जैवविविधता का संरक्षण

Submitted by Hindi on Fri, 04/06/2018 - 15:50
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पर्यावरण विज्ञान उच्चतर माध्यमिक पाठ्यक्रम

पौधों, जन्तुओं एवं सूक्ष्मजीवों सहित विभिन्न प्रकार के जीवधारी, जो इस ग्रह पर हमारे सहभागी हैं, संसार को रहने योग्य एक सुन्दर स्थान का रूप प्रदान करते हैं। सजीव जीवधारी पर्वतीय चोटियों से लेकर समुद्र की गहराइयों, मरुस्थलों से लेकर वर्षावनों तक लगभग सभी जगहों पर पाये जाते हैं। इनकी प्रकृतियों, व्यवहार, आकृति, आकार एवं रंग भिन्न-भिन्न होते हैं। जीवधारियों में पायी जाने वाली असाधारण विविधता हमारे ग्रह के अभिन्न एवं महत्त्वपूर्ण भागों की रचना करती है, हालाँकि निरन्तर बढ़ रही जनसंख्या के कारण जैव विविधता को गम्भीर खतरों का सामना करना पड़ रहा है।

इस पाठ में हम उन क्रियाकलापों का अध्ययन करेंगे जिनके द्वारा मानव जैवविविधता को क्षति पहुँचा रहा है। उन प्रयासों का भी अध्ययन करेंगे जो जैवविविधता के संरक्षण एवं सुरक्षा के लिये किए जा रहे हैं एवं जिनकी इस सम्बन्ध में आवश्यकता है।

उद्देश्य


इस पाठ के अध्ययन के समापन के पश्चात आपः

- जैवविविधता की अवधारणा की व्याख्या कर सकेंगे;
- मानवकल्याण एवं आर्थिक विकास के लिये जैवविविधता के महत्त्व का वर्णन कर सकेंगे;
- भारतीय जैव विविधता की विशिष्टता एवं संबंधित क्षेत्रीय विशिष्टता की व्याख्या कर सकेंगे;
- भारतीय एवं वैश्विक संदर्भ में जैवविविधता के ह्रास के कारणों को सूचीबद्ध कर सकेंगे।
- जैवविविधता के संरक्षण को तर्कसंगत ठहरा सकेंगे;
- विलुप्त, संकटापन्न एवं विलोपोन्मुखी स्पीशीजों में विभेद कर सकेंगे;
- संरक्षण की विभिन्न निजस्थानिक (in-situ) एवं परस्थानिक (ex-situ) विधियों का वर्णन कर सकेंगे;
- विशिष्ट वन्यजीव संरक्षण परियोजनाओं जैसे प्रोजेक्ट टाइगर, प्रोजेक्ट ऐलीफेन्ट, प्रोजेक्ट क्रोकोडाइल इत्यादि के उद्देश्यों का वर्णन कर सकेंगे;
- राष्ट्रीय पार्कों; अभ्यारण्यों एवं जैव मंडल आरक्षित क्षेत्रों के बारे में जानकारी के महत्त्व का वर्णन कर सकेंगे;
- राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय संस्थाओं (निकायों) द्वारा अपनाए गए कानूनी उपायों के बारे में बता सकेंगे।

15.1 जैविक विविधता क्या है


पृथ्वी पर पायी जाने वाली सजीव जीवों की सभी किस्में सामूहिक रूप से जैवविविधता का गठन करती हैं। जैविक विविधता के आमतौर से तीन विभिन्न स्तर हैं- क) आनुवांशिक विविधता अर्थात आनुवांशिक स्तर पर, ख) स्पीशीज विविधता अर्थात स्पीशीजों के स्तर पर तथा ग) पारितंत्र की विविधता अर्थात पारितंत्र के स्तर पर।

15.1 आनुवांशिक विविधता (Genetic diversity)


जीवाणु से लेकर उच्चतर पौधों एवं जन्तुओं तक प्रत्येक स्पीशीज आनुवांशिक सूचना के विशाल भंडार को संचित रखती है। उदाहरण के लिये माइकोप्लाज़मा (Mycoplasma) में जीन की संख्या 450-700, जीवाणु (जैसे ई- कोलाई, Escherichia coli) में 4000, फलमक्खी ड्रोसोफिला मेलेनोगैस्टर (Drosophila melanogaster) में 13000, चावल (ओराइजा सटाइवा, Oryza sativa) में 32000-50000 तथा मानव (होमो सेपियंस, Homo sapiens) में 35000 से 45000 होती है।

जीनों में यह विभिन्नता, केवल संख्या में ही नहीं, संरचना में भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह किसी समष्टि को अपने वातावरण के साथ अनुकूलन करने तथा प्राकृतिक वरण के प्रक्रम के प्रति अनुक्रिया करने में सहायक होती है। यदि किसी प्रजाति में अधिक आनुवांशिक विभिन्नताएँ हैं तो यह परिवर्तनशील पर्यावरण में सही ढंग से अनुकूलन कर सकती है। स्पीशीज में कम विविधता आनुवांशिक रूप से समान फसल के पौधों में आनुवांशिक समानता का कारण है। यह समांगता एक समान गुणवत्ता वाले बीज उत्पन्न करने के लिये वांछनीय है परन्तु आनुवांशिक समानता स्पीशीज में परिवर्तनशील पर्यावरणीय अनुकूलन करने में रुकावट उत्पन्न करती है क्योंकि सभी पौधों में प्रतिरोध का स्तर समान होता है।

उपर्युक्त पृष्ठभूमि में आनुवांशिक विविधता पौधों, जानवरों और सूक्ष्मजीवों की स्पीशीजों में निहित जीन की विविधता को दर्शाता है। व्यक्तिगत स्तर पर नया आनुवांशिक परिवर्तन जीन एवं गुणसूत्री उत्परिवर्तन के द्वारा होता है तथा जीवों में लैंगिक जनन के साथ पुनर्संयोजन के द्वारा समष्टि में फैल सकता है। उदाहरण के लिये दो भाइयों की संरचना में अंतर होता है यद्यपि दोनों के माता-पिता समान हैं। यह अन्तर एकल (एक ही जीन के विभिन्न संस्करण) संरचना में हो सकता है। सम्पूर्ण जीन में (विशिष्ट अभिलक्षणों को निर्धारित करने वाले लक्षण) या फिर गुणसूत्र की संरचना में हो सकता है। अन्तरप्रजनन करने वाली समष्टियों में उपस्थित आनुवांशिक विविधता (जीन पूल का निर्धारण या प्राकृतिकवरण की प्रक्रिया के द्वारा किया जाता है। चयन कुछ विशिष्ट जननिक दायित्व को पूरा करने को बढ़ावा देता है एवं इस जीन पूल की आवृत्ति में परिणामस्वरूप बदलाव होते हैं।

यह जीवधारियों में अनुकूलन के आधार की रचना करता है। भारत में आनुवांशिक विविधता अत्यधिक है और इसे उच्च फसल आनुवांशिक विविधता का वेवीलोव केन्द्र माना जाता है। यह नाम रूस के कृषि वनस्पतिज्ञ एन आई वेवीलोव (Ni Vavilov) के नाम पर रखा गया है जिन्होंने 1950 में विश्वभर में कृषिक पादपों के उद्भव के ऐसे आठ केन्द्रों की पहचान की थी।

15.1.2 स्पीशीज विविधता (Species diversity)


स्पीशीज विविधता का अर्थ है किसी भौगोलिक क्षेत्र में कई किस्म की स्पीशीजें। स्पीशीज विविधता को निम्न के सम्बन्ध में मापा जा सकता है।

क. स्पीशीज समृद्धि : एक निर्धारित क्षेत्र में विभिन्न स्पीशीजों की संख्या को दर्शाती है।
ख. स्पीशीज बाहुल्यः स्पीशीजों में अपेक्षित संख्या को दर्शाता है उदाहरण के लिये किसी क्षेत्र में पादपों, जन्तुओं एवं सूक्ष्मजीवों की संख्या किसी दूसरे क्षेत्र की अपेक्षा अधिक हो सकती है।
ग. वर्गिकीय (Taxonomic) अथवा जातिवृत्तीय (Phylogenetic) विविधताः स्पीशीजों के विभिन्न समूहों के मध्य आनुवांशिक सम्बन्ध को दर्शाती है।

किसी क्षेत्र में उपस्थित स्पीशीजों के प्रकार भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण होते हैं; जब किसी क्षेत्र में वर्गीकरण से विज्ञान असबंद्ध स्पीशीजें पायी जाती है तो वह क्षेत्र वर्गीकरणविज्ञान संबद्ध स्पीशीजों वाले क्षेत्र की तुलना में उच्च स्पीशीज विविधता को दर्शाता है। निम्नलिखित चित्र 15.1 का अवलोकन कीजिए।

चित्र 15.1 स्पीशीज विविधता को प्रदर्शित करने वाले विभिन्न नमूना क्षेत्र(नोटः तीनों नमूने के क्षेत्रों को तीन प्रकार की स्पीशीजों द्वारा प्रदर्शित किया गया है। (स्पीशीज समृद्धि समान है यद्यपि इनमें स्पीशीज बहुलता, प्रति स्पीशीज सदस्यों की संख्या भिन्न-भिन्न है) अवलोकन कीजिए कि नमूना C की स्पीशीज विविधता उच्च है। क्योंकि इसे वर्गीकरण विज्ञान असंबद्ध स्पीशीजों द्वारा दर्शाया गया है)

