मानव रूपांतरित पारितंत्र

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पर्यावरण विज्ञान उच्चतर माध्यमिक पाठ्यक्रम

मनुष्य की लालसा और उसकी जरूरतों ने प्राकृतिक पारितंत्रों को बहुत अधिक प्रभावित किया है। मनुष्य ने इन्हें अपनी आवश्यकताओं के अनुसार रूपांतरित करने का प्रयास किया है। प्राकृतिक पारितंत्रों में रूपांतरण के मुख्य कारण इस प्रकार हैं: (1) बढ़ती हुई जनसंख्या (2) बढ़ती हुई मानवीय आवश्यकताएँ तथा (3) जीवन शैली में परिवर्तन। इस पाठ में आप विभिन्न प्रकार के मानव रूपांतरित पारितंत्रों और अपने अधिकतम उपयोगों के लिये किए गए बदलावों का भी अध्ययन करेंगे।

उद्देश्य


इस पाठ के अध्ययन के समापन के पश्चात आपः

- विभिन्न मानव रूपांतरित पारितंत्रों की सूची बना सकेंगे;
- जनसंख्या में होने वाली तीव्र वृद्धि और भारत में औद्योगिकीकरण के कारण प्राकृतिक पर्यावरण में होने वाले समग्र परिवर्तनों का वर्णन कर सकेंगे;
- कृषि पारितंत्र के निर्माण की व्याख्या और प्राकृतिक पर्यावरण पर कृषि पद्धतियों के प्रभावों और कृषिक-पारितंत्रों के निर्माण की व्याख्या कर पायेंगे;
- वनारोपण जैसे मानवीय क्रियाकलापों के प्रभावों का वर्णन कर सकेंगे;
- बांधों के निर्माण तथा नदियों के प्रवाहमार्ग में परिवर्तन का पारिस्थितिक संतुलन पर पड़ने वाले प्रभाव का विश्लेषण कर सकेंगे;
- मानव रूपांतरित पारितंत्रों के रूप में नगरीय क्षेत्रों का वर्णन कर सकेंगे तथा पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों की व्याख्या कर सकेंगे;
- औद्योगीकरण और पर्यावरण अपक्रमण में संबंध स्थापित कर सकेंगे;
- पारितंत्रों पर पड़ने वाले मानवीय प्रभावों को कम करने की विधियाँ सुझा सकेंगे।

7.1 मानव रूपांतरित पारितंत्र


मानव रूपांतरित पारितंत्र सौर ऊर्जा पर निर्भर नहीं होते हैं। उदाहरण के लिये उद्योगों में ऊर्जा को जीवाश्म ईंधन या बिजली या दोनों रूपों में उपलब्ध कराया जाता है।

मानव रूपांतरित पारितंत्रों के कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं:

(1) कृषिक पारितंत्र (Agro ecosystem)
(2) वृक्षारोपण (Plantation forest)
(3) नगरीय पारितंत्र (Urban Ecosystem)
(4) ग्रामीण पारितंत्र (Rural Ecosystem)
(5) एक्वाकल्चर (Aquaculture )
(6) औद्योगिक क्षेत्र (Industrial Areas)
(7) प्रयोगशाला संवर्धन (Laboratory Cultures)

7.1.1 मानव रूपांतरित पारितंत्रों की विशेषताएँ


(1) अत्यधिक सरल।
(2) प्रजातीय विविधता बहुत कम।
(3) खाद्य श्रृंखलाएँ सरल और लघु होती हैं।
(4) उत्तरजीविता के लिये मानवीय (मानव जनित) सहायता पर निर्भर, जीवाश्म ईंधन ऊर्जा, उर्वरक, सिंचाई इत्यादि की आवश्यकता।
(5) अधिक संख्या में खरपतवार को न्यौता देते हैं।
(6) रोगों के प्रति अधिक संवेदनशील।
(7) मृदा अपरदन से प्रभावित।
(8) अत्यधिक अस्थायी।

पाठगत प्रश्न 7.1


1. दो मानव रूपांतरित पारितंत्रों के नाम बताइए।
2. मानव रूपांतरित पारितंत्रो की दो विशेषताएँ बताइए।

7.2 भारत में पर्यावरण पर बढ़ती हुई जनसंख्या तथा औद्योगिकीकरण के प्रभाव


भारत की जनसंख्या में बहुत तेजी से वृद्धि हो रही है जिसके फलस्वरूप प्राकृतिक संसाधनों की हमारी मांग में भी वृद्धि हो रही है। भारत में औद्योगिकीकरण भी बहुत तेज रफ्तार से हो रहा है। बढ़ती हुई जनसंख्या और औद्योगिकीकरण हमारे पर्यावरण पर कई प्रकार से प्रतिकूल प्रभाव डाल रहे हैं। कुछ मुख्य प्रभावों का संक्षिप्त वर्णन नीचे दिया गया है।

प्रदूषणः विज्ञान और प्रौद्योगिकी में होने वाली प्रगति मानवीय आवश्यकताओं को पूरा करने में मानव जाति के लिये एक वरदान है परन्तु इसके विपरीत ये पर्यावरण में प्रदूषण का कारण भी हैं। पर्यावरण में किसी भी ऐसे पदार्थ का मिल जाना जो मानवों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रतिकूल प्रभाव डालता है, प्रदूषण कहलाता है। प्रदूषण के कई दुष्प्रभाव हैं। औद्योगिक दुर्घटनाओं में कई लोगों की जानें जा चुकी हैं। उदाहरण के लिये भोपाल दुर्घटना में यूनियन कार्बाइड कम्पनी से MIC (मिथाइल आइसोसाइनेट) के रिसाव के कारण 12 से 72 घंटे में 2000 से अधिक लोग मारे गए। कई लोग अपनी नेत्र दृष्टि गवां बैठे और गम्भीर चिकित्सीय समस्याओं का शिकार हो गए।

