इटावा जनपद का जल संसाधन की उपलब्धता का आकलन एवं वितरण (Assessment and Distribution of Water Resources of Etawah district)

Submitted by Hindi on Mon, 10/16/2017 - 13:10
Source
बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी से भूगोल विषय में पी.एच.डी. की उपाधि हेतु प्रस्तुत शोध प्रबंध - 2008-09

जल संसाधन की उपलब्धता का आकलन एवं वितरण


जल मानव जीवन की अत्यंत महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है, प्राणों की रक्षा के लिये वायु के बाद द्वितीय स्थान जल का है। जल मुख्यत: दो रूपों में प्राप्त होता है- 1. सतही जल 2. भूमिगत जल। सतही जल एवं भूगर्भिक जल एक ही जल पद्धति के भाग हैं, जो एक दूसरे से अंत: संबंधित हैं तथा एक दूसरे को प्रभावित भी करते हैं। भारत में संपूर्ण वैश्विक जनसंख्या का लगभग 16 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है, परंतु भारतीय उपमहाद्वीप की नदियों में औसत मासिक जल प्रवाह का मात्र 4 प्रतिशत जल प्राप्त होता है। यह भारत में जल की आवश्यकता से कम उपलब्धता का द्योतक है। चीन की नदियों में यही औसत जल प्रवाह 8 प्रतिशत है, जिसे भारत से 25 प्रतिशत अधिक जनसंख्या का भरण-पोषण करना पड़ता है।

भारत में उपयोग योग्य जल संसाधन की उपलब्धता सतही जल से 690 कि.ली.3 तथा भूगर्भीय जल संसाधन के रूप में 396 कि.ली अर्थात 1086 कि.ली.3 प्रतिवर्ष है, इसमें वर्तमान वापसी प्रवाह से होने वाले 90 कि.ली.3 प्रतिवर्ष जल भंडार की सन्निहित हैं। प्रकृति द्वारा भारत को बड़ी संख्या में नदियों का वरदान प्राप्त है। केंद्रीय जल आयोग के प्रकाशनों के अनुसार सभी नदियों की वर्तमान में अनुमानित औसत वार्षिक क्षमता 1953 कि.ली.3 है। जबकि उपयोग किए जाने योग्य प्रवाह 690.32 कि.ली.3 आंका गया है जो औसत वार्षिक क्षमता का मात्र 35 प्रतिशत है, तथा शेष 65 प्रतिशत जल का समुचित विदोहन नहीं हो पाता है। वर्षापात की उच्च मौसमी प्रकृति नदी जल प्रवाह को ध्यान में रखते हुए जल भंडारण तो आवश्यक ही है। ग्लेशियर से परिपोषित हिमालय से निकलने वाली नदियों में लगभग 80 प्रतिशत प्रवाह तथा दूसरे जलस्रोतों से होने वाला 90 प्रतिशत प्रवाह सामान्यत: मानसून के 3 से 4 माह की अवधि में होता है। वर्तमान में सतही जल की उपयोग की जा सकने वाली कुल मात्रा का लगभग 60 प्रतिशत ही उपयोग किया जा रहा है। अत: अप्रयुक्त 40 प्रतिशत सतही जल का दीर्घकालिक एवं सिर्फ आवश्यक सिंचाई पेयजल अथवा अन्य व्यवहारों में एक-एक बूँद का महत्त्व समझते हुए इस प्रकार के विदोहन की संभावनाओं की तलाश करनी होगी। भारत में सबसे अधिक 80 प्रतिशत जल संसाधन की खपत सिंचाई के रूप में होती है।

धरातलीय जल संसाधन :


धरातलीय जल स्रोत जलापूर्ति का महत्त्वपूर्ण साधन है। मानव को धरातलीय जल प्राकृतिक जल राशियों यथा नदियों, तालाबों एवं मानव निर्मित जलाशयों तथा नहरों से प्राप्त होता है। जिसका प्रमुख स्रोत वर्षा का जल है, चाहे वो वर्षा जल बूँदों के रूप में हो अथवा हिम के रूप में। मानव की जल की मांग का एक बड़ा भाग धरातलीय जल से पूरा होता है। शताब्दियों से चली आ रही जल व्यवस्था के विषय में विचार करें तो पायेंगे कि जल संसाधन के प्रमुख स्रोत खुदे हुए कुएँ एवं नलकूप हैं। केवल प्रतिकूल एवं अत्याज्य परिस्थितियों में ग्रामीण समुदाय के लिये धरातलीय जल संसाधन से आपूर्ति के बारे में विचार करना चाहिए।

धरातलीय जल स्रोत :


वायुमंडलीय वर्षण ही भू पृष्ठीय जल का महत्त्वपूर्ण स्रोत है। यह वर्षा, बर्फ, ओले, ओस आदि किसी भी रूप में हो सकता है। एक अनुमान के अनुसार एक वर्ष में लगभग 96000 क्यूसेक मील जल अथवा कुल जल का 80 प्रतिशत भाग सागरों में बहकर चला जाता है और तत्पश्चात वाष्पन एवं वाष्पोत्सर्जन द्वारा वातावरण में समाहित हो जाता है। अध्ययन क्षेत्र में धरातलीय जल का स्रोत वर्षण है। हमारे देश में धरातलीय जल का वितरण जलवायु दशाओं की विषमता, मिट्टी के प्रकार उच्चावच संरचना के कारण असमान है। उत्तर प्रदेश राज्य में कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 3.5 प्रतिशत पृष्ठीय जल है। नदियों, नालों, गहरे तालों एवं पोखरों के जल का प्रमुख स्रोत बहि:स्रावी निस्यंद (Effluent seepage) है। धरातलीय जल के प्रमुख स्रोत नदियाँ, नहरें एवं तालाब या झीलों का विवरण निम्नवत है।

District Etawah Surface Water Bodies

नदियाँ :


आकार, जलग्रहण क्षेत्र, उच्चावच एवं जल स्रोतों की प्रकृति यह सुनिश्चित करती है कि नदी सतत वहनीय है अथवा मौसमी। जिन नदियों का जलग्रहण क्षेत्र बड़ा होता है, उन्हें सतत वाहिनी नदियाँ कहा जाता है। क्योंकि वे मौसमी वर्षा, बर्फ पिघलने तथा जल रिसाव द्वारा पर्याप्त मात्रा में जल प्राप्त करती हैं। दूसरे शब्दों में सतत वाहिनी नदियों में बर्फखंड व हिमानी पिघलने तथा मृदा जल का अंत: संचरण का संचयी परिणाम है। क्षेत्र की अधिकांश नदियों में वर्षा ऋतु में बाढ़ आ जाती है तथा वे शुष्क ऋतु में संकीर्ण धारा के रूप में प्रवाहित होकर अल्प जल को विसर्जित करती हुई लुप्त हो जाती हैं। लगभग सभी नदियाँ उत्तर पश्चिम से दक्षिण पूर्व दिशा की ओर प्रवाहित होती हैं। कुछ छोटी नदियाँ दक्षिण और उत्तर दिशा की ओर बहकर यमुना एवं चंबल की सहायक नदियाँ बन जाती हैं।

तालिका संख्या - 3.1जनपद इटावा में नदी जल संसाधन प्रवाहक्र.नदी का नामजल ग्रहण क्षेत्र वर्ग किमी मेंक्षेत्र का प्रतिशतवार्षिकऔसत प्रवाह क्यूसेक मेंग्रीष्म कालीनवर्षा कालीनआकस्मिक बाढ़ का प्रवाह1.चंबल नदी3917 102500112001900003142002.यमुना नदी9830453041358500134200स्रोत : केंद्रीय जल बोर्ड, 2005, इटावा, उत्तर प्रदेशजनपद की दो प्रमुख नदियों के जल संसाधन को तालिका सं. 3.1 में प्रदर्शित किया गया है।

यमुना नदी गंगा की सहायक एवं जनपद की प्रमुख नदी है। प्राचीन काल में ‘‘कालिन्दीगिर’’ के निकलने के कारण इसे ‘‘कालिन्दी’’ कहा जाता है। जो 6330 मी. ऊँचाई पर स्थित यमुनोत्री हिमनद से निकली है, हिमभरित होने के कारण पूर्व में इसमें पर्याप्त मात्रा में जल मिलता था, लेकिन अब अध्ययन क्षेत्र में गुजरते समय वर्षा ऋतु के अतिरिक्त शोध अवधि में यह एक संकीर्ण नाले के रूप में बहती हुई दिखाई देती है। यमुना नदी की कुल लंबाई 1376 कि.मी. है। जबकि जनपद में इसकी कुल लंबाई 148 कि.मी. अर्थात 10.75 प्रतिशत है। इसका जनपद में जलग्रहण क्षेत्र 9830 वर्ग किलोमीटर है। इसका वार्षिक जल प्रवाह 4580 लाख क्यूसेक है। यमुना नदी वर्षा ऋतु में जल वर्षा से अधिक मात्रा में जल ग्रहण कर लेती है। फलत: जल स्तर काफी ऊपर आ जाता है, और कई क्षेत्रों में जल विभीषिका उत्पन्न हो जाती है। जनपद का उत्तरी भाग समतल होने एवं नहर शाखा गुजरने के कारण वर्षा का पानी पार करके यमुना नदी में नहीं जा पाता फलत: यमुना जल ग्रहण क्षेत्र में आने के बावजूद भी जल यमुना तक नहीं पहुँच पाता। वर्षा ऋतु में यमुना नदी की चौड़ाई लगभग 440 मी. तक होती है जबकि शुष्क मौसम में इसकी चौड़ाई 50 मी. से भी कम रह जाती है।

