एक रहस्य - कफनौल गाँव का रिंगदू पाणी

Submitted by UrbanWater on Sat, 03/04/2017 - 13:34


कफनौल जलकुण्डकफनौल जलकुण्ड उत्तराखण्ड हिमालय में जल संरक्षण के प्रति लोगों का जुड़ाव देखने को मिल ही जाता है। पानी को लोग देवतुल्य मानते हैं। अर्थात जल संरक्षण के उपादान में यहाँ के लोगों का सूत्र आध्यात्म है। जल संस्कृति व संरक्षण की बात को लोग वेद पुराणों में लिखित कथानक के अनुसार आगे बढ़ाते हैं। सच यह है कि अधिकांश स्थानों के नाम इन वेद-पुराणों से मिलते-जुलते भी हैं।

दिलचस्प यह है कि बासुकीनाथ की स्थली उत्तराखण्ड के कफनौल गाँव में विद्यमान है। इस स्थान पर एक जल कुण्ड है जो कभी सूखता ही नहीं था। अब तो 15 वर्षों में इस कुण्ड का पानी एकदम कमतर ही हो गया है। गर्मियों में तो यह कुण्ड सूख ही जाता है। जबकि कभी लोग इस कुण्ड को कफनौल गाँव का रिंगदू पाणी कहकर जानते थे और बासुकी नाथ के नाम से पवित्र मानते थे। इधर से गुजरने वाले लोग इस पानी को आचमन करने से ही अपने आप को धन्य मानते थे। यही नहीं 250 परिवार वाले इस गाँव की 3000 की जनसंख्या मात्र इसी कुण्ड पर निर्भर रहती थी।

जबसे यह कुण्ड यानि रिंगदू पाणी सूखने की कगार पर आया तब से इस गाँव के लोग पेयजल का संकट भुगतने को विवश हैं। इस कुण्ड का पानी क्यों सूखा? इस पर लोगों के अलग-अलग मत हैं। कुछ लोग कहते हैं पानी की पवित्रता को भ्रष्ट किया जा रहा है। कुछ का मत है कि गाँव के सिरहाने के ऊपर जो जंगल था वह मौजूदा वक्त में कट चुका है और इसी जंगल में जो चाल-खाल (बरसात को एकत्रित करने वाले ताल) थी वह सभी तहस-नहस हो चुकी है। इस कारण भी गाँव में मौजूद कुण्ड सूखने की कगार पर आ चुका है। अधिकांश ग्रामीणों का कहना है कि इस कुण्ड की जो पहले-पहल परम्परागत रूप से पवित्रता थी उसे लोग भूलते जा रहे हैं। इसे बनाए रखने के बाद से ही कुण्ड का पानी वापस आ सकता है।

ज्ञात हो कि महाभारत में एक प्रसंग बासुकीनाथ का आता है। इस प्रसंग की चर्चा उत्तराखण्ड के किसी भी गाँव व शहर में सुनाई तक नहीं देती सिवाय उत्तरकाशी के कफनौल गाँव के। इसी गाँव के पास एक ऊँची पहाड़ी है। इस पूरी पहाड़ी का नाम ही स्थानीय भाषा में ‘‘बौख नाग का टिब्बा’’ कहते हैं। इस शब्द का जब महाभारत के एक अध्याय में अध्ययन करने की कोशिश की गई तो उस अध्याय में धूप कुण्ड, रूपनौल इत्यादि का जिक्र है जो कि बौख नाग टिब्बा के आस-पास ही के रमणिक स्थल हैं।

कफनौल कहने व सुनने से लगता है कि यहाँ काफी नौले होंगे और इस गाँव में निश्चित तौर पर बहुत सारे जलस्रोत हैं भी। जो कुण्ड नुमा तथा ‘नौले’ के आकार के थे।

