हल्दी : प्रकृति का अमूल्य औषधीय वरदान (Haldi : a precious medicinal boon of nature)

Submitted by Hindi on Fri, 08/25/2017 - 13:11
Source
अनुसंधान विज्ञान शोध पत्रिका, 2016

सारांश


.हल्दी प्रकृति का एक अमूल्य औषधीय वरदान है। अपने अत्यन्त विशिष्ट गुणों के कारण हल्दी को भारत में न केवल मसाले एवं औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता है, वरन धार्मिक दृष्टि से भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना जाता है। विभिन्न जटिल रोगों के उपचार में हल्दी का प्रयोग किया जाता है। अभी इसके औषधीय गुणों पर और शोध व अध्ययनों की आवश्यकता है, जिससे इसके अन्य नवीन औषधीय गुणों की खोज की जा सके तथा उनका प्रयोग विभिन्न रोगों के उपचार में किया जा सके।

Abstract : Haldi is a precious medicinal boon of nature. Due to its excellent properties it has been not only used as spice but also used as medicine. It is also considered as auspicious and is an important part of Indian religious rituals. Some further evaluation needs to be carried out on turmeric in order to explore the concealed areas and their practical clinic applications which can use for the welfare of mankind.

हल्दी एक प्रमुख भारतीय औषधि है। अपने अत्यन्त विशिष्ट गुणों के कारण हल्दी को न केवल औषधि के रूप में, वरन धार्मिक दृष्टि से भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना गया है। इसका पौधा 5 से 6 फुट तक बढ़ने वाला होता है, जिसकी जड़ों की गांठों से हल्दी मिलती है। औषधि-ग्रन्थों में इसे हल्दी के अतिरिक्त हरिद्रा, कुरकुमा, लौंगा, वरवर्णिनी, गौरी, क्रिमिघ्ना, योशितप्रिया, हरदल, टर्मरिक आदि नाम दिये गये हैं। भारत वर्ष में हल्दी को न केवल एक प्रमुख मसाले के रूप में प्रयोग किया जाता है, वरन अपने अद्वितीय औषधीय गुणों के कारण एक प्रमुख प्राकृतिक औषधि के रूप में तथा भारतीय धार्मिक एवं सांस्कृतिक अवसरों पर भी इसका प्रयोग किया जाता है। हल्दी का लेटिन नाम- कुरकुमा लौंगा, अंग्रेजी नाम- टरमरिक व पारिवारिक नाम- जिन्जीबेरेसी है। इसमें उड़नशील तेल 5.8 प्रतिशत, प्रोटीन 6.3 प्रतिशत, द्रव्य 5.1 प्रतिशत, खनिज द्रव्य 3.5 प्रतिशत, और कार्बोहाइड्रेट 68.4 प्रतिशत के अतिरिक्त कुर्कमिन नामक पीतरंजक द्रव्य व विटामिन ए पाया जाता है।

हल्दी के प्रमुख औषधीय गुण


1. आक्सीकरणरोधी गुण - हल्दी के इस गुण की खोज सन 1975 के प्रारम्भ में ही कर ली गयी थी। यह हीमोग्लोबिन की आक्सीडेशन से रक्षा करती है।

2. कृमिनाशक गुण - हल्दी को कृमिहरा या कृमिनाशक (एन्टीथेलमिन्टिक) भी कहा जाता है। टरमरिक के जूस में कृमिनाशक गुण होता है। नेपाल के ग्रामीण इलाकों में टरमरिक पाउडर या पेस्ट को पानी में थोड़ा सा नमक डालकर उबालते हैं तथा इस जूस को कृमिनाशक औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता है।

3. हड्डियों के रोग को दूर करने में सहायक - हड्डियों के विभिन्न रोग, गठिया, वात दूर करने में भी हल्दी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होती है। रोजाना हल्दी मिश्रित दूध पीने से शरीर को पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम मिलता है। यह ऑस्टियोपोरोसिस के मरीजों को राहत पहुँचाता है। रियूमेटॉइड गठिया के कारण उत्पन्न सूजन के उपचार में भी हल्दी का प्रयोग किया जाता है।

4. मधुमेह के उपचार में - कच्ची हल्दी में इन्सुलिन के स्तर को संतुलित करने का गुण होता है। अतः यह मधुमेह के रोगी के लिये अत्यन्त लाभप्रद है। इंसुलिन के अलावा यह ग्लूकोज के स्तर को भी नियंत्रित करता है।