चंबल नदी जनपद की दूसरी सबसे बड़ी एवं महत्त्वपूर्ण नदी है। यह बढ़पुरा विकासखंड में मुरॉग ग्राम में प्रवेश करती हुई कुछ दूरी (40 किमी) तक उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश की सीमा बनाती है। यह जनपद में 65 किलोमीटर की दूरी तय करती हुई यमुना नदी में (पंचनद) क्षेत्र में मिल जाती है। यह नदी विसर्प बनाती हुई बढ़ती है। इसकी चौड़ाई लगभग 1000 मीटर है। वर्षा ऋतु में बाढ़ के कारण यह नदी प्रारंभ में दायें किनारे को और अंत में बायें किनारे को जलमग्न कर देती है। यह नदी मुख्यत: अपनी बाढ़ों के लिये विख्यात है। इसका जनपद में जलग्रहण क्षेत्र 3917 है और वार्षिक जल प्रवाह 102500 क्यूसेक है।

यमुना एवं चंबल नदियों के अलावा क्वारी, सेंगर, अहनैया एवं पुरहा मौसमी नदियाँ हैं। क्वारी एवं सेंगर नदियाँ कुछ साल पहले तक सतत वाहिनी नदियों की श्रेणी में आती थी लेकिन अब ग्रीष्मकाल में इनका प्रवाह समाप्त हो जाता है जनपद में इनकी लंबाई क्रमश: 40 किलोमीटर एवं 97 किमी है। सेंगर नदी के अंर्तगत जसवंत नगर, बसरेहर एवं महेवा विकास खंडों का अपवाह क्षेत्र आता है, जबकि क्वारी नदी के अंतर्गत चकरनगर विकासखंड के दक्षिणी भाग का कुछ भू भाग आता है।

अन्य तीन नदियाँ अहनैया, पुरहा एवं सिरसा तीनों जनपद के उत्तरी भाग का जल ग्रहण कर यमुना नदी में मिल जाती हैं। अत: कहा जा सकता है कि ये तीनों नदियाँ यमुना नदी के प्रवाह को तीव्रता प्रदान करती हैं। ये नदियाँ पूर्णत: मौसमी नदियाँ हैं, जो वर्षा ऋतु में उफान पर होती है, और वर्षा ऋतु उपरांत इनका प्रवाह मंद होता चला जाता है और ग्रीष्म काल में पूर्णत: सूख जाती हैं। जनपद में इनकी लंबाई क्रमश: 56 एवं 48 किमी हैं। ये नदियाँ जनपद में उत्तर पश्चिम एवं दक्षिण पूर्व दिशा की ओर प्रवाहित होती है।

नहरें :


नहरें कृत्रिम जलराशि के संवर्ग में आती हैं। नहरों को जल चिरवाहिनी नदियों एवं जलाशयों से प्राप्त होता है। खेतों को सिंचित करने से पूर्व जल संपूर्ण नहर क्रम में प्रवाहित होता है। नहरों के जल में उनके सहायक जलमार्ग और खेत जल मार्ग सम्मिलित रहते हैं। जिनकी क्षमता एवं लंबाई नहरों में उपलब्ध जल की शीर्ष मात्रा पर निर्भर करती है।

संपूर्ण अध्ययन क्षेत्र निचली गंगा नहर क्रम के अंतर्गत आता है। जनपद में दो नहर शाखायें हैं- भोगनीपुर शाखा एवं इटावा शाखा। यह दोनों नहरें चकरनगर एवं बढ़पुरा विकासखंडों को छोड़कर संपूर्ण जनपद को सिंचाई के लिये जल उपलब्ध कराती हैं। इन शाखाओं का उद्गम अलीगढ़ जनपद में हुआ जो नानू से 18 किमी दूर है। ये शाखायें सेंगर एवं सिरसा नदियों को पार करती हुई शिकोहाबाद मैनपुरी से होते हुए जनपद इटावा के धार ट्रेक में प्रवेश करती हैं। भोगनीपुर शाखा जनपद के दक्षिण क्षेत्र में बहती है जबकि इटावा शाखा जनपद के उत्तर क्षेत्र से गुजरती है, जिसका विवरण निम्न तालिका में प्रस्तुत किया जा रहा है।

तालिका सं. 3.2 जनपद इटावा में नहर शाखा की लम्बाई एवं शीर्ष निस्तारण की क्षमता

भोगनीपुर शाखा :


भोगनीपुर शाखा निचली गंगा नहर तंत्र के अंतर्गत आती है। अध्ययन क्षेत्र में मुख्य शाखा एवं राजवाह की लंबाई 130.75 किलोमीटर है। इसके अंतर्गत 1. इटावा राजवाह 2. राजमऊ राजवाह 3. सरायभूपत राजवाह 4. लोकासई राजवाह 5. दतावली राजवाह 6. सुंदरपुर राजवाह 7. नावली राजवाह 8. विधिपुर राजवाह 9. दसरमऊ राजवाह 10. रीतौर राजवाह 11. इगुर्री राजवाह 12. सुल्तानपुर राजवाह 13. कुण्डरिया राजवाह आते हैं। यह नहर शाखा जनपद में उत्तर पश्चिम दिशा अर्थात जसवंतनगर विकासखंड में प्रवेश कर बसरेहर, सैफई, भर्थना एवं तथा विकासखंडों को जल प्रदान करती हुई औरैया जनपद के अछल्दा विकास खंड में प्रवेश कर जाती है। अध्ययन क्षेत्र में इस नहर शाखा की शीर्ष निस्तारण क्षमता 582.00 क्यूसेक है। जनपद में यह शाखा पश्चिम में प्रवेश करती है तथा मध्य से गुजरती हुई औरैया एवं कानपुर जिलों में चली जाती है।

इटावा शाखा :


यह नहर शाखा भी निचली गंगा नहर तंत्र के अंतर्गत आती है। यह जनपद के उत्तरी भाग को सिंचित करती हुई पूर्व की ओर अग्रसर होती है। जनपद में मुख्य शाखा एवं इसके सहायक राजवाह के अंतर्गत लंबाई 219.29 कि.मी. है। इसके सहायक राजवाह के अंतर्गत 1. इटावा शाखा 2. गंगसी राजवाह 3. करहल राजवाह 4. बिलंदा राजवाह 5. तखराऊ दायां राजवाह 6. तखराऊ बायां राजवाह 7. उमरसेंडा राजवाह 8. बामक राजवाह 9. बहारपुर राजवाह 10. कन्धेसी राजवाह 11. सैफई राजवाह आते हैं। यह शाखा जनपद के पश्चिम दिशा में जसवंतनगर विकासखंड में प्रवेश करके जनपद मुख्यालय के करीब से गुजरती हुई बसरेहर एवं महेवा विकासखंडों को सिंचित करती है तथा आगे औरैया जनपद के अजीतमल विकासखंड में चली जाती है। जनपद में इस संपूर्ण शाखा के अंतर्गत शीर्ष निस्तारण की वास्तविक क्षमता 2290.75 क्यूसेक है। अत: यह शाखा जनपद के बड़े भाग को सिंचित करती है।

अत: स्पष्ट है कि दोनों ही नहर शाखाएँ जनपद को सिंचाई के लिये जल उपलब्ध कराती है। लेकिन इन शाखाओं के द्वारा जिन स्थानों पर सिंचन क्षेत्र की ऊँचाई अधिक है, उन स्थानों पर पानी नहीं पहुँच पाता है। वहाँ पम्पिंग सेट के माध्यम से सिंचाई सुविधा का उपयोग किया जाता है।

तालाब एवं जलाशय :


“Storage is the key to the regulation and optimum use of all water resource”

जल संग्रहण संपूर्ण जल संसाधन के अनुकूल और नियमित उपयोग की कुंजी है। यह सर्वथा जलीय चक्र की भूमि तथा ताजे जल की उपस्थिति से संबंधित है।

