कितना बदल गया दून, छिन गया ‘सांसों’ का सुकून

Submitted by HindiWater on Mon, 12/02/2019 - 10:43
Source
दैनिक जागरण, 2 दिसम्बर, 2019

यकीन नहीं होता कि यह वही दून है, जिसे कभी रिटायर्ड लोगों का शहर कहा जाता था। तब जहां भी नजर जाती आम-लीची से लकदक बाग और फसलों से लहलहाते खेत नजर आते थे। फिर वर्ष 2000 में उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखंड बना और दून राजधानी। इसके बाद यहां शहरीकरण की ऐसी अनियंत्रित दौड़ शुरू हुई कि प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का सवाल कोसों पीछे छूट गया।

खेतों व बगीचों में भवन खड़े होने लगे और सड़कों पर वाहनों की रेलमपेल कई गुना बढ़ गई। अब फिजा में धुआं ही धुआं नजर आता है। वायु प्रदूषण की स्थिति मानक से तीन से चार गुना तक पहुंच गई है। पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की वेबसाइट पर सबसे पुराने औसत आंकड़े 2008 के हैं और तब यह स्थिति आज की तुलना में आधी से भी कम (116 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर) थी।

 जिस रिस्पना और बिंदाल नदी को एक दौर में सदानीरा कहा जाता था, वहां अब पानी की जगह गंदगी बह रही है। इन नदियों का पानी मानक से 76 गुना प्रदूषित हो गया है। हरियाली की बात करें तो वर्ष 2000 से 2015 के बीच सरकारी आंकड़ों में ही 30 हजार से अधिक पेड़ काटे डाले गए। हर साल पर्यावरण संरक्षण के नाम पर हजारों पौधे लगाए जाते हैं, मगर उनकी प्रकृति सजावटी प्रजाति के पादपों से आगे नहीं बढ़ पाती। लिहाजा, शहर के 15 किलोमीटर के दायरे में ही तापमान में पांच डिग्री का अंतर पाया गया है। साफ है कि जहां जितनी संख्या में पेड़ कम हैं, वहां का तापमान उतना ही अधिक रहता है।

 पीएम-10 की स्थिति खतरनाक 

दून में धूल-धुएं के कण रेसपायरेबल सस्पेंडेड पार्टिकुलेट मैटर (आरएसपीएम) की मात्र औसत रूप में तीन से चार गुना तक और दैनिक आधार पर ढाई गुना तक पाई गई है। मानकों की बात करें तो आरएसपीएम-10 की मात्र औसत रूप में 60, दैनिक आधार पर 100 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर से अधिक नहीं होनी चाहिए। इससे स्पष्ट हो जाता है कि दून की हवा सेहत के लिए कितनी सुरक्षित रह गई है। हालांकि, यह आंकड़े पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के हैं, जो सीमित स्थलों पर लगे हैं। बोर्ड के समानांतर जब वर्ष 2018 में निजी संगठन गति फाउंडेशन ने शहर के विभिन्न हिस्सों से आंकड़े जुटाए तो प्रदूषण का स्तर और भी ऊपर पाया गया। दूसरी तरफ वर्ष 2017 के अंत में केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड ने देश के तमाम शहरों के वायु प्रदूषण की जो रिपोर्ट संसद में रखी थी, उसमें दून सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में छठे स्थान पर पाया गया।

प्रदूषण नियंत्रण दिवस पर विशेष

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़े

स्थल

पीएम-10

पीएम 2.5

आइएस बीटी

243.12

111.06

रायपुर रोड

131.14

67

घंटाघर

171.59

97.36

 

गति फाउंडेशन के आंकड़े

स्थल

पीएम-10

पीएम-21.5

दून अस्पताल

330

240

सहारनपुर चौक

244

256

बल्लीवाला चौक

190

115

नोटः आंकड़े फरवरी 2018 के

 

संसद में रखी गई रिपोर्ट में टॉप शहरों में दून की स्थिति (2007 के अंत में)

शहर

पीएम-10

शहर

पीएम-10

दिल्ली

278

गाजियाबाद

235

वाराणसी

256

फिरौजाबाद

223

बरेली

253

सहारनपुर

218

देहरादून

241

कानपुर

217

 

शहर के तापमान में ऐसे मिला अंतर

क्षेत्र

तापमान

पटेलनगर

39 डिग्री सेल्सियस

किशन नगर चौक

38 डिग्री सेल्सियस

सुभाष नगर

35डिग्री सेल्सियस

एस्लेहॉल चौक

37 डिग्री सेल्सियस

कौलागढ़ क्षेत्र

36 डिग्री सेल्सियस

वाड़िया संस्थान

35डिग्री सेल्सियस

धर्मपुर डांडा

35 डिग्री सेल्सियस

नोटः तापमान मई 2017 के आंकड़े के अनुसार

 

वर्षवार इस तरह पेड़ काटने से भी घटी हरियाली

वर्ष

काटे गए पेड़

वर्ष

काटे गए पेड़

2000

423

2008

521

2001

685

2009

5779

2002

1056

2010

1670

2003

435

2011

3458

2004

454

2012

2827

2005

689

2013

2284

2006

542

2014

4911

2007

4268

2015

950

 

रिस्पना-बिंदाल के पानी की स्थिति

तत्व

मानक

पाई गई मात्रा

तेल-ग्रीस

0.1

11 से 18

टीडीएस

500

740 से 1200

बीओडी

02

126 से 144

डीओ

06 से अधिक

अधिकतम 1.4

लैड

0.1

0.54

नाइट्रेट

20

388 से 453

टोटल कॉलीफार्म

50

1760 से 3800

फीकल कॉलीफार्म

शून्य

516 से 1460

(नोटः टोटल कॉलीफार्म व फीकल कॉलीफार्म की मात्रा एमपीएन/100 एमएल में और अन्य की मात्रा एमजी/लीटर में)

76 गुना प्रदूषित रिस्पना- बिंदाल में टोटल कॉलीफार्म 3800 एमपीए

दून शहर के बीच से होकर गुजरती रिस्पना नदी में दूधली तक गंदगी तैरती नजर आती है,रिस्पना और बिंदाल नदी के पानी में टोटल कॉलीफार्म (विभिन्न हानिकारक तत्वों का मिश्रण) की मात्र 3800 एमपीएन (मोस्ट प्रोबेबल नंबर) पाई गई, जबकि पीने योग्य पानी में यह मात्र प्रति 100 एमएल में 50 से अधिक नहीं होनी चाहिए। जिस फीकल कॉलीफार्म की मात्र शून्य होनी चाहिए, उसकी दर 1460 एमपीएन/100 एमएल पाई गई।

पिछले साल स्पैक्स की ओर से फरवरी में कराई गई नदी के पानी जांच में प्रदूषण का यह स्तर सामने आया था। इसके अलावा नदी के पानी में जहां घुलित ऑक्सीजन (डीओ) की मात्र मानक से बेहद कम पाई गई, वहीं बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) की मात्र बेहद अधिक है। तमाम अन्य हानिकारक तत्वों की मात्र भी सीमा से कोसों अधिक रिकॉर्ड की गई।

 

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