कैसे दोगुनी होगी किसानों की आय

Submitted by HindiWater on Tue, 11/05/2019 - 12:29
Source
राजस्थान पत्रिका, 4 नवम्बर, 2019

किसान बाजार में अपनी उपज बेचने के लिए एक उद्यमी की तरह पेश आएगा और सोच-समझ कर फैसले लेगा, तो निश्चित तौर पर उसे लाभ मिलेगा। देश में आए दिन ऐसे प्रयोग और लाभ कमाने के उदाहरण सामने आ रहे हैं। आज किसानों के लिए ही नहीं, बल्कि कृषि वैज्ञानिकों के लिए भी जलवायु परिवर्तन (climate change) को लेकर सतर्क रहने और समस्या का त्वरित हल तलाशने की जरूरत है। यदि फसल में देरी हो रही है तो कृषि वैज्ञानिक किसानों को बताएं कि बदलती जलवायु की आकस्मिक परिस्थिति में गेहूँ के अतिरिक्त वे किस फसल की बुवाई करके, किस तरह लाभ कमा सकते हैं। 

केन्द्र सरकार का कहना है कि वह वर्ष 2022 तक किसानों (farmers)की आमदनी दोगुनी करना चाहते हैं। इसमें कोई संदेह भी नहीं है कि इसके लिए सरकार भरसक प्रयास कर भी रही है, लेकिन मेरा मानना है कि केवल योजनाएँ बना देने से ही लक्ष्यों को हासिल करना सम्भव नहीं होगा। यदि इस मामले में सफलता प्राप्त करनी है तो निश्चित तौर पर सभी को एकीकृत कृषि प्रणाली (Integrated Farming System) का समावेश करना होगा और अभियान की तरह जुटना होगा। एकीकृत कृषि प्रणाली से यहाँ आशय है कि किसान केवल खेती-बाड़ी से होने वाली आय पर ही आश्रित न रहें, बल्कि इससे जुड़े अन्य कार्यों में भी आय के साधनों को अपनाएँ। उदाहरण के लिए उन्हें बागवानी, डेयरी फार्मिंग, दुग्ध प्रसंस्करण, कृषि वानिकी, मधुमक्खी पालन, मत्स्य पालन आदि कार्यों को भी अपनाना होगा। इससे एक ओर रोजगार सृजन होगा तो दूसरी ओर किसानों की कृषि आय में निश्चित तौर पर बढ़ोत्तरी होगी। 

यह सही है कि देश में छोटी जोत वाले किसानों की संख्या बहुत अधिक है। उनके लिए एकाएक भूमि का आकार तो बढ़ने नहीं वाला और न ही खेती की उस भूमि पर पानी की उपलब्धता की स्थिति में कोई सुधार होने वाला है। ऐसे में आय बढ़ोत्तरी के लिए आवश्यक है कि किसान उत्पादकता सुधार कर उपज में बढ़ोत्तरी के नए तौर-तरीके अपनाए। केवल इतना ही नहीं, उसे उत्पादन लागत को भी तीव्रता के साथ कम करना होगा। यह भ्रांति है कि पैदावार में बढ़ोत्तरी से किसानों को हानि उठानी पड़ती है। यदि कोई किसान बाजार में अपनी उपज बेचने के लिए एक उद्यमी की तरह पेश आएगा और सोच-समझकर फैसले लेगा तो निश्चित तौर पर उसे लाभ मिलेगा। ऐसा इसलिए भी कहा जा सकता है क्योंकि देश में आए दिन ऐसे प्रयोग किए जाने और लाभ कमाने के उदाहरण सामने आ रहे हैं। तेलंगाना में भी इस दिशा में सफल प्रयास हुए हैं। इस राज्य में एक मॉडल विकसित किया गया, जिसके तहत पाँच-छह ग्राम पंचायतों का एक क्लस्टर बनाकर उनमें से एक ऐसी पंचायत को चुना गया जो अन्य शहरों से बेहतर सम्पर्क में थी। उस ग्राम पंचायत को मंडी के तौर पर विकसित किया गया। इससे किसानों के लिए उपज की परिवहन लागत में कमी आई है। वे पास की मंडी में अपनी उपज बेचने में कामयाब हुए। इसके बाद गाँव के कुछ युवा, जो नई तकनीक जैसे कम्प्यूटर, इंटरनेट, स्मार्टफोन आदि का बेहतर इस्तेमाल करते हैं और अन्य बड़ी मंडियों के सम्पर्क में रहते हैं, को कुछ बेहतर कीमत में निकटवर्ती गाँवों के किसानों की उपज बेचने का मौका दिया गया। इससे उन्हें भी रोजगार का अवसर मिला। 