जल संग्रहण में महत्त्वपूर्ण सफलता बांध और जलाशयों का निर्माण करके प्राप्त हो सकती है। नदी के जल विसर्जन पर नियंत्रण कर जलाशय की क्षमता बढ़ाई जा सकती है। इन साधनों के द्वारा धरातलीय व भौम जल पूर्ति के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान मिल सकता है। भौम जल भंडारों का भी कृत्रिम पुन: पूरण द्वारा विकास किया जा सकता है। जनपद में तालाबों की संख्या घटती बढ़ती रही है जिसका मुख्य कारण सरकार का इनकी दशा की ओर ध्यान न देना तथा जनता द्वारा अतिक्रमण करना रहा है, परिणामत: 2004-05 जनपद में कुल तालाबों की संख्या 147 रह गयी। तालाबों के ह्रास का एक मुख्य कारण सिंचाई के अन्य साधनों का विकास, होना भी है। नहरों, नलकूपों द्वारा सिंचाई सुविधाओं में वृद्धि के कारण लोग तालाबों से सिंचाई करने अथवा उन्हें संरक्षित करने में अपनी उदासीनता प्रकट करते हैं। तालाबों के अवसादीकरण तथा तटबंधों के क्षतिग्रस्त हो जाने के कारण भी संग्रहीत जल की मात्रा कम रह गयी है।

अध्ययन क्षेत्र का अधिकांश भाग किसी न किसी नदी के अपवाह के अंतर्गत आता है, यहाँ वर्षा भी कम होती है, वर्षा का स्वरूप मूसलाधार है, अतिक्रमण के कारण तालाबों की संख्या काफी कम हो गयी है। फलत: वर्षा का पानी बिना किसी अवरोध के बहकर नदियों में चला जाता है, अत: जल का ठीक ढंग से पुनर्भरण भी नहीं हो पाता है। परिणामत: जल स्तर काफी तीव्र गति से गिरता चला जा रहा है। वर्तमान सरकार ने तालाबों के पुनरुद्धार के लिये अतिक्रमण हटवानें और पुराने तालाबों को फिर से ठीक कराने के सख्त आदेश दे दिये हैं। जिन पर तीव्र गति से कार्य प्रारंभ हो गया है। जनपद के तालाबों की स्थिति 2005-06 निम्न तालिका क्रमांक 3.3 के माध्यम से स्पष्ट की जा रही है -

तालिका सं. 3.3. जनपद इटावा में तालाबों एवं जलाशयों के अंतर्गत क्षेत्रफल का विवरणसारणी से स्पष्ट है कि जनपद के बढ़पुरा एवं बसरेहर विकासखंडों में सबसे अधिक क्षेत्रफल 66.44 एवं 63.11 हेक्टे. है, इसका मुख्य कारण यहाँ का कठोर एवं चीका युक्त धरातल है। सैफई, भर्थरा एवं ताखा विकासखंडों में तालाबों का क्षेत्रफल क्रमश: 55.58, 53.14 एवं 45.34 हे. है। यहाँ सिंचाई सुविधाओं का पर्याप्त विकास होने के परिणाम स्वरूप तथा साथ ही गहन कृषि होने के कारण अधिकांश तालाबों को कृषि योग्य भूमि में बदल दिया गया है। इसके अलावा महेबा, चकरनगर एवं जसवंतनगर में तालाबों का क्षेत्रफल सबसे कम क्रमश: 37.86, एवं 36.43 हे. है। इसके अलावा जनपद के दक्षिण पूर्वी भाग की मिट्टी मुलायम है, जो जल को अपने में अधिक समय तक संग्रहीत करके नहीं रख सकती है तथा इसी के साथ यहाँ बीहड़ क्षेत्र का भी विस्तार है। परिणामस्वरूप इस क्षेत्र में तालाबों की संख्या कम है।

District Etawah The area distribution of pond and tank 2004-05तालिका संख्या 3.4 में तालाबों का क्षेत्रफल एवं जल क्षमता को दर्शाया गया है-

तालिका सं. 3.4 जनपद इटावा - तालाबों एवं जलाशयों की जल वहन क्षमता (2..4-05)तालिका सं. 3.4 से स्पष्ट है कि तालाबों एवं जलाशयों के अंतर्गत क्षेत्रफल 395.78 हेक्टेयर है, जिनकी गहराई 1 मीटर से लेकर 2.50 मीटर अथवा इससे भी अधिक है। अधिकांश तालाबों का जल वर्षा ऋतु के तुरंत बाद ही सूख जाता है, केवल कुछ ही ऐसे जलाशय हैं जो साल भर अथवा 8 महीने रबी एवं खरीब की फसलों को जल प्राप्त कराते हैं। अधिकांश बांधों एवं तालाबों के जल का अवस्रवण भू सतह के नीचे हो जाता है। जलवृष्टि, अवस्रवण एवं वाष्पीकरण की दर से इन तालाबों एवं जलाशयों के जल के स्तर में उतार चढ़ाव होता है। नम मानसून के मौसम में इन तालाबों में पर्याप्त जल रहता है। अध्ययन क्षेत्र में 1 से 1.50 मीटर गहराई वाले तालाबों के अंतर्गत 99.13 हेक्टेयर क्षेत्र है। जिसमें कुल जनपद के तालाबों के जल का 27.16 प्रतिशत आता है। 1.50 से 2.00 मीटर गहरे तालाबों के अंतर्गत 56.75 हेक्टेयर क्षेत्र है, जिसमें जनपद के कुल जल का 21.77 प्रतिशत है। 2.00-2.50 मीटर गहराई वाले तालाबों के अंतर्गत 40.41 हे. है। जिसके अंतर्गत जनपद में तालाबों के कुल जल का 19.94 प्रतिशत जल है। 0 से 1 मीटर गहरे तालाबों का क्षेत्रफल सर्वाधिक है, जिसके अंतर्गत जनपद में तालाबों के कुल जल का 19.56 प्रतिशत है। सबसे कम क्षेत्रफल 21.09 हेक्टेयर क्षेत्रफल 2.50 मी. से अधिक गहराई वाले हैं, जिसके अंतर्गत जनपद के तालाबों के कुल जल का 11.56 प्रतिशत है।

Janpad Etawaha talabo avm jlasyo ki jal wahan chamtaअध्ययन क्षेत्र में लघु कृत्रिम जलाशय सर्वत्र पाये जाते हैं किंतु पेयजल एवं सिंचाई के लिये इनका उपयोग नहीं हो पाता है। इनके बनाने का मुख्य उद्देश्य पशुओं के पानी पीने की व्यवस्था करना रहा है। आज जनपद में भूमिगत जल के तीव्र गिरावट के कारण पुराने तालाबों को तेजी के साथ ठीक किया जा रहा है, जिससे बरसात के पानी को रोका जा सके और अधिक से अधिक जल का पुनर्भरण हो, जिससे भूमिगत जल स्तर ऊपर आ सके।

भूमिगत जल संसाधन की उपलब्धता का आकलन एवं वितरण :


जनपद में जल उपलब्धता का दूसरा स्रोत भूमिगत जल है पृथ्वी की सतह के नीचे भू पृष्ठीय चट्टानों के छिद्रों तथा दरारों में स्थित जल को भूमिगत जल (Underground Water) कहा जाता है। चूँकि यह जल धरातलीय सतह के नीचे मिलता है, अत: इसे अद्य: तल जल (Sub Surface Water) भी कहते हैं। वर्षा का जल विभिन्न रूपों में रिसकर नीचे चला जाता है तथा पारगम्य चट्टानों के रिक्त स्थानों में एकत्र होकर भूमिगत जल का रूप धारण करता है, भूमिगत जल का आर्थिक मूल्य बहुत अधिक है। भूमिगत जल उपभोग एवं अनुभोग के प्रत्यक्ष स्रोत के रूप में महत्त्वपूर्ण है। वर्तमान शोध अध्ययन के अंतर्गत भूमिगत जल भंडार का भौगोलिक विश्लेषण अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि इसका प्रभाव जनपद में पेयजल एवं सिंचाई की आपूर्ति पर पड़ता है। भूमिगत जल स्रोतों का क्रमबद्ध अध्ययन इस पिछड़े जनपद के समुदाय के कल्याण हेतु आवश्यक है।

भूमिगत जल की उपस्थिति -


भूमिगत जल की उपस्थिति एवं संचलन प्राय: अनेक कारकों पर निर्भर करता है। यथा- 1. रवेदार संस्तर की अतिभार एवं उपलब्ध मोटाई की गहराई 2. चट्टानों के अपक्षीण भाग की गहराई 3. स्फोट-गर्तों (Visicles) का आकार एवं उनका परस्पर संबंध 4. स्फोट-गर्तों की मोटाई 5. चट्टान समूह के जोड़ एवं विभंजन 6. द्वितीयक खनिजन 7. पुनर्भरण के स्रोत। भूमिगत जल की उपस्थिति, संचयन पुनर्भरण एवं वितरण क्षेत्र की भूगर्भिक संरचना के संघनन (Compections) और संयोजन पर बृहत रूप से निर्भर करती है। अध्ययन क्षेत्र में शैल समूहों का निर्माण नदियों और उसकी सहायक नदियों द्वारा हुआ है। ये शैल समूह भूमिगत जल के उपयोग की दृष्टि से समृद्ध हैं। जनपद में प्राय: क्ले, बालू, ग्रेवेल आदि मिलते हैं। जल स्तर की दशाओं के अंतर्गत बलुई जलमृत में भूमिगत जल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। जल स्तर दक्षिण की ओर गहरा है। जलोढ़ निक्षेप की निम्न पारगम्यता के कारण खुलें कूपों का जल विसर्जन प्राय: कम है और इन कूपों से प्राप्त जल, जल संसाधन की पूर्ति प्राय: नहीं कर पाते। जनपद में संपूर्ण क्षेत्रफल के लगभग 90 से 95 प्रतिशत भाग पर जलोढ़ मिट्टी पाई जाती है। अत: यहाँ सिंचाई के उद्देश्य से जलापूर्ति की कोई समस्या नहीं है।

