदेश दोनों जगहों पर काफी दिलचस्पी पैदा की है। जैसाकि मैंने 31 जनवरी 2011 के अपने निर्णय में चिन्हित किया है कि पोस्को प्रकल्प अपने आप में राज्य और देश, दोनों के लिये उल्लेखनीय आर्थिक, तकनीकी और रणनीतिक महत्त्व का है। इसके साथ ही पर्यावरण और वन से सम्बन्धित कानूनों का निश्चित तौर पर गम्भीरता से कार्यान्वयन होना चाहिए। इस मामले में 31 जनवरी 2011 के मेरे निर्णय के हिस्से के रूप में साठ शर्तें लगाई गई हैं जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि यह प्रकल्प पारिस्थितिकीय और स्थानीय आजीविका के लिहाज से क्षतिकारक नहीं हो सके। मैं अपेक्षा करूंगा कि राज्य सरकार और पोस्को दोनों इस मामले में संवेदनशील बने रहेंगे।

यह निर्णय लेना आसान नहीं था और मैं जानता हूँ कि इसकी तारीफ और आलोचना दोनों होगी। यह सम्बन्धित मामले की जटिल प्रकृति की वजह से शायद अपरिहार्य है। लेकिन मैं चाहता हूँ कि इसे स्पष्ट रूप से स्वीकार किया जाए कि मैंने समुचित प्रक्रिया के सिद्धांतों के अनुपालन की लगातार कोशिश की। मैं मानता हूँ कि मंत्री के रूप में मेरी जिम्मेवारी केवल सही काम करना नहीं है बल्कि चीजों को सही करना भी है।

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चौहान को नवी मुम्बई हवाईअड्डा के बारे में पत्र (18 जून 2009)

नवी मुम्बई में अन्तरराष्ट्रीय हवाईअड्डा के प्रस्तावित स्थल के बारे में मेरे पत्र दिनांक 17 जून 2009 पर आपकी प्रतिक्रिया मुझे अभी-अभी प्राप्त हुई है। मुझे काफी प्रसन्नता है कि मैंग्रोव्स की सुरक्षा के बारे में मेरी चिंताओं में आप हिस्सेदार हुए हैं। मैं इसलिये भी काफी प्रसन्न हुआ हूँ कि इस परियोजना को पर्यावरण पर न्यूनतम प्रभाव डालते हुए कार्यान्वित करने की महाराष्ट्र सरकार की प्रतिबद्धता पर आपने जोर दिया है।

इस खास स्थल के चयन की पृष्ठभूमि के बारे में आपने अपने पत्र में अनेक मसलों को उठाया है। मैंने इस मसलों पर विस्तार से विचार किया है। मैं उन मुद्दों पर फिर वापस लौटूंगा जिन्हें आपने मेरे द्वारा सभी तथ्यों की जाँच करने के बाद उठाया है। इस बीच, मैं आपसे पर्यावरण प्रभाव आकलन की कार्यसूची को जल्दी से जल्दी हमारे पास भेजने का अनुरोध करुंगा। मैं आपको आश्वस्त करता हूँ कि इस कार्यसूची पर शीघ्रतापूर्वक और बेहद पेशेवर ढंग से विचार किया जाएगा।

मुझे मालूम पड़ा है कि गुजरात इकोलॉजिकल कमीशन, मैंग्रोव्स को पुनर्बहाल करने में बहुत सफल रहा है। पिछले दस वर्षों में गुजरात अकेला राज्य है जहाँ मैंग्रोव्स के इलाके में छह गुनी बढ़ोतरी हुई है। गुजरात इकोलॉजिकल कमीशन ने इस क्षेत्र में बेहतरीन काम किया है। मेरा मानना है कि गुजरात में विकसित की गयी इस विशेषज्ञता से मैग्रोव्स की क्षति को न्यूनतम करने सहायता मिलेगी।

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चौहान को नवी मुम्बई हवाई अड्डा परियोजना क्षेत्र में मैंग्रोव्स की सुरक्षा के बारे में पत्र (10 नवंबर 2009)

नवी मुम्बई में नए अन्तरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के निर्माण के आपके प्रस्ताव पर हमारे बीच हुए विचार विमर्श हुए। आपको याद होगा कि इस प्रस्तावित परियोजना की वजह से 350 एकड़ मैंग्रोव्स जंगलों के नष्ट हो जाने के विषय पर मैंने आपके समक्ष अपनी राय रखी थी।

मुझे मालूम पड़ा है कि गुजरात इकोलॉजिकल कमीशन (Gujarat Ecology Commission), मैंग्रोव्स को पुनर्बहाल करने में बहुत सफल रहा है। पिछले दस वर्षों में गुजरात अकेला राज्य है जहाँ मैंग्रोव्स के इलाके में छह गुनी बढ़ोतरी हुई है। गुजरात इकोलॉजिकल कमीशन ने इस क्षेत्र में बेहतरीन काम किया है। मेरा मानना है कि गुजरात में विकसित की गयी इस विशेषज्ञता से मैग्रोव्स की क्षति को न्यूनतम करने सहायता मिलेगी। इस विशेषज्ञता का लाभ नवी मुम्बई एवं किसी अन्य स्थान पर मैंग्रोव्स को पुनर्बहाल करने में ‘महाराष्ट्र महानगर और औद्योगिक विकास निगम’ (City and Industrial Development Corportaion of Maharashtra, सीआईडीसीओ) ले सकता है।

नवी मुम्बई हवाईअड्डा और टाडोबा-अन्धारी टाइगर रिजर्व में खनन से जुड़े तथ्यों की जानकारी देते हुए प्रधानमंत्री को पत्र (21 जनवरी 2010)

मैं समझता हूँ कि शरद पवार और प्रफुल्ल पटेल दोनों ने नवी मुम्बई हवाई अड्डा और टाडोबा-अन्धारी टाइगर रिजर्व के बहिवर्ती क्षेत्र में अडानी कोयला खदान परियोजना के बारे में मेरे रूख को लेकर आपसे मुलाकात की है। मैं आपके सामने कुछ ऐसे तथ्यों को रखना चाहता हूँ जिन्हें शायद आपके ध्यान में नहीं लाया गया होगा।

कोस्टल रेगुलेशन जोन ( Coastal Regulation Zone, सीआरजेड) नोटिफिकेशन 1991 में प्रधानमंत्री कार्यालय की सलाह पर 6 जनवरी 2009 को संशोधन किया गया। यह संशोधन कहता है कि नवी मुम्बई में ग्रीनफिल्ड हवाई अड्डा का विकास विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर किया जाएगा ताकि पर्यावरण की सुरक्षा के समुचित उपाय सम्मिलित किए जा सकें। नवी मुम्बई क्षेत्र के लिये उपयुक्त तटीय पर्यावरण के नुकसान की भरपाई कर सकें। इस संशोधन का अर्थ स्वतः हवाईअड्डा बनाने की अनुमति नहीं होता। यह हवाईअड्डा के निर्माण को अनुमति देने योग्य गतिविधि बनाता है पर शर्तों के आधार पर, जिन्हें इस ढंग से पूरा किया जाएगा कि वन एवं पर्यावरण मंत्रालय सन्तुष्ट हो सके।

नवी मुम्बई हवाईअड्डा के लिये प्रस्तावित स्थल पर 400 एकड़ मैंग्रोव्स और जलीय क्षेत्र को डूबक्षेत्र बन जाना है। मैंने जैसे ही इस मामले को देखा महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को लिखा। फिर हमारी मुलाकात हुई और पर्यावरणीय प्रभाव आकलन के लिये कार्यसूची मेरे जोर देने पर 4 अगस्त 2009 को सिडको को भेज दी गई। मैंने सिडको को नीदरलैड और अमेरिका जैसे देशों के श्रेष्ठ अन्तरराष्ट्रीय परामर्शी को काम में लगाने की सलाह भी दी। मैंने मुख्यमंत्री को यह भी कहा कि पर्यावरणीय प्रभाव आकलन में नदी को मोड़ने के प्रभाव को निश्चित शामिल किया जाए जो इस परियोजना का हिस्सा है। हम इस ईआईए का इंतजार कर रहे हैं और उम्मीद करते हैं कि यह ठोस,विश्वसनीय और पेशेवर काम करेगा।

चूँकि हवाईअड्डा परियोजना में मैंग्रोव्स का नुकसान शामिल है, मैंने अपनी पहल पर गुजरात इकोलॉजिकल कमीशन (जीईसी) से सम्पर्क किया जिसने गुजरात में मैंग्रोव्स के पुर्नबहाली के लिये पिछले दशक में उल्लेखनीय काम किया है। आप यह जानकर प्रसन्न होंगे कि मेरे लगातार प्रयास करने पर जीईसी ने मैंग्रोव्स पुनर्बहाली के बारे में एक रिपोर्ट सिडको को सौंपी है। महाराष्ट्र सरकार इससे अनजान थी कि इस कार्य में जीईसी ने निपुणता हासिल कर ली है। मैंने जीईसी को प्रोत्साहित किया है कि वह नवी मुम्बई में स्वतःसक्रिय हो।

कोयला खनन परियोजना बाघों के वासस्थल और उनके आवागमन के गलियारे को गम्भीर नुकसान पहुँचाने के साथ ही सागवान के सैकडों एकड़ समृद्ध जंगल और दूसरे जंगलों को नष्ट कर देगा। मैंने परियोजना स्थल पर एक तकनीकी टोली को भेजा और उसकी रिपोर्ट प्रफुल्ल पटेल को दिया। मैं स्वयं जमीनी स्तर पर आँकलन करने के लिये 27 जनवरी को टाडोबा का दौरा करने वाला हूँ। महोदय, मैं आपको आश्वस्त करना चाहता हूँ कि सभी परियोजनाओं के बारे में मेरा रूख सकारात्मक होता है और मैं हमेशा मध्यमार्ग खोजने की कोशिश करता हूँ। ऐसे उदाहरण हैं जब मुझे ‘ना’ कहने के लिये मजबूर होना पड़ा लेकिन मेरा रूख जहाँ तक सम्भव हो ‘हाँ लेकिन’ विकल्प को खोजने का रहा है। मैं उम्मीद करता हूँ कि आपके सामने इन तथ्यों को रखने से आप बुरा नहीं मानेंगे। मैं आपको यह धारणा बनाने देना नहीं चाहता कि मैं आर्थिक विकास और अधिसंरचनाओं के विकास में बाधक बन गया हूँ।

नवी मुम्बई हवाईअड्डा के निर्माण में पर्यावरण मंत्रालय की वजह से विलम्ब होने के कारण नागरिक उड्यन राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) प्रफुल्ल पटेल के दावे का खंडन करते हुए पत्र। यह दावा उन्होंने एक इंटरव्यू में किया था। (3 जुलाई 2010)

मैंने नवी मुम्बई हवाईअड्डा के निर्माण में विलम्ब में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की कथित भूमिका के बारे में आपका टीवी इंटरव्यू देखा है। मैं निम्नलिखित तथ्यों को आपके ध्यान में लाना चाहता हूँः-

वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को नवी मुम्बई में ग्रीनफ़ील्ड हवाईअड्डा का विकास करने का पहला प्रस्ताव 27 अगस्त 2007 को मिला। सीआरजेड अधिसूचना 1991 में अन्तिम संशोधन 15 मई 2009 को हुआ जिससे नवीं मुम्बई में हवाईअड्डा के निर्माण की अनुमति दी जाने योग्य गतिविधि हो सकी।

सिडको ने नवी मुम्बई हवाईअड्डा स्थापित करने के लिये प्रस्ताव 22 जून 2009 को सौंपा।

वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा पर्यावरण प्रभाव आकलन को संचालित करने की कार्यसूची (टीओआर) 4 अगस्त 2009 को जारी की गई।

नए हवाईअड्डे के पर्यावरणीय और तटीय प्रभावों पर विचार करते हुए वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की पर्यावरणीय मूल्याँकन समिति ने 23 दिसम्बर 2009 को स्थल निरीक्षण किया। यह दौरा राज्य विधानसभा के चुनाव और बरसात की वजह से पहले नहीं हो सका। इस दौरा के आधार पर पर्यावरणीय प्रभाव आकलन के लिये वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने 8 फरवरी 2010 को अतिरिक्त कार्यसूची (टीओआर) जारी की।

नवी मुम्बई हवाईअड्डा पर सार्वजनिक सुनवाई की कार्यवाही की रिपोर्ट ‘महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण पर्षद’ से 7 जून 2010 को वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को मिली। इसके साथ ईआईए रिपोर्ट का प्रारुप भी संलग्न था।

