मछलियों की अंत: ग्रंथियों पर कीटनाशक डाल रहे दुष्प्रभाव

Submitted by HindiWater on Wed, 11/20/2019 - 10:16
Source
दैनिक जागरण, 20 नवंबर 2019

प्रतीकात्मक फोटो - CSIROscope

फसलों में प्रयोग किए जा रहे कीटनाशकों का जल की रानी मछलियों पर भी दुष्प्रभाव पड़ रहा है। ये कीटनाशक उनकी अंतः ग्रंथियों को खराब कर रहे हैं। वहीं, ऐसी मछलियों को खाने से मनुष्य कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की शिकार हो सकता है। यह चैंकाने वाली बात हरियाणा के हिसार जिले के सीआरएम जाट काॅलेज के प्रोफेसर डाॅ. सुरेश कुमार की रिसर्च में सामने आई है। डाॅ. सुरेश कुमार ने मछली समेत अन्य जलीय जीव-जंतुओं की अंतः ग्रंथियों पर कीटनाशकों के प्रभाव विषय पर यह रिसर्च की है। इस रिसर्च को उन्होंने हाल ही में लंदन में टोक्सीकोलाॅजी एंड क्लीनिकल टोक्सीकोलाॅजी विषय पर आयोजित इंटरनेशनल काॅफ्रेंस में भी प्रस्तुत किया। डाॅ. कुमार को उपरोक्त रिसर्च के लिए सर्वश्रेष्ठ शोध प्रस्तुति के लिए पुरस्कार व प्रमाण पत्र देकर सम्मानित भी किया गया।

लंबदन में आयोजित इस इंटरनेशनल काॅफ्रेंस में करीब 50 देशों के 150 वैज्ञानिकों ने भाग लिया था। इस काॅफ्रेंस में डाॅ. सुरेश कुमार के अलावा राजस्थान के प्रोफेसर प्रेम सिंह बुगासरा भी शामिल हुए थे। डाॅ. सुरेश को अमेरिका सहित अन्य देशों में भी उनके द्वारा की गई विभिन्न विषयों की रिसर्च प्रस्तुत करने का मौका मिल चुका है। 

ये कीटनाशक डाल रहे जीव-जंतुओं पर बुरा प्रभाव

डाॅ. सुरेश ने बताया कि रिसर्च में सामने आया कि आॅर्गेनोक्लोरिन, आॅर्गेनोफोस्टेट और कार्बोनेट जैसे कीटनाशकों को छिड़काव कपास, गेहूं, धान, तिलहन जैसी फसलांे में प्रयोग किया जाता है। उन्होंने बताया कि ये कीटनाशक फसलों के माध्यम से जमीन के पानी में मिल रहे हैं, जो बाद में तालाब, नदियों व समुद्र के जल में मिक्स हो जाते हैं। इन कीटनाशकों में डेल्टामेथ्रिन की मात्रा 0.017 पीपीएम (पोर्ट पर मिलियन) से ज्यादा हो जाएग तो यह जलीय जीव जंतुओं की जान के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। वहीं, ऐसी प्रभावित मछली खाने वाले लोगों पर इसका सीधा प्रभाव पड़ता है और वे बीमारियों के शिकार हो सकते हैं।

हांसी के एक तालाब में प्रदूषण के कारण मछलियों की हुई थी मौत

डाॅ. सुरेश के अनुसार हांसी में करीब छह महीने पहले दिल्ली रोड के नजदीक स्थित एक तालाब में बहुत सी मछलियों की मौत हो गई थी। इसका कारण तालाब के पानी में लगातार बढ़ता प्रदूषण था।

तीन साल में पूरी हुइ रिसर्च

डाॅ. सुरेश ने बातया कि उन्होंने जीव-जंतुओं की एंडोक्राइन ग्रंथियों और आयनिक संतुलन पर डेल्टामेथ्रिन विषय से रिसर्च वर्ष 2017 में शुरू की थी। इसे पूरा करने में करीब तीन साल लगे हैं। उन्होंने बताया कि यह रिसर्च प्रोजेक्ट टूर यूजीसी की ओर से स्पाॅन्सर किया गया। देश भर से यूजीसी ने इंटरनेशनल काॅन्फ्रेंस में शिक्षण संस्थानों से रिसर्च टाॅपिक मांगे थे, जिसमें देशीार से टाॅपिक में से उनके व राजस्थान के वैज्ञानिक के टाॅपिक को चुना गया था। 

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