जल प्रदूषण के कारण और निवारण (Water Pollution : Causes and Remedies in Hindi)

Submitted by Hindi on Wed, 08/09/2017 - 13:08
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Source
भगीरथ - जनवरी-मार्च, 2009, केन्द्रीय जल आयोग, भारत


.हमारी धरती पर अथाह जलराशि विद्यमान है। ‘‘केलर’’ महोदय के अनुसार हमारी धरती पर विद्यमान सम्पूर्ण जलराशि 1386 मिलियन घन किलोमीटर है। यदि ग्लोब को समतल मानकर सम्पूर्ण जलराशि को इस पर फैला दिया जाय, तो यह 2718 मीटर गहरी जल की परत से ढक जायेगा। महासागरों में कुल जलराशि का 96.5 प्रतिशत (1338 मिलियन घन कि.मी.) एवं महाद्वीपों में मात्र 3.5 प्रतिशत (48 मिलियन घन कि.मी.) जल उपलब्ध है।

उपलब्ध जल संसाधनों का उपयोग मुख्य रूप से घरेलू कार्यों, नगरीय, औद्योगिक क्षेत्रों, ताप विद्युत उत्पादन, जल विद्युत उत्पादन, सिंचाई, पशुधन तथा अणु संयंत्रों आदि में किया जाता है। भारत में औसत रूप से 1900 करोड़ घन मीटर जल उपयोग के लिये उपलब्ध है। इस उपलब्ध जल का लगभग 86 प्रतिशत सतही नदियों, झीलों, सरोवरों एवं तालाबों का है। भूमिगत जल का पर्याप्त भाग सिंचाई एवं पीने तथा अन्य कार्यों के लिये किया जाता है।

आदि काल से ही मानव द्वारा जल का प्रदूषण किया जाता रहा है। किन्तु वर्तमान समय में तीव्र जनसंख्या वृद्धि व औद्योगीकरण के कारण विद्यमान जल को प्रदूषित करने की गति और तीव्र हो गयी है। मानव के विभिन्न क्रिया-कलापों के कारण जब जल के रासायनिक, भौतिक एवं जैविक गुणों में ह्रास होता है, तो इस प्रकार के जल को प्रदूषित जल कहा जाता है। अतः स्पष्ट है कि जब जल की भौतिक, रासायनिक अथवा जैविक संरचना में इस प्रकार का परिवर्तन हो जाता है कि वह जल किसी प्राणी की जीवित दशाओं के लिये हानिकारक एवं अवांछित हो जाता है तो वह जल ‘प्रदूषित जल’ कहलाता है।

 

 

इस प्रकार जल प्रदूषण तीन प्रकार का होता है-


1. भौतिक जल प्रदूषण - भौतिक जल प्रदूषण से जल की गन्ध, स्वाद एवं ऊष्मीय गुणों में परिवर्तन हो जाता है।
2. रासायनिक जल प्रदूषण - रासायनिक जल प्रदूषण, जल में विभिन्न उद्योगों एवं अन्य स्रोतों से मिलने वाले रासायनिक पदार्थों के कारण होता है।
3. जैविक जल प्रदूषण - जल में विभिन्न रोग जनक जीवों के प्रवेश के कारण प्रदूषित जल को जैविक जल प्रदूषण कहा जाता है।

जल प्रदूषण के कारण- जल प्रदूषण का सीधा सम्बन्ध जल के अतिशय उपयोग से है। नगरों में पर्याप्त मात्रा में जल का उपयोग किया जाता है एवं सीवरों तथा नालियों द्वारा अपशिष्ट जल को जलस्रोतों में गिराया जाता है। जलस्रोतों में मिलने वाला यह अपशिष्ट जल अनेक विषैले रसायनों एवं कार्बनिक पदार्थों से युक्त होता है, जिससे जलस्रोतों का स्वच्छ जल भी प्रदूषित हो जाता है। उद्योगों से निःसृत पदार्थ भी जल प्रदूषण का मुख्य कारण है। इसके अतिरिक्त कुछ मात्रा में प्राकृतिक कारणों से भी जल प्रदूषित होता है। उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि जल प्रदूषण के मुख्य दो कारक हैं-