महाराष्ट्र तटीय क्षेत्र प्रबन्धन प्राधिकरण (एमसीजेडएमए) से नए हवाईअड्डा के बारे में उसकी सिफारिशें माँगते हुए वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने 22 जून 2010 को लिखा। यह पत्र सिडको को भी भेजा गया और उससे अन्तिम ईआईए रिपोर्ट प्राधिकरण को उपलब्ध कराने का अनुरोध किया गया ताकि परीक्षण सम्भव हो सके।

जहाँ तक अगले कदम का सवाल है सिडको से अन्तिम ईआईओ रिपोर्ट और प्राधिकरण से अन्तिम सिफारिशों का वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के पास पहुँचना आवश्यक है। उसके बाद वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की विशेषज्ञ मूल्याँकन समिति इसपर विचार करेगी और अपनी सिफारिशें देगी जिसके बाद मैं समुचित निर्णय ले सकूंगा।

मैं यह भी स्पष्ट कर दूँ कि यह मामला वन एवं पर्यावरण मंत्रालय में लम्बित नहीं है। मैं मुम्बई में नए हवाईअड्डे की आवश्यकता को अच्छी तरह समझता हूँ। इसके साथ ही यह उम्मीद करता हूँ कि आप भी समझेंगे कि वर्तमान प्रस्ताव का तटीय इलाके पर उल्लेखनीय पर्यावरणीय प्रभाव होगा। इनमें 300 एकड़ के अधिक मैंग्रोव्स की क्षति, दो नदियों की धारा मोड़ना, 80 मीटर उंची पहाड़ी को समतल करना और तटीय क्षेत्र प्रबन्धन के मसले शामिल हैं।

नवी मुम्बई हवाईअड्डा के बारे में मुखर आदेश (22 नवंबर 2010)

मुम्बई में दूसरे अन्तरराष्ट्रीय हवाईअड्डा की आवश्यकता के बारे में भारत सरकार ने पहले पहल नवंबर 1997 में अध्ययन आरम्भ किया। नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने ‘भारतीय विमानपत्तन प्राधिकार’ के तत्कालीन अध्यक्ष की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया। इस समिति ने जून 2000 में अपनी रिपोर्ट दी। उसने सिफारिश किया कि मुम्बई का दूसरा हवाईअड्डा 2016-17 तक चालू हो जाए और इसके के लिये रेवास-मंडवा को सबसे उपयुक्त स्थल के रूप में चिन्हित किया। महाराष्ट्र राज्य सरकार ने अक्टूबर 2000 में नागरिक उड्डयन मंत्रालय को लिखा कि दूसरा हवाईअड्डा नवी मुम्बई में बनना चाहिए रेवास-मंडवा में नहीं। इसके पीछे तर्क दिया गया कि हवाईअड्डे के लिये जरूरी आधारभूत संरचना के विकास और अन्य कारणों के हिसाब से नवी मुम्बई ही उपयुक्त स्थल है। नवी मुम्बई का मुम्बई महानगरीय क्षेत्र में स्थित होना भी इसके पक्ष में था।

दिसम्बर 2000 में नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने महाराष्ट्र सरकार को नवी मुम्बई क्षेत्र में विस्तृत अध्ययन संचालित करने का निर्देश दिया।

सितम्बर 2001 में सिडको ने नवी मुम्बई में हवाईअड्डा निर्माण के लिये तकनीकी-आर्थिक सम्भाव्यता अध्ययन की रिपोर्ट नागरिक उड्डयन मंत्रालय को सौंपी।

अगस्त 2006 में अन्तरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन (आईसीएओ) ने राय दी कि उपयुक्त प्रक्रिया का पालन हो तो मुम्बई और नवी मुम्बई दोनों अन्तराष्ट्रीय हवाईअड्डा का एक साथ संचालन आर्थिक रूप से भी कम खर्चे वाला साबित होगा।

फरवरी 2007 में सिडको ने नवी मुम्बई हवाईअड्डा के बारे में संशोधित परियोजना सम्भाव्यता और व्यावसायिक योजना रिपोर्ट भारत सरकार को सौंपी।

जुलाई 2007 में केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने नवी मुम्बई में दूसरे अन्तरराष्ट्रीय हवाईअड्डा को सिद्धांत रूप में अनुमोदन दिया।

उसके बाद 27 अगस्त 2007 को नवी मुम्बई में ग्रीनफिल्ड हवाईअड्डा विकसित करने के बारे में प्रस्ताव सिडको ने वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को सौंपा। यह प्रस्ताव वापस लौटा दिया गया क्योंकि सीआरजेड अधिसूचना 1991 के अन्तर्गत नवी मुम्बई हवाईअड्डे को यह अनुमति नहीं दी जा सकती थी।

उसके बाद नागरिक उड्डयन मंत्रालय और सिडको ने 30 अक्टूबर 2007 को भारत सरकार से सीआरजेड अधिसूचना 1991 में संशोधन करने का अनुरोध किया ताकि नवी मुम्बई में नया हवाईअड्डा बनाया जा सके।

नवंबर 2007 में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को सीआरजेड अधिसूचना 1991 में संशोधन करने की प्रक्रिया आरम्भ करने के लिये कहा गया जिससे नवी मुम्बई में हवाईअड्डा का निर्माण सम्भव हो सके।

मई 2009 में मद्रास हाईकोर्ट ने सीआरजेड अधिसूचना 1991 में संशोधन करने की अनुमति प्रदान कर दी।

सीआरजेड अधिसूचना 1991 में संशोधन करके नवी मुम्बई में हवाईअड्डा के निर्माण को सीआरजेड क्षेत्र में अनुमति का आदेश आखिरकार 15 मई 2009 को इस शर्त के साथ जारी कर दिया गया कि पारिस्थितिकीय सुरक्षा के लिये कारगर उपाए किये जाएँगे।

पदभार ग्रहण करने के थोड़े दिन बाद ही 17 जून 2009 को मैंने पहले महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर नवी मुम्बई स्थल से जुडे़ गम्भीर पर्यावरणीय मसलों की ओर ध्यान दिलाया जिसमें 1. मैग्रोव्स की क्षति 2. गढ़ी नदी और ज्वार प्रभावित जलक्षेत्र उलाव को मोड़ना 3. पहाड़ी को हटाना शामिल है।

22 जून 2009 को सिडको ने पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) संचालित करने के लिये कार्यसूची (टीओआर) और उसके अनुमोदन के लिये एक प्रस्ताव वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को सौंपा।

वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा ईआईए के लिये कार्यसूची 4 अगस्त 2009 को जारी कर दी गई।

सम्बन्धित पर्यावरणीय मसलों का विचार करते हुए वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की ईएसी ने 23 दिसम्बर 2009 को कार्यस्थल का दौरा किया। यह दौरा पहले सम्भव नहीं हो सका क्योंकि राज्य विधानसभा के चुनाव थे और बरसात का मौसम था। कार्यस्थल के इस दौरे के आधार पर ईआईए के लिये अतिरिक्त कार्यसूची वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा 8 फरवरी 2010 को जारी की गई।

परियोजना के लिये सार्वजनिक जन सुनवाई ईआईए अधिसूचना 2006 के अनुसार 5 मई 2010 को आयोजित हुई।

नवी मुम्बई हवाईअड्डा के लिये अन्तिम ईआईए सिडको द्वारा 6 जुलाई 2010 को वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को सौंपा गया।

उसके बाद ईआईए पर वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की ईएसी द्वारा 22-23 जुलाई 2010 को विचार किया गया और राज्य सरकार से कई स्पष्टीकरण माँगे गए।

नवी मुम्बई स्थल के बारे में मैंने नागरिक उड्डयन मंत्रालय और महाराष्ट्र सरकार के साथ जुलाई और अगस्त 2010 में विस्तृत परामर्श किया। इनसे तीन मुख्य बिन्दु उभरे -

नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने समझाया कि अन्तरराष्ट्रीय हवाईअड्डा हर जगह समानांतर रनवे के साथ बनाया गया है । उसने पर्यावरणीय प्रभाव को न्यूनतम करने के लिहाज से नवी मुम्बई में केवल एक रनवे बनाने के विचार को ख़ारिज कर दिया।

सिडको ने बताया कि मुम्बई के साथ आसान सम्पर्क के अलावा नवी मुम्बई में सबसे बड़ी सुविधा यह है कि जितनी जमीन की जरूरत होगी, उसका अधिकांश (लगभग 66 प्रतिशत) पहले से उसके कब्जे में है (और अन्य करीब 12 प्रतिशत सरकारी जमीन है)। दूसरी जगह जमीन का अधिग्रहण न केवल अधिक खर्चिला होगा बल्कि लगभग असम्भव जैसा भी है।

नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने कल्याण के स्थल को सुरक्षागत कारणों से ख़ारिज करते हुये वाडा एवं रेवास-मुंडवा को भी लोकेशन और दूसरे तकनीकी कारणों से स्वीकार नहीं किया।

अगस्त 2010 तक यह स्पष्ट हो गया था कि विभिन्न तकनीकी और गैर-तकनीकी कारणों से नवी मुम्बई स्थल का चयन तय हो गया। वर्तमान हवाईअड्डे के संचालन में आ रही कठिनाईयों की वजह से मुम्बई में दूसरे हवाईअड्डे की तत्काल आवश्यकता थी। यह स्पष्ट रूप से एक सार्वजनिक संरचना है इसलिये मैंने दूसरे स्थल का चुनाव और भूमि अधिग्रहण में लगने वाले समय जैसी समस्याओं पर गौर करते हुए नवी मुम्बई में हवाईअड्डा बनाने के लिये स्वीकृति प्रदान कर दी। इसके साथ ही इस प्रोजेक्ट से जुडी पर्यावरणीय चिंताओं से निपटने में मैं पूरी तरह लग गया।मैंने बीएनएचएस (Bombay Natural History Society,बंबई नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी) से भी यह अनुरोध किया कि परियोजना क्षेत्र का त्वरित आकलन करें और प्राप्त निष्कर्षों से सिडको को अवगत कराए।

नागरिक उड्डयन मंत्रालय और सिडको, ईएसी के निर्देश पर अगस्त से अक्टूबर 2010 के बीच परियोजना की डिज़ाइन में पर्यावरणीय सरोकारों के उपाय खोजने के लिये परामर्शों में संलग्न रहे। उनसे मेरा सीधा सा अनुरोध था कि मैंग्रोव्स को बचाने के उपाय के साथ ही नदियों/ज्वार से प्रभावित जलक्षेत्रों में कम से कम बदलाव करें चाहे गैर-वैमानिकी सेवाओं से जुड़े कार्यों को किसी दूसरी जगह पर ही क्यों न शिफ्ट करना पड़े।

विभिन्न विकल्पों पर विचार किया गया लेकिन उस स्थल की प्रकृति की वजह से उसमें बड़े पैमानों पर बदलाव नहीं किया जा सकता था। उदाहरण के तौर पर पूरे मैंग्रोव्स को बचाने के लिये रनवे को दक्षिण दिशा में नहीं खिसकाया जा सकता था क्योंकि वहाँ पहले से ही हाईवे और रेल पटरियाँ थी जो प्राकृतिक सीमा के तौर पर काम करती थी। साथ ही टर्मिनल भवन को दोनों रनवे के बीच में बनाना था ताकि हवाईअड्डे के संचालन से सम्बन्धित कुशलता विश्वस्तरीय हो। मैंग्रोव्स के नुकसान को न्यूनतम करने के लिये एक रनवे को खम्भों पर आधारित बनाने के विकल्प को सुरक्षा कारणों से ख़ारिज कर दिया गया। 26/11 की डरावनी घटना के बाद सुरक्षा सम्बन्धी मसलों से कोई समझौता नहीं किया जा सकता था।

ईएसी ने 20 अक्टूबर 2010 को परियोजना स्थल का भ्रमण किया और सिडको के साथ अन्तिम डिज़ाइन के बारे में 22 अक्टूबर 2010 को विचार विमर्श किया। उसके बाद अपनी सिफारिशों को अन्तिम रूप दिया जो 20 नवंबर 2010 को मुझे प्राप्त हुए।

सभी अड़चनों को देखते हुए सन्तोषजनक समझौते के तौर पर परियोजना पर अन्तिम तौर पर सहमति बन गयी। थोड़ी सी आरम्भिक अनिच्छा के बाद सिडको मान गया और परियोजना प्रस्ताव में प्रमुख परिवर्तनों के लिये राजी हो गया ताकि पर्यावरणीय नुकसानों को कम से कम किया जा सके।

योजना से जुडी खासियतें:-

हवाईअड्डे की गैर-जरूरी सुविधाओं को दूसरी जगह भेज दिया गया और इसके परिणामस्वरूप सिडको द्वारा 245 हेक्टेयर का अच्छे किस्म का मैंग्रोव पार्क विकसित किया जा रहा है।