विश्व स्तर पर, सजीव जीवों की लगभग 1.7 मिलियन स्पीशीज अब तक ज्ञात हो चुकी हैं और कई स्पीशीजों की खोज अभी की जानी है। वर्तमान में यह अनुमान लगाया गया है कि स्पीशीजों की कुल संख्या 5-10 मिलियन हो सकती है। पूरे विश्व में स्पीशीज विविधता का वितरण समान नहीं है। समग्र स्पीशीज समृद्धि विषुवतीय क्षेत्रों में केन्द्रित है तथा जैसे-जैसे विषुवत्तीय क्षेत्रों से ध्रुवीय क्षेत्रों की ओर जाते हैं, इसमें कमी आने लगती है। इसके साथ-साथ स्थल पारितंत्रों में जैव विविधता सामान्यतया, ऊँचाई बढ़ाने के साथ-साथ कम होती जाती है। अन्य कारण हैं जो जैव विविधता का वर्षा की मात्रा तथा मृदा में पोषकों का स्तर ऐसे प्रभावित करते हैं। समुद्रीय परितंत्रों में स्पीशीज समृद्धि अधिक होती है।

भारत विशाल जैव विविधता का देश है (चित्र 15.2) और यह विश्व के 12 ‘‘मेगा विविधता’’ (Mega-diversity) वाले देशों में शामिल है।

शैवाल
कवक
लाइकेन
ब्रायोफाइटा
टेरिडोफाइटस
जिम्नोस्पर्म
एंजियोस्पर्म
बैक्टीरिया

चित्र 15.2 भारत में अभिलिखित विभिन्न वर्गों में पादप एवं जन्तु स्पीशीजों की संख्या

15.1.3 पारितंत्रीय विविधता (Ecosystem biodiversity)


यह विभिन्न प्रकार के पारितंत्रों की उपस्थिति को दर्शाता है। उदाहरण के लिये उष्णकटिबन्धीय दक्षिण भारत, जोकि स्पीशीज विविधता के मामले में समृद्ध है, की संरचना मरुस्थल (जिसमें पादप एवं जन्तु स्पीशीजों की संख्या बहुत कम होती है) की तुलना में पूर्णतया भिन्न होगी। इसी प्रकार समुद्री पारितंत्रों में यद्यपि कई प्रकार की मछलियाँ पायी जाती है, फिर भी इसके अभिलक्षण नदियों एवं झीलों के अलवणीय पारितंत्र से भिन्न होते हैं। अतः पारितंत्र के स्तर पर इस प्रकार विभिन्नता पारितंत्रीय विविधता कहलाती है।

जैसाकि ऊपर बताया गया है, पारितंत्रीय विविधता में पारितंत्र एवं पर्यावास की विविधता के मध्य व्यापक अंतर एवं प्रत्येक पारितंत्र के अंदर घटित पारिस्थितिकीय प्रक्रियाएँ निहित हैं। भारत में हिमाच्छादित हिमालय से लेकर मरुस्थलों तक, नीरस झाड़ झंकाड़ से लेकर घास के मैदानों एवं आर्द्र भूमि तथा उष्णकटिबंधीय वर्षा वनों तक, कोरल रीफ से लेकर गहरे समुद्र तक विविध प्रकार के स्थलीय एवं जलीय पारितंत्र पाये जाते हैं। इनमें से प्रत्येक में पर्यावास की अत्यधिक किस्में तथा जैविक एवं अजैविक घटकों के भीतर एवं इनके मध्य अन्योन्य क्रियाएँ सम्मिलित हैं। पश्चिमी घाट एवं उत्तर पूर्व क्षेत्र सबसे अधिक विविधता संपन्न क्षेत्र है।

इन पारितंत्रों में पायी जाने वाली अधिकतर स्पीशीजें स्थानीय हैं यानि केवल भारत में ही पायी जाती हैं। स्थानीय स्पीशीज मुख्य रूप से उत्तर पूर्व, पश्चिमी घाट, उत्तर-पश्चिम हिमालय तथा अण्डमान एवं निकोबार में केन्द्रित है। भारत में पाये जाने वाले पुष्पीय पौधों में से लगभग 33% स्थानिक हैं। भारतीय क्षेत्र स्थानिक जीवों के लिये भी जाना जाता है। उदाहरण के लिये अभिलिखित कशेरूकी प्राणियों में 53 % अलवणजलीय मछलियाँ, 60 % उभयचर, 36 % रेप्टीलिया (सरीसृप) तथा 10 % स्तनधारी स्थानिक हैं।

15.1.4 जैवविविधता के हॉट स्पॉट


जैवविविधता न केवल पृथ्वी के भौगोलिक क्षेत्रों में समान रूप से वितरित नहीं है बल्कि विश्व के कुछ क्षेत्र भी जैवविविधिता के मामले में अत्यधिक समृद्ध हैं। ऐसे क्षेत्रों को हम ‘‘मेगा डाइवर्सिटी क्षेत्र’’ (Mega diversity region) कहते हैं। हम इन्हें ‘‘हाट स्पॉट (Hot spot)’’ भी कहते हैं। उदाहरण के लिये भारत विश्व के भूभाग का केवल 2.4% है, परन्तु इस प्रकार के क्षेत्रों के अस्तित्व के कारण भूमण्डलीय विविधता में भारत का योगदान 8% है।

एक ब्रिटिश पारिस्थितिकीविद नार्मन मायर्स ने हॉट स्पॉट की अवधारणा को यथास्थान संरक्षण के लिये प्राथमिकता क्षेत्रों को नामित करने के उद्देश्य से 1988 में विकसित किया था। उनके अनुसार हॉट स्पॉट पृथ्वी पर जैव विविधता के सबसे समृद्ध एवं संकटापन्न संग्रह हैं। किसी हॉट स्पॉट को निर्धारित करने के मानदंड निम्नलिखित हैं:

i) इस क्षेत्र में 1500 से अधिक स्थानिक स्पीशीज होनी चाहिए।
ii) जिसका 70% से अधिक मूल पर्यावास नष्ट हो चुका हो।

विश्वभर में पच्चीस जैव विविधता हॉट स्पॉट की पहचान की गई है। असाधारण उच्च जैवविविधता इन हॉट स्पॉट की विशेषता है। उदाहरण के लिये इन पच्चीस हॉट स्पॉट का कुल क्षेत्र कुल भूभाग का 1.4% है। यहाँ 44 % पादप एवं 35 % स्थलीय कशेरुकी पाए जाते हैं।

चित्र 15.3 स्थली जैव विविधता हॉटस्पॉटविश्व के 25 हॉट स्पॉट में से केवल 2 भारत में पाए जाते है- पश्चिमी घाट एवं पूर्वी हिमालय। देश के ये दो क्षेत्र पुष्पीय पादपों, सरीसृपों, उभयचर, तितलियों एवं स्तनधारियों की कुछ स्पीशीजों से असाधारण रूप से सम्पन्न है।

पूर्वी हिमालयी हॉट स्पॉट उत्तर-पश्चिम भारत तथा भूटान तक फैले हुए हैं। 1780 से 2500 मी. की ऊँचाई तक समशीतोष्ण वन पाए जाते हैं। कई गहरी एवं अर्द्ध-पृथक्कृत घाटियाँ असाधारण रूप से स्थानिक पादप स्पीशीजों से सम्पन्न है।

पश्चिमी घाट क्षेत्र भारतीय प्रायद्वीप के पश्चिमी तट के समांतर है और महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु एवं केरल में लगभग 1600 किमी- तक फैला हुआ है। कम ऊँचाई पर (औसत समुद्र तल से 500 मी. ऊपर) पाये जाने वाले वन अधिकतर सदाबहार हैं जबकि 500-1500 मी. की ऊँचाई पर अर्द्ध-सदाबहार वन पाये जाते हैं।

पाठगत प्रश्न 15.1


1. आप जैविक विविधता से क्या समझते हैं?
2. जैव विविधता के विभिन्न स्तरों की सूची बनाइए।
3. भारत में पाये जाने वाले दो हॉट स्पॉट के नाम लिखिए।
4. भारत में अभिलिखित सर्वाधिक पाये जाने वाले (i) पादपों के समूह तथा (ii) प्राणियों के समूह का नाम लिखिए।

15.2 जैविक विविधता क्यों महत्त्वपूर्ण है


मानव अपनी जीविका, स्वास्थ्य, खुशहाली एवं सांस्कृतिक विकास के लिये प्रकृति पर निर्भर हैं। जैविक संसाधन भोजन, फल, बीज, चारा, औषधियां एवं अन्य वस्तुएँ तथा सेवाएँ प्रदान करते हैं। जीवन की विशाल विविधता अत्यधिक मूल्यवान है जो पारितंत्रों एवं प्राकृतिक प्रक्रियाओं को लचीलापन प्रदान करती है। जैवविविधता सामाजिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है।

जैविक विविधता का मूल्य


जैविक विविधता के विभिन्न लाभों को तीन श्रेणियों में बांटा गया- क) पारितंत्र सेवाओं ख) जैविक संसाधनों तथा ग) सामाजिक लाभ के अन्तर्गत वर्गीकृत किया जा सकता है।