5. श्वसन सम्बन्धी रोगों के उपचार में - हल्दी को कफहारा, औषधि माना जाता है। हल्दी के ताजे राइजोम को कुकर खांसी (व्हूपिंग कफ) के उपचार में प्रयोग किया जाता है। इसमें उपस्थित वोलाटाइल ऑयल ब्रांकियल अस्थमा के उपचार में भी अत्यन्त उपयोगी होते हैं।

6. कैन्सररोधी गुण - कच्ची हल्दी में कैंसर से लड़ने के गुण होते हैं। यह पुरुषों में होने वाले प्रोस्टेट कैंसर की कैंसर कोशिकाओं को बढ़ने से रोकने के साथ-साथ उन्हें समाप्त भी करती है। हल्दी में उपस्थित तत्व कैंसर कोशिकाओं से डी.एन.ए. को होने वाले नुकसान को रोकते हैं व कीमोथेरेपी के दुष्प्रभावों को भी कम करते हैं।

7. बैक्टीरियारोधी, फंगसरोधी व सूक्ष्मजीवी रोधी गुण - अनेक शोधों से यह प्रमाणित हो चुका है कि टरमरिक अनेक प्रकार के बैक्टीरिया, पैथोजेनिक फंजाई एवं पैरासाइट्स की वृद्धि को रोकती है।

8. फोटोप्रोटेक्टर गुण - यह गुण टरमरिक में ऑक्सीकरणरोधी गुण के कारण होता है। प्रयोगशालीय अध्ययनों से यह प्रमाणित हो चुका है कि टरमरिक सांद्र सूर्य से निकलने वाली अल्ट्रावॉयलट- बीटा किरणों से त्वचा को होने वाली हानि व सूजन की रोकथाम में काफी प्रभावशाली सिद्ध हुआ है। गामा-किरणों से होने वाली गुणसूत्रीय हानि के बचाव में भी हल्दी काफी लाभप्रद सिद्ध हुई है।

9. पाचन-सम्बन्धी गुण - भारत में प्राचीन काल से हल्दी का प्रयोग दैनिक जीवन में मसाले के रूप में किया जाता रहा है। यह पाचन शक्ति को बढ़ाता है तथा पेट में गैस गठन को भी रोकता है।

10. मूत्रीय विकार - अनेक नवीन शोधों व अध्ययनों से यह स्पष्ट व प्रमाणित किया जा चुका है कि कुरकूमिन का प्रयोग मूत्रीय विकारों के उपचार में किया जाता है। विभिन्न मूत्रीय संक्रमणों में टरमरिक राइजोम का प्रयोग किया जाता है। कुरकूमिन तथा कुरकूमिनॉइड्स का प्रयोग किडनी की पथरी के उपचार में भी किया जाता है।

11. रंगरूप वर्धक गुण - प्राचीन काल से ही भारतीय महिलाओं के द्वारा हल्दी का प्रयोग त्वचा की रंगत के निखार के लिये किया जाता रहा है। वे हल्दी व चन्दन का पेस्ट बनाकर त्वचा पर लगाती थी, जिससे त्वचा में निखार आता है। अपने इसी गुण के कारण भारतीय वैवाहिक समारोहों में भी वर-वधू के सौन्दर्य को निखारने के लिये हल्दी का लेप लगाया जाता है व इसके औषधीय गुण त्वचा सम्बन्धी रोगों को भी दूर करते हैं। हल्दी के लिये संस्कृत भाषा में अनेक नाम प्रयोग होते हैं- वर्णदात्री, हेमरागिनी, हृदयविलासिनी इत्यादि जो कि इसके रूपरंग वर्धक गुण की पुष्टि करते हैं।

उपर्युक्त के अतिरिक्त हल्दी का प्रयोग विभिन्न दांत, नेत्र सम्बन्धी रोग व एनीमिया के उपचार में, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में भी किया जाता है। यह वात, कफ शामक, पित्तरेचक है। रक्त स्तम्भन, मूत्र रोग, त्वचा रोग आदि में इसका प्रयोग अत्यन्त लाभप्रद होता है। यकृत की वृद्धि में भी हल्दी का लेप लगाया जाता है। अनुभूत आयुर्वेद वर्णन में हल्दी गांठों को चूने के साथ पकाकर, तत्पश्चात सूखने पर चूर्ण बनाकर उपयोग करने से शरीर पुष्ट होता है। हल्दी वास्तव में प्रकृति का एक चमत्कारिक औषधीय वरदान है। हल्दी पर अभी और शोध अध्ययनों की जरूरत है जिससे इसके और नवीन औषधीय गुणों की जानकारी प्राप्त की जा सके तथा उनके प्रयोग विभिन्न रोगों के निवारण में किया जा सके। हल्दी न केवल हमारी रसोई की शान है, वरन औषधीय व आध्यात्मिक रूप से भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यही कारण है कि हमारे भारतीय समाज में प्राचीन काल से लेकर आज तक हल्दी का स्थान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रहा है।