दो रनवे के बीच की दूरी को 1800 मीटर से घटाकर 1555 मीटर कर दिया गया। इसके कारण गढ़ी नदी को मोड़ने की जरूरत नहीं रही।

मोहा और पनवेल खाड़ी की ओर 60 हेक्टेयर का मैंग्रोव पार्क सिडको द्वारा विकसित किया जाएगा।

हवाईअड्डा स्थल के पूर्वोत्तर की ओर गढ़ी नदी, मनखुर्द-पनवेल रेल गलियारा और नेशनल हाईवे 4 बी के बीच 310 हेक्टेयर इलाके को ‘नो डेवलपमेंट जोन’ करार दिया जाएगा। वहीं यह भी निर्णय लिया गया कि सिडको नवी मुम्बई की मान्यता प्राप्त विकास योजना में परिवर्तन कर उचित प्रक्रिया का पालन करते हुए मैंग्रोव पार्क अथवा हरित क्षेत्र का विकास करेगी।

योजना से जुड़ी कमियाँ: -

जिस इलाके में रनवे का निर्माण हो रहा है उसमें लगभग 98 हेक्टेयर मैंग्रोव्स (अलबत्ता निम्न गुणवत्ता की) हमेशा के लिये नष्ट हो जायेंगे।

ज्वार प्रभावित ‘उलावे जलक्षेत्र’ की जल धारा को मोड़ने की जरूरत अभी भी बरक़रार थी। परन्तु इससे होने वाले सम्भावित नुकसान को कम करने के लिये अनेक सुरक्षात्मक उपाय ढूंढे गए।

रनवे पर सहज पहुँच बनाने के लिये 90 मीटर उंची पहाड़ी को हटाना होगा। पहाड़ी को वास्तव में पहले ही अनियंत्रित ढंग से तोड़कर पत्थर निकाल लिये गए है जिससे उसका पारिस्थितिकीय महत्त्व खत्म हो चुका है।

इस प्रकार मैंग्रोव के मामले में कुल मिलाकर निम्नलिखित तस्वीर बनती है

परियोजना स्थल पर मैंग्रोव अभी 161 हेक्टेयर में फैला है। लेकिन अब इस समझौते के बाद इसका कुल फैलाव (161-98)+60+245+310, यानि 678 हेक्टेयर रह जायेगा। अतः कुल मैंग्रोव के एरिया में से मात्र 98 हेक्टेयर ही हवाईअड्डा के निर्माण वाले भाग में पड़ेगा जो किसी भी मानदंड पर पारिस्थितिकीय दृष्टिकोण से एक बड़ी सकारात्मक उपलब्धि है।

नवी मुम्बई हवाईअड्डा को अन्तिम पर्यावरणीय अनुमति देते हुए वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने बत्तीस विशेष सुरक्षा उपायों एवं शर्तों के साथ ईएसी की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया।

इन शर्तों और सुरक्षा उपायों में प्रमुख निम्नलिखित हैं :-

मैंने पहले भी आपसे जुहू हवाईअड्डा क्षेत्र को मुम्बई महानगर के लिये हरित फेफड़े के तौर पर विकसित करने की आवश्यकता के बारे में उल्लेख किया है जो नागरिक उड्डयन मंत्रालय की मिल्कियत है। मैंने इसका उल्लेख नवीं मुम्बई हवाईअड्डा के बारे में अपने सार्वजनिक पत्र में भी किया है जिसकी प्रति आपके पास है। मैं सोचता हूँ कि इस इलाके में खूबसूरत जैवविविधता क्षेत्र विकसित करना महानगर के हित में अत्यंत आवश्यक है जहाँ खुला स्थान और हरियाली का घोर अभाव है।

सिडको मैंग्रोव को काटने के लिये माननीय बंबई हाईकोर्ट से आवश्यक अनुमति प्राप्त करेगा। साथ ही वन संरक्षण अधिनियम 1980 के अन्तर्गत जनहित याचिका संख्या 87/2006 में निवेदन संख्या 417 /2006 में दिए गए आदेश के मुताबिक आवश्यक अनुमति भी प्राप्त करेगा।

सिडको, हवाईअड्डा क्षेत्र में पड़ रहे सात गाँवों की दस बस्तियों के लगभग तीन हजार परिवारों को भारत सरकार या महाराष्ट्र सरकार की पुनर्वास और पुनर्स्थापन नीति (जो प्रभावित आबादी के हित में हो) के अनुसार पुनर्वास करेगा।

सिडको द्वारा मैंग्रोव के अन्तर्गत आने वाले 615 हेक्टेयर में जैवविविधता को सुनिश्चित किये जाने के साथ ही वहाँ प्रस्तावित पार्क को हवाईअड्डा शुरू होने के पहले ही विकसित कर लिया जाएगा।

उलावे नदी की धारा में प्रस्तावित परिवर्तन को देखते हुए, सतही जल निकासी और बाढ़ से बचाव के लिये एक समन्वित महायोजना तैयार की जाएगी और वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को सौंपी जाएगी।

सिडको हवाईअड्डा के आसपास के निचले इलाकों में बाढ़ को टालने के लिहाज से आकस्मिक योजना तैयार रखेगी। अगर जरूरी लगे तो गढ़ी नदी की चौड़ाई और गहराई बढ़ाने की जरूरत का भी अध्ययन किया जाएगा।

प्रस्तावित परियोजना के मूल प्रस्ताव में कई परिवर्तन हुए हैं। अतः ईआईए द्वारा एक ताज़ा रिपोर्ट तैयार की जानी चाहिए जिसमें हवाईअड्डा के अनुमोदित विन्यास,नयी जलविज्ञानी परिदृष्य, परिवर्तित टोपोग्राफी और भूमि उपयोग की सविस्तार से चर्चा की गयी हो। संशोधित ईआईए रिपोर्ट में बीएनएचएस द्वारा उठाए सवालों को समाहित करते हुए पारिस्थितिकीय आयामों को भी सम्मिलित करना चाहिए।

सिडको, हवाईअड्डा का निर्माण आरम्भ होने के पहले स्थानीय पक्षियों का बेसलाइन सर्वे करेगा और उसका विवरण हर तीन महीने पर बीएनएचएस के सहयोग से वेबसाइट पर डालेगा।

सभी अनिवार्य वैमानिकीय आवश्यकताओं को पूरा करने और हवाईअड्डा के आगामी विस्तार को देखते हुए प्रस्तावित हवाईअड्डा क्षेत्र इलाके (1160 हेक्टेयर) में किसी भू-सम्पदा का विकास नहीं किया जाएगा।

सिडको द्वारा पर्यावरणीय न्यूनीकरण उपायों के कार्यान्वयन की देखरेख करने के लिये एक उच्च स्तरीय सलाहकार और निगरानी समिति का गठन किया जायेगा जिसमें प्रतिष्ठित अन्तरराष्ट्रीय विशेषज्ञ शामिल होंगे। परियोजना की निगरानी विभिन्न स्तरों (योजना, निर्माण और संचालन) पर किया जाएगा और सभी अनुपालन रिपोर्टें तत्काल सार्वजनिक कर दी जाएँगी।

मैं विश्वास करता हूँ कि वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा आरम्भ में ही पर्यावरण के लिहाज से सुरक्षात्मक रूख अपनाने से फायदा हुआ और सभी सम्बन्धित पक्षों में बेहतरीन सहमति बन सकी।

यह सम्भव है कि कुछ पर्यावरणविद योजना के सम्बन्ध में हासिल किये गए समाधानों से अप्रसन्न हों। लेकिन मैं दृढ़ता से यह मानता हूँ कि यह सर्वोत्तम सम्भव समाधान है जो कई सप्ताह की बातचीत के बाद हासिल किया जा सका है। अब सिडको द्वारा अपनी जिम्मेवारियों को पूरा करने पर जोर दिया जाना चाहिए ताकि वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा लगाई गई शर्तों का पूरी तरह से पालन हो सके।

इसके अतिरिक्त मैंने नागरिक उड्डयन मंत्रालय से अनुरोध किया है कि वर्तमान जुहू हवाईअड्डा को राज्य सरकार और वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के सहयोग से मुम्बई नगर के हरित फेंफडे़ के तौर पर विकसित किया जाए।

महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय परियोजनाओं या मसलों के बारे में पिछले व्यवहार का पालन करते हुए मैं नवी मुम्बई हवाईअड्डे को पर्यावरणीय अनुमति प्रदान करने के इस नोट को तत्काल प्रभाव से सार्वजनिक करता हूँ। यहाँ पिछले व्यवहार का आशय है मंत्रालय द्वारा अपनायी गयी पूर्ण पारदर्शिता और जबाबदेही की नीति।

वे शर्तें जिनके अन्तर्गत पर्यावरणीय अनुमति दी गयी हैं उन्हें सिडको को भेज दिया गया है और मंत्रालय की वेबसाइट पर भी डाल दिया गया है।

जुहू हवाईअड्डा को मुम्बई के लिये हरित फेंफड़े के तौर पर विकसित करने के बारे में नागरिक उड्डयन राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) प्रफुल्ल पटेल को पत्र (24 नवंबर 2010)

मैंने पहले भी आपसे जुहू हवाईअड्डा क्षेत्र को मुम्बई महानगर के लिये हरित फेंफड़े के तौर पर विकसित करने की आवश्यकता के बारे में उल्लेख किया है जो नागरिक उड्डयन मंत्रालय की मिल्कियत है। मैंने इसका उल्लेख नवीं मुम्बई हवाईअड्डा के बारे में अपने सार्वजनिक पत्र में भी किया है जिसकी प्रति आपके पास है। मैं सोचता हूँ कि इस इलाके में खूबसूरत जैवविविधता क्षेत्र विकसित करना महानगर के हित में अत्यंत आवश्यक है जहाँ खुला स्थान और हरियाली का घोर अभाव है। पर्यावरणीय मसलों प्रति आपकी गहरी दिलचस्पी को जानने की वजह से मैं विश्वास करता हूँ कि आप इस विचार को स्वीकार करेंगे। इस परियोजना में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय, नागरिक उड्डयन मंत्रालय और राज्य सरकार साथ मिलकर एक टीम के रूप में काम कर सकते हैं।

प्रस्तावित नवी मुम्बई हवाईअड्डा का वाघावल्ली झील पर हानिकर प्रभाव के बारे में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चौहान को पत्र (15 मार्च 2011)

वैश्विक स्तर के वास्तुविद चार्ल्स कोरिया 10 मार्च 2011 को मुझसे मिले और बताया कि प्रस्तावित नवी मुम्बई हवाईअड्डा वागवल्ली झील के मध्य दाहिनी ओर स्थित है जो नवी मुम्बई के प्रस्तावित सिटी सेंटर का केन्द्रीय क्षेत्र है। श्री कोरिया के अनुसार प्रस्तावित हवाईअड्डा, नवी मुम्बई नगर की अवधारणा और स्वभाव को नष्ट कर देगा जिसके साथ वे आरम्भ से ही जुड़े रहे हैं। आखिर में उन्होंने कहा कि हवाईअड्डा का स्थान नवी मुम्बई की वर्तमान महायोजना का उल्लंघन करता है। इन बातों को सिडको या महाराष्ट्र सरकार ने नवी मुम्बई हवाईअड्डा के लिये ईसी/सीआरजेड अनुमति लेने के दौरान कभी मेरे मंत्रालय को नहीं बताया। आप अगर इस मामले को उचित प्राथमिकता के साथ जाँचने का निर्देश दें और श्री कोरिया के बयान की तथ्यात्मक स्थिति के बारे में हमें यथाशीघ्र सूचित करें तो मैं उपकृत महसूस करूंगा।

आदर्श सहकारी आवासीय समिति, मुम्बई के बारे में मुखर आदेश (16 जनवरी 2011)

आदर्श सहकारी आवासीय समिति के निर्माण के मुकदमे में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय का फैसला पूरे विस्तार से मंत्रालय की वेबसाइट पर उपलब्ध है। वहाँ तीन विकल्प उपलब्ध हैं-10

समूची संरचना को हटा देना क्योंकि यह अनाधिकृत है। सीआरजेड 1991 अधिसूचना के अन्तर्गत अनुमति नहीं ली गई है।

संरचना के उस हिस्से को हटाना है जो फ्लोर स्पेस इंडेक्स (एफएसआई) से अधिक है। इसकी अनुमति यदि उपयुक्त प्राधिकार से माँगी गई होती तो दी जा सकती थी।