15.2.1 पारितंत्र सेवाएँ


जीवधारी मुफ्त में ऐसी अनेक पारिस्थितिकीय सेवाएँ प्रदान करते हैं जो पारितंत्र के स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिये उत्तरदायी हैं। अतः जैवविविधता पारितंत्र के साथ-साथ व्यष्टि स्पीशीज से वस्तुओं एवं सेवाओं के रख-रखाव एवं सतत पोषणीय उपयोग के लिये आवश्यक है।

i) जल संसाधनों का संरक्षणः प्राकृतिक वानस्पतिक आच्छादन की सहायता से जल चक्रों को बनाए रखने के साथ बाढ़ एवं अनावृष्टि अकाल जैसी चरम परिस्थितियों के विरुद्ध बफर के तौर पर तथा जल अपवाह के नियमन एवं स्थायीकरण में सहायक होता है। वनस्पति के हट जाने के कारण बांधों एवं जलमार्गों में गाद इकट्ठी हो जाती है। आर्द्र भूमि तथा वन जल परिष्कृत तंत्रों के रूप में कार्य करते हैं। जबकि मैंग्रोव गाद को रोक कर समुद्री पारितंत्रों पर इसके प्रभाव को कम करते हैं।

ii) मृदा संरक्षणः जैविक विविधिता मृदा के संरक्षण तथा नमी एवं पोषकों को बनाए रखने में सहायता करती है। वनस्पति ढके हुए विशाल क्षेत्रों को वनस्पतिहीन करने के कारण प्रायः मृदा अपरदन में तेजी आने लगती है। उत्पादकता में कमी हो जाती है तथा आकस्मिक बाढ़ जैसी घटनाएँ घटने लगती है। जड़-तंत्र जल को उपमृदा तक पहुँचाने में सहायता करता है। जड़-तंत्र पोषक पदार्थों को जमीन के ऊपर तक पहुँचाकर खनिज पोषकों को सतह तक भी लाता है।

iii) पोषकों का संग्रहण एवं चक्रणः पारितंत्र वायुमण्डल एवं मृदा में पाये जाने वाले पोषकों के पुनःचक्रण का महत्त्वपूर्ण जैविक कार्य करता है। पादप पोषकों को ग्रहण करने में सक्षम होते हैं तथा ये पोषक खाद्य श्रृंखलाओं के आधार की रचना कर सकते हैं, जिन्हें विभिन्न प्रकार के जीवों द्वारा उपयोग में लाया जाता है। मृदा में पोषक पदार्थ फिर से आ जाते हैं। मृत अथवा अपशिष्ट पदार्थ के द्वारा किया जाता है जिन्हें सूक्ष्म जीवों द्वारा रूपांतरित किया जाता है। इसके पश्चात इन पदार्थों को केंचुए जैसे अन्य प्राणियों द्वारा ग्रहण कर लिया जाता है जो मृदा को मिश्रित एवं वायवीय बनाते हैं तथा पोषकों की सहज उपलब्धता को सुनिश्चित करते हैं।

iv) प्रदूषण में कमीः पारितंत्र एवं पारिस्थितिकीय प्रक्रियाएँ वायुमंडल के गैसीय संगठन को बनाए रखने, अपशिष्ट पदार्थों के अपघटन एवं प्रदूषकों के निष्कासन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कुछ पारितंत्रों विशेषकर आर्द्रभूमियों में प्रदूषकों के अपघटन एवं उन्हें अवशेषित करने की क्षमता होती है। प्राकृतिक एवं कृत्रिम आर्द्रभूमियों का उपयोग बहिर्स्रावों से पोषकों, भारी धातुओं, निलंबित ठोसों को पृथक करने, BOD को कम करने एवं हानिकारक सूक्ष्मजीवों को नष्ट करने के लिये किया जा रहा है। यद्यपि प्रदूषकों की अधिक मात्रा पारितंत्र एवं उनके जीवजात का पादप एवं प्राणी की अखंडता के लिये हानिकारक हो सकती है।

v) जलवायु स्थिरताः वनस्पति सूक्ष्म एवं बृहत स्तर पर जलवायु को प्रभावित करती है। बढ़ते हुए प्रमाण यह बताते हैं कि सघन वन जल-वाष्प को एक स्थिर दर से पुनर्चक्रण करके आस-पास के क्षेत्रों में वर्षा को बनाए रखने में सहायता करते हैं। वनस्पति सूक्ष्मजलवायु पर भी मन्द प्रभाव डालती है। वनस्पति का शीतलन प्रभाव एक सामान्य अनुभव है जो जीवन को आरामदायक बनाता है। कुछ जीव अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिये इस प्रकार की सूक्ष्म जलवायु पर निर्भर रहते हैं।

vi) पारिस्थितकीय प्रक्रियाओं का रख-रखावः पक्षियों एवं परभक्षियों की विभिन्न स्पीशीज कीट पीड़कों को नियंत्रित करने में सहायता करती है, इस प्रकार कृत्रिम नियंत्रण उपायों की आवश्यकता एवं लागत को कम करती हैं। पक्षी एवं मकरंद प्रिय कीट जोकि प्राकृतिक पर्यावासों में बसेरा एवं जनन करते हैं, फसल एवं जंगली पादपों के लिये महत्त्वपूर्ण परागण कराने वाले कारक हैं। कुछ प्राकृतिक पर्यावास मैंग्रोव एवं आर्द्रभूमियों में वन्यजीवों की आबादी के अत्यंत महत्त्वपूर्ण चरणों जैसे अण्डे देने की जगहों को सुरक्षा प्रदान करते हैं।

जैवविविधता द्वारा प्रदान की गई पारिस्थितीकीय सेवाओं के बिना भोजन, शुद्ध हवा प्राप्त करना संभव नहीं होगा और अपशिष्ट पदार्थों के ढेर में डूब जाएँगे।

15.2.2 आर्थिक महत्त्व के जैविक संसाधन


i) खाद्य, रेशे, औषधि, ईंधन की लकड़ी एवं सजावटी पौधे: पाँच हजार ऐसी पादप स्पीशीजें मालूम हैं जिन्हें मनुष्यों द्वारा भोजन के रूप में उपयोग किया जाता है। वर्तमान में लगभग 20 स्पीशीजें विश्व की जनसंख्या के बहुत बड़े हिस्से को भोजन प्रदान करती है और केवल 3 या 4 मुख्य उपज हैं जो विश्व की आबादी के अधिकांश लोगों द्वारा उपयोग की जाती हैं।

पौधों एवं प्राणियों से बड़ी संख्या में प्राप्त होने वाले पदार्थों को विभिन्न रोगों के इलाज में उपयोग किया जाता है। भारत में औषधीय पौधों के उपयोग का एक प्राचीन इतिहास है। जड़ी बूटियों के चिकित्सीय मूल्यों के कारण आयुर्वेद का विकास हुआ जिसका अर्थ है ‘‘जीवन का विज्ञान’’। ऐसा अनुमान है कि देश की 70% जनसंख्या हर्बल दवाओं पर निर्भर है और पौधों की 7000 से अधिक स्पीशीजें औषधीय प्रयोजनों के लिये उपयोग में लाई जाती हैं।

लकड़ी एक ऐसी आधारभूत सामग्री है जिसका उपयोग विश्व भर में फर्नीचर बनाने तथा भवन निर्माण में किया जाता है। लकड़ी ईंधन का प्राथमिक स्रोत हैं जिसका प्रयोग तीसरी दुनिया के देशों में व्यापक रूप से किया जाता है। लकड़ी एवं बांस का उपयोग कागज बनाने में किया जाता है।

पादप नारियल, जटा, सन, पटसन, कपास, जूट जैसे पौधों से प्राप्त रेशों के पारंपरिक स्रोत हैं।

ii) फसलों में सुधार के लिये प्रजनन सामग्रीः उगाए जाने वाले फसली पौधों के वन्य सम्बन्धियों में बहुमूल्य जीन पाए जाते हैं जिनका फसल सुधार कार्यक्रमों में अत्यधिक आनुवांशिक महत्त्व है। वन्य फसली पौधों के आनुवांशिक पदार्थ अथवा जीन का उपयोग फसलों का उत्पादन बढ़ाने या प्रतिरोधक क्षमता में सुधार के उद्देश्य से वर्तमान फसलों का नवीनीकरण करने के लिये फसल के पौधों की नयी किस्में विकसित करने के लिये किया जाता है। उदाहरणतः एशिया में उगाये जाने वाला चावल एकल वन्य धान की किस्म के द्वारा प्रदान किए गए जीन के कारण चार मुख्य रोगों से मुक्त है।

iii) भावी संसाधनः जैव विविधता के संरक्षण एवं नए जैविक संसाधनों की खोज के मध्य एक स्पष्ट संबंध है। अपेक्षाकृत कुछ विकसित पादप स्पीशीजें जो वर्तमान में उगाई जा रही हैं उन पर अत्यधिक अनुसंधान एवं चयनात्मक प्रजनन का उपयोग किया गया था। कई वर्तमान कम उपयोगी खाद्य फसलें भविष्य में महत्त्वपूर्ण फसल बनने की क्षमता रखती हैं। स्थानीय लोगों द्वारा अक्सर जंगली पौधों का उपयोग किए जाने का ज्ञान प्रायः नए पादप उत्पादों को विकसित करने के विचार का स्रोत है।

15.2.3 सामाजिक लाभ


i) मनोरंजनः वन, वन्यजीवन, राष्ट्रीय उद्यान और अभ्यारण, बगीचे तथा एक्वेरियम मनोरंजन एवं मन बहलाने की दृष्टि से अत्यधिक मूल्यवान हैं। इकोपर्यटन, फोटोग्राफी, पेंटिंग, फिल्म बनाना तथा साहित्यिक गतिविधियों का इनसे घनिष्ट संबंध है।

ii) सांस्कृतिक मूल्यः पादप एवं प्राणी मानव के सांस्कृतिक जीवन एक का महत्त्वपूर्ण भाग हैं। मानव संस्कृतियां अपने पर्यावरण के साथ-साथ विकसित हुई हैं तथा जैव विविधता विभिन्न समुदायों को एक अलग सांस्कृतिक पहचान प्रदान कर सकती है।

प्राकृतिक वातावरण सभी संस्कृतियों के लोगों की प्रेरणादायक, सौंदर्य, आध्यात्मिक और शैक्षिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। भारत के अधिकांश गाँवों एवं शहरों में तुलसी (ओसीमम सैंक्टम), पीपल (फाइकस रिलीजियोसा), खेजड़ी (प्रोसोपिस सिनेरेरिया) जैसे पौधों को पवित्र माना जाता है तथा इनकी पूजा की जाती है।

15.2.4 अनुसंधान, शिक्षा एवं मॉनिटरिंग


जैविक संसाधनों का बेहतर उपयोग कैसे किया जाए, उपज देने वाले जैविक संसाधनों का आनुवांशिक आधार कैसे बनाए रखा जाए तथा विकृत पारितंत्रों का पुनर्वास किस प्रकार किया जाए, इस बारे में अभी भी बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता है। प्राकृतिक क्षेत्र इस प्रकार के अध्ययनों के लिये, उपयोग के तरीकों के अन्तर्गत अन्य क्षेत्रों के साथ तुलना करने और पारिस्थितिकी तथा विकास के महत्त्वपूर्ण अनुसंधान के लिये उत्कृष्ट जीवित प्रयोगशाला उपलब्ध कराते हैं।

