डेढ़ सौ गाँवों को दिया हरियाली का उपहार

Submitted by editorial on Thu, 09/27/2018 - 12:24
Source
अमर उजाला, 27 सितम्बर, 2018

पीपलपीपल पुलिस में भर्ती होने के बाद जब मैं पहली बार चण्डीगढ़ गया, तो शहर की खूबसूरती और हरियाली ने मुझे बहुत प्रभावित किया। मेरे दिमाग में यह उम्मीद चलती रहती कि काश, मेरा शहर सोनीपत भी चण्डीगढ़ जैसा हरा-भरा हो जाए। इसी बुनियादी खयाल के आधार पर मैंने तय किया कि मैं चण्डीगढ़ में रोपे गये विशेष प्रकार के खूबसूसत पौधों की सफल प्रक्रिया का पूरा अध्ययन करूँगा। दरअसल वहाँ पिलखन के पौधे लगाये गए थे, जो बहुत जल्द बड़े होकर हरियाली बढ़ाने में मदद करते हैं। पीपल भी एक दूसरा पौधा है, जिसे लोग रोपने में दिलचस्पी लेते हैं, क्योंकि यह बड़ा होकर अधिक स्थान तक छांव पहुँचाता है।

इतना सोचना या लोगों को अपने साथ जोड़ पाना ही अपने शहर को हरा-भरा बनाने के लिये पर्याप्त नहीं था। मेरी तनख्वाह करीब पचास हजार रुपए प्रति महीने है। दो बच्चों समेत मेरा छोटा परिवार है, सो मेरे पास हर महीने इतने पैसे जरूर बच जाते, जिनका उपयोग मैं इस नेक काम के लिये कर सकता था। मैंने ऐसा करने में बिल्कुल भी संकोच नहीं किया। हाँ, इस फैसले को लेकर मेरे परिजनों ने जरूर मुखालफत की। लेकिन मेरे या यों कहें मेरी जिद के आगे किसी की न चली। आखिर मैं अपनी पारिवारिक जिम्मेदारी निभाते हुये यह सब करना चाह रहा था। मेरे पिता एक बैंक में सुरक्षा गार्ड हैं और उन्हें सैन्य पैंशन भी मिलती है, सो उनको भी मेरी किसी आर्थिक मदद की जरूरत नहीं होती।

मेरी सबसे बड़ी चुनौती मेरी पुलिस की नौकरी थी, क्योंकि इस पेशे में ड्यूटी के घंटे तय नहीं होते। कभी-कभार लगातार चौबीस घंटे ड्यूटी करनी पड़ती है, लेकिन फिर हमें आराम भी दिया जाता है।

मैंने इसी आराम के वक्त और दूसरी छुट्टियों का प्रयोग अपने पौधरोपण के काम के लिये किया। इस तरह से मैंने अपने गृह जनपद को हरा-भरा बनाने के प्रयास शुरू कर दिये।

शुरू में मैंने शहर की नर्सरियों से पौधे खरीदे, लेकिन यह काफी महँगा विकल्प था। बाद में मैंने उत्तर प्रदेश के किसानों से थोक में पौधे लाने शुरू कर दिए। थोक की खरीदारी के लिये कई बार मैंने बैंक से कर्ज भी लिया। मुझे समझ में आ गया कि एक साथ पौधरोपण के अनेक अभियान चलाने के लिये पौधे खरीदना व्यावहारिक नहीं है, फिर वे कहीं से भी खरीदे जाएँ।

कुछ वक्त बाद मैंने अपनी खुद की नर्सरी तैयार कर ली। हालाँकि नर्सरी के लिये मुझे पचास हजार रुपए प्रति वर्ष की दर से जमीन किराये पर लेनी पड़ी। मैंने अकेले सोनीपत जिले के डेढ़ सौ गाँवों में अपनी टीम तैयार कर ली है। इन स्वयंसेवकों की मदद से हम विभिन्न आश्रमों, विद्यालयों, मन्दिरों और पंचायतों की खाली जमीन पर पौधे रोपते हैं। इसके अलावा मैंने दूसरे जिलों को भी पौधे भेजते हैं। कोई भी मेरे पास आकर बिल्कुल निःशुल्क पौधे ले सकता है। बस मैं हर किसी से पौधों की अच्छी तरह से देखभाल करने का वचन लेता हूँ। आस-पास का इलाका हरा बनाने के साथ मैं लोगों को स्वस्थ बनाने के अभियान में भी जुटा हूँ। हम त्योहारों के मौके पर मिलावटी मिठाई बेचने वालों की खबर लेते रहते हैं। मैं लोगों से अपील करता रहता हूँ कि वे छोटी दूरी के लिये मोटर वाहन के बजाय साइकिल का प्रयोग करें। दो सौ से ज्यादा लोगों ने मेरी बात मानकर पैडल मारने शुरू कर दिये हैं।

- विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित
 

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