धरती के चुम्बक का असर

Submitted by editorial on Sat, 08/04/2018 - 15:33
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Source
शैक्षिक संदर्भ, मार्च-अप्रैल 1997


पृथ्वी का चुम्बकत्व शायद जीवन के लिये एक रक्षा कवच भी है तो कई प्रवासी जीवों को मार्गदर्शन में भी मदद करता है। लेकिन कई सवाल हैं जिनके जवाब या तो नहीं हैं या फिर अधूरे हैं।


पृथ्वी का चुम्बकपृथ्वी का चुम्बक चुम्बक से खेलने और उससे तरह-तरह के प्रयोग करने में बच्चों को मजा आता है। इसके बारे में तकरीबन सभी स्कूल में पढ़ते हैं कि चुम्बकीय पदार्थ अपने इर्द-गिर्द एक चुम्बकीय बल क्षेत्र की रचना करते हैं, जिसके माध्यम से वह अन्य चुम्बकीय पदार्थों और लोहे से बनी चीजों को प्रभावित करते हैं। पर क्या जीव-जन्तु भी चुम्बकीय बल के प्रति संवेदनशील होते हैं? क्या हम भी चुम्बकीय बल से प्रभावित होते हैं या हो सकते हैं?

इस तरह के पेचीदा सवालों पर मेरा ध्यान तब आकर्षित हुआ जब मैंने अपने मित्र को मैग्नेटो-थेरेपी के तहत चुम्बकों की मदद से अपने एक रोग का इलाज करते पाया। जवाब तलाशने निकला तो समझ में आया कि मामला काफी उलझा हुआ है, पर है बेहद दिलचस्प। बहुत-से वैज्ञानिक भी एक लम्बे समय से इन प्रश्नों के संतोषप्रद जवाब खोजने में जुटे हुए हैं। इनके प्रयास से एक धुँधली-सी तस्वीर जरूर उभरी है। इस तस्वीर की मुख्य आकृतियाँ कैसा रूप ले रही हैं, आइए इस लेख में समझें।

इतिहास में चुम्बकीय दिक्सूचक का सबसे शुरुआती वर्णन ग्यारहवीं सदी में देखने को मिलता है। चीन के नाविकों द्वारा उपयोग में लाए जाने वाले एक दिक्सूचक का उल्लेख है उसमें। पर ऐसा समझा जाता है कि चीन के लोग, छठवीं सदी के पहले ही यह जान गए थे कि स्वतंत्रता से घूम-फिर सकने वाला एक चुम्बक हमेशा एक खास दिशा (लगभग उत्तर-दक्षिण) में ही रुकता है। लेकिन ऐसा क्यों होता है, यह सोलहवीं सदी के अंत तक एक रहस्य था। इस सवाल का जवाब तब मिला जब विलियम गिलबर्ट ने, सन 1600 में पहली बार यह सुझाया-ऐसा इसलिये होता है क्योंकि पृथ्वी खुद एक विशालकाय चुम्बक है। पृथ्वी के चुम्बकीय गुणों के महत्व को मद्देनज़र रखते हुए तब से इनका बारीकी से अध्ययन किया गया है।

और आज हम जानते हैं कि हमारी धरती का चुम्बकीय क्षेत्र किस तरह समस्त जीवन को अपने में समेटे हुए है-चाहे वह जल में मौजूद हो, सतह पर हो या वायुमंडल में। प्रभाव की दृष्टि से भी चिरकाल से यही चुम्बकीय बल सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण रहा है। अतः जीव-जन्तुओं की चुम्बकीय संवेदनशीलता या उन पर पड़ने वाले चुम्बकीय प्रभावों की चर्चा करते वक्त हमारा प्रमुख केन्द्र बिन्दु पृथ्वी का चुम्बकीय बल ही होगा। इसलिये जीव-जगत की बात शुरू करें उससे पहलेे यह जरूरी हो जाता है कि एक सरसरी नजर पृथ्वी के चुम्बकत्व पर भी डाल ली जाए।

