निष्ठापूर्वक निष्काम सेवा से ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति

Submitted by RuralWater on Sun, 05/06/2018 - 12:46
Source
सन्तुलित पर्यावरण और जागृत अध्यात्म, 2006

 

धरती पर जन्म लेने पर इस संसार में शरीर धारण करके प्रवेश करने पर मनुष्य को कर्म किये बिना दूसरा चारा नहीं, मार्ग नहीं। वैसे उपनिषदों की सिखावन ‘जिजीविषा’ का-जीने की इच्छा का-त्याग करना ही सुझाती है-लेकिन किस तरह और किसलिये? कामना-विकार वासनाओं को क्षीण करने के लिये यह त्याग होगा। यहाँ तो सौ साल जीने की इच्छा करो ऐसी आज्ञा ही श्रुति माता दे रही है! यह भी किस तरह का जीवन जीने की आज्ञा है?

‘शिवोभूत्वा शिवं यजेत्।’ ‘तत्त्व मसि’ इन सूत्रों के निदिध्यास के बाद जो जागृति आती है वह कर्म-शून्य नहीं होती। सारे कर्म अपने आप, प्रसंगों के अनुरूप होते रहते हैं। उनका स्वरूप यज्ञमय होता है। कर्म यज्ञमय होने का अर्थ है कर्तापन बचता नहीं ‘मैंने किया’ यह भान नहीं होगा। मात्र कार्य प्रकट रहेगा। सभी को प्रवेश देकर और भी प्रवेश के लिये अवकाश रखने वाले आकाश के समान हो गये कि कर्म का बोझ कैसे लगेगा, वह कर्म फिर हल्का-फुल्का हो जाता है। भक्त का चित्त इस तरह आकाश के जैसा, अलिप्त, निरात हो जाता है। ज्ञानेश्वर फिर उसकी विशेषता कह देते हैं-

व्यापक आणि उदास। जैसे कि हे आकाश।
तैसे जयाचे मानस सर्वत्र गा।।

आकाश के समान जिसका मन व्यापक और उदास यानी ‘उत-आसीन’ सभी विकारों की वासनाओं की दलदल से ऊपर उठा हुआ-होता है तब उसका ‘मन पना’ यानी चंचलता, भोग के पीछे दौड़ लगाने की आदत-समाप्त हो जाती है। फिर उसे मर्यादित करने वाली सारी दीवारें धराशायी होती हैं तब अन्तिम स्थिति में सर्वव्याप्ति में विलीन होने पर उसकी पहचान क्या होगी? ज्ञानेश्वर महाराज ने यह अन्तिम कड़ी भी जोड़ दी।

हे विश्व चि माझे घर। ऐसी मति जयाची स्थिर।
किंबहुना चराचर। आपणचि जाहला।।


उसकी बुद्धि का यह पक्का निश्चय हो जाता है कि यह अखिल विश्व ही मेरा घर है। इतना ही नहीं, यह चराचर सृष्टि हिलने-डुलने वाली चर और पहाड़ के जैसी स्थिर अचर या द्विविध सृष्टि इन दोनों रूपों में खड़ी अखिल प्रकृति वह स्वयं ही बन जाता है।

मन की चंचलता समाप्त होकर वह ‘चाहिए नहीं चाहिए’ के द्वन्द्व से ऊपर उठ जाने तक कर्म निष्ठापूर्वक करना जरूरी है। चित्त की व्याप्ति सर्वत्र होने की गुरू चाभी है निष्काम कर्म। शिवाजी महाराज के गुरू स्वामी रामदास ने ठोक-पीट कर कहा था-

