औद्योगिक क्षेत्र

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छत्तीसगढ़ प्रदेश में औद्योगिक विकास और उसका पर्यावरण पर प्रभाव (पुस्तक), 2002

 

सिलतरा औद्योगिक क्षेत्र का विकास 1988 में एक वृहद स्तरीय स्पंज आयरन उद्योग की स्थापना से प्रारम्भ हुआ। इसके पूर्व यहाँ पर्यावरण वानिकी आदि कार्यक्रमों के अन्तर्गत लगाए गए वृक्षों के रख-रखाव के अतिरिक्त विकास सम्बन्धी कोई भी कार्य यहाँ नहीं हुआ। वर्तमान में यहाँ रायपुर एलॉय एवं स्टील लिमिटेड, नागपुर आयरन एवं स्टील लिमिटेड (जायसवाल निको कास्टिंग) तथा सिंघानिया सीमेन्ट लिमिटेड आदि उद्योग कार्यरत हैं। इस औद्योगिक क्षेत्र की विकास प्रक्रिया की गति शिथिल एवं असन्तोषप्रद रही है। जिसका मुख्य कारण इस क्षेत्र के प्रति उद्यमियों एवं व्यवसायियों की उत्साह हीनता है।

औद्योगिक क्षेत्र से आशय भूमि का वह भाग है, जहाँ एक निश्चित, नियोजित तथा विस्तृत योजना के आधार पर उद्योगों की स्थापना की जाती है तथा जहाँ विभिन्न आवश्यक सेवाएँ तथा सुविधाएँ उपलब्ध कराकर उद्योगों के विकास में सहायता प्रदान की जाती है। पी.सी. अलेक्जेण्डर के अनुसार औद्योगिक क्षेत्र अथवा औद्योगिक बस्ती, कारखानों का ऐसा समूह है जिसका निर्माण उपयुक्त स्थान तथा आर्थिक आधार पर किया जाता है एवं जहाँ जल, परिवहन, बैंकिंग, पोस्ट ऑफिस, विद्युत, कैण्टीन, सुरक्षा, प्राथमिक चिकित्सा, तकनीकी परामर्श तथा सामान्य सेवा तथा सुविधाएँ उपलब्ध रहती हैं। (Alexander, 1963) सर्वप्रथम इंग्लैण्ड में सन 1996 में मैनचेस्टर में ‘The Trafford Park Estates Ltd’ की स्थापना की गई तथा इसे औद्योगिक क्षेत्र की जननी भी माना जाता है।

औद्योगिक क्षेत्र की स्थापना देश के औद्योगीकरण की गति को त्वरित करती है, क्योंकि ऐसे क्षेत्रों में अधिकांशतः लघु उद्योगों की स्थापना की जाती है, इन क्षेत्रों में प्रारम्भ किये जाने वाले लघु उद्योग, वृहद उद्योगों के पूरक बन जाते हैं तथा दोनों प्रकार के उद्योग मिलकर देश में औद्योगीकरण की गति को बढ़ाने में सहायक सिद्ध होते हैं। औद्योगिक क्षेत्रों के द्वारा उद्योगों के एक बड़े समुदाय को उचित स्थान की प्राप्ति होती है तथा बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण तथा भवन निर्माण के कारण इन क्षेत्रों में कारखाने की लागत तुलनात्मक रूप से कम आती है। साथ ही साथ स्थापित कारखानों को सस्ती दर पर जल, विद्युत, परिवहन, तकनीकी परामर्श बैंक इत्यादि सुविधाएँ आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं। विलियम ब्रेडो के अनुसार इस प्रकार के औद्योगिक क्षेत्र छोटी पूँजी के विनिमय को गतिशील तथा उद्योग में प्रवेश को सरल बनाते हैं। (सिन्हा एवं सिन्हा 1992, 528) लघु उपक्रमियों को उद्योगों के प्रवर्तन और विकास में सहायता देने की दृष्टि से औद्योगिक क्षेत्रों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। परम्परागत औद्योगिक नगरों से उद्योगों का विकेन्द्रीकरण करने तथा कुछ निश्चित स्थानों पर उद्योगों का पूर्व नियोजित विकास करने की दृष्टि से औद्योगिक क्षेत्र उल्लेखनीय तथा उपयोगी भूमिका का निर्वाह करते हैं। साथ ही लघु उद्योगों की महत्त्वपूर्ण भूमिका के कारण रोजगार की मात्रा में वृद्धि होती है। अतः औद्योगिक क्षेत्रों में प्रायः पिछड़े क्षेत्र के लोगों को अधिक मात्रा में रोजगार प्राप्त होता है। इस प्रकार औद्योगिक क्षेत्र अथवा बस्तियाँ राष्ट्रीय औद्योगिक कार्यक्रमों का एक अभिन्न अंग हैं। ये क्षेत्र विनियोग में वृद्धि करने के लिये तकनीकी सुधार तथा वित्तीय समस्याओं का समाधान करके प्रमाणीकरण को सरल बनाकर उत्पादकता के स्तर को ऊँचा उठाने का प्रयास करते हैं।

भारत में औद्योगिक क्षेत्रों का इतिहास सन 1947 से प्रारम्भ हुआ जबकि तत्कालीन मुम्बई राज्य ने एक विशेष अधिकारी की नियुक्ति इस कार्य के लिये की कि वह ऐसे केन्द्रों का सुझाव दें जहाँ औद्योगिक क्षेत्र स्थापित किये जा सकते थे। वित्त के अभाव के कारण सन 1952 में बम्बई राज्य के हदसपुर में औद्योगिक विकास करने के लिये पूना नगर निगम को ऋण प्रदान किया। इस योजना से प्रेरणा लेते हुए तत्कालीन सौराष्ट्र (गुजरात) ने भी राजकोट में भक्तिनगर रेलवे स्टेशन के निकट औद्योगिक क्षेत्र स्थापित करने का निर्णय लिया।

