मध्य प्रदेश का कला परिदृश्य

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कला एवं पर्यावरण - एक अध्ययन मध्य प्रदेश के प्रमुख दृश्य चित्रकारों के सन्दर्भ में (पुस्तक), 2014

मध्य प्रदेश का परिचय

विष्णु चिंचालकरविष्णु चिंचालकरभारत देश का सबसे समृद्धशाली राज्य मध्य प्रदेश हृदयस्थल के रूप में पहचाना जाता है। यह अपने नाम के अनुरूप देश के मध्य में स्थित है। स्वतंत्र भारत में नए राज्यों के पुनर्गठन आयोग की सिफारिश पर 01 नवम्बर, 1956 को नए प्रान्त का निर्माण किया गया। इस नए राज्य के निर्माण में पुराने मध्य प्रान्त के महाकौशल, विंध्य प्रदेश, मध्य भारत तथा भोपाल को विलीन कर नए राज्य का गठन किया गया। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसे मध्य प्रदेश के नाम से सम्बोधित किया। इसे ब्रिटिश काल में सेन्ट्रल प्राविंसेज के अन्तर्गत सम्मिलित छोटी-छोटी रियासतें सेन्ट्रल इण्डिया के नाम से जानी जाती थीं। स्वतंत्रता के पश्चात 1947 में सेन्ट्रल प्राविंसेज तथा बरार में बघेलखण्ड और छत्तीसगढ़ की रियासतों को सम्मिलित मध्य प्रदेश बनाया गया। 1947 से 1956 के मध्य तक यह पार्ट A, B और पार्ट C रियासतों में विभाजित था।

01 नवम्बर, 1956 को राज्य पुनर्गठन आयोग डॉ. फजल अली की अनुशंसा के आधार पर मध्य प्रदेश का पुनर्गठन किया गया। उस समय 43 जिले थे। 1972 में दो जिले और शामिल किये गए। जिससे 45 जिले हो गए। उस समय मध्य प्रदेश का क्षेत्रफल 4,43,452 वर्ग किलोमीटर था। जो देश का क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा राज्य था। देश के सात राज्यों उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश, उड़ीसा और बिहार से इसकी सीमा मिली हुई थी।

31 अक्टूबर, 2000 को मध्य प्रदेश का विभाजन कर छत्तीसगढ़ को देश का 26वाँ राज्य गठित किया गया। वर्तमान विभाजित मध्य प्रदेश में 50 जिले तथा 9 सम्भाग हैं। इसकी सीमा 5 राज्यों (राजस्थान, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र तथा गुजरात) को छूती है।

वर्तमान में मध्य प्रदेश 2106’ उत्तरी अक्षांश से 26030’ उत्तरी अक्षांश तथा 7409’ पूर्वी देशान्तर से 81048’ पूर्वी देशातर तक विस्तृत है।

मध्य प्रदेश की पूर्व से पश्चिम तक की लम्बाई 870 किलोमीटर तथा उत्तर से दक्षिण तक चौड़ाई 605 किलोमीटर है। नवीन मध्य प्रदेश का क्षेत्रफल 3,08,245 वर्ग किलोमीटर है।

पर्यावरणीय प्रतीकों को राजकीय चिन्ह के रूप में लिया है जैसे राजकीय पशु- बारहसिंगा, राजकीय पक्षी-दूधराज (शाह बुलबुल), राजकीय वृक्ष- बरगद का पेड़।

मध्य प्रदेश का प्राकृतिक सौन्दर्य

मध्य प्रदेश का प्राकृतिक सौन्दर्य लुभावना और अनेकों सम्भावनाओं से परिपूर्ण है। निरन्तर विकास की प्रक्रिया के दौरान इसका सौन्दर्य निखरता जा रहा है। यहाँ की धरातलीय बनावट एक समान नहीं है। कहीं पर्वत शृंखलाएँ, कहीं दूर तक फैले पठार, मैदान, कहीं ऊँची-नीची घाटियाँ विद्यमान हैं। मध्य प्रदेश में ही जीवन-दायिनी नदी नर्मदा है जो मध्य प्रदेश की सबसे बड़ी नदी है। इसके अलावा यहाँ अन्य पवित्र और कल्याणकारी नदियाँ है। डॉ. ओंकार लाल शर्मा ने अपनी कविता में मध्य प्रदेश के प्राकृतिक सौन्दर्य के बारे में वर्णन किया।

मध्य प्रदेश का प्राकृतिक सौन्दर्य नदियों, वनों, वनस्पति, पर्वतों, पठार मैदानों से है। जिससे समृद्ध पर्यावरण निर्मित होता है।

नदियाँ

नदियाँ देश की जीवन रेखा मानी जाती हैं। इसके किनारे ही कृषक का जीवन फलीभूत होता है। इसके अलावा अन्य उद्योग और संस्कृतियाँ पनपती हैं। भारत में सिन्धु नदी प्रमुख उदाहरण है। प्रत्येक नदी का अपना महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसके किनारे ही धार्मिक और कलात्मक व्यवसाय पनपता है। अनेक मूर्तिकार, चित्रकार, पुजारी के परिवार पालने का साधन भी है।

1. नर्मदा

नर्मदा नदी मध्य प्रदेश की सबसे बड़ी नदियों में से एक है। इसकी लम्बाई 1312 कि.मी. है। इस नदी का उद्गम मैकल पर्वत से 1057 मीटर की ऊँचाई पर अमरकंटक से हुआ है। नर्मदा का शीतल प्रवाह और प्रमुख धार्मिक स्थलों में से जबलपुर, होशंगाबाद, ओंकारेश्वर, महेश्वर, बरहान, नरसिंहपुर, खरगौन आदि प्रमुख हैं।

जबलपुर निवासी श्री अमृतलाल वेगड़ ने सौन्दर्यपूर्ण नर्मदा की पैदल परिक्रमा की है। साथ ही अनेकों छवि बनाकर कोलाज बनाए। साथ ही स्वयं के संस्मरण द्वारा कला साहित्य को तीन किताबों को जन सामान्य के बीच लाए। नर्मदा के सौन्दर्य को स्व.श्री डी.जे जोशी, स्व. श्री राममनोहर सिन्हा एवं डॉ. लक्ष्मीनारायण भावसार आदि ने अपने दृश्य चित्रों में प्रमुख स्थान दिया।

2. चम्बल

चम्बल नदी का उद्गम महु के निकट जानापावा से हुआ है। इसकी सम्पूर्ण लम्बाई 775 किमी. है। यह इटावा के पास यमुना नदी में मिलती है। चम्बल नदी के प्रवाह क्षेत्र में धार, उज्जैन, रतलाम, मन्दसौर और राजस्थान क्षेत्र आते हैं। काली सिन्ध, सिन्ध, कुनवारी, पार्वती और बनास नदी इसकी सहायक नदियाँ हैं। चम्बल नदी पर मन्दसौर में गाँधी सागर बाँध बनाया गया।

3. सोन

सोन नदी का उद्गम अमरकंटक से नर्मदा के विपरीत दिशा में हुआ है। इसकी लम्बाई 780 किमी. है।

4. ताप्ती

मुलताई के समीप सतपुड़ा पर्वत से 762 मीटर की ऊँचाई से ताप्ती नदी का उद्गम माना गया है। पूर्णा इसकी सहायक नदी है।

5. बेतवा

बेतवा नदी का उद्गम रायसेन जिले के कुमरा गाँव से हुआ है। इसकी लम्बाई 780 किमी है। बीना, धसान और काली सिन्ध सहायक नदियाँ है।

6. तवा

इसका उद्गम पचमढ़ी के निकट महादेव पर्वत श्रेणी से हुआ है। यह नर्मदा की सहायक नदी है।

7. क्षिप्रा

इसका उद्गम इन्दौर के पास कांकरी बरडी से हुआ है। इसकी लम्बाई 195 किमी है। इसका धार्मिक और पौराणिक महत्व है। महाकुम्भ का आयोजन उज्जैन में क्षिप्रा नदी तट पर ही होता है। यह बारह वर्षों में एक बार आता है।

8. पार्वती

इसका उद्गम सीहोर से होता है। इसकी लम्बाई मात्र 37 किमी है।

9. कूनो नदी

इसका उद्गम शिवपुरी पठार से है। उद्गम के पश्चात यह संकरी और गहरी घाटी में बहती है। यह मुरैना के पठार को पार करके चम्बल में मिल जाती है।

10. कुँआरी नदी

यह सिन्ध की सहायक नदी है। इसका उद्गम पठार से हुआ है।

11. वर्धा

इसका उद्गम मुलताई के उत्तर पूर्व व दक्षिण पूर्व में हुआ।

12. केन नदी

विन्ध्याचल पर्वत से निकलकर उत्तर की ओर से बहती हुई घने जंगल को पार कर यमुना में मिल जाती है।

13. काली सिन्ध

यह देवास के बागली नदी से निकली है। यह मध्य प्रदेश में शाजापुर और नरसिंहगढ़ से निकलती है।

14. बैनगंगा

इसका उद्गम परसवाड़ा पठार से हुआ है। यह सिवनी, छिन्दवाड़ा और सिवनी बालाघाट से निकलती है।

15. गार

यह नर्मदा की सहायक नदी है और लखना क्षेत्र में मिलती है।

पठार

यहाँ पर कुल 7 पठार हैं:-

1. मध्य भारत का पठार
2. मालवा के पठार
3. बुन्देलखण्ड का पठार
4. रीवा पन्ना का पठार
5. सतपुड़ा मैकल का पठार
6. बघेलखण्ड का पठार
7. नर्मदा सोन घाटी।

वनस्पति

मानव जीवन में वनस्पति का बहुत महत्व है। मध्य प्रदेश के कुल क्षेत्र का लगभग 27% वनों से आच्छादित है। मध्य प्रदेश के वनों को दो भागों में बाँटा गया है।

1. पतझड़ वाले वन- सागौन, साल, बीजा, हल्दू, तेन्दू, धावड़ा, शीशम और बाँस के वन।
2. कंटीले वन- बबूल खेजड़ा, आँवला, बबूल, करौंदा, बेर इत्यादि

मध्य प्रदेश में सतपुड़ा, विन्ध्याचल, महादेव, मैकल, अमरकंटक, कैमूर-भाण्डेर आदि प्रमुख पर्वत श्रेणियाँ आच्छादित हैं। इन्हीं पर्वत श्रेणियों के गर्भ में कन्दराओं में आदि मानव ने स्वयं की अनुभूतियों को जीवन्त किया। आदि मानव का प्रागैतिहासिक मानव भारत का सबसे प्राचीन निवासी था। वह नितान्त बर्बर, जंगली और घुमन्तू था, जंगली पशुओं के आतंक से भयग्रस्त रहा था। तब भी उसने आत्मशक्ति, दृढ़ संकल्प और साहस के साथ अपना मार्ग प्रशस्त किया। पत्थर के औजार, बर्तन भाण्डे उन पर चित्रित आलेखन, इसी क्रम में छेनियाँ, शिकार करने और मछली पकड़ने के हथियार, शैलाश्रयों की ऊबड़-खाबड़ भीतों पर चित्रांकन पाषाण युगीन मानवों के रहन-सहन की दशा समझने के लिये सहायक सिद्ध होते हैं।

भारतीय संस्कृति में कलाओं को विशेष प्रयास कर नहीं लाया गया, बल्कि ये आदतें (प्रवृत्तियाँ) वह स्वयं आत्मसात करता गया और यही परम्परा उनके जीवन का एक हिस्सा बन गई।

कन्दराओं या गुफाओं में उसने एक अद्भुत संसार को रचा। आड़ी, तिरछी रेखाओं के माध्यम से वह विस्मित हुआ और आनन्दित भी हुआ। उसने विषाद पूर्ण स्थिति को भी देखा। इस समय आखेटक संस्कृति का विकास हुआ है। इस समय मानव ने स्वयं को प्रकृति के अधिक समीप पाया। पेट की क्षुधा शान्त करने के लिये एवं स्वयं की रक्षा के लिये प्राकृतिक संसाधनों की सहायता ली। प्रकृति प्रदत्त आपदाओं, आँधी-तूफान, वर्षा आदि से बचने के लिये कन्दराओं की शरण ली। पर्वतों की कन्दराओं को अपना निवास स्थान बनाया और अनगढ़ प्रस्तर खण्डों को आखेट के लिये हथियार बनाया। इन कन्दराओं को प्रकाशित और गर्म रखने के लिये उसने पशुओं की चर्बी और लकड़ी को जलाया। उसने गुफाओं के धूमिल प्रकाश में अपने जीवन को सरस और सरल बनाया। अभिव्यक्ति तूलिका के माध्यम से खुरदरी चट्टानों, गुफाओं की दीवारों पर तथा फर्श पर चित्रों के रूप में कर दी। यह समय प्रागैतिहासिक काल अर्थात इतिहास के पूर्व का समय कहलाया, जो कि प्राक और इतिहास शब्द से मिलकर बना है।

मध्य प्रदेश का कला परिदृश्य

भारत की हृदयस्थली के रूप में स्थापित मध्य प्रदेश कलात्मक और सौन्दर्यपूर्ण स्थलों से परिपूर्ण है। अपने नाम को चरितार्थ करता हुआ यह मध्य में स्थित है। पर्यावरणीय दृष्टि से इसका प्राकृतिक सौन्दर्य मनमोहक है।

इसका अलंकरण करने में समृद्ध जल-स्रोत, हरित तथा पर्णपाती वन, धातु भण्डार, पर्वत और कन्दराएँ सभी जीवनावश्यक स्रोतों की भूमिका रही है। इस भू-प्रदेश में दरियाी घोड़ा, हिप्पोपोटामस आदि सभी विचरण करते थे। जबलपुर के निकट घुघवा ग्राम में विश्व स्तरीय फॉसिल्स पार्क कई हेक्टेयर भूमि में फैला हुआ है तथा अभी-अभी प्राप्त डायनासोर का फॉसिल, धार के निकट मिला है। जीवाश्म, भोपाल के निकट रविशंकर नगर में शुतुरमुर्ग के अंडे पर उकेरे गए आकल्पन इसकी पुष्टि करते हैं।

उस समय का मानव वातावरण से संघर्ष कर ‘सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट’ की क्रिया में सर्वश्रेष्ठ भूमिका अदा करता रहा।

अद्यतन स्थिति तक पहुँचने में मानव में अनेकों परिवर्तन आते रहे। हमने नए रीति-रिवाजों, वस्तुओं और संस्कारों को अपनाया, पर जो जीवन रस हजारों वर्ष पूर्व विद्यमान था। वह आज भी जस का तस बना है। उसमें निहित रस, गन्ध, स्वाद और जीवन्तता वैसी ही बनी हुई है। इस निरन्तरता ने ‘परम्परा’ का रूप धारण कर लिया है। ये गुण आदिकाल से लेकर आज तक चले आ रहे हैं। हमारे रक्त में परम्परा रूपी कणों ने ही हमें इतना समृद्धशाली बनाया है। इकबाल ने अपनी कुछ पक्तियों में इस प्रकार बयां किया है-

यूनानो मिश्रो रोमा सब मिट गए जहाँ से
अब तक मगर बाकी नामों निशां हमारा।


हमारी रंगों में समाए चरावेति-चरावेति के कारण ही हमारा अस्तित्व बना हुआ है। आदिमानव के अस्तित्व का आधार ही श्रम था और श्रम से ही जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति करता था और ‘आनन्द’ का संचय करता रहा। आदिमानव के हृदय में चित्रण की शक्तिशाली अभिलाषा विद्यमान थी और एक चित्र से दूसरे चित्र को अधिक प्रभावशाली बनाने की आकांक्षा भी।

आदिम मानव ने प्रस्तर अथवा कन्दरा के चित्रों के महत्व को भिन्न-भिन्न दृष्टि से देखा, जो चित्र पशुओं के हैं उनमें मंत्र मुग्ध करने की शक्ति है। सम्भवतः मानव का विश्वास था कि जिस पशु का वह चित्र बना रहा है, वह उसकी शक्ति पर विजय प्राप्त कर लेगा।

मंत्र मुग्ध करने वाली कला इन्द्रिय ज्ञान से सम्बन्धित है और जीवन को प्रसन्न करती है। यह कला पशुओं के स्वाभाविक गुणों और शक्ति पर निर्भर करती है। इस प्रकार की कला शक्तिमय और इन्द्रिय ज्ञान से सम्पन्न है।

कला संस्कृति के मूल में धार्मिकता का समावेश मिलता है। यूनान, चीन, भारतवासियों को कला की प्रेरणा प्रकृति से ही प्राप्त हुई। इसके प्रमाण प्रागैतिहासिक काल के आदि मानव द्वारा बनाए गए वे चित्र हैं, जिनमें प्रकृति के स्पष्ट दर्शन होते हैं। पेड़-पौधे, वन्य प्राणी, नदी आदि के गेरू कोयला से बनाए गए चित्र आज भी मनुष्य की पर्यावरण से समबद्धता दर्शाते हैं।