पाठगत प्रश्न 15.2


1. ऐसी तीन महत्त्वपूर्ण श्रेणियों के नाम बताइए जिनके अन्तर्गत जैव विविधता के उपयोगों का वर्णन किया जाता है।
2. पारितंत्र सेवाओं के दो उदाहरण दीजिए।
3. ऐसे दो तरीके बताइए जिनके द्वारा जैव विविधता स्वच्छ पर्यावरण के प्रति योगदान देती है।

15.3 भारतीय जैव विविधता की विलक्षणता एवं संबंधित क्षेत्रीय विशिष्टता


भारत पारितंत्र, स्पीशीजों और आनुवंशिक जैवविविधता सहित जैव विविधता के सभी पहलुओं में विशिष्ट रूप से समृद्ध है। पूरे विश्व में किसी एक देश के लिये यह शायद अपनी उष्णकटिबंधीय स्थिति, परिवर्तनशील भौतिक विशेषताओं एवं विविध जलवायु के गुण के कारण पूरे विश्व में किसी एक देश के लिये यह शायद पर्यावरणीय परिस्थितियों का सबसे बड़ा श्रृंखला समूह है। भारत में विविध प्रकार के पारितंत्र हैं। भारत में विश्व का केवल 2.4% भूभाग है परन्तु यहाँ संसार की 7.8% जीवित स्पीशीजें पायी जाती हैं। भारत में पादपों की 45000 से अधिक स्पीशीजें और जन्तुओं की 81000 से अधिक स्पीशीजें पायी जाती हैं। भारत खेती के पौधों के उद्गम के आठ प्राथमिक केन्द्रों में से भी एक है। भारत की कृषिक जैव विविधता बहुत समृद्ध है।

हिमालय-पार के क्षेत्र में विरल वनस्पति के बावजूद संसार के भेड़ और बकरियों के सबसे समृद्ध समुदाय पाये जाते हैं। यहाँ हिम तेंदुए (पेन्थेरा अनसिया) और काली गर्दन वाले सारस (ग्रुस नाइग्रिकोलिस) पाये जाते हैं। ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (आरडियोटिस नाइग्रिसेप्स) जो भारत में पाया जाने वाला अत्यधिक संकटापन्न पक्षी है, गुजरात क्षेत्र, जो विस्तृत घास के मैदानों से संपन्न है, में पाया जाता है।

उत्तर-पूर्व भारत देश का सर्वाधिक जैवविविधता सम्पन्न क्षेत्र है। विशेष रूप से आर्किड, बाँस, फर्न, सिट्रस (संतरा), केला, आम तथा जूट से समृद्ध है।

भारत मूंगा चट्टानों (कोरल रीफ) के मामले में भी समृद्ध है। भारतीय समुद्रों में मुख्य मूंगा संरचनाएँ मन्नार की खाड़ी, पाल्क खाड़ी, कच्छ की खाड़ी, अण्डमान और निकोबार द्वीप समूह तथा लक्षद्वीप में पायी जाती हैं। मैंग्रोव वृक्षों (दलदली भूमि में उग रहे) एवं मूंगा चट्टानों (कोरल रीफ) को बाजार की मांग को पूरा करने के लिये सतत मछली पकड़ने आस-पास के क्षेत्रों में भूमि-उपयोग में परिवर्तन और जल प्रदूषण इत्यादि से खतरा है।

15.4 जैवविविधता के ह्रास के कारण


स्पीशीजों की क्षति मानव अस्तित्व के लिये चिंता का एक गंभीर कारण है। यह देखा गया है कि स्तनधारियों की 79, पक्षियों की 44, सरीसृपों की 15 तथा उभयचर प्राणियों की 3 स्पीशीजे संकटग्रस्त हैं। भारत में लगभग 1500 पादप स्पीशीजें संकटग्रस्त हैं। अस्तित्व को खतरा या क्षति के निम्नलिखित तीन कारण हो सकते हैं:

प्रत्यक्ष तरीकाः वनोन्मूलन, शिकार, अवैध शिकार, व्यवसायिक दोहन।
अप्रत्यक्ष तरीकाः प्राकृतिक पर्यावासों की क्षति या इनमें रूपान्तरण विदेशी स्पीशीजों का प्रवेशन, प्रदूषण इत्यादि।
प्राकृतिक कारणः जलवायु परिवर्तन।

इनमें से पर्यावास का विनाश तथा अति दोहन मुख्य कारण हैं।

i) पर्यावासों का विनाशः वनों की कटाई एवं जंगल की आग, आर्द्रभूमियों की भराई तथा इनसे पानी की निकासी, प्राकृतिक क्षेत्रों को कृषि या औद्योगिक उपयोग में लाना, मानव बस्तियां, खनन, सड़कें बनाना तथा अन्य विकास संबंधी परियोजनाएँ वास स्थान के विनाश का कारण हैं। इस तरह जीवों के प्राकृतिक पर्यावास परिवर्तित हो गए हैं या फिर नष्ट हो गए हैं। इन परिवर्तनों के कारण स्पीशीजें या तो मर जाती हैं या क्षेत्र से बाहर निकलने के लिये बाध्य हो जाती हैं जिसके कारण स्पीशीजों के मध्य अन्योन्यक्रिया बाधित हो जाती है। बड़े वन्य क्षेत्रों का विखण्डन (जैसे गलियारे) वन के भीतरी भागों में रहने वाली स्पीशीजों को प्रभावित करता है और वह लुप्त हो जाती है। विकास संबंधी गतिविधियों के दौरान स्पीशीजों की प्रत्यक्ष क्षति के अतिरिक्त नया पर्यावरण स्पीशीजों के जीवित रहने के लिये अनुपयुक्त होता है। अतिदोहन प्रजातियों की जनसंख्या का आकार कम कर देता है और इन्हें विलुप्त होने पर मजबूर कर देता है।

ii) विदेशी स्पीशीजों का प्रवेशः लोगों के कपड़ों पर बीजों का चिपकना, माइस, चूहे और पक्षी जहाजों पर सवार हो जाते हैं। जब यह स्पीशीजें नए स्थानों पर पहुँचती हैं तो वहाँ शत्रुओं के अभाव के कारण बहुत तेजी से प्रजनन करती हैं और प्रायः उन देशी स्पीशीजों को समाप्त कर देती है जो यहाँ पहले से उपस्थित हैं। विदेशी स्पीशीजें (भौगोलिक क्षेत्र में प्रवेश करने वाली नई स्पीशीजें) देशी स्पीशीजों को पूरी तरह से नष्ट कर सकती हैं। कुछ उदाहरण हैं:

i) पारथीनियम हिस्टेरोफोरस (कांग्रेस घास-एक उष्णकटिबंधीय अमेरिकी खरपतवार) भारत के शहरों, कस्बों तथा गाँवों के खाली क्षेत्रों में फैल चुकी है जिससे स्थानीय पादपों और उन पर निर्भर रहने वाले प्राणी मिट गए हैं।

ii) नाईल पर्च, एक विदेशी परभक्षी मछली जिसका विक्टोरिया झील (दक्षिणी अफ्रीका) में प्रवेश के कारण झील का समस्त पारितंत्र संकट ग्रस्त हो गया। परिणामस्वरूप छोटी सिक्लिड (Cichlid) मछली की कई देशी स्पीशीजें समाप्त हो गई जो इस अलवणजलीय तंत्र की स्थानिक प्रजातियां थीं।

iii) जलकुंभी झीलों एवं नदी तट को अवरुद्ध कर देती हैं तथा कई जलीय स्पीशीजों के अस्तित्व के लिये संकट पैदा कर देती हैं। यह भारत के मैदानी इलाकों में आमतौर से पायी जाती हैं।

iv) लेन्टाना केमेरा (एक अमेरिकी खरपतवार) ने भारत के विभिन्न भागों में कई वन भूमियों पर कब्जा किया हुआ है और इस कारण देशी घास स्पीशीजें नष्ट हो गई हैं।

iii) प्रदूषणः वायु प्रदूषण, अम्लीय वर्षा के कारण वन नष्ट हो जाते हैं। जल प्रदूषण के कारण मछलियाँ तथा अन्य जलीय पादप एवं जन्तु मर जाते हैं। विषाक्त एवं खतरनाक पदार्थों को जल मार्गों में बहाया जाता है जिसके कारण जलीय जीवन नष्ट हो जाता है। समुद्र में तेल गिरने के कारण तटीय पक्षी, पादप एवं अन्य समुद्रीय जन्तु मर जाते हैं। प्लास्टिक कचरे में वन्यजीव फंस जाते हैं। यह सरलता से देखा जा सकता है कि प्रदूषण जैव विविधता के लिये कितना बड़ा खतरा है।

iv) जनसंख्या वृद्धि एवं गरीबीः छह अरब से भी ज्यादा लोग पृथ्वी पर रहते हैं। प्रत्येक वर्ष इसमें 90 मिलियन लोग और शामिल हो जाते हैं। ये सभी लोग भोजन, जल, औषधियां, कपड़े, आश्रय और ईंधन प्राप्त करने के लिये प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करते हैं। गरीब लोगों की आवश्यकता तथा प्रायः धनाढ्य लोगों के लालच के कारण संसाधनों पर निरंतर दबाव बढ़ रहा है जिससे इनका अतिदोहन हो रहा है एवं जैवविविधता को क्षति पहुँच रही है।

विश्व संरक्षण संघ (The World Conservation Union, IUCN) (पूर्व में ‘प्रकृति एवं प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिये अन्तरराष्ट्रीय संघ’ के रूप में जाना जाता था) ने स्पीशीजों की संरक्षण स्थिति के अनुसार आठ रेड लिस्ट श्रेणियों की पहचान की है। इन श्रेणियों को निम्न तालिका 15.2 में परिभाषित किया गया है।