पृथ्वी एक चुम्बक (earth is a magnet)
सबसे पहला प्रश्न तो शायद यही होगा कि आखिर पृथ्वी में चुम्बकत्व क्यों है सवाल सरल है। पर जैसा कि सरल सवालों के साथ अक्सर होता है जवाब अपूर्ण और असंतोषप्रद ही नजर आते हैं। भूगर्भशास्त्रियों के बीच इस विषय को लेकर कोई एक सर्वमान्य समझ तो नहीं उभर पाई है; हाँ, पर इस बात पर सभी एकमत हैं कि इस चुम्बकत्व की उत्पत्ति पृथ्वी की लौह सम्पन्न द्रवीय बाहरी कोर (Outer Core) में बह रही विद्युत धाराओं की वजह से ही होती है।

मोटे तौर पर समझा जाए तो पृथ्वी का चुम्बकीय बल एक भीमकाय छड़ चुम्बक सरीखा है। ‘भौगोलिक उत्तर दक्षिण ध्रुवों’ के अतिरिक्त पृथ्वी में एक और जोड़ी ध्रुव ‘उत्तर और दक्षिण चुम्बकीय ध्रुव’ मौजूद हैं।

अब जैसा कि सर्वविदित है, एक लटकाए हुए चुम्बक (या चुुम्बकीय सुई) का उत्तरी ध्रुव उत्तर दिशा में रुकता है। इसका अर्थ यह हुआ कि पृथ्वी का चुम्बकीय दक्षिण ध्रुव दक्षिण में न होकर भौगोलिक उत्तरी ध्रुव के समीप है; और चुम्बकीय उत्तरी ध्रुव भौगोलिक दक्षिण ध्रुव के पास है।

है न, यह थोड़ी दिलचस्प बात। पर ऐसा भी नहीं है कि चुम्बकीय ध्रुव अपने से विपरीत भौगोलिक ध्रुवों के ठीक ऊपर या आस-पास हैं। चुम्बकीय दक्षिण ध्रुव भौगोलिक उत्तरी ध्रुव से दूर उत्तरी कनाडा में (76.1 डिग्री N, 100 डिग्री w) पड़ता है। चुम्बकीय उत्तरी ध्रुव तो भौगोलिक दक्षिण ध्रुव से और भी अधिक दूर अंटार्कटिका (65.8 डिग्री S, 139 डिग्री E) में मौजूद है। यही कारण है कि दिक्सूचक एकदम उत्तर दिशा कभी नहीं दिखाता।

पृथ्वी का चुम्बकीय बल सतह पर तो विद्यमान है ही, यह आकाश में भी काफी दूर तक फैला हुआ है। दरअसल सूरज से हमें केवल प्रकाश और गर्मी ही प्राप्त नहीं होती बल्कि खासी मात्रा में तीव्र गति-धारी आवेशित कणों (इलेक्ट्रॉन और प्रोटॉन) की धाराएँ भी निकलकर पृथ्वी तक पहुँचती रहती है। इन धाराओं को सोलर विंड (Solar Wind) कहा जाता है। सोलर विंड जब पृथ्वी के समीप पहुँचती है तो उसके चुम्बकीय क्षेत्र पर एक तरह का ‘दबाव’ डालती है। इस ‘दबाव’ के कारण ही यह चुम्बकीय क्षेत्र एक तरफ से दब जाता है।

सोलर विंड के अतिरिक्त अंतरिक्ष से (दरअसल हमारे सौर मंडल से भी दूर से) एक और किस्म के आवेशित कण (मुख्यतः प्रोटॉन) हमारी धरती पर अविरत बरसते रहते हैं। इन कणों को कॉस्मिक किरणें (Cosmic rays) कहा जाता है। ये किरणें कहाँ से आती हैं, यह अभी पक्के तौर पर नहीं मालूम। पर हम खुश नसीब हैं कि, पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र एक कवच की तरह काम करते हुए सोलर विंड और कॉस्मिक किरणों के अधिकांश कणों को धरती से परे धकेल देता है।