मध्य प्रदेश में कन्दराओं में शैल चित्रों का उद्भव दृष्टिगोचर होता है। ये प्राकृतिक रूप से सम्पन्न और सुन्दर परिदृश्य हैं जो मानव को अपनी ओर सहज रूप से आकर्षित करते हैं। साथ ही प्रदेश में व्याप्त प्रागैतिहासिक कला की कड़ियाँ जोड़ने से मानव के विकास की कहानी का पता चलता है। यह पाषाण काल से सम्बद्ध है, पूर्व पाषाण काल 50,000 ई. पूर्व एवं उत्तर पाषाण काल 35,000 ई.पू.।

उत्तर पाषाण युग में शैल चित्रों के सर्वाधिक उदाहरण देखने को मिलते हैं। मध्य प्रदेश के प्रमुख प्रागैतिहासिक कला केन्द्रों की खोज का श्रेय सर्वप्रथम कार्लाइल काकबर्न को जाता है।

विभिन्न प्रागैतिहासिक केन्द्रों की खोज का श्रेय विभिन्न विद्वानों एवं पुरातत्ववेत्ताओं को जाता है। जैसे 1910 में सी.डब्ल्यू एण्डरसन-सिंघनपुर, डी.एच.गार्डन ने पचमढ़ी, स्व. श्री वी.एस. वाकणकर पुरातत्व संग्रहालय व उत्खनन के अधीक्षक, उज्जैन द्वारा भीमबेटका तथा मनोरंजन घोष द्वारा होशंगाबाद की खोज की। इनके अलावा शोधकर्ताओं में श्री गोवर्धन राय शर्मा, आर.वी. जोशी, डॉ.डी.पी.एम. द्वारिकेश, पंचानन मिश्र, अमरनाथ एवं प्रो. कृष्णदत्त बाजपेयी प्रमुख हैं।

मध्य प्रदेश के प्रमुख प्रागैतिहासिक केन्द्र

1. भोपाल- नयापुरा, बरखेड़ी, बैरागढ़, भीमबेटका, धरमपुरी, शहद-कराड, गुफा मन्दिर, मनुआभान की टेकरी, भदभदा, श्यामला हिल्स, सांची एवं उदयगिरी।
2. होशंगाबाद- आदमगढ़, बुधनी, रेहटी।
3. रायसेन- खरबई, नरवार, पुतली कराड़, रामछज्जा।
4. सागर- रहली, तारागुबरी, मडैया, गोंड, बरोदा, कड़वा, आबवेद, नरयावर्ग, बीता, रानगीरा तथा खानपुर। (यहाँ प्रागैतिहासिक चित्र प्राप्त हुए हैं)
5. नरसिंहपुर- बिजौरी।
6. पंचमढ़ी- इमलीखोह, निम्बूभोज, लश्करिया खोह, मांटेरोजा, काजरी, झालाई, मड़ादेव, सोनभद्र, डोरोथी, डीप ईशान श्रंग, छोटा महादेव, बड़ा महादेव।
7. रीवा, पन्ना, छतरपुर- करपटिया, देवरा, नौगाँव।
8. ग्वालियर- ग्वालियर, शिवपुरी, कंकाली माता टिकला एवं चौरपुरा आदि।
9. चम्बल घाटी- मोड़ी, सुजानपुरा, सीता खर्डी, झलवाड़ा, कोटा, दर्रा कनारियावुड, इन्द्रगढ़, गाँधीसागर बाँध, छिपड़ा नाला आदि।


भीमबेटका

भारत के सबसे प्राचीन प्रागैतिहासिक चित्र भीम बेटका में उपलब्ध होते हैं। यह मध्य प्रदेश में भोपाल से 40 कि.मी. दूर बरखेड़ा और औबेदुल्लागंज स्टेशन के बीच मियांपुर (भीमपुरा) नामक गाँव से 2 कि.मी. दक्षिण में खड़ी पहाड़ी पर स्थित है। यहाँ 600 से भी अधिक गुफाएँ हैं, जो 10 किमी क्षेत्र में फैली हुई है। इनमें 475 चित्रित हैं। श्री वी.एस. वाकणकर (जो विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन में पुरातत्व संग्रहालय व उत्खनन के अधीक्षक) को खोज का श्रेय जाता है। 30 सितम्बर सन 1973 ई. में ‘धर्मयुग’ साप्ताहिक में डॉ. वीरेन्द्र नाथ मिश्र का सचित्र लेख ‘भीमबेटका की गुफाओं का रहस्य’ प्रकाशित हुआ था।

यहाँ के अधिकांश चित्र मध्य-पाषाण काल के हैं। प्राचीन आदिम चित्रों के यह दो स्पष्ट स्तर हैं।

प्रथम जहाँ हिरण, बारहसिंगा, सुअर, रीछ, भैंसे आदि जानवरों को स्वतंत्र रूप से चित्रित किया है। दूसरा स्तर वह है जब मानव को जानवरों के साथ अन्तरंग मित्र के रूप में दर्शाया गया है। यह वह युग है जब मनुष्य ने खेती करना व पशुपालन के उन्नत तरीके ढूँढ लिये थे। चित्रों में लाल, काले व सफेद रंगों का प्रयोग हुआ है। कहीं-कहीं हरे व पीले रंगों के चित्र भी प्राप्त हुए हैं। वातावरणीय प्रभाव के कारण अधिकांश चित्र नष्ट हो गए हैं, परन्तु फिर भी छतों और दीवारों पर बने काफी चित्र अच्छी अवस्था में विद्यमान हैं। जानवरों के अलावा मछली, कछुआ व केकड़ा भी चित्रित है। कुछ सामाजिक चित्र, जिनमें सामूहिक नृत्य, मद्यपान शिकार आदि बने हैं। बाद के चित्रों में घोड़ों पर जुलूस आदि भी हैं।

यह चित्र सबसे पुरान चित्रों में से हैं और इन्हें विश्व-धरोहर में शामिल किया गया है। स्व. श्री एच.डी. सांकलिया के अनुसार भीमबेटका और भोजपुर ही ऐसा स्थान है जहाँ पर पूर्व पाषाण काल से चौदहवीं-पन्द्रहवीं शताब्दी तक के पुरावशेष क्रमिक रूप से उत्खनन में प्राप्त होते हैं। इस दृष्टि से भीमबेटका का महत्व विश्व स्तर पर बढ़ गया है।

पचमढ़ी

पचमढ़ी होशंगाबाद जिले में सतपुड़ा पर्वत की महादेव पहाड़ी में स्थित है। इस क्षेत्र के चित्रों को प्रकाश में लाने का श्रेय डी एच गार्डन को है। सन 1936 में उनका एक प्रसिद्ध लेख ‘The Rock Printing of Mahadev Hills’ प्रकाशित हुआ। यह सचित्र था 20 फलकों पर 51 चित्रों का प्रकाशन हुआ। इमलीखोह, निम्बू भोज, बाजार केव (लश्करिया खोह), माड़ादेव, डोरोथीडीप, सोनभद्र बनिया बेरी, काजरी, छोटा महादेव आदि स्थल हैं। पचमढ़ी में सम्भवतः पाण्डवों ने निवास किया था। चारों ओर फैले अरण्य में अगणित शिला चित्रों के कई स्तर मिलते हैं। यहाँ इन शिला चित्रों को ‘पुतरी’ कहते हैं। ये गुफा की छतों और दीवारों पर बने हैं। इन्हें विशेषकर लेट कर देखा जा सकता है। यहाँ पर चित्र आखेट, संगीत नर्तन वादन, पारिवारिक जीवन, पूजन तथा धनुर्धर विषयों को लेकर बनाए गए हैं। पशुओं की सुदीर्घ पंक्तियाँ अलंकरण के रूप में चित्रित हैं। यहाँ के चित्रों के कई स्तर हैं पहले स्तर के चित्रों में तख्तीनुमा और डमरूनुमा मानवाकृतियों को बनाया गया है और लहरदार रेखाओं से शारीरिक गठन का बोध कराने का प्रयास किया है। यहाँ लाल और पीले रंग की अधिकता है। दूसरे स्तर में बेडोल आकृतियाँ हैं। इसमें आखेट दृश्यों की अधिकता है। शहद एकत्रित करते मानव तथा घुड़सवार हैं। तीसरे स्तर के चित्रों में स्वाभाविकता की ओर झुकाव दिखाई देता है। चित्रों के विषय में वीर योद्धा, शस्त्रधारी सैनिक, वाद्य यंत्रों को बजाते वादक और घरेलू विषयों से सम्बन्धित दृश्य बने हैं।

महादेव की गुफा में शेर का शिकार, बनिया बेरी में स्वास्तिक पूजा, क्रीड़ा, तथा नर्तन के दृश्य तथा माण्टेरोजा में सफेद रंग के लाल बाह्य रेखा वाले चित्र बने हैं।

इन प्रकार पचमढ़ी मनोरम दृश्य-स्थल के साथ ही आकर्षक कलात्मक परिवेश भी उपस्थित करता है।

होशंगाबाद

आदमगढ़ की पहाड़ी, बुदनी तथा रहेली क्षेत्र की गुफाओं में शैल चित्र अंकित हैं। ये होशंगाबाद चित्र में आते हैं। यहाँ के चित्रों को 1921 में मनोरंजन घोष ने खोजा था। यहाँ का सबसे प्रमुख स्थल आदमगढ़ है। यहाँ जंगली भैंसे का चित्र 10 फीट x 6 फीट आकार का है जो दोहरी शाखाओं में शैलाश्रय के ऊपरी भाग पर पूरे विस्तार से अंकित है। हल्के पीले रंग का विशाल हाथी का दृश्य है। इस शिलाश्रय पर विभिन्न कालों और चित्र शैलियों में पाँच-छः स्तर के साथ है। हाथी के पैरों के पास अनेक पतली टांगों वाला भैंसा बनाया है तथा चार धनुर्धारियों वाला गतिपूर्ण चित्र बनाया है तथा पैरों के पास घुड़सवार जंगली जानवर तथा वन्य जीवन का सुन्दर चित्र मिलता है एक शैलाश्रय पर बड़े से मोर का चित्र भी दिखाई देता है। छलांग लगाते बारहसिंगा का एक अन्य सुन्दर चित्र अंकित है जो गहरी पृष्ठ भूमि पर पीली रेखाओं से उकेरा गया है। यही गतिशील आकृतियाँ बनी हैं।

मन्दसौर

मन्दसौर जिले में भानपुरा व रामपुरा के निकटस्थ श्री वाकणकर ने अनेक शैलाश्रयों को खोजा। मोरी स्थान पर बने गुफा चित्र सुन्दर हैं, इस चित्र में 30 पहाड़ी खोह है जिनमें अनेक चित्र हैं। अनेक चिन्ह भी हैं जैसे चक्र, सूर्य, सवतोबद्र, अष्टदल कमल और पीपल की पत्तियाँ भी हैं। यहीं चित्र में देहाती बाँस से बनी गुड़िया भी चित्रित है। अनेक पशु, नृत्यरत मानव तथा पशुओं को हांकते मानव भी है।

ग्वालियर की प्रागैतिहासिक कला

मध्य प्रदेश के उत्तर-पश्चिमी भाग में ऐतिहासिक नगर ग्वालियर की कला संस्कृति प्रागैतिहासिक और पूर्व पाषाणकालीन से प्रारम्भ होती है। पूर्व पाषाण काल की अश्यूलियन संस्कृति 1,00,000 वर्ष पूर्व से लेकर 40,000 ई. पूर्व तथा मध्य पाषाण युग 40,000 वर्ष पूर्व से लेकर 20,000 वर्ष के बीच आंकी गई है। गोपांचल क्षेत्र में दतिया जिले के केवलारी, इंदरगढ़, डबरा, नूराबाद और जसारा से भी पाषाण युगीन उपकरण, फॉसिल प्राप्त हुए हैं। ग्वालियर से गुप्तेश्वर उत्खनन स्थल तक प्रागैतिहासिक शैलाश्रय प्रागैतिहासिक मानव का निवास केन्द्र होने का प्रमाण देते हैं। इनमें ही चित्रकला के उदाहरण मिलते हैं।

ग्वालियर में प्राप्त शैलाश्रयों में मोहना से एक किलोमीटर दूर पार्वती नदी के तट पर टीकला ग्राम के दक्षिण में प्राप्त होते हैं। यहाँ 14 शैलाश्रय हैं। टीकला ग्राम का पहला शैलाश्रय मुम्बई आगरा मार्ग की ओर माता मन्दिर से 200 मीटर दक्षिण की ओर तथा दूसरा समूह दूसरी पहाड़ी पर उत्तरी उतार के निकट है।

शिवपुरी के प्रागैतिहासिक चित्र

शिवपुरी के निकट टुण्डा भरका खोह के निकट बिची बाजार में चुड़ैल छाज चित्रशाला में आदि मानव की संघर्षमयी कहानी चित्रित है। उसने धूमिल प्रकाश में अपने जीवन की सरस एवं सरल अभिव्यक्ति तूलिका के माध्यम से खुरदरी चट्टानों-गुफाओं की दीवारों तथा चट्टानों की ऊपरी भागों पर चित्रों के रूप में अंकित की।

चट्टानों के धरातल पर दौड़ते-भागते हिरण, आखेट करती मानवाकृतियाँ विजय सिद्धि के लिये जादू-टोना, स्वास्तिक चिन्ह व हाथ के छापे गेरू रंग से उकेरे गए हैं। एक जगह पर नृत्यरत पुरुषाकृति जिसके हाथ में डमरू है- पशुपति शिव की आकृति है। इसी प्रकार आसन नदी के लिखीछाज में लगभग 86 गुफाएँ विद्यमान हैं। इस प्रकार मध्य प्रदेश में शैलाश्रय मानव-विकास की आधारभूत कड़ी है। इन चित्रों द्वारा संस्कृति और सभ्यता का बोध होता है।

सिंहनपुर की प्रागैतिहासिक कला

मध्य प्रदेश विभाजन के पूर्व यह मध्य प्रदेश में आता था किन्तु वर्तमान में यह रायगढ़ जिले के सिंहनपुर गाँव के पास है। इसे सन 1910 में डब्ल्यू एण्डर्सन और 1913 में अमरनाथ दत्त ने खोजा। यहाँ के चित्र गेरू रामरज जैसे भू रंगों से बने हैं। यहाँ, हिरण, छिपकली, सांड आदि जीवों का अंकन मिलता है।

यहाँ एक गुफा में दीवार पर जंगली सांड का आखेट करते हुए मार्मिक दृश्य है। इस चित्र में कुछ आखेटक चारों ओर से पशुओं को घेरे हैं और कुछ प्रबल पशु खीस से वायु में उछले गए हैं और कुछ पृथ्वी पर गिर पड़े हैं। इस चित्र में आखेटक तथा पशुओं की भयंकरता और गति का सुन्दर अंकन किया है।

इसी दीवार पर दूसरा चित्र जंगली भैंसे के शिकार का सुन्दर दृश्य है जिसमें घायल भैंसा बुरी तरह तीरों से छिदा हुआ दम तोड़ रहा है। भालों से सुसज्जित मानवाकृतियाँ भैंसे को घेरे हुए हैं।

यहाँ के चित्र क्षेपांकन पद्धति से बने हैं। यहाँ चित्र परवर्ती और प्राचीन दोनों ही काल के बने हुए हैं।

इन प्रागैतिहासिक गुफाओं में प्रागैतिहासिक काल का विस्तृत संसार दिखाई देता है, परन्तु व्यवस्थित इतिहास नहीं प्राप्त होता। 500 ई.पू. के पश्चात हम एक ऐसे युग में प्रवेश करते हैं, जहाँ से चित्रकला का इतिहास व्यवस्थित रूप से उपलब्ध होने लगता है। साथ ही चित्र सम्बन्धित साहित्य प्रचुर मात्रा में प्राप्त होता है। मध्य प्रदेश में सरगुजा रियासत की रामगढ़ पहाड़ियों में जोगीमारा तथा सीताबोंगरा की गुफाएँ अवस्थित हैं। इनका समय 300-200 ई.पू. माना जाता है। इस गुफा के शोध का श्रेय श्री आसित कुमार हल्दार और क्षेमेन्द्रनाथ गुप्त को है। इस गुफा के चित्र सफेद चूने से पुते धरातल पर लाल-काले तथा पीले रंगों से बनाए हैं। सीमा रेखाएँ लाल रंग से बनी हैं। यहाँ चित्रों के दो स्तर मिलते हैं, पहले चित्र कुशल चित्रकारों की कृति लगते हैं, परन्तु बाद में इन्ही के ऊपर दोबारा जो चित्र बनाए हैं, वे अकुशल कलाकारों के लगते हैं। ये चित्र विधिवत भित्ति-चित्रण का प्रथम प्रयास है।

