गुरुत्वीय तरंगें क्या हैं (What are Gravitational waves)

Submitted by Hindi on Sun, 08/27/2017 - 15:35
Source
अनुसंधान विज्ञान शोध पत्रिका, 2016

सारांश


यह लेख विज्ञान के इतिहास का वर्णन न करके केवल डॉ. अल्बर्ट आइन्स्टीन द्वारा अपने सापेक्षवाद के सिद्धान्त में दिये गये गुरुत्वीय तरंगों के होने की पुष्टि कर रहा है। वर्षों के अनुसंधान के बाद वैज्ञानिकों ने यह प्रमाणित कर दिया कि बहुत भारी तारे जो ब्लैक होल भी कहे जाते हैं, एक दूसरे की कक्षा में घूमते हुए पास आकर टकराते हैं तो बहुत अधिक ऊर्जा दिक् में बिखेरते हैं। जिनसे गुरुत्वीय तरंगें भी उत्पन्न होती हैं, जो प्रकाश के वेग से चलकर हमारी पृथ्वी पर भी अनुभव की गई हैं।

Abstract : The purpose of this article is not to present a popular history of mathematical physics nor even to display for the general reader some of the result of research in the history of science, Rather the intention is to explore one important aspect of the great scientific revaluation of recent times which proves the existence of Gravitational wave, predicted by Dr. Albert Einstein about a hundred years ago in his general theory of relativity. Gravitational waves are ripples in the fabric of spacetime caused by some of the most violent and energetic processes in the universe. They are produced by catastrophic events such as colliding Black hole as well as the collapse of stellar supernova.

बीसवीं सदी ने विज्ञान को जो बड़ी सैद्धान्तिक प्रणालियाँ दी उसने न केवल जनसाधारण बल्कि विज्ञान वेत्ताओं को भी ब्रह्माण्ड के शान्तिपूर्ण संचालन में अविश्वास करने को सर्वप्रथम बाध्य किया। इनमें एक मैक्स प्लांक का प्रमात्रा सिद्धान्त (Quantum Theory) था जिसका सम्बन्ध पदार्थ और शक्ति की मूलभूत इकाइयों से था। दूसरा सिद्धान्त था आइन्स्टीन का सापेक्षवाद (Theory of Relativity) जिसका सम्बन्ध दिक्-काल और एक सम्पूर्ण इकाई के रूप में ब्रह्माण्ड की रचना से था। आज मनुष्य के ज्ञान की अन्तः सीमाएँ प्रमात्रा सिद्धान्त से समझी जाती हैं और परमाणु, पदार्थ तथा शक्ति की मौलिक इकाईयाँ एवं उनसे सम्बन्धित हमारी धारणाएँ, जो अनुभव की दृष्टि से बहुत ही रहस्यमय तथा सूक्ष्म है प्रमात्रा-सिद्धान्त से निर्धारित है। ज्ञान की बाहरी सीमाएँ सापेक्षता के सिद्धान्त से जहाँ दिक् काल, गुरुत्वाकर्षण तथा उनसे सम्बन्धित हमारे सिद्धान्त, जो हमारे अनुभव की दृष्टि से या तो बहुत दूरस्थ हैं या बहुत विशाल, सापेक्षता की मदद से निरूपित हुए हैं।

यह दोनों महान वैज्ञानिक प्रणालियाँ बिल्कुल ही पृथक असम्बद्ध सैद्धान्तिक आधारों पर निर्भर करती हैं तथा अपने-अपने क्षेत्र में घटनाओं के सुदृढ़ और गणित विषयक सम्बन्धों पर प्रकाश डालती हैं। जहाँ मेक्स-प्लांक के समीकरणों का असाधारण तत्व, आधार रूप में यह मान्यता थी कि विकीर्ण शक्ति अखंडित धारा के रूप में नहीं वरन पूरी तरह से खंडित रूप में प्रवाहित होती है, वहीं सापेक्षवाद ने हमारी अनेक धारणाओं को उनके प्रतिष्ठित स्थान से हटाकर, दिक्-काल के सम्बन्ध में हमारे सदियों पुराने विश्वास को विचलित कर दिया। सापेक्षवाद के अनुसार आकाश और काल स्वतंत्र सत्ताएँ नहीं रह गयी हैं वरन वह एक दूसरे पर निर्भर करती हैं।

