भूजल स्तर बढ़ाने के लिए मध्य प्रदेश सरकार लायेगी ग्रे-वाटर कानून

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दैनिक भास्कर, 09 जुलाई 2019

भूजल स्तर बढ़ाने के लिए मध्य प्रदेश में सरकार लायेगी ग्रे-वाटर कानून।भूजल स्तर बढ़ाने के लिए मध्य प्रदेश में सरकार लायेगी ग्रे-वाटर कानून।

बारिश शुरू होते ही जल संकट दूर हो गया है, लेकिन यह राहत कुछ ही महीनों की रहेगी। यह समस्या फिर सामने आएगी, क्योंकि जितना पानी धरती में जाता है, उससे ज्यादा हम बाहर निकाल लेतेे हैं। भूजल दोहन का यह प्रतिशत 137 है। यानी, 100 लीटर पानी अंदर जाता है, तो हम 137 लीटर पानी बाहर निकालते हैं। यह मध्यप्रदेश के 56 फीसद से दोगुना से भी ज्यादा है।

इंदौर शहर को जीरो वाटर जोन (जहां जमीन के 600 फीट नीचे भी पानी नहीं मिले) की तरफ बढ़ते खतरे को देखते हुए मध्य प्रदेश सरकार ने अब ग्रे-वाटर काूनन को सख्ती से लागू करने जा रही है। इसके तहत हर काॅलोनी, टाउनशिप और इमारत बनाने वालों को किचन के पानी की पाइन अलग से डालनी होगी। यह पानी ट्रीटमेंट के बाद वापस घरों मूें जाएगा, जहां इसे टाॅयलेट और अन्य कामों में उपयोग किया जा सकेगा। इसके लिए बिल्डर को अलग ट्रीटमेंट प्लांट लगाना होगा, जिसका टैंक परिसर में ही बनेगा। इस पानी को गार्डन के लिए भी उपयोग किया जा सकेगा। अभी बिल्डर सीवरेज का ट्रीटमेंट प्लांट साथ बना देते हैं, जिससे वह घरों में उपयोग नहीं हो पाता। किचन और टाॅयलेट का पानी अलग-अलग करने से लोगों को पानी लेने में सहुलियत रहेगी। यह नियम अब बनने वाली टाउनशिप में ही लागू होगा। ग्रे-वाटर कानून को लेकर हाल ही में भोपाल मूें लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग ने बैठक की, जिसमें पानी वाले बाबा पद्मश्री राजेंद्र सिंह, भूजल विशेषज्ञ सुधींद्र मोहन शर्मा से ग्रे-वाटर, रिचार्जिंग की अनिवार्यता पर सलाह ली। इनकी रिपोर्ट के आधार पर ड्राफ्ट बनेगा। 

हर व्यक्ति को रोज चाहिए 135 लीटर पानी

जियोलाॅजिस्ट सुधींद्र मोहन शर्मा के मुताबिक शहर में नर्मदा से लगभग 500 एमएलडी (50 करोड़ लीटर) पानी मिल रहा है। अगर 25 लाख आबादी के हिसाब से जोड़ें तो हर व्यक्ति के लिए 166 लीटर पानी उपलब्ध है, जबकि मापदंड 135 लीटर का है। यानी, जरूरत से ज्यादा पानी है फिर भी संकटत रहता है। इसकी वजब उन चार लाख लोगों का जनसंख्या में नहीं जुड़ना है, जो बाहर से आकर यहां नौकरी, व्यापार और पढ़ाई कर रहे हैं। यह आबादी फ्लोटिंग है, लेकिन जितने जाते हैं, उससे 10 फीसद बढ़कर शहर में रहने आ जाते हैं। यानी, हम 25 लाख आबादी की चिंता करते हैं, जबकि पानी 50 लाख के हिसाब से चाहिए। 

शहर में दो जोन - छिद्रयुक्त चट्टानों में खूब पानी, टूटी हुई में कम

जोन एक -  यह मोटी छिद्रयुक्त चट्टानों वाला इलाका है, जहां काफी मात्रा में पानी जमा है। यहां कम गहराई (80 से 100 फीट) पर पानी मिल जाता है। इस जोन में कैलोद करताल, रालामंडल, निरंजनपुर, राजेंद्र नगर, वैशाली नगर, बड़ा गणपति, एयरपोर्ट रोड का बड़ा हिस्सा, सिरपुर आते हैं। असरावद, मिर्जापुर में अधिक पानी के कारण ही फूलों की खेती होती है। 

जोन दो - यह वह जोन है, जिसमें चट्टानों में टूट-फूट से पानी 300 से 500 फीट चीचे चला गया है। यहां ज्यादातर ट्यूबवेल फरवरी के बाद बंद हो जाते हैं। इसमें निपानिया, खजराना, कनाड़िया बायपास से सटा इलाका, बिचैली मर्दाना, भूरी टेकरी के आसपास की काॅलोनियां और मध्य शहर का बड़ा भाग आता है। कुल शहर का 50 फीसद भाग इसमें शामिल है। 

 

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