 

तालिका 15.2: IUCN संकट ग्रस्त श्रेणियां

सूची श्रेणी

परिभाषा

विलुप्त

एक टेक्सॉन विलुप्त है जब संदेह करने के लिये कोई कारण ही नहीं बचता कि अंतिम सदस्य की भी मृत्यु हो चुकी है।

जंगल में विलुप्त होना

एक टेक्सॉन जंगल में विलुप्त है जब तब थकाने वाला सर्वे करने पर जाना-जाता है एवं/या फिर संभावित वास स्थान में एक सदस्य की भी गिनती रिकॉर्ड नहीं कर पाते हैं।

क्रांतिक रूप से संकटापन्न

एक टेक्सॉन संकटापन्न होता है जब वह जल्दी ही भविष्य में जंगल के विलुप्त होने की सबसे अधिक संभावना का सामना कर रहा होता है।

संकटापन्न

एक टेक्सॉन संकटापन्न होता है जब वह क्रांतिक रूप से संकटापन्न नहीं है लेकिन वह जल्दी ही भविष्य में जंगल में तेजी से विलुप्त होने के कगार की बहुत अधिक संभावना है।

सुभेद्य

एक टेक्सॉन सुभेद्य है जबकि वह क्रांतिक रूप से संकटापन्न या संकटापन्न नहीं है परन्तु इसके मध्यक्रम भविष्य में तेजी से विलुप्त होने की संभावना काफी है।

कम संभावित

एक टेक्सान कम संभावित खतरे में है जब वह मापा जा सके एवं क्रांतिक रूप से संकटापन्न, संकटापन्न या सुभेद्य मानने के मानदंडों पर खरा नहीं उतरता है।

अपर्याप्त डाटा

एक टेक्सॉन का डाटा अपर्याप्त है जब पर्याप्त सूचना के अभाव के कारण परोक्ष या अपरोक्ष रूप से उसकी विलोपन की संभावना के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता है।

मूल्यांकन नहीं किया जा सके

एक टेक्सॉन का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता है जब ऊपर दिये गए मानदंडों  के विरुद्ध मूल्यांकन करना संभव नहीं होता है।

 

विलोपन्मुखी स्पीशीजों की स्थिति


IUCN रेड लिस्ट इस उद्देश्य के लिये सूचना का विश्वसनीय स्रोत है। 2000 रेड लिस्ट नवीनतम उपलब्ध सूची है। इसमें स्पीशीजों के विलोपन के खतरे के मूल्यांकन के लिये विश्व के सभी क्षेत्रों एवं सभी स्पीशीजों के लिये नियत मापदंडों का उपयोग किया जाता है। 2000 रेड लिस्ट में 18000 से अधिक स्पीशीजों के आकलन का समावेश है। इनमें से 11000 स्पीशीजें संकट ग्रस्त हैं। (5485 जन्तु तथा 5611 पादप)। इनमें से 1939 गम्भीर रूप से संकटापन्न (925 जन्तु तथा 1014 पादप) रेड लिस्ट के अनुसार भारत में 44 पादप स्पीशीजें गम्भीर रूप से संकटग्रस्त हैं 113 संकट ग्रस्त तथा 87 सुभेद्य (असुरक्षित) हैं। जन्तुओं में 18 गम्भीर रूप से संकटापन्न, 54 संकटापन्न तथा 143 अतिसंवेदनशील हैं। इन पादपों एवं जन्तुओं के कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं:

 

तालिका 15.3: भारत में संकटापन्न स्पीशीजों के उदाहरण

श्रेणी

पादप स्पीशीजें

जन्तु स्पीशीजें

गम्भीर रूप से संकटापन्न

बेरबेरिस नीलगीरियनसिस

सस सल्वेनियस, (पिग्मी होग)

संकटापन्न

वेन्टिनक्टा निकोवारिका

एल्यूरस फुलगेन्स (रेड पांडा)

सुभेद्य

क्यूप्रेसस केशमीरियान

एंटीलोप सर्वीकापरा, (ब्लेक बक)

 

15.5 जैव विविधता का संरक्षण


संरक्षण प्राकृतिक संसाधनों का योजनाबद्ध प्रबंधन है ताकि प्राकृतिक संतुलन एवं जैव विविधता को बनाये रखा जा सके। इसमें प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग भी शामिल है जिसके अन्तर्गत संसाधनों का उपयोग इस प्रकार किया जाए कि वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके तथा भविष्य की पीढ़ियों के लिये भी पर्याप्त हो। जैव विविधता का संरक्षण निम्नलिखित के लिये महत्त्वपूर्ण हैः

- प्रजाति की आनुवांशिक विविधता को नष्ट होने से रोकना।
- स्पीशीजों को विलुप्त होने से बचाना, तथा
- पारितंत्र को नष्ट तथा अवकृमित होने से बचाना।

पाठगत प्रश्न 15.3


1. भारत का वह कौन सा क्षेत्र है जहाँ संसार की सबसे समृद्ध भेड़ एवं बकरियों के समुदाय पाए जाते हैं।
2. ऐसे तीन कारकों की सूची बनाइए जिनके कारण भारत की जैवविविधता समृद्ध एवं अद्वितीय है।
3. जैवविविधता के सबसे समृद्ध क्षेत्रों के नाम बताइए।
4. विदेशी स्पीशीजें क्या हैं? ये स्थानीय स्पीशीजों पर क्या प्रभाव डालती हैं?
5. जैवमंडल रिजर्व के तीन क्षेत्रों के नाम बताइए। इनमें से किसमें बस्तियां बनाने की अनुमति है?
6. अर्थ सम्मेलन 1993 के दौरान जिस करार पर हस्ताक्षर हुए उसके तीन उद्देश्यों की सूची बनाइए।
7. IUCN का पूरा नाम लिखिए।
8. भारत में कितने प्राणियों एवं कितने पादपों को गम्भीर रूप से संकटापन्न स्पीशीजों की सूची में रखा गया है?

15.6 संरक्षण कार्यनीतियां


संरक्षण के प्रयासों को निम्नलिखित दो श्रेणियों में बांटा गया हैः

1. निजस्थानिक (निज स्थानीय) संरक्षणः इस प्रकार के संरक्षण के अन्तर्गत पौधों एवं प्राणियों को उनके प्राकृतिक वास स्थान अथवा सुरक्षित क्षेत्रों में संरक्षित किया जाता है। संरक्षित क्षेत्र भूमि या समुद्र के वे क्षेत्र हैं जो संरक्षण के लिये समर्पित हैं तथा जैव विविधता को बनाए रखते हैं।

2. परस्थानिक (परस्थानीय) संरक्षणः पादपों एवं प्राणियों का उनके पर्यावास के बाहर संरक्षण। इसमें वानस्पतिक उद्यान, चिड़िया-घर, जीन बैंक, बीज बैंक, ऊतक संवर्धन तथा क्रायोप्रिजर्वेशन सम्मिलित हैं।

15.6.1 निजस्थानिक विधियां


i) पर्यावास का संरक्षणः स्पीशीजों के संरक्षण की मुख्य रणनीति सम्बन्धित पारितंत्रों में पर्यावास का संरक्षण है। वर्तमान में भारत में 96 राष्ट्रीय, 500 वन्यजीव अभ्यारण, 13 जैव मंडल रिजर्व, 27 टाइगर रिजर्व तथा 11 एलिफेंट रिजर्व हैं जो 15-67 मिलियन हेक्टेयर या देश के भौगोलिक क्षेत्र के 4.7 % भाग पर फैले हुए हैं। भारत सरकार के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने गहन संरक्षण एवं प्रबंधन के उद्देश्य से 21 आर्द्र भूमियों, 30 मैंग्रोव क्षेत्रों एवं 4 मूंगा चट्टानों (कोरल रीफ) की पहचान की है।

राष्ट्रीय उद्यान एवं अभ्यारण


भारत अपनी वनस्पति तथा वन्य जीवन की समृद्धि एवं विविधता के मामले में अद्वितीय है। भारत के राष्ट्रीय उद्यान एवं वन्यजीव अभ्यारण (पक्षी अभ्यारण सहित) हिमालय में लद्दाख से लेकर दक्षिणी छोर पर तमिलनाडु तक अवस्थित है जो जैव विविधता एवं धरोहर के मामले में अत्यंत समृद्ध है। भारत के वन्य जीव अभ्यारण पूरे विश्व के लोगों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। तथा यहाँ अतिदुर्लभ स्पीशीजें पायी जाती हैं। 96 राष्ट्रीय उद्यान तथा 500 से भी अधिक वन्यजीव अभ्यारण के साथ भारतीय वन्यजीव धरोहर की विविधता एवं उसके परास अद्वितीय हैं।

भारत के कुछ अभ्यारण्य हैं: जिम कार्बेट टाइगर रिजर्व - उत्तराखण्ड, कान्हा राष्ट्रीय उद्यान- मध्य प्रदेश, बान्धवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान- मध्य प्रदेश, रणथम्भोर राष्ट्रीय उद्यान- सवाईमाधोपुर, गिर राष्ट्रीय उद्यान- सासागीर (गुजरात) इत्यादि।

वन्यजीव प्रेमी भरतपुर, राजस्थान के शानदार पक्षी अभ्यारण्य देखने को उत्सुक रहते हैं यह अभ्यारण्य विश्व का दूसरा ऐसा प्राकृतिक पर्यावास है जिसमें शीतऋतु के दौरान साइबेरियाई सारस प्रवास करते हैं और यह मूलतः जल पक्षियों के लिये एक विशाल प्रजनन क्षेत्र उपलब्ध कराता है। ग्रेट इंडियन बस्टार्ड भारतीय मरुस्थल में पाया जाता है। पश्चिमी हिमालय में हिमालयी मोनाल तीतर, पश्चिमी टेंगोपाम कोकलास (कोयल), श्वेत क्रस्टेड खलीज तीतर, ग्रीफॉन गिद्ध, लेमरगियर गोधस (Choughs), रेवन्स जैसे पक्षी पाए जाते हैं। अंडमान एवं निकोबार क्षेत्र में पक्षियों की लगभग 250 प्रजातियाँ एवं उप-स्पीशीजें पायी जाती हैं जैसे दुर्लभ नारकोण्डम हार्न बिल, निकोबार कबूतर और मेगापोड। जबकि दक्षिण भारत में राष्ट्रीय उद्यान एवं अभ्यारण्य भी। उदाहरण के लिये तमिलनाडु में मदुमलाई तथा कर्नाटक में बांदीपुर टाइगर रिजर्व तथा नागाहोल राष्ट्रीय उद्यान।

