केंचुआ खाद-टिकाऊ खेती एवं आमदनी का अच्छा स्रोत

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Source
प्रसार शिक्षा निदेशालय, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, राँची, जनवरी-दिसम्बर 2009


.बढ़ती हुई जनसंख्या एवं अधिक उत्पादन के लिये सीमित भूमि पर अधिक मात्रा में रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग मिट्टी की उर्वरा शक्ति को ह्रास कर रही है एवं मिट्टी, जल तथा वायु तीनों को प्रदूषित कर रहा है। रासायनिक उर्वरकों का अधिक मूल्य भी किसानों की आर्थिक स्थिति को कमजोर करते जा रहा है। ऐसी परिस्थिति में यदि किसान जैविक उर्वरक एवं रासायनिक उर्वरक के बीच सन्तुलन स्थापित कर अपने फसलों में प्रयोग करें तो कम लागत में अच्छा उत्पादन प्राप्त करते हुए टिकाऊ खेती की परिकल्पना कर सकते हैं। इस बात को ध्यान में रखते हुए कृषि विज्ञान केन्द्र, चतरा ने किसानों के घर में उपलब्ध कम्पोस्ट एवं अन्य घरेलु अवशेष के माध्यम से वर्मी कम्पोस्ट उत्पादन का कार्यक्रम बनाया। इसके लिये सर्वप्रथम हंटरगंज प्रखण्ड के खुटी केवाल ग्राम के किसानों के साथ बैठक कर वैसे 25 किसानों को चयनित किया गया जिसके पास कम से कम 2 मवेशी उपलब्ध हों और उन्हें दो दिन का प्रशिक्षण कृषि विज्ञान केन्द्र में दिया गया।

प्रशिक्षण के दौरान श्रीमती बसंती पन्ना ग्राम खुटीकेवाल की महिला अति उत्साहित थी एवं उनके यहाँ करीब दस जानवर थे एवं प्रशिक्षण में प्राप्त जानकारी को अच्छी तरह से ग्रहण कर अपने घर में वर्मी कमपोस्ट उत्पादन करने की इच्छा जताई, इसमें कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिकों ने उन्हें इसिनिया फोएटिडा नाामक केचुओं की प्रजाति एस.आर. आई. से उपलब्ध करायी। शुरुआत में तो श्रीमती पन्ना की थोड़ी बहुत समस्या आयी लेकिन अब वे वर्मीकम्पोस्ट उत्पादन में दक्षता प्राप्त कर ली है एवं श्रीमती पन्ना करीब 10 टन वर्मीकम्पोस्ट प्रति वर्ष उत्पादित कर करीब 70,000 रुपये प्रतिवर्ष की दर से आमदनी कर रही हैं एवं साथ-साथ अपने पाँच एकड़ के खेत में केवल वर्मी कम्पोस्ट के उपयोग से सब्जी एवं अन्य फसलों की अच्छी उत्पादन पा रही है। साथ में श्रीमती पन्ना करीब 25 महिलाओं का समूह बनाकर वर्मी कम्पोस्ट उत्पादन की तकनीक को किसानों तक पहुँचा रही है एवं महिलायें अपने खेतों में उपयोग के साथ-साथ वर्ष में 10-12 हजार रुपये की आमदनी कर रही है। जैविक खेती के क्षेत्र में अच्छा काम करने के लिये श्रीमती पन्ना को जिला स्तर पर प्रथम किसान के रूप में पुरस्कृत करते हुए 50,000 रुपये का नागद पुरस्कार भी दिया गया है।

 

 

 

 

 

पठारी कृषि (बिरसा कृषि विश्वविद्यालय की त्रैमासिक पत्रिका) जनवरी-दिसम्बर, 2009

 

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

उर्वरकों का दीर्घकालीन प्रभाव एवं वैज्ञानिक अनुशंसाएँ (Long-term effects of fertilizers and scientific recommendations)

2

उर्वरकों की क्षमता बढ़ाने के उपाय (Measures to increase the efficiency of fertilizers)

3

झारखण्ड राज्य में मृदा स्वास्थ्य की स्थिति समस्या एवं निदान (Problems and Diagnosis of Soil Health in Jharkhand)

4

फसल उत्पादन के लिये पोटाश का महत्त्व (Importance of potash for crop production)

5

खूँटी (रैटुन) ईख की वैज्ञानिक खेती (sugarcane farming)

6

सीमित जल का वैज्ञानिक उपयोग

7

गेहूँ का आधार एवं प्रमाणित बीजोत्पादन

8

बाग में ग्लैडिओलस

9

आम की उन्नत बागवानी कैसे करें

10

फलों की तुड़ाई की कसौटियाँ

11

जैविक रोग नियंत्रक द्वारा पौधा रोग निदान-एक उभरता समाधान

12

स्ट्राबेरी की उन्नत खेती

13

लाख की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भागीदारी

14

वनों के उत्थान के लिये वन प्रबन्धन की उपयोगिता

15

फार्मर्स फील्ड - एक परिचय

16

सूचना क्रांति का एक सशक्त माध्यम-सामुदायिक रेडियो स्टेशन

17

किसानों की सेवा में किसान कॉल केन्द्र

18

कृषि में महिलाओं की भूमिका, समस्या एवं निदान

19

दुधारू पशुओं की प्रमुख नस्लें एवं दूध व्यवसाय हेतु उनका चयन

20

घृतकुमारी की लाभदायक खेती

21

केचुआ खाद-टिकाऊ खेती एवं आमदनी का अच्छा स्रोत

 

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