जल उपयोग दक्षता बढ़ाने हेतु सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली

Submitted by Hindi on Sun, 11/26/2017 - 11:50
Source
कुरुक्षेत्र, नवम्बर 2017

सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली सामान्य रूप से बागवानी फसलों में उर्वरक व पानी देने की सर्वोत्तम एवं आधुनिक विधि है। सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली के द्वारा कम पानी से अधिक क्षेत्र की सिंचाई की जा सकती है। इस प्रणाली में पानी को पाइप लाइन के द्वारा स्रोत से खेत तक पूर्व-निर्धारित मात्रा में पहुँचाया जाता है। इससे एक तरफ तो जल की बर्बादी को रोका जा सकता है, तो दूसरी तरफ यह जल उपयोग दक्षता बढ़ाने में सहायक है। सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली अपनाकर 30-37 प्रतिशत जल की बचत की जा सकती है। साथ ही इससे फसलों की गुणवत्ता और उत्पादकता में भी सुधार होता है। सरकार भी ‘प्रति बूँद अधिक फसल’ के मिशन के अन्तर्गत फव्वारा व टपक सिंचाई पद्धति को बढ़ावा दे रही है।

सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को आम जनता, किसानों व प्रसारकृमियों में और अधिक लोकप्रिय बनाने की जरूरत है, ताकि संरक्षणपूर्ण प्रौद्योगिकियों के प्रयोग से बेहतर जल प्रबन्धन एवं जल उपयोग दक्षता को अधिक लाभप्रद बनाया जा सके। कम पानी वाले क्षेत्रों में ड्रिप सिंचाई प्रणाली अपनाई जानी चाहिए।

भारत केवल 4 प्रतिशत जल संसाधनों के साथ दुनिया की 16 प्रतिशत आबादी को खाद्य व पोषण सुरक्षा प्रदान करता है। आने वाले समय में बढ़ती जनसंख्या, शहरीकरण और औद्योगिकीकरण के कारण कृषि के लिये पानी की उपलब्धता काफी कम हो जाएगी। इस प्रकार बढ़ती आबादी के खाद्य व पोषण के लिये पर्याप्त खाद्यान्न उत्पादन करना हमारे देश के प्रबन्धकों एवं शोधकर्ताओं के लिये एक चुनौतीपूर्ण लक्ष्य होगा। दुनिया के लगभग सभी देशों में तेजी से बढ़ते औद्योगिकीकरण एवं जनसंख्या वृद्धि के कारण पानी की आपूर्ति फसल उत्पादन हेतु एक प्रमुख समस्या बनती जा रही है। इस सम्बन्ध में सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो सकती है। सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली सामान्य रूप से बागवानी फसलों में उर्वरक व पानी देने की सर्वोत्तम एवं आधुनिक विधि है। सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली के द्वारा कम पानी से अधिक क्षेत्र की सिंचाई की जा सकती है। इस प्रणाली में पानी को पाइप लाइन के द्वारा स्रोत से खेत तक पूर्व निर्धारित मात्रा में पहुँचाया जाता है। इससे एक तरफ तो जल की बर्बादी को रोका जा सकता है, तो दूसरी तरफ यह जल उपयोग दक्षता बढ़ाने में सहायक है।

सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली अपनाकर 30-37 प्रतिशत जल की बचत की जा सकती है। साथ ही इससे फसलों की गुणवत्ता और उत्पादकता में भी सुधार होता है। सरकार भी ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ के मिशन के अन्तर्गत फव्वारा व टपक सिंचाई पद्धति को बढ़ावा दे रही है। फव्वारा सिंचाई से सतही सिंचाई की अपेक्षा 10 से 35 प्रतिशत जल की बचत व 10-30 प्रतिशत तक फसल उत्पादन में वृद्धि होती है। टपक सिंचाई विधि से पेड़-पौधों का जड़ क्षेत्र नम रहता है जिससे लवण की सान्द्रता अधिक नहीं होती है। खेतों में सिंचाई के लिये ज्यादातर कच्ची नालियों का प्रयोग किया जाता है जिससे लगभग 30-40 प्रतिशत जल रिसाव के कारण बेकार चला जाता है। साथ ही खरपतवारों व जलमग्नता की समस्या पैदा होती है। बदलते परिदृश्य में किसानों व ग्रामीणों को खेत का पानी खेत में और गाँव का पानी गाँव में संरक्षित करने का संकल्प लेना चाहिए। गत कई वर्षों से फसलोत्पादन में जल उपयोग दक्षता बढ़ाने के लिये सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली का प्रयोग किया जा रहा है। केन्द्र सरकार ने ‘हर खेत को पानी’ के लक्ष्य के साथ प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना की शुरुआत की है। इसके तहत देश के हर जिले में समस्त खेतों तक सिंचाई के लिये पानी पहुँचाने की योजना है। इस योजना को लागू करने की जिम्मेदारी कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के साथ-साथ ग्रामीण विकास मंत्रालय और जल संसाधन मंत्रालय को दी गई है।