वन्य जीवों को उनके प्राकृतिक पर्यावरण में संरक्षण प्रदान करने के लिये अनेकों राष्ट्रीय उद्यान एवं अभ्यारण्य स्थापित किए गए हैं। इनमें से कुछ राष्ट्रीय उद्यानों एवं अभ्यारण्य तथा उनमें पायी जाने वाली स्पीशीजें नीचे दी गई हैं:

- काजीरंगा अभ्यारण्य (असम)- एक सींग वाला गेंडा।
- मानस अभ्यारण्य (असम) - जंगली भैंस।
- गिर वन (गुजरात) - शेर, चीतल, सांभर, जंगली भालू।
- केलामेरु पक्षी अभ्यारण्य (आन्ध्र प्रदेश) - पेलिकन एवं समुद्री पक्षी।
- डचिगाम अभ्यारण्य (जम्मू एवं कश्मीर) - कश्मीरी बारहसिंघे, हिमालयी तेहर, जंगली बकरी, भेड़, हिरण।
- बांदीपुर अभ्यारण्य (कर्नाटक) - भारतीय गवल (बाइसन), हाथी, लंगूर।
- पेरियार अभ्यारण्य (केरल) - हाथी, हिरण, सांभर।
- कान्हा राष्ट्रीय उद्यान (मध्य प्रदेश)- बाघ, तेंदुए, जंगली कुत्ते।
- सिमिलीपाल राष्ट्रीय उद्यान (उड़ीसा)- मैंग्रोव (गारन), अंडे देने वाले समुद्री कछुए।
- भरतपुर पक्षी अभ्यारण्य (राजस्थान)- बत्तख, बगुला।
- कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान (उत्तरांचल)- बाघ, बार्किंग हिरण, सांभर, जंगली भालू, रीसर बंदर।
- जलदपारा अभ्यारण्य (पश्चिमी बंगाल)- गैंडा।

वन्यजीव संरक्षण सोसायटी (Wildlife Conservation Society, WCS), भारत अन्य गैर सरकारी संगठनों एवं आदिवासी लोगों के सहयोग से, भारत की सबसे कीमती पादप प्रजातियों के संरक्षण एवं पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिये वन्यजीव संरक्षण के नए मॉडल विकसित करने का हर संभव प्रयास कर रही है।

जैव मंडल आरक्षित क्षेत्र (Biosphere reserve zone)


ये प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक भूदृश्य के प्रतिनिधि क्षेत्र हैं जो स्थलीय या तटीय/समुद्री पारितंत्रों के एक बड़े क्षेत्र में फैले हुए हैं। जिनकी यूनेस्को के मानव तथा जैव मंडल कार्यक्रम के अन्तर्गत अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान की गई है। तेरह जैवविविधता से समृद्ध प्रतिनिधि पारितंत्रों, जो अधिकतर वन्य भूमि पर हैं (कुल क्षेत्रफल- 53000 वर्ग किमी) को भारत में जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र के तौर पर नामित किया गया है। चित्र 15.4 में दिखाया गया है।

चित्र 15.4 जैवमंडल आरक्षित क्षेत्रभारत में जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र (Biosphere reserves, BR) की अवधारणा को 1975 में यूनेस्को के ‘‘मानव एवं जैव मंडल कार्यक्रम’’ के एक भाग के रूप में शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य है-पारितंत्रों एवं इनके आनुवांशिक पदार्थ का संरक्षण। जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र में कोर, बफर एवं ट्रान्जीशन क्षेत्र सम्मिलित होते हैं। (क) कोर क्षेत्र (Core zone) पूर्णतया सुरक्षित है तथा मानव गतिविधियों द्वारा कम से कम बाधित प्राकृतिक क्षेत्र है। यह कानूनी तौर पर संरक्षित ऐसा पारितंत्र है जिसमें किसी विशेष उद्देश्य के लिये अनुमति को छोड़कर प्रवेश की अनुमति नहीं है। वैज्ञानिक अन्वेषण के लिये विनाशकारी नमूना निषेध है। (ख) बफर क्षेत्र (Buffer zone), कोर क्षेत्र के चारों तरफ का क्षेत्र है तथा इसका प्रबंधन (ग) संक्रमण क्षेत्र (Transition zone) जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र का सबसे बाहरी भाग है, यह आरक्षित क्षेत्र प्रबंधन एवं स्थानीय लोगों के मध्य सक्रिय सहयोग का ऐसा क्षेत्र है जिसमें बस्तियां, फसल उगाना, वानिकी, मनोरंजन जैसी गतिविधियां एवं अन्य आर्थिक क्रियाकलाप संरक्षण के उद्देश्यों के साथ सामंजस्य बनाते हुए सम्पन्न किए जाते हैं। आज तक 107 देशों में 533 जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र स्थापित हो चुके हैं।

चित्र 15.5 मानव बस्तियाँ (एक स्थलीय BR- जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र

जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र के मुख्य कार्य हैं:


संरक्षणः प्रतिनिधियों, भूदृश्यों तथा विभिन्न प्रकार के पारितंत्रों एवं उनमें पायी जाने वाली सभी प्रजातियों एवं आनुवांशिक संसाधनों का दीर्घकालीन संरक्षण।
विकासः पारम्परिक संसाधनों के उपयोग को प्रोत्साहन देना तथा सांस्कृतिक, सामाजिक एवं पारिस्थितिकीय रूप से सतत पोषणीय आर्थिक विकास को बढ़ावा देना।
वैज्ञानिक अनुसंधान, निगरानी एवं शिक्षाः संरक्षण अनुसंधान निगरानी, स्थानीय, राष्ट्रीय एवं वैश्विक पर्यावरणीय तथा संरक्षण के मुद्दों से सम्बन्धित शिक्षा एवं सूचना के आदान प्रदान को सहारा देना।

II) स्पीशीज उन्मुख परियोजनाएँ: कुछ प्रजातियों की ठोस एवं विशेष रूप से निर्देशित प्रयासों की आवश्यकता के तौर पर पहचान की गई है। प्रोजेक्ट टाइगर, प्रोजेक्ट एलिफेन्ट एवं प्रोजेक्ट क्रोकोडाइल इनके वास स्थान के संरक्षण के माध्यम से एकल प्रजातियों पर ध्यान केन्द्रित करने के उदाहरण हैं।

प्रोजेक्ट टाइगर- स्पीशीज संरक्षण में एक सफलता


बाघ जो कभी भारतीय वनों में बड़ी संख्या में पाये जाते थे, शिकारियों के भेंट चढ़ रहे हैं। परिणामस्वरूप देश में बाघों की आबादी 40,000 से घटकर 1970 में 1200 रह गई। इसीलिये 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर शुरू किया गया जिसका उद्देश्य इस प्रजाति का संरक्षण एवं इसे विलुप्त होने से बचाना है। 2007 में 40 से भी अधिक प्रोजेक्ट टाइगर वन्य जीव आरक्षित क्षेत्र थे जो 37,761 वर्ग किमी क्षेत्र में फैले हुए थे। प्रोजेक्ट टाइगर की सहायता से इन बाघों की संख्या 12,00 (1970 में) से बढ़कर 1990 में 3500 तक हो गई। यद्यपि 2008 में भारत सरकार द्वारा कराई गई जनगणना से पता चला है कि बाघों की संख्या घटकर 1411 रह गई है। बाघों का शिकार करने तथा राष्ट्रीय स्तर पर बाघों के उत्पादों के व्यापार पर पूर्णतया प्रतिबन्ध लगा दिया गया है। बाघों के पर्यावासों में सुधार तथा अवैध शिकार को रोकने के उद्देश्य से प्रत्येक टाइगर रिजर्व के लिये व्यापक प्रबंधन योजनाएँ तैयार की गई हैं।

प्रोजेक्ट एलिफेंट


प्रोजेक्ट एलिफेंट फरवरी 1992 में शुरू किया गया था, जिसका उद्देश्य था कि हाथियों की आबादी को उनके पर्यावासों में लम्बे समय तक जीवित रहने को सुनिश्चित बनाने के लिये राज्यों की सहायता करना। इस प्रोजेक्ट को बारह राज्यों आन्ध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, असम, झारखण्ड, कर्नाटक, केरल, मेघालय, नागालैंड, उड़ीसा, तमिलनाडु, उत्तरांचल तथा पश्चिमी बंगाल में कार्यान्वित किया जा रहा है।