छत्तीसगढ़ प्रदेश में औद्योगिक क्षेत्रों का विकास मुख्यतः छठवीं व सातवीं पन्चवर्षीय योजनावधि (1980-85 से 1985-90) में हुआ है जबकि म.प्र. औद्योगिक केन्द्र विकास निगम (रायपुर) लिमिटेड द्वारा औद्योगिक क्षेत्रों की स्थापना की गई। छत्तीसगढ़ के अन्तर्गत प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र रायपुर, बिलासपुर तथा दुर्ग में स्थापित हुए हैं।

प्रदेश में औद्योगिक विकास प्रक्रिया को त्वरित करने के उद्देश्य से शासन द्वारा नवीन औद्योगिक विकास केन्द्रों अथवा क्षेत्रों का विकास तथा उद्योग विभाग द्वारा पूर्व में स्थापित औद्योगिक क्षेत्रों के रख-रखाव के उद्देश्य से वर्ष 1981 में मध्य प्रदेश औद्योगिक केन्द्र विकास निगम (रायपुर) लिमिटेड की स्थापना की गई, जो कि मध्य प्रदेश शासन के उपक्रम म.प्र. स्टेट डेवलपमेंट कार्पोरेशन लिमिटेड भोपाल का सहायक निगम है। इस निगम का प्रमुख उद्देश्य औद्योगिक विकास केन्द्रों में उद्योगों की स्थापना, उद्योगों को मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध कराने के दृष्टिकोण से मुख्यतः भूखण्ड विकास, शेड निर्माण, सड़क निर्माण, जल आपूर्ति एवं विद्युत व्यवस्था उपलब्ध कराना है। इसके अतिरिक्त सामाजिक व अधोसंरचना विकास के अन्तर्गत दूरभाष केन्द्रों की स्थपाना, बैंक, पोस्ट ऑफिस, अस्पताल, स्कूल, अग्निशमन केन्द्र पुलिस स्टेशन, शॉपिंग कॉम्पलेक्स, विद्युत उपकेन्द्र की सुविधा उपलब्ध करवाना तथा वृक्षारोपण प्रमुख उद्देश्य है।

औद्योगिक विकास में शासन द्वारा स्थापित एवं विकसित किये गए औद्योगिक क्षेत्रों की महती भूमिका रही है। वास्तव में सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों को छोड़कर अन्य बड़े उद्योगों के आधे से अधिक उद्योग औद्योगिक क्षेत्र में ही स्थापित हुए हैं। औद्योगिक क्षेत्रों की स्थापना तथा उनके त्वरित विकास एवं नियमित संधारण हेतु वर्ष 1981 में राज्य शासन द्वारा मध्य प्रदेश औद्योगिक केन्द्र विकास निगमों का गठन किया गया जिनमें से एक का मुख्यालय रायपुर में है। मध्य प्रदेश औद्योगिक केन्द्र विकास निगम रायपुर का कार्यक्षेत्र सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ है तथा इसे छत्तीसगढ़ के औद्योगिक विकास, विशेषतः वृहद एवं मध्यम उद्योगों की स्थापना हेतु उत्प्रेरक एवं सहायक की भूमिका सौंपी गई है। इस निगम द्वारा रायपुर, बिलासपुर एवं दुर्ग जिले में नये औद्योगिक क्षेत्रों, जिन्हें औद्योगिक विकास केन्द्र के नाम से भी जाना जाता है, की स्थापना की गई है, जिनमें उद्योगों के लिये आवश्यक आधारभूत सुविधाएँ जैसे सड़क, बिजली, जल आदि की सुविधाएँ निगम द्वारा उपलब्ध कराई गई है। छत्तीसगढ़ के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र रायपुर जिले में उरला तथा सिलतरा, दुर्ग में बोरई तथा बिलासपुर जिले में तिफरा तथा सिरगिट्टी है। निगम द्वारा बस्तर, सरगुजा, रायगढ़ तथा राजनांदगांव में औद्योगिक क्षेत्र स्थापित नहीं किये गए हैं। निगम द्वारा विकसित इन औद्योगिक क्षेत्रों का विस्तृत विवरण निम्नानुसार है :-

1. उरला :-

छत्तीसगढ़ के औद्योगिक उत्थान हेतु प्रेरणादायी भिलाई इस्पात संयंत्र के पश्चात सर्वप्रथम उरला का नाम आता है। वर्तमान औद्योगिक मानचित्र में उरला औद्योगिक क्षेत्र एक प्रमुख बिन्दु बन गया है। रायपुर नगर की प्रशासनिक, आर्थिक तथा औद्योगिक क्रियाओं से सम्बन्धित स्थिति तथा भिलाई इस्पात संयंत्र तथा उसके सह-उत्पादों पर आधारित लघु, बृहद तथा मध्यम स्तरीय उद्योगों की स्थापना के बाद औद्योगिक विकास के लिये अनुकूल वातावरण को ध्यान में रखते हुए मध्य प्रदेश औद्योगिक केन्द्र विकास निगम, रायपुर द्वारा रायपुर-बिलासपुर राजमार्ग क्रमांक - 5 पर स्थित ‘उरला’ नामक ग्राम में औद्योगिक क्षेत्र स्थापित किया गया। यह ग्राम रायपुर नगर से 8 किमी की दूरी पर स्थित है। यह उल्लेखनीय है कि इस औद्योगिक क्षेत्र की स्थापना के पूर्व रायपुर नगर तथा उरला के मध्य बसे दो ग्रामों खमतराई तथा भनपुरी का अर्ध औद्योगिक क्षेत्र के रूप में विकास हो चुका था।

मध्य प्रदेश औद्योगिक केन्द्र विकास निगम रायपुर द्वारा औद्योगिक विकास हेतु अधिगृहीत यह प्रथम योजना है। उरला औद्योगिक क्षेत्र की स्थापना मध्य प्रदेश शासन द्वारा स्वीकृत आदेश क्रमांक एफ. 18/82/11/अ, दिनांक 15/03/1984 के अन्तर्गत 473.78 करोड़ रुपए के साथ की गई।

