पानी के पहाड़

Submitted by Hindi on Tue, 01/23/2018 - 15:57
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बूँदों के तीर्थ ‘पुस्तक’


...यह कोई कहानी नहीं है।
...यह तो कई ‘कहानियों’ का क्लाइमेक्स है।
रोमांचक! जीवंत! सरप्राइज! जिज्ञासा जगाने वाला! प्रेरणादायी! सत्यमेव जयते! संकल्प! और भी बहुत कुछ...! आप सोच रहे होंगे, भला ऐसा क्या राज है इसमें।

श्री तोलाराम आंजना ने अपने जिले में पहला कुंडी बनायातो सुनिये! हमने नीचे से पहाड़ देखा! पत्थरों का पहाड़! ऊपर गये तो उसमें एक तालाब मिला। फिर ऊपर देखा… पहाड़! पास गये तो उसमें भी एक तालाब! यही रोमांचक क्षण फिर तीसरी बार!!

पत्थरों के नहीं, पानी के पहाड़!!!
थकियेगा नहीं, आज हम आपको इन्हीं पहाड़ों की कभी न भूलने वाली सैर कराएँगे।

जल प्रबन्धन कार्यक्रम एक अवधारणा पर कार्य करता है। पहाड़ी से नाले की ओर स्थान-स्थान पर अनुकूल संरचनाएँ तैयार कर पानी रोकने की कोशिश करना। इस रोक से जहाँ-जहाँ रिचार्जिंग की सम्भावना बनती है, पानी जमीन में समाता जाता है। यह सभी जानते हैं कि ‘रोक’ न होने पर वह फर्राटे की गति से निकलता, पहाड़ी नालों-नदियों से होता हुआ समुद्र में चला जाता है। ...और हम उसके जाने के बाद रोते हैं। चीखते-चिल्लाते हैं। कभी गुमसुम हो हाथ पर हाथ धर बैठ जाते हैं, लेकिन कुछ लोग हिम्मत करके और संकल्प लेकर उसे पहाड़ों को खोदने जैसी प्रतिकूलताओं भरी चुनौतियों के बावजूद रोकते हैं। उसमें सफल भी होते हैं।

यह समूह आज के समाज का ‘नायक’ है। यह रोमांचक कहानी भी इन्हीं नायकों की है। इन्हें ही समर्पित!

उज्जैन जिले की महिदपुर तहसील के गाँव खजुरिया मंसूर और ठिकरिया की पहाड़ियों पर यह चमत्कार किया गया है। खजुरिया मंसूर में बावड़ी, डबरियाँ, कुंडियाँ, आर.एम.एस. और जिन्दा कुएँ देखते हुए हम पहाड़ी पर चढ़ते हैं।

...यहाँ एक विशाल तालाब बनाया गया है। यह 10 हेक्टेयर क्षेत्र में निर्मित है। तालाब में रबी के मौसम में भी 20 फीट पानी भरा है। इसमें दो कुएँ भी हैं, जो पानी के भीतर समाये हुए हैं। तालाब किनारे खड़े किसान बाबूराव कहने लगे- “हमारे आस-पास के सभी कुएँ लबालब हैं। इनसे सिंचाई हो रही है। पहले यहाँ कुछ नहीं हो पाता था।” इस तालाब के वेस्टवेअर से नाले में पानी जाता है। इसकी वजह से नाला भी जिन्दा रहता है। अभी हमने गाँव में नाले से रिचार्जिंग व सीधे मोटर लगाकर सिंचाई होते देखी है। यह नाला 9 किमी लम्बा है।