वर्षों पूर्व मिन्काउस्की (Minkowaski) ने आकाश और काल से एक चतुर्विमितीय की संकल्पना के द्वारा अनुबन्धों को ज्यामितीय रूप दे दिया था और आइन्स्टीन ने इसे मौलिक मानकर गुरुत्वाकर्षण की समस्याओं को ‘ज्यामितीय पद्धति’ के अनुसार हल करके विश्व को चकित कर दिया। इसके पूर्व के नियमों पर विचार करने का कोई लाभ नहीं रहा, कारण वह सब न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त पर आधारित थे, जिनके अनुसार दो पिण्डों के मध्य आकर्षण बल उनके द्रव्यमानों के समानुपाती तथा उनकी दूरता के द्विघात का व्युत्क्रमानुपाती होता है। अतः इसके अनुसार विश्व का एक केन्द्र होना आवश्यक है जहाँ घनत्व महत्तम होगा तथा उससे दूरी के अनुसार घटता जायेगा और अंत में अत्यधिक दूरियों पर शून्य के अनन्त क्षेत्र होंगे, जहाँ घनत्व शून्य होगा। परन्तु प्रेक्षण यह सिद्ध करते हैं कि विश्व की रचना में चारों ओर समांगता है।

इस समांगता को ही आइन्स्टीन ने ब्रह्माण्डीय सिदान्त (Cosmological Principle) का नाम दिया और विश्वास दिलाया कि विश्व में आकाश की वक्रता समान है। वक्रता दो प्रकार की होती है ऋण तथा धन। इन दोनों के बीच शून्य वक्रता का आकाश युक्लिड ज्यामितीय आकाश कहलाता है जिसे वैज्ञानिक गलत सिद्ध कर चुके हैं। शून्य वक्रता के आकाश में किसी गोले का आयतन उसकी त्रिज्या के त्रिघात के अनुसार वृद्धि करता है, जबकि धन वक्रता के आकाश में गोले के आयतन की वृद्धि की दर इससे कम होती है तथा ऋणीय वक्र आकाश में इससे अधिक। अतः जब तक हमें निहारकाओं के विकासीय परिवर्तनों के विषय में और अधिक ज्ञान प्राप्त न हो जाय तब तक हम आकाश की वक्रता के विषय में किसी निश्चयात्मक परिणाम पर नहीं पहुँच सकते। जैसा कि आइन्सटीन ने बताया कि चूँकि दिक् की ज्यामितीय या वक्रता उसके अन्दर निहित पदार्थों से निश्चित होती है, अतः ब्रह्माण्डीय समस्या का समाधान ब्रह्माण्ड के पदार्थ की औसत सघनता का निश्चय होने से ही सम्भव होगा। आइन्सटीन का ब्रह्माण्ड यद्यपि अपरिमित नहीं है, तदापि इतना विशाल है कि उसमें अरबों ज्योतिर्मालाएँ समायी हुई हैं तथा प्रत्येक ज्योतिर्माला में करोड़ों ज्वलंत तारे, अपरिमेय गैस, लोहे और पत्थर की शीत, प्रणालियाँ और ब्रह्माण्डीय रजकण हैं।