बारानी क्षेत्र और कृषि उत्पादन


जल संरक्षण आज सबसे बड़ी चुनौती है क्योंकि उपलब्ध जल का 80 प्रतिशत केवल सिंचाई में ही खर्च हो जाता है। इसे देखते हुए सूक्ष्म सिंचाई तकनीक को प्रचलन में लाया गया है। पिछले कई दशकों से खेती-बाड़ी, विकास कार्यों व अन्य उपयोगों में जल पर हमारी निर्भरता बढ़ती जा रही है। इस कारण जल के अन्धाधुन्ध दोहन से जलस्रोतों की मात्रा और गुणवत्ता निरन्तर तेजी से घटती जा रही है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपनी वार्षिक वर्ल्ड वॉटर डेवलपमेंट रिपोर्ट में कहा है कि पानी के उपयोग के तरीकों और प्रबन्धन में कमियों के कारण 2030 तक दुनिया को जल संकट का सामना करना पड़ सकता है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के ‘हर बूँद ज्यादा फसल’ के नारे के महत्व को ध्यान में रखते हुए जल संरक्षण और उसके सही इस्तेमाल के लिये किसानों को प्रोत्साहित करना चाहिए।

हमारे देश की कुल 14.3 करोड़ हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि का लगभग 55 प्रतिशत वर्षा-आधारित तथा बारानी खेती के अन्तर्गत आता है। देश में लगभग 95 प्रतिशत ज्वार व बाजरा तथा 90 प्रतिशत मोटे अनाजों का उत्पादन वर्षा-आधारित क्षेत्रों से ही आता है। इसके अलावा 91 प्रतिशत दालों और 85 प्रतिशत तिलहनों की पैदावार भी बारानी क्षेत्रों में होती है। परन्तु दुर्भाग्यवश इन बरानी क्षेत्रों से कुल उत्पादन का मात्र 45 प्रतिशत ही प्राप्त होता है। इसका प्रमुख कारण वर्षा का असमय, अल्पवृष्टि या अतिवृष्टि है। साथ ही इन क्षेत्रों में वर्षाजल का सही प्रबन्ध न होना है। हमारे देश में औसत वर्षा 1190 मिलीमीटर है। देश में अधिकांश फसलें वर्षा के भरोसे होती हैं। इसलिये किसान भाई बड़ी बेसब्री से मानसून का इन्तजार करते हैं। देश में वर्षा-आधारित खेती करने योग्य पर्याप्त क्षेत्रफल है। यह क्षेत्र शुष्क खेती या बारानी खेती कहलाता है जो कुल खाद्यान्न उत्पादन में लगभग 44 प्रतिशत योगदान करता है। इसके साथ-साथ 40 प्रतिशत मानव एवं 60 प्रतिशत पशुपालन में सहयोग करता है। इन क्षेत्रों में आधुनिक प्रौद्योगिकियों मुख्यतः सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली को अपनाकर पौष्टिक व स्वास्थ्यवर्धक खाद्यान्न उत्पन्न किया जा सकता है।