औद्योगिक क्षेत्र उरला (औद्योगिक क्षेत्र भनपुरी एवं रावांभाटा सहित) 700 हेक्टेयर भूमि पर स्थापित है। इस क्षेत्र में 60 बृहद एवं मध्य स्तरीय उद्योग तथा 550 लघु उद्योग स्थापित हुए हैं, जिनमें 40,000 लाख रुपए से अधिक पूँजी निवेश हुआ है एवं 16 हजार से अधिक व्यक्तियों को प्रत्यक्ष रोजगार प्राप्त हो रहा है। उरला के समीपवर्ती ग्राम अछोली, सरोरा तथा बीरगाँव है।

उरला विकास कार्य हेतु निजी स्वामित्व के अन्तर्गत 199.55 हेक्टेयर भूमि तथा शासकीय भूमि के अन्तर्गत 102.62 हेक्टेयर भूमि अर्थात कुल 301.17 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण किया गया। नवम्बर 2000 अन्त तक कुल 225.41 हेक्टेयर क्षेत्र में मूलभूत सुविधाओं से युक्त भू-खण्डों का विकास तथा शेड निर्माण का कार्य पूर्ण किया गया है। ‘स्वयं शेड बनाओ’ योजना के अन्तर्गत कुल 80 शेड का निर्माण कार्य किया गया है। वृहद तथा मध्यम स्तरीय उद्योगों के अन्तर्गत कुल 44 इकाइयों को 77.308 हेक्टेयर भूमि आवंटित की गई है। 11 लघु स्तरीय उद्योगों को 143.11 हेक्टेयर भू-खण्डों का आवंटन किया गया है। इस प्रकार कुल 355 इकाइयों को 220.41 हेक्टेयर भू-खण्डों का आवंटन किया गया। 65 इकाइयों को 80 शेड आवंटित किये गए। नवम्बर 2000 तक यहाँ 44 बृहद एवं मध्यम उद्योग स्थापित हुए हैं, जिनमें कुल पूँजी निवेश 32847.29 लाख रुपए है तथा 5200 व्यक्तियों को रोजगार मिला है। इसके अतिरिक्त 247 लघु उद्योग हैं, जिनमें पूँजी निवेश की मात्रा 5925.785 लाख रुपए तथा रोजगार प्राप्त व्यक्तियों की संख्या 6997 है तथा 44 उद्योग निर्माणाधीन है जिनमें पूँजी निवेश 1125 लाख रुपयों का है। वर्तमान में इस औद्योगिक क्षेत्र में 3 वृहद एवं मध्यम तथा 83 लघुस्तरीय उद्योग बन्द हो गए हैं। इस औद्योगिक क्षेत्र में वुलवर्थ, फैलवर्थ, सिम्पलेक्स कास्टिंग, अडवानी आर्लिकन लिमिटेड, सेठ ऑयल मिल्स, साल उद्योग, गणेश ट्वाइन मिल्स प्रा. लिमिटेड, एम.पी. एक्सट्रेशन प्रा. लिमिटेड इत्यादि के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। इन सफल औद्योगिक इकाइयों के परिणाम स्वरूप उत्पन्न औद्योगीकरण की सम्भावनाएँ उरला औद्योगिक क्षेत्र के विकास में सहायक सिद्ध हुई है।

उरला पूर्णतः विकसित औद्योगिक क्षेत्र है, जिसमें सड़कों, स्ट्रीटलाइटों, जलप्रदाय, सतही जल निकास जैसी आधारभूत सुविधाओं के अतिरिक्त शॉपिंग कॉम्प्लेक्स, दूरभाष केन्द्र, डाकघर, पुलिस थाना, बैंक, बीमा ऑफिस, औषधालय, वेयर हाउसिंग, पेट्रोल पम्प की सुविधाएँ उपलब्ध कराई गई है। इसके अतिरिक्त फायर स्टेशन की स्वीकृति प्राप्त हो चुकी है, जिसका निर्माण शीघ्र प्रारम्भ होने वाला है। जल की आपूर्ति भूतल जल तथा खारून नदी द्वारा की जाती है। विद्युत आपूर्ति हेतु 33/11 किलोवाट तथा 220/132/33 किलोवाट के दो विद्युत उपकेन्द्र यहाँ स्थित हैं। निर्यातक उद्योगों को सुविधा तथा निर्यात को बढ़ावा देने के लिये ‘कंटेनर फ्रेट स्टेशन’ की स्थापना भी इस औद्योगिक क्षेत्र में की गई है, जिसमें कस्टम सम्बन्धी समस्त औपचारिकता की पूर्ति स्थानीय स्तर पर ही हो जाती है। राष्ट्रीय राजमार्ग के समीप होने के कारण उरला के लिये परिवहन सुविधाजनक है। निकटतम रेलवे स्टेशन रायपुर (6 किमी) है तथा रायपुर का माना विमान तल उरला का निकटतम (22 किमी) विमान तल है।

2. सिलतरा :-

भारत शासन द्वारा स्वीकृत आदेश क्रमांक 13/11/89/ डीबीए-1, दिनांक 16/10/1989 के अन्तर्गत मध्य प्रदेश औद्योगिक केन्द्र विकास निगम रायपुर द्वारा रायपुर जिले में सिलतरा औद्योगिक क्षेत्र की स्थापना 30 करोड़ रुपयों की लागत से रायपुर-बिलासपुर राजमार्ग क्रमांक-5 तथा मुम्बई-हावड़ा ब्रॉड गेज लाइन दक्षिणी-पूर्वी रेलवे पर रायपुर नगर पालिका निगम से 15 किमी की दूरी पर सिलतरा नामक ग्राम में की गई। आधुनिक तकनीक एवं विकसित प्रौद्योगिकी पर आधारित वृहद, मध्यम एवं लघु उद्योगों के लिये संयंत्र निर्माण एवं आधारभूत सुविधाएँ उपलब्ध कराने के दृष्टिकोण से इस औद्योगिक क्षेत्र की स्थापना की गई है। सिलतरा औद्योगिक क्षेत्र 1259.286 हेक्टेयर भूमि पर विस्तृत है जिसमें 968.272 हेक्टेयर भूमि निजी स्वामित्व वाली तथा शासकीय भूमि 291.014 हेक्टेयर है।