मगरमच्छ प्रजनन एवं प्रबंधन परियोजना


यह परियोजना मगरमच्छों की तीन संकटापन्न प्रजातियों अलवणजलीय मगरमच्छों, लवणीय जलीय मगरमच्छों एवं दुर्लभ घड़ियालों को बचाने के लिये 1976 में एफएओ-यूएनडीपी (FAO-UNDP) के साथ शुरू की गई थी। प्रोजेक्ट के अन्तर्गत मगरमच्छों के पर्यावास का सर्वेक्षण किया गया तथा इन्हें अभ्यारण एवं राष्ट्रीय उद्यान घोषित करके इनके संरक्षण में सहायता की गई। बंदी प्रजनन (Capture breeding) पुनः परिचय या प्रोग्राम के पुनः संग्रहण के अंतर्गत जंगल से अण्डों को सावधानीपूर्वक एकत्र करना शामिल था। तीनों स्पीशीजों के हजारों मगरमच्छों को सोलह केन्द्रों पर पाला गया तथा इनमें से अनेकों मगरमच्छों को जंगल में छोड़ दिया गया। मगरमच्छों को संरक्षित करने के लिये ग्यारह अभ्यारण्य घोषित किए गए हैं जिनमें मध्य प्रदेश का राष्ट्रीय चम्बल अभ्यारण्य भी सम्मिलित है।

iii) पवित्र वन एवं पवित्र झीलें: भारत एवं कुछ अन्य एशियाई देशों में पवित्र वनों के रूप में जैव विविधता के संरक्षण की परंपरागत कार्यनीति प्रचलित है। ये छोटे-छोटे वन हैं जो धार्मिक पवित्रता के कारण आदिवासी समुदायों के द्वारा संरक्षित हैं। यह हर प्रकार के विघ्न से स्वतंत्र हैं। पवित्र वन भारत के विभिन्न भागों में स्थित हैं जैसे कर्नाटक, महाराष्ट्र, केरल, मेघालय इसी प्रकार कई जल निकाय जैसे सिक्किम में खेचिओपलरी झील को लोगों द्वारा पवित्र घोषित किया गया है जिससे जलीय पादपों एवं जन्तुओं को संरक्षण मिला है।

15.6.2 परस्थानिक संरक्षण


(i) वानस्पतिक उद्यान, चिड़ियाघर आदिः निज स्थानिक संरक्षण प्रयासों के पूरक के तौर पर परस्थानिक संरक्षण, विभिन्न एजेंसियों द्वारा स्थापित वानस्पतिक उद्यान, चिड़ियाघर, औषधीय पादप पार्क आदि के माध्यम से किया जा रहा है। हावड़ा का भारतीय वानस्पतिक उद्यान 200 वर्ष से भी अधिक पुराना है। अन्य महत्त्वपूर्ण वानस्पतिक उद्यान ऊटी, बंग्लुरु तथा लखनऊ में स्थित हैं। भारतीय गणराज्य का नवीनतम वानस्पतिक उद्यान दिल्ली के समीप नोएडा में अप्रैल 2002 में स्थापित किया गया है। इस उद्यान के मुख्य उद्देश्य हैं:

- प्रमुख संकटग्रस्त पादप स्पीशीजों का परस्थानिक संरक्षण एवं प्रवर्धन करना।
- संरक्षण, अनुसंधान एवं प्रशिक्षण के लिये उत्कृष्टता के केन्द्र के रूप में कार्य करना।
- शिक्षा के माध्यम से पादप विविधता एवं संरक्षण की आवश्यकता के प्रति जनता में जागरुकता पैदा करना।

देश में कई चिड़ियाघर विकसित किए गए हैं। ये प्राणी उद्यान प्राणी स्पीशीजों के बारे में शिक्षा एवं मनोरंजन के केन्द्रों के रूप में देखे जाते हैं। ये संकटापन्न प्राणी स्पीशीजों के संरक्षण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं जैसे मणीपुर थामिया हिरण (सीरस इल्डी) तथा श्वेत पंख वाली वुड डक (कैरिना स्कूटूलता) के संरक्षण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। बंदी प्रजनन केन्द्र के उल्लेखनीय सफलतम उदाहरण गंगा के घड़ियाल (गेवियालिस गेंजेटिकस), कछुए एवं श्वेत टाइगर हैं।

(ii) जीन बैंकः आनुवांशिक संसाधनों का परस्थानिक संग्रहण एवं संरक्षण जीन बैंकों एवं बीज बैंकों द्वारा किया जाता है। राष्ट्रीय पादप आनुवांशिक संसाधन ब्यूरो (The National Bureau of Plant Genetic Resources, NBPGR), नई दिल्ली फसल के पौधों के जंगली संबंधित स्पीशीजों तथा उगाई जाने वाली किस्मों के बीजों को संरक्षित रखता है, करनाल (हरियाणा) में राष्ट्रीय पशु अनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (The National Bureau of Animal Genetic Resources) पालतू पशुओं के आनुवांशिक पदार्थ का रखरखाव करता है तथा राष्ट्रीय मत्स्य आनुवांशिक संसाधन ब्यूरो (The National Bureau of Fish Genetic Resources), लखनऊ मछलियों के लिये है।

(iii) क्रायोप्रिजर्वेशन (Cryopreservation) : (हिमकारी संरक्षण) विशेष रूप से कायिक संवर्धित फसलों के संरक्षण के लिये लाभदायक है। क्रोयोप्रिजर्वेशन के अन्तर्गत पदार्थ को द्रव नाइट्रोजन में अत्यंत निम्न तापमान (-196° C) पर रखा जाता है तथा सभी उपापचयी प्रक्रियाओं एवं क्रियाकलापों को आवश्यक रूप से निलंबित रखा जाता है। क्रोयोप्रिजर्वेशन का अनुप्रयोग विभज्योतक, युग्मनजीय एवं कायिक भ्रूण, पराग, प्रोटोप्लास्ट कोशिकाएँ तथा अनेक पादप स्पीशीजों के निलंबन संवर्धन पर सफलता के साथ किया जा चुका है।

(iv) आण्विक स्तर पर संरक्षण (DNA स्तर पर) : उपरोक्त के अतिरिक्त, आण्विक स्तर पर जर्मप्लाज़्म संरक्षण अब संभव है तथा इसने अपनी ओर ध्यान आकर्षित किया है। क्लोन डीएनए तथा डीएनए युक्त पदार्थ अपनी मूल अवस्था में आनुवांशिक संरक्षण के लिये उपयोग किया जा सकते है। इसके अलावा जीन बैंकों में संग्रहित मूल्यवान जीनोटाइप दर्शाने वाला अलाभकारी पदार्थ डीएनए लाइब्रेरी के स्रोतों के रूप में उपयोग किया जा सकता है, जहाँ से उपयुक्त जीन या जीनों के संयोजन को पुनः प्राप्त किया जा सकता है।

कानूनी उपायः बाजार में बाघ की हड्डियों, गैंडे के सींगों, फर, हाथी दांत, खाल, कस्तूरी, मोर के पंख इत्यादि की मांग के कारण वन्य जीवों की हत्या की जाती है। वन्य जीव संरक्षण अधिनियम (1972) में अवैध शिकार एवं व्यापार को रोकने के लिये जुर्माना एवं दंड का प्रावधान है। भारत ने वन्य पादप एवं जन्तुओं की संकटापन्न स्पीशीजों के अन्तरराष्ट्रीय व्यापार समझौते (Convention on International Trade in Endangered Species of Wild Fauna and Flora, CITES) पर हस्ताक्षर किए हैं। समझौता 1 जुलाई 1975 से लागू है। इसके साथ-साथ भारत ने जैविक विविधता समझौते (Convention on Biological Diversity, CBD) पर भी हस्ताक्षर किए हैं। यह हस्ताक्षर 29 दिसम्बर 1993 को पृथ्वी सम्मेलन के दौरान रियो डी जेनेरो में किए गए थे। इस समझौते के तीन मुख्य उद्देश्य हैं:

1. जैवविविधता का संरक्षण।
2. जैवविविधता का सतत पोषणीय उपयोग।
3. आनुवांशिक संसाधनों के उपयोग से होने वाले लाभों का स्वस्थ एवं समान बँटवारा।

CITES (सीआइटीईएस) एवं CBD (सीबीडी) अन्तरराष्ट्रीय पहल है। भारत सरकार ने भी 2002 में जैविक विविधता अधिनियम पास किया है।

जैविक विविधता अधिनियम 2002


- इस अधिनियम के अन्तर्गत राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (National Biodiversity Authority, NBA), राज्य जैवविविधता बोर्ड (State Biodiversity Board, SBB) एवं स्थानीय निकायों में जैवविविधता प्रबंधन समितियों (Biodiversity Management Committees, BMC) का गठन किया गया है।

- सभी विदेशी नागरिकों/संगठनों को जैविक संसाधन प्राप्त करने तथा/अथवा किसी भी उपयोग हेतु संबंध ज्ञान प्राप्त करने के लिये एनबीए के पूर्व अनुमोदन की आवश्यकता होगी।

- इसी प्रकार, भारतीय नागरिकों अथवा संगठनों को वाणिज्यिक उपयोग हेतु आयात किए जाने वाले किसी भी जैविक संसाधन के बारे में संबंधित एसबीबी को पहले से सूचना देनी होगी। यदि एसबीबी को लगता है कि इससे संरक्षण, सतत पोषणीय उपयोग एवं लाभ के बंटवारे के उद्देश्यों का उल्लंघन हो रहा है तो वह इस आयात पर रोक लगा सकता है।

- यद्यपि वैद्य एवं हकीमों सहित स्थानीय लोग एवं समुदाय देश के अन्दर निजी उपयोग, औषधीय उद्देश्यों तथा अनुसंधान हेतु जैविक संसाधनों के उपयोग के लिये स्वतंत्र होंगे।

- अनुमोदन की स्वीकृति प्रदान करते समय एनबीए लाभ के समान बँटवारे को सुनिश्चित करने के लिये नियम एवं शर्तों को लागू करेगा।

- पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण हेतु ढांचे के गठन का प्रावधान।

- आर्थिक लाभ, फीस एवं रायल्टी को एनबीए के अनुमोदन के पश्चात राष्ट्रीय जैवविविधता कोष में जमा किया जाएगा। जिसका उपयोग स्थानीय सरकार के परामर्श से उन क्षेत्रों के संरक्षण एवं विकास के लिये किया जाएगा, जहाँ से संसाधन प्राप्त किए गए हैं।

- वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर (World Wide Fund for Nature, WWF) तथा विश्व संरक्षण संघ जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र के संरक्षण एवं उचित विकास को बढ़ावा देने वाली परियोजनाओं को समर्थन देते हैं।