जलधारी पदार्थों के जलविज्ञान संबंधी गुण -


जलधारी पदार्थों के जल विज्ञान संबंधी प्रमुख गुणों में उसकी सरंध्रता, विशिष्ठ लब्धि तथा पारगम्यता है। ये गुण मुख्यत: जलधारण निकास एवं प्रेषण की चट्टान की क्षमता को नियंत्रित करते हैं। ये आकार में परिवर्तन की विभिन्नता मात्रा का वर्गीकरण तथा कणों के संयोजन के घटक को प्रदर्शित करते हैं। ‘‘कार्यकारी जल स्तर (Working Boilor Level) तथा बायलर परीक्षण (Boilor Test) मार्ग में मिलने वाले स्तर की जलधारी विशेषताओं के संबंध में उपयोगी सूचना प्रदान करता है।

सरंध्रता -


शैल कणों में पाये जाने वाले अंतराकाश के गुण को ‘‘सरंध्रता’’ कहते हैं या किसी शैल व मृदा में विद्यमान अंतराकाशों के पुज्जित आयतन और शैल व मृदा के कुल आयतन के बीच के अनुपात को सरंध्रता कहते हैं। यह प्राय: प्रतिशत में व्यक्ति की जाती है। सरंध्रता मुख्यता कणों के आकार एवं विन्यास, मात्रा का वर्गीकरण तथा संयोजन एवं उनके संगठन पर निर्भर करती है। कठोर चट्टानों में सीमेन्टेशन एवं संघनन की मात्रा में वृद्धि के साथ सरंध्रता का प्रतिशत घटता है। जलभृत सामान्यत: सूक्ष्म से मध्यम रेत एवं बजरी के बनते हैं। इस संदर्भ में जलोढ़ पदार्थों की सरंध्रता प्राय: अधिकांश निक्षेपों की अवर्गीकृत प्रकृति के कारण काफी कम होती है। जलधारी बालू में 40 प्रतिशत से अधिक सरंध्रता होती है। श्री एडेन्स के अनुसार मेरठ जनपद के समीप जनपदों में सरंध्रता 40 से 41 एवं 41.5 प्रतिशत है। आंकड़ों के अप्राप्त होने के कारण इटावा जनपद की सरंध्रता ज्ञात नहीं की जा सकी।

विशिष्ठ जल लब्धि -


विशिष्ठ जल लब्धि को जलोत्सारित अवसाद के कुल आयतन को प्रतिशत के रूप में व्यक्त किया जाता है, जो जल स्तर में ह्रास का सूचक है या पुनर्भरण द्वारा संत्रप्त अवसाद के कुल आयतन के प्रतिशत द्वारा, जो जल स्तर की वृद्धि का सूचक है। क्षेत्र की विशिष्ठ जल लब्धि की गणना भौम जल स्तर के उतार चढ़ाव से की जाती है। जैसा कि तालिका में दिया गया है।

तालिका सं. 3.5 जनपद इटावा - विशिष्ठ जनलब्धि (2004)विशिष्ठ जल लब्धि मात्रा रवों के आकार तथा छिद्रों के वितरण एवं संस्तर के संघनन पर भी निर्भर करती है। मोटी रेत व ग्रेवेल द्वारा निर्मित जलोढ़ असंपिड़ित एवं सुषर्गित तथा उनमें विशिष्ठ जल लब्धि का प्रतिशत अधिक पाया जाता है, और उनमें पर्याप्त सरंध्रता पाई जाती है। दूसरी ओर क्ले व शिष्ठ महीन कणों वाले मिट्टी के जमाव में विशिष्ठ जल लब्धि कम है। इसका मुख्य कारण उच्च मात्रा का वर्गीकरण एवं महीन कणें का सीमेन्टेशन है। शिल्ट और क्ले तथा ग्रैवेल एवं रेत में विशिष्ठ जल लब्धि का प्रतिशत अधिक होने के कारण जलभृत बनते हैं, जिनसे भूमिगत जल का दोहन जलापूर्ति हेतु किया जाता है। जलभृत की विशिष्ठ जललब्धि विभिन्न क्षेत्रों की अलग-अलग है। परिणामस्वरूप नलकूपों व जलपम्पों की गहराई उसी के अनुरूप भिन्न-भिन्न है। तालिका संख्या - 3.5 से स्पष्ट है कि विशिष्ठ जललब्धि 4-10 प्रतिशत के मध्य है।

पारगम्यता -


शैल का वह गुण या उसकी क्षमता जिससे तरल पदार्थ उसमें से होकर गुजर सकता है, उसकी पारगम्यता कहलाता है। शैलों की पारगम्यता की मात्रा उनके रध्रों के प्रमाप तथा आकार एवं रध्रों के अंतरायोजकों के प्रमाप, आकर व विस्तार पर निर्भर करती है जलभृत की पारगम्यता कणों के विन्यास आकार प्रमाप तथा उसकी मात्रा का वर्गीकरण संहनन पर निर्भर है। बड़े कणों वाले वर्गीकृत पदार्थ यथा रेत एवं ग्रैवेल में पारगम्यता अधिक होती है, कणों के आकार के साथ जल में अंत:स्रवण की दर में वृद्धि हो जाती है। बजरी तथा अन्य स्थूलतर निक्षेपों की अपेक्षा सूक्ष्म रेत तथा क्ले निक्षेपो में जल अंत:स्रवण की दर कम होती है।

संतृप्त मंडल में जल :


संतृप्त मंडल भू-पटल का वह भाग है, जिसमें शैल की रिक्तियां, अंतराकाश तथा मुख जल से भरे रहते हैं, इसे भूमिगत जल या अधो भौम जल की कहते हैं। इसकी ऊपरी सतह वह रेखा है, जिस ऊंचाई पर भूमिगत जल शुष्क ऋतु में भी पहुँच जाता है। यह क्षेत्र उस गहराई तक पाया जाता है, जिस गहराई तक भूमिगत जल नीचे की ओर प्रवेश कर सकता है, और अभेद चट्टानों के कारण अधिक नीचे नहीं जा सकता। यह गहराई सर्वत्र एक समान नहीं होती तथा इसमें बहुत अधिक भिन्नता पाई जाती है। संतृत्प मंडल को तीन भागों में विभक्त कर सकते हैं - उरुद्ध जल, परिरुद्ध जल, सहजात जल। सहजात जल निक्षेपित शैलों की संरचना के समय उनके मध्य अवरुद्ध हो गया था, जबकि परिरुद्ध जल दो अपारगम्य शैल संस्तरों के मध्य स्थित होता है, और किसी समय अर्टीजन दशाओं में जल ऊपर उठ जाता है। अरुद्ध जल संस्तर के नीचे होता है और यह नीचे की ओर प्रथम प्रभावी अप्रवेश्य स्तर की गहराई तक होता है।

जलभृत :


अवशादी शैलों में कुछ महत्त्वपूर्ण जलभृत पाये जाते हैं क्योंकि यह शैलें अपने सीमेन्टिड संस्तर में पर्याप्य छिद्र रखती हैं। क्ले जलभृत के लिये उपयुक्त नहीं है, क्योंकि इसमें छिद्र बहुत सूक्ष्म होते हैं, जिससे जल का आसानी से अन्त:स्रवण नहीं हो पाता। रेत और बजरी के निक्षेप जलभृत के लिये उपयुक्त होते हैं, क्योंकि उनके शैल समूह असंपिंडित होने के साथ उनके छिद्र बहुत बड़े होते हैं। बलुआ पत्थर की रचना दानेदार पदार्थों से होती है परिणामत: इसमें सर्वोत्तम जलभृत बनते हैं। मृदा संस्तर के वितरण में भिन्नता के कारण जलभृतों में भी भिन्नता पाई जाती है। जलभृतों का वर्गीकरण निम्न दो प्रकार से किया जा सकता है- अपरिरुद्ध व परिरुद्ध। यह वर्गीकरण जल स्तर की उपस्थिति पर निर्भर है। अपरिरुद्ध जलभृत में जलस्तर तरंगिक एवं ढाल के रूप में भिन्न है, जो क्षेत्र के पुनर्भरण एवं विसर्जन कूप से पंपन तथा पारगम्यता पर निर्भर करता है। जलस्तर के उतार चढ़ाव से जलभृत के जल भंडार के आयतन में परिवर्तन होते हैं। परिरुद्ध जलभृत में जलस्तर संतृप्त मंडल की ऊपरी सतह के रूप में होते हैं। परिरुद्ध जलभृत को ‘‘आर्टिजन’’ या ‘‘दाब जलभृत’’ कहते हैं, जिनमें भौमिक जल अपेक्षाकृत अप्रवेश्य संस्तर के बीच परिरुद्ध पाया जाता है।