नवम्बर 2000 अन्त तक इस क्षेत्र में 5 वृहद एवं मध्यम उद्योगों को 502.488 हेक्टेयर भूखण्ड तथा 5 लघु उद्योगों को 5.366 हेक्टेयर भूखण्ड आवंटित किये गए हैं। ‘स्वयं शेड बनाओ’ योजना के अन्तर्गत यहाँ 10 शेड्स का निर्माण किया जा चुका है। इस क्षेत्र में 3 वृहद एवं मध्यम उद्योग तथा 9 लघु स्तरीय उद्योगों की स्थापना हो चुकी है। जिनमें पूँजी विनियोजन की मात्रा क्रमशः 68818.88 तथा 163.08 लाख रुपए है। वृहद एवं मध्यम उद्योग के अन्तर्गत 1468 तथा लुघ उद्योगों के अन्तर्गत 55 व्यक्तियों को प्रत्यक्ष रोजगार प्राप्त हुआ है।

इसके अतिरिक्त यहाँ 1 वृहद उद्योग निर्माणाधीन है जिसमें पूँजी निवेश की मात्रा 12000 लाख रुपए है तथा 805 व्यक्तियों को रोजगार प्रस्तावित है। साथ ही 3 लघु उद्योग भी निर्माणाधीन हैं जिनमें कुल पूँजी निवेश 314.80 लाख रुपए तथा 97 व्यक्तियों को राजगार प्रस्तावित है। इसके अतिरिक्त यहाँ 5 वृहद एवं मध्यम उद्योग प्रस्तावित हैं जिसमें पूँजी निवेश की मात्रा 185000 लाख रुपए होगी तथा 2000 व्यक्तियों को रोजगार प्राप्त होगा।

सिलतरा औद्योगिक क्षेत्र का विकास 1988 में एक वृहद स्तरीय स्पंज आयरन उद्योग की स्थापना से प्रारम्भ हुआ। इसके पूर्व यहाँ पर्यावरण वानिकी आदि कार्यक्रमों के अन्तर्गत लगाए गए वृक्षों के रख-रखाव के अतिरिक्त विकास सम्बन्धी कोई भी कार्य यहाँ नहीं हुआ। वर्तमान में यहाँ रायपुर एलॉय एवं स्टील लिमिटेड, नागपुर आयरन एवं स्टील लिमिटेड (जायसवाल निको कास्टिंग) तथा सिंघानिया सीमेन्ट लिमिटेड आदि उद्योग कार्यरत हैं। इस औद्योगिक क्षेत्र की विकास प्रक्रिया की गति शिथिल एवं असन्तोषप्रद रही है। जिसका मुख्य कारण इस क्षेत्र के प्रति उद्यमियों एवं व्यवसायियों की उत्साह हीनता है।

इस औद्योगिक क्षेत्र में पेट्रोल पम्प, बैंक, दूरभाष केन्द्र तथा शॉपिंग कॉम्प्लेक्स की स्थापना हो चुकी है। जल प्रदाय योजना के अन्तर्गत खारून नदी पर एक एनीकट का निर्माण किया गया है, जिससे ग्रीष्म ऋतु में भी उद्योगों को पर्याप्त जल प्राप्त होता है। विद्युत आपूर्ति हेतु 400 किलोवाट तथा 33/11 किलोवाट का उपविद्युत केन्द्र प्रस्तावित है। वर्तमान में विद्युत प्रदाय की सुविधा बीरगाँव ग्राम में 33 किलोवाट उपविद्युत केन्द्र से उपलब्ध है। रायपुर-बिलासपुर राजमार्ग पर स्थित सिलतरा का निकटतम रेलवे स्टेशन मांढर तथा रायपुर है। माना विमानतल की दूरी 27 किमी है।

उपर्युक्त सुविधाओं के बाद भी एक पूर्ण विकसित एवं व्यवस्थित औद्योगिक क्षेत्र के रूप में सिलतरा का विकास नहीं हो पाया है। पूर्ण विकास के पश्चात निःसन्देह यह क्षेत्र औद्योगीकरण की दृष्टि से वृहद सम्भावनाओं वाला क्षेत्र होगा।

3. बोरई :-

भारत शासन द्वारा स्वीकृत आदेश क्रमांक 13/11/89 डीबीए/सी, दिनांक 16/10/1989 में दुर्ग जिले में भिलाई इस्पात संयंत्र के निकटवर्ती बोरई ग्राम में औद्योगिक क्षेत्र की स्थापना की गई है। इस क्षेत्र के विकास के लिये भारत शासन द्वारा 30 करोड़ रुपए स्वीकृत किये गए हैं।

इस क्षेत्र की स्थापना 436.83 हेक्टेयर भूमि पर हुई है। इस प्रक्षेत्र के निर्माण, विकास एवं विस्तार के लिये भिलाई इस्पात संयंत्र द्वारा 230.147 हेक्टेयर भू-क्षेत्र हस्तान्तरित किया गया है। इसके अतिरिक्त 12.36 हेक्टेयर शासकीय भूमि तथा 194 हेक्टेयर निजी स्वामित्व वाली भूमि का अधिग्रहण किया गया है। इस तरह बोरई औद्योगिक क्षेत्र के अन्तर्गत 436.83 हेक्टेयर भूमि का पूर्ण आधिपत्य मध्य प्रदेश औद्योगिक केन्द्र विकास निगम को प्राप्त हो चुका है। इसके अतिरिक्त 405 हेक्टेयर भू-अर्जन का प्रस्ताव केन्द्र शासन को भेजा जा चुका है। इस औद्योगिक क्षेत्र में कुल 35 शेड्स बनाए गए हैं। जिनमें से अधिकांश का आवंटन किया जा चुका है।

