सौर ऊर्जा का महत्त्व समझ रहा भारत

Submitted by editorial on Thu, 10/11/2018 - 13:48
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दैनिक जागरण, 11 अक्टूबर, 2018

यह यूँ ही नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को फ्रांस के राष्ट्रपति इमैन्युएल मैक्रों के साथ संयुक्त रूप से ‘चैम्पियन्स अॉफ द अर्थ अवॉर्ड’ मिला। संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से पर्यावरण क्षेत्र में दिया जाने वाला यह सबसे बड़ा सम्मान है। मरकॉम कम्युनिकेशन्स इण्डिया की रिपोर्ट के अनुसार, भारत 2017 में सौर ऊर्जा के मामले में तीसरे सबसे बड़े बाजार के रूप में उभरा है और इस मामले में सिर्फ चीन और अमरीका से पीछे है।

सौर ऊर्जासौर ऊर्जा (फोटो साभार - स्क्रॉल)यह वही देश है, जहाँ बिजली पर शहरों का और शहरों में भी वीवीआईपी इलाकों का पहला अधिकार था। गाँवों और ग्रामीण इलाकों में खेती और सिंचाई के दिनों में भी बिजली घंटे से आती थी। और वह भी शिफ्ट में इसकी कई वजहें थीं। ऊर्जा के स्रोत सीमित थे।

उत्पादन और वितरण की अपनी दिक्कतें थीं फिर ऊर्जा उत्पादन की लागत से लेकर उसके लिये जरूरी ईंधन कोयला और तेल के क्षेत्र में समक्ष न थे, हमारी निर्भरता दूसरों पर थी, लागत अधिक और उत्पाद कम। वितरण की अपनी दिक्कतों के बीच उद्योग धन्धों में ऊर्जा की बढ़ती माँग से स्थितियाँ ऐसी थीं कि चाहकर भी कुछ बड़ा बदलाव नहीं लाया जा सकता था। भारत ने अपनी इन दिक्कतों से सीखा और सत्तर के दशक में आये तेल संकट के बाद ऊर्जा के परम्परागत स्रोतों के साथ-साथ गैर-पारम्परिक स्रोतों की तरफ तेजी से ध्यान देना शुरू किया।

स्थायी ऊर्जा के निर्माण में पुनरोपयोगी ऊर्जा या गैर-परम्परागत ऊर्जा स्रोतों के उपयोग के उत्तरोत्तर बढ़ते महत्त्व को महसूस करते हुए भारत उन गिने-चुने देशों में शामिल रहा, जिन्होंने 1973 से ही नए तथा पुरोपयोगी ऊर्जा स्रोतों का उपयोग करने के लिये अनुसन्धान और विकास कार्य आरम्भ कर दिये। नतीजा यह हुआ कि हालात तेजी से बदलन लगे।

आज स्थिति यह है कि ऊर्जा निर्माण के जितने भी माध्यम हो सकते हैं, देश ने सबको अपना लिया है। पारम्परिक और गैर-पारम्परिक ताप और जलविद्युत गृह से आगे बढ़ हम परम्परागत, पुनरोपयोगी और गैर-परम्परागत ऊर्जा स्रोतों की तलाश में जुटे और शीघ्र ही सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल विद्युत, बायो गैस, हाइड्रोजन, ईंधन कोशिकाएँ, परमाणु ऊर्जा, समुद्री ऊर्जा, भू-तापीय ऊर्जा, आदि नवीन प्रौद्योगिकियों में अपना दखल बढ़ा दिया है।

खुशी की बात यह कि भारत के इन प्रयासों को न केवल अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली बल्कि उसे नए साथी भी मिले, खासकर सौर ऊर्जा के क्षेत्र में फ्रांस के साथ समन्वित तौर पर हम दुनिया की अगुवाई करने की तरफ कदम बढ़ा चुके हैं।

अन्तरराष्ट्रीय सौर गठबन्धन, जिसे आईएसए भी कहते हैं, के दिल्ली में आयोजित स्थापना सम्मेलन में सदस्य देशों ने अपनी कुल ऊर्जा खपत में सौर ऊर्जा के हिस्से को बढ़ाने का वचन दिया। इस अवसर पर तीन पन्नों का ‘दिल्ली सौर एजेंडा’ जारी किया गया, जिसमें कहा गया कि आईएसए निरन्तर विकास के लिये 2030 संयुक्त राष्ट्र एजेंडे की अपनी प्रतिबद्धता दोहराता है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने ‘पेरिस जलवायु समझौते’ के दौरान इस गठबन्धन की शुरुआत की थी। आईएसए की ओर से यह कहा गया कि यह सौर संसाधन सम्पन्न देशों का एक गठबन्धन है, जो अपनी विशेष ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने और दृष्टिकोण के माध्यम से अन्तराल की पहचानकर उससे निपटने में सहयोग प्रदान करने के लिये मंच उपलब्ध कराएगा।

