प्रकृति ही इलाज

Submitted by editorial on Sun, 06/10/2018 - 13:36
Printer Friendly, PDF & Email
Source
दैनिक जागरण, 10 जून, 2018

भारतीय परिस्थितियों में पानी की समस्या से बचने के लिये कई अहम कदम उठाने होंगे। जैसे नगर पालिकाओं की जवाबदेही बढ़ाना। इनकी तकनीकी और प्रबन्धन क्षमता को बढ़ाया जाना चाहिए। सप्लाई किये जाने वाले पानी को विभिन्न स्रोतों से लिया जाना चाहिए, जैसे भूजल, सतह पर मौजूद जल, संरक्षित किया हुआ वर्षाजल और शोधित किया हुआ दूषित जल। शहर या कस्बों के निर्माण की योजना बनाते समय चाहे अमीरों के लिये गगनचुम्बी इमारतें बनाई जाएँ या गरीबों के लिये बस्तियाँ बसाई जाएँ, उसमें साफ और सस्ते पानी की उपलब्धता अनिवार्य होनी चाहिए।

इंजीनियरिंग आधारित उपायों के बदले पोखर, झील, कुँओं, ताल-तलैयों, जंगलों और बेकार पड़ी भूमि को शहरों का अभिन्न अंग बना दिया जाये, तो प्रकृति आधारित उपायों से इस समस्या को खत्म किया जा सकता है।

देश के छोटे-बड़े सब शहर तेजी से पानी की कमी की तरफ बढ़ रहे हैं। पानी का लगातार गिरता स्तर लोगों की चिन्ता, चिड़चिड़ाहट, आपसी बैर व लड़ाई-झगड़ों और पानी के दाम को बढ़ा रहा है। यह स्थिति बंगलुरु, पुणे, चेन्नई, शिमला, दिल्ली समेत कई शहरों; कस्बों और गाँवों की है। इसके पीछे कई कारण हैं। तेजी से होता शहरीकरण जिसमें बिना किसी योजनाबद्ध तरीके के तहत गाँवों से लोग शहरों की ओर पलायन करते हैं, तेजी से बढ़ती जनसंख्या और पानी के इस्तेमाल की बदलती पद्धतियाँ। इसके अलावा अधिकतर शहरों में जल प्रबन्धन की टिकाऊ प्रणाली मौजूद नहीं है।

सालाना 250 अरब घन मीटर भूजल निकालने के साथ भारत दुनिया में सर्वाधिक भूजल इस्तेमाल करने वाला देश बन गया है। देश में भूजल के तकरीबन 16 ब्लॉक ऐसे हैं जो देश गम्भीर स्थिति में हैं और जहाँ पानी का दोहन क्षमता से अधिक हो चुका है। बंगलुरु में अतिक्रमण के चलते जलस्रोत 79 फीसद से अधिक खाली हो चुके हैं।

बिल्ट-अप एरिया 77 फीसद तक बढ़ गया है। दो दशकों में जल निकालने के कुएँ 5,000 से 4.50 लाख हो जाने के कारण भूजल स्तर 12 मीटर से गिरकर 91 मीटर पहुँच गया है। बेलंदूर झील में जहरीले पदार्थों के चलते झाग बन गया है। जमीन पर कंक्रीट बिछा देने और दूषित जल को शोधित न किये जाने के कारण पुणे में बारिश के पानी का जमीन के अन्दर रिसना 35 फीसद से घटकर सिर्फ 5 फीसद रह गया है।

शिमला में स्थानीय संसाधनों को नजरअन्दाज करके किया बेतरतीब विकास और पर्यटकों व होटलों की पानी की जरूरतों को पूरा करने की अपर्याप्त योजनाओं के चलते ऐसी विकट स्थिति खड़ी हुई है। यह प्रबन्धन और सरकार की विडम्बना ही है कि गर्मियों में पानी के अकूत भण्डार वाले हिमालय में आने वाले कश्मीर से कोहिमा तक कई शहरों और गाँवों में पानी की सर्वाधिक किल्लत होती है।

पानी की यह समस्या भले ही भारत में गम्भीर हो, लेकिन इससे पूरा विश्व जूझ रहा है। विश्व बैंक ने अपनी हालिया रिपोर्ट में इस स्थिति से बचने के लिये पंचमुखी उपाय सुझाया।

1. सोच समझकर पानी का इस्तेमाल करने की मानसिकता विकसित हो।
2. पानी को विभिन्न स्रोतों में जमा करना, जैसे पुनर्भरण किये गये एक्वीफर्स।
3. ऐसे उपायों पर निर्भर करना, जो जलवायु परिवर्तन के खतरे से दूर हों, जैसे डीसैलिनेशन और दूषित जल शोधन करना।
4. बाहरी प्रतिद्वंद्विता से जलीय स्रोतों को बचाना।
5. किसी संकट से निपटने के लिये जल प्रबन्धन के डिजाइन और प्रणाली तैयार रखना।

भारतीय परिस्थितियों में इस समस्या से बचने के लिये कई अहम कदम उठाने होंगे। जैसे नगर पालिकाओं की जवाबदेही बढ़ाना। इनकी तकनीकी और प्रबन्धन क्षमता को बढ़ाया जाना चाहिए। सप्लाई किये जाने वाले पानी को विभिन्न स्रोतों से लिया जाना चाहिए, जैसे भूजल, सतह पर मौजूद जल, संरक्षित किया हुआ वर्षाजल और शोधित किया हुआ दूषित जल।

शहर या कस्बों के निर्माण की योजना बनाते समय चाहे अमीरों के लिये गगनचुम्बी इमारतें बनाई जाएँ या गरीबों के लिये बस्तियाँ बसाई जाएँ, उसमें साफ और सस्ते पानी की उपलब्धता अनिवार्य होनी चाहिए। शोध बताते हैं कि शहरों में सप्लाई होने वाले पानी का मात्र 10 फीसद ही इस्तेमाल होता है, बाकी 90 फीसद दूषित जल की तरह बहा दिया जाता है। भारतीय शहरों में तो सप्लाई का 40 फीसद पानी लीकेज में बह जाता है। पानी की अतिरिक्त सप्लाई देने के बजाय टूटे-फूटे पाइपों की मरम्मत करना और उनका प्रबन्धन करना सस्ता पड़ता है।

केन्द्रीय भूजल बोर्ड नेशनल एक्वीफर्स मैपिंग नाम से प्रोग्राम शुरू करने जा रहा है जिसमें देश के अधिकतर राज्यों में उपलब्ध जल की सटीक जगह और मात्रा पता लगाई जा सकेगी। आगे आने वाले कई वर्षों में उन स्थानों पर जल संसाधनों का विकास किया जा सकेगा।

पहाड़ी इलाकों में मल्टिपल वॉटर यूज सिस्टम प्रणाली का प्रयोग काफी सफल रहा है। इसके तहत घरेलू काम और खेतों में सिंचाई के पानी की जरूरत एक साथ पूरी हो जाती है। लेकिन आखिर में लोगों और पानी का इस्तेमाल करने वाले उद्योगों को यह समझना होगा कि जल सबसे कीमती प्राकृतिक संसाधन है लेकिन वह सीमित मात्रा में है और उसका उपयोग समझदारी और उत्पादक तरीके से करने से ही जीवन खुशहाल हो सकेगा।
 

Add new comment

This question is for testing whether or not you are a human visitor and to prevent automated spam submissions.

2 + 12 =
Solve this simple math problem and enter the result. E.g. for 1+3, enter 4.

More From Author

Related Articles (Topic wise)

Related Articles (District wise)

About the author

Latest