2 वृहद स्तरीय उद्योगों को 430.080 हेक्टेयर भू-खण्ड तथा 38 लघु स्तरीय उद्योगों को 26.451 हेक्टेयर भूमि का आवंटन किया जा चुका है। इसके अतिरिक्त 24 लघु स्तरीय उद्योगों को 26 शेड्स आवंटित किये जा चुके हैं। वर्तमान में यहाँ 2 वृहद स्तरीय तथा 27 लघु स्तरीय उद्योग उत्पादनरत है। वृहद स्तरीय उद्योगों के अन्तर्गत पूँजी विनियोजन की मात्रा 106.92 लाख रुपए है तथा रोजगार प्राप्त व्यक्तियों की संख्या 858 है। इसी प्रकार लघु स्तरीय उद्योगों में पूँजी विनियोजन की मात्रा 728 लाख रुपए तथा रोजगार प्राप्त व्यक्तियों की संख्या 453 है। इसके अतिरिक्त इस क्षेत्र के अन्तर्गत 11 लघु स्तरीय उद्योग निर्माणाधीन हैं।

इस औद्योगिक क्षेत्र में हिन्दुस्तान इलेक्ट्रो ग्रेफाइट (एन.ई.जी.) का लौह संयंत्र तथा शिवनाथ ऑर्गेनिक प्रा. लि. प्रमुख औद्योगिक इकाई है। सामाजिक अधोसंरचना सम्बन्धी सुविधाओं के अन्तर्गत यहाँ दूरभाष एवं दूरसंचार, शिक्षा तथा स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध हैं। विद्युत आपूर्ति 33/11 किलोवाट विद्युत उपकेन्द्र द्वारा की जाती है जो क्षेत्र में ही स्थापित किया गया है। इसके अतिरिक्त 220/33 किलोवाट विद्युत उपकेन्द्र के लिये भू-खण्ड का आवंटन किया गया है। जल आपूर्ति शिवनाथ नदी के माध्यम से की जाती है। राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 6 का दुर्ग बाईपास इस औद्योगिक क्षेत्र के बीच से गुजरता है। अतः सड़क परिवहन की दृष्टि से यह समृद्ध है। निकटतम रेलवे स्टेशन रसमड़ा तथा दुर्ग, मुम्बई, हावड़ा मार्ग में स्थित है।

4. सिरगिट्टी :-

मध्य प्रदेश शासन के स्वीकृत आदेश क्रमांक एफ/18/182/11/A दिनांक 15/03/1984 के अन्तर्गत बिलासपुर जिले के सिरगिट्टी ग्राम में औद्योगिक क्षेत्र की स्थापना की गई। यह औद्योगिक क्षेत्र बिलासपुर से 6 किमी की दूरी पर स्थित है। इस औद्योगिक क्षेत्र के विकास हेतु 449.39 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण प्रस्तावित है। वर्तमान में निगम द्वारा 215.58 हेक्टेयर शासकीय भूमि तथा 156.03 हेक्टेयर निजी भूमि का अर्जन किया गया है। इस प्रकार इस क्षेत्र की विस्तार सीमा 371.56 हेक्टेयर है। इस क्षेत्र में 6 वृहद एवं मध्यम स्तरीय उद्योगों को 33.20 हेक्टेयर भूमि तथा 71 लघु स्तरीय उद्योगों के अन्तर्गत 52.85 हेक्टेयर भूमि आवंटित की गई है। इसके अतिरिक्त बिलासपुर विकास प्राधिकरण द्वारा ट्रांसपोर्ट नगर के लिये 18.22 हेक्टेयर भूम आवंटित की गई है।

औद्योगिक क्षेत्र के बाहर स्थापित वृहद श्रेणी के उद्योग जिन्हें मध्य प्रदेश औद्योगिक केन्द्र विकास निगम, रायपुर द्वारा भूमि उपलब्ध कराई जा चुकी है, इनका विवरण निम्नानुसार है :-

1. मै. नोवा आयरन एण्ड स्टील लिमिटेड, ग्राम दगौरी 129.03 हेक्टेयर
2 मै. प्रकाश इण्डस्ट्रीज लिमिटेड, चांपा (हथनेवरा) 132.23 हेक्टेयर
3 मै. रेमण्ड वर्क्स, गोपाल नगर (रेलवे साइडिंग हेतु) 77.21 हेक्टेयर
4. मै. नोवा स्टील इंडिया लिमिटेड दगौरी 24.28 हेक्टेयर
5. मै. श्री राधे इण्डस्ट्रीज, ग्राम सिलपहरी 20.43 हेक्टेयर

इस प्रकार उपर्युक्त उद्योगों को कुल 382.98 हेक्टेयर भूमि उपलब्ध कराई गई है। यह समस्त भूमि शासकीय है। तथा उपर्युक्त सभी उद्योग स्पंज आयरन, रोलिंग मिल तथा सीमेंट उद्योग से सम्बन्धित हैं। औद्योगिक विकास के अन्तर्गत सिरगिट्टी औद्योगिक क्षेत्र में 6 वृहद एवं मध्यम स्तरीय उद्योगों की स्थापना हो चुकी है, जिनमें पूँजी निवेश की मात्रा 2226.62 लाख रुपए तथा रोजगार प्राप्त व्यक्तियों की संख्या 788 है। इसी अनुक्रम में 82 लघु उद्योगों की स्थापना हुई है। जिनमें पूँजी निवेश की मात्रा 3064.67 लाख रुपए तथा रोजगार प्राप्त व्यक्तियों की संख्या 2324 है।

मूलभूत सुविधाओं के अन्तर्गत इस क्षेत्र को दूरभाष केन्द्र, बैंक, पोस्ट ऑफिस, पेट्रोल पम्प, सड़क, बिजली, शॉपिंग कॉम्प्लेक्स, स्ट्रीट लाइट आदि सुविधाएँ प्राप्त हैं। जल आपूर्ति इस क्षेत्र को मुख्यतः भूतल जल द्वारा ही होती है, विद्युत आवश्यकता की पूर्ति हेतु 33/11 किलोवाट का विद्युत उपकेन्द्र क्षेत्र में स्थापित किया गया है। सिरगिट्टी में (औद्योगिक क्षेत्र तिफरा) सहित 7 वृहद एवं मध्यम तथा 175 लघु उद्योगों की स्थापना हो चुकी है जिनमें 9300 लाख की पूँजी विनियोजित हुई है एवं 4500 व्यक्तियों को रोजगार प्राप्त हो रहा है। बिलासपुर शहर से लगे हुए इस औद्योगिक क्षेत्र में रेलवे तथा साउथ ईस्टर्न कोल फील्ड्स लिमिटेड पर आधारित अनेक सहायक उद्योगों की स्थापना हुई है।