आईएसए को कर्क और मकर रेखा के उष्णकटिबन्धीय क्षेत्र में आने वाले सभी 121 देशों के लिये खुला रखा गया। अब आईएसए के ‘दिल्ली सौर एजेंडा’ में जोर दिया गया है कि हमारे प्रयास में वृद्धि दर बढ़ाने, कौशल बढ़ाने, रोजगार पैदा-करने, उद्यमिता उन्मुक्त करने, नवाचार बढ़ाने और आय बढ़ाकर स्थिरता हासिल करने की क्षमता है। आईएसए के सदस्य देश ‘अपनी राष्ट्रीय ऊर्जा खपत में सौर ऊर्जा की हिस्सेदारी को बढ़ाने के लिये प्रयासों में बढ़ोत्तरी पर’ भी सहमत हुए हैं।

यह कदम जलवायु परिवर्तन की वैश्विक चुनौतियों से निपटने व अपने-अपने देशों में नीतिगत पहलों के समर्थन और उनके कार्यान्वयन व सभी प्रासंगिक हितधारकों की भागीदारी के जरिए एक प्रभावी समाधान के रूप में उठाया गया है। सम्मेलन में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैन्युएल मैक्रों ने 2022 तक वैश्विक सौर जन्म पीढ़ी के लिये अतिरिक्त 70 करोड़ यूरों के निवेश की घोषणा की, ताकि जीवाश्म ईंधन के उपयोग को कम और जलवायु परिवर्तन से सामना करने में मदद की जा सके।

अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का नाम लिये बगैर मैक्रों ने कहा कि कुछ लोगों ने जलवायु समझौता छोड़ दिया, जबकि अन्य बने हुए हैं क्योंकि वह अपने बच्चों और उनके बच्चों की भलाई चाहते हैं। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिये 10 बिन्दु प्रस्तुत करते हुए प्रौद्योगिकी, आर्थिक स्रोत, भण्डारण प्रौद्यगिकी, कर्मचारी निर्माण और नवोन्मेष के विकास और मौजूदगी के लिये पूर्ण पारितंत्र पर जोर देते हुए सौर परियोजनाओं के लिये रियायती वित्तपोषण को कम जोखिम पर करने का आवाह्न किया।

उनका दावा था कि देश में 2030 तक 40 प्रतिशत बिजली उत्पादन सौर एवं पवन जैसे अभय ऊर्जा संसाधनों से किया जाएगा। उनका कहना था, ‘एक विश्व एक सूर्य और एकग्रिड का हमारा सपना है, सूर्य से हर समय बिजली मिलती रहती है क्योंकि यह पृथ्वी के एक हिस्से में अस्त होता है तो दूसरे हिस्से में उदय होता है। पूरी दुनिया में एक साथ सूर्यास्त नहीं होता।’

इस कार्यक्रम में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने भी हिस्सा लिया। इस दौरान ‘हिन्द महासागर तटीय सहयोग संघ’ यानी आईओआरए के दूसरे वैश्विक अक्षय ऊर्जा निवेशक सम्मेलन एवं प्रदर्शनी का भी आयोजन हुआ। गुतारेस का कहना था, ‘भारत में हम वैश्विक अक्षय ऊर्जा क्रान्ति देख रहे हैं। इस क्रान्ति के केन्द्र में सौर ऊर्जा है।’ यह यूँ ही नहीं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को फ्रांस के राष्ट्रपति इमैन्युएल मैक्रों के साथ संयुक्त रूप से ‘चैम्पियन्स अॉप द अर्थ अवॉर्ड’ मिला। संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से पर्यावरण क्षेत्र में दिया जाने वाला यह सबसे बड़ा सम्मान है।

मरकॉम कम्युनिकेशन्स इण्डिया की रिपोर्ट के अनुसार, भारत 2017 में सौर ऊर्जा के मामले में तीसरे सबसे बड़े बाजार के रूप में उभरा है और इस मामले में सिर्फ चीन और अमरीकी से पीछे है। रिपोर्ट के अनुसार 2017 में भारत ने रिकॉर्ड 9600 मेगावॉट क्षमता की सौर परियोजनाएँ लगाईं, जो 2016 में 4300 मेगावाट के मुकाबले दोगुनी से भी अधिक हैं।

आईएचएस मार्केट का अनुमान है कि भारत 2018 में, यानी इसी साल अमरीकी को पीछे छोड़कर दूसरे स्थान पर आ जाएगा उसका कहना है कि इस साल भारत 11 गीगावाट तक की परियोजनाएँ लगाएगा जबकि अमरीकी 10 गीगावाट तक के ही प्रोजेक्ट्स लगाएगा।

लेखक राजनीतिक जानकार हैं।


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