कल्पना कीजिए, इस पहाड़ी के बारे में जब यहाँ तालाब नहीं बना होगा। जाहिर है, बरसात की बूँदें जब यहाँ गिरती होंगी तो उन्हें रोकने वाला, दुलार करने वाला, मेजबान की भूमिका अदा करने वाला, उनकी मनुहार करने वाला - भला यहाँ कौन था? कोई नहीं। न वृक्ष, न घास! केवल चारों ओर पत्थर ही पत्थर। इसलिये हमारी जीवनदायिनी बूँदें आतीं और चली जातीं, लेकिन अब परियोजना अधिकारी एस.सी. गुप्ता और स्थानीय समाज की सहभागिता वाले जल प्रबन्धन से पत्थरों का यह पहाड़ एक विशाल तालाब वाले पानी के पहाड़ में बदल गया है। काश! ऐसा होता कि विकास की जद्दोजहद करते भारत के उन अनगिनत गाँवों के ऊपर विराजित पहाड़ों के मस्तक पर बरसात की नन्हीं-नन्हीं बूँदों से यह स्थायी अभिषेक होता रहता और इस अभिषेक की प्रसन्नता तलहटी के गाँवों के घर-आँगन में अपनी-अपनी शैली में खुशी की किलकारियाँ भरती।

...हम फिर दूसरी पहाड़ी पर चढ़ते हैं।
...दूसरा चमत्कार!
...इस पहाड़ी पर भी एक विशाल तालाब मौजूद है।

यह ठिकरिया गाँव की पहाड़ी है। इसकी कहानी काफी रोचक है। सबसे पहले हम आपकी मुलाकात करवाते हैं तोलारामजी आंजना से। तोलाराम यहाँ पानी समिति के अध्यक्ष हैं और एक जुझारू पानी आन्दोलनकारी भी। ये शख्स पूरे उज्जैन जिले में इस बात के लिये पहचाने जाते हैं कि उज्जैन में इन्होंने सबसे पहली कुंडी बनाई और कुंडी आन्दोलन के प्रेरणा स्रोत बने। इसके बाद आपने अपनी जमीन पर दस डबरियाँ भी तैयार करवाईं।

सर्वश्री एस.सी. गुप्ता, तोलाराम और गाँव-समाज के लोगों ने इस तालाब की रोचक कहानी सुनाई। यह पहाड़ भी पूरी तरह से पत्थरों से सराबोर था। समाज ने यह तय किया कि पत्थरों के इस पहाड़ को अब हम पानी का पहाड़ बनाएँगे। ठिकरिया के समाज ने पत्थर हटाना शुरू कर किया। ट्रैक्टर का उपयोग किया गया। मशीनों की जरूरत भी लगी। समाज ने इस तालाब की नींव काली मिट्टी से तैयार करवाई। दूर-दूर तक पहाड़ी पर तो मिट्टी का कोई नामोनिशान था ही नहीं। गाँव के पास एक पुराने तालाब से यह मिट्टी लाये। इससे वह तालाब स्वतः गहरा भी हो गया। इस कार्य में गाँव-समाज के साथ-साथ कमल, नाथूलाल, दुलेसिंह, पर्वतसिंह, एक बुजुर्ग पुरा बा और चौकीदार का योगदान रात-दिन सक्रिय रहने वालों में से था। लगभग एक माह में ठिकरिया के दो तालाब बना दिये गये। जनरेटरों के साथ हैलोजन बल्ब लगाकर समाज ने यहाँ रातों को चार-चार बजे तक काम किया।

पहली बरसात के बाद यहाँ भरे पानी को देखने गाँव का समाज आया और खूब उत्सव मनाया। नारियल बदारे और पानी की परम्परानुसार पूजा-अर्चना की। भजन-कीर्तन किये। क्या इस आनन्द का वर्णन सम्भव है? इसके लिये तो यही पर्याप्त है कि इस समाज की खुशी देखकर आसमान से बूँदों के रूप में नेमत बरसाने वाले हमारे देवता भी प्रसन्न हो गये होंगे।

इस पहाड़ी को गाँव के लोग न जाने कितने बरसों से मोटा बड़ला के नाम से पुकारते रहे हैं। बड़ला यानी पहाड़। उसका दूसरा नाम ओढ़वां भी रहा है। पुराने जमाने में भी यहाँ कुछ स्थान प्राकृतिक रूप से ऐसे बन गये थे कि यहाँ पानी भर जाया करता था। ओढ़ से मतलब है रोक। मवेशी चराने वाले यहाँ छोटी-सी झिरी भी खोद लिया करते थे। यह पीने के पानी के काम में आती रही है। अब गाँव के लोग इन्हें तालाब वाली पहाड़ी के नाम से भी पुकारने लगे हैं।