तिफरा :-

मध्य प्रदेश औद्योगिक केन्द्र विकास निगम रायपुर की स्थापना के पूर्व तिफरा औद्योगिक क्षेत्र का संचालन उद्योग विभाग मध्य प्रदेश शासन द्वारा किया जाता था। निगम की स्थापना के पश्चात मध्य प्रदेश शासन, वाणिज्य एवं उद्योग विभाग के आदेश क्रमांक एफ/11/03/81/11/अ दिनांक 31/12/1981 के द्वारा इस औद्योगिक क्षेत्र को मध्य प्रदेश औद्योगिक केन्द्र विकास निगम, रायपुर को हस्तान्तरित कर दिया गया। औद्योगिक क्षेत्र तिफरा (सिरगिट्टी सहित) 928.09 हेक्टेयर भूमि में स्थापित किया गया है, जिसमें 385.48 हेक्टेयर भूमि शासकीय तथा 542.61 हेक्टेयर निजी भूमि का अधिग्रहण कर समावेश किया गया है।

सिरगिट्टी एवं तिफरा में माह नवम्बर 2000 तक 178 लघु उद्योग स्थापित हुए हैं, जिनमें 4212.16 लाख रुपए का पूँजी विनियोजन तथा 4127 लोगों को रोजगार प्राप्त हुआ है। साथ ही 6 मध्यम श्रेणी के उद्योग स्थापित हुए हैं, जिनमें 2226.62 लाख रुपए का पूँजी वेष्ठन तथा 788 लोगों को रोजगार प्राप्त हुआ है। निर्माणाधीन उद्योगों के अन्तर्गत सिरगिट्टी तथा तिफरा में 9 लघु उद्योग हैं जिनमें 133.91 लाख पूँजी वेष्ठन होना स्वाभाविक है तथा 40 व्यक्तियों को रोजगार प्राप्त होगा। इन इकाइयों को 5.18 हेक्टेयर भूमि का आवंटन किया गया है। विकास केन्द्र हेतु देय समस्त सुविधाएँ शासन द्वारा यहाँ प्रदत्त की गई है।

औद्योगिक क्षेत्र सिरगिट्टी एवं तिफरा में स्थापित प्रमुख उद्योग :-

औद्योगिक क्षेत्र सिरगिट्टी में स्थापित प्रमुख उद्योगों में बी.ई.सी. फर्टिलाइजर, भारत अर्थमूवर्स, साउथ ईस्टर्न कोल फील्ड्स लिमिटेड, इण्डियन स्पेशलिटी फेट्स लिमिटेड, आर.एस. पारपोलिन उद्योग, मसाला उद्योग, प्लास्टिक इण्डस्ट्रीज, पी.वी.सी. फुट वेयर, सॉफ्टड्रिंक्स, सीमेंट, टाइल्स इत्यादि हैं।

तिफरा में स्थापित प्रमुख उद्योगों में ऑक्सीजन प्लांट, रोलिंग मिल, एक्रेलिक शीट, फेब्रिकेशन, पी.वी.सी. फुटवेयर, पोर्टलैण्ड सीमेंट, कैल्शियम नाइट्रेट, प्लास्टिक-कन्टेनर, पॉलीथीन बैग्स, दालमिल इत्यादि है।

उपर्युक्त क्षेत्रों के अतिरिक्त निगम के आधिपत्य में ग्राम कोरमी, बसिया, हरदी, कलाटोना, सिलपहरी में 605 हेक्टेयर भूमि उपलब्ध है। औद्योगिक केन्द्र विकास निगम द्वारा इन औद्योगिक क्षेत्रों के अतिरिक्त आवश्यकतानुसार अन्यत्र भी उद्योग विशेष के लिये भूमि अर्जित कर उन्हें आवंटित की जाती है। वर्तमान में निगम द्वारा लगभग 3112 हेक्टेयर भूमि का विकास एवं प्रबन्धन किया जा रहा है। जिसमें अभी तक 1859.55 लाख रुपए के पूँजी विनियोजन से 830 उद्योगों की स्थापना हो चुकी है, जिनमें 25000 से अधिक व्यक्तियों को रोजगार प्राप्त हो रहा है।

औद्योगिक क्षेत्र कार्यक्रम के उद्देश्य :-

सभी विकासशील देशों के समान भारत में लघु उद्योग विभिन्न बाधाओं अथवा समस्याओं से ग्रसित है जिनमें प्रमुख है पूँजी के अपर्याप्त स्रोत, आधुनिक यंत्र प्रणाली विषयक अपूर्ण ज्ञान, उत्पादन तथा विपणन के तरीके तथा प्रशिक्षित कार्मिकों की कमी। भारत में लघु स्तरीय उद्योगों के लिये विकास कार्यक्रमों का प्रमुख उद्देश्य इन बाधाओं को दूर करने में लघु उद्योगों की सहायता करना तथा उन्हें पर्याप्त स्पर्धात्मक शक्ति प्राप्त करने के योग्य बनाना है। भारत की केन्द्र और राज्य सरकारों की नीति उन्हें सहायता देने तथा सशक्त बनाने की रही है, जिससे शीघ्रतम सम्भव समय में ये इकाइयाँ स्वस्थ और स्वावलम्बी इकाइयों में विकसित हो सके।

लघु उद्योगों को राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के विकास में महत्त्वपूर्ण कार्य सौंपा गया है। भारत की स्वतन्त्रता प्राप्ति के एक वर्ष के भीतर भारत सरकार ने लघु उद्योगों के विषय में अपनी नीति निम्नलिखित शब्दों में रेखांकित की :-