गुरुत्वाकर्षण- सापेक्षवाद में गुरुत्वाकर्षण का कारण ब्रह्माण्ड में आकाश की विकृति के कारण वक्रता को माना है। आइन्स्टीन का मत था कि वक्रता का मुख्य कारण कालाकाश (Space Time) में बहुत बड़े द्रव्यमानों का होना है। साधारणतः अधिक द्रव्यमान का किसी छोटे स्थान में होने से विश्व की वक्रता का अधिक होना। जैसा कि द्रव्यमान तेजी से ब्रह्माण्ड में चलायमान होते हैं जिससे वक्रता में नयापन आ जाता है, यह उनकी स्थिति के परिवर्तन को दर्शाता है। किसी-किसी परिस्थिति में तेजी से त्वरण करते हुए द्रव्य पुँज विशेष प्रकार की तरंगों को उत्पन्न कर देते हैं, जो बहुत तेजी से तथा प्रकाश के वेग से बाहर की तरफ गुरुत्वीय शक्ति को और वितरित करती है। इन्हीं बाहर की ओर निकलने वाली तरंगों को ही गुरुत्वीय तरंगों (Gravitational Waves) का नाम दिया गया जब यह तरंगें किसी पर्यवेक्षक के पास से गुजरती है तो उसे कालाकाश में एक परिवर्तन अनुभव होता है। जैसे-जैसे इनकी दूरी बढ़ती जाती है इनका परिणाम भी कम होता जाता है। गुरुत्वीय तरगों की भविष्यवाणी आइन्स्टीने सापेक्षवाद में लगभग 100 वर्ष पूर्व कर दी थी, किन्तु बाद के 50 वर्षों तक न तो इसे ठीक से समझा गया और न ही इन तरंगों की उपयोगिता के बारे में तथा इनका पता लगाने में सोचा गया। पहली बार 1967ई. में अमेरिका की मेरीलेन्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञज्ञनिक डॉ. जोसेव वेबर ने इनके बारे में जानने का प्रयास किया। डॉ. वेबर ने 1400 किलोग्राम के दो एल्यूमिनियम बेलन बनाकर और एक विशेष प्रकार के यंत्र से त्वरण उत्पन्न करके गुरुत्वीय क्षेत्र बनाकर इस प्रकार की तरंगों को उत्पन्न करने का प्रयास किया उनका प्रयोग इस बात पर आधारित था कि कालाकाश वक्र है परन्तु उनके द्वारा बनाई गई गुरुत्वीय तरंगों को बहुत ही कम ऊर्जा वाली होने से वह पूरी तरह प्रमाणित नहीं कर सके। आइन्स्टीन ने 1916ई. में ही यह भविष्यवाणी कर दी थी कि तीव्र गति से त्वरण करने वाले द्रव्य पुँज गुरुत्वीय तरंगों को बनाकर विकिरण करते हैं जो प्रकाश की गति से अपने साथ ऊर्जा का भी वितरण कर सकते हैं। यह प्रक्रिया तेजी से एक दूसरे का चक्कर लगाने वाले तारे अधिनवतारे (Supernova) तथा वह बड़े द्रव्य पुँज जो आपतन (Collapse) की स्थिति में होने द्वारा सम्भव होती है। जब हमारे ब्रह्माण्ड की शुरूआत हुई होगी तो ‘बिग-बैंग’ द्वारा उत्पन्न यह तरंगें अवश्य पृथ्वी पर आई होगी।

पुरतो रीको नामक स्थान पर 1974 में दो वैज्ञानिकों ने गुरुत्वीय तरंगों के बारे में पहली बार सटीक जानकारी हासिल की। उन्होंने ब्रह्माण्ड के दो घने द्रव्य पुँज जो एक दूसरे की कक्षा में तेज गति से विचरण कर रहे थे, द्वारा उत्पन्न गुरुत्वीय तरंगों के अपने विशेष यंत्रों द्वारा होने का प्रमाण पाया। अपने 8 सालों के अनुसंधान के बाद उन्होंने यह देखा कि दोनों ही द्रव्य पुँज (तारे) धीरे-धीरे एक दूसरे के पास आ रहे हैं। लगभग 30 वर्षों के कठिन प्रयास के बाद उन्होंने इस प्रक्रिया द्वारा उत्पन्न गुरुत्वीय तरंगों के निकलने का विश्व को प्रमाण दिया। जिसका पता डिटेक्टरों की मदद से लगाया गया। इसी प्रकार 14 सितम्बर 2015 को वैज्ञानिकों ने ‘लेजर इंटरफेरोमीटर ग्रेविटेशनल वेब ऑब्जर्वेटरी’ नामक संस्था द्वारा आयोजित प्रयोगों से प्रमाणित कर दिया कि ऐंठते हुए जब बड़े द्रव्य पुँज का रूप बदलता है तो इससे भी गुरुत्वीय तरंगें उत्पन्न होती हैं।

