नहीं लिया सबक, तो बूंद-बूंद को मोहताज होगा भारत

Submitted by HindiWater on Sat, 07/13/2019 - 17:21

नहीं लिया सबक, तो बूंद-बूंद को मोहताज होगा भारत।नहीं लिया सबक, तो बूंद-बूंद को मोहताज होगा भारत।

जगह-जगह ताल, तलैया, पोखर, झील, जल, स्त्रोत और नदियां आदि भारत की धरती को सिंचित करने का कार्य ही नहीं करते थे, बल्कि स्वच्छ जल उपलब्ध कराकर हर जीव-जन्तु और इंसान की प्यास भी बुझाते थे। धरती के ऊपरी सतह के पानी को सिंचाई सहित पीने के उपयोग में लाया जाता था। तब पानी की कमी या प्रदूषण के कारण किसी की मृत्यु नहीं होती थी। शुद्ध व स्वच्छ जल की बहुतायात उपलब्धता के कारण भारत को पानीदार देश भी कहा जाता था। यही कारण है कि आजाद भारत में वर्ष 1951 में प्रति व्यक्ति जल की उपलब्ध्ता 5177 घनमीटर थी, लेकिन नदियों को माँ का दर्जा देने वाले देश की जनता ने अपने जल स्त्रोतों और नदियों आदि की परवाह नहीं की। विकास के नाम पर तालाबों और कुओं को पाटकर अधिकांश हिस्सों पर भवन व पार्किंग बना दी गयी। रिहायशी कालोनियां बना कर झील और नदियों तक जल पहुंचाने वाले प्राकृतिक स्रोतों को बाधित कर दिया गया। तेजी से बढ़ती जनसंख्या को घर उपलब्ध कराने के लिए बड़े पैमाने पर जंगलों का सफाया किया गया। परिणाम स्वरूप पर्यावरण चक्र बाधित होने से नदिया और झीलें सूखती चली गईं। बढ़ती आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए धरती के गर्भ से बेतहाशा पानी का दोहन किया गया। नतीजन पानीदार देश ‘भारत’ पर जल का भयावह संकट मंडराने लगा और वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता 1951 की अपेक्षा घटकर 1545 घन मीटर हो चुकी है। जिस कारण भारत जल की तनाव (वाटर स्ट्रेस्ड) वाली श्रेणी में आता है।

घरेलू उपयोग में भी हम करीब 80 फीसदी पानी की बर्बादी करते हैं। ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्स से पंजीकृत करीब 6 हजार कंपनियां देश में बोतलबंद पानी के कारोबार से जुड़ी हुई हैं। जिसे में एक कंपनी हर घंटे औसतन 5 हजार लीटर से 20 हजार लीटर तक धरती की कोख से पानी निकाल रही है, लेकिन इस कार्य में करीब 35 फीसद पानी बर्बाद जाता है। पानी के ये उद्योग 15 फीसद की दर से हर साल बढ़ रहे हैं।