बाघ गुफा चित्र

मध्य प्रदेश के कला परिदृश्य में बाघ-गुफा का महत्त्वपूर्ण स्थान है। यहाँ की कला परिष्कृत रूप में है। इसके चित्र अजन्ता गुफा चित्रों से साम्य रखते हैं। ये गुफाएँ धार जिले के अन्तर्गत विन्ध्य पर्वत श्रेणी में अवस्थित है। बाघ की गुफाएँ बाघ नदी के किनारे अवस्थित है। इन गुफाओं का विवरण लेफ्टिनेंट ने 1818 में मुम्बई से प्रकाशित किया। ये गुफा चित्र गुप्तकला के श्रेष्ठ उदाहरण हैं।

ये कुल नौ गुफाएँ हैं। 1. गृह गुफा, पाण्डव, हाथी खाना, रंगमहल, गृह गुफा चार स्तम्भ वाली 23x24 फीट के कमरे के समान है। दूसरी पाण्डव गुफा है। यह ठीक हालत में है और यहीं पर ऐतिहासिक महत्व का महाराज सुबन्दु का ताम्रपत्र मिला है। तीसरी गुफा हाथी खाना है। यह चैत्य गुफा है। इसमें सुन्दर चित्र अंकित है। यह विशिष्ट अतिथियों के लिये बनाई गई है। इसमें बोधिसत्व के चित्र मिलते हैं। चौथी गुफा रंगमहल के नाम से प्रसिद्ध है। इसकी दीवार तथा छत पर चित्र बने हुए है। यह दूसरी गुफा से मिलती-जुलती है। इसके बीच का हाल 94 फीट लम्बा है। पांचवी पाठशाला- गुफा में छतों दीवारों और स्तम्भों में टेम्परा चित्र है। छठी गुफा एक 46 फीट का वर्गाकार हॉल है। शेष तीन गुफाएँ नष्ट हो चुकी हैं।

विन्सेट स्मिथ के अनुसार यह गुफा मध्य काल की न होकर उत्तर काल की है। फर्ग्यूशन और बर्गस इसका निर्माण काल 350-450 ई. निर्धारित करते हैं। महाराज सुबन्धु के ताम्रपत्र अनुसार इसका निर्माण कार्य 416-486 ई. के मध्य निर्धारित किया है।

चित्र मनोहारी एवं प्रभावपूर्ण है। रंग संयोजन में लाल, पीला, हरा, रंग अधिक प्रयोग हुआ है। यहाँ के आलेखनों में फूल-पत्तियाँ, डालियाँ और पशु-पक्षियों का चित्रण हुआ है। हंस और बत्तख शुद्धि और बुद्धि के प्रतीक माने गए हैं। हाथी, ऐश्वर्य, प्रतिभा और वैभव का प्रतीक है। तो पशु-पक्षी मंगल की कामना दर्शाता है। इन गुफाओं में नारी का मनोहारी रूप सामने आया है। भारतीय जनमानस में अधिकांश चित्र सामाजिक-सांस्कृतिक क्रिया-कलापों से सरोकार रखते हैं जो मध्य प्रदेश की तत्कालीन चित्रण शैली की विशिष्टता को सुदृढ़ करते हैं।

मालवा की कला

बाघ गुफाओं के भित्ति चित्रों के पश्चात दीर्घ अन्तराल तक चित्रांकन के अवशेष प्राप्त नहीं होते हैं। समय बीतने के साथ ही भारत में राजाओं का शासन हुआ। राज्याश्रय में कला के नवांकुर फिर से फूटने लगे। इसका प्रभाव मध्य प्रदेश पर भी पड़ा। मध्यकाल में तीन प्रमुख शैलियाँ विकसित हुईं जो मालवी, बुन्देली और ग्वालियरी नाम से जानी जाती है।

मालवा में 8वीं शती में राजपूतों और 13वीं से 15वीं शती तक तुर्क वंश का शासन था। और 1535 ई. से 1561 ई. तक पठान शासक बाजबहादुर ने शासन किया। आपसी युद्ध के कारण कला का विकास नहीं हुआ। इस समय केवल स्थापत्य कला का ही विकास हुआ। इस समय परमार नरेशों के शासन काल में चित्रकला का विकास हुआ। यह राजप्रासादों, धनिकों तथा जागीरदारों के भवनों की शोभा बनी। माण्डू में प्राप्त ‘कल्प सूत्र’ में लाल पृष्ठभूमि पर सुनहरे रंग में अक्षर लिखे गए हैं तथा प्रत्येक पृष्ठ को विभाजित किया है। दाहिने भाग में गद्य-पद्य लिखे हैं।

15वीं शती के पूर्व और प्रारम्भ में मालवा शैली में चित्रित ‘लौर चन्दा’ प्रणय काव्य श्रेष्ठ उदाहरण हैं। इन्दौर, उज्जैन, मन्दसौर, धार, देवास, राजगढ़ तथा नरसिंहगढ़ मालवा शैली के प्रमुख केन्द्र रहे हैं।

18वीं सदी में इन्दौर में मराठाओं के आगमन से चित्रकला की गतिविधियों में जान आई। मराठों के समय एक समन्वित शैली उभर कर आई। अहिल्याबाई होल्कर द्वारा चांदबड़ के राजप्रासाद तथा यशवंत राव (प्रथम) की छत्री में रंगमहल नामक भित्ति चित्रों को सुसज्जित किया। प्रसिद्ध राजवाड़ा में गणेश चौक के दूसरी मंजिल पर टेम्परा पद्धति में बने भित्ति चित्र बने हुए थे। जिनके विषय कृष्ण का होली रास, द्रोपदी स्वयंवर, राम रावण युद्ध, देवियाँ आदि चित्र थे। युद्ध के दृश्यों में मराठा-मेवाड़ शैली का प्रमाण दिखाई देता है। 19वीं सदी में अंग्रेजों के भारत आगमन से चित्रकला पर विदेशी प्रभाव का आक्षेप हुआ और मालवा शैली के विनाश का कारण बना।

नीमच में 18वीं शती में ढोलामारू की प्रेमकथा, श्रीनाथ जी, गणेश तथा 24 मिथुनाकृतियाँ चित्रित होती हैं। इसी प्रकार मन्दसौर में मराठा काल के लघुचित्रों का भण्डार है। यहाँ कन्हैयालाल पाटीदार के मकान में लघु चित्र और मालवी लोक शैली के मिश्रित चित्र दिखाई देते हैं। इनके विषय कृष्ण जन्म, माखन चोरी, कालियामर्दन, कृष्णलीला, समुद्र मन्थन था अंग्रेज अधिकारी भारतीय अधिकारी से सन्धि करते दिखाया है। इसी प्रकार श्री पोरवाल के पास ‘लौर चन्दा’ के 37 लघु चित्र तथा धनार सेठ के कक्षों में मराठा काल के रंगमाल के चित्र अंकित है।

उज्जैन में चित्रकला भित्ति चित्रों और लघु चित्रों के रूप में दिखाई देती है। यहाँ साहित्य और चित्रकला का अन्तर्सम्बन्ध देखने को मिलता है। मालवा की चित्रकला के विषय रसिक प्रिया, रामायण, महाभारत तथा नायिका भेद रहे हैं। उज्जैन में लघु चित्रों का सबसे महत्त्वपूर्ण संग्रह सिंधिया प्राच्य विद्या शोध प्रतिष्ठान में है। यहीं पर मालवा शैली में बने ‘भक्ति विजय ग्रन्थ’ के लघु चित्र मालवा-मराठा-मेवाड़ (मिश्रित) शैली में निर्मित है।

उज्जैन के परमार कालीन मन्दिर राम जनार्दन और विष्णु जनार्दन मन्दिर में भित्ति चित्र बने हैं। राम जनार्दन मन्दिर में बने चित्रों के विषय नाम संस्कार, रिद्धि-सिद्धि गणेश, क्रीड़ामग्न राम और उनके भाई वशिष्ठ तथा ऋषिगण, शिव पार्वती तथा वाद्य वृन्द का समूह चित्रित है। विष्णु जनार्दन मन्दिर में धूसर आकाश गहरे लाल रंग की पृष्ठभूमि पर अंकित चित्र में मालवा-मराठा शैली से भिन्नता दृष्टिगोचर होती है। यहाँ के प्रसिद्ध हरसिद्धि के मन्दिर के सभागृह के गुम्बद के नीचे 20वीं सदी के भित्ति चित्र बने हैं।

राजगढ़ में पनपी शैली मालवी शैली के अन्तर्गत होते हुए भी कोटा-बूँदी के संसर्ग से परिष्कृत होकर राजगढ़ शैली के रूप में सामने आई। राजगढ़ मालवा और बुन्देलखण्ड की सीमा पर स्थित है। राधोगढ़ शैली के चित्र बूँदी और कोटा से प्रभावित रहे हैं परन्तु पर्यावरण तथा स्त्री-पुरुष का अंकन उनकी निजी पहचान बन गए। चित्रों को पर्यावरणीय महत्व दिया गया। यहाँ पर सुदृढ़ देह वाली स्त्रियाँ तथा पुरुष, बलशाली योद्धा चित्रों में दिखाई देते हैं। इसी शैली के अन्य केन्द्र धार, देवास, नीमच तथा रतलाम के राजपरिवार में तथा धनिक वर्गों के यहाँ संग्रहित है।

निमाड़ क्षेत्र में ओंकारेश्वर और महेश्वर में भित्ति चित्र उपलब्ध हुए हैं। लेकिन अधिकाशंतः नष्ट हो गए हैं। महेश्वर के पण्डरीनाथ मन्दिर में 27 मराठा कालीन चित्र मिले हैं। इनमें कुछ राजपूत शैली तो कुछ बसौली शैली की प्रतिकृतियाँ लगती हैं। इनमें कमजोर रेखांकन है, पर रंग योजना आकर्षक है।

बुन्देलखण्ड की चित्रकला

मध्य प्रदेश में बुन्दलेखण्ड क्षेत्र में नाग और वाकाटकों का राज्य था। चन्देलों की संस्कृति का पतन होने पर तोमरों का ग्वालियर सांस्कृतिक केन्द्र के रूप में उभरा और ग्वालियर संस्कृति का पतन होने पर ओरछा नया संस्कृति केन्द्र के रूप में उभर कर आया। डॉ. दलजीत खरे ने Glory of Orchha places/painting में ओरछा से प्रारम्भ मानी है। ई.सं. 1505 के पश्चात ग्वालियर में ऐसी परिस्थितियाँ बनीं जिसमें ललित कलाओं की गतिविधियाँ समाप्त हो गई। ग्वालियर के कलाकारों ने ओरछा और दिल्ली की ओर पलायन किया। इस प्रकार चित्रकला बुन्देलखण्ड संस्कृति का आवश्यक अंग बनी। उत्सव और त्योहार के अवसर पर घर-दीवारों में चित्र बनाए जाते थे। बुन्देलखण्ड की चित्रकला मन्दिरों के भित्ति चित्रों, राज प्रासादों और धार्मिक ग्रन्थों के रूप में दिखाई दी। चन्देल राजा मदनवर्यन द्वारा निर्मित वैष्णव मन्दिर में अपभ्रंश शैली के चित्र मिलते हैं। यहाँ जैन तथा जैनेत्तर ग्रन्थों में इस शैली को अपनाया। एक चश्म चेहरे, पहरावे में अंगरखा, पजामा, ओढ़नी, चोली-लहंगा आदि में यह परिवर्तन दिखाई देता है। छतरपुर के जैन मन्दिरों में जैन कथाओं पर आधारित चित्र बने हैं। बुन्देलखण्ड की चित्रकला पर मालवी, राजस्थानी प्रभाव होना पता चलता है।

कृष्ण लीला, गोपियों के चित्रों में रंग संयोजन और संगति मालवा शैली की है। स्त्री आकृतियों में लम्बी गर्दन तथा पहरावा और अलंकरण से चिन्हित किया गया है। लक्ष्मी मन्दिर में बने रामायण तथा 1857 के बुद्धचित्र लोक शैली के बन लगते हैं। 18वीं शती में इन्द्रजीत (1733-62) ओरछा का शासक हुआ। इसके समय ‘रसिक-प्रिया’ और ‘कवि प्रिया’ आदि ग्रन्थों पर चित्र बने।

18वीं शती के अर्धशतक में राजा शत्रुजीत सिंह के समय मध्य प्रदेश में एक नई शैली विकसित हुई। इस समय राधा कृष्ण का प्रणय तथा ऋतुओं पर आधारित बाराहमासा के चित्र बने। इसे नव जागरण काल कहा गया।

बुन्देलखण्ड शैली के चित्र टीकमगढ़, ताल बेहट, टोडी, फतहपुर, पन्ना छतरपुर आदि स्थानों पर विकसित हुए।

दतिया में सतखण्ड महल तथा कंचनमनिया भित्ति चित्रों के श्रेष्ठ उदाहरण हैं। आर्चर महोदय अनुसार ओरछा में चित्रकला की कोई परम्परा नहीं थी, लेकिन दतिया के चित्रों की परम्परा ओरछा नरेशों के कारण ही विकसित हुई। सतखण्ड महल के मुख्य द्वार को गणेश घुड़सवार सैनिक के चित्रों से संवारा गया है। तीसरी मंजिल के गुम्बद पर गोल पट्टी में उभरे हुए (स्टुक पद्धति) में रासलीला का अंकन है। इनमें मुगलिया प्रभाव दिखाई देता है। चौथी मंजिल के मुख्य छज्जे में भित्ति चित्र हैं।

अतः बुन्देलखण्ड में मालवा, मराठा, मुगल और राजस्थानी शैली का प्रभाव दिखाई देता है।

ग्वालियर

मध्य प्रदेश में ग्वालियर क्षेत्र गोपांचल कहलाता है। मध्य प्रदेश की व्याख्या मानकुतुहल के फारसी के अनुवाद फकिरूल्ला ने ‘सुदेश’ कह कर दी। सुदेश से तात्पर्य ग्वालियर जो आगरा का केन्द्र रहा है। इस गोपांचल क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत काफी सम्पन्न थी। यहाँ पर चित्रकला का इतिहास पाँच चरणों में दिखाई देता हैः-

1. जैन कालीन चित्रकला
2. तौमर कालीन चित्रकला
3. मुगल कालीन चित्रकला
4. मराठा कालीन चित्रकला
5. आधुनिक चित्रकला

ग्वालियर में चित्रकला का विकास लघु चित्र, भित्ति चित्र, पोथी चित्रण के रूप में दिखाई देेता है। जैन चित्रकला की ऐतिहासिक उपलब्धि 7वीं शताब्दी से है, जिसके प्रमाण पल्लव राजा महेन्द्र वर्मन (7वीं शताब्दी) में बनी पाँच जैन मूर्तियाँ हैं। समग्र भारतीय शैली में 15 वीं शताब्दी से पूर्व के जितने भी चित्र प्राप्त हैं, उन सब में मुख्य और प्राचीन जैन चित्र ही हैं। आरम्भिक जैन शैली को ‘गुजराती-शैली’ या ‘अपभ्रंश शैली’ कहा गया।

जैन शैली के चित्र तीन रूपों में प्राप्त होते हैंः-

1. ताड़पत्र पर बने पोथी चित्र
2. कपड़े पर बने पट चित्र
3. कागज पर बने पोथी चित्र या फुटकर चित्र

ग्वालियर में जैन चित्रकला का अध्ययन करने पर ज्ञात हुआ है कि सन 1424 में डूंगरेन्द्र सिंह का शासन हुआ तो जैन धर्म के प्रचार-प्रसार की अनुमति दी और जैनाचार्यों को संरक्षण भी प्रदान किया। ग्वालियर में अपभ्रंश भाषा में अत्यधिक मात्रा में सृजन हुआ। महाकवि रायधु की कृतियाँ चित्रमय पाण्डुलिपियों के रूप मे प्राप्त हुई हैं। ये पाण्डुलिपियाँ हैं- ‘पासणाह चरिउ’ ‘शान्तिनाह चरिउ’ तथा ‘जसहर चरिउ’ इनमें प्राप्त चित्रों में रेखाएँ सहज, सजीव व प्राबल्य कुछ दुर्बल सा हो गया है।

तोमर कालीन चित्रकला

तोमर कालीन चित्रकला को मध्य युगीन या राजपूत शैली कहा जा सकता है। मध्य काल में ग्वालियर में तोमर राजाओं का वर्चस्व था। वीरसिंह देव तोमर के समय कवि नारायणदास द्वारा रचित ‘छिपाई चरित’ में चित्रकला के विषय पर काफी रूचिकर सामग्री उपलब्ध है। मान मन्दिर के भित्ति चित्रों के ‘छिपाई-चरित’ के उल्लेख हैं।