केल्या ने होत आहे रे।
आधी केलेचि पाहिजे।।


करने से ही होता है, इसलिये पहले करना ही आवश्यक है। कर्म करने से दुहरा कार्य होता है : निष्कामता चित्त में पैठ जाती है और समाज का रूप संवरता है, सम्हला जाता है। सभ्यता संस्कृति का नया युगानुरूप स्वरूप खिलता है। इस प्रकार का सेवा का कर्म करते-करते ही ब्रह्म-रूप कैसे हो जाते हैं-यह भी उपनिषदों ने ही स्पष्ट किया है। ज्ञान के जितना, बोध के समान ही कर्म का अधिकार मुक्त रूप से, लेकिन जोर देकर उपनिषद वर्णन करते हैं। ‘ईशावास्य’ उपनिषद ने तो मानों आज्ञा ही दी है-

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेत् शतं समाः।
एवं त्वयि नान्य था अस्ति न कर्म लिप्यते नरे।।


धरती पर जन्म लेने पर इस संसार में शरीर धारण करके प्रवेश करने पर मनुष्य को कर्म किये बिना दूसरा चारा नहीं, मार्ग नहीं। वैसे उपनिषदों की सिखावन ‘जिजीविषा’ का-जीने की इच्छा का-त्याग करना ही सुझाती है-लेकिन किस तरह और किसलिये? कामना-विकार वासनाओं को क्षीण करने के लिये यह त्याग होगा। यहाँ तो सौ साल जीने की इच्छा करो ऐसी आज्ञा ही श्रुति माता दे रही है! यह भी किस तरह का जीवन जीने की आज्ञा है? कर्म करते-करते ही जीना है तो निष्काम बनने के लिये कामना छूट गई कि किया हुआ कर्म मनुष्य के चित्त को पकड़ नहीं सकता ‘मैंने किया’ इस अहंकार को छेद देने के लिये, उसे समाप्त करने के लिये निर्लेप कर्म का अनुष्ठान हो इसी हेतु से कर्म करने का विधान प्रकट हुआ है। श्रीकृष्ण की गीता ने तो फलाशा से मुक्त हुआ कर्म ही अनुष्ठान के लायक होता है क्योंकि वही मुक्तिदायी, सुखकारी कैसे होता है इसका गुणगान किया है।

‘छांदोग्य’ उपनिषद् में एक अद्भुत कथा इसी निष्काम कर्म निष्ठा को स्पष्ट करती है। सत्यकाम जाबाल नाम के लड़के को अपने पिता का नाम और गोत्र की विशेषता का पता ही नहीं था। सत्य की जिज्ञासा तीव्र थी। गुरुदेव के पास पहुँचकर उसने सत्य बता दिया और माता का नाम ‘जाबाला’ कहा। सत्यकाम सचमुच जीवन के सत्य की कामना करने वाला सुयोग्य शिष्य है, उसको फालतू, व्यर्थ की विद्याएँ नहीं चाहिए यह गुरु गौतम जी ने पहचान लिया। यह लड़का दुनिया में कहीं भी जाएगा तो उसे जिस बात का आकर्षण है उसे वह अवश्य सीखेगा। यह वे जान गये। उन्होंने सत्यकाम को वन भेज दिया, साथ में गो-वंश के पशु दिये और कहा कि “इनकी संख्या एक सहस्र हो जाने पर उन्हें लेकर वापस आना।” सत्यकाम गौ-सेवा का यह कार्य करने के लिये वन में चला गया। निष्ठापूर्वक उसने यह काम किया। अनेक वर्षों के इस काल में उसने प्रकृति के विविध रूप देखे।

सभी ऋतु, ग्रह-नक्षत्र-तारक, आकाश-धरती, जल-स्रोत और वृक्षों का साम्राज्य, पशु-पक्षियों का जीवन-क्रम सब कुछ उसने निकटता से, सृष्टि के साथ एकरूप होकर देखा, समझा और अत्यन्त प्रेमपूर्वक गो-वृषभों की सेवा की। अपने इस एकाकी जीवन में उसने सबके साथ मित्रता की। समय कैसा बीता उसे पता ही नहीं चला। तब एक दिन एक वृषभ ने उससे कहा- “अब हम एक सहस्र हो गये हैं, सत्यकाम! तुमने हमारी खूब सेवा की है। हम कृतज्ञतापूर्वक तुम्हें सर्वव्याप्त जीवन का प्रथम- ‘प्रकाशवान’ चरण बता देते हैं।” सत्यकाम ने सारी सृष्टि की विविधता को ही गुरु रूप में देखा था। अब वायु देवता ने वृषभ रूप में उसे उपदेश दिया। जीवन सत्य की पहचान के रूप में ‘प्रकाशवान’ चरण उसे प्रथम प्राप्त हुआ।