सरकार द्वारा इमारत के अधिग्रहण की सिफारिश करना। इसके सार्वजनिक इस्तेमाल के बारे में बाद में तय किया जाएगा।

विकल्प 2 को ख़ारिज कर दिया गया क्योंकि यह नियमित करने के समतुल्य या सीआरजेड अधिसूचना के जबरदस्त उल्लंघन को माफ करना होता। विकल्प 3 पर विचार किया गया परन्तु उसे भी ख़ारिज कर दिया गया क्योंकि (1) भले ही इस्तेमाल सार्वजनिक हित में हो पर इसका नियमितीकरण सीआरजेड अधिसूचना 1991 के उल्लंघन को माफ करके ही किया जा सकता है। (2.) अधिग्रहण की अवस्था में राज्य या केन्द्र सरकार के पास उल्लेखनीय विवेकाधिकार होंगे। इस प्रकार, आदर्श सहकारी आवासीय समिति (एसीएचएस) के कागजातों में प्रस्तुत सभी तथ्यों, परिस्थितियों, बहसों, विचारों, दलीलों और विश्लेषणों को देखते हुए मैंने विकल्प 1 को अपनाने का फैसला किया है। इस तरह के उल्लंघन के अन्य मामले भी हो सकते हैं और एसीएचएस द्वारा ऐसे जबरदस्त उल्लंघन के मामले में दंडात्मक कार्रवाई को कम करने का आधार नहीं बन सकता। कोई अन्य कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट और देश के विभिन्न हाईकोर्टस के निर्णयों से स्थापित मजबूत दृष्टांतों को कमजोर करना होगा।

एसीएचएस ने सीआरजेड अधिसूचना 1991 की मूल भावना के अनुसार ‘अनुमति प्राप्त करने की आवश्यकता’ को स्वीकार नहीं करके उल्लंघन किया है। वे इसकी आवश्यकता से अवगत थे या नहीं,यह कोई मायने नहीं रखता क्योंकि कानून के प्रति अनजान होना उसका अनुपालन नहीं करने का बहाना नहीं बन सकता।अन्त में, मैं इसपर जोर देना चाहता हूँ कि 7 जनवरी 2011 को ‘सीआरजेड अधिसूचना 2011’ के प्रकाशन से एसीएचएस जैसे मामलों में कोई फर्क नहीं पड़ता। सीआरजेड अधिसूचना 2011 में ऐसे मामलों से सुरक्षा के प्रावधानों के अतिरिक्त यह व्यवहार संविधान की धारा 20(1) में प्रतिस्थापित सिद्धांतों से भी सही सिद्ध होता है जो कहता है कि ‘‘कोई व्यक्ति अपराध होने के समय प्रभावी कानून के अलावा किसी कानून के उल्लंघन के लिये अपराधी नहीं ठहराया जा सकता।’’ इस प्रकार एसीएचएस ने कानून का उस समय उल्लंघन किया था जब सीआरजेड अधिसूचना 1991 प्रचलित थी। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा कार्रवाई उस समय आरम्भ की गई जब सीआरजेड अधिसूचना 1991 प्रचलित थी। इस प्रकार एसीएचएस के खिलाफ कार्रवाई जारी रहेगी।

सेल के चिड़िया लौह-अयस्क खदान के लिये वन अनुमति के बारे में मुखर आदेश (9 फरवरी 2011)

पृष्ठभूमि

झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले में सारंडा जंगल स्थित चिड़िया लौह-अयस्क खदान परिसर का नियंत्रण, पूर्ववर्ती निजी मिल्कियत वाली इंडियन आयरन एंड स्टील कम्पनी (आईआईएससीओ, इस्को) ने 1936 में ग्रहण किया था।

इस्को, 1978 में सेल की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कम्पनी बन गई और अन्तिम विलय 2006 में इस आधार पर हुआ कि खदानों को सेल को सौंपना होगा क्योंकि वह इस्को के खाते में हुए उल्लेखनीय नुकसानों की भरपाई करने के लिये मजबूर हुआ।

चिड़िया खदान परिसर 2376 हेक्टेयर में फैला है जो समूचे सारंडा वन क्षेत्र का करीब 3 प्रतिशत है। इसमें से 194 हेक्टेयर (8 प्रतिशत) पहले ही विखंडित हो चुका है। सेल का प्रस्ताव जो वन एवं पर्यावरण मंत्रालय में वन अनुमति के लिये आया (पर्यावरणीय अनुमति पहले ही प्राप्त कर ली गई थी) उसमें दो अवयव हैं-1. पहले से खंडित 194 हेक्टेयर में खनन की अनुमति का नवीकरण 2. अतिरिक्त 401 हेक्टेयर (17 प्रतिशत) में खनन करने की अनुमति। इस प्रकार कुल 595 हेक्टेयर वनभूमि के विचलन की अनुमति माँगी जा रही है जो समूचे चिड़िया खदान क्षेत्र का 25 प्रतिशत होता है। अनुमति 20 वर्षों के लिये माँगी गई है।

निर्णय में विचारणीय कारक

सेल के प्रस्ताव पर अनुमति प्रदान करने का निर्णय करते हुए मैंने निम्नलिखित कारकों का ध्यान रखा- सेल सार्वजनिक क्षेत्र की एक ‘महारत्न’ कम्पनी है। इसकी कारपोरेट सोशल रिस्पाँसिबिलिटी का रिकार्ड बेहतरीन है और वह पक्के आर्थिक प्रमाणिकता के इस जमाने में भी विशेष व्यवहार की पात्र है।

सेल के पास 18 हजार करोड़ की आरम्भिक सार्वजनिक हिस्सेदारी (आईपीओ) है और इससे हुई आमदनी का 50 प्रतिशत सरकार के पास जायेगा। इसीलिये सम्पूर्ण सूचनाओं के आने का इंतजार किए बगैर शीघ्र निर्णय करना जरूरी है।

माननीय प्रधानमंत्री ने अगस्त 2007 में व्यापक राष्ट्रीय हित में सेल के पक्ष में चिड़िया खनन पट्टे के नवीकरण का अनुरोध करते हुए झारखंड के मुख्यमंत्री को लिखा है।

सेल को चिड़िया माइन्स में दो पट्टों के लिये वन अनुमति क्रमशः जुलाई 1998 और अक्टूबर 1998 में ही दी जा चुकी है।

सेल के भविष्य के लिये चिड़िया माइंस आवश्यक है। आगामी पचास वर्षों तक सेल के लौह अयस्क की आवश्यकता का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा चिड़िया खदानों से पूरा हो जायेगा। इसके अलावा सेल के पास उपलब्ध यह इकलौता सघन खदान है।

केवल नवीकरण की अनुमति देना, सेल के कच्चे माल की आवश्यकता को पूरा करने के लिये कुल मिलाकर अपर्याप्त होगा। नवीकरण के लिये विचाराधीन पट्टे के अन्तर्गत याँत्रिकीकरण सम्भव नहीं होगा और वह वर्ष 2020 में समाप्त भी हो जाएगा।

बोकारो, बर्नपुर, दुर्गापुर, और राउरकेला में मौजूद इस्पात प्रकल्पों को वर्तमान में अयस्क मुहैया करा रहे खदानों के भंडार दस-बारह साल में समाप्त हो जायेंगे उसके बाद इन्हें निश्चित ही चिड़िया माइंस से आए लौह अयस्क से संचालित करना होगा।

चिड़िया वामपंथी उग्रवाद प्रभावित इलाका है जहाँ अच्छी संख्या में आदिवासी आबादी है। सेल द्वारा कारपोरेट सोशल रिस्पाँसिबिलिटी (सीएसआर) के तहत आनेवाली गतिविधियाँ इलाके के सामाजिक आर्थिक विकास में सहायक हो सकती हैं। खासकर हो आदिवासी समुदाय के मामले में।

उत्पादन शुरू करने में लगने वाले समय को ध्यान में रखते हुए चिड़िया माइंस के मामले में शीघ्र अनुमोदन प्रदान करने की आवश्यकता है क्योंकि इस क्षेत्र में कई कारणों से काम करना आसान नहीं है।

निर्णय को निर्देशित करती विशिष्ट परिस्थितियाँ

यद्यपि वन-अनुमति को नियंत्रित करने वाली आम शर्तों (जैसे क्षतिपूरक वनीकरण और एनपीवी इत्यादि से सम्बन्धित) के अन्तर्गत दी जा रही हैं। इस अनुमोदन के लिये तेरह विशेष शर्तें लगाई जा रही हैं। वे निम्नलिखित हैं :-

वन क्षेत्र के अन्तर्गत केवल प्रारम्भिक और द्वितीयक क्रसिंग किया जाएगा। प्रोसेसिंग बेनिफिसिएशन, ब्लेंडिंग, स्टॉकपाइलिंग, रेलवे साइडिंग, अधिसंरचनाएँ और सभी नगरीय सुविधाएँ 15 किलोमीटर दूर, गैर वनभूमि पर होगी। अयस्क की ढुलाई के लिये केवल कन्वेयर प्रणाली का इस्तेमाल किया जाएगा।

अधिक बिखराव को टालने के लिये खनन सम्बन्धी गतिविधियों में संकुल प्रबन्धन पद्धति को अपनाया जाएगा और इलाके का विखंडन विभिन्न चरणों में किया जाएगा। जलसंग्रह स्थल के उपर के वनक्षेत्र में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा।

वनपथ का उपयोग रात के दौरान सेल द्वारा नहीं किया जाएगा।

सेल कामकाज के आरम्भ से ही चिड़िया में एक वन्यजीव प्रबन्धन टोली तैनात रखेगा जो खनन का वन्यजीवों पर होने वाले प्रभावों की निगरानी करेगी और उनके निदान के उपाय करेगी।

अगले बीस वर्षों में कुल वन क्षेत्र का केवल 25 प्रतिशत (लगभग 595 हेक्टेयर) का विखंडन किया जा सकेगा।

सारंडा वन प्रक्षेत्र पर खास ध्यान देते हुए इस इलाके में वन्यजीवों और जैव विविधता से सम्बन्धित कार्यक्रमों को संचालित करने के लिये सेल आगामी पाँच वर्षों में 20 करोड़ रुपये का योगदान करेगा।

सार्वजनिक उद्यम विभाग द्वारा जारी निर्देशावली के अनुसार सेल अपने शुद्ध मुनाफा का कम से कम दो प्रतिशत सीएसआर गतिविधियों (वन्यजीव और जैव विविधता प्रबन्धन कार्यक्रम से अलग) के लिये निर्धारित करेगा।

सीएसआर में स्थानीय युवकों के लिये व्यावसायिक और कौशल विकास कार्यक्रम शामिल होंगे जिनका आरम्भ खनन गतिविधियों के साथ-साथ हो जाएगा। स्थानीय युवकों को अधिक से अधिक रोजगार उपलब्ध कराए जाएँगे।

भूस्खलन और जलधाराओं के अवरूद्ध होने के मामलों को न्यूनतम करने के लिये समुचित न्यूनीकरण उपाय अपनाए जायेंगें।

कोयना नदी में गन्दे पानी का विसर्जन नहीं किया जायेगा। इसे भी सुनिश्चित करने के उपाय किए जाएँगे कि नदी प्रदूषित न हो। यह राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण पर्षद द्वारा समीक्षा का विषय होगा। वनों के स्वास्थ्य के लिये नदी की पारिस्थितिकी महत्त्वपूर्ण है।

वर्तमान में सेल के पास खदान पट्टे का समूचा 2376 हेक्टेयर क्षेत्र रहेगा।पाँच साल के लिये भूमि उपयोग की योजना बनाई जाएगी और उसके अनुसार वृक्षों की कटाई को नियंत्रित किया जाएगा।

सेल की सहायता से भारतीय वन्यजीव संस्थान, भारतीय वन्यजीव न्यास और वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड फॉर नेचर ( World Wildlife Fund for Nature, डब्लूडब्लूएफ) मिलकर वन्यजीव और जैव विविधता के प्रबन्धन की समन्वित योजना तैयार करेंगे। इस अध्ययन में सारंडा जंगल के उन इलाकों चिन्हित किया जाना भी शामिल है जिनके वर्त्तमान स्वरुप से कोई छेड़छाड़ नहीं किया जायेगा। यह अध्ययन तत्काल आरम्भ होना चाहिए।

हाल के महीनों में पारिस्थितिकीय लिहाज से संवेदनशील इलाकों में (दुआरगुईबुरू के साथ-साथ किरिबुरू-मेघाहातुबुरू में) खनन की अनुमति दी गई है। इसे देखते हुए सेल को तत्काल एक पूर्णकालिक कार्यकारी निदेशक के अधीन परमानेंट वन प्रबन्धन टोली का गठन करना चाहिए जिसका इकलौता कार्य वन प्रबन्धन होना चाहिए।