हाँ, कुछ कण जरूर इस सुरक्षा कवच को भेद पाने में सफल हो जाते हैं। इनमें से कुछ तो चुम्बकीय क्षेत्र के ऊपरी इलाकों में फँस कर ‘वेन एलन रेडिएशन बेल्ट’ (Van Allen radiation belts) का निर्माण करते हैं। और बाकी हम तक पहुँच कर हमारे शरीर को हर समय भेदते रहते हैं। जी हाँ, इस प्रहार का भले ही आपको गुमान न हो, पर यह जाँची परखी बात है कि अगर आप समुद्र तट पर आराम फरमा रहे हैं। तो औसतन एक से तीन कण प्रति वर्ग से.मी. प्रति मिनट की दर से कॉस्मिक किरणें आपके जिस्म से आर-पार हो रही होंगी। जैसे-जैसे भूमध्य रेखा से दूर जाते हैं, यह दर बढ़ती जाती है।

यह किरणें हमें किस तरह प्रभावित करती हैं यह तो पता नहीं, पर इस बात की प्रबल संभावना जरूर है कि पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र और इन किरणों की परस्पर क्रिया का असर शुरू से ही जैव विकास (Evolution) पर होता आया है। इस असर का प्रमुख कारण चुम्बकीय क्षेत्र कि दिशा और मात्रा में निरंतर होती घट-बढ़ को माना जाता है।

जी हाँ, पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र स्थिर नहीं है। लाखों वर्षों से इसमें निरंतर अनियमित बदलाव होते आए हैं। इन बदलावों के प्रमाण हमें पृथ्वी में (चट्टान की) विभिन्न परतों और समुद्री तल पर मौजूद चट्टानों के चुम्बकत्व के अध्ययन से मिले हैं। यह बदलाव चुम्बकीय क्षेत्र की मात्रा और दिशा दोनों में देखने को मिलता है।

अभी तक उपलब्ध प्रमाणों के हिसाब से कई बार ऐसा भी हुआ है कि चुम्बकीय क्षेत्र घट कर शून्य हो गया और फिर उल्टी दिशा में बढ़ने लगा। ऐसा अनुमान है कि पिछले पचास लाख सालों में इस तरह कि उलट-फेर बीस बार हो चुकी है। आख़िरी बड़ी उलट-फेर लगभग सात लाख साल पहले हुई थी लेकिन करीब 30 हजार साल पहले एक छोटी उलट फेर रिकॉर्ड कि गई है। और लगभग दस लाख वर्ष पहले एक समय तो ऐसा भी आया था जब दस - बीस हजार साल के लिए पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र लगभग लुप्त ही हो गया था।

इस तरह के बदलाव शुरू से ही इतनी बेतरतीबी और अनियमितता से होते देखे गए हैं कि यह अंदाज लगा पाना मुश्किल है कि अगली उलट-फेर कब होगी। पर जिस दर से पृथ्वी का चुम्बकीय बल घट रहा है (करीब पाँच प्रतिशत प्रति सौ साल) वह अगर कायम रहा तो आगामी दो हजार सालों के अंदर आप चुम्बकीय बल में एक और उलट-फेर की उम्मीद कर सकते हैं।

पर घबराइए नहीं यह जरूरी नहीं कि ऐसा हो ही। दरअसल यह पूरा मसला बेहद पेचीदा है। भूगर्भ-शास्त्री तो अभी तक यह ही समझ नहीं पाए हैं कि चुम्बकीय बल में यह बदलाव आखिर आते क्यों हैं।