“कुटीर और लघु उद्योग राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं, वे एकल ग्राम या सहकारी उद्यमों के लिये कार्य क्षेत्र तथा विस्थापित व्यक्तियों के पुनर्वास के साधन प्रस्तुत करते हैं। यह उद्योग स्थानीय स्रोतों के बेहतर उपयोग के लिये तथा अनिवार्य उपभोक्ता सामग्री के कुछ प्रकारों के विषय में स्थानीय स्व-पर्याप्तता की उपलब्धि के लिये विशेष रूप से उपयुक्त है।”

द्वितीय औद्योगिक नीति प्रस्ताव दिनांक 30 अप्रैल, 1956 में लघु उद्योगों की भूमिका निम्नानुसार वर्णित की गई है :

“वे तत्काल बहुव्यापी नियोजन प्रदान करते है, वे राष्ट्रीय आय के अधिक साम्यपूर्ण वितरण को सुनिश्चित करने का तरीका देते है तथा वे पूँजी और कौशल के स्रोतों के प्रभावशाली संचालन को सुविधायुक्त बनाते हैं। जो अन्यथा बिना उपयोग में आए रह सकते हैं। पूरे देश में औद्योगिक उत्पादन के छोटे केन्द्रों की स्थापना के द्वारा ऐसी कुछ समस्याओं का परिहार किया जा सकेगा जिन्हें अनियोजित यंत्रीकरण पैदा कर सकता है।”

प्रस्ताव में आगे विभिन्न क्षेत्रों के सन्तुलित विकास से सम्बन्धित नीति को निम्नलिखित शब्दों में रेखांकित किया है :-

“औद्योगीकरण देशभर की अर्थव्यवस्था को लाभान्वित कर सके, इसके लिये यह महत्त्वपूर्ण है कि विभिन्न क्षेत्रों के बीच विकास के स्तर में भेदों को उत्तरोत्तर कम किया जाना चाहिए। देश के भिन्न-भिन्न भागों में उद्योगों की कमी बहुतांशतः आवश्यक कच्चे माल और प्राकृतिक स्रोतों की उपलब्धता जैसे कारकों से वर्णित होती है। कुछ क्षेत्रों में उद्योगों का संकेन्द्रण बिजली, जल प्रदाय और परिवहन सुविधाओं की शीघ्र उपलब्धता के कारण भी होता है, जो वहाँ विकसित की गई होती है। यह निश्चित करना राष्ट्रीय नियोजन के लक्ष्यों में से एक है कि ये सुविधाएँ ऐसे क्षेत्रों को एकदम उपलब्ध कराई जाएँ जो औद्योगिक दृष्टि से पिछड़े हुए हैं अथवा जहाँ नियोजन के अवसर देने की अधिक आवश्यकता है, बशर्ते कि अन्यथा स्थान उपयुक्त हो। केवल सभी समूचा देश उच्चतर जीवन स्तर प्राप्त कर सकता है, जब प्रत्येक क्षेत्र में औद्योगिक और कृषि सम्बन्धी अर्थव्यवस्था का सन्तुलित और समन्वित विकास सुरक्षित किया जाए।”

1956 के औद्योगिक नीति प्रस्ताव से उद्धृत किए गए इन अंशों को लघु उद्योगों और सन्तुलित क्षेत्रीय विकास पर शासन की नीति के सर्वाधिक प्राधिकृत निरूपण के रूप में लेना चाहिए। इन वक्तव्यों में पंचवर्षीय योजनाओं में स्वीकृत लघु उद्योगों के विकास के लिये विभिन्न कार्यक्रमों की न्यायोचितता तथा पृष्ठभूमि विद्यमान है। द्रुत विकास के लिये उपकरण के रूप में लघु उद्योगों की कार्यकुशलता में विश्वास घोषित करके शासन ने उनको विकसित करने के लिये एक विशद कार्यक्रम प्रस्तुत किया। यह कार्यक्रम उन विशिष्ट क्षेत्रों में सहायता का है, जहाँ लघु उद्योग सर्वाधिक दुर्बलता रखते हैं। इस कार्यक्रम में सरल शर्तों पर ऋण सुविधाओं का प्रावधान, औद्योगिक विस्तार सेवा के माध्यम से उत्पादन और प्रबन्धन मार्गदर्शन, प्रशिक्षण के लिये सुविधाएँ, विपणन में सहायता आदि शामिल है।

लघु उद्योगों की विभिन्न समस्याओं विशेषकर पूँजी, भवन निर्माण, उत्पादन तथा विपणन इत्यादि से सम्बन्धित कारकों के निवारण के लिये प्रथम योजना काल का अन्त होने तक अर्थात 1955 में भारत में औद्योगिक क्षेत्र का कार्यक्रम शुरू किया गया। इस प्रकार भारत में जब औद्योगिक क्षेत्र की शुरुआत हुई, तब इसका प्रमुख लक्ष्य था कि यह लघु उद्योगों के विकास में सहायता करें। यह कार्यक्रम भारत की विकास योजना में लघु उद्योगों को सहायता के रूप में सम्मिलित था। बाद में योजना का विस्तार हुआ, तब इसमें नए उद्देश्य जुड़ गए तथा औद्योगिक क्षेत्र द्वारा अन्य भूमिकाएँ अदा करने की आशा की गई।

लघु उद्योगों को सहायता की योजना के रूप में औद्योगिक क्षेत्र वित्तीय सहायता की किसी साधारण योजना के कार्यक्षेत्र की तुलना में अत्यधिक महत्त्व तथा उपयोगिता रखते हैं। एक औद्योगिक क्षेत्र पानी, परिवहन, विद्युत, बैंक, डाकघर, कैण्टीन, सुरक्षा तथा प्राथमिक सुविधाओं से युक्त एवं तकनीकी मार्गदर्शन और सामान्य सेवा सुविधाओं के विशेष प्रबन्ध के साथ उपयुक्त स्थानों पर मितव्ययिता के पैमाने पर बना कारखानों का समूह है। औद्योगिक क्षेत्र उद्योगों के सुसम्बद्ध विकास के लिये आदर्श प्रस्तुत करता है। कारखानों में कार्य की बेहतर स्थितियाँ निश्चित रूप से उत्पादन को बढ़ाती है। बेहतर प्रकाश तथा वायु जैसी सुविधाएँ श्रमिकों के लिये विशेष रूप से लाभकर होती है।