सारंडा वन क्षेत्र की पारिस्थितिकीय संवेदनशीलता को देखते हुए वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने प्रत्यक्ष जिम्मेवारी उठा ली और एक मल्टीडिसिप्लिनरी एक्सपर्ट कमिटी (जिसमें न केवल पारिस्थितिकीविद होंगे, बल्कि मानव विज्ञानी भी रखे जाएँगे) का गठन किया। सारंडा वन क्षेत्र की निगरानी की जिम्मेवारी कमिटी पर होगी। इसके अलावा कमिटी की यह भी जिम्मेवारी होगी कि वह वन क्षेत्र की निगरानी, मूल्याँकन और अनुपालन की रिपोर्ट प्रति तिमाही सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराए। यह हाथियों के वासस्थलों और आवागमन के रास्तों पर खनन के प्रभाव से जुड़ी चिंताओं पर खासतौर से नजर रखेगी।

अन्तिम शब्द

एफएसी एक वैधानिक संस्था है।मैंने इसके कामकाज में हस्तक्षेप करने का कभी कोई प्रयास नहीं किया। इसके विपरीत मैंने अपनी सीमा से बाहर जाकर यह सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि यह पेशेवर और स्वतंत्र ढंग से काम करे। मैंने सरकार के बाहर से विशिष्ट विशेषज्ञों को लाकर एफएसी का सदस्य बनाया है।

अधिकतर बार मैंने एफएसी की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया है। पर कई अवसर ऐसे भी आए हैं जब एफएसी ने अनुमोदन करने की सिफारिश की और मैंने स्पष्ट कारण बताते हुए अपने निर्णय से किसी खास मामले को ख़ारिज कर दिया। उदाहरण के तौर पर हिमाचल प्रदेश स्थित रेणुका बाँध परियोजना जिसे एफएसी ने अनुमोदित किया था पर मैंने विशुद्ध रूप से पारिस्थितिकीय कारणों से उसे ख़ारिज कर दिया। दूसरी ओर दो अवसर ऐसे भी आए जब एफएसी ने ख़ारिज करने की सिफारिश की थी और मैंने अपने निर्णय का इस्तेमाल किया और उसकी सिफारिशों को उलट दिया-पहला पोस्को था और दूसरा वर्तमान चिड़िया खदान का मामला।

प्रस्तावित परियोजना टाडोबा-अन्धारी टाइगर रिजर्व के बाहर के वन्यजीवों के लिये भी हानिकारक है। ब्रह्मपुरी और चंद्रपुर के वन प्रक्षेत्रों पर इसका ज्यादा असर पड़ेगा क्योंकि ये दोनों ही परियोजना के लिये प्रस्तावित स्थल से भौगोलिक रूप से जुड़े हुए हैं। परियोजना के लिये आवश्यक रेल और सड़क के लिये बड़े पैमाने पर अतिरिक्त वनभूमि के विचलन की जरूरत होगी जिससे वासस्थलों का विखंडन होगा।

एफएसी एकनिष्ठता से वन एवं जैव विविधता से सम्बन्धित मसलों पर केंद्रित होकर विचार करेगा। जबकि मंत्री के तौर पर मुझे निश्चित तौर पर एक व्यापक दृष्टिकोण अपनाना होगा और रिकॉर्ड को सार्वजनिक रखना होगा।

टाडोबा-अन्धारी टाइगर रिजर्व के आसपास खनन की अनुमति नहीं देने के बारे में प्रधानमंत्री को पत्र (4 फरवरी 2010)

मैंने टाडोबा-अन्धारी टाइगर रिजर्व के निकट लोहारा और चंद्रपुर जिलों का दौरा किया है जहाँ अडानी पावर लिमिटेड को कोयला खदान आवंटित की गई है। मैंने वस्तुतः एक पूरा दिन लोहारा और चंद्रपुर के विभिन्न लोगों से मुलाकात करने में गुजारा, साथ ही प्रस्तावित खनन स्थल को भी कुछ विस्तार से देखा।

अपने सरजमीनी दौरे के आधार पर मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि हमें इस कोयला खनन परियोजना को आगे बढ़ने की इजाजत किसी भी स्थिति में नहीं देनी चाहिए। इसके निम्नलिखित कारण उल्लेखनीय हैं :-

प्रस्तावित पट्टा क्षेत्र समृद्ध जैव विविधता और घने जंगलों, खासकर सागवान वृक्षों के बीच स्थित है। इस परियोजना से एशिया का सबसे बड़ा और इकलौता सागवान का जीन -पुल (gene pool) नष्ट हो जायेगा। इसमें 250 से अधिक क्लोन हैं।

खनन स्थल उस गलियारे में पड़ता है जो टाडोबा-अन्धारी टाइगर रिजर्व को अन्य संरक्षित क्षेत्रों खासकर पूर्वी और दक्षिणी तरफ से जोड़ता है जो छत्तीसगढ़, आन्ध्रप्रदेश और मध्यप्रदेश तक फैले हैं।

प्रस्तावित परियोजना टाडोबा-अन्धारी टाइगर रिजर्व के बाहर के वन्यजीवों के लिये भी हानिकारक है। ब्रह्मपुरी और चंद्रपुर के वन प्रक्षेत्रों पर इसका ज्यादा असर पड़ेगा क्योंकि ये दोनों ही परियोजना के लिये प्रस्तावित स्थल से भौगोलिक रूप से जुड़े हुए हैं। परियोजना के लिये आवश्यक रेल और सड़क के लिये बड़े पैमाने पर अतिरिक्त वनभूमि के विचलन की जरूरत होगी जिससे वासस्थलों का विखंडन होगा।

मैंने पाया कि चंद्रपुर में बहुत बड़ी संख्या में नागरिक संगठन इस परियोजना के एकदम खिलाफ हैं। भारतीय प्रोद्यौगिकी संस्थान, दिल्ली द्वारा कराए गए अध्ययन के अनुसार चंद्रपुर देश का चौथा सर्वाधिक प्रदूषित औद्योगिक क्षेत्र है। इस प्रदूषण का पहले से ही जनस्वास्थ्य पर गम्भीर असर हो रहा है जैसाकि अनेक चिकित्सकों ने चंद्रपुर में मुझे बताया। मैंने स्वयं खनन कम्पनियों के खराब पर्यावरण प्रबन्धन को देखा है जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनी वेस्टर्न कोलफिल्ड्स भी शामिल है।कम्पनी के इस रवैये से लोगों में दिनों-दिन असन्तोष बढ़ता जा रहा है। स्पष्ट तौर पर चंद्रपुर के लोग पर्यावरणीय और पारिस्थितिकीय मसलों के प्रति अधिक सतर्क हैं। चंद्रपुर निश्चित ही कुछ उन जगहों में शामिल है जहाँ एक टाइगर रिजर्व को बचाने के पक्ष में बन्द रखा गया।

7 जनवरी 2010 को वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने अडानी की कोयला परियोजना को ख़ारिज कर दिया है और कोयला मंत्रालय से दूसरा कोयला ब्लॉक आवंटित करने का अनुरोध किया है। यह कार्यवाई राष्ट्रीय ब्याघ्र संरक्षण प्राधिकरण के सदस्य सचिव द्वारा तैयार रिपोर्ट के आधार पर की गई जिन्होंने करीब दो महीना पहले मेरे अनुरोध पर इलाके का दौरा किया था। चूँकि शरद पवार और प्रफुल्ल पटेल आपसे मिले मिलें और मेरे रूख पर चिंता व्यक्त की है। मैंने लोहारा का दौरा करने के लिये स्वयं को प्रस्तुत किया ताकि यह देख सकूं कि क्या किया जा सकता है। मेरे दौरे ने इस निष्कर्ष को फिर से पुष्ट किया कि यह परियोजना कतई राष्ट्र हित में नहीं है।


मेघालय में यूरेनियम खनन के प्रस्ताव को ख़ारिज करते हुए टिप्पणी (10 मई 2010)

वन्यजीवों पर राष्ट्रीय बोर्ड की स्थाई समिति की उन्नीसवी बैठक (1 मई 2010 को) वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के राज्यमंत्री(स्वतंत्र प्रभार) जयराम रमेश की अध्यक्षता में हुई। विस्तृत विचार विमर्श के बाद स्थायी समिति ने मेघालय के दक्षिण गारो पहाड़ी जिले के बाल्फाक्रम राष्ट्रीय उद्यान में रोंगचेंग पठार पर यूरेनियम की खोज के लिये खुदाई के प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया। यह प्रस्ताव परमाणु उर्जा विभाग द्वारा भेजा गया था।

स्थाई समिति ने यह फैसला स्थानीय लोगों की भावनाओं को देखते हुए अनेक स्थानीय नागरिक समूहों द्वारा दिए गए ज्ञापनों के आधार पर किया। बावजूद इसके कि वन एवं पर्यावरण राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) ने स्वीकार किया कि देश को घरेलू यूरेनियम आपूर्ति बढ़ाने की अत्यधिक आवश्यकता है। स्थाई समिति ने अपने एक सदस्य - बीएनएचएस के डॉ. असद रहमानी द्वारा बाल्फाक्रम राष्ट्रीय उद्यान के आस-पास गैरकानूनी निजी कोयला खनन के बारे में तैयार रिपोर्ट पर भी विचार किया। रिपोर्ट में की गई सिफारिशों का कार्यान्वयन करने के लिये राज्य सरकार पर दबाव डालने का फैसला लिया गया। उन सिफारिशों में 1. राष्ट्रीय पार्क के बीच सभी प्रकार के खनन और सड़क निर्माण पर फौरन रोक लगाना। 2. गारो पहाड़ी और राज्य के दूसरे हिस्सों में सभी कोयला खदानों पर कठोर नियंत्रण। 3. समुचित खनन योजना का कार्यान्वयन जो सुनिश्चित करेगा कि खनन से स्थानीय लोगों को अधिकतम लाभ प्राप्त हो सके। डॉ. रहमानी की रिपोर्ट मंत्रालय की वेबसाइट पर उपलब्ध है।

परमाणु उर्जा विभाग के सचिव और परमाणु उर्जा आयोग के अध्यक्ष अनिल काकोदकर को नीलगिरी में भारत-आधारित न्यूट्रिनो वेधशाला (आईएनओ) परियोजना पर उठ रही आपत्तियों के बारे में पत्र

8 जुलाई 2009

मुझे नीलगिरी में प्रस्तावित आईएनओ परियोजना के बारे में पूर्व कैबिनेट सचिव और प्रधानमंत्री के पूर्व प्रधान सचिव बीजी देशमुख का पत्र मिला है। करीब दो सप्ताह पहले इस परियोजना के बारे में डॉ. एमआर श्रीनिवासन भी मुझसे मिलने आए थे।

आप साधारण तौर पर विज्ञान और तकनीक तथा विशेषकर परमाणु उर्जा विभाग के प्रति मेरी अगाध प्रतिबद्धता के बारे में जानते हैं। फिर भी मैं श्री देशमुख और डॉ. श्रीनिवासन (संयोग से दोनों परमाणु उर्जा आयोग के पूर्व सदस्य हैं) ने जो कहा, उसकी अनदेखी नहीं कर सकता। मैं बेहद विनम्रतापूर्वक आपसे अनुरोध करता हूँ कि क्या इस आईएनओ परियोजना के लिये किसी वैकल्पिक स्थान का चयन किया जा सकता है? इसे देखें। जिस स्थल का आपने चयन किया है वह पारिस्थितिकी के लिहाज से बहुत ज्यादा संवेदनशील है और मुडुमलाई टाइगर रिजर्व के काफी करीब है। इसका स्थानीय जलछाजन पर भी हानिकारक प्रभाव होगा।

मैं आईएनओ के महत्त्व से भलीभाँति अवगत हूँ, परन्तु इस परियोजना से उत्पन्न हो रहे व्यापक पर्यावरणीय मसलों को अपने संज्ञान में नहीं लिया तो अपनी नई मंत्रिमंडलीय जिम्मेवारी से जुड़े कर्तव्यों को पूरा करने में असफल रहूँगा।

नीलगिरी में आईएनओ परियोजना को ख़ारिज करने के निर्णय की सूचना देते हुए परमाणु उर्जा विभाग के सचिव और परमाणु उर्जा आयोग के अध्यक्ष अनिल काकोदकर को पत्र (20 नवंबर 2009)