भूमण्डलीय ऊष्मणः जीवाश्म ईंधनों के अधिक उपयोग के कारण वायुमण्डल में CO2 तथा अन्य हरितगृह गैसों के स्तर में वृद्धि हो रही है। वायुमण्डल में हरितगृह गैसों के कारण धरातल के तापमान में वृद्धि हो गई है जिसे भूमण्डलीय ऊष्मण कहते हैं। भूमण्डलीय ऊष्मण के कारण ग्लेशियर पिघल रहे हैं जिससे समुद्र में जलस्तर बढ़ रहा है। समुद्र के जलस्तर में वृद्धि तटीय क्षेत्रों के निचले क्षेत्र विशेषकर मुम्बई, चेन्नई और कोलकाता जैसे सघन आबादी वाले शहरों के लिये एक गम्भीर खतरा है।

मानव स्वास्थ्य और रोगः जनसंख्या में वृद्धि के कारण एड्स (AIDS: Aquired Immuno Deficiency Syndrome), हेपैटाइटिस, तपेदिक (Tuberculosis), बर्ड फ्लू, स्वाइन फ्रलू, सिफिलिस (Syphilis), सुजाक (Gonorrhoea), कैंसर जैसी महामारियों के फैलने की घटनाओं में वृद्धि हो जाती है। ये रोग पर्यावरण में भीड़-भाड़ के कारण फैलते हैं।

प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहनः तेजी से बढ़ रही जनसंख्या के कारण संसाधनों का अत्यधिक दोहन होने लगता है। आवश्यकता से अधिक उपयोग और नई या आनुवंशिक रूप से रूपांतरित प्रजातियों के समावेश से प्राकृतिक पारितंत्रों की उत्पादकता कम हो जाती है। उदाहरण के लिये पारितंत्र में आनुवांशिक रूप से रूपांतरित उच्च उत्पादकता वाली किस्मों या विदेशी प्रजातियों के समावेश से देशी प्रजातियों की समष्टि कम हो जाती है। भोजन के रूप में प्रयोग की जाने वाली मछलियों को अधिक संख्या में पकड़ने के कारण इनकी जनन दर कम हो जाती है तथा इनकी जनसंख्या घटने लगती है और कुछ समय के पश्चात पूर्णरूप से विलुप्त हो सकती है।

- वनोन्मूलन, अतिचारण, सघन कृषि, अत्यधिक सिंचाई इत्यादि के कारण मृदा की उर्वरता नष्ट हो जाती है। लंबे समय तक मृदा के अपकर्ष के कारण मरुस्थल बन जाते हैं।

- नदियाँ, झीलें, तालाब, ज्वारनदमुख तथा सागरों का अत्यधिक दुरुपयोग हो रहा है। नदियों और अन्य जल निकायों का उपयोग द्रव बहिस्रावों तथा अन्य सभी प्रकार के अपशिष्ट पदार्थों के निष्कासन के लिये किया जा रहा है। आज अधिकतर जल निकाय बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण दूषित हो रहे हैं। यमुना नदी का प्रदूषित होना इसका एक उदाहरण है।

पाठगत प्रश्न 7.2


1. किसी भी ऐसी गैस का नाम बताइए जो वैश्विक ऊष्मण का कारण है।
2. MIC तथा AIDS का पूरा नाम लिखिए।
3. मिट्टी के अपरदन के क्या कारण हैं

7.3 कृषि पारितंत्र तथा कृषि पद्धतियाँ


कृषि पारितंत्र (Agro ecosystem) वह बड़े-बड़े क्षेत्र हैं जहाँ वाणिज्यिक व्यापारिक महत्त्व की फसलें उगाई जाती हैं। फसलों को मानव द्वारा आर्थिक उद्देश्यों के लिये बोया और उगाया जाता है। इन्हें फसल-पारितंत्र भी कहा जाता है और अधिकतर एकल फसलन (पूरे खेत में केवल एक प्रकार की फसल उगायी जाती है) के रूप में उगाया जाता है या कभी-कभी एक ही खेत में दो या अधिक प्रकार की फसलों को एक साथ उगाया जाता है।

7.3.1 कृषि पारितंत्रों की विशेषताएँ


(1) ये अत्यधिक सरल पारितंत्र है जो फसल प्रजाति के एकल फसलन को सहारा देते हैं।
(2) प्रजातीय विविधता न्यूनतम होती है।
(3) अत्यधिक अस्थायी और स्वपोषणीय नहीं होते।
(4) खरपतवार को बढ़ावा देते हैं तथा पादप रोगों के प्रति संवेदनशील होते हैं।
(5) मृदा में पोषकों की कमी होती है तथा रासायनिक उर्वरकों को इसमें मिलाना पड़ता है।
(6) कृत्रिम सिंचाई और जल प्रबन्धन की आवश्यकता।
(7) मानवीय देखभाल और प्रबन्धन पर निर्भर।