इन क्षेत्रों में थोड़ी वर्षा और पर्याप्त प्राकृतिक संसाधन प्रकृति की ओर से दिया गया निःशुल्क उपहार है। सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली द्वारा बारानी क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ाने की काफी सम्भावनाएँ हैं। बारानी क्षेत्रों में साधारणतः वर्षा का अभाव तथा अत्यधिक वाष्पोत्सर्जन दो सबसे बड़ी समस्या हैं। इन भूमियों की उपजाऊ शक्ति में कमी विशेषतौर पर मृदाक्षरण के कारण होती है। इसीलिये इन भूमियों में नमी धारण करने की क्षमता भी कम होती है। अतः इस क्षेत्रों में सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली द्वारा समुचित रूप से मृदा में नमी बनाए रखना नितान्त आवश्यक है। वर्षा के पानी का संरक्षण और उसे जमा करना बारानी खेती की सफलता का मूल आधार हैं। इन क्षेत्रों में नमी संरक्षण की तकनीकें जैसे फव्वारा सिंचाई, टपक सिंचाई और उन्नत सस्य विधियाँ अपनाकर उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है। एक अनुमान के अनुसार यदि इन क्षेत्रों में फव्वारा सिंचाई व टपक सिंचाई तकनीकें अपनाई जाएँ तो हम आजीविका सुरक्षा के साथ-साथ खाद्य एवं पौष्टिक सुरक्षा में भी सफल हो जाएँगे। इन क्षेत्रों की अधिकांश भूमियाँ छोटे किसानों के पास हैं जो समाज के अनुसूचित जाति, जनजाति या आर्थिक रूप से पिछड़े व उपेक्षित वर्गों से ताल्लुक रखते हैं। इन क्षेत्रों में फसलोत्पादन की आधुनिक प्रौद्योगिकियों को अपनाकर गरीबी उन्मूलन के साथ-साथ समाज में समानता की भावना भी पैदा की जा सकती है।

सरकारी प्रयास व योजनाएँ


कृषि को बढ़ावा देने और किसानों की सुविधा के लिये भारत सरकार अनेक योजनाएँ चला रही है। इन योजनाओं के माध्यम से किसानों को आर्थिक व तकनीकी सहायता प्रदान की जाती है। कृषि व किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा किसानों को सूक्ष्म सिंचाई उपकरणों पर सब्सिडी मिलने से कृषि क्षेत्र में युवाओं का रुझान भी बढ़ा है। आज सूक्ष्म सिंचाई पर सरकारी सहायता पाकर अधिक से अधिक किसान खेती से अच्छा मुनाफा प्राप्त कर रहे हैं। फव्वारा सिंचाई व टपक सिंचाई की स्थापना हेतु सरकार सब्सिडी भी देती। केन्द्र सरकार के अलावा राज्य सरकारें भी अपने किसानों को सब्सिडी देती है। यद्यपि केन्द्र व राज्य सरकारों द्वारा कुल खर्च पर दी जा रही सब्सिडी 90 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। यदि किसान सूक्ष्म सिंचाई सेट ऋण लेकर लगवाना चाहता है तो सब्सिडी का चेक सीधे ऋणदाता बैंक के नाम जाता है। प्रत्येक किसान के खेत को सिंचाई का पानी पहुँचाने के उद्देश्य से व सूखे की समस्या को स्थाई रूप से दूर करने के लिये प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (पीएमकेएसवाई) की शुरुआत की गई है।

इस योजना को वित्तीय मंत्रिमंडलीय समिति ने एक जुलाई, 2015 को 5 वर्ष (2015-16 से 2019-20) के लिये 50,000 करोड़ रुपये की राशि अनुमोदित की है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना द्वारा देश की कृषि भूमि को सिंचाई का संरक्षित स्रोत उपलब्ध कराना सुनिश्चित करना है ताकि पानी की प्रत्येक बूँद से अधिक-से-अधिक कृषि उत्पादन लिया जा सके। साथ ही सिंचित क्षेत्र बढ़ाकर ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक समृद्धि लाई जा सके। पीएमकेएसवाई की नीति के अन्तर्गत जलस्रोतों, वितरण प्रणाली, खेत-स्तर पर बेहतर नीति का उपयोग और नई तकनीकी पर आधारित कृषि प्रसार एवं सूचना का व्यापक रूप से सम्पूर्ण सिंचाई आपूर्ति करने के लिये जिला व राज्य-स्तर पर प्रयोग करना है। बूँद-बूँद सिंचाई प्रणाली के अन्तर्गत गैर डीपीएपी/डीडीपी क्षेत्रों के लघु एवं सीमान्त किसानों के लिये कुल स्थापना लागत का 45 प्रतिशत एवं अन्य किसानों के लिये 35 प्रतिशत की सहायता दी जाती है। डीपीएपी/डीडीपी/उत्तर-पूर्वी एवं हिमालयी राज्यों के अन्तर्गत लघु एवं सीमान्त किसानों के लिये कुल स्थापना लागत का 60 प्रतिशत एवं अन्य किसानों के लिये 45 प्रतिशत की सहायता राशि दी जाएगी। अधिक अन्तराल वाली फसलों के लिये मानक स्थापना लागत का 23,500 रुपये से लेकर 58,400 रुपये प्रति हेक्टेयर और कम अन्तराल वाली फसलों के लिये 85,400 रुपये से 1,00,000 प्रति हेक्टेयर होगी।