उपदेश का दूसरा चरण अग्नि देवता ने खोलकर दिखाया। ‘अनन्तवान’। सूर्य देव ने ‘ज्योतिष्मान’ चरण हंस, रूप में प्रकट होकर सिखाया और चौथा चरण ‘आयत्तनवान’ यानी सबका ‘आयतन’-या ‘निवासस्थान’ प्राण तत्व ने मुर्गे के रूप में प्रकट होकर सिखा दिया। इन चारों देवताओं को सत्यकाम ने गुरु रूप में ही देखा और उन्हें ‘भगवन’ कहकर पुकारा, प्रणाम किया और उनका उपदेश ग्रहण किया। इस उपदेश का निदिध्यासान करते हुए वह सहस्र गो-वृषभों को लेकर गुरु गौतम के आश्रम पर पहुँचा।

इस समय गुरु-सेवा और गौ-सेवा को निष्काम कर्म करके जो तेजस्विता जीवन में आई थी-उसका तेज चेहरे पर प्रकट हो रहा था और सत्य के चार चरण उसमें गहरे उतरे थे। गुरु गौतम ने उसका तेजस्वी चेहरा व गम्भीर व्यक्तित्व देखकर उसे कहा- वत्स! तेरा मुख-तेज मानो यही जाहिर करता है कि तुम ब्रह्म-ज्ञान में पारंगत हो गये हो! ‘ब्रह्माविदेव त्वं भासि।’ परन्तु सत्यकाम सत्य ज्ञान के कारण नम्र हो गया था। उसने कहा- भगवन प्रत्यक्ष गुरु-मुख से श्रवण किये बिना ब्रह्म-ज्ञान परिपूर्ण नहीं होता ऐसी ही मान्यता है। “भगवदृशेभ्य आचार्याद्धैव विद्या विदिता साधिष्टम्। इसलिये श्रेय तो आपको ही जाता है।” तब खुश होकर मात्र अपनी मान्यता प्रकट करने के लिये उन्होंने कहा- “वत्स! जो कुछ तुम्हें प्राप्त हुआ है वही है ब्रह्मज्ञान, अब इससे अधिक कुछ सीखने का शेष रहा नहीं है।”
 

 

सन्तुलित पर्यावरण और जागृत अध्यात्म

 

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें)

क्रम संख्या

अध्याय

1.

वायु, जल और भूमि प्रदूषण

2.

विकास की विकृत अवधारणा

3.

तृष्णा-त्याग, उन्नत जीवन की चाभी

4.

अमरत्व की आकांक्षा

5.

एकत्व ही अनेकत्व में अभिव्यक्त

6.

निष्ठापूर्वक निष्काम सेवा से ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति

7.

एकात्मता की अनुभूति के लिये शिष्यत्व की महत्त्वपूर्ण भूमिका

8.

सर्व-समावेश की निरहंकारी वृत्ति

9.

प्रकृति प्रेम से आत्मौपम्य का जीवन-दर्शन

10.

नई प्रकृति-प्रेमी तकनीक का विकास हो

11.

उदार चरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम

12.

अपना बलिदान देकर वृक्षों को बचाने वाले बिश्नोई

13.

प्रकृति विनाश के दुष्परिणाम और उसके उपाय

14.

मानव व प्रकृति का सामंजस्य यानी चिपको

15.

टिहरी - बड़े बाँध से विनाश (Title Change)

16.

विकास की दिशा डेथ-टेक्नोलॉजी से लाइफ टेक्नोलॉजी की तरफ हो

 

Disqus Comment