चूँकि हम पृथ्वी की तुलना एक विशालकाय छड़ चुम्बक से कर रहे हैं, मुमकिन है आप इस चुम्बकीय बल को काफी प्रबल मान बैठें। पर आपको यह जान कर शायद आश्चर्य हो कि प्रयोगशालाओं में उपयोग में आए जाने वाले आम चुम्बकों की तुलना में यह चुम्बकीय बल काफी कमजोर है। पर फिर भी जीवन इस बल के प्रति संवेदनशील है, इससे प्रभावित है। कैसे, आइए समझें।

पृथ्वी के चुम्बक का इस्तेमाल (Use of earth's magnet)
जीवों में पृथ्वी के चुम्बकीय बल के प्रति संवेदनशीलता का सबसे सरल, सीधा और अहम उदाहरण (प्रक्रिया और अवलोकन के हिसाब से) मैग्नेटो-टेक्टिक (Magnetotactic) जीवाणुओं में देखने को मिलता है।

इन जीवाणुओं में एक ऐसा चुम्बकीय मार्गदर्शन यंत्र पाया जाता है जिसका उपयोग यह जीव हलन-चलन में करते हैं। यह तंत्र, पृृथ्वी के चुम्बकीय बल की मदद लेते हुए, इन जीवाणुओं को चलने के लिये सही दिशा की ओर उन्मुख करता है। अब इसे आप शायद जैव-विकास की अद्भुत जटिलता की एक और मिसाल ही कहेंगे कि जहाँ पृथ्वी के चुम्बकत्व का इस तरह उपयोग करने का मानव इतिहास मात्र एक हजार साल ही पुराना है, वहीं दूसरी ओर मैग्नेटो-टेक्टिक बैक्टीरिया जैसे सरलतम जीव ने यह महारत अरबों साल पहले ही हासिल कर ली थी।

मैग्नेटो-टेक्टिक जीवाणु उन जीवाणुओं की जमात में आते हैं जिन्हें श्वसन करने के लिये ऑक्सीजन गैस की जरूरत नहीं पड़ती। उल्टे ऑक्सीजन तो इनके लिये एक विष के समान होती है। इसलिये यह जीवाणु ऐसी जगहों पर ही पहना पसंद करते हैं जहाँ ऑक्सीजन न हो (या बहुत ही कम मात्रा में हो), जैसे तालाबों और दलदलों के तल में जहाँ का पानी रुका रहता है।

इन जीवाणुओं की सर्वप्रथम खोज, जो कि महज एक संयोग थी, ऐसे ही एक तालाब के तल की कीचड़ में हुई थी। यह बात सन 1975 की है। और इस खोज का श्रेय जाता है रिचर्ड ब्लैकमोर को, जो दरअसल उस समय किसी और ही चीज पर अपनी पी.एच.डी. पूरी करने में जुटे हुए थे। किस तरह तुक्के से यह खोज हो गई, यह अपने आप में काफी दिलचस्प वाक्या है। पर उसका यहाँ वर्णन शायद अपने संदर्भ से परे होगा। इसलिये फिलहाल हम मैग्नेटो-टेक्टिक जीवाणुओं की चुम्बकीय संवेदनशीलता पर ही चर्चा को आगे बढ़ाते हैं।