अधिकतम सहायता प्रति लाभार्थी/समूह 5 हेक्टेयर तक सीमित होगी। छोटे स्प्रिंकलर के लिये मानक स्थापना लागत 58,900 रुपये प्रति हेक्टेयर, मिनी स्प्रिंकलर के लिये 85,200 रुपये प्रति हेक्टेयर, पोर्टेबल स्प्रिंकलर के लिये 19,000 रुपये प्रति हेक्टेयर होगी। उपरोक्त योजनाओं के बारे में विस्तृत जानकारी के लिये जिला कृषि अधिकारी/जिला मृदा संरक्षण अधिकारी/परियोजना निदेशक (आत्मा)/जिला बागवानी अधिकारी से सम्पर्क किया जा सकता है। इस योजना को मिशन मोड में लागू किया जाना है। सिंचाई के अधीन 28.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र लाया जाएगा जिसके लिये केन्द्रीय बजट 2016-17 के लिये 5717 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है। इससे सूक्ष्म सिंचाई तथा जल संरक्षण के कार्य किए जाएँगे। सहकारी समितियाँ, स्वयंसहायता समूह और हितधारक कम्पनियाँ भी उपरोक्त योजनाओं का लाभ ले सकती हैं। सहायता लेने के लिये टपक सिंचाई सेट पंजीकृत डीलर से ही खरीदा जाना चाहिए। टपक सिंचाई का सेट लगवाने पर होने वाला खर्च पानी के मुख्य स्रोत की खेत से दूरी और खेत में पौधों के बीच खाली छूटे स्थान पर निर्भर करता है।

सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली


बदलते परिदृश्य में सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली को जल उपयोग दक्षता बढ़ाने वाली तकनीक के रूप में देखा जा रहा है। सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली एक उन्नत विधि है जिसके प्रयोग से सिंचाई जल की पर्याप्त बचत की जा सकती है। इसमें मुख्य रूप से दो विधियाँ- फव्वारा सिंचाई व टपक सिंचाई अधिक प्रचलित हैं। टपक सिंचाई को बूँद-बूँद सिंचाई या ड्रिप सिंचाई के नाम से भी जाना जाता है।

फव्वारा सिंचाई पद्धति


फव्वारा सिंचाई को स्प्रिंकलर सिंचाई के नाम से भी जाना जाता है। फव्वारा सिंचाई एक ऐसी पद्धति है, जिसमें पानी का हवा में छिड़काव किया जाता है जो कृत्रिम वर्षा का एक रूप है। पानी का छिड़काव दबाव द्वारा छोटी नोजल से प्राप्त होता है। इसमें न तो कहीं पर पानी का जमाव और न बहाव होता है। साथ ही बीजों का अंकुरण भी जल्दी होता है। फव्वारा सिंचाई विधि में पानी महीन बूँदों में बदलकर वर्षा की फुहार के समान पौधों के ऊपर गिरता है। स्प्रिंकलर को फसलों के अनुसार उचित दूरी पर लगाकर पम्प की सहायता से चलाते हैं जिससे पानी तेज बहाव के साथ निकलता है। स्प्रिंकलर में लगी नोजल पानी को फुहार के रूप में बाहर फेंकती है। स्प्रिंकलर हमेशा घूमता रहता है जिससे उसके क्षेत्र में आने वाली फसलों की सिंचाई की जा सकती है। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में फव्वारा सिंचाई विधि बहुत ही प्रचलित है जिसके द्वारा पानी की लगभग 30-50 प्रतिशत तक बचत की जा सकती है। वर्तमान में लगभग 30 लाख हेक्टेयर भूमि में फव्वारा सिंचाई का प्रयोग हो रहा है।

