किसानों की सेवा में किसान कॉल केन्द्र

Submitted by Hindi on Mon, 11/27/2017 - 13:34
Source
प्रसार शिक्षा निदेशालय, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, राँची, जनवरी-दिसम्बर 2009

 

किसान कॉल केन्द्रों को सुचारु रूप से चलानें, विभिन्न क्रिया-कलापों का समय-समय पर नोडल संस्था द्वारा निरीक्षण एवं समीक्षा किया जाता है। विभिन्न स्तर पर क्रियाकलापों किसान प्रश्नोत्तर, विषय विशेषज्ञों की उपलब्धता जो कॉल स्तरIII के पास दिया गया हो, इनकी प्रतिक्रिया 72 घंटों के अन्दर उपलब्ध कराना इत्यादि के लिये नोडल संस्था उत्तरदायी होत हैं।

भारतवर्ष के विभिन्न राज्यों में तकनीकी सूचना के प्रसार के अभाव के कारण किसान भाई उन्नत कृषि तकनीकी ज्ञान के अभिवर्द्धन से वंचित रह जाते है। भारत के वैज्ञानिकों ने कृषि तकनीक तो बहुत ईजाद कर ली है, मगर अभी भी किसान भाई इनमें से कई तकनीकों से अनजान हैं। इन कमियों को दूर करने के लिये कृषि विश्वविद्यालय, कृषि विज्ञान केन्द्र, राज्य सरकार एवं गैर सरकारी संगठन व विभिन्न प्रसार माध्यमों द्वारा अपने स्तर से प्रयासरत हैं।

उपरोक्त कमियों को दूूर करने हेतु जनवरी, 2004 में कृषि सहकारिता विभाग, कृषि मंत्रालय, भारत सरकार ने देश के सभी राज्यों में किसान कॉल सेन्टर स्थापित करने का निर्णय लिया। कॉल सेन्टर का मुख्य उद्देश्य किसानों की समास्याओं का उचित निदान क्षेत्रीय भाषाओं में अतिशीघ्र उपलब्ध कराना है।

इसकी दूरभाष संख्या है 15511 इस दूरभाष से झारखण्ड के स्थानीय परिवेश के अनुकूल, स्थानीय स्तर पर अपनी समास्याओं की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। बिरसा कृषि विश्वविद्यालय झारखण्ड राज्य के किसान कॉल सेन्टर का नोडल केन्द्र है।

 

 

 

किसान कॉल केन्द्र की संरचनाः


किसान कॉल केन्द्र की त्रिस्तरीय संरचना निम्न प्रकार है।-

1. व्यावसायिक रूप से संचालित कॉल केन्द्र (स्तर I)
2. प्रत्येक प्रतिष्ठान में एक उत्तरदायी केन्द्र जिसमें विषय वस्तु विशेषज्ञ उपलब्ध होते हैं। (स्तर II)
3. नोडल केन्द्र जिसमें सभी क्षेत्रीय किसान कॉल केन्द्र जुड़े होते है- (स्तर III) जो कि बिरसा कृषि विश्वविद्यालय है।

 

 

 

 

स्तर-I पर सुविधाएँ


स्तर-I पर तकनीकी संरचना जरा जटिल होती है। भारत संचार निगम लि. द्वारा एक टेलीफोन लाइन लगा होता है जिसका कनेक्शन छह व्यक्तियों के पास लगा होता है। कम्प्यूटर हर व्यक्ति के पास लगा होता है। इस कम्प्यूटर में सूचनाएँ एकत्रित रहती हैं तथा किसानों के प्रश्नों रिकॉर्ड रखा जाता है। यहाँ पर पदस्थापित कृषि स्नातक कम्प्यूटर में संग्रहित सूचना तथा अपने अनुभव के आधार पर किसानों के प्रश्नों का जवाब देते हैं।

 

 

 

 

स्तर-II पर सुविधाएँ


स्तर-II को तकनीकी प्रतिक्रिया केन्द्र के रूप में व्यवहार किया जाता है एवं यह किसान कॉल केन्द्र के आस-पास उपलब्ध कराया जाता है। यहाँ एक सूचना प्रौद्योगिकी उपस्कर, इंटरनेट, एक प्रिंटर एवं बैटरी सहित बिजली व्यवस्था उपलब्ध होती है।

 

 

 

 

स्तर-III पर सुविधाएँ


इस स्तर पर तथ्यों का विश्लेषण एवं वितरण का डाटा बेस तैयार किया जाता है। इस स्तर पर सभी क्षेत्रीय सूचना केन्द्र के प्रबंधन हेतु एक प्रबंधक होते हैं। इस स्तर में कम्प्यूटर सहित अन्य आधुनिक उपकरणों का मदद लिया जाता है।

 

 

 

 