आधा विश्व इस समय जिन विकराल संकटों से जूझ रहा है, उसमें जल संकट सबसे बड़ा है और वर्तमान में कभी पानीदार देश के नाम से जाना जाने वाला भारत दुनिया भर में पानी की सबसे विकराल समस्या से जूझ रहा है। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ ग्लोबर वाटर स्टीवर्डशिप की एक रिपोर्ट के मुताबिक जल संकट के मामले में दुनियाभर में चेन्नई पहले नंबर पर है, जबकि कोतकाता दूसरे, तीसरे नंबर पर तुर्की का शहर इस्तांबुल, चीन का चेंदगू चैथे नंबर पर, पांचवे नंबर पर बैंकाॅक, ईरान का तेहरान छठे, इंडोनेशियों का जकाॅता सातवें नंबर पर, अमेरिका का लाॅस एंजेलिस आठवे, चीन का तियांजिन नौवे और मिस्त्र की राजधानी काहिरा दसवे नंबर पर है। तो वहीं 11वें नंबर पर मुंबई और 15वे नंबर पर देश की राजनधानी दिल्ली हैं। जल संकट वाले दुनिया के प्रमुख बीस शहरों में सियोल, शेंनजेन, ढाका, कराची, लीमा, रियो डि जेनेरियो, बीजिंग और पेरिस भी शामिल हैं। भारत में जल की ऐसी दशा तब है जब देश में दस हजार से ज्यादा नदियां हैं और लाखों तालाब, पोखर, बावड़ी, नौले, धारे आदि हैं। हर साल देश में 4 हजार अरब घनमीटर तक वर्ष होती है, लेकिन हमारे देश में वर्षा जल संरक्षण की संस्कृति अभी विकसित नहीं हुई। जिस कारण 85 प्रतिशत से अधिक जल व्यर्थ बह जाता है, तो वहीं नदियों और तालाबों आदि के पानी को विकास की अंधी दौड़ ने प्रदूषित कर दिया, जबकि अधिकांश तो सूख गए हैं।  सूखते तालाब और नदियों से उत्पन्न हुए जल संकट से उभरने के लिए देश में बोरवेल आदि से भूजल के दोहन का कार्य शुरू हुआ। अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हमने धरती की कोख से इतना पानी खींच लिया कि आज धरती की कोख सूखने की कगार पर है। जिस कारण हर साल भूजल स्तर 0.3 मीटर नीचे जा रहा है देश के कई राज्यों में तो यह हर साल 2 मीटर तक नीचे जाता है लगातार गिरते भूजल स्तर के कारण देश में पानी की भीषण किल्लत खड़ी हो गई है सरकारी अध्ययन बताते हैं कि एक अनुमान के मुताबिक वर्ष 2002 से 2008 के बीच भारत ने 109 किलोमीटर भूजल का इस्तेमाल किया है। जिस कारण भारत दुनिया में सबसे अधिक भूजल का दोहन करने वाला देश है दूसरे नंबर पर चीन और तीसरे नंबर पर अमेरिका है।

पर्यावरण चक्र बिगड़ने और वर्षा जल का उचित प्रबंधन न कर पाने के कारण भारत में हर साल जल संकट गराता जा रहा है। बढ़ती आबादी और पानी की बर्बादी के कारण पिछले आठ सालों में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता में 70 प्रतिशत कमी आ चुकी है। सरकारी अध्ययन बताते हैं कि भारत तेजी से जल वंचित श्रेणी की तरफ बढ़ रहा है। जल वंचित श्रेणी उस दशा को कहते हैं, जबकि जल की उपलब्धता एक हजार घनमीटर से कम रह जाती है। जल का तेजी से कम होना देश के भयावह भविष्य को भी दिखा रहा है, जिसके प्रति हम अभी तक नहीं चेते हैं। सरकार आकलन बताते हैं कि वर्ष 2001 में प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता 1820 घनमीटर थी, जो छह साल बाद वर्ष 2025 तक घटकर 1341 घनमीटर रह जायेगी और यदि जल इसी गति से घटता रहा तो, वर्ष 2050 तक इसकी मात्रा 1140 घनमीटर या इससे भी कम हो जायेगी। 