सामान्यतः फव्वारा सिंचाई सूखाग्रस्त, बलुई मृदा, ऊँची-नीची जमीन तथा पानी की कमी वाले क्षेत्रों के लिये उपयोगी है। इस विधि द्वारा गेहूँ, चना, मूँगफली, तम्बाकू, कपास व अन्य अनाज वाली फसलों में आसानी से सिंचाई की जा सकती है। इसके अलावा घास के मैदानों, पार्कों व सजावटी पौधों में भी फव्वारा विधि द्वारा सिंचाई की जा सकती है। स्प्रिंकलर को खेत में इधर-उधर भी ले जाया जा सकता है। शुरुआती दौर में केवल चाय, कॉफी, सौंफ व ढालू क्षेत्रों में उगाई गई फसलों में पूरक सिंचाई के रूप में फव्वारा विधि का प्रयोग किया जाता था। वर्तमान में अनियमित वर्षा वाले क्षेत्रों व सूखाग्रस्त इलाकों में इस विधि का बहुतायत में प्रयोग किया जा रहा है। स्प्रिंकलर सिंचाई विधि में पहले एल्युमिनियम पाइपों का ज्यादा प्रयोग होता था। परन्तु आजकल अधिक मजबूती व कम दाब हानि के कारण एचडीईपी. व पीवीसी पाइपों का प्रयोग भी किया जा रहा है।

 

सारणी 1 फव्वारा सिंचाई प्रणाली के अन्तर्गत पानी की बचत एवं पैदावार में बढ़ोत्तरी

क्र.सं.

फसल का नाम

पानी की बचत (प्रतिशत में)

पैदावार वृद्धि (प्रतिशत में)

1.

गेहूँ

35

24

2.

जौ

56

16

3.

बाजरा

56

19

4.

कपास

36

50

5.

चना

69

57

6.

ज्वार

55

34

7.

सूर्यमुखी

33

20

 

फव्वारा सिंचाई विधि के लाभ


1. इस विधि में सतही सिंचाई विधियों की अपेक्षा जल प्रबन्धन आसान होता है।
2. फव्वारा सिंचाई विधि में लगभग 10 प्रतिशत अधिक क्षेत्रफल फसल उत्पादन हेतु उपलब्ध होता है क्योंकि इस विधि में नालियाँ बनाने की आवश्यकता नहीं पड़ती है।
3. फव्वारा सिंचाई विधि में दिये गए जल का लगभग 80-90 प्रतिशत भाग पौधों द्वारा ग्रहण कर लिया जाता है जबकि पारम्परिक विधि में सिर्फ 30 प्रतिशत पानी का ही उपयोग हो पाता है।
4. इस विधि में जमीन को समतल करने की जरूरत नहीं पड़ती है। ऊँची-नीची और ढलान वाली मृदाओं में भी आसानी से खेती की जा सकती है।
5. फव्वारा सिंचाई विधि में खेत की उचित समय पर जुताई और फसल की बुवाई का कार्य किया जा सकता है।
6. फसलों में कीटों व बीमारियों का कम प्रकोप होता है। क्योंकि फव्वारा सिंचाई प्रणाली के द्वारा कीटनाशी व रोगनाशी दवाइयों का छिड़काव बेहतर ढंग से किया जा सकता है।
7. इस विधि द्वारा फसलों की पोषक तत्व सम्बन्धित आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये घुलनशील उर्वरकों का भी प्रयोग किया जा सकता है।

फव्वारा सिंचाई में बाधाएँ


1. हवा की गति तेज होने के कारण पानी का वितरण समान नहीं हो पाता है। चिकनी मिट्टी और गर्म हवा वाले क्षेत्रों में इस प्रणाली से सिंचाई नहीं की जा सकती है।
2. इस विधि के सही उपयोग के लिये लगातार जलापूर्ति की आवश्यकता होती है। साथ ही अधिक ऊर्जा की जरूरत होती है। पानी साफ-सुथरा, रेत व कंकड़ रहित व खारा नहीं होना चाहिए।