नोडल केन्द्र की भूमिकाः


किसान कॉल सेन्टर के दस्तावेजों एवं विवरणी के लिये नोडल संस्था उत्तरदायी होती है। नोडल संस्था के पदाधिकारी विभिन्न प्रकार के विवरण एवं दस्तावेज सभी किसान सूचना केन्द्रों से प्राप्त करते हैं एवं किसानों के प्रश्नोत्तर का एकीकरण का औपचारिक ब्यौरा तैयार करते हैं। जिन्हें कृषि एवं सहकारिता विभाग, भारत सरकार को ई-मेल या फैक्स द्वारा पन्द्रह दिनों के अन्दर भेजा जाता है।

- किसान कॉल केन्द्रों का निरीक्षण परिक्षण एवं सर्वेक्षण

- किसान कॉल केन्द्रों को सुचारु रूप से चलानें, विभिन्न क्रिया-कलापों का समय-समय पर नोडल संस्था द्वारा निरीक्षण एवं समीक्षा किया जाता है। विभिन्न स्तर पर क्रियाकलापों किसान प्रश्नोत्तर, विषय विशेषज्ञों की उपलब्धता जो कॉल स्तरIII के पास दिया गया हो, इनकी प्रतिक्रिया 72 घंटों के अन्दर उपलब्ध कराना इत्यादि के लिये नोडल संस्था उत्तरदायी होत हैं।

- नोडल सेल प्रथम छह महीनों तक पन्द्रह दिनों के अन्तराल पर स्तर-II के तकनीकी प्रतिक्रिया पदाधिकारी के साथ बैठक करता है, जिसका मुख्य उद्देश्य किसान कॉल केन्द्र से उत्पन्न विभिन्न समस्याओं का निष्पादन करना होता है।

निम्नलिखित विषयों के बारे में किसान भाई किसान कॉल सेन्टर से जानकारी प्राप्त कर सकते है-

कृषि- मृदा, बीज, फसल , बागवानी, उर्वरक, जल प्रबन्धन, कीट प्रबन्धन, फसल उत्पादन में लागत एवं आमदनी, कृषि उत्पादों का बाजार खाद्य प्रसंस्करण, लाह, पालन, रेशम कीट पालन, मधुमक्खी पालन।

पशुपालन- गौ पालन, भैंस पालन, बकरी पालन, सूअर पालन, मत्स्य पालन, मुर्गी पालन, बत्तख पालन, बटेर पालन आदि।

वानिकी- भूमि एवं जलवायु के अनुसार पौधों का चुनाव, पौधा तैयार करना, पौधा लगाना, पौधों की समुचित देखभाल, उचित प्रबन्धन, कटाई एवं विपणन आदि।

अन्य- सरकार द्वारा किसानों के लिये चलाई गई योजनाएँ, फसल बीमा, किसान क्रेडिट कार्ड, कृषि ऋण, राष्ट्रीय बागवानी मिशन, कार्बनिक खेती, केचुआ खाद आदि।

किसान भाई घर बैठे एकदम निःशुल्क अपनी समस्याओं का निराकरण कर सकते हैं। अब यह सुविधा मोबाइल पर भी उपलब्ध है, जिसका नंबर है 18001801551 बस उन्हें फोन उठाना है और डायल करना है-1551 ।

 

 

 

 

 

 

 

पठारी कृषि (बिरसा कृषि विश्वविद्यालय की त्रैमासिक पत्रिका) जनवरी-दिसम्बर, 2009

 

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

उर्वरकों का दीर्घकालीन प्रभाव एवं वैज्ञानिक अनुशंसाएँ (Long-term effects of fertilizers and scientific recommendations)

2

उर्वरकों की क्षमता बढ़ाने के उपाय (Measures to increase the efficiency of fertilizers)

3

झारखण्ड राज्य में मृदा स्वास्थ्य की स्थिति समस्या एवं निदान (Problems and Diagnosis of Soil Health in Jharkhand)

4

फसल उत्पादन के लिये पोटाश का महत्त्व (Importance of potash for crop production)

5

खूँटी (रैटुन) ईख की वैज्ञानिक खेती (sugarcane farming)

6

सीमित जल का वैज्ञानिक उपयोग

7

गेहूँ का आधार एवं प्रमाणित बीजोत्पादन

8

बाग में ग्लैडिओलस

9

आम की उन्नत बागवानी कैसे करें

10

फलों की तुड़ाई की कसौटियाँ

11

जैविक रोग नियंत्रक द्वारा पौधा रोग निदान-एक उभरता समाधान

12

स्ट्राबेरी की उन्नत खेती

13

लाख की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भागीदारी

14

वनों के उत्थान के लिये वन प्रबन्धन की उपयोगिता

15

फार्मर्स फील्ड - एक परिचय

16

सूचना क्रांति का एक सशक्त माध्यम-सामुदायिक रेडियो स्टेशन

17

किसानों की सेवा में किसान कॉल केन्द्र

18

कृषि में महिलाओं की भूमिका, समस्या एवं निदान

19

दुधारू पशुओं की प्रमुख नस्लें एवं दूध व्यवसाय हेतु उनका चयन

20

घृतकुमारी की लाभदायक खेती

21

केचुआ खाद-टिकाऊ खेती एवं आमदनी का अच्छा स्रोत

 

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