1. जल प्रदूषण के प्राकृतिक स्रोत- प्राकृतिक रूप से जल का प्रदूषण जल में भूक्षरण, खनिज पदार्थ, पौधों की पत्तियों एवं ह्यूमस पदार्थ तथा प्राणियों के मल-मूत्र आदि मिलने के कारण होता है। यदि किसी भूमि में खनिज की मात्रा अधिक है और वहाँ पर जल एकत्रित हो रहा है, तो खनिज पदार्थ का जल द्वारा रासायनिक अपक्षय होता है, अर्थात वे खनिज पदार्थ उस जल में घुल जाते हैं, जिससे जल प्रदूषित हो जाता है, कुछ खनिज पदार्थ जैसे- आर्सेनिक, सीसा, कैडमियम, पारा आदि विषैले पदार्थ हैं, जो जल के साथ घुलकर जल को अतिविषाक्त बना देते हैं।

2. जल प्रदूषण के मानवीय स्रोत- मानव के विभिन्न गतिविधियों के फलस्वरूप निःसृत अपशिष्ट युक्त बहिर्स्रोतों के जल में मिलने से जल प्रदूषित होता है। ये अपशिष्ट एवं आशिष्ट युक्त बहिर्स्रोत निम्नांकित रूप में प्राप्त होते हैं।

1. घरेलू बहिःस्राव
2. वाहित मल
3. औद्योगिक बहिःस्राव
4. कृषि बहिःस्राव
5. ऊष्मीय या तापीय प्रदूषण

1. घरेलू बहिःस्राव- घरेलू अपशिष्टों से युक्त बहिःस्राव को मलिन जल कहा जाता है। विभिन्न दैनिक घरेलू कार्यों यथा खाना पकाने, स्नान करने, कपड़ा धोने एवं अन्य सफाई कार्यों में विभिन्न पदार्थों का उपयोग किया जाता है, जो अपशिष्ट पदार्थों के रूप में बहिःस्राव के साथ नालियों में बहा दिये जाते हैं, जो अन्ततः जल स्रोतों में जाकर गिरता है, इस प्रकार के बहिःस्राव में सड़े हुए फल एवं सब्जियाँ, रसोई घरों की चूल्हें की राख, विभिन्न प्रकार के कूड़ा करकट, कपड़ों के चिथड़े एवं अन्य प्रदूषणकारी अपशिष्ट पदार्थ होते हैं, जो येन केन प्रकारेण जलस्रोतों में मिलकर जल प्रदूषण का कारण बनते हैं।

2. वाहित मल- वाहित मल के अन्तर्गत मुख्य रूप से घरेलू एवं सार्वजनिक शौचालयों से निःसृत मानव मल को सम्मिलित किया जाता है। वाहित मल में कार्बनिक एवं अकार्बनिक दोनों प्रकार के पदार्थ होते हैं। ठोस मल का अधिकांश भाग कार्बनिक होता है, जिसमें मृतोपजीवी एवं कभी-कभी रोग कारक सूक्ष्मजीवी भी विद्यमान रहते हैं, कार्बनिक पदार्थ की अधिकता से विभिन्न प्रकार के सूक्ष्म जीव तथा बैक्टीरिया, प्रोटोजोआ, वायरस, कवक एवं शैवाल आदि तीव्र गति से वृद्धि करते हैं। इस प्रकार का दूषित वाहित मल जल बिना उपचार किये ही नालों से होता हुआ जलस्रोतों में मिलता है जो भयंकर जल प्रदूषण का कारण बनता है।

3. औद्योगिक बहिःस्राव- प्रायः प्रत्येक उद्योग में उत्पादन प्रक्रिया के पश्चात अनेक अनुपयोगी पदार्थ बचे रह जाते हैं, जिन्हें औद्योगिक अपशिष्ट पदार्थ कहा जाता है, इनमें से अधिकांश औद्योगिक अपशिष्टों या बहिःस्राव में मुख्य रूप से अनेक प्रकार के धात्विक तत्व व अनेक प्रकार के अम्ल, क्षार, लवण, वसा, तेल आदि विषैले रासायनिक पदार्थ विद्यमान रहते हैं। ये तत्व जल में मिलकर जल को विषैला बनाकर प्रदूषित कर देते हैं। लुग्दी एवं कागज उद्योग, चीनी उद्योग, वस्त्र उद्योग, चमड़ा उद्योग, शराब उद्योग, औषधि निर्माण उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग तथा रासायनिक उद्योगों से पर्याप्त मात्रा में अपशिष्ट पदार्थ निःसृत होते हैं, जिनका निस्तारण जलस्रोतों में ही किया जाता है, जिससे जल प्रदूषित होता है।