ड्रिप सिंचाई पद्धति


टपक या ड्रिप सिंचाई एक ऐसी पद्धति है, जिसमें प्लास्टिक के पाइप द्वारा पौधे के तने के चारों ओर भूमि पर या जड़ विकास क्षेत्र में ड्रिप की सहायता से बूँद-बूँद कर पानी दिया जाता है जिससे पानी की प्रत्येक बूँद पौधों के उपयोग में आ सके। इसमें 1.2-2.0 सेंटीमीटर मोटाई की लम्बवत पाइपों के साथ पानी निकालने की उपयुक्त युक्ति लगी होती है जिसको ड्रिपर कहते हैं। यह पौधों के जड़ क्षेत्र के पास लगी होती है। इसमें मुख्य पाइप के समानान्तर उप-मुख्य पाइप बिछाते हैं एवं उसी में ड्रिपर लगा देते हैं। पानी के लिये एक प्लास्टिक या सीमेंट का बना मुख्य टैंक होता है जिससे प्लास्टिक का मोटा मुख्य पाइप जुड़ा होता है। इसी में पानी खींचने की मोटर लगी होती है जो पानी को ड्रिप लाइन में दबाव से पहुँचाती है।

 

सारिणी - 2 सिंचाई की विभिन्न विधियों/प्रणालियों में जलदक्षता

क्र.सं.

सिंचाई प्रणाली

जल दक्षता प्रतिशत में

1.

बॉर्डर

30

2.

कूंड

33

3.

क्यारी

35

4.

ड्रिप

98

5.

फव्वारा

50

 

ड्रिप सिंचाई पद्धति को टपक सिंचाई को टपक सिंचाई या बूँद-बूँद सिंचाई के नाम से भी जाना जाता है। ड्रिप सिंचाई प्रणाली का विकास 1960 के दशक के आरम्भ में इजराइल तथा 1960 के दशक के अन्त में ऑस्ट्रेलिया व उत्तरी अमेरिका में हुआ। इस समय अमेरिका में ड्रिप सिंचाई प्रणाली के अन्तर्गत सर्वाधिक क्षेत्र लगभग 10 लाख हेक्टेयर है। इसके बाद भारत, स्पेन, इजराइल का स्थान है। ड्रिप सिंचाई पद्धति में जल को पाइप लाइन तंत्रों के द्वारा पौधों के जड़ क्षेत्र के आस-पास आवश्यकतानुसार दिया जाता है। ड्रिप सिंचाई के तहत पानी को पाइप नेटवर्क के माध्यम से सीधे पौधों के जड़ क्षेत्र में सतह या उपसतह पर ड्रिपर्स के माध्यम से दिया जाता है। इस प्रणाली में बूँद-बूँद द्वारा फसलों व बागवानी पौधों की सिंचाई की जाती है। टपक सिंचाई द्वारा 50-60 प्रतिशत सिंचाई जल की बचत, फसल उत्पादन में वृद्धि, खरपतवारों के प्रकोप में कमी और फसल उत्पाद की गुणवत्ता में भी सुधार होता है। इस विधि से उर्वरकों का सिंचाई के साथ प्रयोग करना भी सम्भव है। इससे उर्वरक उपयोग दक्षता तो बढ़ती ही है। साथ ही 30-40 प्रतिशत उर्वरक की भी बचत की जा सकती है। वर्तमान में देश में इसका उपयोग लगभग 5 लाख हेक्टेयर भूमि पर हो रहा है। इस आधुनिक सिंचाई प्रौद्योगिकी की तरफ देश के किसानों का रुझान बढ़ता जा रहा है। प्लास्टिक से बने पाइप सिंचाई के खेतों या बागों में सिंचाई के लिये व्यावहारिक दृष्टि से उत्तम होते हैं।