ग्वालियर में तोमरों के समय ‘संगीत दर्पण’ एवं ‘रागाध्याय की रचना’ की, जो राग रागिनियों के चित्रों का आधार बना। हरिहर निवास द्विवेदी ने मध्यकालीन कला के ‘दृश्य संगीत’ अध्याय में राग रागिनियों के चित्रों की स्थली माना है। रागमाला के चित्रों के जनक ग्वालियर केन्द्र के कलाकार रहे हैं। डूंगर सिंह तोमर और कीर्ति या करन सिंह के कार्यकाल में मूर्तिकला का निर्माण हुआ। मानसिंह तोमर के शासनकाल में साहित्य और चित्रकला का विकास हुआ।

राजपूत कालीन चित्रकला

ग्वालियर में राजपूत कला का प्रारम्भ 14वीं शती में राजस्थान में हुआ। यह विशुद्ध हिन्दू संस्कारों से सम्बद्ध है। यह उस समय की है, जब मुस्लिम भारत में नहीं आये थे। प्रसिद्ध लेखिका स्टेलाक्रेमरिश ने अपनी पुस्तक ‘आर्ट एण्ड आर्किटेक्चर ऑफ इण्डिया’ में इसे राजपूत शैली का प्रारम्भ निरूपित किया है। उन्होंने लिखा है कि ‘राजपूत कलम’ का प्रारम्भ शास्त्रीय शताब्दियों के द्वारा और उसके स्थान पर लोककला के अविर्भाव के कारण हुआ। मानसिंह के मान मन्दिर राजपूत कला के महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। इसमें सवाचश्म चेहरे के स्थान पर एक चश्म चेहरा बनाया जाने लगा। मान मन्दिर में प्रथम बार संगीत और नृत्य की जालियों में प्रथम बार राजपूत शैली का प्रयोग किया गया है। नृत्य की परम्परा केवल ग्वालियर में ही थी। तोमर कालीन चित्र ग्वालियर किले स्थित गुजरी महल में विद्यमान हैं।

मध्य भारत में कछवाहा, तोमर और बुन्देला राजपूतों ने कला का संरक्षण किया। मान सिंह तोमर (1486-1516ई.) के समय वास्तुकला, मूर्तिकला, चित्रकला, संगीत और नाट्यकला ने विशेष प्रगति की थी।

ग्वालियरी शैली

परम्परागत शैली से भिन्न शैली ग्वालियरी शैली कहलायी। 1517 में निर्मित महाभारत की एक सचित्र पाण्डुलिपि प्राप्त हुई है ग्वालियर दुर्ग स्थित मान मन्दिर की सज्जा में ग्वालियरी शैली का प्रयोग किया। बुर्ज की छत को आकर्षक फूल पत्तियों और मानवाकृतियों से चित्रित किया है। ये मानवाकृतियाँ वाद्य यंत्री लिये और नृत्य करते चित्रित किए गए हैं। रेखाओं के आरोह-अवरोह और लचीलापन विशिष्टताओं में निहित है। मान मन्दिर के एक वातायन में चामरधारी युग्म का चित्रण है। इस मन्दिर में निश्चय ही अन्य चित्र भी रहे होंगे, जो सम्भवतः कालग्रस्त हो गए। किले की प्राचीर और मान मन्दिर पर लगी कलात्मक टाइल्स दर्शाती हैं कि तोमर शासकों को कला के प्रति अभिरूचि थी।

मुगलकालीन चित्रकला

सन 1526 ई. में जलालुद्दीन मुहम्मद बाबर ने पानीपत के मैदान में सुल्तान इब्राहिम लोधी को पराजित कर मुगल साम्राज्य की नींव रखी। तैमूर वंश के समान अन्य कोई वंशज इतना सभ्य और सुसंस्कृत नहीं है, जिसने सभ्य और कलाप्रिय शासकों को जन्म दिया। यही ईरानी शैली मुगल कला के रूप में भारत आई। अकबर के शासन काल में अनेकों चित्रकार थे। इनमें केशव, महेश, मुकुन्द लाल, मिसकिन, फारूख बेग, माधो जगन्नाथ, ख्वाजा अब्दुस्मद, मीर सैयद अली शीराजी, तारा, सांवला, हरिवंश, खेमकरन तथा राम के नाम उल्लेखनीय हैं। इनमें से अनेक चित्रकार ग्वालियर का बताते थे। सांवला प्रथम ज्ञात चित्रकार कहलाता है।

मुगल काल में कला और साहित्य का विकास हुआ। इसी समय वास्तुकला और चित्रकला दोनों ही फली-फूली। अनेक कलाकार मुगल दरबार में भी रहे और स्वयं को ग्वालियर कहकर गौरवान्वित होते रहे।

मराठा कालीन चित्रकला

ग्वालियर में मराठों का इतिहास सन 1765 से प्राप्त होता है। शिन्दे वंश का प्रारम्भ इस वंश के महायोद्धा माहद जी शिन्दे ने ग्वालियर पर अपना अधिकार कर इस वंश की शुरुआत की। इस प्रकार शिन्दे शासन के संरक्षण में वास्तुकला मूर्तिकला एवं चित्रकला में परिवर्तन दिखाई दिया। जयाजी राव द्वारा निर्मित कोठी (कम्पू कोठी) के मेहराबदार हाल में सुन्दर भित्ति चित्र बने हैं। यहाँ लता बल्लरियों, पशु पक्षियों का चित्रांकन किया गया है। यहाँ पर महारानी विक्टोरिया, बादशाहों, बेगमों तथा हिन्दू महापुरुषों के चित्र भी चित्रित हैं। मोती महल राजप्रासाद के कुछ कक्षों में रंगीन शीशों की पच्चीकारी की गई। यहाँ भित्ति चित्रों में रागमाला-शृंखला के 42 चित्र बनाए गए हैं। यहाँ की स्थापत्य कला में इटालियन प्रभाव दिखाई देता है, जिसमें टस्कन, इटालियन पलाजियों, कैरियोथिन शैली अपनाई गई है। ग्वालियर स्थापत्य में शिन्दे शासकों की छत्रियाँ प्रमुख हैं। ये छत्रियाँ नागर शैली में हैं। दीवारों पर चटख रंगों में चित्र बने हैं। इस पर कमलाकृतियाँ तथा कृष्ण लीला के दृश्य बने हुए हैं।

शिन्दे शासकों के आश्रय में पनपी कला राजस्थानी एवं पश्चिम भारतीय शैली का समन्वय रूप दिखाई देता है। मोती महल के रागमाला चित्रों में नायक, नायिकाओं की भाव-भंगिमा, वेशभूषा अलंकरणों पर मराठा संस्कृति का प्रभाव है। इस समय के चित्रकारों ने चित्रों में नाम नहीं लिखे थे।

जयाजी राव शिन्दे के शासनकाल के चित्रकारों को ‘चितेरा’ कहा गया और महाराजा बाड़े के पास चितेरा ओली बसाई। ये चितेरे घरों, महलों की सज्जा का कार्य करते हैं। ये चित्रकार उन्हीं के वंशज हो सकते हैं, जिन्होंने मोती महल का सरस्वती महल के भवनों को सुन्दर चित्रों से अलंकृत किया। यह मराठा शैली में बने चित्र हैं।

बघेलखण्ड की चित्रकला

बघेलखण्ड क्षेत्र में सोन घाटी प्रागैतिहासिक संस्कृति की जनक रही है। सोन के कगार पर ‘रानी माची’ शैलाश्रय हैं, जिसमें गेरू से पशुओं के चित्र बने हैं। पशुओं का चित्रण चौकोर रेखाओं से आड़ी-तिरछी रेखाओं से भरा गया है। गौरा पहाड़, शैलाश्रय, बिछी-बघोरा, घघरिया, धवल गिरी, टीका, सिंहावल तथा चौरावल चित्रित शैलाश्रय हैं।

‘खनदों’ (रीवा-शहडोल मार्ग) एवं ‘गुड्डी’ (रीवा-सीधी मार्ग) पर शैलाश्रय कैमूर शीर्ष पर है। खनदों में आठ शैलाश्रय और गुड्डी में 12 चित्रित शैलाश्रय हैं। ये उत्तर पाषाण काल के हैं। गुढ़ के नाला के पास 9 चित्रित शैलाश्रय हैं।

प्रागैतिहासिक शैल चित्रों के बाद यहाँ चित्रकला के अवशेष प्राप्त नहीं होते।

सन 1552 में राजा रामचन्द्र एक कला प्रेमी शासक थे। संगीत और साहित्य में उनकी रूचि थी किन्तु चित्रकारी का अभाव था। केवल महाराजा विश्वनाथ सिंह के समय चित्रकार चतुर्भुज सिंह बावनी गंगा सिंह बावनी का उल्लेख मिलता है, जिन्होंने राजाज्ञा अनुसार ‘श्री मद भागवत’ के आधार पर 54 चित्रों की रचना की। आपने सोन महल में रामायण पर आधारित चित्र बनाए। राजा विश्वनाथ सिंह के अनेकों चित्र बनाए, जिनमें शिकार खेलते हुए और दशहरा दरबा तथा पोर्ट्रेट प्रमुख हैं। उनके राज्यारूढ़ होने पर ‘बिछर हटा’ तथा गंज युद्ध के चित्र बनाए गए हैं।

इन बावनी चित्रकारों के साथ ही बघेली शैली प्रारम्भ हुई। महाराजा रघुराज के समय के चित्रों का संग्रह रीवा किला स्थित राधौमहल में है। इनके समय में आए राजस्थान के चित्रकारों ने इस आंचलिक चित्र शैली को आगे बढ़ाया। बाद के चित्रों में पाश्चात्य शैली दिखाई देती है। अतः बघेल खण्ड की कला शैली में दृष्टि डालने से ज्ञात होता है कि मध्य प्रदेश में अन्य क्षेत्रों में जिस प्रकार चित्र कला का विकास हुआ उतना बुन्देलखण्ड क्षेत्र में चित्र कला का विकास नहीं हो पाया।

आधुनिक चित्रकला

आधुनिक चित्रकला में विदेशी प्रभाव पड़ने से आमूल-चूल परिवर्तन देखने को मिले। 19वीं सदी के मध्य पारम्परिक कलाओं को छोड़ विभिन्न प्रयोग किये गए। इस पर वैज्ञानिक प्रभाव भी दिखाई दिया। आधुनिक कलाकार धर्म और राजा-महाराजाओं के बन्धनों से मुक्त होकर स्वछन्द चित्रण करने लगा। अब वह किसी दृष्टान्त या विवरण ना देकर किसी एक विषय को लेकर चित्र बनाने लगा। इसी समय अमूर्तकला, ग्राफिक कला, रेखा चित्र, लिपि चित्रण, कोलाज, कम्प्यूटर कला, यांत्रिक कला का समावेश हुआ।

हीरा, सोना, चाँदी जैसे बहुमूल्य पदार्थों से लेकर कूड़े-कबाड़ तक को आज कला की सामग्री के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। आधुनिक कलाकारों में एल.एस. राजपूत, डी.पी. शर्मा, विश्वामित्र वासवाणी, हरि भटनागर, विजय मोहिते आदि उल्लेखनीय हैं। इस कला शैली पर कोलकाता, मुम्बई और दिल्ली के कला केन्द्रों का महत्त्वपूर्ण योगदान है।

मध्य प्रदेश की राजधानी झीलों की नगरी का कलात्मक एवं सांस्कृतिक इतिहास भी कम रोचक नहीं है। प्रागैतिहासिक काल के अश्मावशेष और शैलचित्रों का विराट संसारर मानवीय विकास की कहानी कहता है। भोजपुर, भीमबेटका, पंचमढ़ी, होशंगाबाद, रायसेन में प्राचीन चित्रावशेष विद्यमान हैं।

सोलह जनपद काल में भोपाल क्षेत्र अवन्ति उज्जयनी के अधीन तथा मौर्य काल में सम्राट अशोक की सल्तनत का हिस्सा था। साँची का स्तूप मौर्य कालीन स्थापत्य का प्रमुख उदाहरण है। इस क्षेत्र पर परमार कालीन सम्राट राजा भोज (1010-1055 ई.) ने भी शासन किया।

सर जान मेल्काम ने इस क्षेत्र के बारे में कहा है कि-

‘उपलब्ध जानकारी के अनुसार भोपाल नाम इसके राजपूत निर्माता विख्यात राजा भोज से लिया गया है एवं इसका निर्माण उसी समय हुआ जब राजा भोज ने तालों की नगरी में एक सुन्दर विशाल तालाब का निर्माण कराया और इसी के समीप भोजपुर की स्थापना की जो अब भग्नावशेष में है।’

सर जॉन इलियड के अनुसार-

“ऐसा कहा जाता है कि भोपाल की स्थापना राजा भोज ने की थी किन्तु भोपाल निर्माण के कुछ समय बाद यह किसी दैविक विपदा से ध्वस्त होकर मात्र ग्राम के स्वरूप में निःशेष रह गया, जो कि तालाब किनारे स्थित था।”

इस प्रकार भोपाल का आदि कालीन सम्पर्क तन्तु राजा भोज से जुड़ता है। भोपाल नाम राजा भोज के नाम पर आधारित प्रारम्भ में ‘भोजपाल’ कालान्तर में ‘भूपाल’ और वर्तमान में ‘भोपाल’ पड़ा। धार के शासक ‘राजा भोज’ द्वारा निर्मित बाँध के दोनों ओर ‘छोटी तथा बड़ी झील’ स्थित है, जिसे राजा भोज की कृति कहा गया।

शेरशाह के शासन काल में भोपाल के स्वतंत्र राज्य का उल्लेख मिलता है, राजा भोज के पश्चात भोपाल क्षेत्र अनेक छोटे-छोटे हिन्दू राजाओं एवं जागीरदारों के अधीन रहा, जिससे भोपाल का अस्तित्व मात्र एक ग्राम के रूप में ही सीमित रह गया।

भोपाल एक समय ‘गोंडवाना’ क्षेत्र में आता था, जिस पर राजा निजाम शाह का शासन था। उनकी मृत्यु पश्चात रानी कमलापति ने शासन की बागडोर सम्भाली।

गोंड वंश की अन्तिम रानी कमलापति ने परिस्थितिवश भोपाल क्षेत्र को अफगान से आए सरदार दोस्त मोहम्मद खान को वह हिस्सा दे दिया। अतः दोस्त मोहम्मद खान ही इस रियासत के संस्थापक के रूप में जाने जाते हैं।

इस सम्बन्ध में सर विलियम वारटर ने कहा है-

“अठारहवीं शताब्दी में एक अफगान अधिकारी द्वारा राजपूतों के दक्षिणी मालवा राज्य से कुछ भाग छीनकर एक मुस्लिम राज्य भोपाल की स्थापना की गई।”

सन 1708 से 1949 तक का समय ‘रियासत-काल’ कहलाता है। लगभग 200 वर्षों में 9 पुरुष नवाब और चार महिला नवाबों का शासन रहा, जिसमें नवाब कुदसिया बेगम (गौहर बेगम), सिकन्दर जहाँ, शाहजहाँ और सुल्तान जहाँ बेगम प्रमुख हैं। नवाब दोस्त मोहम्मद खान और अन्य नवाबों ने अपने अधिकार क्षेत्र को बढ़ाने या स्थापत्य कला के निर्माण में अपना समय लगाया। भोपाल की स्थापत्य कला पर मुगलकालीन प्रभाव देखने को मिलता है। शाहजहाँनाबाद में निर्मित ताजमहल और तालाब किनारे निर्मित गौहर महल मुगलकालीन स्थापत्य का नायाब उदाहरण हैं। इसमें विभिन्न कक्षों में अलंकरणों से भरपूर चित्र बने हुए हैं। अलंकरणों की उपस्थिति मुस्लिम संस्कृति की अवधारणा दर्शाती है। इसके अनुसार चित्र में मानवाकृतियों का सृजन नहीं करना चाहिए, लेकिन कालान्तर में यह अवधारणा भी मिथ्या साबित हुई। तमकीन मोहम्मद खान (नवाब काल के उत्तराधिकारी) इलियास हारुन, मोहम्मद अय्यूब और जफर ऐसे चित्रकार रहे हैं। जिन्होंने पोर्ट्रेट, संयोजन और मानवाकृतियों का सृजन किया। तमकीन मोहम्मद, अब्दुल हलीम अंसारी, सगीरजमा तथा मोहम्मद अय्यूब ने दृश्य चित्र बनाए। ऐतिहासिक स्थलों को चिरस्थायी कर दिया। बहुत से स्थल आज विलुप्त हो गए हैं, लेकिन इन चित्रों के माध्यम से तत्कालीन मनोरम स्थलों को देखा जा सकता है। मोहम्मद अय्यूब के चित्रों में ईरानी या अफगानी प्रभाव दिखाई देता है। नवाब काल में मुस्लिम और पठानी संस्कृति वर्चस्व पर थी।