पाठगत प्रश्न 15.4


1. मुख्य संरक्षण कार्यनीतियां क्या हैं?
2. दो महत्त्वपूर्ण बाघ आरक्षित क्षेत्रों के नाम बताइए।
3. WCS का पूरा नाम बताइए।
4. जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र के मुख्य कार्य क्या हैं?
5. निम्नलिखित के पूरे नाम लिखिएः
(i) NBPGR (ii) NBG (iii) CITES (iv) IUCN (v) CBD (vi) NBA

आपने क्या सीखा


- जैवविविधता किसी क्षेत्र में जीनों, स्पीशीजों तथा पादप, जन्तु तथा सूक्ष्मजीवों के पारितंत्रों का समूह है। हमारे अस्तित्व के लिये जैवविविधता के मूल्य का अहसास होने के बाद जैवविविधता का अध्ययन आज बहुत महत्त्वपूर्ण हो गया है। इसके अनेकों औषधीय, वाणिज्यिक, आर्थिक एवं वैज्ञानिक उपयोग हैं।

- उगायी जाने वाली फसल के पौधों का जंगली स्पीशीजों रोगों के प्रति प्रतिरोधकता एवं कई अन्य फसलों के सुधार के लिये आवश्यक गुण वाले जीन के स्रोत हैं।

- जैवविविधता मूल्यवान सेवाएँ भी प्रदान करती है जैसे जल संरक्षण, शुद्ध वायु, मृदा संरक्षण तथा मिट्टी की उर्वरता में सुधार, प्रदूषण का कम करना, सौन्दर्य इत्यादि।

- पृथ्वी पर स्पीशीजों की कुल संख्या 5-100 मिलियन है। परन्तु अब तक केवल 1.8 मिलियन स्पीशीजों का ही वर्णन किया गया है।

- भारत जैवविविधता समृद्ध देश है तथा विश्वस्तर पर स्वीकृत 12 मेगाडाइवर्सिटी देशों में से एक है। भारत देश में 70% क्षेत्रफल का सर्वेक्षण किया गया है तथा आज तक सूक्ष्मजीवों एवं पादपों की 45000 स्पीशीजों तथा जन्तुओं की 81000 स्पीशीजों का विवरण प्रस्तुत किया गया है।

- जैव विविधता के 3 स्तर हैं- 1) आनुवांशिक 2) प्रजातीय और (3) समुदाय अथवा पारितंत्र। स्पीशीजें विविधता की स्पष्ट इकाइयां हैं तथा प्रत्येक स्पीशीज पारितंत्र में विशिष्ट भूमिका निभाती है।

- पर्यावरण में परिवर्तन के साथ प्रायः स्पीशीज के भीतर विविधता में वृद्धि हो जाती है। स्पीशीज विविधता से अभिप्राय है कि किसी क्षेत्र में स्पीशीजों की किस्में। पारितंत्रीय जैवविविधता ध्रुवीय क्षेत्रों से भूमध्य रेखा की ओर तथा उच्च उन्नयन से कम उन्नयन की ओर बढ़ती जाती है।

- पर्यावास का विनाश एवं विखण्डन, अतिदोहन, पर्यावरणीय प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन तथा विदेशी स्पीशीजों का प्रवेशन जैवविविधता के लिये बड़ा खतरा है। ऐसा अनुमान है कि केवल उष्णकटिबंधीय वनों से ही प्रतिवर्ष 14000-40000 स्पीशीजें नष्ट हो जाती है।

- IUCN रेड लिस्ट संकटाग्रस्त पादप एवं जन्तु स्पीशीजों की विश्वस्तरीय संरक्षण स्थिति की सबसे व्यापक सूची है।

- भूदृश्यों, पारितंत्रों, स्पीशीजों एवं आनुवांशिक संसाधनों के संरक्षण को सुनिश्चित करना महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसके असफल होने पर मानव का अस्तित्व संकट में पड़ सकता है।

- संरक्षण रणनीति में निजस्थानिक (निजस्थानीय) एवं परस्थानिक (पर-स्थानीय) दृष्टिकोण शामिल हैं।

- पर्यावास का संरक्षण मुख्य निजस्थानिक दृष्टिकोण है। पर्यावास के संरक्षण के लिये संरक्षित एरिया नेटवर्क में राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभ्यारण, जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र, पवित्र वन या पवित्र गुफाएं सम्मिलित हैं।

- परस्थानिक संरक्षण वनस्पति उद्यान, चिड़ियाघर, जीन बैंक एवं बीज बैंक, जर्मप्लाज्म के क्रोयोप्रिजर्वेशन की स्थापना के द्वारा किया जाता है।

- जैव विविधता के संरक्षण हेतु जिन क्षेत्रों को संरक्षित किए जाने की तत्काल आवश्यकता है उन्हें जैवविविधता के हॉट स्पॉट कहा जाता है। विश्व स्तर पर जैवविविधता के पच्चीस हॉट स्पॉट की पहचान की गई है जिनमें से दो भारत में हैं।

- विश्व स्तर पर जैव विविधता के संरक्षण को बढ़ावा देने के लिये जैवविविधता पर सम्मेलन एक महत्त्वपूर्ण अन्तरराष्ट्रीय साधन है।

- IUCN तथा WWF जैवविविधता के संरक्षण से संबंधित प्रमुख अन्तरराष्ट्रीय संगठन हैं। राष्ट्रीय स्तर पर वन्य जीव संरक्षण अधिनियम (1972) तथा जैव विविधता अधिनियम (2002) तथा अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर CITES तथा जैवविविधता सम्मेलन जैवविविधता के व्यापार का नियमन करते हैं तथा इसके संरक्षण एवं सतत पोषणीय उपयोग को बढ़ावा देते हैं।

पाठान्त प्रश्न


1. जैव विविधता क्या है? हाल के वर्षों में यह क्यों महत्त्वपूर्ण हो गया है?
2. जैवविविधता के विभिन्न स्तरों को सूचीबद्ध कीजिए तथा समझाइए कि आनुवांशिक विविधता से क्या अभिप्राय है?
3. संरक्षण के विभिन्न निजस्थानिक तरीके कौन-कौन से हैं?
4. निम्नलिखित पर लघु टिप्पणी लिखिएः (क) क्रोयोप्रिजर्वेशन (ख) संरक्षित क्षेत्र (ग) जैवमण्डल आरक्षित क्षेत्र (घ) IUCN (ड.) जीन बैंक (च) जैवविविधता के हॉट स्पॉट (छ) जैवविविधता अधिनियम
5. जैवविविधता के ह्रास के प्रमुख कारणों का वर्णन कीजिए।
6. मुख्य पर्यावरणीय प्रवणता के साथ जैवविविधता का वितरण बताइए।
7. भारत में जैवविविधता संरक्षण के प्रयासों पर नोट लिखो।
कॉलम I के शब्दों का कॉलम II के शब्दों से मिलान कीजिए9. 1992 में रियो डि जेनेरो में आयोजित पृथ्वी सम्मेलन का क्या परिणाम निकला?
10. भारत में स्थानीय संवहनी पौधों का लगभग प्रतिशत क्या है?

पाठगत प्रश्नों के उत्तर


15.1
1-पृथ्वी पर पायी जाने वाली जीवधारियों की सभी किस्मों की कुल संख्या (सामूहिक रूप से) जैवविविधता का गठन करती है।
2. आनुवांशिक, स्पीशीज तथा पारिस्थितिकीय जैवविविधता
3. पश्चिमी घाट एवं पूर्वी हिमालय
4. एंजियोस्पर्म एवं आर्थ्रोपोड

15.2
1. पारिस्थितिकीय सेवाएँ, जैविक संसाधन, सौन्दर्य एवं सांस्कृतिक मूल्य।
2. परागण, मृदा का संरक्षण, जलवायु नियंत्रण। (कोई दो)
3. प्रदूषकों को कम करना, वायु के गैसीय घटकों का रख-रखाव, कचरे (अपशिष्टों) का अवक्रमण। (कोई दो)

15.3
1. हिमालय पार का क्षेत्र।
2. इसकी उष्णकटिबन्धीय स्थिति।
- परिवर्तनशील भौतिक लक्षण एवं जलवायु परिस्थितियाँ।
- तीन प्रमुख जैव भौगोलिक क्षेत्रों का मिलान।
3. उत्तर-पूर्व भारत।
4. भौगोलिक क्षेत्र में नई अथवा विदेशज स्पीशीजों के प्रवेश के कारण परिवर्तित जैव अन्योन्यक्रिया के द्वारा स्थानीय प्रजातियां विलुप्त हो जाती हैं।
5. कोर क्षेत्र, बफर क्षेत्र तथा संक्रमण क्षेत्र।
6. जैव विविधता का संरक्षण, आनुवांशिक संसाधनों के उपयोग से प्राप्त होने वाले लाभों का समान बँटवारा तथा जैवविविधता का सतत पोषणीय उपयोग।
7. इन्टरनेशनल यूनियन फॉर कन्जर्वेशन ऑफ नेचर एण्ड नेचुरल रिसोर्सेज।
8. 18,44

15.4
1. दो कार्यनीतियां - (i) निजस्थानिक; (ii) परस्थानिक
2. उत्तरांचल में जिम कार्बेट पार्क, कान्हा राष्ट्रीय उद्यान, बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान। (कोई दो)
3. इसमें कोर, बफर तथा संक्रमण क्षेत्र सम्मिलित हैं।
5. 1- संरक्षण 2- विकास
6. (i) राष्ट्रीय पादप आनुवांशिक संसाधन ब्यूरो, नई दिल्ली
(ii) राष्ट्रीय वनस्पति उद्यान
(iii) वन्य पादप एवं जन्तुओं की संकटापन्न प्रजातियों के व्यापार पर अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन
(iv) इन्टरनेशनल यूनियन फॉर कन्जर्वेशन ऑफ नेचर एण्ड नेचुरल रिसार्सेज
(v) जैविक विविधता पर सम्मेलन
(vi) राष्ट्रीय जैवविविधता प्राधिकरण

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