7.3.2 आर्थिक महत्व


(i) कृषि पारितंत्र भोजन, फल, खाद्य तेलों आदि की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं।
(ii) उन्नत किस्म के अनाज की अधिक पैदावार प्राप्त की जा सकती है।
(iii) लोगों की बहुत बड़ी संख्या को रोजगार प्राप्त होता है। भारत की 70% से भी अधिक जनसंख्या कृषि पर निर्भर है।

7.3.3 कृषि पारितंत्रों के अवगुण


- किसी खेत में एक समय में एक ही फसल उगने (एकलकृषि, Monoculture) के कारण फसली पौधों की आनुवांशिक विविधता के साथ-साथ प्राकृतिक जैवविविधता भी नष्ट हो जाती है।

- फसलों की अधिक उत्पादकता वाली किस्में रोगों के प्रति अधिक संवेदनशील होती हैं। जैसेः गन्ने, मक्का और ज्वार का स्मट तथा गेहूँ और बाजरे का रस्ट पौधों के सामान्य रोग हैं। फसलों को रोगों और पीड़कों से बचाने के लिये बड़े पैमाने पर पीड़कनाशी और रसायनों का उपयोग किया जाता है जो पर्यावरण को दूषित करते हैं।

- अधिक सिंचाई के कारण कई क्षेत्रों में भूमिगत जल स्तर नीचे चला जाता है।

- खेतों से बहकर आने वाले जल में उर्वरक तथा पीड़कनाशी घुले होते हैं जो नदियों, झीलों और तालाबों को प्रदूषित करते हैं।

7.4 मानव निर्मित वन


यह एक मानव निर्मित पारितंत्र है जिसमें वृक्षों की विशेष प्रजातियाँ आती हैं। पेड़ों को खाली भूमि, निजी भूमि, गाँव पंचायत की भूमि, सड़क के किनारे, नहर के किनारे, रेलवे लाइन के किनारे तथा कृषि अयोग्य भूमि पर लगाया जाना शामिल है। ऐसे पारितंत्रों का उद्देश्य है आर्थिक दृष्टि से उपयोगी पौधों को तेजी से उगाना।

7.4.1 वृक्ष रोपण की विशिष्टताएँ


(1) मानव निर्मित वनों में प्रायः एकल कृषि संवर्धन जैसे ऑयल पाम-वृक्षारोपण, रबर-वृक्षारोपण, कॉफी वृक्षारोपण आदि आते हैं।
(2) इन वनों में लगभग एक ही आयु के वृक्ष होते हैं।
(3) ये वन रोगजनकों और पीड़कों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं।
(4) प्रजातीय विविधता बहुत कम होती है।
(5) निरंतर मानवीय देखभाल और प्रबन्धन की आवश्यकता होती है।
(6) आजकल बायोडीजल प्राप्त करने के लिये जेट्रोफा करकरे (Jatropha curcure) प्रजाति के पौधों का वृक्षारोपण काफी प्रचलित हो चुका है।

7.4.2 आर्थिक महत्व


(1) वृक्षारोपण फल, तेल, रबर, कॉफी, इमारती लकड़ी, ईंधन के लिये प्रयुक्त लकड़ी तथा रेयान और कागज उद्योग के लिये पल्प प्राप्त करने हेतु किया जाता है।
(2) वृक्षारोपण वातपातन या वातरोधन के लिये भी किया जाता है।
(3) वृक्षारोपण मृदा के अपरदन को रोकने और मृदा की उर्वरता में वृद्धि के लिये भी किया जाता है।
(4) वृक्षारोपण कामकाज के अवसर और आय प्राप्त करने के लिये भी किया जाता है।

पाठगत प्रश्न 7.3


1. वृक्षारोपण के पाँच पौधों के प्रकारों के नाम लिखिए।
2. वृक्षारोपण के लिये किस प्रकार के वृक्षों को वरीयता दी जाती है।
3. कृषि पारितंत्रों और रोपित वनों के सामान्य लक्षणों की सूची बनाइए।
4. बायोडीजल प्राप्त करने हेतु वृक्षारोपण करने के लिये आप कौन से पौधों की सिफारिश करेंगे।

7.5 नगरीय पारितंत्र (Urban Ecosystem)


नगरीय जीवन वह जीवन है जिसमें बहुत सारे लोग साथ-साथ रहते हैं। वर्तमान में तो एक नगरीय क्रांति सी दिखाई पड़ती है क्योंकि समस्त संसार में लोग नगरों और शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं। 1800 ई. में विश्व की जनसंख्या का केवल 5 प्रतिशत ही शहरी आबादी थी (50 मिलियन लोग)। 1985 में यह बढ़कर 2 बिलियन हो गई। वर्तमान में विश्व की कुल जनसंख्या का 45% शहरी आबादी है और 2030 तक 60 प्रतिशत से अधिक लोग शहरों में रह रहे होंगे।

7.5.1 नगरीय पारितंत्र की विशेषताएँ


(1) अत्यधिक जनसंख्या घनत्वः सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व माल्टा (अफ्रीका) का है। यह 1100 व्यक्ति/वर्ग किमी है। दूसरा स्थान बांग्लादेश का है। जोकि 888 व्यक्ति/वर्ग किमी है। नीदरलैंड का जनसंख्या घनत्व 441 व्यक्ति/वर्ग किमी तथा जापान में 328 व्यक्ति/वर्ग किमी है।

