खाटू-सिरोही लिनियामेंट के कारण जोधपुर में भूकम्प का खतरा

Submitted by Hindi on Mon, 11/20/2017 - 10:47
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Source
राजस्थान पत्रिका, 20 नवम्बर, 2017

जोधपुर। जमीन के नीचे इंडियन प्लेट पर खाटू से लेकर सिरोही तक का लिनियामेंट एक्टिव हो गया है यानी यहाँ की जमीन कमजोर होने से भू-गर्भ की ऊर्जा निकलने का खतरा बढ़ गया है। इसके चलते मारवाड़ और मेवाड़ को पृथक करने वाले इलाकों में भूकम्प की आशंका बढ़ती जा रही है। विशेषकर पाली जिले में, जहाँ रह-रहकर कई बार हल्के भूकम्प आते रहते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जोधपुर में शनिवार को आया भूकम्प भी इसी लिनियामेंट के समानान्तर था। ऐसे में अब अरावली क्रेटोन का अध्ययन अनिवार्य हो गया है। पूरा विश्व भूगर्भ के नीचे कई प्लेटों के ऊपर तैर रहा है। भारत इंडियन प्लेट पर टिका हुआ है। भारत के अलावा श्रीलंका, अफगानिस्तान, नेपाल, बर्मा और फिलिपींस इंडियन प्लेट पर टिके हुए हैं। इस प्लेट के किनारों पर नेपाल व अफगानिस्तान जैसे देश हैं, इसलिये ये दोनों भूकम्प के लिहाज से सर्वाधिक खतरे वाले जोन पाँच में आते हैं। इंडियन प्लेट के पीछे का हिस्सा शील्ड के रूप में है, जहाँ राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र का पश्चिमी हिस्सा आता है।

भुज में इंडियन प्लेट कटी हुई है जो सम धोरों तक फैली हुई है। इंडियन प्लेट, चाइना प्लेट से लगातार टकरा रही है। चाइना प्लेट मजबूत है जिसकी वजह से इंडियन प्लेट के टकराने पर इसके कमजोर हिस्सों से ऊर्जा निकलती है। इंडियन प्लेट पर कई लिनियिमेंट हैं, जिसमें खाटू से सिरोही तक लिनियामेंट महत्त्वपूर्ण है। इंडियन प्लेट जैसे ही चाइना प्लेट से टकराती है, सबसे कमजोर लिनियामेंट से सिस्मिक तरंगों के माध्यम से ऊर्जा बाहर निकल आती है।

कमजोर हो गई अरावली की परिधि


खाटू-सिरोही लिनियामेंट अरावली की परिधि के पास स्थित है। अरावली विश्व की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं यानी गोंडवाना लैण्ड का हिस्सा है। अरावली की परिधि कमजोर होने से उसके किनारे बसे भू-स्थलों पर धरती डोलने का खतरा कुछ बढ़ जाता है।

अब अध्ययन जरूरी हो गया


राजस्थान के नीचे टेक्टोनिक प्रक्रिया में बदलाव हो रहा है। ऐसे में अब यहाँ की प्लेट, लिनियामेंट और चट्टानों का अध्ययन अनिवार्य हो गया है, ताकि बदलते समय के साथ भूकम्प जोन का पुनर्निर्धारण किया जा सके। खाटू से लेकर सिरोही तक के लिनियामेंट की वजह से जोधपुर, पाली और आस-पास के इलाकों में भूकम्प आ सकते हैं। -प्रो. एससी माथुर, भू-विज्ञान विभाग, जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर।

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