वित्तीय सहायता की योजना के रूप में औद्योगिक क्षेत्र अनेक लाभ प्रदान करता है। चूँकि विकास के लिये एक बड़ा क्षेत्र लिया जाता है इसलिये भूमि के प्रयोग और विकास में बचत की अर्थव्यवस्था सम्भव है। इसी प्रकार कारखानों के निर्माण और पानी तथा विद्युत जैसी सुविधाओं की अभिपूर्ति भी मितव्ययता के साथ की जा सकती है। औद्योगिक क्षेत्र की योजना भारत में आरम्भिक चरणों में लागू की गई तब इसका प्रधान उद्देश्य लघु उद्योगों के विकास के लिये माध्यम के रूप में कार्य करना था। जैसे-जैसे योजना आगे बढ़ी, कुछ अतिरिक्त उद्देश्य अधिकाधिक महत्त्व के होते गए। औद्योगिक क्षेत्र बड़े शहरों में अति भीड़-भाड़ तथा जमाव से छुटकारा दिलाने की दृष्टि से उपयोगी पाए गए, यद्यपि केवल एक सीमा तक अधिकतर भारतीय शहरों में बड़े और छोटे उद्योग स्वतन्त्रता के बाद के वर्षों में बिना किसी योजना या समन्वय के खड़े हो गए।

शहरों में कारखाने के लिये स्थान की दृष्टि से उपयुक्त भवन बहुत कम थे, औद्योगिक गतिविधि के भारी प्रवेश के दौरान बहुत से आवासीय भवन कारखानों में बदल दिए गए। उपलब्ध खुले स्थानों पर निर्माण कर दिया गया तथा अप्राधिकृत कारखाने, स्थलों के लिये सड़कें अतिक्रमित कर दी गईं। शहरों के औद्योगिक क्षेत्र गन्दगी और जमाव का वातावरण उपस्थित करने वाली मलिन बस्तियाँ बन गए, जिससे कार्मिकों के स्वास्थ्य तथा उनकी उत्पादकता को गम्भीर क्षति पहुँची। औद्योगिक क्षेत्र ने इस जमाव से कुछ राहत दिलाई, यद्यपि समस्या के आकार को देखते हुए इसे केवल नाम मात्र का माना जा सकता है।

औद्योगिक क्षेत्र का एक अन्य उद्देश्य यह था कि इसे आर्थिक दृष्टि से अल्पविकसित क्षेत्रों, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में औद्योगिक विकास के सक्रिय होने में मदद करनी चाहिए। सामुदायिक विकास कार्यक्रम ने भारत में ग्रामीण विकास की आवश्यकताओं के बारे में पर्याप्त रुचि जागृत की थी। स्वतन्त्रता के पूर्व भी ग्रामीण विकास राष्ट्रीय आन्दोलन के महत्त्वपूर्ण आधारों में से एक रहा था और ग्रामीण औद्योगीकरण का नारा भारत में खूब लोकप्रिय था। लेकिन विचारधारा कुटीर और ग्रामीण उद्योगों के द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों के विकास की दिशा में अधिक थी। बड़े शहरों और उनके आस-पास आधुनिक यंत्र-सुसज्जित लघु उद्योगों के विस्तार के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में उनके विस्तार की माँग प्रखर हो गई और औद्योगिक क्षेत्र की योजना को इस उद्देश्य को प्राप्त करने की दृष्टि से सर्वाधिक प्रभावशाली समझा गया।

औद्योगिक दृष्टि से पिछड़े क्षेत्रों में वृहत औद्योगिक समृद्धि के साथ सन्तुलित औद्योगिक विकास की आवश्यकता सरकार द्वारा समझी गई तथा सरकार ने इस नीति को अपने 1956 के औद्योगिक नीति प्रस्ताव में घोषित किया। इस नीति की बड़े उदयोगों के मामले में सीमाएँ थी, जहाँ प्राकृतिक संसाधनों, कच्चे माल आदि की उपलब्धता जैसे तथ्यों के आधार पर स्थान का प्रधानतः निर्धारण होता था, लघु स्तरीय उद्योग बड़े उद्योगों की तुलना में बहुत अधिक लचीले थे और यह विचार किया गया कि उन्हें पिछड़े क्षेत्रों के विकास के उपकरणों के रूप में व्यापक रूप से स्थापित किया जाना चाहिए। औद्योगिक क्षेत्र की नीति इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिये सर्वाधिक सक्षम साधन के रूप में उपयोगी पाई गई। जैसे-जैसे लघु स्तरीय उद्योगों के विकास के लिये विविध कार्यक्रमों की प्रगति हुई, औद्योगिक क्षेत्र की नीति अधिकाधिक प्रयोजनों के लिये उपयोग में आती गई। औद्योगिक क्षेत्र बड़े उद्योगों की सहायक इकाइयों की तरक्की के लिये उपयोगी पाए गए। वर्तमान में औद्योगिक क्षेत्रों की योजना के 2 मुख्य उद्देश्य बताये जा सकते हैं :-

1. औद्योगिक क्षेत्रों के द्वारा लघु स्तरीय उद्योगों के त्वरित विकास प्रोन्नत करना चाहिए तथा
2. उन्हें आर्थिक दृष्टि से पिछड़े हुए तथा ग्रामीण क्षेत्रों के औद्योगीकरण को सुविधाजनक बनाना चाहिए।

इनमें से प्रथम उद्देश्य सदा मुख्य रहा है तथा आज भी है। (Alexander, 1963, 1-8)

 

 

 

 

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