देश में 80 प्रतिशत भूजल का उपयोग कृषि कार्यों में तो होता ही है, लेकिन घरेलू बर्बादी, आरओ प्यूरीफायर और बोतल बंद पानी के कारण भी देश में पानी की काफी बर्बादी हो रही है। दरअसल जिस आरओ को हम पानी का सबसे बड़ा दोस्त मानते हैं, वह असल में पानी का दुश्मन साबित हो रहा है। मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट आॅफ टेक्नोलाॅजी द्वार अहमदाबाद में किये गये एक अध्ययन में ये बात सामने आई है कि आरओ पानी को साफ जरूरी करता है, लेकिन करीब 74 फीसद को बर्बाद कर देता है। उदाहरण के तौर पर आरओ से एक लीटर साफ पापनी लेने के लिए चार लीटर पानी की जरूरत पड़ती है। घरेलू उपयोग में भी हम करीब 80 फीसदी पानी की बर्बादी करते हैं। ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्स से पंजीकृत करीब 6 हजार कंपनियां देश में बोतलबंद पानी के कारोबार से जुड़ी हुई हैं। जिसे में एक कंपनी हर घंटे औसतन 5 हजार लीटर से 20 हजार लीटर तक धरती की कोख से पानी निकाल रही है, लेकिन इस कार्य में करीब 35 फीसद पानी बर्बाद जाता है। पानी के ये उद्योग 15 फीसद की दर से हर साल बढ़ रहे हैं। तो वहीं अधिकांश लोग बोतलबंद पानी को पूरा पीने के बाजाए आधार बार्बाद भी करते हैं। कार्यक्रमों, होटलों, रेस्टोरेंटों आदि में यह भी देखा गया है कि आधे गिलास पानी की आवश्यकता होने पर पूरा गिलास पानी दिया जाता है, जिसमें अधिकांशतः आधा गिलास पानी बर्बाद जाता है, तो वहीं देश के अन्नदाताओं द्वारा सिंचाई के उपयोग में लाए जाने वाले 80 प्रतिशत जल में से करीब 60 फीसदी जल भी बर्बाद जाता है, लेकिन देश के भीषण जल संकट से सीख लेने के बजाये, पानी का दोहन देश में बदस्तूर जारी है।

इसके अलावा पानी की समस्या को पूरा करने के लिए जिन नदियों को हम सबसे बड़ा माध्यम मान रहे थे, आज वें सभी नदियों खुद के अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं। बढ़ते औद्योगिक वेस्ट और सीवरेज के कारण नदियों का अमृतमय जल जहरीला हो गया है। पानी में फ्लोराइड आदि की मात्रा लगातार बढ़ रही है। दिल्ली में तो यमुना और कानपुर में गंगा नदी की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। यहां दोनों नदियों का पानी पीना तो दूर आचमन के योग्य तक नहीं रहा है। गोमती, सरयु, अलकनंदा आदि नदियां भी अब आईसीयू में भर्ती हैं, लेकिन इन्हें आईसीयू से बाहर निकालने के बजाये निजी स्वार्थ के लिए वैंटीलेटर पर ले जाने के कार्य ज्यादा होते प्रतीत हो रहे हैं और जनता केवल मूकदर्शक बनकर देख रही है तथा इस बदहाली के लिए एक दूसरे को कोसने का कार्य कर रही है। दरअसल ये प्रशासनिक अमला, सरकार और जनता के लिए पानी के बेतहाशा हुए दोहन से उत्पन्न समस्याओं से सबक लेकर सुरक्षित भविष्य के लिए सख्त निर्णय लेने का समय है, क्योंकि हवा के बाद जल इंसान के शरीर के सबसे बड़ी मांग है और जल को किसी लैब में भी नहीं बनाया जा सकता। जल के बिना धरती पर अन्न तो क्या जीवन भी संभव नहीं होगा। इसलिए इस समय देश अन्य विकाय कार्यों करने के बजाए जल संकट से पार पाने की आवश्यता है, क्योंकि बिना पानी के विकास अर्थहीन और औचित्यहीन होगा। इसके लिए देश की जनता के साथ ही सरकार को भी वर्षा की एक बूंद को सहेजने की जरूरत है, ताकि भावी पीढ़ी पानी को केवल कीताबों और बंद बोतलों में ही नहीं, बल्कि नदियों और तालाबों में भी देखे। यदि ऐसा नहीं किया तो भारत बूंद बूंद पानी के लिए मोहताज हो जायेगा। 

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