जलवायु परिवर्तन - समाधान नहीं तो तबाही रोकना मुश्किल

Submitted by UrbanWater on Fri, 09/15/2017 - 09:52

आर्कटिक में किसी फ्रीजर की तरह प्राचीन जीवाणु और विषाणु और कार्बन संरक्षित हैं। 1400 गीगाटन कार्बन डाइऑक्साइड बर्फ के नीचे दफन है। ये बर्फ के पिघलते ही बाहर आ जाएगी। इसके साथ ही बड़ी मात्रा में मीथेन, कार्बन डाइऑक्साइड और दूसरी गैसें भी बाहर निकलेंगी। 120 गीगाटन कार्बन डाइऑक्साइड साल 2100 तक बर्फ पिघलने से वातावरण में बढ़ जाएगी। वहीं बर्फ के पिघलने के साथ ही समंदर में पानी का स्तर भी बढ़ेगा जो तटवर्ती शहरों की जमीन और सड़कों कों अपनी चपेट में लेकर तबाह कर देगा।

Climate change-Difficult to prevent destruction if not solution
जलवायु परिवर्तन एक भीषण समस्या है। वह एक ऐसी अनसुलझी पहेली है जिससे समूची दुनिया जूझ रही है। बाढ़, सूखा, जानलेवा बीमारियों में बेतहाशा बढ़ोत्तरी इसी का नतीजा है। असलियत तो यह है कि मौजूदा हालात में इसके प्रभाव से कुछ भी अछूता नहीं है। यह कहना किसी भी दशा में गलत नहीं होगा। यदि शीघ्रतिशीघ्र इसका समाधान निकालने में दुनिया के देश नाकाम रहे तो इसमें दो राय नहीं कि समस्त प्राणी जगत का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।

दरअसल जलवायु का मानव जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान है। मानवीय जीवन और उसकी क्रियाएँ जलवायु से स्पष्टतः प्रभावित होती हैं। यह कटु सत्य है कि विश्व की जलवायु कभी भी स्थिर नहीं रही है। पृथ्वी की उत्पत्ति से लेकर आज तक इसमें लगातार परिवर्तन होते ही रहे हैं। कभी पृथ्वी का तापमान कम हो जाता है और हिम की परतें इसके धरातल पर आच्छादित हो जाती हैं तो कभी तापमान बढ़ जाता है और बर्फ पिघलने लगती है।

जलवायु में होने वाले ये बदलाव दीर्घकालिक प्रक्रिया के तहत होती हैं लेकिन पिछले दशकों से वैश्विक जलवायु में तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है। इस बदलाव के पीछे मनुष्य के अंधे विकास की चाहत का सबसे बड़ा हाथ है। दरअसल इसका सबसे बड़ा कारण वह विकास है जिसमें पर्यावरण को पीछे धकेल दिया गया है। असलियत में हमारी सरकारों को विकास के अलावा कुछ दिखाई ही नहीं दे रहा है। जबकि विडम्बना यह कि सरकारें पर्यावरण सुधार का दावा करते नहीं थकतीं। लेकिन पर्यावरण की गुणवत्ता में सुधार सरकारों के विकासवादी इस अड़ियल तरीके से तो कदापि नहीं आ सकता। उसी का परिणाम जलवायु परिवर्तन के रूप में हमारे सामने है।

दुख इस बात का है कि इसकी दिन-ब-दिन बेतहाशा बढ़ोत्तरी में अनियंत्रित औद्योगिक विकास और सुख-संसाधनों की अंधी दौड़ का महत्त्वपूर्ण योगदान है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता। यह जानते-समझते हुए भी न तो सरकारें अपने हठ को छोड़ना चाहती हैं यानी विकास की अनियंत्रित रफ्तार को कम करने को तैयार हैं और न ही समाज यानी हम अपनी पाश्चात्य सभ्यता से ओत-प्रोत जीवनशैली को छोड़ने को तैयार हैं। बल्कि उसमें दिनोंदिन आकंठ डूबते चले जा रहे हैं। समस्या की असली जड़ यही है।

बीते दिनों केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री सुदर्शन भगत ने लोकसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में बताया कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़े हुए तापमान का दबाव दूध देने वाले पशुओं पर काफी नुकसानदेह हो सकता है। उन्होंने यह स्वीकार किया है कि देश के विभिन्न हिस्सों में जलवायु परिवर्तन के चलते दुग्ध उत्पादन में 1.8 मिलियन टन की कमी आई है।