4. कृषि बहिःस्राव- वर्तमान समय की कृषि प्रणाली नवाचारों पर आधारित होती जा रही है, अर्थात उत्पादन की अधिक मात्रा प्राप्त करने के लिये विभिन्न प्रकार के रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों, पेस्टीसाइड इत्यादि का प्रयोग किया जा रहा है, इस प्रकार की रासायनिक कृषि के कारण जहाँ एक ओर कृषि पदार्थों का उत्पादन बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर वातावरण प्रदूषित हो रहा है, जिसके कारण भूक्षरण की मात्रा बढ़ रही है। रासायनिक उर्वरक के प्रयोग के कारण भूक्षरण के साथ ये रसायन मिल जाते हैं तथा धीरे-धीरे जल के साथ मिलकर व बहकर नदियों, तालाबों व पोखरों में पहुँच जाते हैं। नाइट्रोजन युक्त उर्वरक का नाइट्रोजन जब जल (विशेषतया स्थिर जल) में पहुँच जाता है, तो जल में ‘ड्यूट्रोफिकेशन’ की प्रक्रिया तीव्र हो जाती है। फलतः जल में शैवाल की तीव्रता से वृद्धि होती है और शैवाल के मृत होने से उनके अपघटक बैक्टीरिया भारी संख्या में उत्पन्न होते हैं। इनके द्वारा जैविक पदार्थों के अपघटन की प्रक्रिया में जल में ऑक्सीजन की मात्रा में कमी होती जाती है, जिसके कारण जलीय जीवों की संख्या में कमी होने लगती है और जल प्रदूषित होने लगता है।

5. ऊष्मीय या तापीय प्रदूषण - उद्योगों के अतिरिक्त वाष्प या परमाणु शक्ति चालित विद्युत उत्पादक संयंत्रों द्वारा भी ऊष्मीय प्रदूषण होता है। ऊर्जा संयंत्रों में द्रवणियों के शीतलीकरण के लिये पर्याप्त प्राकृतिक जल का उपयोग किया जाता है, विभिन्न उत्पादक संयंत्रों में विभिन्न रियेक्टरों के अतितापन के निवारण के लिये नदी एवं तालाबों के जल का उपयोग किया जाता है। शीतलन की प्रक्रिया के फलस्वरूप उष्ण हुआ यह जल पुनः जलस्रोतों में मिलाया जाता है। इस प्रकार के उष्ण जल से जलस्रोतों के जल के ताप में हानिकारक वृद्धि हो जाती है। ऊष्मीय प्रदूषण का विशेष प्रभाव जल जीवों पर पड़ता है। बड़े जीव 35 डिग्री से.ग्रे. से 40 डिग्री से.ग्रे. से अधिक तापमान सहन नहीं कर पाते हैं, जल के तापमान में वृद्धि हो जाने से ऑक्सीजन की घुलनशीलता में भी कमी आ जाती है, जिससे जलीय जीवों की संख्या में कमी आने लगती है और इस प्रकार जल प्रदूषित होता रहता है।

जल प्रदूषण ज्ञात करने के मानदण्ड- किसी भी जल के पहचान के लिये कुछ ऐसे मानदण्ड निर्धारित किये गये हैं, जिसकी कमी या अधिकता होने पर जल को प्रदूषित माना जा सकता है। इन मानदण्डों को तीन उपवर्गों में विभक्त किया जा सकता है-

भौतिक मानदण्ड- इसके अन्तर्गत तापमान, रंग, प्रकाशवेधता, संवहन एवं कुल ठोस पदार्थ आते हैं।

रासायनिक मानदण्ड- इसके अन्तर्गत घुला हुआ ऑक्सीजन, बी.ओ.डी. (बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमाण्ड), सी.ओ.डी. (केमिकल ऑक्सीजन डिमाण्ड), पी.एच. मान, क्षारीय, अम्लीयता, धातुयें, मरकरी, सीसा, क्रोमियम एवं रेडियोधर्मी पदार्थ आते हैं।

जैविक मानदण्ड - इसके अन्तर्गत बैक्टीरिया, कॉलिफार्म, एलगी एवं वायरस आदि आते हैं।

उपरोक्त पदार्थों (प्रदूषकों) की जल में एक निश्चित सीमा होती है। इस सीमा से अधिक मात्रा बढ़ने पर जल प्रदूषित होने लगता है।

जल प्रदूषण से उत्पन्न समस्यायें - जल प्रदूषण का प्रभाव जलीय जीवन एवं मनुष्य दोनों पर पड़ता है, जल प्रदूषण का भयंकर परिणाम किसी भी राष्ट्र के स्वास्थ्य के लिये एक गम्भीर खतरा है। एक अनुमान के अनुसार भारत में होने वाली दो तिहाई बीमारियाँ प्रदूषित पानी से होती हैं। जल प्रदूषण का प्रभाव मानव स्वास्थ्य पर जल द्वारा जल के सम्पर्क से एवं जल में उपस्थित रासायनिक पदार्थों द्वारा पड़ता है। पेय जल के साथ रोग वाहक बैक्टीरिया, वायरस, प्रोटोजोआ, एवं कृमि मानव शरीर में पहुँच जाते हैं और हैजा, टाइफाइड, पेचिश, पीलिया, अतिसार, एनकायलो, नारू, लेप्टोस्पाइरासिस जैसे भयंकर रोग उत्पन्न हो जाते हैं।