नवाबी शासन काल में भोपाल रियासत में सांस्कृतिक विरासत को विकसित करने में चित्रकला एवं वास्तुकला का अग्रणी स्थान था। इसके अलावा यहाँ के संगीतज्ञों साहित्यकारों ने भी अपनी ख्याति समाज में बनाई रखी थी।

सुल्तान जहाँ (सन 1844-1868) के शासन काल को नवाबी दौर का ‘स्वर्ण युग’ कहा जाए तो मिथ्या न होगा। इसे दौरे सुल्तानी के नाम से जाना जाता है। इस समय शिक्षा में जागृति आई। अनेक उर्दू ग्रन्थों की रचना हुई। इसी समय हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीतज्ञ मेवाती घराने के विख्यात गायक ‘उस्ताद मसीत खान’ तथा ‘उस्ताद घसीट खान’ का नाम सम्मान से लिया जाता है। नवाबी काल में अनेक किताबों की रचना हुई जिनमें 1313 में उर्दू में ‘तारीखे अलहक भोपाल’ मुंशी मेंहदी अली सहसवानी ने लिखी। इसके अलावा अनेक पुस्तकों की रचना की गई जो गोंडी दरबारी व्यक्तियों के जीवन इतिहास वृतान्त पर आधारित थी।

भोपाल में हमीदिया रोड के दूसरी तरफ ‘बर्रू’ के पेड़ बहुत बड़े क्षेत्र में लगे हुए थे। इस क्षेत्र के पास रहने वाले लोगों को ‘बरूकट भोपाली’ कहा जाता था। इसका उपयोग वे कलात्मक वस्तुएँ बनाने में और लिखने के उपकरण बनाने में करते थे। जिसकी अक्षरकला को अलंकारिक बनाने में सहयोग प्राप्त हुआ। उर्दू में इस अक्षरकला को ‘नास्तलिक’ कहा गया। इस नास्तलिक कला में निम्नलिखित महानुभावों का उल्लेख मिलता है-

1. मो. इरफान- इन्होंने कवि गालिब का चित्र (Portrait) उनकी पंक्तियों को लिखकर बनाया।
2. समसुद्दीन- ये गनमेकर थे और लाहौरी तथा लखनवी शैली में लिखते थे।
3. सिराजुद्दीन- Oriental- Art में लिखने में माहिर।
4. मुमताज पेंटर- काँच (शीशा)पर लिखने में माहिर।
5. मो. अय्युब- इन्होंने केलीग्राफ को अपनी जीविका का साधन बनाया। इन्होंने दृश्य चित्र, पोट्रेट सभी कुछ बनाया।

दृश्य चित्रकारी में मो., तमकीन मोहम्मद खान, मो. अय्यूब, अब्दुल हलीम अंसारी, जफर, इलियास हारून, सगीरजमा के नाम उल्लेखनीय हैं।

1. तमकीन मोहम्मद खान (1890-1935 ई.)

तमकीन मोहम्मद खान एक सम्भ्रान्त परिवार के सहृदय, दयालु, अन्तर्मुखी प्रवृत्ति के व्यक्ति थे जिन्हें कला से बहुत प्रेम था। इनका जन्म सन 1890 ई. में नवाब खानदान में हुआ था। इनके पिता नवाब यासीन मोहम्मद खान भोपाल रियासत के वारिस थे। किन्तु रियासती षडयंत्र के रहते नवाब शाहजहाँ बेगम ने इनकी सम्पूर्ण जायदाद और जागीर को अपने आधिपत्य में ले लिया। कुदसिया बेगम इनकी संरक्षक थी। शिक्षा हेतु इन्होंने तमकीन मोहम्मद खान को इन्दौर के डेली कॉलेज भेजा।

इन्हें बचपन से ही चित्रकारी का शौक था। इनके पारिवारिक जीवन का उल्लेख यार मोहम्मद खान द्वारा लिखित ‘तजकिखे फरह बख्श’ तथा ‘चार्ल्स इलियट की पुस्तक’ में मिलता है। इन्हें जागीरदारी शौक जैसे सैर-सपाटा, शिकार मनोरंजन आदि में दिलचस्पी नहीं थी। वे अधिकतर घर में रहकर पेंटिंग बनाना पसन्द करते थे।

इनकी रूचि हर प्रकार के स्केच करने में अधिक थी। वे दृश्य चित्र पोर्ट्रेट तथा मिनिएचर पेंटिंग बनाने में निपुण थे। नगर की बारादरी में नवाबी खानदान के पोर्ट्रेट इनके द्वारा बनाए गए हैं। तमकीन मोहम्मद खान के चित्रों की विशेषता रेखाओं का आकर्षण और यथार्थवादिता था। कभी-कभी इनके चित्रों में फोटोग्राफी होने का आभास होता है, जिसमें दूरी जल की पारदर्शिता, उड़ते बादलों की सघनता या हल्कापन दिखाई देता है। इन्होंने तालाब के बहुत से चित्र बनाए हैं। चारकोल से स्केच भी बनाया करते थे। इन्होंने अपना स्टूडियो यासीन महल में बनाया था। नवाबी-काल की विपरीत परिस्थितियों में भी इन्होंने अपने कलात्मक शौक को बनाए रखा। इनकी कला स्वप्रेरित थी। इन्होंने अपने चित्रों पर नाम नहीं लिखे। अतः अनेक चित्र गुमनामी के अंधेरे में आंकलित नहीं किये जा सके। सन 1935 ई. में इनकी मृत्यु हो गई और इनके कलात्मक इतिहास का अन्त हो गया।

2. अब्दुल हलीम अन्सारी

अब्दुल हलीम अन्सारी एक ख्याति प्राप्त कलाकार थे। इनका जन्म ई. सन 1897 (अरबी सफर माह के 1315 हिजरी) में हुआ था। इनके पिता श्री अब्दुल रहीम अन्सारी थे जो ‘पप्पू मियाँ’ के नाम से मशहूर थे। नवाब सुल्तान जहाँ बेगम से अच्छे पारिवारिक सम्बन्ध थे। अब्दुल हलीम अन्सारी अपने पिता के साथ सुल्तान जहाँ बेगम के दरबारी माहौल में अक्सर जाया करते थे। चित्रकारी का शौक इन्हें बचपन से रहा। इन्होंने चित्रकारी की प्रारम्भिक शिक्षा अपने पिता अब्दुल रहीम अन्सारी से सीखी। अब्दुल रहीम अन्सारी बेगम शाहजहाँ के शासन काल में ‘मद्दारूल-मुहाम्मा’ के पद पर आसीन थे। इनका परिवार दरबारी संस्कृति से जुड़ा होने के कारण इनमें वही अदब, शालीनता एवं एकाकी प्रवृत्ति दृष्टिगोचर होती है। अब्दुल हलीम अन्सारी शाहजहाँ बेगम एवं सुल्तान जहाँ बेगम के विशेष कृपा के पात्र थे। विरासत में मिली चित्रकारी का शौक सदैव बरकरार रखा। इन्होंने यहाँ के अलेक्जेण्ड्रा स्कूल में शिक्षा पाई। सुल्तान जहाँ बेगम ने इनकी निगरानी के लिये नवाब हमीदुल्लाह खाँ को कह रखा था।

इसके पश्चात इन्हें जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स मुम्बई पढ़ाने के लिये भेजा। इनकी चित्रकारी से वहाँ के प्रिसिपल श्री सोलोमन बहुत प्रसन्न थे। इसके अलावा इन्होंने पत्रकारिता का काम भी किया। पत्रिकाओं में चित्रकारी के लेख तथा मुख्य आवरण पृष्ठ डिजाइन किए।

इन्हें सुन्दर कलात्मक चीजें एकत्र करने का शौक रहा, जैसे सीप, बटन, पत्र बाँधने के रिबन आदि। इन्हें फोटोग्राफी, फर्नीचर के डिजाइन, गहनों के डिजाइन, बटुए के मोनोग्राम व घर के कपड़ो की रंगाई का शौक था। गहनों के डिजाइन वे खुद तैयार करते थे और सुनार सोने अथवा चाँदी के गहने बनाते थे। इन्हें भ्रमण का भी शौक था। वे जगह पर जाकर ही दृश्य चित्र बनाते थे। बनाने के पहले उस स्थान का बारीकी से निरीक्षण करते थे कि कोई वास्तुकला अथवा जगह उस जगह से कितनी दूर है तो उसका रंग कैसा होगा? तब वे दृश्य चित्र बनाते थे। इन्होंने भोपाल के अधिकाशंतः ऐतिहासिक इमारतों के दृश्य चित्र बनाए। उनके प्रमुख चित्रों में याट क्लब (वोट क्लब), फतेहगढ़ का किला, पीरगेट, साँची स्तूप, पूर्वी द्वार, कुदसिया महल, रायसेन का दुर्ग, बड़े तालाब का घाट, पुलपुख्ता पर पानी का झरना और रानी कमलापति का महल आदि है। आपने ‘खान-ए-काबा’ में असली सोने के पानी की कुरान की आयतें लिखीं।

इनके चित्र त्रिआयामी होते थे और रंगों की प्रफुल्लता और यथार्थ चयन देखने को मिलता है। आपने चित्रों को अधिकांशतः वाश तकनीक में बनाया है।

अब्दुल हलीम अन्सारी रियासत कालीन श्रेष्ठ कलाकार थे। कॉलिना राफैल ने आपके बारे में लिखा है- “Modest Courteous and kind, l made aquintaince of Mr. Abdul Halim Ansari. Painter of Bhopal and discovered in him, an artist who strives to conquer a piece of that paradise which is granted on earth, only to those, who love art.”

3. मोहम्मद अय्यूब

मोहम्मद अय्यूब का जन्म एक मध्यवर्गीय परिवार में 8 जुलाई, 1931 ई. में भोपाल में हुआ था। इनके पिता का नाम मोहम्मद शरीफ खान था जो गूजरपुर के रहने वाले थे।

मोहम्मद अय्यूब ने मैट्रिक की शिक्षा अलेक्जेंड्रिया स्कूल से पास की। इन्हें चित्रकारी का बहुत शौक था। 1949 में वे हमीदिया ब्वायज हायर सेकेण्ड्री स्कूल, भोपाल में ड्राइंग टीचर के रूप में नियुक्त हुए। सन 1965 ई. म.प्र. बोर्ड ऑफ एजुकेशन, भोपाल में आर्टिस्ट के पद पर नियुक्त हुए। सर्विस में रहते हुए इन्होंने स्नातक परीक्षा पास की।

इन्होंने इलस्ट्रेशन, कैलेण्डर, मानचित्र व पुस्तकों के मुख्य पृष्ठ बनाए प्रिटिंग का कार्य भी सीखा।

इन्होंने कला जगत में अन्तरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की। इन्होंने सभी माध्यमों में कार्य किया। इनको जल- माध्यम में कार्य करना पसन्द था। इन्होंने जन सामान्य के जीवन को चित्रों में चित्रित किया। व्यक्ति संयोजन और दृश्य संयोजन का साथ-साथ प्रयोग देखने को मिलता है। अय्यूब साहब की अपनी मौलिक शैली है। आपने वाश-पद्धति में लघु चित्र बनाए हैं। केलीग्राफी को जीविका का साधन बनाया। आकारों की स्पष्टता रंगों का आकर्षक प्रयोग मानवीय जीवन के विभिन्न पहलुओं को उजागर करता है। इन्होंने यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाया और स्वभाविकता की ओर विशेष ध्यान दिया। ‘रहस्य’, ‘बाजार का दृश्य’, ‘काफिला’, काफिले पर दृष्टि, वार्तालाप, विश्राम, पक्षी के साथ घुड़सवार, सींचन और बुनकर प्रमुख संयोजन चित्रों में से है। आप प्रभावशाली चित्रकारों में से एक हैं।

4. सगीर जमा

भोपाल रियासत में धर्म और संस्कृति की कट्टरता के रहते एक महिला चित्रकार सगीर जमा का नाम प्रमुखता से उभर कर आता है। वे नवाब मोहम्मदगढ़ की पुत्री थी। इनका विवाह भोपाल के तहसीन मोहम्मद खान के बेटे मतीन मोहम्मद खान से हुआ था। इस घराने में साहित्य और कला का बहुत सम्मान किया जाता था। किन्तु पुरानी परम्पराएँ भी विद्यमान थीं। अतः पारम्परिक घराने में चित्रकला जैसी प्रतिभा का प्रदर्शन किया जाना असम्भव कार्य था। पर्दा प्रथा और विपरीत विचारों के रहते हुए भी सगीरजमा ने चित्रकारी सीखी और रियासतकालीन महिला चित्रकार और लेखिका के रूप में अपना स्थान बनाया। उन्होंने उपन्यासों की भी रचना की।

बेगम सगीर जमा ने प्रमुख रूप से दृश्य चित्र बनाए हैं। इन्हें जल रंगों में कार्य करना पसन्द था। दृश्य चित्र के अलावा पोर्ट्रेट की भी रचना की। इन्होंने स्याह तथा धूसर रंगों का प्रयोग किया है। इनके चित्रों को देखने से ज्ञात होता है कि वे घुटन भरे माहौल से त्रस्त थीं। यही कारण है कि चित्रों में प्रफुल्लित करने वाले रंगों को स्थान न मिल सका।

इन्हें चीनी के बर्तनों पर भी चित्रकारी करने का शौक था। साथ ही कशीदाकारी और अलंकरण के मनमोहक रूपों की रचना की।

उन्होंने कला को अपने जीवन में स्वान्तः सुखाय के रूप में लिया क्योंकि उन्हें पारिवारिक सहयोग प्राप्त नहीं हुआ।

5. मोहम्मद इरफान

मोहम्मद इरफान फ्रांस से आकर भोपाल में बसने वाले सम्भ्रान्त परिवारों में से थे। आपका जन्म फ्रांस में 14 फरवरी, 1908 में हुआ था। आपका परिवार साहित्य और कला प्रेमी था। स्कूली शिक्षा भोपाल में हुई। सन 1923 में चित्रकला की शिक्षा होशंगाबाद से उत्तीर्ण की। 1937 में मैट्रिक अलीगढ़ से किया। मार्च 1932 में न्यूयार्क इंस्टीट्यूट ऑफ फोटोग्राफी (अमरीका) से डिप्लोमा प्राप्त किया।1933 में साप्ताहिक पत्र ‘सुबहे-वतन’ में कार्टूनिस्ट के रूप में कार्य किया। स्वतंत्रता संग्राम विषय पर कार्टून बनाने और लेख छपने के कारण जेल भी जाना पड़ा। फिर भी आपका साहित्य और व्यंग्यात्मक रुझान बढ़ता ही गया। आपके द्वारा सामाजिक, राजनैतिक बुराइयों से सम्बन्धित चित्रों की रचना की जाती रही। साहित्य में अत्यधिक रूचि होने के कारण गालिब का ऐसा पोर्ट्रेट बनाया जो गालिब की शायरी लिख कर तैयार किया था। यह चित्र 1969 में ‘गालिब शताब्दी’ के समय बहुत प्रसिद्ध हुआ। आपने कई साप्ताहिक पत्र निकाले, जिसके सम्पादक, सज्जाकार और कार्टूनिस्ट आप स्वयं होते थे।

प्रमुख चित्र- गालिब की शायरी से तैयार व्यक्ति चित्र, बेरोजगारी, एशिया की राजनीति, दिल्ली की चोटी, मिश्र व स्वेज तथा चाह हुसैन आदि।

साहित्य और चित्रकला की सेवा करते हुए बहुमुखी प्रतिभा के धनी मोहम्मद इरफान का देहान्त 18 मार्च, 1972 को हो गया।

6. इलियास हारून

इनका जन्म 31 मार्च, 1932 को भोपाल में हुआ। अरब वंश से ताल्लुक रखने वाले नामाचीन खानदानी परिवार से थे। आपकी शिक्षा अलेक्जेंड्रिना स्कूल तथा सेफिया कॉलेज से हुई। जे.जे.स्कूल ऑफ आर्ट्स मुम्बई से कला में डिप्लोमा किया। आपने 1953 में साँची में एक प्रदर्शनी लगाई, जिसका उद्घाटन पं. जवाहरलाल नेहरू ने किया। इनके चित्रों में कल्पनाशीलता से अधिक यथार्थवादी प्रवृत्ति दिखाई देती है और कुछ मनोवैज्ञानिक सृजनशीलता के दर्शन भी होते हैं, जो अमूर्त चित्रण से साम्यता रखते हैं।

प्रमुख चित्र- Aims of life, Sorrow of love, Khajuraho, Don’t touch me, Lightly to last, in the Bible anl Self Portrait.