वैश्विक तापमान वृद्धि से साल 2020 तक दुग्ध उत्पादन में 1.6 मिलियन टन तक और 2050 तक 15 मिलियन टन से अधिक तक नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। उनके अनुसार जलवायु परिवर्तन का ज्यादा दूध देने वाली संकर गायों और भैंसों पर स्वदेशी गौपशुओं की तुलना में सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ेगा। इससे साबित होता है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से हमारे दुधारू पशु भी अछूते नहीं हैं। ऐसे हालात में इंसान की क्या दुर्गति होगी, उसका सहज अन्दाजा लगाया जा सकता है। जहाँ तक खाद्यान्न का सवाल है, चावल को ही लें, दुनिया में धान की खेती के मामले में हमारा देश दूसरे पायदान पर है।

दुनिया में कुल 15 करोड़ हेक्टेयर जमीन पर 45 करोड़ टन चावल का उत्पादन होता है जिसमें विश्व के कुल उत्पादन का 20 फीसदी चावल भारत करता है। धान देश की सर्वाधिक उत्पादित की जाने वाली फसल है। देश में 4.2 करोड़ हेक्टेयर जमीन पर 9.2 करोड़ मीट्रिक टन चावल पैदा होता है लेकिन बढ़ते तापमान से उस पर ग्रहण लगने वाला है। लेकिन बढ़ते तापमान की वजह से आने-वाले दिनों में हम चावल के दाने-दाने को मोहताज हो जाएँगे। ह्यूलेट फाउंडेशन के प्रोग्राम ऑफिसर मैट बेकर के मुताबिक 2030 में भारतीय उपमहाद्वीप का तापमान काफी बढ़ जाएगा। इस वजह से धान की फसल उगाना बहुत मुश्किल हो जाएगा। तात्पर्य यह कि आने वाले 13 सालों में ही हम चावल के लिए मोहताज हो जाएँगे। इसके लिये जरूरी है कि भारत सौर विकिरण प्रबन्धन पर काम करे ताकि पृथ्वी के तापमान को नीचे लाया जा सके।

हालात की भयावहता का अन्दाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जलवायु परिवर्तन के कारण दिन-ब-दिन बढ़ रही गर्मी से निबटने के लिये लॉस एंजिलिस में सड़कों पर कुलसील नामक चीज की एक खास तौर से बनाई गई परत चड़ाई जा रही है। वह भी इसलिये कि आने वाले दस-बीस सालों में शहर के तापमान को तीन डिग्री तक कम किया जा सके। गौरतलब है कि कुलसील सिलेटी रंग की चीज होती है। इसे खासतौर पर तैयार किया जाता है। अक्सर देखा गया है कि चीज सूर्य की किरणों और उष्मा को अवशोषित कर सूर्य की किरणों और उष्मा को वापस कर देती है। उल्लेखनीय है कि साल 2015 में सैन फर्नांडो वैली में भी वहाँ की सड़कों पर पहली बार कुलसील की परत चड़ाई गई थी। सैन फर्नांडो वैली लॉस एंजिलिस की सबसे गर्म जगहों में से एक है। वैली का तापमान गर्मी के दिनों में बहुत ही ज्यादा रहता है। इससे वहाँ का जनजीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है और गर्मी की वजह से त्राहि-त्राहि मच जाती है।

ब्यूरो ऑफ स्ट्रीट सर्विसेज के सहायक निदेशक ग्रेग स्पॉट्स के अनुसार सैन फर्नांडो वैली की सड़कों पर कुलसील की परत चड़ाए जाने से वहाँ का तापमान 10 डिग्री सेल्सियस तक ठंडा रहने लगा। जिसकी वजह से लॉस एंजिलिस की सड़कों पर कुलसील की परत चड़ाने का निर्णय लिया गया ताकि जलवायु परिवर्तन के चलते तापमान में बढ़ोत्तरी से कुछ राहत मिल सके।

आर्कटिक काउंसिल की हालिया रिपोर्ट की चेतावनी पर नजर डालें तो पता चलता है कि जलवायु परिवर्तन के चलते 2040 तक आर्कटिक सागर की बर्फ का बीस फीसदी हिस्सा पिघल जाएगा। इससे बड़ी मात्रा में बर्फ के अन्दर जमे जीवाणु और विषाणु बाहर आ जाएँगे। इससे साढ़े तीन करोड़ लोग सीधे-सीधे प्रभावित होंगे। गौरतलब है कि आर्कटिक सागर उत्तरी गोलार्द्ध के 25 फीसदी हिस्से पर फैला है।