महिदपुर क्षेत्र में इस तरह कुंडियां आपको कई जगह मिल जाएंगीतोलाराम पटेल कहते हैं- “तालाब बनने के पहले यहाँ पत्थर ही पत्थर थे। गर्मी में यह ‘सूखे का पहाड़’ बन जाया करता था। गाँव के पास एक सरकारी बावड़ी थी। वहीं से जैसे-तैसे पीने के पानी की पूर्ति हो जाया करती थी। पहाड़ पर आया पूरा पानी तो बहकर चला जाया करता था। पानी रोकने से यहाँ जलस्रोत जिन्दा हो गये हैं।” ठिकरिया गाँव में लगभग 50 बीघा में रबी की फसल ली जा रही है। पहले सिर्फ यहाँ ज्वार की खेती होती थी। क्षेत्र की कृषि योग्य जमीन 150 बीघा है। 50 बीघा में और रबी की फसल लिये जाने की सम्भावना है।

राधेश्याम भानोया कहने लगे कि यहाँ पर पास वाले तीन कुओं पर 24 घंटे इंजिन चलाओ तो भी पानी खत्म नहीं होता है।

...फिर एक और पहाड़ी।
...फिर एक और तालाब।
...हम इस समय जल प्रबन्धन के ‘शिखर’ की पाल पर खड़े हैं। पत्थरों के बीच पानी का विशाल भंडार। इसे भी ठिकरिया के समाज के सहयोग से वाटर मिशन के तहत श्री एस.सी. गुप्ता व उनकी टीम ने तैयार करवाया है। यह तालाब भी रबी के मौसम में लबालब भरा है। तालाब के पास के कुओं में भी 24 घंटे लगातार इंजिन चलता है, लेकिन फिर भी कुएँ खाली नहीं हो रहे हैं। इस तालाब के निर्माण में भी तोलाराम व उनके साथी समाज का उल्लेखनीय योगदान रहा है।

जलग्रहण कार्य की अवधारणा रिज टू वैली (पहाड़ी से नाले की ओर) की यहाँ जीवन्त मिसाल मिलती है। पहाड़ी के एक बड़े भू-भाग का पानी इस तालाब में एकत्रित होता है। इसके वेस्टविअर से निकला पानी ठिकरिया के नीचे वाले तालाब में जाता है। इसका ओवर-फ्लो खजुरिया मंसूर के तालाब में जाता है। इसके वेस्टविअर का पानी नीचे के गाँवों की ओर जाता है। यहाँ के नालों में भी रोक बाँध बनाया गया है।

इस पूरे पानी आन्दोलन वाले इलाके में और तालाब, तलैया, डबरियाँ व कुंडियाँ बनाई गई हैं। ऊपर से तो पानी रिचार्ज हो ही रहा है, लेकिन जगह-जगह पानी के ये ‘बेरिकेट्स’ उसे और रिचार्ज कर रहे हैं। इन गाँवों में आया पानी बेहतर जल प्रबन्धन व्यवस्था अपनाने की वजह से बाहर नहीं जा पा रहा है। फलस्वरूप भीषण सूखे की हालत में भी यहाँ रबी की न केवल फसल ली जा रही है, बल्कि रकबा भी बढ़ रहा है। ठिकरिया में भी आर.एम.एस. व अन्य तालाब बनाये गये हैं।

तोलाराम कहने लगे- “मैंने सबसे पहले कुण्डी बनाई। यह 10 X 10 की एक संरचना है। कुण्डी से भी जलस्तर बढ़ा है। इसके बाद 10 डबरियाँ भी बनाई गई हैं। मुर्रमी जमीन की वजह से इसमें आया पानी रिचार्ज होता रहा। इससे गाँव के बन्द रहने वाले 6 हैंडपम्प जीवित हो उठे। ठिकरिया के मांगू, नरवा, पदम और इन जैसे अनेक लोगों के चेहरों पर जल प्रबन्धन से आप बदलाव की कहानी पढ़ी जा सकती है।”