दरअसल ये जीवाणु अपने संचलन (Movement) के लिये पृथ्वी के चुम्बकीय बल का उपयोग एक बड़ी ही सरल प्रक्रिया के द्वारा करते हैं। इनमें मैग्नेटाइट या लोडस्टोन नाम के प्राकृतिक चुम्बकीय पत्थर के छोटे-छोटे टुकड़े (एक से ज्यादा) श्रृंखलाओं में कतारबद्ध जमे हुए पाए जाते हैं। पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र इन पत्थरों पर चुम्बकीय बल लगाता है। पृथ्वी की भूमध्य रेखा के आस-पास के इलाकों में पाए जाने वाले मैग्नेटो-टेक्टिक जीवाणुओं को छोड़कर, अन्य सभी जगहों के जीवाणुओं पर यह बल हमेशा नीचे की ओर लगता है। बल के नीचे की ओर लगने के कारण इन जीवणुओं को तालाबों के तलों तक पहुँचने में काफी मदद मिलती है। अब चूँकि पृथ्वी के उत्तरी और दक्षिणी गोलार्द्धों में पृथ्वी के चुम्बकीय बल की दिशा विपरीत होती है, इसलिये यह देखा गया है कि दक्षिणी गोलार्द्ध में पाए जाने वाले जीवाणुओं के चुम्बकीय पत्थरों के ध्रुव भी उत्तरी गोलार्द्ध में पाए जाने वाले जीवाणुओं के ध्रुवों के विपरीत होते हैं।

वैसे, जीवाणुओं में पत्थरों के टुकड़ों का पाया जाना कोई खास बात नहीं है। गुण तो है इन टुकड़ों का चुम्बकीय होना।

आपको यह जानकर शायद थोड़ा अचरज हो कि कीचड़ में पाए जाने वाले अधिकांश जीवाणुओं के अग्रिम हिस्सों में ठोस क्रिस्टल्स (Crystals) पाए जाते हैं। इन टुकड़ों के वजन की वजह से इन जीवाणुओं का अगला सिरा नीचे की ओर उन्मुख हो जाता है। इससे इनको तालाबों के तल की ओर तैरने में सुगमता हो जाती है। चूँकि मैग्नेटाइट पत्थर जीवों द्वारा प्राकृतिक रूप से बनाया गया सबसे भारी पदार्थ है, इसलिये मात्र वजन की तरह से भी यह पत्थर इन जीवाणुओं के लिये काफी उपयुक्त रहता। इन पत्थरों का चुम्बकीय गुण, मैग्नेटो-टेक्टिक जीवाणुओं के संचलन को अधिक सफल और आसान बना देता है। ‘है न यह सोने पर सुहागे वाली एक मिसाल।’

जीव वैज्ञानिकों ने इन जीवाणुओं के अलावा कई और ऐसे जीव-जन्तुओं का पता लगाया है जिनमें पृथ्वी के चुम्बकीय बल के प्रति संवेदनशीलता होती है। इनमें, शोध की दृष्टि से कुछ प्रवासी पक्षी और अपना ठौर ढूंढ लेने वाले कबूतर (Homing pigeons) प्रमुख हैं।

इस कबूतर की खासियत यह है कि अगर उन्हें उनके निवास स्थल से सैकड़ों किलोमीटर दूर छोड़ दिया जाए, तो वे किसी प्रकार से अपने घर वापस पहुँच जाते हैं। वैज्ञानिकों के लिये शोध का विशेष मुद्दा रहा है कि यह परिन्दे आखिर किन दिशा-सूचक चिन्हों की मदद से और किस मार्गदर्शन प्रक्रिया को अपना कर अपना घर पुनः ढूंढ पाते हैं। प्रक्रिया के बारे में तो फिलहाल कोई स्पष्टता नहीं है। पर शोध के परिणामों से ऐसा जरूर प्रतीत होता है कि ये कबूतर अपना रास्ता ढूंढने के लिये कई सारे दिशा-सूचक चिन्हों और व्यवस्थाओं का सहारा लेते हैं। पृथ्वी का चुम्बकीय बल उनमें से एक है।

अमेरिका के प्रिंसटन विश्व विद्यालय के गोल्ड और वॉलकॉट द्वारा प्रतिपादित संकल्पना के अनुसार कबूतरों में किसी जगह पर पृथ्वी के चुम्बकीय बल की मात्रा को आंक सकने की क्षमता होती है।