पिछले 15 वर्षों के अन्तराल में इस गाँव में सम्पूर्ण जलस्रोत सूख चुके हैं। अब मात्र एक ही कुण्ड शेष है जिसे ‘देवता का पानी’ कहते हैं। लोग इस पानी की पूजा प्रत्येक माह की सक्रांति में करते हैं तथा यह पानी गाँव की पेयजल आपूर्ति भी करता है। पहले इस कुण्ड के बाहर एक लकड़ी का मन्दिर बना था अब पत्थर व सीमेंट से मन्दिर बनाया गया है। इस मन्दिर में अनुसूचित जाती के लोग तथा महिलाओं का प्रवेश वर्जित है। यह कुण्ड भी नक्कासीदार पत्थरों से बनाया गया है।

बेकल की झाड़ी और उसमें लगे फलबताया जाता है कि गाँव के सामने पर बौखटिब्बा पर्वत से एक गाय रोज आकर उक्त स्थान पर एक बेकल नामक प्रजाति की झाडीनुमा पेड़ पर दूध छोड़ कर जाती थी। गाँव के पास एक बाड़िया नाम का राजा रहता था। उसने अपने कर्मचारियों को गाय को जिन्दा अथवा मुर्दा पकड़ने के आदेश दिये। राजा के कर्मचारियों ने उक्त गाय को मार कर राजा के सुपूर्द किया। तब गाय ने राजा को श्राप दिया था कि तेरे कुल का सर्वनाश इस गति से होगा कि पीछे से आनी वाली पीढ़ी राजा के नाम तक की खोज ना कर पाये।

निश्चित रूप से राजा के कुल का सम्पूर्ण नाश हो गया। आज भी जहाँ राजा रहता था वहाँ का नाम बाड़क नामक तोक से जाना जाता है। परन्तु गाय जिस जगह पर दूध छोड़ती थी वहाँ बेकल नामक वह झाड़ी प्रजाति ने एक पेड़ का रूप ले लिया और लोगों ने उसी प्रजाति की लकड़ी से वहाँ मन्दिर बनवा डाला। मन्दिर बनाते समय उक्त स्थान पर एक कुण्ड भी प्रकट हुआ, तथा दो मूर्तियाँ भी प्राप्त हुईं। यह मूर्तियाँ आज भी बौखनाग देवता के रूप में गाँव-गाँव में पूजी जाती है। आज यह स्थान देवतुल्य माना जाता है।

पानी के संरक्षण बाबत जो भी कहानियाँ गाँव और लोगों के बीच आज जिन्दा हैं उनकी महत्ता इस बात को लेकर कह सकते हैं कि कथानुसार लोग पानी बचाने व संरक्षित करने के लिये कितने संवेदनशील थे, जो अब किसी भी नागरिक और सत्ता व्यवस्था में कहीं पर भी दिखाई नहीं देता। यहाँ तक कि वर्तमान में जो विकासीय योजनाएँ बन रही हैं उनमें भी पानी को लेकर योजनाकारो की संवेदनशीलता नहीं दिखाई देती है।

वर्तमान की विकास योजनाओं में ना तो पानी को लेकर आध्यात्म को महत्त्व दिया जा रहा है और ना ही पानी के संरक्षण के लिये विशेष कार्य की पहल की जा रही है। पानी के संरक्षण व उपयोग को लेकर लब्बोलुआब यह हैं कि लोगों ने पानी को कभी वस्तु के रूप में नहीं देखा। पानी को जिन्दगी का एक अभिन्न हिस्सा माना था। यही वजह रही कि उन दिनों पानी की कोई किल्लत पूर्व के लोगों के पास नहीं थी। कह सकते हैं कि कफनौल गाँव के जैसे राज्य के अन्य गाँवों में पानी का अकाल पड़ने वाला है।
 

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प्रेम पेशे से स्वतंत्र पत्रकार और जुझारु व्यक्ति हैं, विभिन्न संस्थानों और संगठनों के साथ काम करते हुए बहुत से जमीनी अनुभवों से रूबरू हुए। उन्होंने बहुत सी उपलब्धियाँ हासिल की।

 

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