बाघ बनाम इंसान का कवि

Submitted by RuralWater on Sat, 04/28/2018 - 18:48
Source
डाउन टू अर्थ, अप्रैल, 2018


गाँव, नदी, जंगल, पहाड़ से लेकर भाषा तक में जो बाजार आ चुका था, केदारनाथ सिंह अपनी कविताओं में बहुत अच्छी तरह से उसकी पहचान कर रहे थे

केदारनाथ सिंहकेदारनाथ सिंह“आज सुबह के अखबार में
एक छोटी-सी खबर थी
कि पिछली रात शहर में
आया था बाघ!
किसी ने उसे देखा नहीं
अंधेरे में सुनी नहीं किसी ने
उसके चलने की आवाज
गिरी नहीं थी किसी भी सड़क पर खून की छोटी-सी एक बूँद भी
पर सबको विश्वास है
कि सुबह के अखबार में छपी हुई खबरगलत नहीं हो सकती
कि जरूर-जरूर पिछली रात शहर में आया था बाघ”


इंसान बनाम पर्यावरण जैसे बड़े मसले पर इतनी सहजता से कविता रच जाने वाले वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह अब हमारे बीच नहीं रहे। लेकिन जब कवि ऐसा रच जाता है कि वह मुहावरा बन जाता है तो उसका एक क्रिया के रूप में जाना कुछ देर के लिये खौफनाक लगता है। लेकिन जब हम कविताओं को देखते हैं तो लगता है कि कवि कहीं जाता नहीं है। साठोत्तर दशक में जब नगरीकरण, वैश्वीकरण इंसान को नए साँचे में ढाल चुका था तो इस नए तरह के इंसान को कविता की नई भाषा दी केदारनाथ सिंह ने।

अपने जंगल और गाँव से दूर हुआ इंसान, जिसके पास न अब नदी बची थी और न झरना। जब वह शहर आता है तो गाँव की ओर देखने लगता है और जब गाँव जाता है तो उसे लगता है कि शहर ने उसके लिये कुछ छोड़ा ही नहीं कठफोड़वा से लेकर चींटी तक से जो उसका ऑर्गेनिक (सहजीवन) रिश्ता था वह खत्म हो चुका था। लेकिन शहर के बालू-पत्थर और कुतुबमीनार जैसी इमारतों में न उसके लिये जगह थी और न बाघ के लिये। अब न उसे गाँव मिल सकता है और न बाघ को जंगल।

“कह देना पिता से सब ठीक-ठाक है
हवा है
पानी है
बस्ती के बाहर एक छोटा-सा क्रबिस्तान है
सब ठीक-ठाक है।”


आज का विस्थापित इंसान बाघ के साथ अपने पिता से भी बिछुड़ चुका है। हवा, पानी के साथ वह कब्रिस्तान होने की भी जानकारी दे देता है अपने पिता को। खत्म हो जाना इस समय का सबसे बड़ा सच है और जंगल, पेड़, नदियों की तरह इंसान भी खत्म हो रहा। इसलिये केदारनाथ सिंह अपनी कविताओं में मृत्यु के साथ बहुत संवाद करते हैं। उनकी कविताएँ जड़ों से अलगाव के खिलाफ हैं, इंसान के विस्थापन का शोक-गीत है। कोई मुखर राजनीतिक सन्देश दिये बिना नए इंसानों के लिये नई कविता गढ़ना ही इनका मकसद दिखता है।

विस्थापितों के लिये भाषा भी सत्ता का एक औजार ही है और केदारनाथ सिंह इसके संज्ञा, सर्वनाम, कारक, विभक्ति को पकड़ते हुए इसका एक व्याकरण भी रचते हैं। हिन्दी से लेकर भोजपुरी तक का सवाल उठाते हैं। दिल्ली जैसे महानगर में वह भोजपुरी को गुम पाते हैं तो सत्ता के गलियारों को कहते हैं कि भाषा को भाषा ही रहने दो। वह यह भी ऐलान करते हैं कि यह जानते हुए कि लिखने से कुछ नहीं होता, वह लिखेंगे। उन्हें इस बात का भी अहसास है कि जिनके लिये वह लिखेंगे वह उनकी भाषा समझ नहीं पाएँगे, उन तक उनकी किताब पहुँचेगी ही नहीं।

‘डुमरियागंज’ जैसा छोटा इलाका हिन्दुस्तान के नक्शे में तो गुम रहता है लेकिन वह साधारण सा शहर कवि के नायक का शहर है। केदारनाथ सिंह की कविता का आदमी बहुत साधारण है इसलिये उनकी कविता की भाषा भी बहुत साधारण है। लोकभाषाओं की महत्ता बताते हुए कवि आज भी लोक की जुबान को सबसे बड़ी लाइब्रेरी बताते हैं। गैरबराबरी के इस समाज में जिनके पास अक्षर और शैक्षणिक संस्थान नहीं पहुँचने दिये गए हैं उनकी जुबान को ही अक्षर क्यों न माना जाये, उनके गीत, शोक, पीड़ा की गूँजती आवाज को ही लाइब्रेरी क्यों न माना जाये।

जंगल, गाँव से उजड़ शहर और बाजार की गिरफ्त में फँसे आदमी का सपना थे केदारनाथ सिंह। अपनी कविता से शहर और गाँव के बीच एक पुल बनाकर एक आवाजाही बरकरार रखते थे। उन्हें उम्मीद थी पुल से एक बाघ शहर की ओर आएगा और अखबार में उसके आने की खबर को लोग सच मानेंगे। आज शहर में बाघ का होना खबर है और इंसान का अपना गाँव और जंगल खोना भी एक खबर है। लोक को अपने खोए हुए की चेतना से लैस करने वाले कवि हैं केदारनाथ सिंह।

जन्म: 07 जुलाई, 1934
मृत्यु: 19 मार्च, 2018

 

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