जंगल, पहाड़ और पानी

Submitted by Hindi on Thu, 09/07/2017 - 10:42


.इस साल फिर सूखे के आसार हैं। फसलें सूख रही हैं। रोग लग रहे हैं। किसानों के माथे पर चिंता के बादल घिर रहे हैं। उनकी उम्मीदों पर पानी फिर रहा है। पिछले कुछ सालों में लगातार सूखा, अनियमित वर्षा और कभी कम वर्षा की स्थिति बनी हुई है। इस लेख में हम पानी और जंगल के रिश्ते को समझने की कोशिश करेंगे, जिससे यह समझने में मदद मिले कि आखिर बारिश क्यों नहीं हो रही है।

हाल के बरसों में यह देखा जा रहा है कि गाँवों के अधिकांश कुआँ, बावड़ियाँ और तालाब सूख रहे हैं। सदानीरा नदियाँ मर रही हैं। नदियों के किनारे के आस-पास की छोटी-छोटी झाड़ियाँ, पेड़ और घास-फूस अब नहीं हैं। ये सब मिलकर न केवल नदियों को सदानीरा बनाते थे बल्कि भू-पृष्ठ के पानी को सोखकर नीचे तक पहुँचाकर भूजल में वृद्धि करते थे।

सतना जिले के किसान और देशी बीजों के जानकार बाबूलाल दाहिया कहते हैं “ ये जंगल ही उपजाऊ मिट्टी भी बनाते हैं। वे कहते हैं कि पहाड़ के पत्थरों के संधि स्थलों में पेड़ों की पत्तियाँ झड़-झड़कर जमा होती हैं और सड़-गल कर इन्हीं पत्थरों के क्षरण के साथ उपजाऊ मिट्टी बनाती हैं।”

आज जब नदियाँ सूख रही हैं, रह-रह कर अपने बचपन की याद आती है, जब दुधी नदी में पूरे साल भर पानी रहता था। यह नदी मध्यप्रदेश के पूर्वी छोर पर होशंगाबाद जिला और नरसिंहपुर को विभक्त करती है। इसी नदी के किनारे के गाँव में मेरा बचपन बीता है।

हम देखा करते थे इस नदी के किनारे कोहा (अर्जुन), गूलर, लडेन, झाऊं, गोंदरा, जामुन, बहेड़ा, महुआ, करंज इत्यादि कई प्रकार के वृक्ष और छोटी- मोटी झाड़ियाँ होती थीं। ये सभी वृक्ष पानीदार हैं, यानी इनमें पानी की मात्रा ज्यादा होती है। यानी पेड़ भी एक तरह से पानी ही है।

इसके अलावा, लम्बी चौड़ी पड़ती में दरे (बेर) की झाड़ियाँ होती थी। तरियों (नदी कछार की जमीन) में कहार, बरौआ सब्जियों की खेती करते थे। नदी की रेत में डंगरबाड़ी ( तरबूज-खरबूज) की खेती होती थी। वहीं पर बरौआ मड़ैया (घास-फूस) डालकर रहते थे। तरबूज-खरबूज की खेती में पौधों की अच्छी परवरिश करनी पड़ती है।

हमारे यहाँ की सभी नदियाँ वनजा हैं। यानी वनों पर, जंगल पर निर्भर हैं। ये नदियाँ मानसून की बारिश से मिले पानी से बहती हैं या फिऱ जंगल जो इस पानी को स्पंज की तरह सोखकर अपने में समाहित करता है, इससे सदानीरा रहती हैं। यानी अगर इन नदियों के किनारे अच्छे जंगल रहेंगे तो ये नदियाँ बहती रहेंगी।

इसका एक उदाहरण होशंगाबाद जिले की देनवा नदी है, जहाँ एक ओर दुधी जैसी उसी पड़ोसी नदियाँ सूख गईं पर देनवा निरंतर प्रवाहमान है। क्योंकि देनवा के रास्ते में अब भी दोनों ओर अच्छा जंगल है, जबकि दुधी, ओल, मछवासा, पलकमती, शक्कर जैसी नदियों के किनारे का जंगल लगभग खत्म हो गया है या बहुत कम बचा है।

जंगल के पेड़ न केवल पानी का भंडार अपने में समोते हैं बल्कि मिट्टी को भी बांध कर रखते हैं। भू-क्षरण रोकते हैं जिससे नदियों में गाद कम जमा होती है। जबकि जंगल और पेड़ कम होने से नदियाँ उथली हो जाती हैं और जलधाराएँ मद्धिम पड़ जाती हैं। पेड़ों के कम होने से बारिश होती है तो पानी रूक नहीं पाता है और बाढ़ की स्थिति निर्मित हो जाती है।

बाबूलाल दाहिया बताते हैं कि “घने वन होने के कारण बादल वहाँ रम जाते हैं और सफेद सी लम्बी बादलों की पर्त उन पेड़ों पर दिखने लगती है। गाँव में लोग इन्हें बादलों का चरना कहते हैं। पिछले 20-25 वर्षों से न तो बादलों की वह सफेद चादर दिखती हैं और न ही पहले जैसी बारिश ही हो रही है।”

दाहिया जी बताते हैं कि “जहाँ वन रहते हैं, वे खुद गर्मी झेलते हैं और नीचे ठंडक देते हैं। पर जब पेड़ कट जाते हैं तो सूरज की गरमी सीधी धरती पर पड़ती है और गर्मी व तापमान बढ़ते जाता है। यही गर्मी ऊपर से गुजरने वाले बादलों को और ऊपर उठा देती है और बिना बरसे ही बादल ऊपर ही ऊपर उड़ जाते हैं। अब अधिकांश पहाड़ पेड़ विहीन हो गए हैं। इसलिए नदियाँ भी सूख गई हैं। अगर जंगल बचाएँगे तो पानी होगा, नदियाँ सदानीरा होगी और बारिश भी आएगी।” दाहिया जी बहुत ही सुंदर उपमा देते हैं कि “अगर हवाई अड्डा (जंगल) ही नहीं होगा तो हवाई जहाज (बादल) कैसे उतरेगा।”

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं
 

Disqus Comment

More From Author

Related Articles (Topic wise)

Related Articles (District wise)

About the author

बाबा मायारामबाबा मायारामबाबा मायाराम लोकनीति नेटवर्क के सदस्य हैं। वे स्वतंत्र पत्रकार व शोधकर्ता हैं। उन्होंने देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इन्दौर से 1989 में बी.ए.

नया ताजा