मालवा की मानव निर्मित मौत

Submitted by Hindi on Fri, 12/22/2017 - 12:02
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Source
डाउन टू अर्थ, दिसम्बर 2017

मालवा के जल संसाधनों पर ग्रहण उस समय लगा जब बाँधों की श्रृंखला में गाँधीसागर बाँध शामिल हुआ।

पश्चिमी मध्य प्रदेश के 8 जिलों- धार, इंदौर, देवास, शाजापुर, उज्जैन, रतलाम, मंदसौर और नीमच को प्रायः मालवा कहा जाता है। आजादी के समय क्षेत्र की प्रमुख नदी, चम्बल या उसकी प्रमुख सहायक नदियों गम्भीर, क्षिप्रा, छोटी कालसिंध, शिवना आदि में ही नहीं, छोटे नालों में भी वर्ष भर पानी बहता था। क्षेत्र में राजाओं द्वारा जंगली जानवरों के शिकार हेतु वनों की रक्षा की जाती थी। क्षेत्र की प्रमुख रियासत होल्कर एस्टेट के 1930 के गजेटियर में लिखा है कि होल्कर एस्टेट में 30 प्रतिशत क्षेत्र में वन थे। पश्चिमी मानसून से औसतन 36 इंच वर्षा होती थी। क्षेत्र की काली मिट्टी कपास की खेती के लिये उपयुक्त थी और कपास के अच्छे उत्पादन के फलस्वरूप यहाँ 6-7 कपड़ा मिल थीं। वर्षा के जल को सिंचाई और पेयजल हेतु संग्रहित करने के लिये कितने तालाब थे, इस बारे में कोई आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन 1954-60 के मध्य चम्बल घाटी विकास परियोजना के अन्तर्गत बने प्रथम गाँधीसागर बाँध के जलाशय में 95 तालाब डूब में आए थे। जलाशय का क्षेत्र 560 वर्ग किमी था। 5.89 वर्ग किमी में एक तालाब था। इस हिसाब से गाँधीसागर के जलग्रहण क्षेत्र में 3800 के आस-पास तालाब रहे होंगे।

.मालवा क्षेत्र में पर्याप्त मात्रा में वन होने, मिट्टी में जैविक पदार्थों की पर्याप्त मात्रा के होने से इस क्षेत्र की भूमि में आर्द्रता का स्तर अच्छा था और असिंचित क्षेत्र में भी अच्छी खेती होती थी। असिंचित क्षेत्र में पैदा होने वाले कठिया गेहूँ की माँग अच्छी थी। अच्छी वर्षा, नदियों-नालों में वर्ष भर पानी बहने, अच्छे स्तर के कृषि उत्पादन को देखते हुए किसी जनकवि ने मालवा की विशेषताओं को इन पंक्तियों में प्रस्तुत किया है-

“मालवा धरती धीर-गम्भीर,
पग-पग रोटी, डग-डग नीर”


मालवा की उपजाऊ धरती और प्रचुर जल संसाधनों की स्थिति पर ग्रहण उस समय लगा जब आजादी के बाद बने बाँधों की लम्बी श्रृंखला में गाँधीसागर बाँध शामिल हुआ। यह चम्बल घाटी विकास योजना के अन्तर्गत बनने वाले तीन बाँधों में प्रथम और प्रमुख था। सम्पूर्ण परियोजना द्वारा दोहन किए जल में गाँधीसागर का योगदान 83 प्रतिशत था और 17 प्रतिशत पानी राजस्थान के राणास्थान के राणाप्रताप सागर का था। पानी में प्रमुख योगदान मध्य प्रदेश का ही था जो मालवा की जीवन रेखा कही जाने वाली चम्बल नदी से आता है। बाँधों में पानी की मात्रा कम न हो, इस हेतु जल ग्रहण क्षेत्र में वर्षा के पानी के संग्रहण हेतु किसी नई संरचना के निर्माण पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है।