ब्लैक होल - गुरुत्वीय तरंगों की जानकारी देने में ब्लैक होल का बहुत अधिक महत्त्व है। दो ब्लैक होल जब एक दूसरे की परिक्रमा में घूमते हुए पास आकर टकराते हैं तो बहुत अधिक मात्रा में ऊर्जा भी उत्पन्न करते हैं जो ब्रह्माण्ड में चारों ओर गुरुत्वीय तरंगों द्वारा विकसित होती है। ब्लैक होल कोई छेद नहीं होता जैसा कि इसके नाम से लगता है यह कुछ बड़े द्रव्य पुँजों के अवशेष द्वारा जन्म लेते हैं इन्हें सुपर नोवा भी कहा सकता है तारों में होने वाले विशाल धमाके उन्हें नष्ट कर देते हैं और उनका विशाल पदार्थ अंतरिक्ष में फैल जाता है। लगभग 100 वर्ष पूर्व आइन्स्टीन ने अपने सापेक्षता के सिद्धान्त में जब गुरुत्वाकर्षण में छिपी शक्ति को समझकर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की विस्तृत रचना के दर्शन करके यह पुष्टि की कि गुरुत्वीय तरंगें भी प्रकाश की गति से यात्रा करती हैं। ब्लैक होल का द्रव्यमान इतना अधिक होता है कि वहाँ से बाहर निकलने के लिये पलायन गति प्रकाश की गति से अधिक होनी चाहिये जो सम्भव नहीं है अतः प्रकाश भी उनसे नहीं निकल सकता और वह दिखाई नहीं देते। लेकिन वैज्ञानिक कई साधन लगाकर उनकी स्थिति का पता लगा सकते हैं तथा उनके द्रव्यमान का अनुमान भी लगा लेते हैं। यह भी सच है कि ब्लैक होल में समा गई वस्तुएँ सदैव के लिये खो जाती हैं। आइन्सटीन के पास भले ही 100 वर्ष पूर्व ब्लैक होल का पूरा ज्ञान नहीं था फिर भी उन्होंने अपने गुरुत्वीय ज्ञान से यह जान लिया था कि प्रकाश की किरणें भी वहाँ से पलायन नहीं कर सकतीं। इसीलिये वह आकाश में काले धब्बों की तरह दिखाई देते हैं। कितनी विचित्र बात प्रतीत होती है कि ब्रह्माण्ड में जो प्रकाश के बड़े-बड़े पुँज हैं जिनके पास बहुत अधिक प्रकाश है वह हमें दिखाई नहीं देते। आज पूरे विश्व के वैज्ञानिक इनके बारे में जानकारियाँ लेने में लगे हैं। कई वैज्ञानिकों का अनुमान है कि ब्लैक होल का गुरुत्वाकर्षण बल इतना अधिक होता है कि प्रकाश जो 1,86,000 मील प्रति सेकेंड की गति से चलता है इससे नहीं निकल पाता है और वह काले धब्बों की तरह ही प्रतीत होते हैं।

इस वर्ष लीगो टीम के वैज्ञानिकों ने कठिन प्रयास करके कुछ ही महीनों में गुरुत्वीय तरंगों की दो बार झलक प्राप्त की। दो बड़े ब्लैक होल जो एक दूसरे की परिक्रमा करके एक दूसरे के समीप आ रहे थे आपस में टकराने लगे। संयोगवश कई वैज्ञानिकों ने इनके टकराने का अध्ययन किया और प्रयोगों द्वारा गुरुत्वीय तरंगों के पृथ्वी पर आने को प्रमाणित किया।