भौमिक जल की जांच एवं अन्वेषण :


जलभृतों के लिये विभिन्न प्रकार के सर्वेक्षणों का प्रयोग किया गया है। फोटो जलविज्ञान संबंधी एवं भू-भौतकीय सर्वेक्षण किये गये हैं। इन भूगर्भिक जल सर्वेक्षणों से अद्यस्तल राशियों का आकार एवं अवस्थिति को निर्धारित किया जाता है। भू-भौतकीय सर्वेक्षणों को निम्न भागों में विभाजित किया जा सकता है - 1. गुरूत्वीय 2. चुंबकीय 3. तापीय 4. रेडियो एक्टिव 5. विद्युतीय तथा 6. भूकम्पी पद्धति। भौतिक जल विकास के लिये उपयुक्त क्षेत्रों में खोज संबंधी बोरिंग हेतु जलोढ़ आवरण की मोटाई, अवक्षीण, मेंटल, विभंजन की दिशा, भ्रंश एवं दरारों आदि को आधार मानकर अल्पअंतराली प्रतिरोधकता का सर्वेक्षण क्षेत्र की स्थिति प्रस्तावित स्थल के निर्धारण हेतु सबसे सस्ता एवं सफल है। जिन परिस्थितियों में भौमिक जल पाया जाता है, को ज्ञात करने के लिये बेधन परीक्षण एक सुनिश्चित विधि है। इस विधि का उद्देश्य उर्ध्वाधर व पार्श्विक एवं सहसंबंध, खारे जल के साथ जलभृत का सीमांकन तथा जलविज्ञान संबंधी परीक्षणों द्वारा निश्चित जलभृत के निर्धारण द्वारा पहचानना है। केंद्रीय भूगर्भ जल विभाग एवं भूगर्भ जल सर्वेक्षण संगठन उत्तर प्रदेश ने जलविज्ञान संबंधी परीक्षण 500 फुट की गहराई तक किये हैं जो जलभृत क्षेत्र का निर्धारण करते हैं। भारतीय भू वैज्ञानिक सर्वेक्षण ने भी जनपद के कुछ भागों में भौमिक जल के अन्वेषण किये हैं, परंतु वर्तमान अध्ययन में राजकीय नलकूपों के भौतिक संस्तर का अध्ययन किया गया है।

District Etawah location of tubewellsDistrict Etawah Location and depth of aquifers

असंतृप्त मंडल में जल :


भौम जल स्तर के उस ऊपरी भाग को असंतृप्त मंडल कहते हैं, जिसमें होकर जल रिसकर नीचे पहुँचता है एवं जहाँ तक पौधों की जड़ें पहुँचती हैं। वास्तव में भूमिगत जल का यह सबसे ऊपरी भाग होता है जिसमें शैलों के छिद्र प्राय: वायु से भरे रहते हैं। इन छिद्रों में रिसने वाले जल का कुछ भाग रूक जाता है। इस मंडल को पवन मिश्रित मंडल या वातन क्षेत्र कहते हैं। केवल उन स्थानों को छोड़कर जहाँ जल सिंचाई अथवा वर्षा के कारण अधिक जल रिसाव से अस्थाई तौर पर भूमि के अंदर पहुँच जाता है। मृदा जल क्षेत्र में संतृप्त जल कम गहराई में पाया जाता है। इस मंडल का जल वाष्पीकरण तथा वाष्पोत्सर्जन द्वारा वायुमंडल में वापस चला जाता है। इस मंडल में शैल जल से संतृप्त नहीं हो पातीं, वर्षा के मौसम में ही यह मंडल कुछ जलयुक्त रहता है तथा शुष्क मौसम में सूख जाता है। वनस्पतियों की आवश्यकता एवं उनकी धारक क्षमता से अधिक जल संतृप्त मंडल की ओर अधोमुखी रिसता है। मृदा जल पेटी एक विशाल जलाशय होता है, जिस पर पौधों का जीवन निर्भर करता है। मृदा जल पेटी में गुरुत्व जल और मृदा के पृष्ठीय स्तर पर तनुत्वक जल शामिल रहता है, जो कि पौधों की जड़ों की पहुँच सीमा में होता है। संतृप्त मंडल बहुत महत्त्वपूर्ण होता है, क्योंकि भौमजल का एक बड़ा भाग हैंडपंप एवं खुले कुओं के माध्यम से निकाला जाता है। पेयजल आपूर्ति योजनाओं के क्रियान्वयन के पूर्व कुछ जलधाराओं को छोड़कर (केवल ग्रीष्म ऋतु में) यह जल प्राप्त करने का एक मात्र स्रोत है।

भौम जल स्तर का प्रेक्षण :


तीव्र गति से गिरते जल स्तर को रोकने के लिये भूगर्भ जल निदेशालय, उत्तर प्रदेश द्वारा भौम जल स्तर का नियमित रूप से निरीक्षण किया जाता है। जनपद में लगभग 28 प्रेक्षण कुएँ हैं, जो खुले हुए है तथा इनका व्यास लगभग 1.35 मीटर है। इन कुओं के जलस्तर का नियमित प्रेक्षण 1991 से प्राप्त है। इन प्रेक्षित कुओं की अवस्थिति चित्र संख्या 3.4 में दर्शायी गयी है। धरातल पर प्रेक्षित कुओं का वितरण असमान है। सबसे अधिक प्रेक्षण कूपों की संख्या चकरनगर विकासखंड में 08 एवं सबसे कम प्रेक्षण कुएँ ताखा भर्थना एवं सैफई विकास खंडों में है। इन विकासखंडों में दो-दो प्रेक्षण कुएँ हैं। वढ़पुरा विकास खंड में 5 प्रेक्षण कुएँ हैं। जसवंतनगर, बसरेहर एवं महेवा विकासखंडों में प्रेक्षण कुओं की संख्या 3-3 है।

तालिका 3.6 जनपद इटावा - प्रेक्षण कूपDistrict Etawah Observation Wells & Tubewells 2004-05जनपद में उन स्थानों के कूपों को प्रेक्षण के लिये चुना गया है, जिन क्षेत्रों में जल स्तर तीव्र गति से गिर रहा है। इसी कारण चकरनगर एवं बढ़पुरा विकास खंड जिनमें कि अधिकांश बीहड़ भाग का विस्तार होने से पानी बहकर नदियों में चला जाता है, में प्रेक्षण कूप अधिक हैं।

भौम जल स्तर की गहराई :


अध्ययन क्षेत्र में भौम जलस्तर की गहराई में स्थान व समय दोनों में भिन्नता है, क्षेत्र के अध्ययन के समय शोधार्थी ने कुछ खुले कुओं के जलस्तर के आंकड़े एकत्र किये हैं। चकरनगर विकास खंड जनपद के दक्षिण भाग में स्थित है। जिसकी समुद्र तल से ऊँचाई 143 मीटर के लगभग है। यहाँ भौमिक जल की गहराई सबसे अधिक 38.23 मीटर है। वर्षा का पानी बिना रुके सीधा बहकर यमुना चंबल आदि नदियाँ में चला जाता है। जिससे पुनर्भरण कम से कम हो पाता है, परिणामत: जल स्तर अधिक गहराई पर मिलता है। जनपद में उत्तर भाग से दक्षिण भाग की ओर जाने पर जल स्तर में निरंतर गिरावट देखने को मिलती है। जल स्तर की गहराई स्रोत तल रेखा XX एवं YY खींची गयी है जो प्रकट करती है कि संपूर्ण जनपद जलोढ़ मिट्टी द्वारा निर्मित है। यह क्षेत्र पुरातन जलोढ़ क्ले, कांकर, सिल्ट बालू मौरम बजरी द्वारा निर्मित है। YY रेख स्पष्ट करती है कि क्ले मिट्टी की सबसे कम गहराई बसरेहर विकासखंड (6.15 मी.) तथा सबसे अधिक 12.50 मी. बढ़पुरा विकासखंड में मिलती है। कंकड़ मिश्रित क्ले की गहराई 108 मी. जसवंतनगर विकासखंड में तथा सबसे कम ताखा विकासखंड में 36.92 मी. है। XX रेखा से स्पष्ट है कि क्ले मिट्टी की सबसे अधिक गहराई चकरनगर विकासखंड में 28.15 मी. तथा सबसे कम गहराई बसरेहर विकास खंड में 6.15 मी. है। कंकड़ मिश्रित क्ले की सबसे अधिक गहराई विकासखंड चकरनगर में 82.3 मी. तथा सबसे कम गहराई तथा विकासखंड में 38.92 मी. है। संपूर्ण स्टेटाचार्ट के अवलोकन करने पर पता चलता है कि दक्षिणी भाग में अर्थात चकरनगर वि.खं. लगभग 28 मी. पर होना चाहिए था, जल के पुनर्भरण न हो पाने के कारण 38.23 मी. पर मिलता है, जबकि बसरेहर विकासखंड में 18 मी. पर होना चाहिए था। नहरों एवं समतल भू-भाग होने से अधिक जल का पुनर्भरण हो रहा है, फलत: जल स्तर 4.12 मी. पर मिलता है।