7. मोहम्मद जफर

मोहम्मद जफर नवाबी दौर के अन्तिम पड़ाव के प्रसिद्ध चित्रकार रहे हैं। आपका जन्म 20.10.1921 को भोपाल में हुआ। मास्टर अहतेशाम से चित्रकला और मुश्ताक साहब से अक्षरकला सीखी। आपने अक्षरों में जानवरों और मानवीय आकारों का समावेश किया। अक्षरों की लिखावट संगमरमर पर भी लिखी। आपने अनेकों पुस्तकों के मुखपृष्ठ बनाए। पेन्सिल स्केच से जलरंग, तेलरंग तक का पूरा सफर उन्होंने सूझ-बूझ और लगन के साथ तय किया। आपने होर्डिंग में स्प्रे पेंटिंग भी की। आपने व्यावसायिक कला को मजबूरी में अपनाया। मुम्बई में ‘रहबरे वतन’ पत्र का अलंकरण और इलस्ट्रेशन कार्य किया। बी.आर.चोपड़ा के आर्ट डिपार्टमेंट में बतौर आर्टिस्ट कार्य किया। ‘अफसाना’ और ‘नया दौर’ फिल्म में भी कार्य किया। भोपाल रियासत के इन नामचीन कलाकारों के अलावा अनेकों ऐसे कलाकार रहे हैं जिनकी पहचान न हो सकी। ऐसे ही अनेक गुमनाम चित्रकार मानो कह रहे हों-

हमें भी खोज निकालो, सनावरों एक दिन।
के पानियों में घिरा, हम भी एक जजीरा हैं।।

इस प्रकार भोपाल के रियासत कालीन संस्कृति में चित्रकारों की कमी अवश्य रही पर पूर्ण रिक्तता नहीं। भोपाल धरा ने राष्ट्रीय अन्तरराष्ट्रीय कलाकारों को विकसित किया। भोपाल शहर ने देश और विदेश के कलाकारों को पनाह दी।

भारत में अग्रेजों के आने से कला शैली भी प्रभावित हुई। चित्र के विषयों और पद्धति में भी अन्तर दिखाई देने लगा।

स्वाधीनता के पश्चात मध्य प्रदेश का कला परिदृश्य

स्वतंत्रता के पश्चात कला के क्षेत्र में नवीन प्रयोग होेने लगे। मध्य प्रदेश के कलाकार पाश्चात्य जगत में हो रहे नए आन्दोलनों को आत्मसात करने के साथ-साथ अपनी ही ऐश्वर्य मण्डित व परम्परा के भीतर प्रेरणा के ओजस्वी स्रोतों को रूपायित करने में प्रयत्नशील हैं। कला जगत में आधुनिक अमूर्त रूप भारत के असीम दर्शन और अध्यात्म से अभिसिंचित होकर नए प्रतिमानों और नई धाराओं की सृष्टि में परिभाषित है। यह ऊँचे ध्येय, निष्ठा एवं आत्म विश्वास का द्योतक है।

प्रारम्भ में चित्रकारों ने अपने देश की संस्कृति, मर्यादा व आस्थाओं को ध्यान में रखकर रचनाएँ की। अनेक धार्मिक व भक्ति भावना से परिपूर्ण चित्र सृजन किया। चित्रकारों ने विषय प्रधान चित्र भी निर्मित किये। जो फोटोग्राफी पद्धति पर आधारित यथार्थवादी शैली पर आधारित थे।

आधुनिक युग में जब राजाओं के संरक्षण का ह्रास हुआ। उस समय चित्रकला की प्राचीन उद्देश्य भूलकर नवीन पद्धति अपनाने लगे। इसी समय आधुनिक कलाकारों ने पुरुत्थान काल में भारतीय पारम्परिक शैली में बने गुफा चित्रों की प्रतिलिपि तैयार करवाई। इस कार्य में सचिदा नागदेव आदि ने बाघ-अजन्ता के चित्रों की प्रतिलिपि तैयार करने में सहयोग प्रदान किया। पुरातत्वविद उज्जैन के श्री वाकणकर ने प्रागैतिहासिक गुफाओं की खोज की और इस अद्भुत संसार को कलाप्रेमियों के समक्ष लाए। इस प्रकार छुपी हुई कला को विस्तार मिल सका।

इस समय ही कला को प्रोत्साहन देने के लिये विभिन्न कला केन्द्र स्थापित हुए। जहाँ कला के विभिन्न आयामों को समझाया गया। साथ ही असीमित नवीन साधनों का प्रयोग हुआ। मध्य प्रदेश में भी कला गुरुओं द्वारा कला शिक्षा संस्थाओं में शिक्षा दी जाने लगी। यही नहीं कला प्रदर्शनी तथा कला साहित्य संगोष्ठियाँ आयोजित की जाने लगी। कलाकारों द्वारा देश-विदेश का भ्रमण कर कला की व्यापकता की पहचान वर्तमान में कलाकारों ने कड़ी मेहनत कर अपनी राह स्वयं बनाई और निजी शैली में स्वतंत्रतापूर्वक कार्य किया। भारत के कलागुरुओं तथा कला केन्द्रों ने मध्य प्रदेश की कला को विश्व के नक्शे में अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर स्थान दिलाया। अंग्रेजों ने भारत में मुम्बई, कोलकाता, मद्रास का प्रयोग समुद्र मार्ग के उपयोग हेतु किया था। भारत में अंग्रेजों का पदार्पण सन 1757 ई. को हुआ। पुर्तगाली, फांसीसी और अंग्रेज व्यापार के उद्देश्य से आए। सर्वप्रथम पुर्तगाल से वास्कोडिगामा, जहाँगीर काल में इंग्लैण्ड से सर टॉमस रो भारत आए। लॉर्ड क्लाइव ने भारत में कूटनीति से अंग्रेज शासन की स्थापना की। औरंगजेब के पश्चात जब देश में आन्तरिक अराजकता फैली तो विदेशियों के मन में भारत पर आधिपत्य जमाने की इच्छा बलवती हुई। प्लासी के युद्ध और बक्सर के युद्ध में अंग्रेजों की जीत होने से भारत में पैर जमा लिये। 16वीं सदी में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना हुई। धीरे-धीरे प्रमुख बन्दरगाहों पर अपना आधिपत्य जमाना शुरू कर दिया।

औरंगजेब के पश्चात मुगल कला का हृास हो गया। कलाकारों को राजसी संरक्षण नहीं मिलने से उन्होंने मुर्शिदाबाद, हैदराबाद, लखनऊ, पटना और बनारस की ओर पलायन किया। 19वीं सदी में अनेकों अंग्रेज चित्रकार भारत आए। यहाँ पर राजाओं, नवाबों और सम्पन्न वर्ग के लोगों के चित्र बनाए। भारतीय चित्रकारों ने यूरोपियन शैली के चित्रों की विशेषताओं को आत्मसात किया। भारतीय और पश्चिमी शैली के सम्मिश्रण से ‘कम्पनी शैली’ का जन्म हुआ। इसे पटना शैली भी कहा गया। इन चित्रकारों ने दैनिक जन जीवन और पक्षियों के सुन्दर चित्र बनाए। कम्पनी शैली के चित्र खुदाबक्श ओरियंटल लाइब्रेरी और पटना संग्रहालय में संग्रहित हैं।

कम्पनी शैली के अलावा कोलकाता में लोक कला से प्रभावित मुगल शैली के चटख रंगों के मिश्रण से कालीघाट पेंटिंग बनाई गई। इसमें धार्मिक तथा समसायिक विषयों का चित्रण हुआ। मध्य प्रदेश के कलाकारों को मुम्बई कला विद्यालय ने अपनी ओर आकर्षित किया। कला की विशिष्ट शिक्षा के लिये कलाकारों ने मुम्बई कला महाविद्यालय को प्राथमिकता दी।

मुम्बई कला विद्यालय को स्थापित किये जाने में एक विशेष कारण यह रहा कि देशी राजा महाराजाओं ने पश्चिमी शैली के चित्रों को बहुत महत्व दिया। यूरोप के चित्रकार यहाँ आते दर्शनीय और प्राकृतिक स्थलों के चित्र बनाते।

मुम्बई कला विद्यालय खोलने में टाटा की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। उनके आग्रह पर ब्रिटिश दृश्य चित्रकार ने कहा आर्ट स्कूल खोलिये तब मैं यहाँ चित्रकला की विद्या सिखाऊँगा। श्री जमशेद जीजा भाई टाटा लौटे और भारत आने पर उन्होंने मुम्बई सरकार को एक लाख रुपए का योगदान दिया और इस प्रकार 2 मार्च, 1857 को सर जे.जे.स्कूल ऑफ आर्ट की स्थापना हुई जो एशिया का सबसे विख्यात आर्ट स्कूल बना। यहाँ के एलफिस्टन इंस्टीट्यूट में कला की कक्षाएँ लगाई गई जिसमें डिजाइन व उत्कीर्णन पढ़ाया जाता था। 1866 में पाठ्यक्रम में आलंकारिक चित्रण, मॉडलिंग तथा लोहे के जालीदार काम को शामिल किया। सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट के प्रथम प्राचार्य लावुड किपलिंग थे। कला स्कूल के आरम्भिक समय में कला की शिक्षा देेने के लिये इंग्लैण्ड से कला शिक्षक बुलाए जाते थे। सन 1919 में प्राचार्य ग्लेडस्टोन सोलोमन के समय विद्यार्थियों को उचित अनुपात में रेखांकन, रंगों के विभिन्न बलों आदि पर बल दिया गया। 1936 में आचार्य चार्ल्स जेरार्ड ने यूरोप में प्रचलित कला के विद्यार्थियों को आधुनिक यूरोपीय शैली से अवगत कराया। प्राचार्य ग्रिफील्स महोदय जब इस स्कूल में आए तो उन्होंने विद्यार्थियों के लिये अजन्ता के चित्रों की प्रतिलिपि तैयार करवाई।

मुम्बई स्कूल पढ़ने वाले विद्यार्थियों में मध्य प्रदेश से श्री देवलालीकर प्रथम विद्यार्थी थे। मध्य प्रदेश में समकालीन कला आन्दोलन का सूत्रपात इन्दौर से सन 1927 में हुआ। यहाँ स्व. देवलालीकर ने तत्कालीन होल्कर महाराज से आग्रह कर इन्दौर स्कूल की स्थापना की। जे.जे. स्कूल से अनुप्राणित यथार्थवादी दृष्टिकोण पर कलाकार तैयार किये गए। वहीं ब्रिटिश शैली से प्रभावित पाश्चात्य कला शैली में कार्य करने वाले चित्रकार बने। जिनमें नारायण श्रीधर बेन्द्रे, स्व. मकबूल फिदा हुसैन, स्व. एल.एस. राजपूत, स्व.डी.जे.जोशी, चन्द्रेश सक्सेना जैसे कलाकार बने। जिन्होंने चित्रकला के अपने मुहावरे रचे।

मध्य प्रदेश के कलाकारों को प्रभावित करने वाला दूसरा कला संस्थान शान्ति निकेतन (पश्चिम बंगाल कोलकाता) था। यहाँ की कला शैली चीन की वाश तकनीक से प्रभावित रही है। श्री अमृतलाल वेगड़, स्व. राममनोहर सिन्हा और स्व. चन्द्रेश सक्सेना इसी कला संस्था से प्रशिक्षित हुए और पर्यावरण के प्रति जागरूक भूमिका निभाई।

कोलकाता कला विद्यालय की स्थापना सन 1854 में हुई। सन 1885 में भित्ति चित्रण का प्रारम्भ हुआ। ई.वी. हैवल जब मद्रास कला महाविद्यालय से स्थानान्तरित होकर कोलकाता आए तो उन्हें यहाँ का पाठ्यक्रम अच्छा नहीं लगा। उन्होंने दक्षिण भारतीय परम्परागत शिल्प का गहराई से अध्ययन किया था। उनका कहना था कि-

“यहाँ आकार कल्पना (Designing) पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया जाता, जो समस्त कला की नींव है। बल्कि यहाँ इंग्लैण्ड के प्रादेशिक विद्यालयों की चालीस वर्ष पुरानी निकृष्ट परम्परा अपनाई जा रही है और पूर्वी कला की उपेक्षा करके भारतीय कला विद्यार्थियों को दिग्भ्रमित किया जा रहा है।”

कोलकाता में ई.वी. हैवल अवनीन्द्र नाथ के सम्पर्क में आए। अवनीन्द्र नाथ टैगोर ने उप प्रधानाचार्य के पद पर रहते हुए चीन तथा जापान की कला को भी शामिल किया। आपके प्रमुख शिष्यों में प्रमुख थे- नंदलाल बसु, सुरेन्द्र, गांगुली, आसित कुमार हल्दार, क्षितिन्द्र नाथ मजूमदार, के.वेकेरप्पा, शारदाचरण उकील तथा समरेन्द्र नाथ आदि। वहाँ की कला से प्रभावित मध्य प्रदेश भोपाल के श्री सुशील पाल ने नंदलाल बोस के सानिध्य में कला का प्रशिक्षण प्राप्त किया।

पुनरुत्थान काल में श्री सचिता नागदेव ने अजन्ता, एलोरा तथा बाघ गुफा की प्रतिकृतियाँ बनाई। इसके अलावा मध्य प्रदेश के कलाकारों को प्रभावित करने में मेयो स्कूल लाहौर, जयपुर, स्कूल ऑफ आर्ट तथा लखनऊ कला विद्यालय भी रहे।

मध्य प्रदेश के कलात्मक पर्यावरण को विकसित करने में ललित कला संस्थानों का विशेष स्थान रहा है। इन संस्थानों के चित्रकार प्रशिक्षण प्राप्त कर राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर चुके हैं। निम्नलिखित कला संस्थानों में कला की शिक्षा प्रदान की गई।

1. ललित कला संस्था एवं देवलालीकर कला वीथिका, इन्दौर
2. ललित कला संस्थान, ग्वालियर
3. लक्ष्मी कला भवन, धार
4. ललित कला संस्थान, जबलपुर एवं कला निकेतन
5. भारती कला भवन, उज्जैन

ललित कला संस्थान, इन्दौर

ललित कला संस्थान, इन्दौर को स्थापित करने का श्रेय स्व. श्री दत्तात्रेय दामोदर देवलालीकर को है। यह संस्था शासिका देवी अहिल्याबाई की नगरी में राजवाड़ा के कृष्णपुरा पुल के पास शहर के मुख्य मार्ग महात्मा गाँधी रोड, इन्दौर में प्रारम्भ की गई। इसका सूत्रपात 1927 में हुआ। यह तत्कालीन होल्कर महाराज के सहयोग से हो सका। इस संस्थान को प्रारम्भ करने के पीछे ऐतिहासिक घटनाएँ, कलात्मकता की चाह और कला गुरुओं का अथक प्रयास रहा।

स्वतंत्रता के पूर्व ब्रिटिश शासक ने इन्दौर को कल्चरल सोसायटी का मुख्यालय बनाया था। तुकोजीराव और यशवन्तराव होल्कर कला प्रेमी थे। अंग्रेजों के आगमन पर अंग्रेज अपने साथ पाश्चात्य शैली के बने चित्र लाते थे। उन्हें होल्कर शासकों को भेंट करते थे। इस प्रकार इन्दौर में पाश्चात्य कला शैली आई और होल्कर शासकों में कला प्रेम जागा। इस शैली में बने चित्रों को खरीदकर अपने संग्रह में भी रखा। इनकी अनुकृतियाँ भी करवाई गई। महाराजा तुुकोजीराव के मन में भारतीय शैली के चित्रों को भेंट करने की इच्छा बलवती हुई, किन्तु उस समय इन्दौर में भारतीय शैली में कार्य करने वाला कोई कलाकार नहीं था।

1912 में डेली कॉलेज, इन्दौर में चित्रकला की नियमित कक्षाएँ प्रारम्भ की गई। यह कॉलेज राजाओं, सामन्तों और धार्मिक वर्ग के विद्यार्थियों के लिये था। रॉयल एसियाटिक सोसायटी ब्रिटेन के कलाकार द्वारा बनाए गए पोर्ट्रेट इस कॉलेज में संग्रहित हैं।

होल्कर महाराज ने पाश्चात्य शैली के लिये प्रताप राव और रामचन्द्र राव को चुना। पाश्चात्य चित्रों से अवगत कराने के लिये उन्हें यूरोपीय गैलरियों में लेकर गए। देवलालीकर को इन दोनों गुरुओं का निर्देशन प्राप्त था। साथ ही प्राचार्य, प्रो. चामले ने तुकोजीराव से चित्रकला की आगे की पढ़ाई के लिये मुम्बई आर्ट कॉलेज भेजने का आग्रह किया। अतः उच्च अध्ययन के लिये वे मुम्बई गए। वहाँ से अध्ययन उपरान्त वे इन्दौर आए।