चूँकि यह चुम्बकीय बल अक्षांश के साथ घटता-बढ़ता है, इसलिये इस क्षमता के आधार पर कबूतरों को कम से कम किसी जगह के अक्षांश का पता तो लग ही जाता है। इस संकल्पना की पुष्टि में कई प्रमाण मिले हैं कि पृथ्वी के चुम्बकीय बल में छोटे-मोटे बदलाव से भी कबूतरों की अपने घर तक पहुँचने की क्षमता प्रभावित हो जाती है।

प्रवासी पक्षियों के अलावा कई और जीव-जन्तु जैसे मधुमक्खी, ट्यूना और सॅमन मछलियाँ आदि पृथ्वी के चुम्बकीय बल के प्रति संवेदनशील पाई जाती हैं। ऐसा भी माना जाता है कि शार्क और अधिकांश रे (Ray) मछलियाँ अपनी विद्युतीय संवेदनशीलता का उपयोग चुम्बकीय बल की दिशा का पता लगाने में भी करती हैं। इन सभी जीवों की चुम्बकीय संवेदनशीलता का आधार क्या है, यह तो अभी तक ठीक से मालूम नहीं पड़ सका है। पर इतना जरूर है कि इन सभी जीवों में, तंत्रिका तंत्र से जुड़े हुए मैग्नेटाइट पत्थर के बारीक टुकड़े पाए गए हैं।


सोलर बिण्ड का प्रभाव और वेन एलन रेडिएशन बेल्टसोलर बिण्ड का प्रभाव और वेन एलन रेडिएशन बेल्ट अब जहाँ तक हम इंसानों का सवाल है, प्राप्त जानकारी के आधार पर तो यही प्रतीत होता है कि इंसान इस क्षमता से वंचित है। पर जैसा कि आपको आभास हो चला होगा, चुम्बकीय संवेदनशीलता को लेकर हमारी समझ अभी आधी-अधूरी ही है।

इस विषय पर शोध से नित नए आश्चर्यजनक तथ्य उभर कर आ रहे हैं। मिसाल के तौर पर, गत वर्ष घोंघों (Snails) पर शोध के आधार पर कनाडा के कुछ वैज्ञानिकों ने यह दावा किया था कि दर्द से पीड़ित जीव-जन्तुओं को अगर एक खास किस्म के चुम्बकीय क्षेत्र में रखकर दर्द निवारक दवा दी जाए तो उन्हें ज्यादा आराम मिलेगा।

इस बात के कई प्रमाण मिले हैं कि चुम्बकीय बल जानवरों के दिमाग में पाए जाने वाले ओपिओइड (Opioid) नामक रसायनों की रासायनिक क्रियाओं को प्रभावित करता है। पर इन सभी परिणामों को अभी एक ठोस आधार की जरूरत है? तब तक मैगनेटो-थेरेपी के इलाजों को मजबूरन विज्ञान के हद से परे ही रहना होगा।

चुम्बकत्व और जैव विकास Magnetism and biodiversity)
कई वैज्ञानिक ऐसा मानते हैं कि पृथ्वी के चुम्बकीय बल में होते आए बदलावों ने जैव विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके हिसाब से पृथ्वी पर जीवन के शुरुआती दिनों में चुम्बकीय बल ने कॉस्मिक किरणों और सोलर विण्ड के कणों को पृथ्वी के बाहर ही रोक कर पनपते जीवन को नष्ट होने से बचाए रखा। तब से अब तक हमारी धरती कई ऐसे दौरों से गुजर चुकी है जब उसका चुम्बकीय बल लगभग गायब ही हो गया था। तब इस सुरक्षा कवच के न रहने से पृथ्वी तक पहुँचने वाले आवेशित कणों की मात्रा बेतहाशा बढ़ गई। ऐसा समझा जाता है कि उस समय इन कणों के प्रहार से जीवों में गुणसूत्रों की व्यवस्था में गड़बड़ी (Mutation) की दर काफी तेज हो गई, जिससे जीव जन्तुओं की प्रजातियों में कई बादलाव आए।

 

 

 

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