इस तरह एक ओर तो मालवा क्षेत्र में वर्षा के जल संग्रहण हेतु किसी नई संरचना पर तो प्रतिबंध लगा ही, साथ ही पूर्व में बनाए गए करीब 3800 तालाबों में से अधिकांश कृषि भूमि की बढ़ती माँग के शिकार हो गए। मालवा के ग्रामीण क्षेत्र के आस-पास की कृषि भूमि का अवलोकन करें तो कई स्थानों की कृषि भूमि के कभी तालाब की भूमि होने के अनेक प्रमाण मिल जाएँगे। तालाबों के नष्ट होने से इस क्षेत्र में भूजल पुनर्भरण की प्रक्रिया पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।

चम्बल के जल ग्रहण क्षेत्र के वनों को किस तरह नष्ट किया गया, इसका अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि जल ग्रहण के लिये शाजापुर और उज्जैन जिलों में इस समय एक प्रतिशत से भी कम भूमि पर वन है। वनों के विनाश का सीधा परिणाम यह हुआ कि वर्षा का पानी सीधे नदियों और नालों में आने लगा। गाँधीसागर में चम्बल में आने वाले पानी का अधिकांश भाग बाढ़ों के माध्यम से आने लग। 1961 से 1980 की बीस वर्षीय अवधि में चम्बल में आने वाली बाढ़ों की संख्या का औसत 3.05 प्रतिवर्ष था जो 1981 से 2000 की अवधि में बढ़कर 4.35 प्रतिवर्ष हो गया है। बाढ़ों की बढ़ती संख्या बाँध की सुरक्षा पर भी प्रश्नचिन्ह लगा रही है।

चम्बल के जल ग्रहण क्षेत्र में वर्षाजल संग्रहण हेतु किसी संरचना के निर्माण पर प्रतिबंध से प्रारम्भ में क्षेत्र में पर्याप्त भूजल भंडार होने से कुओं आदि के जलस्तर पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा। बाद में उन्नत बीज, रासायनिक खाद और सिंचाई पर आधारित हरित क्रांति तकनीक के प्रसार के साथ-साथ सिंचाई की माँग भी तेजी से बढ़ी।

भूजल विभाग के एक अनुमान के अनुसार, मालवा के भूजल भंडारों का स्तर पिछले 50 वर्षों में लगभग 4 मीटर नीचे चला गया।

मध्य प्रदेश के जल संसाधन विभाग की भूजल शाखा की 2009 की रिपोर्ट के अनुसार, 2008 में भूजल के दोहन का स्तर देवास में 80.1 प्रतिशत, धार में 82.80 प्रतिशत, इंदौर में 125.43 प्रतिशत, मंदसौर में 97.35 प्रतिशत, नीमच में 80.93 प्रतिशत, रतलाम में 125.67 प्रतिशत शाजापुर में 96.40 प्रतिशत व उज्जैन में 98.61 प्रतिशत था।

अब चम्बल के जल ग्रहण क्षेत्र में वर्षा के जल दोहन पर लगे प्रतिबंध से सिंचित क्षेत्र में सतही स्रोत का योगदान पूर्व में कुल के 7.1 के प्रतिशत से गिरकर 5.3 प्रतिशत ही रह गया है। अब किसानों के समक्ष यह प्रश्न है कि वे अपनी सिंचाई की बढ़ती माँग को कैसे पूरा करें? किसानों ने सिंचाई सुविधाओं की तलाश में जहाँ पास में कोई नदी या नाला था, वहाँ पानी को सीधे पानी पम्प लगाकर अपने खेतों की सिंचाई करना शुरू कर दिया।

भूजल स्तर के नीचे जाने के कारण नदियों और भूजल भंडारों के मध्य प्रकृति ने जो सम्बन्ध निर्धारित किया था, वह भी भंग हो गया। पूर्व में जब नदियों में बाढ़ आती थी और उनका जलस्तर काफी ऊँचा हो जाता था, उस समय वे आस-पास के भूजल भंडारों को समृद्ध करती थीं और बाद में ग्रीष्मकाल में जब उनका जलस्तर काफी नीचे चला जाता था तो भूजल भंडारों के अपेक्षाकृत ऊँचे जलस्तर से उनमें पानी आता रहता और ग्रीष्मकाल में भी वे बहती रहती थीं। अब भूजल भंडारों का स्तर नीचे चले जाने से यह प्रक्रिया बाधित हो गई। अब पग-पग रोटी, डग-डग नीर वाले मालवा में फरवरी-मार्च के पहले ही छोटी-छोटी नदियाँ ही नहीं, चम्बल जैसी बड़ी नदी में पानी का बहाव समाप्त हो जाता है और उनमें यत्र-तत्र डबरे ही भरे रह जाते हैं। उनका पानी भी किसान विद्युत-डीजल पम्पों के माध्यम से अपने खेतों में ले जाते देखे जा सकते हैं।