(2) भीड़-भाड़, घरों की कमी तथा झोपड़ पट्टी में वृद्धि।

(3) शहरी क्षेत्र उत्तरजीविता के लिये ऊर्जा, खाद्य पदार्थ, वस्तुओं तथा अन्य सामान की बढ़ती हुई मात्रा का बाहर से आयात करते हैं।

(4) अत्यधिक मात्रा में ठोस और द्रव अपशिष्ट पदार्थ उत्पन्न करते हैं तथा वायु प्रदूषक पर्यावरणीय प्रदूषण की समस्याएँ उत्पन्न करते हैं।

(5) रोजगार के अधिक अवसर और साथ ही साथ अत्यधिक स्पर्धा।

(6) बेहतर शिक्षा सुविधाएँ।

(7) बेहतर चिकित्सीय सुविधाएँ और स्वास्थ्य सेवा प्रदान की जाती है।

(8) मनोरंजन के अन्य विविध स्रोत।

7.5.2 नगरीय पारितंत्रों के लाभ


(1) आर्थिक दृष्टि से सुविकसित।
(2) औद्योगिक वृद्धि के केन्द्र।
(3) व्यापार के केन्द्र।
(4) बहुसांस्कृतिक सामाजिक पर्यावरण।
(5) कम शिशु मृत्युदर।
(6) राजनीतिक गतिविधियों के केन्द्र।

7.5.3 नगरीय पारितंत्रों से होने वाले दुष्प्रभाव


(1) नगरीय पारितंत्र पृथ्वी के 75% संसाधनों का उपभोग करते हैं तथा 75% कचरा उत्पन्न करते हैं।

(2) नगरीय क्षेत्र अत्यधिक प्रदूषित होते हैं क्योंकि मोटर गाड़ियों और उद्योगों की बढ़ती हुई संख्या के कारण बहुत अधिक मात्रा में प्रदूषक उत्पन्न होते हैं।

(3) उद्योगों और परिवहन के कारण उत्पन्न होने वाले ध्वनि प्रदूषण से ग्रस्त रहते हैं।

(4) नगरीय पारितंत्रों में जल का अत्यधिक अभाव होता है।

(5) अत्यधिक अपराधिक दर, अशांति और बेरोजगारी।

(6) विश्व के शहरों में बढ़ते हुए जनसंख्या घनत्व के कारण कुछ लोग झुग्गी झोपड़ियों में रहने को बाध्य हो जाते हैं। जैसे मुम्बई में 3 मिलियन (30 लाख) आबादी झोपड़ पट्टी तथा फुटपाथ पर रहती है। बिना अधिकार वाली भूमि पर बसने के कारण साफ पीने का पानी, अपशिष्ट पदार्थों का निपटारा, स्वास्थ्य सेवाएँ जैसी आधारभूत सुविधाओं का अभाव होता है।

भारत जैसे विकासशील देशों में बहुत तेजी से नगरीय क्रांति आयी है। नगरीय जनसंख्या की औसत वृद्धि दर जनसंख्या वृद्धि दर की दोगुनी हो चुकी है। वर्तमान में विकासशील देशों के शहरों में रहने वालों की जनसंख्या की वृद्धि दर औद्योगीकृत देशों के शहरों की तुलना में कहीं अधिक है।

7-6 ग्रामीण पारितंत्र (RURAL ECOSYSTEM)


ग्रामीण पारितंत्र प्राकृतिक और नगरीय पारितंत्र के बीच में है क्योंकि इनमें मानव द्वारा प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों का दोहन अपेक्षाकृत काफी कम है। ग्रामीण क्षेत्रों के लोग अपेक्षाकृत प्रकृति के अधिक निकट रहते हैं तथा साधारण जीवन निर्वाह करते हैं।

7.6.1 ग्रामीण पारितंत्रों की विशेषताएँ,


- बहुत से गाँव केवल एक ही परिवार के होते हैं।
- ग्रामीण क्षेत्रों में लोग छप्पर की बनी झोपड़ियों, मिट्टी के बने घरों के छोटे-छोटे समूहों में रहते हैं। यह घर चारों ओर से खेतों से घिरे रहते हैं। ग्रामीण क्षेत्रें में लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर होते हैं तथा स्थानीय संसाधनों का उपयोग करते हैं।
- पीने का पानी कुओं, नहरों, झीलों और नदियों से प्राप्त किया जाता हैं।
- शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ, जलनिकास, स्वच्छता, स्वास्थ्य विज्ञान और परिवहन आदि सुविधाओं का अभाव होता है।
- ग्रामीण क्षेत्र अधिकतर वायु और ध्वनि प्रदूषण से मुक्त रहते हैं।

गाँवों से शहरों की तरफ लोगों के पलायन को कम करने की सरकारी नीतियों के अन्तर्गत शहरों में भूमि की कीमतों में वृद्धि करना शामिल है। ग्रामीण क्षेत्रें में रोजगार के अधिक अवसर पैदा करने चाहिए। गाँवों में कार्यरत लोगों को प्रोत्साहन देना चाहिए।

पाठगत प्रश्न 7.4


1. ग्रामीण पारितंत्रों की कोई दो विशेषताएँ लिखिए।
2. लोग ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर क्यों पलायन करते हैं?
3. नगरीय पारितंत्रों के किन्हीं दो दुष्प्रभावों की सूची बनाइए।
4. आप छुट्टियों के दौरान किसी पहाड़ी इलाके में जाना क्यों पसंद करते हैं?