District Etawah Minimum Depth of water table Pre Mansoon (2004)भौम जल स्तर की गहराई धरातल के नीचे एवं समुद्र तल के ऊपर मानसून पूर्व तथा मानसूनोत्तर महीनों का जल स्तर सन 2004 के प्रेक्षित कूपों के एकत्र आंकड़ों की सहायता से समोच्च रेखाओं द्वारा प्रदर्शित किया गया है। मई के महीने में जनपद में धरातल से भौम जल स्तर की गहराई अधिकतम है। इस समय सबसे अधिक गहराई विकासखंड चकरनगर एवं बढ़पुरा में क्रमश: 38.23 एवं 26.16 मीटर है तथा महेवा, जसवंतनगर, सैफई, ताखा एवं भर्थना विकासखंडों में यह गहराई क्रमश: 9.00, 7.41, 7.13, 5.33 एवं 4.85 मीटर पायी गई है। सबसे कम गहराई बसरेहर विकासखंड में 4.12 मीटर है। अर्थात जनपद के उत्तरी पश्चिमी भाग का औसत जल स्तर 6.22 मीटर, उत्तर पूर्वी भाग का जल स्तर 4.77 मीटर है। जबकि दक्षिणी एवं दक्षिणी-पश्चिमी भाग का औसत जल स्तर 32.19 मीटर है। अत: उत्तर से दक्षिण दिशा में जाने पर भौमजलस्तर में गिरावट प्रारंभ हो जाती है। दक्षिण भाग का औसत जल स्तर 32.19 मीटर इसके विपरीत उत्तरी पूर्वी भाग का जल स्तर 4.77 मीटर यह स्पष्ट करता है कि उत्तर दिशा से दक्षिण दिशा की ओर जाने में जल स्तर का ग्राफ तीव्र गति के साथ गिरता है। जनपद के उत्तरी भाग में समतल भूमि, नहर सिंचाई की उत्तम व्यवस्था होने के कारण जल का अधिक पुनर्भरण होता है परिणामत: जल स्तर काफी ऊपर मिलता है, जबकि दक्षिण भाग में सभी विकासखंड बीहड़ी होने एवं सिंचाई सुविधाओं का अभाव होने के कारण जल स्तर काफी गहराई पर मिलता है।

अध्ययन क्षेत्र में अधिकतम एवं न्यूनतम भौम जलस्तर समोच्च रेखाओं द्वारा प्रदर्शित किया गया है। भूमिगत जल स्तर की अधिकतम गहराई मई माह में जनपद के दक्षिणी भाग में पायी जाती है। यहाँ का जल स्तर औसत जल तल 38 मी. से भी अधिक है, जबकि उसी माह में जनपद के उत्तरी पूर्वी भाग का जल स्तर 4 मीटर के लगभग है। जनपद के उत्तर पश्चिम दिशा में विकासखंड जसवंतनगर का जल स्तर 7 मीटर से अधिक है। अत: उत्तर पश्चिम से दक्षिण पश्चिम एवं उत्तर पूर्व दिशा की ओर जाने पर जल स्तर में निरंतर कमी होती चली जाती है। अत: स्पष्ट है कि जनपद के उत्तरी विकासखंडों का जल स्तर अधिक तथा दक्षिणी भाग में जल स्तर कम ऊँचाई पर मिलता है।

District Etawah Minimum Depth of water table post Mansoon (2004)

भौम जलस्तर का रूप :


भौम जल स्तर शायद ही समतल सतह के रूप में पाया जाता है। वास्तव में यह विभिन्न उच्चावच लक्षणों के अनुरूप देखा गया है। किसी क्षेत्र के भौम जल स्तर के विभिन्न रूपों को उच्चावच मानचित्र के समान प्रदर्शित किया जाता है, अत: यह नहीं कहा जा सकता कि भौम जल स्तर भू-पृष्ठ की अल्प प्रतिकृति है। अध्ययन क्षेत्र में भौम जल कटक शायद ही कहीं देखा गया है। भौमिक जल की घाटी मुख्य धारा के अ:धस्य में पाई जाती है। अर्थात यमुना एवं चंबल, भौम जल स्तर की पूर्व मानसून एवं मानसूनोत्तर मौसम की समोच्च रेखाएँ इस लक्षण को स्पष्ट रूप से नहीं दर्शाती हैं, क्योंकि कुछ प्रेक्षण कूपों का ही अभिलेख प्राप्त है।

भौम जल स्तर का उतार-चढ़ाव :


भौम जल स्तर का उतार चढ़ाव बहुत महत्त्व रखता है, क्योंकि यह जल संसाधन की उपलब्धता को प्रभावित करता है। विशेषतया कूपों के भौम जल स्तर में उतार चढ़ाव भौम जल के पुनर्भरण एवं विसर्जन का परिणाम है। वास्तव में भौम जल उस समय बढ़ता है जब पुनर्भरण विसर्जन की तुलना में अधिक होता है तथा विपरीत दशा में घटता है। किसी अवधि में भौम जल स्तर में उतार-चढ़ाव की दर एवं मात्रा उसी अवधि में पुनर्भरण घटने या बढ़ने पर पूर्णत: निर्भर करती है।शोधकर्ता ने भौम जल स्तर का उतार चढ़ाव विकासखंड बार अभिकलित किया है जैसा कि निम्न तालिका में दर्शाया गया है।

तालिका सं.- भौम जल स्तर का उतार चढ़ाव (2004-05) उपर्युक्त तालिका से स्पष्ट है कि जनपद के जल स्तर का उतार चढ़ाव भर्थना विकासखंड में 1.78 मीटर है। जबकि विकासखंड बढ़पुरा में न्यूनतम उतार चढ़ाव 0.26 मीटर है। जनपद में 2004-05 का औसत उतार चढ़ाव 1.32 मीटर था। अधिकतम उतार चढ़ाव भर्थना विकास खंड में 1.78 मी. है, जो औरैया जनपद से स्पर्श करता हुआ NH-2 (नेशनल हाइवे) के दोनों ओर स्थित है। यह संपूर्ण विकास खंड जलोढ़ मिट्टी द्वारा निर्मित है। दूसरी ओर न्यूनतम उतार चढ़ाव यमुना एवं चंबल के बेसिनों में अर्थात जनपद के दक्षिणी पश्चिमी दिशा में बढ़पुरा एवं चकरनगर विकासखंडों में देखने को मिलता है। भौम जल स्तर का उतार चढ़ाव उन क्षेत्रों में अधिक है जहाँ जल की गहराई कम या जलस्तर ऊँचा है तथा उतार चढ़ाव उन क्षेत्रों में कम है, जहाँ जल स्तर तुलनात्मक रूप से नीचा है, विशेषत: जनपद के दक्षिण पश्चिम में।

समय के संबंध में भौम जल स्तर का उतार चढ़ाव स्थानिक उतार चढ़ाव की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण है। यद्यपि भौम जल स्तर का उतार चढ़ाव प्रत्येक माह में अधिक है। भौम जल स्तर को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक जलवायु उच्चावच एवं चट्टान संरचना की जलीय विशेषताएँ तथा जल का प्रचुर विसर्जन है।

उतार-चढ़ाव का वर्षा से संबंध :


वर्षा सबसे महत्त्वपूर्ण कारक है जो भौमिक जल भंडार की पुन: पूर्ति तथा भौम जल स्तर के उतार चढ़ाव को प्रभावित करता है। उतार चढ़ाव की मात्रा एवं दर, वर्षा की मात्रा एवं समय की अवधि द्वारा सुनिश्चित होती है। संपूर्ण जनपद में वर्षा की मात्रा में विभिन्नता के कारण भौम जल स्तर के माहवार उतार चढ़ाव को अभिलिखित किया गया है। संपूर्ण औसत वार्षिक वर्षा का लगभग 90 प्रतिशत भाग मध्य जून से मध्य अक्टूबर के बीच प्राप्त होता है। संपूर्ण क्षेत्र में भौम जल स्तर में प्राय: प्रतिवर्ष वृद्धि सामान्य वर्षा वाले वर्ष में जुलाई से सितंबर माह के अंत तक अनवरत रूप से होती है। यह वृद्धि अधिक वर्षा वाले वर्ष में अक्टूबर तक तथा कम वर्षा वाले वर्ष में सितंबर के प्रथम सप्ताह तक होती है। भौम जल स्तर का उतार सामान्य वर्षा वाले वर्ष में अक्टूबर से, अधिक वर्षा वाले वर्ष में नवंबर से तथा कम वर्षा वाले वर्ष में मध्य सितंबर के अंतिम सप्ताह से प्रारंभ होता है। संपूर्ण क्षेत्र में जल स्तर का उतार प्रतिवर्ष जून तक होता रहता है। मासिक वर्षा एवं भौम जल स्तर की गहराई के मध्य संबंध को प्रदर्शित करने हेतु 4 वर्षों की (2001 से 2004) वर्षा को आधार माना गया है। विभिन्न भू आकृतिक प्रदेश से पाँच प्रेक्षित कूप जसवंतनगर, ताखा, बढ़पुरा, चकरनगर एवं बसरेहर लिये गये हैं। भौम जल स्तर सभी चुने गये प्रेक्षित कूपों में जून के अंतिम सप्ताह से बढ़ना प्रारंभ हो जाता है, और यह वृद्धि अक्टूबर तक होती रहती है। जिनकी भू-तल से अधिकतम गहराई 38.84 मीटर (चकरनगर) अंकित है, नवंबर माह से मई तक यह बढ़ती जाती है, क्योंकि इन महीनों में न्यूनतम वर्षा होती है।