आजादी के बाद के वर्षों में वनों के विनाश, चम्बल घाटी विकास योजना के संदर्भ में मध्य प्रदेश और राजस्थान के मध्य समझौते में गाँधीसागर के जल ग्रहण क्षेत्र में वर्षा के पानी के संचयन हेतु किसी संरचना के निर्माण पर प्रतिबंध, सिंचाई की बढ़ती माँग की पूर्ति का सारा दायित्व भूजल स्रोतों-पर आ जाने के फलस्वरूप उनका अतिदोहन हुआ। साथ ही सिंचाई की बढ़ती माँग की पूर्ति न होने से किसानों के द्वारा प्रदत्त सस्ती बिजली के माध्यम से छोटे-बड़े सभी नदी-नालों का पानी पम्प कर उन्हें जनवरी-फरवरी तक सुखा देना, इन सभी प्रक्रियाओं के कारण इस क्षेत्र में स्थितियाँ खराब हुई हैं। मिट्टी में गिरती आर्द्रता आदि के कारणों से हवा, वर्षा आदि के समय तीव्र क्षरण से मालवा की अत्यन्त उपजाऊ मिट्टी भी क्षरित हो रही है।

पूर्व में मालवा में खरीफ फसलों में ज्वार और मक्का ही प्रमुख फसलें होती थीं। इन फसलों के साथ-साथ मूँग या उड़द भी बो दिया जाता था। ये दालें भूमि को उपजाऊ बनाती थीं। अब इनके स्थान पर सोयाबीन की खेती होने लगी है। मक्का और ज्वार के पौधों की जड़ें तो तने के आस-पास फैली थीं और आस-पास की कम गहरी भूमि से पोषण प्राप्त करती थीं। ऊपरी सतह की भूमि का पोषण स्तर भिंडोलों द्वारा मिट्टी को ऊपर नीचे कर पूर्व के स्तर पर बनाए रखा जाता है। सोयाबीन की जड़ें भूमि में काफी नीचे जाती हैं और गहरी भूमि के उपजाऊ तत्वों को सोख लेती हैं, गिडोले इतनी गहराई तक नहीं जाते। परिणामस्वरूप भूमि का उपजाऊपन समय के साथ कम होता जा रहा है और इसी वजह से कृषि विज्ञानियों ने सोयाबीन की खेती का विरोध किया है। अब समय आ गया है कि गाँधीसागर के जलग्रहण क्षेत्र में वर्षा के पानी के संग्रह हेतु किसी संरचना के निर्माण पर प्रतिबंध को समाप्त करने के लिये आवश्यक कदम उठाए जाएँ। उल्लेखनीय है जिस गाँधीसागर में पानी सुनिश्चित करने के लिये मालवा में वर्षा के जल संचयन पर प्रतिबंध लगाया गया और जिसके कारण मालवा मरुस्थलीकरण की दिशा में अग्रसर हो गया है, वह गाँधीसागर भी वर्तमान में 8-9 वर्ष में एक बार ही भरता है। जबकि बाँध की क्षमता इस तरह निर्धारित की जाती है कि वह 4 में से 3 वर्ष पूरा भर सके।

गाँधीसागर बाँध के कारण उत्पन्न हो रहे इन प्रभावों को देखते हुए इस परियोजना को समाप्त करने का समय आ गया है। मालवा से इस परियोजना के माध्यम से प्रतिवर्ष 2.5-3.0 एमएएफ पानी निर्यात करने के बजाय मालवा में ही प्रयुक्त किया जाए तो इस परियोजना के माध्यम से हो रहे सिंचित क्षेत्र से भी अधिक क्षेत्र सिंचित किया जा सकेगा, कृषि उत्पादन में वृद्धि हो सकेगी और मालवा की नदियाँ पुनः बन सकेंगी सदानीरा।

(लेखक अर्थशास्त्र के प्राध्यापक रहे हैं)

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