मैंने आईएनओ परियोजना के बारे में लम्बे समय तक और गहराई से सोचा है। मेरे जोर देने पर राष्ट्रीय ब्याघ्र संरक्षण प्राधिकरण के अतिरिक्त सदस्य सचिव, अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन-संरक्षक (पीसीसीएफ) और राष्ट्रीय ब्याघ्र संरक्षण प्राधिकरण के सदस्य सचिव ने भी सिंगारा, जिला नीलगिरी, तमिलनाडु का दौरा किया और बिन्दुवार रिपोर्ट दिया जो संलग्न है।

मैं आईएनओ परियोजना के प्रति बेहद सहानुभूति रखता हूँ। यह हमारे कुछ सर्वोत्तम संस्थानों और कुछ सर्वाधिक समर्पित वैज्ञानिकों द्वारा कार्यान्वित किया जा रहा है। इसका महत्त्व केवल सैद्धांतिक भौतिकी के परिप्रेक्ष्य में नहीं है बल्कि प्रायोगिक भौतिकी के लिये भी यह बेहद महत्त्वपूर्ण है। यह ऐसा क्षेत्र है जिसमें भारत परम्परागत रूप से कमजोर है। मैंने प्रस्तावित वेधशाला के पर्यावरण प्रबन्धन योजना और पर्यावरण प्रभाव आकलन को भी पढ़ा है और मैं इन रिपोर्टों के विस्तार और पर्यावरणीय मसले के प्रति संवेदनशीलता की सराहना करता हूँ।

मैं भारतीय विज्ञान का हमेशा से कट्टर समर्थक रहा हूँ और ऐसा कुछ भी करना नहीं चाहूँगा जो भारतीय वैज्ञानिक समुदाय के उत्साह को भंग करे। फिर भी वन एवं पर्यावरण मंत्री के तौर पर मुझे प्रस्तावित स्थल के खिलाफ बड़ी संख्या में मिली रिपोर्टों का ध्यान भी रखना होगा। इसके अतिरिक्त पीसीसीएफ एवं एमएस-एनटीसीए ने बहुत ही वजनदार कारण बताया है जो सिंगारा के विरूद्ध प्रभावी होगा। मैंने सभी बिन्दुओं पर वस्तुनिष्ठ ढंग से विचार किया है और इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि सिंगारा स्थल उपयुक्त नहीं होगा। अतिरिक्त पीसीसीएफ एवं एमएस-एनटीसीए द्वारा सुझाए गए वैकल्पिक स्थल सुरूलियार के बारे में परमाणु उर्जा विभाग को गम्भीरता से विचार करना चाहिए। हम अपनी तरफ से वैकल्पिक स्थल के लिये आवश्यक अनुमति प्रदान करने की कोशिश करेंगे। मुझे बताया गया है कि वैकल्पिक स्थल पर उस तरह की समस्याएँ नहीं है, जैसी सिंगारा में हैं। यहाँ के लिये पर्यावरणीय एवं वन के दृष्टिकोण से अनुमति देने में गम्भीर कठिनाई है।

मैंने विभिन्न विचारों को सुनने में काफी समय लगाया है जिसमें भारतीय विज्ञान संस्थान के प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. आर सुकुमार भी हैं जिन्हें नीलगिरी बायोस्फेयर रिजर्व में बीस वर्षों के काम का अनुभव है। उन्होंने मेरे अनुरोध पर तैयार एक टिप्पणी में स्पष्ट कहा है कि सिंगारा के खिलाफ दलीलें बहुत हद तक अतिश्योक्तिपूर्ण और बेवजह हैं। फिर भी पर्यावरणीय प्रबन्धन योजना में विभिन्न सुरक्षात्मक उपाए प्रस्तावित किए गए हैं। मैं डॉ. सुकुमार का बहुत सम्मान और आदर करता हूँ लेकिन मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचने के लिये बाध्य हूँ कि सिंगारा स्थल को लेकर आगे नहीं बढ़ना चाहिए। मैंने आईएनओ परियोजना से जुडे़ वैज्ञानिकों से बातचीत की है और मैंने पाया है कि वे पर्यावरणीय मसलों को लेकर उतने ही सावधान है, जितने वे एनजीओ, जो इस परियोजना के खिलाफ हैं। हालांकि मैं सन्तुलन रखने के ख्याल से सोचता हूँ कि निर्णय को निश्चित ही सिंगारा के खिलाफ होना चाहिए।

बोडी पश्चिमी पहाड़ी संरक्षित वन में आईएनओ के लिये अनुमति के बारे में टिप्पणी (परमाणु उर्जा विभाग द्वारा पहले चयनित स्थल पर वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की आपत्ति को देखते हुए इस स्थल को लेकर सहमति बनी।)

18 अक्टूबर 2010

परमाणु उर्जा विभाग के न्यूट्रिनो वेधशाला, तमिलनाडु के थेनी जिले में बोडी पश्चिमी पहाड़ी संरक्षित वन क्षेत्र में स्थापित करने के प्रस्ताव को वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने पर्यावरणीय और वन अनुमति दोनों प्रदान कर दिया। यह अनुमोदन इस शर्त के अधीन है कि वृक्षों की कटाई नहीं होगी और वन आच्छादन को कोई नुकसान नहीं होगा। सुरंग बनाने रोड़े-पत्थर व कचरे फेंकने के प्रभावों को न्यूनतम करने के उपाय किए जायेंगे। इसके साथ ही पर्यावरण प्रबन्धन योजना जिसे कोयंम्बटूर स्थित सलीम अली सेंटर फॉर ऑर्निथोलोजी एंड नेचुरल हिस्ट्री ने तैयार किया है का पूरा कार्यान्वयन किया जाएगा। न्यूट्रिनो वेधशाला परियोजना भारत की वैज्ञानिक नेतृत्व के लिये महत्त्वपूर्ण है। इसका कार्यान्वयन टाटा इंस्टीच्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (Tata Institute of Fundamental Research,टीआईएफआर) द्वारा किया जाएगा। देश के अन्य बीस वैज्ञानिक संस्थान संकाय भी इसका हिस्सा हैं। यह भूगर्भीय विज्ञान और प्राथमिक तौर पर न्यूट्रिनो भौतिकी का विश्वस्तरीय प्रयोगशाला होगा। यह प्रकृति के बुनियादी कानूनों को समझने के बारे में शोध अध्ययन में भारत को तीक्ष्णता प्रदान करेगा। यह केवल सैद्धांतिक भौतिकी की एक परियोजना भर नहीं है। इसमें उपकरणों के विकास ही बड़े आकार के प्रयोगों में भी शामिल होगा। वर्ष 2015 में अनुमानित लागत 1000 करोड़ रूपयों से इसका निर्माण कराया जायेगा। इसमें विश्व का सबसे विशालकाय चुम्बक अवस्थित होगा और यहाँ 200 से अधिक वैज्ञानिक कार्य करेंगे।

वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को प्रसन्नता है कि परमाणु उर्जा विभाग ने पहले प्रस्तावित सिंगारा स्थल से जुड़े पारिस्थितिकीय सरोकारों को स्वीकार कर लिया है। इस कार्य के लिये परमाणु ऊर्जा विभाग ने बोडी पश्चिमी पहाड़ी पर अपनी सहमति दे दी है।

केन-बेतवा नदी को जोड़ने का पन्ना रिजर्व में बाघ, वन्यजीव और दूसरे जीवजंतुओं पर नुकसानदेह प्रभाव का उल्लेख करते हुए इसके खिलाफ सलाह के साथ प्रधानमंत्री को पत्र (4 अप्रैल 2011)

मैं जल संसाधन मंत्रालय को बताता रहा हूँ कि यह परियोजना मध्य प्रदेश में पन्ना टाइगर रिजर्व को डुबो देगी। पन्ना का कुल आकार अब 542 वर्ग किलोमीटर है। परियोजना के प्रभावी होने पर टाइगर रिज़र्व का 44 वर्ग किलोमीटर का हिस्सा जलमग्न हो जाएगा जो इसके अन्तर्गत आने वाले कुल क्षेत्रफल 8 प्रतिशत है। हालांकि डूबक्षेत्र में आने वाला इलाका टाइगर रिजर्व का अांतरिक क्षेत्र है। जैसाकि आप जानते हैं कि पन्ना का इतिहास समस्याग्रस्त रहा है और एकबार 2009 में इसके सारे बाघ समाप्त हो गए थे। उसके बाद हमने महत्त्वाकांक्षी बाघ पुनर्स्थापन कार्यक्रम चलाया और आज इसमें चार बाघ हैं जो कान्हाँ, पेंच और बाँधवगढ़ से लाकर यहाँ पुनर्स्थापित किए गए हैं। हाल में छह शावकों का जन्म हुआ है। इस समूचे वास स्थल में बीस से पच्चीस बाघों का पोषण हो सकता है। बाघों की संख्या के अलावा यह समृद्ध जैव विविधता और वन आच्छादन का इलाका है। आप याद कर सकते हैं कि एक अन्य पनबिजली परियोजना भूटान में प्रस्तावित है जिस का इसी तरह का नुकसानदेह प्रभाव उत्तर बंगाल स्थित बक्सा टाइगर रिजर्व पर होने वाला है।

लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार को दुर्गावती परियोजना की अनुमति देने के बारे में पत्र (12 अप्रैल 2010)

हमें बिहार सरकार की ओर से दिनांक 3 नवंबर 2009 के उनके पत्र से 2029.8002 हेक्टेयर वनभूमि के इस्तेमाल की अनुमति के लिये प्रस्ताव मिला है जिसमें पहले से बाँध स्थल और फैलाव मार्ग के लिये दी गई 64.75 हेक्टेयर वनभूमि शामिल है। प्रस्ताव का परीक्षण एफएसी ने किया है और एफएसी की सिफारिशों के आधार पर मैंने दुर्गावती जलाशय के लिये वनभूमि के विचलन का अनुमोदन कर दिया है। इस बारे में औपचारिक पत्र जारी किया जा रहा है।

शिक्षण संस्थानों की स्थापना के लिये वनभूमि के इस्तेमाल के बारे में केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल को पत्र (10 सितम्बर 2009)

बत्तीस केन्द्रीय विश्वविद्यालयों की स्थापना सचमुच एक उल्लेखनीय उपलब्धि है जिसे प्रधानमंत्री और संयुक्त प्रगतिशील मोर्चा की अध्यक्ष के नेतृत्व में सम्पादित किया गया है। यह मेरी जानकारी में लाया गया है कि कुछ केन्द्रीय विश्वविद्यालय सैकड़ों एकड़ वनभूमि पर बनने जा रहे हैं। वन और पर्यावरण के मामलों में आपकी व्यक्तिगत प्रतिबद्धता को जानने से मुझे भरोसा है कि आप यह सुनिश्चित करने वाले पहले व्यक्ति होंगे कि केन्द्रीय विश्वविद्यालयों की स्थापना में मूल्यवान वन सम्पदा का अधिक नुकसान नहीं हो। मैंने सोचा कि मुझे इस चिंता से आपको अवगत करा देना चाहिए।

केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल को आईआईटी मंडी और इंदौर के लिये वनभूमि के विचलन को अनुमति देने के बारे में पत्र (2 जून 2011)

मैंने आईआईटी, मंडी और इंदौर का परिसर बनाने के लिये वनभूमि के विचलन के प्रस्ताव को, एफएसी द्वारा उठाई गयी आपत्तियों की अनदेखी करते हुए अभी-अभी मंजूरी दी है। मैं आपसे सभी नए आईआईटी और केन्द्रीय विद्यालयों को निर्देश देने का अनुरोध करूंगा कि वनभूमि का न्यूनतम उपयोग करें। जहाँ वनभूमि का उपयोग किया जाए पारिस्थतिकी को बनाए रखने के लिये किया जाए, निर्माण के लिये नहीं।

चम्बल पर बाँधों के निर्माण के बारे में राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को पत्र 7 अगस्त 2009

कृपया अपने द्वारा भेजे गए दिनांक 16 जुलाई 2009 के पत्र को देखें जो चम्बल नदी पर कोटा बराज के नीचे चार बाँधों -राहु का गाँव, गुजापुरा, जैतपुरा और बरसाला में निर्माण के प्रस्ताव के बारे में है। इस सम्बन्ध में मैं उल्लेख करना चाहता हूँ कि प्रस्ताव पर पहले वन्यजीवों के लिये राष्ट्रीय पर्षद की स्थाई समिति ने 12 दिसम्बर 2008 को विचार किया और इसे ख़ारिज कर दिया। 17 जुलाई 2009 को हुई स्थाई समिति की बैठक में इस प्रस्ताव पर फिर से विचार किया गया और फिर ख़ारिज कर दिया गया क्योंकि यह घड़ियाल और सोंस के 197 किलोमीटर वासस्थल को नष्ट कर देता। दोनों न केवल देश में बल्कि अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर विलुप्तप्राय जीव हैं। चूँकि चम्बल नदी देश में अकेली नदी है जिसका पानी सबसे स्वच्छ है। जलीय जैव-विविधता के लिहाज से यह बहुत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसमें घड़ियाल और सोंस जैसे प्रमुख जीव भी रहते हैं। इसे राष्ट्रीय धरोहर के रूप में संरक्षित करने की आवश्यकता है।