7.7 एक्वाकल्चर- गुण और दोष


एक्वाकल्चर (Aquaculture) जलीय जन्तुओं और पौधों का कृत्रिम संवर्धन है। एक्वाकल्चर में बुनियादी तौर पर व्यावसायिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण अलवणजलीय तथा लवणजलीय मछलियों, घोंघों, क्रस्टेशियनों और जलीय पौधों की खाद्य-प्रजातियों का संवर्धन किया जाता है। सामान्यतः प्राकृतिक जल निकायों में अत्यधिक जैवविविधता पायी जाती है, मनुष्यों के द्वारा बहुत थोड़ी प्रजातियों का ही संवर्धन किया जाता है। मछलियों की 20,000 प्रजातियाँ ज्ञात हैं इनमें से केवल 22 प्रजातियों का ही मानव द्वारा संवर्धन किया जाता है। मात्स्यकी में समुद्र और अलवणीय जल से खाद्य का निष्कर्षण शामिल है जबकि एक्वाकल्चर के अन्तर्गत कृत्रिम रूप से बनाए गए जल निकायों में जलीय जीवों का पालन पोषण शामिल है जैसे कार्प, तिलपिया मछलियों का संवर्धन।

चित्र 7.1 एक्वाकल्चर

एक्वाकल्चर दो प्रकार के होते हैं:


1. मत्स्य पालन (Pisuculture): इसके अंतर्गत नियंत्रित पर्यावरण आमतौर से तटीय अथवा अन्तःस्थलीय तालाबों, झीलों, जलाशयों या धान के खेतों में मछलियों का संवर्धन और जब वह वांछित आकार प्राप्त कर लें तो उन्हें पकड़ना शामिल है।

2. मत्स्य (Ranching रानचिंग): इसके अन्तर्गत मछलियों को तटीय लगूनों में प्लवमान पिंजरों के अन्दर पहले कुछ वर्षों के लिये बन्दी-स्थिति में रखा जाता है। तत्पश्चात इन्हें जल निकायों में छोड़ दिया जाता है। वयस्कों को उस समय पकड़ लिया जाता है जब वह लगून में अण्डे देने के लिये वापस आते हैं। जैसे सॉल्मन तथा हिल्सा जो अण्डे देने के लिये नदियों की तरफ प्रवास करती हैं, इसी विधि द्वारा संवर्धित की जाती है।

7.7.1 भारत में मात्स्यकी और एक्वाकल्चर


समुद्रीय संसाधनों की प्राप्ति की दृष्टि से भारत का समुद्रतटीय क्षेत्र बहुत लम्बा है। समुद्री संसाधनों में बंगाल की खाड़ी, अरब सागर, हिन्द महासागर, असंख्या खाड़ियां, कोरल रीफ, लगून और उड़ीसा की चिल्का झील शामिल हैं। भारत में अतःस्थली जलीय क्षेत्र लगभग 1.6 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है। यह बड़े नदी तंत्रों जैसे गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र, नर्मदा, महानदी, कावेरी, कृष्णा तथा अन्य नदियों के रूप में है। इसके अलावा नहरों, तालाबों, झीलों तथा सिंचाई चेनलों में भी जहाँ मत्स्य संवर्धन किया जा सकता है। अलवणजल में जिन मछलियों का संवर्धन किया जाता है उनमें कार्प की विभिन्न प्रजातियों (रोहू, कतला-कतला), चाइनीज कार्प, ग्रीन कार्प, मिरर कार्प, कैट फिश इत्यादि हैं।

तिलपिया, टांउट, सॉल्मन और कुछ अन्य मछलियों की ऐसी प्रजातियाँ हैं जिनका संवर्धन जालीदार बाड़े में किया जाता है। मिल्क-फिश तथा मुलेट का संवर्धन बांस से घिरे हुए बाड़े में किया जाता है। तिलपिया बहुत से लोगों की प्रिय मछली है। इसे जल की मुर्गी भी कहा जाता है। बहुत से गरीब किसानों द्वारा छोटे पैमाने पर इसका संवर्धन किया जाता है। इस मछली को बहुत कम प्रोटीन वाले आहार पर पाला जा सकता है और इसमें कई रोगों और परजीवियों के लिये प्रतिरोधक क्षमता होती हैं। यह मछली बाड़े के भीतर भी बहुत तेजी से जनन कर सकती हैं।

7.7.2 एक्वाकल्चर के गुण


(1) पारिस्थितिकीय दक्षता उच्च होती है। 1 किग्रा सजीव भार प्राप्त करने के लिये 2 किग्रा अनाज की आवश्यकता होती हैं।
(2) थोड़े पानी में अधिक उत्पादन।
(3) चयन, जनन, तथा आनुवांशिक अभियांत्रिकी द्वारा मछलियों की उन्नत किस्में प्राप्त करना।
(4) एक्वाकल्चर मछलियों के अत्यधिक संवर्धन को कम करता है।
(5) इससे अधिक पैसा कमाया जा सकता है।