उतार चढ़ाव का पंपिंग से संबंध :


नलकूपों के पम्पन द्वारा भौम जल का विसर्जन जलांतर के उतार-चढ़ाव के मौसमी प्रतिरूप को प्रक्षेपित करता है। अत्यधिक पंपिंग क्षेत्र एवं नहर सिंचित क्षेत्र के मध्य भौम जलस्तर के उतार चढ़ाव में भिन्नता देखी गयी है क्योंकि नलकूप भौम जल भंडार का पुनर्भरण पद्धति द्वारा जल का निष्कर्षण करता है। पंपिंग में तीव्रता की वृद्धि के कारण भौमिक जल स्तर में अंतर होना स्वाभाविक है। मि. ऑडन का विचार था कि पंपिंग का भौम जल स्तर पर प्रभाव नगण्य है। जैसा कि उन्होंने अपनी रिपोर्ट में अभिलेखित किया है। वर्तमान अन्वेषण के अंतर्गत संबंधित आंकड़ों के न होने के कारण नलकूप पंपिंग का भौमिक जल स्तर पर प्रभाव का पता नहीं लगाया जा सकता है।

उतार-चढ़ाव का वाष्पन एवं वाष्पोत्सर्जन से संबंध :


भू-पृष्ठ के निकट अपरिरुद्ध जलभृत का प्रभाव भौम जल स्तर के दैनिक उतार चढ़ाव पर देखा गया है। जो वाष्पन एवं वाष्पोत्सर्जन के कारण होता है। यद्यपि भौमिक जल का विसर्जन वाष्पन-वाष्पोत्सर्जन के द्वारा नगण्य है, तथापि कुछ विशेष परिस्थितियों में यह महत्त्वपूर्ण हो जाता है। यह देखा गया कि वाष्पन की तीव्रता भौम जल स्तर की गहराई में वृद्धि के साथ भू-तल से नीचे गिरकर तथा 2.5 से 3.5 मीटर की गहराई पर समाप्त हो जाती है। वाष्पोत्सर्जन की हानियाँ उन क्षेत्रों में होती है जहाँ भौम जल स्तर भू-तल के निकट है। संपूर्ण जनपद में कुछ ही कुएँ ऐसे हैं, जिनका जल स्तर भू-तल से 4 मीटर से भी कम गहराई पर है। इन स्थलों पर वाष्पन एवं वाष्पोत्सर्जन का प्रभाव अंकित किया गया है। किंतु वाष्पन एवं वाष्पोत्सर्जन के विस्तृत आंकड़ों के अभाव में इसके प्रभाव के सही परिणाम प्राप्त नहीं किये जा सकते हैं।

उतार-चढ़ाव का निस्यंदन से संबंध :


असंतृप्त मंडल में अंत:प्रवाही निस्यंद वर्षा, नहर, चिरवाहनी धाराओं तथा तालाबों द्वारा होता है। नहरों द्वारा अंत:प्रवाही निस्यंद दो प्रकार से होता है। प्रथम संस्तर द्वारा निस्यंद, द्वितीय सिंचित भूमि द्वारा निस्यंद लेकिन अध्ययन क्षेत्र के अंतर्गत इसका कोई महत्व नहीं है। नहर सिंचित क्षेत्र में भौम जल स्तर शुष्क ऋतु (मई एवं जून) तथा शीत ऋतु (नवंबर एवं दिसंबर) में ऊपर उठता है। ये प्रमुख सिंचाई के मौसम के महीने हैं। उत्तरी भाग के प्रमुख प्रेक्षण कुएँ भोगनीपुर नहर शाखा एवं इटावा नहर शाखा के निकट स्थित हैं। जो कुएँ नहरों के सिंचित क्षेत्र से दूर स्थित हैं, उनका जल स्तर उठाने में नहरों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

जब कोई नदी धारा अपरिरुद्ध जलभृत के संपर्क में आती है, तो वह भौमिक जल स्तर का पुनर्भरण कर देती है। धारा की बाढ़ अवधि में भौमिक जल तल धारा से अंतर्वाह द्वारा उसके जलमार्ग के निकट धारा से अंतर्वाह बढ़ जाता है। धाराओं के साथ-साथ गहरे ताल एवं जलाशय भी भौम जल भंडार में पुनर्भरण करते हैं। कुल जलाशयों से निष्यंदन हानि उनकी अभिकल्पित क्षमता की लगभग 35 प्रतिशत तक हो जाती है। नि:संदेह अंत: प्रवाही निष्यंदन के स्रोत बहुत कम हैं।

भौम जल का उपलब्धता एवं विसर्जन :


उपलब्धता :
जनपद में भूमिगत जल उपलब्धता का महत्त्वपूर्ण स्थान है। भू-गर्भ जल विभाग उत्तर प्रदेश 2005 के आधार पर जनपद के भू-जल का वार्षिक पुनर्भरण कुल 79691.39 हेक्टेयर मीटर है। भूमिगत जल की मात्रा पर वर्षा की प्राप्ति चट्टानों की सरंध्रता एवं संरचना तथा धरातलीय स्वरूप आदि का प्रभाव पड़ता है। अध्ययन क्षेत्र जनपद इटावा में विकास खंड स्तर पर भूमिगत जल के पुनर्भरण की मात्रा में असमानता मिलती है, जो तालिका संख्या- 3.8 से स्पष्ट है।

तालिका सं. 3.8 जनपद इटावा - विकासखण्डवार भूजल उपलब्धतातालिका क्रमांक 3.8 के आधार पर जनपद में विकास खंड स्तर पर उपलब्ध भूमिगत जल की पुनर्पूरण मात्रा के आधार पर जनपद को तीन भागों में रखा जा सकता है।

District Etawah Available of underground water 2004-05तालिका सं.-3.9 भौम जल की उपलब्धता

जल उपलब्धता के क्षेत्र :


(1) उच्च उपलब्धता के क्षेत्र - (12000 हेमी से अधिक)
इस वर्ग में जनपद के बसरेहर एवं महेवा विकास खंडों को सम्मिलित किया गया है। जिनमें जनपद के कुल पुनर्भरण का क्रमश: 19.97 एवं 15.18 प्रतिशत है। इसमें बसरेहर विकास खंड में 15916.73 एवं महेवा विकासखंड में 12098.62 हेक्टेयर मीटर जल का उपलब्ध है। इन विकास खंडों में समतल भूमि एवं नहर सिंचाई का अधिक विकास होने के कारण भूमिगत जल का अधिक पुनर्भरण स्वाभाविक है।

(2) मध्यम उपलब्धता के क्षेत्र - (8000 से 12000 हे.मी. के मध्य)
इस संवर्ग के अंतर्गत जनपद के तीन विकासखंड जिनमें जसवंत नगर, ताखा एवं भर्थना आते हैं। इन विकासखंडों में जनपद के कुल 31.08 प्रतिशत क्षेत्रफल पर कुल जल के पुनर्भरण का 40.04 प्रतिशत वार्षिक होता है। जसवंतनगर विकासखंड जनपद का 10.33 प्रतिशत क्षेत्रफल रखता है, जिसमें कुल पुनर्भरण का 14.41 प्रतिशत है। ताखा एवं भर्थना विकासखंड जनपद के कुल क्षेत्रफल का 10.11 एवं 13.40 प्रतिशत क्षेत्र रखते हैं जिनमें जनपद के वार्षिक पुनर्भरण का क्रमश: 13.19 एवं 12.44 प्रतिशत है।