यहाँ अगले 20 से 25 साल में 0.5 से दो डिग्री सेल्सियस तक तापमान बढ़ सकता है। एक डिग्री तापमान में बढ़ोत्तरी होने से 40 लाख वर्ग किलोमीटर आर्कटिक की बर्फ पिघल जाएगी। और तो और दो डिग्री तापमान में बढ़ोत्तरी का नतीजा यह होगा कि दुनिया की तकरीब 40 फीसदी बर्फीली जमीन खत्म हो जाएगी। आर्कटिक की बर्फ पिघलने के परिणामस्वरूप समूची दुनिया में चेचक और एंथ्राक्स जैसी भयंकर जानलेवा बीमारियाँ फैलेंगी। रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक तापमान में बढ़ोत्तरी के चलते आर्कटिक सागर की बर्फ तेजी से सिकुड़ रही है। इसके लक्षण साफ-साफ सामने आने लगे हैं।

आर्कटिक में किसी फ्रीजर की तरह प्राचीन जीवाणु और विषाणु और कार्बन संरक्षित हैं। 1400 गीगाटन कार्बन डाइऑक्साइड बर्फ के नीचे दफन है। ये बर्फ के पिघलते ही बाहर आ जाएगी। इसके साथ ही बड़ी मात्रा में मीथेन, कार्बन डाइऑक्साइड और दूसरी गैसें भी बाहर निकलेंगी। 120 गीगाटन कार्बन डाइऑक्साइड साल 2100 तक बर्फ पिघलने से वातावरण में बढ़ जाएगी। वहीं बर्फ के पिघलने के साथ ही समंदर में पानी का स्तर भी बढ़ेगा जो तटवर्ती शहरों की जमीन और सड़कों कों अपनी चपेट में लेकर तबाह कर देगा। इमारतों के धराशायी होने का खतरा भी बढ़ेगा। कनाडा और सर्बिया के इलाके इससे ज्यादा प्रभावित होंगे।

इसमें किंचित मात्र भी सन्देह नहीं कि जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव से क्या इंसान, जीव-जन्तु, पक्षी, फल-फूल, पेड़-पौधे, जमीन, जल, जंगल, वन्यजीव, जैव विविधता, भूजल स्रोत, वनस्पतियाँ, तितलियाँ, मधुमक्खियाँ, फसलें, खाद्यान्न, दुग्ध, स्वास्थ्य, समस्त प्राकृतिक संसाधन आदि पृथ्वी पर कुछ भी ऐसा नहीं है जो अछूता बचा हो। इससे अभी तक प्रकृति का जो नुकसान हुआ है उसकी भरपाई में तो हजारों साल लग जाएँगे। यदि हम अब भी नहीं चेते तो प्रकृति हमें कभी भी माफ नहीं करेगी। यह भी जान लें कि घरेलू उपकरण भी जो तापमान में वृद्धि में अहम भूमिका निभा रहे हैं, इससे पर्यावरण के साथ-साथ सेहत भी प्रभावित हो रही है। नतीजतन लोग गम्भीर जानलेवा बीमारियों की चपेट में तेजी से आ रहे हैं। हर साल गर्मी रिकार्ड तोड़ रही है। नतीजन ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं।

दुनिया के वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों ने जो आशंका हमारे सामने व्यक्त की है उसे दृष्टिगत रखते हुए समय रहते सावधानी बरतना ही मानव जाति के हित में है। अब समय आ गया है कि हम अपनी आवश्यकताओं को सीमित रखें और अति भौतिकवादी होने से बचें। पर्यावरणीय दृष्टि से अनुकूल तकनीकी विकास, जैव उर्वरक, जैव कीटनाशकों के उपयोग और बायो ईंधन को तरजीह दें, आवश्यक हो तभी वृक्ष काटें और उसके स्थान पर कम-से-कम पाँच वृक्ष जरूर लगाएँ, मैंग्रोव वनों के सफाए को रोकें, तभी हम एक स्वस्थ मानव समाज की कल्पना कर सकते हैं और किसी हद तक इस समस्या के प्रभाव को कम करने में कामयाब हो सकते हैं। इस दिशा में यही बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। अन्यथा तबाही को रोक पाना आसान नहीं होगा।

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एक परिचय:


. 21 जनवरी 1952 को एटा, उ.प्र. में शिक्षक माता-पिता के यहाँ जन्म।

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