प्रथम टकराव - महत्त्वपूर्ण ढंग से 11 फरवरी, 2016 को लीगो के वैज्ञानिकों ने यह घोषणा की कि दो ब्लैक होल जिनका द्रव्यमान हमारे सूर्य के द्रव्यमान से 29 तथा 36 गुना भारी थे एक दूसरे की परिक्रमा करके आपस से टकरा गये जिनसे एक नये और बहुत बड़े ब्लैक होल का जन्म हुआ और साथ-साथ बहुत अधिक मात्रा में गुरुत्वीय तरंगों का जन्म हुआ। वैज्ञानिकों का यह भी कहना था कि यह टकराव इतनी दूर हुआ होगा जहाँ से गुरुत्वीय तरंगें लाखों साल पहले चली होगी जो अब पृथ्वी पर पहुँच रही हैं। उस नये ब्लैक होल का द्रव्यमान हमारे सूर्य के द्रव्यमान से 62 गुना अधिक हो गया होगा तथा साथ में बहुत अधिक ऊर्जा भी बनी होगी।

दूसरा टकराव - संयोगवश लगभग तीन महीनों में ही लीगो टीम के वैज्ञानिकों ने दूसरी बार गुरुत्वीय तरंगों की झलक पाई। यह टकराव इसी वर्ष 15 जून, 2016 को हमारी पृथ्वी की प्रयोगशालाओं में अनुभव की गई। इस बार के दो ब्लैक होल जिनका द्रव्यमान हमारे सूर्य के द्रव्यमान से 14.2 तथा 7.5 गुना अधिक था टकरा कर एक दूसरे में मिलकर एक नये ब्लैक होल का निर्माण किया। इस बार भी वैज्ञानिकों ने गुरुत्वीय तरंगों के प्रमाण प्रस्तुत किये। इस नये ब्लैक होल का द्रव्यमान हमारे सूर्य के द्रव्यमान से 20.8 गुना अधिक रहने का संकेत प्राप्त हुआ तथा साथ-साथ पृथ्वी पर गुरुत्वीय तरंगों के बारे में भी अधिक से अधिक जानकारियाँ प्राप्त हुई। यह तरंगें अंतरिक्ष में फैलती हुई अब धरती पर प्रमाणित हुई। इनका पता दो भूमिगत डिटेक्टरों की मदद से लगाया गया। यह तरंगें अंतरिक्ष के फैलाव का एक मापक हैं। इनकी खोज से दूर के तारों, आकाश-गंगाओं और ब्लैक होल सहित ब्रह्माण्ड के रहस्यों के बारे में विस्तृत जानकारी जुटाई जा सकेगी।

विश्व में अभी तक जितना भी ज्ञान प्राप्त हो चुका है, उसकी प्रगति में किस सिद्धान्त अथवा आविष्कार का हाथ सबसे अधिक है यह विवाद का विषय हो सकता है, किन्तु इसमें संदेह नहीं कि जिन आविष्कारों से ज्ञान की प्रगति में क्रान्ति कही जा सकती है, उनमें अलबर्ट आइन्स्टीन के सापेक्षवाद का स्थान हमेशा प्रमुख रहेगा।

संदर्भ


1. ग्रेविटेशनल वेब डिटेक्टेड 100 इयर्स आफ्टर आइन्स्टीन प्रेडिक्शन, नेशनल साइंस फाउण्डेशन, 2016।
2. वेबर, जे. (1969) फिजकल रिव्यू लेटर, खण्ड-22, पृ. 1320।
3. ग्रेविटेशनल वेब्स फ्रॉम ब्लैक होल, बी.बी.सी. न्यूज, 11 फरवरी 2016।
4. लीगो, डिटेक्शन ऑफ ग्रेविटेशनल वेब्स, ओपन ए न्यून विन्डोस, 2016।

लेखक परिचय


भानु प्रताप सिंह
असिस्टेन्ट प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, गणित विभाग, नेशनल पी.जी. कॉलेज, लखनऊ-226001, उ.प्र., भारत, bhanupratapsingh1996@gmail.com
प्राप्त तिथि-19.07.2016 स्वीकृत तिथि-22.08.2016

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