गुजरात में भी कई जगह इस किस्म के प्रयोग हुए और वे सफल भी रहे। ऐसे में देश के अन्य राज्यों में भी किसानों को इस बिजनेस मॉडल पर काम करना चाहिए। उत्पादन लागत की बात करें तो हमारे देश में इसके अक्सर बढ़ जाने के पीछे मुख्य कारण है-उन्नत प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल नहीं करना या फिर उन्नत प्रौद्योगिकी और उसके फायदों से अनभिज्ञ होना। इसके लिए जरूरत इस बात की है कि सरकार की ओर से उपलब्ध तकनीकी सहयोग के लिए किसान आगे बढ़कर पहल करें। इस बात को इस उदाहरण से भी समझा जा सकता है कि भारत एक दशक से दुनिया में दुग्ध उत्पादन के मामले में पहले नम्बर पर है। आज देश में करीब 165 करोड़ टन दूध का उत्पादन हो रहा है। जब इस स्थिति में भारत में प्रसंस्करण करके दूध पाउडर तैयार किया जाता है तो दूघ का मूल्य 250 रुपए प्रति किलोग्राम बैठता है। इसके विपरीत विदेशों में दूध पाउडर 120 रुपए किलोग्राम पर उपलब्ध हो जाता है। स्पष्ट है यदि हम उन्नत प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल नहीं करते और लागत को कम नहीं करते, तो निर्यात क्षेत्र में मौजूद अवसरों से वंचित रह जाते हैं। जबकि उन्नत प्रौद्योगिकी को अपनाने से न केवल लागत कम होगी, उत्पादों की गुणवत्ता बेहतर होगी और उत्पादों के निर्यात के अवसर बेहतर होंगे। 

देश में आज लगभग सभी राज्यों में कृषि पर जलवायु परिवर्तन का प्रतिकूल असर देखा जा रहा है। आमतौर पर देश में जहाँ पर भी गेहूँ की बुवाई होनी होती है, वह अधिकतम 22 नवम्बर तक हो जाती है। लेकिन, इस बार दीपावली बीत जाने के बाद भी कहीं-कहीं बरसात हो रही है और कहीं-कहीं तो खेतों में पानी भी भरा हुआ है। ऐसे में यदि नवम्बर में भी बारिश जारी रहती है तो गेहूँ की बुवाई करने वाले किसानों की मुश्किल यह होगी कि वे कब गेहूँ की बुवाई करें और कब फसल काटें। आज किसानों के लिए ही नहीं, बल्कि कृषि वैज्ञानिकों के लिए भी जलवायु परिवर्तन को लेकर सतर्क रहने और समस्या के त्वरित हल तलाशने की जरूरत है। यदि फसल में देरी हो रही है तो कृषि वैज्ञानिक किसानों को बताएँ कि बदलती जलवायु की आकस्मिक परिस्थिति में गेहूँ के अतिरिक्त वे किस फसल की बुवाई करके, किस तरह लाभ कमा सकते हैं। उदाहरण के लिए गेहूँ उत्पादक किसान मसाले या सब्जियाँ उगा सकते हैं। इसी तरह उदयपुर के किसान यदि सब्जियों की बुवाई पहले कर लेते तो आस-पास के इलाकों में स्थानीय स्तर पर ही सब्जियों की आपूर्ति की जा सकती थी। लेकिन आज उदयपुर को ही गुजरात से सब्जियाँ मंगवानी पड़ रही हैं। इस दिशा में किसानों को जागरूक किए जाने की आवश्यकता है। 

जागरूकता और व्यापारिक सोच आज के दौर की किसानों के लिए दो खास जरूरत है। अक्सर देखने में आता है कि किसान अन्य फसलों के साथ आंवला बो देते हैं। समय आने पर जब उन्हें बेचने मंडी जाता है तो उसे पांच रुपए किलो का भाव ही मिलता है। यदि वह सुलझी हुई कृषि व्यापार रणनीति अपनाता है तो एक खास प्रसंस्करण कम्पनी को भी 50 रुपए प्रति किलोग्राम पर आंवला बेच सकता है। उन्नत प्रौद्योगिकी के साथ आज किसान को तालमेल बिठाना होगा। ऐसा होने पर वह अपने उत्पाद के मूल्य का निर्धारण स्वयं कर सकेगा। वह इस बात से अनजान नहीं होगा कि कहाँ उसकी उपज की खपत है और कहाँ उसे बेहतर कीमत मिल सकती है। आज गाँवों में भी लोग स्मार्टफोन और इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं, जरूरत है इन संसाधनों के सही इस्तेमाल की। देश में यदि किसान जागरूकता के साथ उद्यमी की तरह व्यवहार कर अपनी उपज को बाजार में बेचेगा तो उसके लिए बहुत मुश्किल नहीं है आय को दोगुना करना।

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