कर्नाटक के मुख्यमंत्री बी एस येदुरप्पा को गुंडिया पनबिजली परियोजना में आगे नहीं बढ़ने का अनुरोध करते हुए पत्र (इस परियोजना को पर्यावरण या वन अनुमति में से कोई नहीं मिली थी)

20 जून 2009

मुझे अनेक एनजीओ और नागरिक संगठनों से जानकारी मिली है कि हसन जिले में कर्नाटक बिजली निगम (केपीसी) की प्रस्तावित 400 मेगावाट की गुंडिया पनबिजली परियोजना पहले से संकटग्रस्त पश्चिमी घाट के लगभग 1900 एकड़ घने जंगल को समूचे जीव-जगत के साथ डूबा देगी। यह कुछ ऐसा है जिसे कर्नाटक और अपना देश सहन नहीं कर सकते। इसके अतिरिक्त मुझे बताया गया है कि भारत सरकार से पर्यावरणीय और वानिकी अनुमति प्राप्त किए बगैर 26 मई 2009 को परियोजना की आधारशिला रख दी गई। मैं जानता हूँ कि आप भी सहमत होंगे कि पर्यावरण और वानिकी अनुमति प्राप्त हो जाने की उम्मीद में आधारशिला रखना उचित नहीं हुआ है। मैं नहीं सोचता कि इस मामले में पर्यावरण अनुमति को सहज उपलब्ध समझा जाना चाहिए। हमें कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया से गुजरना चाहिए और हमें इस प्रक्रिया को सामान्य औपचारिकता नहीं समझना चाहिए।

मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि कर्नाटक में बिजली उत्पादन बढ़ाने की तत्काल आवश्यकता है लेकिन मैं निश्चिंत हूँ कि आप भी सहमत होंगे कि यह पारिस्थितिकीय सुरक्षा और जैव विविधता के संरक्षण की कीमत पर नहीं होना चाहिए। दोनों के बीच एक सन्तुलन निश्चित तौर पर बनाया जाना चाहिए। यह मेरी समझ से कर्नाटक की अपनी प्राथमिकता भी है।

आन्ध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री एन किरण कुमार रेड्डी को कोठागुडा संरक्षित वनक्षेत्र में ईकोटूरिज्म के मानदंडों के उल्लंघन के बारे में पत्र (10 मार्च 2011)

यह पत्र हैदराबाद के कोठागुडा संरक्षित वनक्षेत्र में 110.87 हेक्टेयर में फैले श्री कोटला विजय भास्कर रेड्डी (एसकेवीबीआर) बोटानिकल गार्डेन, नाइट सफारी और ईको पार्क तथा पक्षीविहार नामक परियोजना के बारे में है। एकदम आरम्भ से यह मंत्रालय आन्ध्रप्रदेश की राज्य सरकार से उन मानदंडों का कडाई से पालन करने के लिये कह रहा है जिसे ‘ईकोटूरिज्म’ कहते हैं। आपकी सरकार अपने पत्राचार और वन संरक्षण अधिनियम 1980 के अन्तर्गत अनुमति माँगने के मूल प्रस्ताव में इस परियोजना को ऐसी गतिविधि ठहराती रही है जिसका कोई स्थाई प्रभाव नहीं होगा। इस मंत्रालय ने पहली बार जब 4 अगस्त 2004 को परियोजना पर विचार किया तो निम्नलिखित शर्तें निर्धारित की:-

इस प्रस्ताव के अन्तर्गत वनक्षेत्र में कोई स्थाई निर्माण करने की अनुमति नहीं होगी। आवास के लिये केवल अस्थाई संरचनाएँ जैसे-टेंट, झोपड़ी, सिमटने वाली संरचनाएँ (सिमटने वाली संरचनाओं का अर्थ ऐसी संरचनाओं से है जिन्हें समेटकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जा सकता है) बनाने की इजाजत होगी। सीमेंट /राजमिस्त्री के कार्य नींव के उपर बनाने की इजाजत नहीं होगी, केवल शौचालय/स्नानागार बनाए जा सकेंगे। खाली पड़े वन विश्राम गृहों का उपयोग करने की इजाजत दी जा सकती है।

मंत्रालय की अनुमति का जोर उन सभी बाहरी विकास, संरचनाओं और गतिविधियों से बचने की आवश्यकता पर है जो प्राकृतिक पारिस्थितिकी और वनों की प्राकृतिक विशेषताओं को प्रभावित कर सकता हो। आपकी अपनी सरकार ने वन संरक्षण अधिनियम 1980 की धारा 2 के अन्तर्गत आवेदन में अर्थपूर्ण ढंग से ईकोटूरिज्म के दर्शन और सिद्धांतों के बारे में लिखा है। आवेदन में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि आप बड़े पैमाने पर पर्यटन की तुलना में सन्तुलित पर्यटन को प्रोत्साहन देंगे।

इस कार्य में अस्थाई स्थानीय वास्तुविदों को प्राथमिकता दी जाएगी। पर्यटन की सुविधाएँ पर्यावरण हितैषी, सरल, स्वच्छ और स्वास्थ्यकर होंगी। इस मामले में कर्नाटक के ‘द जंगल एंड लॉजेज कारपोरेशन’ द्वारा बनाई गई सुविधाएँ उल्लेखनीय हैं।

राज्य सरकार इस परियोजना से हुई आमदनी का 25 प्रतिशत सीएएमपीए कोष में जमा करेगी जिसे इलाके में दोबारा पर्यटन को प्रोत्साहन देने और विकास करने में लगाया जाएगा।

राज्य सरकार के स्पष्ट अनुरोध पर 12 सितम्बर 2005 को शर्तों में निम्नलिखित रियायत दी गई :-

अधिकतम दो मंजिलों तक निर्माण की अनुमति होगी। सीमेंट और कंक्रीट से नींव तक निर्माण की अनुमति होगी। सतह के उपर सीमेंट और कंक्रीट के खम्भे और शहतीर की ढांचागत संरचना के पहली मंजिल तक निर्माण की अनुमति होगी। अन्य निर्माण सामग्री ईको-फ्रेंडली जैसे-बाँस, लकड़ी, कृत्रिम काठ और गारा इत्यादि द्वारा की जएगी। पहली मंजिल तक शौचालय और स्नानघर में सीमेंट और कंक्रीट से फर्श बनाने की अनुमति दी जाएगी।

निर्माण की वास्तुकारी ऐसी होगी जो आसपास के भूमि परिदृष्य में घुल मिल जाए। इससे होने वाली आमदनी का 3.5 प्रतिशत का उपयोग राज्य वन विभाग की सलाह से स्थानीय समुदाय के सामाजिक विकास की गतिविधियों/कार्यों में किया जाएगा।

उपरोक्त से यह स्पष्ट है कि मंत्रालय की अनुमति का जोर उन सभी बाहरी विकास, संरचनाओं और गतिविधियों से बचने की आवश्यकता पर है जो प्राकृतिक पारिस्थितिकी और वनों की प्राकृतिक विशेषताओं को प्रभावित कर सकता हो। आपकी अपनी सरकार ने वन संरक्षण अधिनियम 1980 की धारा 2 के अन्तर्गत आवेदन में अर्थपूर्ण ढंग से ईकोटूरिज्म के दर्शन और सिद्धांतों के बारे में लिखा है। आवेदन में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि आप बड़े पैमाने पर पर्यटन की तुलना में सन्तुलित पर्यटन को प्रोत्साहन देंगे। अपने सभी पत्रों में राज्य सरकार ने लिखा है कि आगंतुकों की सुविधाओं समेत ईको-पार्क और ईको-हैबिटैट के लिये केन्द्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण (सीजेडए), भारत सरकार की अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है। संशोधित प्रबन्धन योजना 1 जून 2009 में आगंतुकों की सुविधा का विवरण पेज 43 पर दिया गया है जिसमें ईको-हितैषी और परम्परागत झोपड़ी (इथनिक कॉटेज) का उल्लेख है जो भारत सरकार की निर्देषावली दिनांक 4 अगस्त 2004 और 12 सितम्बर 2005 के अनुकूल होगी जिसे इस मंत्रालय ने जारी किया है।

इस पृष्ठभूमि में संशोधित प्रबन्धन योजना दिनांक 1 जून 2009 को मंत्रालय ने यह मानते हुए जारी किया कि संशोधन एफएसी के विशेषज्ञों और मंत्रालय की सलाह को पूरा करेगा और मूल प्रस्ताव में कुछ भी जोड़ा नहीं जाएगा। यह जानकर मैं निराश हुआ हूँ कि निर्माण को कम करने और इसे ईको-हितैषी बनाने की बजाय परियोजना प्रस्तावकों ने असल में विशाल कंक्रीट संरचनाएँ खड़ी करने की योजना बनाई है जैसे बड़े होटल 300-400 कमरों के, सम्मेलन कक्ष जिसमें 2500 लोगों के बैठने की सुविधा हो, एक दर्जन स्क्रिनों वाला मल्टीप्लेक्स, बहुस्तरीय पार्किंग जिसमें 5000 वाहन लगाए जा सके। यह सब वनक्षेत्र में पूरी तरह अस्वीकार्य हैं। स्थानीय निवासियों और संसद सदस्य की ओर से यह शिकायत भी मिली है कि यहाँ वनाधिकार कानून और पर्यावरणीय कानूनों का घोर उल्लंघन हुआ है।

मैं यह कहने के लिये भी मजबूर हूँ कि इसका मतलब होता है कि परियोजना प्रस्तावक अपनी योजना को प्रस्तुत करने में थोड़ा भी स्पष्टवादी नहीं है और ईको-टूरिज्म, ईको फ्रेंडली, इथनिक इत्यादि शब्दों से प्रकट होने वाले सामान्य अर्थों का फायदा अपने अतिशय हस्तक्षेप और पारिस्थितिकी के लिहाज से विनाशकारी तौर-तरीकों को ढंककर निर्माण कार्य को आगे बढ़ाने में उठाया है।

उपरोक्त के अलावा मुझे यह भी रेखांकित करना है कि सीजेडए ने प्रमाणित किया है कि रात्रिकालीन सफारी पार्क के लिये उसकी अनुमति की आवश्यकता नहीं है क्योंकि उस दौरान केवल उन्नत/आयातित जानवर ही प्रदर्शित किए जाएँगे जो वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के अनुसार वन्यजीव की परिभाषा के अन्तर्गत नहीं आते। लेकिन संशोधित प्रबन्धन योजना (1 जून 2009) की मोटी फाइल के पन्ने पलटते हुए यह दिखता है कि वन्यजीव प्रभाग भी प्रस्तावित है जिसमें बाघ, भेड़िया, चीता, सांम्भर, ब्लैकबक, नीलगाय इत्यादि शामिल हैं। मुझे कहते हुए अफसोस है कि परियोजना प्रस्तावक ने इस मंत्रालय द्वारा दी गयी सामान्य अनुमति की आड़ लेकर ऐसे अवयवों को शामिल कर लेना चाहता है जिसकी समुचित ढंग से पड़ताल नहीं की गई है।

इस मंत्रालय द्वारा दी गई अनुमति में अनेक दूसरी शर्तें भी जोड़ी गई थी जिनके अनुपालन का समुचित ढंग से आँकलन नहीं किया गया है। किसी भी स्थिति में बड़ा निर्माण पूरी तरह अस्वीकार्य होगा और इसकी आलोचना की जाएगी और दण्डात्मक कार्रवाई भी की जाएगी। इसीलिये मैं मंत्रालय द्वारा इस परियोजना के लिये दी गई अनुमति को वापस लेता हूँ। एफएसी को इस प्रस्तावित परियोजना के हर एक अवयव का विस्तार से छानबीन करने के लिये कह रहा हूँ ताकि भयंकर गलती को टाला जा सके और हैदराबाद के लोगों को वास्तविक ईको-फ्रेंडली और नेचर-फ्रेंडली सुविधाएँ उपलब्ध कराई जा सके। मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि आन्ध्र प्रदेश वन विकास निगम, सम्बन्धित परियोजना प्रस्तावक को सभी निर्माण कार्यों को तत्काल रोकने के साथ ही वृक्षों की कटाई, मिट्टी खुदाई और दूसरी गतिविधियाँ को भी तत्काल प्रभाव से रोकने के लिये उपयुक्त निर्देश जारी करे। यह रोक इस मंत्रालय द्वारा स्थिति का पूरा जायजा लेने और इस मामले में अन्तिम निर्णय लेने तक जारी रहेगा। इस मंत्रालय की ओर से आधिकारिक आदेश भेजा जा रहा है।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को भुइदार घाटी में बिजली परियोजना के बारे में पत्र (22 अक्टूबर 2010)