जल प्रदूषण का परिणाम समुद्री जीवों पर भी पड़ता है। नदियों द्वारा ले जाये गये प्रदूषित जल के कारण अधिकांश मात्रा में मछलियाँ मर जाती हैं तथा साथ ही साथ जल में उपस्थित प्रदूषक तत्व सागर के नितल पर स्थित अन्य वनस्पतियों व जीवों को भी प्रभावित करते हैं। जल प्रदूषण से पारिस्थितिकी संतुलन प्रभावित हो रहा है एवं साथ ही साथ इससे सम्बन्धित करोड़ों रोजगार एवं उपभोक्ता भी प्रभावित हो रहे हैं।

रासायनिक कृृषि कार्य के चलते कृषि भूमि का क्षरण अधिक व उर्वरता में कमी हो रही है। विभिन्न नगरों में स्थित रंगाई व छपाई उद्योगों के निःसृत दूषित जल नगरों के बाहर स्थित क्षेत्रों अर्थात ग्रामीण क्षेत्रों के कृषि भूमि पर फैल रहा है, जिसके फलस्वरूप बंजर भूमि का विस्तार हो रहा है, जो कि रेगिस्तानी क्षेत्र (मरुस्थल क्षेत्र) बढ़ाने में सहयोग कर रहा है।

जल प्रदूषण से बचाव- आज सम्पूर्ण विश्व जल के प्रदूषण से त्रस्त है, वर्तमान परिप्रेक्ष्य में हालाँकि जल प्रदूषण को पूर्णतया समाप्त नहीं किया जा सकता, किन्तु इस पर हम अंकुश लगा सकते हैं, जल प्रदूषण से बचाव के लिये सरकारी तंत्र, स्वयंसेवी संस्थाओं एवं व्यक्तिगत रूप से निम्न प्रक्रियाओं को व्यवहार में लाना होगा-

1. घरों से निकलने वाले मलिन जल एवं वाहित मल को एकत्र करके संशोधन संयंत्रों में पूर्ण रूप से शोधन के उपरान्त जलस्रोत में विसर्जित किया जाय।
2. तालाब, पोखरों इत्यादि के चारों ओर दीवार बनाकर विभिन्न प्रकार की गंदगियों को रोका जाय तथा साथ ही साथ उनमें नहाने, कपड़े धोने आदि पर भी रोकथाम करनी चाहिये।
3. जल स्रोतों के निकट स्थापित उद्योगों के निःसृत जल का संशोधन कर उन्हें पुनः जलस्रोतों में विसर्जित किया जाय तथा भविष्य में जलस्रोतों के निकट उद्योगों की स्थापना पर प्रतिबन्ध लगाया जाय।
4. समय-समय पर प्रदूषित जलाशयों के आधार पर एकत्रित अनावश्यक गन्दगी व कीचड़ों को बाहर निकाला जाना चाहिये।
5. सबसे प्रमुख जनसाधारण के मध्य जल के प्रदूषण के कारणों, दुष्प्रभावों व रोकथाम की विधियों के विषय में जागरूकता बढ़ानी होगी, क्योंकि सर्वाधिक प्रदूषण मानव द्वारा होता है, अतः मनुष्य वर्ग में इस प्रकार का संदेश प्रेषित कर कुछ हद तक जल के प्रदूषण को नियन्त्रित किया जा सकेगा।

वर्तमान में सरकारी तंत्रों व स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा उपर्युक्त विधियों का पालन तो किया जा रहा है, लेकिन केवल औपचारिकताओं का ही अधिक निर्वाह हो रहा है, ऐसे में आने वाले समय को दृष्टि में रखते हुए इन संस्थाओं को चाहिये कि वे अपनी क्रियाविधि में पारदर्शिता लायें एवं अनुशासन को कायम रखें ताकि भविष्य में जल प्रदूषण को रोका जा सके।

 

 

 

 

लेखक परिचय


डॉ. अखिलेश्वर कुमार द्विवेदी
प्रवक्ता, भूगोल विभाग, श्री अ.प्र.ब. राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, अगस्त्यमुनि, रुद्रप्रयाग (उत्तराखण्ड) पिन-246421

 

 

 

 

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