(3) निम्न उपलब्धता के क्षेत्र (8000 हे. मी. से कम) :
इस संवर्ग में जनपद के तीन विकासखंड आते हैं। इसके अंतर्गत चकरनगर बढ़पुरा एवं सैफई विकासखंड जनपद के कुल क्षेत्रफल के 47 प्रतिशत पर केवल 20.81 प्रतिशत जल का पुनर्भरण होता है। विकासखंड चकरनगर में जनपद के 18.70 प्रतिशत क्षेत्र पर 7.22 प्रतिशत, बढ़पुरा विकासखंड में 10.53 प्रतिशत क्षेत्र पर 8.62 प्रतिशत एवं सैफई विकासखंड में 18.46 प्रतिशत क्षेत्रफल पर मात्र 8.97 जल का पुनर्भरण होता है। चकरनगर एवं बढ़पुरा विकासखंड जनपद के दक्षिणी भाग में अवस्थित है। इन विकासखंडों के मध्य से जनपद की दो प्रमुख बड़ी नदियों यमुना एवं चंबल के गुजरने से बीहड़ क्षेत्र का अधिक विस्तार हो गया है। अत: वर्षा काल में वर्षा का जल बिना किसी अवरोध के तीव्रगति से बहकर नदियों में चला जाता है। परिणामत: इन विकास खंडों में कम से कम जल का पुनर्भरण हो पाता है।

भू-जल का विसर्जन :


भौम जल का विसर्जन दो प्रकार से होता है : (1) चिरवाहिनी सरिताओं में बहिस्रावी निस्यंद, तालों, नहरों, तालाबों, झरनों तथा खुले कूपों द्वारा विसर्जन प्राकृतिक विसर्जन के अंतर्गत आता है। (2) नलकूपों एवं आर्टीजन कूपों तथा कृत्रिम विधियों से भौम जल का पंपन द्वारा निस्यंदन। इन विधियों द्वारा भौम जल के दोहन से भौमिक जल भंडार में काफी कमी आ जाती है।

भौम जल का विसर्जन झरनों द्वारा भी देखा गया है। ये झरने दो अपरागम्य चट्टान की सतहों या चिकनी बलुई मृत्तिका की प्रवेश्य सतहों के बीच एकत्रित जल के दबाव द्वारा बनते हैं। यद्यपि अध्ययन क्षेत्र में झरने नहीं पाये जाते हैं तथापि भौम जल की काफी मात्रा तल एवं किनारों द्वारा चिरवाहिनी धाराओं में विसर्जित हो जाती है। इस क्षेत्र में कुछ चिरवाहनी नदियाँ बहि:स्रावी निस्यंदन द्वारा भर जाती हैं। लेकिन आंकड़ों की अनुपस्थिति में इस प्रक्रम द्वारा भौम जल के विसर्जन की वास्तविक मात्रा को ज्ञात करना असंभव है। गहरे पक्के तालाब एवं चिर स्थाई तालाबों द्वारा भी भौम जल का विसर्जन होता है। इस क्षेत्र में सभी प्रकार के खुले कुएँ संतृप्त दशा में भौम जल का विसर्जन करते हैं।

भौम जल के कृत्रिम विसर्जन का प्रमुख स्रोत नलकूप हैं। नलकूपों से जनपद के चकरनगर, बढ़पुरा, जसवंतनगर, महेवा, सैफई आदि विकासखंडों में जल पर्याप्त मात्रा में खीचा जाता है। सिंचाई विभाग एवं अधिष्ठापित नलकूपों के अतिरिक्त निजी फैक्ट्री मालिकों द्वारा भी घरेलू व औद्योगिक उपयोग हेतु नलकूप संस्थापित किए गये हैं। जल संचयन एवं कृत्रिम भूजल रिचार्ज योजना 2004-05 के आधार पर जनपद में विकासखंडवार भूगित जल विसर्जन के प्रारूप को निम्नवत अभिकलित किया गया है।

तालिका सं.-3.10 विकासखण्डवार भूजल का विसर्जन (2004-05)District Etawah Draft of underground water 2004-05तालिका क्रमांक 3.10 से स्पष्ट है कि जनपद इटावा में भूमिगत जल का उपयोग 27016.76 हे.मी. है। विकासखंडवार भूमिगत जल के उपयोग को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है-

1. उच्च भूजल उपयोग (15 प्रतिशत से अधिक) -
इस संवर्ग के विकासखंडों में अत्यधिक भूमिगत जल का दोहन किया जा रहा है। इसके अंतर्गत जसवंतनगर, भर्थना, बसरेहर एवं महेवा विकासखंडों को सम्मिलित किया गया है। जसवंतनगर जनपद के वार्षिक विसर्जन का 5237.87 हे.मी. अर्थात 19.39 प्रतिशत है। भर्थना विकासखंड जनपद के कुल वार्षिक विसर्जन का 4622.06 हे.मी. अर्थात 17.11 हे.मी. है। ताखा विकासखंड 2991.17 हेक्टेयर मीटर अर्थात 11.07 प्रतिशत वार्षिक भूमिगत जल का विसर्जन होता है, जबकि महेवा 4158.97 हे.मी. अर्थात 15.39 प्रतिशत भूमिगत जल का उपयोग कर रहे हैं।

2. मध्यम भू-जल उपयोग (10 से 15 प्रतिशत के मध्य) :
इस संवर्ग के अंतर्गत जनपद का एक मात्रा विकासखंड ताखा आता है। जो 2991.17 हे.मी. अर्थात जनपद के कुल जल उपयोग का 11.07 प्रतिशत जल का उपयोग करता है। इस विकासखंड में सिंचाई के साधनों के रूप में नहर सिंचाई का अधिक विकास हुआ है, फलत: नलकूपों द्वारा भूमिगत जल का कम से कम दोहन होता है।

3. निम्न भू-जल का उपयोग (10 प्रतिशत से कम) :
इस संवर्ग के अंतर्गत जनपद के तीन विकासखंडों सैफई, बढ़पुरा एवं चकरनगर विकासखंडों को सम्मिलित किया गया है। सैफई जनपद कुल भूमिगत जल विसर्जन का 2243.37 हे. मी. अर्थात कुल भूमिगत जल का 8.30 प्रतिशत उपयोग करता है। बढ़पुरा एवं चकरनगर विकासखंड में कुल जल उपयोग क्रमश: 1769.03 एवं 1712.20 हेक्टेयर मीटर अर्थात जनपद के कुल भू-जल उपयोग का 6.55 एवं 6.34 प्रतिशत है। इन विकासखंडों में कम भू-जल उपयोग का प्रमुख कारण बीहड़ क्षेत्र का अधिक विस्तार अथवा समतल भूमि का अभाव है। अत: नलकूपों का अधिक विकास नहीं हो सकता है। फलत: इन विकासखंडों में बहुत कम भूमिगत जल का उपयोग किया जा रहा है।

भूमिगत एवं सतही जल की विशेषताएँ :


भौम जल स्तर को मुक्त जल एवं केशिका फिंज के बीच में स्पर्शी तल के रूप में परिभाषित किया जाता है। भूमिगत जल की ऊपरी सतह को ‘‘भौम जल स्तर’’ कहते हैं। रवेदार पदार्थ के अंतर्गत भौम जल स्तर की वास्तविक सतह का निर्धारण कठिन है। भूमिगत जल स्तर एक जलभृत में या तो अपरिरुद्ध या परिरुद्ध में द्रवस्थौतिक दाब को सूचित करता है, यह पूर्व में भौम जल स्तर और अंत में दाब समोच्च पृष्ठ से संबंधित होता है। भूमिगत जल तल भौमिक जल के भंडार की मात्रा को परावर्तित करता है।

यह क्षेत्र के पुनर्भरण एवं विसर्जन की विभिन्नता के कारण भौम जल में होने वाले उतार-चढ़ाव को सूचित करता है। भू पृष्ठ के नीचे पृष्ठीय स्थलाकृति का भौम जल स्तर ‘‘अल्प प्रतिकृति’’ होती है। भूगर्भिक दृष्टिकोण से शैल सीमेंटेशन के अध:स्थ पेटी में अपक्षय ऑक्सीकरण एवं शैल विघटन की क्रियाएँ भौम जल स्तर को निर्धारित करती हैं।

सतही जल नदियों, तालाबों एवं नहरों में पाया जाता है। अत: यह भूमिगत जल की अपेक्षा सुगमता से प्राप्त हो जाता है। यह जल वर्षा ऋतु में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध रहता है। वाष्पीकरण, भू-जल रिसाव के कारण अन्य ऋतुओं में इसका प्राय: अभाव रहता है। सतही जल का सबसे अधिक उपयोग सिंचाई व्यवस्था के रूप में किया जाता है।

 

इटावा जनपद में जल संसाधन की उपलब्धता, उपयोगिता एवं प्रबंधन, शोध-प्रबंध 2008-09

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1

प्रस्तावना : इटावा जनपद में जल संसाधन की उपलब्धता, उपयोगिता एवं प्रबंधन (Availability Utilization & Management of Water Resource in District Etawah)

2

भौतिक वातावरण

3

जल संसाधन की उपलब्धता का आकलन एवं वितरण

4

अध्ययन क्षेत्र में कृषि आयाम

5

अध्ययन क्षेत्र में नहर सिंचाई

6

अध्ययन क्षेत्र में कूप एवं नलकूप सिंचाई

7

लघु बाँध सिंचाई

8

जल संसाधन का कृष्येत्तर क्षेत्रों में उपयोग

9

जल संसाधन की समस्यायें

10

जल संसाधन प्रबंधन

 

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