7.7.3 एक्वाकल्चर के अवगुण


(1) अत्यधिक खाद्य, जल और भूमि निवेश की आवश्यकता होती हैं।
(2) जल की प्राकृतिक जैवविविधता नष्ट हो जाती है क्योंकि इनकी जगह व्यापारिक महत्व की मत्स्य प्रजातियों का एकल संवर्धन किया जाता है।
(3) अत्यधिक मात्र में मत्स्य अपशिष्ट पैदा होते हैं जो जल निकायों को दूषित कर देते हैं।
(4) मैंग्रोव वनों या तटीय वनस्पति नष्ट हो जाती हैं।
(5) एक्वाकल्चर मछलियां खेतों से बहकर आने वाले पीड़कनाशियों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होती हैं।
(6) एक्वाकल्चर जलाशयों में उच्च समष्टि घनत्व को नियमित कर देता है जो उनकी फसल को किसी भयंकर रोग से सुरक्षा प्रदान करता है।
(7) एक्वाकल्चर टैंक या जलाशय प्रायः कुछ वर्षों के बाद दूषित हो जाते हैं

पाठगत प्रश्न 7.5


1. मात्स्यकी और एक्वाकल्चर में क्या अंतर है?
2- अलवण जल में पायी जाने वाली दो ऐसी मछलियों के नाम बताइए जिन्हें तालाबों में पाला जा रहा है।
3. उस मछली का नाम बताइए जिसे सामान्यतया जल की मुर्गी कहा जाता है।
4. एक्वाकल्चर मैंग्रोव वनों को किस प्रकार प्रभावित करता है?

7.8 बाँध, जलाशय और नहरें (DAM, RESERVOIR AND CANAL)


बाँध एक ऐसी संरचना है जिसमें नदी अथवा ज्वारीय जल को संचित किया जाता है। बाँध जलाशय और नहरों में बहते हुए पानी को संचित कर लिया जाता है तथा आवश्यकतानुसार उस पानी को छोड़ा जाता है। इनका उपयोग निम्नलिखित के लिये किया जाता है।

(1) बाढ़ पर नियंत्रण या उसे कम करने के लिये।
(2) जल विद्युत उत्पन्न करने के लिये और
(3) सिंचाई, उद्योगों, और अन्य उपयोग ग्रामीण, उपनगरीय और नगरीय क्षेत्रों के लिये जल आपूर्ति के लिये। तैराकी, नौकायन जैसे मनोरंजनात्मक गतिविधियों के लिये उपयोग में लाए जाते हैं।

7.8.1 बाँधों के लाभ


(1) बांध से निकलने वाले पानी से बिजली बनाई जाती हैं।
(2) कोयले के उपभोग में कमी आती है परिणामस्वरूप CO2 का उत्सर्जन भी कम होता है।
(3) बाढ़ पर नियंत्रण होता है।
(4) कृषि के लिये सिंचाई के पानी की आपूर्ति की जाती हैं।

7.8.2 बाँधों से हानियाँ


(1) वनों और कृषि भूमि का बहुत बड़ा भाग स्थायी रूप से जलमग्न हो जाता है।
(2) यहाँ रहने वाले लोगों की बहुत बड़ी आबादी को हटाना पड़ता है।
(3) पानी के कम बहाव के कारण जल प्रदूषण में वृद्धि हो जाती है।
(4) निचले बाढ़ के इलाकों में पोषकों के पुनर्भरण में कमी आती हैं।
(5) कुछ मत्स्य प्रजातियों के प्रवास और अण्डे देने में बाधा पड़ती है।
(6) उच्च लागत।
(7) ऊँचे बाँध अर्थात जिनकी ऊँचाई 15 मीटर (492 फुट) से अधिक हैं। वह विशेषकर भूकम्प सम्भावित क्षेत्रों में भूकम्प के खतरे को और बढ़ा देते हैं।
(8) जल की भौतिक-रासायनिक गुणवत्ता में परिवर्तन होता है।

7.9 औद्योगीकरण और पर्यावरणीय अवक्रमण


शहरीकरण में होने वाली तीव्र वृद्धि समकालिक औद्योगिकीकरण में वृद्धि का परिणाम है। खनन, वस्तुओं का उत्पादन, धातु निष्कर्षण से संबंधित गतिविधियां, झलाई (वेल्डिंग), पिसाई (ग्राइंडिंग) तथा रसायनों का संश्लेषण इत्यादि यह सब औद्योगिक प्रक्रियाएँ हैं। वह उद्योग जिन्हें प्राकृतिक पर्यावरणीय परिस्थितियों के अन्तर्गत उत्पन्न किए गए प्राथमिक कच्चे माल को बेहतर उपयोग के लिये मानव द्वारा बनाया जा रहा है। निम्न प्रकार से पर्यावरणीय अपक्रमण का कारण बन रहे हैं।

प्रदूषणः यह सभी उद्योग अपशिष्ट गैसें और कणिकीय प्रदूषकों को वायुमण्डल में उत्सर्जित कर देते हैं। इनमें से कुछ निम्नलिखित हैं:

(i) गैसीय प्रदूषकः कार्बन, नाइट्रोजन और सल्फर के ऑक्साइड।

(ii) कणिकीय पदार्थः बारीक धात्विक धूल, फ्लाई एश, कालिख, रुई की धूल (कण) और रेडियोधर्मी पदार्थ।

(iii) प्लास्टिक के जलाने सेः पाली क्लोरीनेटिड बाईफिनाइल (Poly chlorinated biphenyles, PCBs) का उत्सर्जन होता है जो फेफड़ों और आँखों के लिये हानिकारक है।

(iv) कुछ विषैली गैसों जैसे फास्जीन (COCl2) तथा मिथाइल आइसोसाइनेट (जैसा कि एक बार भोपाल में हुआ) का दुर्घटनावश रिसाव जानलेवा हो सकता है।