संदर्भ


1. शर्मा ओ.पी. (1976) एन्टीऑक्सीडेन्ट एक्टीविटी ऑफ कुरकूमिन एण्ड रिलेटेड कम्पाउण्ड बायोकेम फार्माकोल, खण्ड-25, मु.पृ. 1811-1812।
2. रूवी ए.जे., कुट्टन, जी. दिनेश, राजेशखरन, के.एन. एवं कुट्टन, आर. (1995) एन्टीट्यूमर एण्ड एन्टीऑक्सीडेन्ट एक्टीविटी ऑफ नेचुरल कुरकूमिनॉइड्स कैसन लिट, खण्ड-94, मु.पृ. 79-83।
3. नदकारनी के.एम. (1976) इण्डियन मेटीरिआ मेडिका, 1.3 एडीशन, पॉपुलर प्रकाशन, बॉम्बे।
4. प्रशान्ती, डी जागर (2003) टरमरिक: द आयुर्वेदिक स्पाइस ऑफ द लाइफ।
5. नदकारनी के.एम. (1976) इण्डियन मेटीरिआ मेडका, 1.3 एडीशन, पॉपुलर प्रकाशन, बॉम्बे।
6. राव, स.वी. रिवरसन, ए., सिमी, वी. एवं रेड्डी बी. एस. (1995) कीमोप्रीवेन्शन ऑफ कोलोन कारसीनोजेनेसिस बाइ डाइटरी कुरकूमिनः ए नेचुरली ऑकरिंग प्लॉट फीनालिक कम्पाउण्ड, कैसन रेस, खण्ड-55, मु.पृ. 259-66।
7. श्पिट्ज, बी., गिलादी, एन., सागिव ई., ली-एरी एस., लिवरमेन ई., कोजोनोव, डी. एवं अन्य (2006) सीलीकोसिव एण्ड कुरकूमिन एडीटिविली इनहिबिट द ग्रोथ ऑफ कोलेस्ट्रॉल कैंसर इन रेट मॉडल, डाइजेशन, खण्ड-74, मु.पृ. 140-4।
8. भवानी शंकर, टी. एन. एवं श्रीनिवासा, मूर्ति वी. (1979) इफेक्ट ऑफ टरमरिक (कुरकूमा लौंगा) फैक्शन ऑन द ग्रोथ ऑफ सम इनटेसटाईनल एण्ड पैथोजेनिक बैक्टीरिया इन विट्रो, इण्डियन जे. एम्स. वाओल, खण्ड-17, मु.पृ. 1363-1366।
9. खाजेहडेही, पी. (2012) टरमरिक, रीमर्जिंग ऑफ ए निगलेक्टेड, एशियन ट्रेडिशनल रेमेडी, जे. नेफ्रोपेथोल, खण्ड-1, अंक-1, मु.पृ. 17-22।
10. डुग्गी, श्री शैल, हेनड्रल, हरीश कं., हेन्ड्रल रविचन्द्र, तुलसिआनन्द, जी. एवं एस.डी. श्रुथी (2013) टरमरिकःनेचुरल प्रेसीयस मेडिसिनः एशियन जर्नल ऑफ फार्माक्यूटिकल एण्ड क्लीनिकल रिसर्च, खण्ड-6, अंक-3।
11. कोलम्मल, एम. (2005) फार्माकोग्नोसी ऑफ आयुर्वेदिक ड्रग्स, त्रिवेन्द्रम, फार्माकोग्नोसी यूनिट, गवर्नमेन्ट आयुर्वेद कॉलेज, 1979।
12. रामाडेनी, आर. एवं रविन्द्रन पी. एन. (2005) टरमरिकः मिथ्स एण्ड ट्रेडीशन्स स्पाइस इण्डिया, खण्ड-18, अंक-8, मु.पृ. 11-17।

लेखक परिचय


पल्लवी दीक्षित
एसोसिएट प्रोफेसर, वनस्पति विज्ञान विभाग, महिला विद्यालय डिग्री कॉलेज, लखनऊ 226018 उ.प्र., भारत, drpallavidixit80@gmail.com
प्राप्त तिथि-30.06.2016 स्वीकृत तिथि-27.09.2016

Disqus Comment

More From Author

Related Articles (Topic wise)

Related Articles (District wise)

About the author

नया ताजा