अनेक अनुसन्धान केन्द्रों पर किये गए अध्ययनों से गन्ना, कपास, केला, टमाटर, फूलगोभी, बैंगन, करेला, मिर्च आदि फसलों में ड्रिप सिंचाई से अन्य प्रचलित सिंचाई विधि की अपेक्षा उपज वृद्धि के साथ-साथ पानी की भी बचत दर्ज की गई। विभिन्न प्रयोगों में धान-गेहूँ फसलचक्र में कुल 9,750 घन मीटर पानी प्रति हेक्टेयर के लिये आवश्यक है जबकि टपक सिंचाई प्रणाली से 8,840 घन मीटर पानी प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होता है। इस प्रकार धान-गेहूँ फसल चक्र में पानी की बचत होती है। यह विधि मृदा के प्रकार, खेत के ढाल, जलस्रोत और किसान की दक्षता के अनुसार अधिकांश फसलों के लिये प्रयोग में लाई जा सकती है। फसलों की पैदावार बढ़ने के साथ-साथ इस विधि से फसल उत्पाद गुणवत्ता, कीटनाशियों एवं उर्वरकों का दक्ष उपयोग, खरपतवारों का कम प्रकोप एवं सिंचाई जल की बचत सुनिश्चित की जा सकती है। आजकल ड्रिप सिंचाई प्रणाली पूरे विश्व में लोकप्रिय होती जा रही है। सीमित जल संसाधनों और दिनों-दिन बढ़ती जल माँग और भूजल प्रदूषण की समस्या को कम करने के लिये ड्रिप सिंचाई तकनीक बहुत लाभदायक सिद्ध हो रही है। जिन क्षेत्रों में ऊँची-नीची भूमि को समतल कर पाना कठिन या असम्भव होता है, उन क्षेत्रों में टपक सिंचाई प्रणाली द्वारा व्यावसायिक फसलों को आसानी से उगाया जा सकता है। सिंचाई की इस विधि का प्रयोग कर 30-40 प्रतिशत तक उर्वरकों की बचत, 70 प्रतिशत तक जल की बचत के साथ उपज में 100 प्रतिशत तक वृद्धि की जा सकती है। इसके अलावा ऊर्जा की खपत में भी कमी होती है।

भविष्य में टपक सिंचाई तकनीक सिंचाई जल की बढ़ती हुई आवश्यकता की पूर्ति करने हेतु एक सशक्त साधन है। टपक सिंचाई प्रणाली को मुख्य रूप से बागवानी फसलों में अधिक प्रभावी पाया गया है जिसमें सिंचाई की जल उपयोग दक्षता 95 प्रतिशत तक देखी गई है। बदलते परिवेश में भारत सरकार के प्रयासों से टपक सिंचाई तकनीक किसानों के बीच काफी लोकप्रिय होती जा रही है। टपक सिंचाई तकनीक से सिंचाई क्षेत्र में नारियल फसल का योगदान लगभग 22 प्रतिशत है। आम, अंगूर, केला, अनार आदि फसलों में भी टपक सिंचाई का प्रयोग किया जा रहा है। गत कई वर्षों के दौरान देश में ड्रिप सिंचाई के अन्तर्गत आने वाले क्षेत्र में अत्यधिक वृद्धि हुई है। हमारे देश में लगभग 81.4 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में सूक्ष्म सिंचाई विधि से सिंचाई की जा रही है। महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा और तमिलनाडु आदि राज्यों में बड़े पैमाने पर ड्रिप सिंचाई विधि का प्रयोग अनेक फसलों में हो रहा है जिनमें फल वृक्षों का क्षेत्रफल सर्वाधिक है।

 

सारणी-3 विभिन्न फसलों के अन्तर्गत टपक सिंचाई प्रणाली से जल बचत एवं उपज में वृद्धि

क्र.स.

फसल

जल बचत (प्रतिशत में)

उपज में वृद्धि (प्रतिशत में)

1.

गन्ना

50

30

2.

कपास

55

30

3.

भिंडी

40

15

4.

बैंगन

55

20

5.

तोरई

60

20

6.

पत्ता गोभी

60

25

7.

अंगूर

50

90

8.

मूँगफली

40

70

9.

नींबू

80

35

10.

पपीता

60

75

11.

मूली

73

15

12.

मिर्च

60

45

स्रोत : खेती, 2016 आईसीएआर

 