(v) स्मॉग और अम्लीय वर्षा जैसे प्राथमिक प्रदूषकों के मध्य होने वाली जटिल अभिक्रियाओं के परिणामस्वरूप द्वितीयक प्रदूषक उत्पन्न होते हैं जो सभी जीवों, भवनों और स्मारकों के लिये हानिकारक हैं।

भूमि उपयोग और पर्यावास का विनाशः मानव जनसंख्या की बढ़ती हुई आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये प्राकृतिक पारितंत्रों को रूपांतरित किया जाता है। पृथ्वी का 83 प्रतिशत भाग (अन्टार्कटिका को छोड़कर) मानवों द्वारा प्रभावित हुआ है। वन्यजीवों के पर्यावास अपकर्षित हो गए हैं। वनों का सफाया कर दिया गया है जो हजारों छोटे बड़े जानवरों को पर्यावास उपलब्ध कराते हैं। उद्योग और आधुनिक परिवहन नेटवर्कों के द्वारा केवल जन्तुओं के पर्यावास का ही विनाश नहीं हुआ है अपितु इनसे ध्वनि और तापीय प्रदूषण भी पैदा होता है। इससे पौधों और जन्तुओं की वन्य प्रजातियों की वृद्धि और प्रजनन प्रभावित हो रहे हैं जिसके परिणामस्वरूप जैव विविधता का विनाश हो रहा है।

मानव स्वास्थ्यः आजकल विभिन्न प्रकार के रसायनों के उपयोग के कारण स्वास्थ्य संबंधी गम्भीर जटिलताएँ उत्पन्न हो रही हैं। कैंसर की घटनाएँ, आनुवांशिक उत्परिवर्तन तथा तंत्रिका, प्रतिरक्षी और हार्मोनल तंत्र को होने वाली क्षति, पारिस्थितिकी के विनाश के कारण एड्स (AIDS), मैड काऊ रोग (Mad Cow disease ), बर्ड फ्लू तथा स्वाइन फ्लू जैसे नए-नए रोग एक के बाद एक पैदा हो रहे हैं।रोगों के प्रति संवदेनशीलता में वृद्धि उगाई जाने वाली पौधों की प्रजातियां, मछलियां तथा अन्य पालतू पशु पीड़कों और रोगों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो गए हैं।

आनुवांशिक प्रतिरोधकताः पीड़कनाशियों, कीटनाशियों तथा एन्टीबायोटिक्स (प्रतिजैविक) के अधिक उपयोग के कारण दिशात्मक प्राकृतिकवरण में वृद्धि हुई है और यह रोगजनकों में आनुवांशिक प्रतिरोध कारण बन गए हैं।

देसी समष्टियों पर प्रभावः नई विदेशी प्रजातियों (new alien species) या विदेशी प्रजातियों के समावेश के कारण मूल प्रजातियों की जनसंख्या कम हो गई है।

अति उत्पादन के कारण तनावः मवेशियों द्वारा अतिचारण के कारण मृदा अपरदन होता है तथा उत्पादकता का ह्रास होता है। इसी प्रकार खाद्य मछलियों को बहुत अधिक मात्र में पकड़ने के कारण इनकी जनसंख्या घट जाती है और यदि लम्बे समय तक अधिक मात्र में मछली पकड़ने के कारण यह पूर्णरूप से विलुप्त हो सकती है।

पोषकों के चक्रण पर प्रभावः खेतों में रासायनिक उर्वरकों के उपयोग के कारण प्राकृतिक जैव-भू-रासायनिक चक्र बाधित होते हैं।

7.10 प्राकृतिक पारितंत्रों पर मानवीय प्रभावों को कम करने की विधियां


अपनी आवश्यकताओं को कम करनाः हमें अपनी आदतों में परिवर्तन लाना चाहिए, अपनी आवश्यकताओं को घटाना चाहिए तथा अपने संसाधनों विशेषकर खाद्य, ईंधन और जल को संरक्षित करने का प्रयास करना चाहिए।

पारि-औद्यौगिक क्रांतिः उपर्युक्त समस्याओं में से कई समस्याओं का हल आर्थिक औद्योगिक क्रान्ति है। यह एक नया संसाधन और सक्षम उत्पादन पद्धति है जिससे कम से कम कचरा उत्पन्न होता है। पारिउद्योग अथवा औद्योगिक-पारिस्थितिकी का अर्थ है औद्योगिक प्रक्रियाओं के साथ-साथ प्राकृतिक प्रक्रियाओं के पैटर्न के पुनःअभिकल्पन के द्वारा अधिक पोषणीय बनाना।

- एक तरीका यह भी है कि अधिकतर औद्योगिक अपशिष्ट पदार्थों का पुनर्उपयोग या पुनर्चक्रण किया जाए।
- विभिन्न उद्योगों की एक जटिल संसाधन विनिमय वेब में नेटवर्किंग करना जिसमें एक उद्योग का अपशिष्ट दूसरे उद्योग के द्वार कच्चे माल के रूप में उपयोग किया जाए।

पाठगत प्रश्न 7.6


1. बाँध के दो लाभ बताइए।
2. उस हानिकारक गैस का नाम बताइए जो प्लास्टिक को जलाने से उत्पन्न होती है।
3. विदेशी प्रजातियों के प्रवेशन से देसी प्रजातियां किस प्रकार प्रभावित होती हैं।
4. घास के मैदान में पशुओं द्वारा अतिचारण का क्या प्रभाव पड़ता है?