सिद्धस्त श्री देवलालीकर ने अथक प्रयासों से सन 1927 में इस ‘ललित कला संस्थान’ की स्थापना की। इस समय श्री देवलालीकर अध्यक्ष और श्री.एच.पी वर्मा प्रथम प्राचार्य थे। धीरे-धीरे विद्यार्थियों की संख्या बढ़ती गई। अतः चित्रकला की विशेष कक्षाएँ प्रारम्भ की। देवलालीकर ने प्रयत्नों और गरिमामय उपलब्धि के कारण रु. 1000 का अतिरिक्त अनुदान पाया। जिससे कला संस्थान के लिये स्टैच्यू पार्ट्स, फर्नीचर और कला सामग्री खरीदी। 1929 में एग्रो हॉर्टीकल्चर प्रदर्शनी आयोजित की, जिसमें विद्यार्थियों के चित्रों को प्रदर्शित किया गया था। इस समय संस्था को स्वर्ण पदक एवं रजत पदक के साथ ही 1000 रुपए का अनुदान प्राप्त हुआ। इस संस्था के गरिमामय स्तर से प्रभावित होकर 1933 में डिप्लोमा कक्षाएँ प्रारम्भ की। इससे पूर्व यहाँ एलीमेंट्री और इंटरमीडिएट ड्राइंग कक्षाओं के अध्ययन की व्यवस्था थी।

ललित कला संस्था ने श्री गावड़े, मकबूल फिदा हुसैन, रामकृष्ण अनन्त खोत, श्री धर नारायण बेन्द्रे, ब्रजलाल जी सोनी, श्री सोलेगाँवकर तथा जटाशंकर जोशी जैसे मूर्धन्य कलाकारों को अन्तरराष्ट्रीय स्तर तक की ख्याति दिलवाई। उस समय श्री दत्तात्रेय दामोदर देवलालीकर ने इन विद्यार्थियों को चित्रकला की शिक्षा प्रदान की। विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करने के लिये उनके श्रेष्ठ चित्रों को प्रदर्शन हेतु विदेशों में भी भेजा गया। 1934 में मुम्बई आर्ट कमेटी ने श्री नारायण श्रीधर बेन्द्रे तथा श्री सोलेगांवकर के चार-चार चित्र लन्दन ओरिएण्टल आर्ट एक्जीबिशन में चयन कर भेजे। श्री बेन्द्रे के ‘Life and Color’ और श्री सोलेगांवकर के ‘Trimurti’ चित्र को बेलिगंटन हाउस लन्दन की प्रदर्शनी में बहुत प्रशंसा प्राप्त हुई। श्री मकबूल फिदा हुसैन और रजा ने भी विश्व स्तर की ख्याति प्राप्त की।

इस संस्था का उद्देश्य छात्रों की संख्या बढ़ाना न होकर उन्हें राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर तैयार करना था। साथ ही उन्हें आर्थिक स्तर से भी मजबूत करना था। अतः 1936 से यहाँ आर्किटेक्चर ड्रॉइंग, कॉमर्शियल ड्रॉइंग और क्ले मॉडलिंग का प्रशिक्षण दिया जाने लगा।

सन 1980 में प्राचीन ‘ललित कला संस्थान’ के अग्रभाग में ‘देवलालीकर कला वीथिका’ का लोकार्पण हुआ, जो समुचित प्रकाश व्यवस्था से सुसज्जित था। इस भवन के पिछले हिस्से में शैक्षणिक तथा प्रशासनिक भवन हैं। प्राचार्य कक्ष, संस्थान कार्यालय, पुस्तकालय तथा अन्य शैक्षणिक कक्षाएँ अवस्थित थीं। यहाँ एक विशाल सभागृह और कला स्टूडियों भी बना हुआ था। यह एक ऐसा संस्थान है जहाँ चित्रकला, मूर्तिकला, ग्राफिक्स के सैद्धान्तिक और प्रायोगिक विषयों का अध्ययन करवाया जाता है।

सन 1966 तक यह मुम्बई के सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स से सम्बद्ध रहा। यहाँ National Council of Technical Education (भारत शासन) के पाठ्यक्रम संचालित होते रहे। लगभग डेढ़ दशक तक संस्कृति विभाग की यह व्यवस्था कायम रही। 01 अप्रैल, 2002 से यह आयुक्त, उच्च शिक्षा भोपाल को हस्तान्तरित किया गया। इस संस्थान में डिप्लोमा के अलावा विद्यार्थियों को विद्या-वाचस्पति की उपाधि का भी निर्देशन दिया जाता है। इस संस्थान में विद्यार्थियों को परम्परागत रूप से तैयार किया जाता है और विश्व की दौड़ में आधुनिक प्रयोगात्मक शैलियों में भी तैयार किया जाता है। जिसके अनेकों उदाहरण हमारे सम्मुख हैं जिन्होंने यहाँ प्रशिक्षित होकर विश्व स्तर पर मौलिक पहचान बनाई।

इस संस्थान को समुचित रूप से चलाने के लिये प्रथम प्राचार्य श्री एच.वी. वर्मा सहित श्री डी.जे. जोशी, श्री एम. किरकिरे, श्री चन्द्रेश सक्सेना, श्री श्रेणिक जैन, श्री शशिकांत मुण्डी, श्री अब्दुल हमीद खान, श्री देवेन्द्र जैन, श्री कर्ण सिंह और श्रीमती राजुल भण्डारी के अथक प्रयास रहे। जिन्होंने इस सस्थान को उच्चतम शिखर तक पहुँचाया। संस्थान को इस स्थिति तक पहुँचाने में सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स, बाम्बे की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। वहाँ के प्राचार्य ग्लेडस्टोन सोलोमन और श्री अहिवासी जैसे कला गुरुओं ने श्री देवलालीकर, श्री बेन्द्रे, श्री मकबूल फिदा हुसैन, सैयद हैदर रजा, श्री डी.जे. जोशी, श्री चन्द्रेश सक्सेना जैसे शिष्यों को तैयार करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की।

श्री डी.जे. जोशी एवं श्री चन्द्रेश सक्सेना ने छात्रों को प्राकृतिक सौन्दर्य से अवगत कराया। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये वे शिक्षार्थियों को संस्थान से बाहर दृश्य-चित्रण के लिये बिजासन टेकरी, खजराना, रालामण्डल आदि स्थानों पर ले जाते थे। जिससे विद्यार्थी मुखर हो कार्य कर सकें।

इन्दौर में कला शिक्षा प्रदान करने हेतु शासकीय महारानी लक्ष्मीबाई कन्या महाविद्यालय में स्नातक स्नाकोत्तर स्तर पर चित्रकला का अध्यापन कराया जाता है। शुभांकन फाइन आर्ट्स कॉलेज, इन्दौर तथा SDPS Women College, IPS Academy, Indore अन्य उल्लेखनीय संस्थाएँ हैं। इन संस्थाओं से अध्ययन करने वाले विद्यार्थी अपने चित्रों की प्रदर्शनी गैलरियों में करते हैं। प्रीतमलाल दुआ आर्ट गैलरी, आर्ट एण्ड हार्ट (Orbit hall), रिफ्लेक्शन आर्ट गैलरी, देवलालीकर कला वीथिका- 78 स्कीम इन्दौर, उत्सव चन्द पोरवाल आर्ट गैलरी, चिन्मय आश्रम (कला गैलरी) आदि ने चित्रकारों को एक अच्छा मंच प्रदान किया है जहाँ वे अपनी कलाकृतियों को प्रदर्शित कर सकते हैं।

अतः मध्य प्रदेश में ये ललित कला संस्थान विकासोन्मुख हैं और कलाकारों को सृजन के लिये प्रेरित कर रहे हैं। यहाँ पर प्रशिक्षण प्राप्त कर विद्यार्थियों ने राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय स्तर की प्रदर्शनियाँ लगाई। ग्वालियर कला के विकास का एक महत्त्वपूर्ण इतिहास है।

ललित कला संस्थान, ग्वालियर

ग्वालियर क्षेत्र की कला का इतिहास मध्य काल से शुरू होता है। ग्वालियर कलम पर राजपूत शैली, ईरानी-फारसी मुगल शैली तथा पश्चिमी शैली का प्रभाव दिखाई देता है। ग्वालियर के राजा डूगेन्द्र सिंह और राजा मान सिंह तोमर ने अपने समय के चित्रकारों तथा शिल्पकारों को संरक्षण देकर राजपूत शैली को गति प्रदान की। ग्वालियर के कलाकारों द्वारा निर्मित चित्र शैली ग्वालियर कलम कहलाई। ईरानी, फारसी, मुगल कला का प्रभाव तत्कालीन राजपूत शैली पर पड़ा। जगन्नाथ, खेमकरन, केशवलाल और नंद आदि कलाकारों ने मुगल शैली में कार्य किया। सन 1765 में ग्वालियर पर मराठों का आधिपत्य हुआ। तब मुगल और राजपूत शैली से भिन्न चटख रंग वाली शैली का प्रादुर्भाव हुआ, जिसमें शीशे जड़ने का कार्य किया। रागमाला के 42 चित्र इस शैली के अनुपम उदाहरण हैं। सिंधिया राजाओं ने उज्जैन को छोड़कर ग्वालियर को अपनी राजधानी बनाया। स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व यहाँ की चित्रकला पर पश्चिमी शैली का प्रभाव पड़ने लगा था, लेकिन चित्रों के रख-रखाव की कमी के कारण उन चित्रकारों के नाम प्रकाश में नहीं आ सके, जिन्होंने पश्चिमी चित्रकारों से प्रभावित होकर चित्र बनवाए। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात चित्रकला का नवीन युग प्रारम्भ होता है। मूर्धन्य चित्रकार डी.डी. देवलालीकर ने चित्रकला के विकास के लिये प्रशिक्षण संस्थान की स्थापना के लिये विशेष प्रयास किये।

आपके प्रयासों से ग्वालियर में सन 1954 में ललित कला महाविद्यालय की स्थापना हुई। प्रारम्भ में यह संस्थान 1960 तक जनकगंज में स्थित स्कूल भवन में संचालित था। डी.डी. देवलालीकर को प्रथम संस्थापक प्राचार्य के रूप में मध्य प्रदेश शासन ने नियुक्ति दी। आपने चित्रकला के क्षेत्र में नवीन प्रयोगों का समावेश किया। छोटे चित्रों की अपेक्षा बड़े चित्रों को बनाने के लिये प्रेरित किया। जल रंगों के स्थान पर तेल रंग (Oil colours) के इस्तेमाल पर जोर दिया। इस समय राजशाही शासन होने से राजा-रानी से सम्बन्धित चित्रों की अधिकता रही। इसके अलावा उन्होंने एक परिवर्तन और करना चाहा।

आपने प्रकृति चित्रण को विशेष महत्व प्रदान किया। इस पद पर आपने दो वर्षों तक कार्य किया। यह संस्थान प्रारम्भ से वर्ष 1960 तक जनकगंज स्थित स्कूल भवन में संचालित था। 30 अक्टूबर, 1956 को सिंधिया परिवार द्वारा दी गई भूमि पर मध्य भारत के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री तखतमल जैन द्वारा वर्तमान भवन का शिलान्यास किया गया एवं 20 मई, 1962 को तत्कालीन शिक्षा मंत्री स्वर्गीय शंकर दयाल शर्मा के प्रयत्नों से इस भवन का उद्घाटन भारत के तत्कालीन प्रतिरक्षा मंत्री श्री बी.के. कृष्णमेनन के द्वारा सम्पन्न हुआ।

पूर्व में वर्ष 1956 तक शिक्षारत विद्यार्थियों को परीक्षा देने मुम्बई जाना पड़ता था और मुम्बई से ही जी.डी. आर्ट की पत्रोपाधि प्राप्त होती थी। 1956 में एल.एस. राजपूत के प्राचार्य पद पर रहते हुए संस्थान की परीक्षाएँ एवं प्रकाशन मध्य प्रदेश तकनीकी शिक्षा मण्डल के अधीन कर दी गई। सन 1977 में स्व. श्री मदन भटनागर के प्राचार्य पद पर रहने पर इस संस्थान में मूर्तिकला विभाग की स्थापना की गई। 1986 तक इस संस्थान में केवल डिप्लोमा कोर्स संचालित था। इसी वर्ष इन्दिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ से सम्बद्ध होने के कारण स्नातकोत्तर (डिग्री) कोर्स भी संचालित किया जाने लगा। यह संस्थान 2007 से संस्कृति विभाग को हस्तान्तरित कर दिया गया। अब यहाँ बी.एफ.ए. और एम.एफ.ए. की उपाधि प्रदान की जाती है। इस संस्था को एल.एस. राजपूत, श्री मदन भटनागर, श्री हरि भटनागर, राजुल भण्डारी, पी.एस.लोधी, आर.आर. स्वर्णकार, श्री शंखवार, अपर्णा अनिल और प्रसन्न पाटकर जैसे प्राचार्यों ने कला के विकास के प्रयास किये।

इस कला महाविद्यालय से प्रमुख चित्रकार मनोहर गोधने, विश्वामित्र, वासवानी, हरि भटनागर, देवेन्द्र जैन और साल्वी आदि कलाकारों ने प्रशिक्षण प्राप्त किया। इनमें से अनेक चित्रकार प्रशिक्षण उपरान्त उच्च पदों पर आसीन हुए और चित्रकारी शिल्पकारी के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई। देवलालीकर के समक्ष एम.एस. भाण्ड, सुधीर खास्तगीर रूद्रहांजी, एल.एस. राजपूत, डी.पी. शर्मा, एम.एस. कान्हड़े, यू. कुमार, विमल कुमार, बसन्त मिश्रा, बसन्त धुमाल, मदन भटनागर, शम्भूदयाल श्रीवास्तव, डॉ. राजुल भण्डारी, श्रीमती पुष्पा काले, द्रविड़, विजय मोहिते जैसे अनेक कलाकारों ने चित्रकला को नए आयाम दिये। महाविद्यालय की स्थापना के बाद आंग्ल चित्रकारी को बढ़ावा मिला। ग्वालियर कलम से पहचाने जाने वाली शैली पर पाश्चात्य शैली का विशेष प्रभाव पड़ा।

इसी समय चित्रकारों के जन सहयोग से कलाकार मण्डल की स्थापना हुई। इस संस्था ने पहली कला प्रदर्शनी का आयोजन ग्वालियर में किया। इसमें एम.एस. भाण्ड, उमेश कुमार, रूद्राहांजी, प्रभात नियोगी, रत्नाकर, लक्ष्मण भाण्ड, रामराव भाण्ड, केशव बाघ, एल.एस. राजपूत, विजय मोहिते, दुर्गा प्रसाद शर्मा, विश्वामित्र बासवाणी तथा विमल कुमार के चित्रों को प्रदर्शित किया। इसके पश्चात मण्डल और कलाकार सोसायटी के सहयोग से अखिल भारतीय प्रदर्शनी का कार्य आरम्भ हुआ।

मध्य प्रदेश राज्य की स्थापना के पश्चात 1952 में ‘मध्य प्रदेश कला परिषद’ का गठन हुआ। सन 1955 में कलावीथिका (आर्ट गैलरी) की स्थापना की गई। इसके पश्चात ललित कला संस्थान के निजी प्रयासों से समकालीन और कला के उभरते कलाकारों को प्रकाश में लाने के प्रयास हुए। कलाकारों ने कला जगत में राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाली प्रदर्शनियों में भाग लिया और नवीन तकनीक का प्रयोग कर कला जगत को अभिभूत कराया। इस प्रकार ग्वालियर का कला क्षेत्र में एक अपना ही स्थान है।

धार कला विद्यालय (लक्ष्मी कला भवन-धार)

मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक नगरी धार का महत्व इतिहास राजनैतिक के साथ ही कलात्मक पक्ष के कारण भी है। इसका प्राचीन नाम ‘धरा-नगरी’ था। इसका ऐतिहासिक महत्व शताब्दियों से रहा है तथा यहाँ का वैभव कलात्मकता दृष्टिगोचर होती है। लगभग 1000 वर्षों से परमार कालीन राजाओं का आधिपत्य रहा। इनके अलावा मुस्लिम शासकों का आधिपत्य भी रहा परन्तु इस काल में कला क्षेत्र में अधिक प्रगति नहीं दिखाई देती है। धार की प्रगति विशेषकर परमार काल में दिखाई देती है।

मालवा में धार नगरी को राजा भोज (परमार-नरेश) की राजधानी होने का गौरव प्राप्त है वहीं कला संस्कृति के लिये भी प्रसिद्ध है। परमार काल में चित्रकला विषय पढ़ना बच्चों के लिये अनिवार्य था। कासार साहब चित्रकला पढ़ाने में विशेष योग्यता रखते थे। इस समय इण्टर ग्रेड परीक्षा का केन्द्र था। हाईस्कूल में भी यह विषय पढ़ाया जाने लगा। इस समय ‘बड़नेरकर सर’ को चित्रकला पढ़ाये जाने का आधिपत्य सौंपा। इस समय कोई विशेष प्रगति नहीं हुई।