ड्रिप सिंचाई के लाभ


1. सिंचाई जल की 70 प्रतिशत तक बचत होती है क्योंकि सिंचाई जल सतह पर बहकर और मृदा में जड़ क्षेत्र से नीचे नहीं जाता है।
2. जल उपयोग दक्षता को 80-90 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकता है। परिणामस्वरूप उत्पादकता एवं फसलों की गुणवत्ता में सुधार होता है।
3. ड्रिप सिंचाई प्रणाली में श्रम की बहुत कम आवश्यकता होती है।
4. ड्रिप सिंचाई द्वारा जमीन का बहुत कम क्षेत्र नम होता है। अतः खेत में खरपतवारों का कम प्रकोप होता है।
5. इस विधि में जल्दी-जल्दी सिंचाई करने के कारण जड़ क्षेत्र में अधिक नमी रहती है जिससे लवणों की सान्द्रता हानिकारक-स्तर से कम रहती है। फसलों व पेड़-पौधों में बीमारियाँ और कीटों के प्रकोप की कम आशंका रहती है क्योंकि पौधों के आस-पास वायुमण्डल में नमी की सान्द्रता कम रहती है।
6. ड्रिप सिंचाई सभी प्रकार की मृदाओं के लिये उपयोगी है क्योंकि ड्रिप सिंचाई द्वारा मृदा में जल के वितरण को मृदा की प्रकार के अनुसार नियोजित किया जा सकता है।
7. ड्रिप सिंचाई प्रणाली में जल का नियंत्रण बिल्कुल सही व आसानी से किया जा सकता है।
8. सिंचाई जल के साथ दिये गए उर्वरकों का लीचिंग व डिनाइट्रीफिकेशन द्वारा कम ह्रास होता है। अतः यह प्रणाली उर्वरक उपयोग दक्षता बढ़ाने में भी सहायक है।
9. फसल से आर्थिक लाभ में वृद्धि के साथ-साथ ड्रिप सिंचाई के प्रयोग से भू-क्षरण की सम्भावना भी न के बराबर होती है।
10. इस विधि से जल्दी-जल्दी सिंचाई करने से मृदा में नमी की कमी नहीं रहती है जिसका पौधों की वृद्धि और विकास पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। अतः पैदावार में 100 प्रतिशत तक वृद्धि की जा सकती है।
11. पानी एवं पोषक तत्वों की बचत, श्रम लागत में कमी, भूमि को समतल करने की जरूरत नहीं पड़ती है।

फर्टिगेशन


यह शब्द फर्टि और गेशन दो शब्दों से मिलकर बना है जिसका अर्थ उर्वरक और सिंचाई है। ड्रिप सिंचाई प्रणाली में जल के साथ-साथ उर्वरकों को भी पौधों तक पहुँचाना ‘फर्टिगेशन’ कहलाता है। फर्टिगेशन द्वारा उर्वरकों का अपव्यय भी कम होता है। इस विधि से जल और उर्वरक पौधों के मध्य न पहुँचकर सीधे पौधों की जड़ों तक पहुँचते हैं। इसलिये फसल में खरपतवार भी कम पनपते हैं। फसल की माँग के अनुसार उर्वरकों की सान्द्रता या उनके संघटन में भी बदलाव किया जा सकता है। इसमें फसल की सभी वृद्धि अवस्थाओं पर पौधे को पोषक तत्वों की सन्तुलित आपूर्ति होती रहती है। अनुसन्धानों द्वारा सिद्ध हो चुका है कि इस विधि में सिंचाई जल और उर्वरकों का उचित प्रबन्धन होता है। यह तकनीक फसलों की उपज बढ़ाने, उनकी गुणवत्ता में सुधार करने और उत्पादन खर्च घटाने में सहायक है।

 

तालिका - 4 उर्वरक उपयोग व सिंचाई के विभिन्न तरीकों के अन्तर्गत उर्वरक उपयोग दक्षता (प्रतिशत में)

पोषक तत्व

छिटकवां विधि

ड्रिप

ड्रिप + फर्टिगेशन

नाइट्रोजन

30-35

65

95

फास्फोरस

20

30

45

पोटाश

50

60

80

स्रोत- इंडियन फार्मिंग, 2016

 

सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को आम जनता, किसानों व प्रसारकृमियों में और अधिक लोकप्रिय बनाने की जरूरत है, ताकि संरक्षणपूर्ण प्रौद्योगिकियों के प्रयोग से बेहतर जल प्रबन्धन एवं जल उपयोग दक्षता को अधिक लाभप्रद बनाया जा सके। कम पानी वाले क्षेत्रों में ड्रिप सिंचाई प्रणाली अपनाई जानी चाहिए। इससे पानी के अनावश्यक अपव्यय पर रोक लगेगी। जिससे भावी पीढ़ी को पर्याप्त सिंचाई जल के साथ सुरक्षित जल भण्डार भी प्राप्त हो सकें।

लेखक परिचय
लेखक जल प्रौद्योगिकी केन्द्र, भारतीय कृषि अनुसन्धान संस्थान, नई दिल्ली में कार्यरत हैं। ई-मेल : v.kumardhama@gmail.com

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