महिदपुर के गाँवों में ‘बूँदों की आराधना’ के सूत्रधार एस.सी. गुप्ता हैं। ठिकरिया की पहाड़ी के शिखर पर बना तालाब हो या फिर नीचे के गाँव काचरिया के किसी खेत में कुओं के जिन्दा रहने से रबी फसल की जड़ों को मिल रहे पर्याप्त पानी की बात- हर जगह पानी रोको के बेहतर प्रबन्धन के नतीजे अन्य स्थानों के लिये भी प्रेरणादायक माने जा सकते हैं। गुप्ता ने कहा- “उन्होंने चंडीगढ़ के महाजरी प्रोजेक्ट की अध्ययन यात्रा की थी। वहाँ पर भी पहाड़ों पर इस तरह के अनेक तालाब बनाये गये हैं। इसी पानी की रिसन से किसान अपने खेतों में बढ़िया फसल लेते हैं। समाज का बड़े पैमाने पर सामाजिक और आर्थिक विकास हो रहा है। यहाँ समाज खुद अपनी ‘बैंकें’ चला रहे हैं, जिसमें कम ब्याज पर राशि मिल जाती है। बचत की प्रवृत्ति भी बढ़ती है।”

पानी से लबालब इन जल संरचनाओं और रबी की फसल दे रहे खेतों को देखकर क्या आप अन्दाजा लगा सकते हैं कि यहाँ पर केवल 15 इंच बरसात हुई है, जबकि क्षेत्र की औसत वर्षा 32 इंच मानी जाती है। यानी गम्भीर सूखे के हालात…!

...आपको कैसी लगी उन पहाड़ों से मुलाकात जो अब ‘पानी वाले पहाड़’ की पहचान में तब्दील हो गये हैं।

जैसे संकल्प का दूसरा नाम
जैसे माउण्ट आबू की नक्की झील,
जैसे किसी सपने का साकार होना,
जैसे पहाड़ी पर खुद बादलों का ठहर जाना,
जैसे पहाड़ी पर खुदा की इबादत
या देवताओं को आचमन!
...और जैसे दूर-दूर तक फैले गाँवों में पहाड़ से प्रकाश स्तम्भ की भाँति ‘पानी की रोशनी’ देने वाला अनुभव!
...या फिर कुछ और इससे भी अच्छा!

 

बूँदों के तीर्थ

 

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

बूँदों के ठिकाने

2

तालाबों का राम दरबार

3

एक अनूठी अन्तिम इच्छा

4

बूँदों से महामस्तकाभिषेक

5

बूँदों का जंक्शन

6

देवडूंगरी का प्रसाद

7

बूँदों की रानी

8

पानी के योग

9

बूँदों के तराने

10

फौजी गाँव की बूँदें

11

झिरियों का गाँव

12

जंगल की पीड़ा

13

गाँव की जीवन रेखा

14

बूँदों की बैरक

15

रामदेवजी का नाला

16

पानी के पहाड़

17

बूँदों का स्वराज

18

देवाजी का ओटा

18

बूँदों के छिपे खजाने

20

खिरनियों की मीठी बूँदें

21

जल संचय की रणनीति

22

डबरियाँ : पानी की नई कहावत

23

वसुन्धरा का दर्द

 

 

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About the author

.पत्रकार और लेखक क्रांति चतुर्वेदी का जल पर लेखन से गहरा नाता है। पानी पर आज कई अध्ययन यात्राएँ कर चुके हैं। जल, जंगल और प्राकृतिक संसाधन प्रबन्धन पर पाँच पुस्तकें भी लिख चुके हैं। मध्य प्रदेश के सन्दर्भ ग्रन्थ ‘हार्ट ऑफ इण्डिया’ के सम्पादक भी रह चुके हैं। पानी की पत्रकारिता के लिये भारतीय पत्रकारिता जगत की प्रतिष्ठित के.के.

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