मुझे विश्वास है कि आप हिमालय की पारिस्थितिकी के प्रतिरक्षण और संरक्षण में चंडी प्रसाद भट्ट जी के कामों को जानते होंगे।

वे हाल में मुझसे मिले हैं और भुइदार घाटी में प्रस्तावित 23.4 मेगावाट की बिजली परियोजना की ओर मेरा ध्यान दिलाया है जो प्रसिद्ध फूलों की घाटी के एकदम शीर्ष पर स्थित है। मैं उनसे सहमत हूँ कि ऐसी परियोजना का इस इलाके की समृद्ध जैव विविधता पर गम्भीर प्रभाव होंगे। पहले भी भिदरगंगा के पानी को विष्णुप्रयाग पनबिजली परियोजना के लिये मोड़ने का एक प्रस्ताव आया था, लेकिन इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी के हस्तक्षेप से वह प्रस्ताव उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा सितम्बर 1986 में वापस ले लिया गया।

मुझे विश्वास है कि आप फूलों की घाटी को लेकर बहुत सारे भारतीयों के आकर्षण में हिस्सेदार होंगे और ऐसी किसी परियोजना के लिये राजी नहीं होंगे जो इसकी स्वच्छता, वैभव और सम्पन्नता को नष्ट करती हो।

कितना हरित है हमारा विकास: पर्यावरण हितैषी रास्ते से विकास करे भारत। टाइम्स आफ इंडिया में विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर प्रकाशित विचार (5 जून 2010)

पर्यावरण और विकास को साथ-साथ चलना चाहिए। इससे कौन असहमत हो सकता है? लेकिन जो सिद्धांत में अच्छा है, वह व्यवहार में विवादास्पद हो जाता है। परियोजनाओं को वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से कुछेक बार ‘हाँ’ मिलता है। कुछेक बार प्रतिक्रिया ‘‘हाँ, लेकिन’’ होगी जब परियोजना को आगे बढ़ाने के लिये सुरक्षात्मक शर्तें लगायी जाएँगी, वास्तव में बहुसंख्यक परियोजनाओं को इन्हीं में से कोई एक प्रतिक्रिया प्राप्त होगी। लेकिन ऐसे भी अवसर होंगे जब पक्के तौर पर ‘नहीं’ कहना ही होगा। लगभग तीन दशक पहले हमारे राजनीतिक वर्ग में निर्विवाद रूप से सबसे बड़ी पर्यावरणवादी इंदिरा गाँधी थी जो साइलेंट वैली के बारे में मुखर और स्पष्ट थीं। लेकिन उसके बाद ऐसे उदाहरण बहुत कम आए। भारत के लिये अब उच्च आर्थिक विकास के पथ पर होने और उस पथ पर बने रहना सुनिश्चित करना आवश्यक हो जाने से सुरक्षात्मक उपाय, शर्तें और यहाँ तक कि साइलेंट वैली जैसी दुविधाएँ भी प्रमुखता पाने लगी हैं। अब हम उस स्थिति में सन्तुष्ट नहीं हो सकते जिसे एकबार एस.राधाकृष्णन ने सारगर्भित ढंग से हमारी संस्कृति का सारतत्व कहा था, ‘‘चीजों को यह या वह के रूप में क्यों देखें? क्यों नहीं यह और वह दोनों को रखने की कोशिश करें।’’ ऐसी परिस्थितियों का सामना हम कैसे करें जिसमें इच्छित और कठिन चुनाव अपरिहार्य होते हैं? हालांकि मेरा विश्वास है कि कोई सामान्यीकरण सम्भव नहीं है क्योंकि पर्यावरणीय या जैव विविधता प्रभाव का हर मामला अद्वितीय होता है और सिद्धांतों और मार्गदर्शिकाओं को निश्चित तौर पर अपनाया जा सकता है।

पहला, हमें नियम आधारित ढंग अपनाने के साथ ही निर्णय करने में विशेषाधिकार आधारित ढंग पर भरोसा कम करना होगा। इसका एक अच्छा उदाहरण कोयला खनन में पहली नजर में ‘‘जाओ मत जाओ’’ इलाके को चिन्हित करने की पहल है। नौ प्रमुख कोयला क्षेत्रों का विश्लेषण किया गया और डिजिटल मानचित्रों में वनक्षेत्रों के साथ परस्पर व्याप्त तस्वीरों को सार्वजनिक किया गया। इस कार्य का उद्देश्य ‘जाओ मत जाओ’ अवधारणा के आधार पर भविष्य में कोयला क्षेत्रों को वानिकी अनुमति प्रदान करने में नियम आधारित पारदर्शी ढंग अपनाने की सुविधा प्रदान करना है। इस तरीके को दूसरे कोयला क्षेत्रों और दूसरे खनिजों के मामलों में भी विस्तार दिया जा रहा है, खासकर लौह अयस्क के मामले में।

दूसरा, हमें समूचे पर्यावरणीय शासन प्रणाली को बड़े पैमाने पर संस्थागत मजबूती प्रदान करने की जरूरत है। संसद ने हाल में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल विधेयक पारित किया है। यह एकनिष्ठ और विशेषज्ञ पर्यावरणीय अदालत के तौर पर काम करेगा जिसमें कोई भी नागरिक जा सकता है। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्यों में उसके सहयोगियों को तकनीकी और सांगठनिक मजबूती देने के लिये एक नेशनल एनवायरनमेंट प्रोटेक्शन ऑथरिटी बनने की प्रक्रिया में है ताकि जमीनी स्तर पर निगरानी और अनुपालन को मजबूती प्रदान किया जा सके। स्वयं मंत्रालय में आँतरिक प्रक्रियाओं को पारदर्शी बनाने के लिये कदम उठाए गए हैं, चाहे वह एनवायरनमेंट क्लीयरेंस कमिटी की संरचना हो या निर्णय लेने की प्रक्रिया या मंत्रालय की वैज्ञानिक क्षमता को मजबूत बनाना।

तीसरा, हमें बड़े स्तर पर (आरटीआई से भी अधिक) पारदर्शिता को अपनाने की आवश्यकता है। मंत्रालय के भीतर की सारी जानकारी, नीतियाँ, नए प्रस्ताव, निगरानी रिपोर्ट, प्रभाव आकलन तत्काल वेबसाइट पर डाल दी जाती है। इसे सुनिश्चित करने के निर्देश भी जारी किए गए है कि स्थानीय निर्वाचित संस्थाओ और स्थानीय नागरिक संगठनों जानकारी जरूर दी जाए जिसके वे पात्र है। यह अधिकार का मामला है और उनका उपकार करने का मामला नहीं है। जनता हमारी निगरानी की सर्वोत्तम व्यवस्था है। हमें अपने लक्ष्यों के प्रति जबाबदेह बनाए रखती है और जमीनी स्तर पर प्रचलन तथा अनुपालन को सुनिश्चित करती है जहाँ हम कमजोर हैं। ऐसी कार्रवाईयाँ जनता को बहुत मजबूती देती है।

चौथा, दुविधाएँ जब भी उत्पन्न हो, उन्हें निश्चित तौर पर व्यक्त करना चाहिए। आगे बढ़ने का सर्वोत्तम मार्ग व्यापक सहमति बनाना होता है। उदाहरण के लिये, बीटी-बैंगन के मामले में आगामी कार्रवाई का निर्णय करते समय हमने परिश्रमपूर्वक इस तरीके का पालन किया, इसके व्यवसायीकरण के बारे में निर्णय की घोषणा करने के पहले अनेक विशाल सार्वजनिक परामर्श आयोजित किए गए थे। निर्णय से सम्बन्धित सभी तथ्यों, विचारों, पत्राचारों और कार्यवाहियों इत्यादि को सार्वजनिक किया गया था। निर्णय को फूल-माला और रोड़ा-पत्थर दोनों मिले, पर वे अपरिहार्य थे।

पाँचवाँ, हमें नवाचारी वित्तीय व्यवस्था के बारे में सोचना होगा जो विकास की अनिवार्यता के साथ पारिस्थितिकीय सुरक्षा के साहचर्य को स्वीकार करे। 2002 में हमने एक बड़ी शुरुआत की जब सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप किया और सीएएमपीए के गठन का निर्देश दिया। सीएएमपीए एक माध्यम है जिसका गठन पुनःवनीकरण को प्रोत्साहन देने के लिये हुआ है। परियोजना के लिये जितने वन क्षेत्र का उपयोग बदला जाना हो, उसके सामाजिक और आर्थिक मूल्य की समतुल्य राशि सरकार के पास जमा कराने के लिये परियोजना प्रस्तावक को कहा जाता है। इस तरीके से पिछले सात वर्षों में कुल 11 हजार करोड़ रूपए एकत्र हुए हैं।

अभी हाल में इसतरह के नवोन्मेष का समान रूप से महत्त्वपूर्ण उदाहरण राष्ट्रीय स्वच्छ उर्जा कोष की स्थापना है जिसकी घोषणा वित्त मंत्री ने इस साल के बजट भाषण में की है। मूलभूत प्रस्ताव कोयला पर 50 रूपए प्रति टन की दर से स्वच्छ उर्जा सेस लगाना है। यह रकम स्वच्छ उर्जा तकनीकों में शोध और नवाचारी परियोजनाओं को वित्तीय सहायता देने में खर्च की जाएगी और खतरनाक रूप से प्रदूषित इलाके के पर्यावरणीय प्रबन्धन में भी यह रकम खर्च की जाएगी।

प्रधानमंत्री ने नई दिल्ली में वन एवं पर्यावरण मंत्रियों के राष्ट्रीय सम्मेलन में एक सम्बोधन के दौरान ठीक ही उल्लेख किया कि ‘‘हम अभी भी औद्योगिकरण और शहरीकरण की आरम्भिक अवस्था में हैं......हम अलग रास्ते पर चल सकते हैं और हमें निश्चित ही पर्यावरण हितैषी राह पर चलना चाहिए।’’ हमें इस राह पर डटे रहना है, विरोध के बावजूद, क्योकि विरोध होना अवश्यम्भावी है। केवल तभी उच्च विकास टिकाऊ भी होगा और समावेशी विकास होगा।

टिप्पणियाँ :-

1. इस मसले पर मैंने अध्याय 7 और 9 में विस्तार से चर्चा की है। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के दबाव और गंगा के उपरी प्रवाह क्षेत्र में तीन परियोजनाओं का परित्याग करने में मंत्रालय की भूमिका ने उर्जा मंत्रालय को पनबिजली परियोजनाओं पर विचार करते समय संचित प्रभाव आँकलन (क्युमुलेटिव इम्पैक्ट असेस्मेंट) की पद्धति को अपनाने के लिये प्रेरित किया।

2. कानूनों और नियमावलियों के कार्यान्वयन के बारे में अध्याय 6 में चर्चा की गई है।

3. पुनर्प्रस्तुत, समर सिंह (सम्पा.) 2007, इकोलॉजिकल सिक्यूरिटी : द फांउडेशन ऑफ सस्टेनेबल डेवलपमेंट, नई दिल्ली, शिप्रा पब्लिकेशन ।

4. ओडिशा सरकार के पत्र और डॉ. सक्सेना के जबाब दोनों मंत्रालय की वेबसाइट पर डाल दिए गए।

5. मुखर आदेश की अनुसूची 1 में शामिल, जिसे मंत्रालय की वेबसाइट पर डाला गया।

6. मुखर आदेश की अनुसूची 2 में शामिल जिसे मंत्रालय की वेबसाइट पर डाला गया।

7. मुखर आदेश की अनुसूची 3 में शामिल जिसे मंत्रालय की वेबसाइट पर डाला गया।

8. जिसका अर्थ ओडिशा में ग्राम सभा होता है।

9. इस तथ्य के बावजूद कि राज्य सरकार विवादित परियोजना के पक्ष में सक्रियता से प्रचार कर रही थी।

10. अन्तिम आदेश के अलावा एसीएचएस के कागजातों में मौखिक सुनवाई की संक्षिप्त कार्यवाही रिपोर्ट, मौखिक प्रस्तुतियों का विश्लेषण, लिखित प्रस्तुतियों का विश्लेषण, बहस, विवेचना, तर्क-वितर्क और निष्कर्ष शामिल हैं।


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