आपने क्या सीखा


- मानव रूपांतरित पारितंत्र मानव निर्मित पारितंत्र है जैसे कृषि पारितंत्र, एक्वाकल्चर तालाब, नगर इत्यादि। इनकी उत्तरजीविता के लिये जीवाश्म ईंधनों के निवेश की आवश्यकता होती है।

- जनसंख्या वृद्धि और ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की तरफ लोगों का पलायन शहरीकरण में वृद्धि का मुख्य कारण है।

- सभी मानव रूपांतरित पारितंत्र जैव विविधता के क्षय से ग्रस्त रहते हैं और वह स्वयं पर सतत नहीं है।

- अधिकतर वर्तमान पर्यावरणीय समस्याएँ अनियंत्रित मानव जनसंख्या वृद्धि, शहरीकरण और औद्योगिकीकरण में होने वाली वृद्धि के कारण हैं।

- किसी भी पादप अथवा जन्तु प्रजाति से अत्यधिक उत्पाद प्राप्त करने की प्रक्रिया को नियंत्रित करना चाहिए, ताकि पारितंत्र में संतुलन बना रहे।

- कृषि पारितंत्रों के कारण कई पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं जैसे मृदा अपरदन, भौमिक जलस्तर का गिरना तथा उर्वरकों और पीड़कनाशियों द्वारा पर्यावरणीय प्रदूषण।

- पर्यावरण की रक्षा के लिये पारिऔद्योगिक तंत्रों को प्रोत्साहित करना चाहिए।

पाठांत प्रश्न


1. रूपांतरित पारितंत्र को परिभाषित कीजिए।
2. प्राकृतिक और मानव रूपांतरित पारितंत्रों में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
3. निम्नलिखित परिस्थितियों के कारण समष्टि में तनाव क्यों आ जाता हैः
(क) अत्यधिक भीड़ (ख) अत्यधिक उत्पादन (ग) मानवीय हस्तक्षेप
4. मानव रूपांतरित पारितंत्रों की विशेषताएं बताइए।
5. निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिएः
(i) जनसंख्या विस्फोट
(ii) औद्योगिक प्रदूषण
(iii) मानव स्वास्थ्य और रोग
6. वृक्षारोपण के लाभ बताइए।
7. कुछ प्रभावों की सूची बनाइये जोकि पर्यावरणीय अपक्रमण को बढ़ावा देते हैं।

पाठगत प्रश्नों के उत्तर


7.1
1. कृषि पारितंत्र, वृक्षारोपण, नगरीय पारितंत्र, ग्रामीण पारितंत्र, एक्वाकल्चर (कोई दो)।
2. प्रजातीय विविधता कम, अत्यधिक सरल, मृदा अपरदन से प्रभावित, अत्यधिक अस्थायी, ये रोगों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील। (कोई दो)

7.2
1. CO2 , मीथेन
2- मिथाइल आइसोसाइनेट (MIC), एक्वायर्ड इम्यूनो डेफिशियन्सी सिंड्रोम (Acquired Immuno Deficiency Syndrome (AIDS)
3. अतिचारण, कम सिंचाई, अत्यधिक उत्पादन, वनोन्मूलन।

7.3
1. अकेसिया, ल्यूकेनास (Lucainas), प्रोसोपिस (Prosopis), सेसबेनिया (Sesbannia), केज़ुराअना (Casuarina), जेट्रोफा (Jatropa), मोनिगा (Moniga) तथा नीम (कोई पाँच)
2. व्यापारिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण तेजी से बढ़ने वाली वृक्ष प्रजातियाँ।
3. पाठ देखिए।
4. जेट्रोफा करकरे।

7.4
1. स्वच्छ और प्राकृतिक वातावरण उपलब्ध है, लोग साधारण जीवन व्यतीत करते हैं।
2. बेहतर रोजगार, स्वास्थ्य और शिक्षा के अवसरों के लिये तथा रहन-सहन की बेहतर सुविधाओं के लिये।
3. अत्यधिक संकुलित और प्रदूषित (जल, वायु और ध्वनि प्रदूषण का उच्च स्तर), रहने की जगह का अभाव झोपड़ पट्टी के विकसित होने का कारण हैं। (कोई दो)
4. पाठ में देखें।

7.5
1. एक्वाकल्चर जलीय जन्तुओं और पौधों का कृत्रिम संवर्धन है जबकि समुद्र तथा अन्य अलवणीय जल निकायों से मछलियों और अन्य जलीय जीवों को पकड़ना मात्सयकी के अन्तर्गत आता है।
2. ईल, तिलपिया, रोहू, कतला, केट फिश (कोई दो)।
3. तिलपिया।
4. मैंग्रोव वन नष्ट होते जाते हैं।

7.6
1. ये जल को संचित करते हैं, जल-विद्युत उत्पन्न करते हैं, फसलों की सिंचाई तथा अन्य घरेलू उपयोग हेतु जल उपलब्ध कराते हैं, बाढ़ पर नियंत्रण रखते हैं। (कोई दो)।
2- पॉलीक्लोरीनेटिड बाईफिनाइल (PCB)।
3- प्राकृतिक प्रजातियों की समष्टि का ह्रास।
4. इसके कारण मृदा का अपरदन और भावी उत्पादन कम हो सकता है।

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