1933 में श्री रघुनाथ फड़के साहब के आने से कलात्मक क्षेत्र में कुछ परिवर्तन देखने को मिलता है। आप साहित्य, संगीत, चित्र तथा शिल्प कलाओं में निपुण थे। राजमाता कला के प्रति सजग थीं, अतः आपके प्रयास से कला शिक्षण संस्था स्थापित करने की आज्ञा दी गई। 28 नवम्बर, 1938 को राजमाता के नाम पर ‘लक्ष्मी कला भवन’ स्कूल ऑफ आर्ट की स्थापना हुई। श्री र.कृ. फड़के (अण्णा) को कला भवन की स्थापना के समय प्राचार्य पद सम्भालने को कहा गया लेकिन उन्होंने इस पद के लिये इन्कार कर दिया और ‘ऑनरेरी आर्गेनाइजर’ के रूप में पद ग्रहण करने की इच्छा व्यक्त की। इस पद (प्राचार्य) के लिये उन्होंने अपने होनहार शिष्य श्री डी.जे. जोशी को पद ग्रहण करने के लिये कहा। श्री डी.जे. जोशी की कला-परख आपने उनके शिष्यकाल में ही कर ली थी, जबकि वे इन्दौर में कला शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। वे उन्हें धार ले आए। यहाँ पर डी.जे. जोशी कला की बारीकियों से अवगत हुए उनके परिश्रम, लगन के कारण वे अपने फन में मंजते चले गए और कला संस्थान ‘लक्ष्मी भवन’ के प्राचार्य पद का निर्वाह किया। इन्होंने इस संस्थान को अनेकों सुविधाएँ मुहैया करवाई। यह संस्थान प्रगति के मार्ग पर दिन-प्रतिदिन अग्रसर होता चला गया। इसकी मुख्य विशेषता यह थी कि विद्यार्थियों को यहाँ निःशुल्क शिक्षा दी जाती थी और विद्यार्थियों को जे.जे.स्कूल ऑफ आर्ट्स की परीक्षा में बैठाया जाता था। इस संस्थान में पाँच वर्ष पाठ्यक्रम की वार्षिक पढ़ाई कराई जाती थी।

स्वतंत्रता से पूर्व इस संस्था का खर्च धार राज्य शासन वहन करता था। किन्तु स्वतंत्रता के पश्चात यह कार्य मध्य भारत राज्य सरकार द्वारा किया जाने लगा। सन 1952 में डी.जे. जोशी के इन्दौर जाने के पश्चात श्री दिनकर देव प्रभारी प्राचार्य बने। शासन ने इसका स्वरूप बदलकर ललित कला महाविद्यालय धार कर दिया। इस महाविद्यालय के प्राचार्य पद को विभिन्न समय में डी.जे.जोशी दिनकर विश्वनाथ देव (प्रभारी प्राचार्य), डॉ. आर.सी.भावसार, श्री मधुकर गोविन्द किरकिरे श्री हरी भटनागर आदि कलाकारों ने सुशोभित किया।

1974-75 में इसका नाम ललित कला महाविद्यालय से बदलकर ललित कला संस्थान कर दिया। इसका विशेष कारण यह रहा कि यह संस्था किसी महाविद्यालय से सम्बद्ध नहीं थी। इस कला महाविद्यालय के विकास की गति अन्य कला महाविद्यालयों से कम थी। इस प्रकार इस कला संस्थान का चित्रकला और मूर्तिकला के शिक्षण संस्थाओं में विशेष महत्व रहा है।

कला के क्षेत्र में श्री खण्डेराव नाड़कर का भी दखल रहा। वे कला प्रेमी थे, आपके सहयोग से धार में कलावीथिका की स्थापना हुई। यह खण्डेराव टेकरी कला वीथिका कहलाई। इसके पश्चात ‘आनन्द-महाविद्यालय’ में भी चित्रकला प्रारम्भ हुई। यहाँ विद्यार्थियों को निःशुल्क शिक्षा दी जाती है। वर्तमान में शासकीय महाविद्यालय, धार में स्नातक स्तर तक कला की शिक्षा दी जा रही है।

शासकीय ललित कला संस्थान-जबलपुर

जबलपुर में शासकीय ‘ललित कला संस्थान’ का प्रारम्भ सन 1961 में शासकीय कला निकेतन के ड्राइंग एवं पेंटिंग विभाग के रूप में तत्कालीन प्राचार्य श्री एस.के.दास के द्वारा हुआ। वे इंजीनियर होने के साथ ही एक अच्छे कलाकार भी थे। ललित कला संस्थान जबलपुर आपके अथक प्रयासों का परिणाम था। आपने सन 1961 में ‘कला निकेतन’ के प्रथम प्राचार्य के रूप में कार्य भार सम्भाला। वर्ष 1986 में मध्य प्रदेश शासन के द्वारा ड्राइंग एण्ड पेंटिंग विभाग को एक स्वतंत्र संस्थान का स्तर प्रदान किया और तभी से यह स्वतंत्र संस्थान के रूप में संचालित हो रहा है।

चित्रकला विषय के राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त श्री राममनोहर सिन्हा इस स्वतंत्र संस्थान के प्रथम प्राचार्य थे। श्री अमृतलाल वेगड़ श्री हरि भटनागर, श्री हरि श्रीवास्तव, स्व. श्री विष्णु चौरसिया, श्री हरिशंकर दुबे, श्री ओम पाण्डेय, श्री भगवानदास गुप्ता, श्री पी.डी. प्रजापति, स्व. श्री सुधाकर सोनवलकर के अथक प्रयासों से यह संस्थान चित्रकला और एप्लाइड आर्ट के अध्यापन का महत्त्वपूर्ण केन्द्र रहा है।

वर्ष 1986 में संस्थान के प्रारम्भ होते ही इसमें चित्रकला और व्यावहारिक कला के स्नातक और स्नातकोत्तर उपाधि के पाठ्यक्रम प्रारम्भ किये गए जो कि इन्दिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ से सम्बद्ध किया। इसके पूर्व प्रारम्भ से ही ललित कला में पत्रोपाधि (Diploma) पाठ्यक्रम का अध्यापन किया जाता था जो कि National Council of Technical Education, Bhopal से सम्बद्ध था।

वर्ष 1986 में इस संस्थान के उदय के साथ ही और उपाधि प्रारम्भ होने के साथ-साथ संस्थान को मध्य प्रदेश शासन के संस्कृति विभाग को हस्तान्तरित कर दिया और 17 वर्षों तक संस्थान संस्कृति विभाग के अन्तर्गत संचालित होने के पश्चात वर्ष 2002 में मध्य प्रदेश शासन ने इसे महाविद्यालय का स्तर प्रदान करते हुए उच्च शिक्षा विभाग को हस्तान्तरित कर दिया। वर्तमान में अप्रैल 2007 से पुनः संस्कृति विभाग के अधीन हस्तान्तरित होकर उन्नति की ओर अग्रसर है।

इस संस्थान में चित्रकला एवं व्यावहारिक कला (Applied Art) में स्नातक (BFA) स्नातकोत्तर (MFA) के अतिरिक्त दोनों विषयों में चार वर्षीय डिप्लोमा एवं एक वर्षीय डिप्लोमा कोर्स का अध्ययन करवाया जा रहा है। B.F.A प्रथम वर्ष का कोर्स राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय ग्वालियर द्वारा संचालित किया जा रहा है।

कला निकेतन जबलपुर को अमृतलाल वेगड़ जैसे कला शिक्षक मिले, जो कि नर्मदा प्रेमी थे। नर्मदा के सौन्दर्य को निहारने और निखारने की उनकी अपनी कला दृष्टि थी। आपने कोलाज के माध्यम से दृश्य चित्रण बनाए। वे अपने साथ विद्यार्थियों को भी परकम्मा (परिक्रमा) के लिये ले जाते थे। इस प्रकार विद्यार्थी स्वतः ही उन गुणों को सीखता जाता था।

इस संस्थान के लिये श्री राम मनोहर सिन्हा का भी महत्त्वपूर्ण योगदान है। वे शान्ति निकेतन से प्रशिक्षित थे और चीन की कला का वहाँ रहकर बारीकी से अध्ययन किया था। वे इस कला विद्यालय के विभागाध्यक्ष भी रहे और अपने प्रयासों से इस विद्यालय के विकास में सहयोग प्रदान किया। आपके प्रयासों से हरि श्रीवास्तव (शान्ति निकेतन), श्री श्रेणिक जैन और श्री हरि भटनागर की नियुक्ति हुई। अमृत लाल वेगड़, राम मनोहर सिन्हा और श्रेणिक जैन प्रमुख दृश्य चित्रकारों में से हैं अतः विद्यार्थियों पर इनकी कला का प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था।

आज भी यह कला निकेतन विद्यार्थियों को प्रशिक्षण दे रहा है और यहाँ अनेकों विषय पढ़ाए जा रहे हैं।

इस संस्थान के अलावा यहाँ चित्रकला की शिक्षा शासकीय मानकुँवर बाई कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, जबलपुर और माता गूजरी स्नातक महाविद्यालय, जबलपुर में भी दी जा रही है।

भारतीय कला भवन-कला महाविद्यालय, उज्जैन

उज्जयिनी धार्मिक और सांस्कृतिक नगरी है। यहाँ परमार कालीन स्थापत्य और कलाकृतियाँ देखने को मिलती हैं। भारतीय कला भवन को स्थापित करने का श्रेय श्री वाकणकर को जाता है। श्री वाकणकर 1953 तक राष्ट्रीय सेवक संघ के प्रचारक, प्रसारक के रूप में विभिन्न स्थानों का भ्रमण करते रहे। आपने धार, निमाड, रतलाम से शिक्षण कार्य पूर्ण किया। आपने अपना निवास या कार्यस्थल उज्जैन बनाया। पिता के सहयोग से इमारत की तीसरी मंजिल की एक कक्ष में कला-शिक्षण का प्रारम्भ किया। आपने प्रसिद्ध प्रतिमा सरस्वती के नाम पर ‘भारती कला भवन’ नाम दिया। इस कला भवन की स्थापना 1953 में हुई। स्थापना के पूर्व आपने कई चित्रकारों से सम्पर्क किया, जिनमें जगमोहन आर्टिस्ट मदनलाल शर्मा, कोरान्ने, श्री भाण्ड, श्री गिरी, श्री केशव राव अम्बेडकर आदि थे।

भारतीय कला भवन में लगभग 40-50 विद्यार्थी प्रतिवर्ष शिक्षा ग्रहण करते हैं। इस शिक्षण का प्रमुख उद्देश्य श्रेष्ठ चित्रकार को तैयार करना था। यहाँ विभिन्न परीक्षाओं के लिये विद्यार्थी को तैयार करना था।

भारतीय कला भवन 1968 से परीक्षा आयोजित करने का केन्द्र बनाया गया तथा 1977 से प्रिपटेरी कोर्स द्विवर्षीय ग्रेड ड्राइंग परीक्षा देने योग्य बनाया गया।

इसी दौरान श्री वाकणकर (पुरातत्वविद) का यूरोप जाने का टूर बना। इस भ्रमण में उन्होंने अपने साथ शिष्यों को भी रखा। इस भ्रमण का उद्देश्य मुख्यतः प्रागैतिहासिक कला का तुलनात्मक अध्ययन करना था।

कला के प्रचारार्थ पत्रिकों का प्रकाशन किया गया। प्रारम्भ में हस्तलिखित ग्रन्थों को प्रकाशित किया गया। 1977 से आकार नामक कला पुस्तक नियमित प्रकाशित हो रही थी। इसके अलावा कला भारती पुस्तक प्रकाशित होती थी।

1. यहाँ पर समय-समय पर कालीदास टैगोर स्मृति, बसु स्मृति तथा कला प्रदर्शनियाँ आयोजित हुई हैं।
2. इस संस्था में ख्याति प्राप्त कलाकार जैसे श्रीधर नारायण बेन्द्रे, डी.जे. जोशी, भाण्ड साहब द्वारा डिमॉन्स्ट्रेशन दिये गए। साथ ही परिचर्चाएँ भी आयोजित की गई हैं।

वर्तमान में भारतीय कला-भवन का नाम सम्मान से लिया जाता है। डॉ. वाकणकर का अपने शिष्यों के प्रति समर्पण भाव ने शिष्यों को काफी ऊँचाई तक पहुँचाया। श्री सचिदा नागदेव आपके प्रथम और प्रमुख शिष्यों में से हैं, जो बचपन में ही 1956 में शंकर्स अन्तरराष्ट्रीय बाल चित्रकला प्रतियोगिता में पुरस्कार पाकर सम्मानित हुए एवं 1990 में जापान अवार्ड प्राप्त किया। इनके अलावा आपके अन्य शिष्यों में एम. कुरैशी, श्रीमती शिवकुमारी जोशी, डॉ. आर.सी. भावसार, श्री कृष्ण जोशी, विष्णु भटनागर एवं श्री राधेश्याम भारद्वाज हैं।

चित्रकारों को अपने चित्रों को प्रदर्शित किये जाने के लिये 1965 से ‘कालिदास समारोह’ हर वर्ष आयोजित किया जाता है। इसमें प्रतिभागियों से कालिदास के काव्य ग्रन्थों पर चित्र एवं शिल्प आमंत्रित किये जाते हैं। उनके ग्रन्थों में काव्य प्रकृति पर आधारित रहे हैं। इस प्रकार संवेदनाओं से परिपूर्ण चित्र चित्रकार सृजित करते हैं। चयनित चित्रों की प्रदर्शनी की जाती है साथ ही अच्छे चित्रों को पुरस्कृत भी किया जाता है।

सन 1964 में ‘माधव महाविद्यालय उज्जैन’ में स्नातक तथा स्नातकोत्तर स्तर पर चित्रकला विषय में शिक्षण कार्य प्रारम्भ हुआ। शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, उज्जैन में भी चित्रकला की स्नातकोत्तर स्तर पर शिक्षा प्रदान की जा रही है। वर्तमान में कुछ चित्रकारों द्वारा ‘कलावर्तन्यास’ तथा ‘मानव संकेत’ की स्थापना की गई। इन संस्थाओं में चित्रकला शिविर आयोजित किये जाते हैं तथा प्रदर्शनियाँ होती हैं और पुरस्कार भी प्रदान किये जाते हैं। इस प्रकार चित्रकला के विकास में उज्जैन की महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

भोपाल के कला केन्द्र

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण प्रदेश रहा है। यहाँ झील, पहाड़, घाटियों से मनोरम दृश्य बन पड़ा है। प्रारम्भ से ही भोपाल कला संस्कृति, ऐतिहासिक तथा राजनैतिक गतिविधियों का केन्द्र रहा है। यहाँ पर भोपाल के सौन्दर्य से आकर्षित होकर अन्य क्षेत्रों से कलाकार आकर बस गए और अनेक कला केन्द्र स्थापित किये। भोपाल ललित कलाओं का केन्द्र बिन्दु बन गया। यहाँ स्थापत्य कला नवाब कालीन स्थापत्य कला है। यहाँ संगीत, चित्र और शिल्प का समृद्ध रूप दिखाई देता है।

मध्य प्रदेश कला परिषद

सन 1952 में भोपाल में ‘मध्य प्रदेश कला परिषद’ की स्थापना की गई। संगीत, नृत्य, नाटक ही नहीं बल्कि यह सृजनात्मक तथा ललित कलाओं की भी राज्य अकादमी है। शास्त्रीय कलाओं को जनमानस में प्रतिष्ठित कराने और सम्मिलित कराने के उद्देश्य से अब तक वरिष्ठ ख्यातनाम कलाकारों को आमंत्रित करती रही है। इसके प्रमुख कार्यक्रम खजुराहो नृत्य समारोह, तानसेन संगीत समारोह, मध्य प्रदेश नाट्य समारोह, मध्य प्रदेश कला प्रदर्शनी, एकल प्रदर्शनी, रजा पुरस्कार, अरविन्द व्याख्यानमाला, एकत्र के आयोजन और सम्भागीय मुख्यालयों एवं पर्यटन केन्द्रों पर समारोह आदि हैं। कला वार्ता पत्रिका का प्रकाशन रचनात्मकता का द्योतक है।

वर्तमान में इसका नाम परिवर्तित कर ‘उस्ताद अलाउद्दीन खाँ कला परिषद’ रखा गया है।

भारत भवन

एक अत्यन्त प्रभावशाली ललित कलाओं का घर ‘भारत भवन’ भोपाल में बड़ी झील किनारे अवस्थित है, जिसका उद्घाटन भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी के कर कमलों से माघ 24 शके 1903, 13 फरवरी 1982 को सम्पन्न हुआ। प्रधानमंत्री स्व. श्रीमती गाँधी की वर्षों पहले की परिकल्पना थी, जिसे उन्होंने सम्मेलन के अवसर पर व्यक्त किया-

“देश में शायद ही कोई ऐसा सम्मेलन हो, जिसमें भारत और विदेश के कलाकार इतनी संख्या में जमा हों। मेरी बहुत दिनों से कल्पना रही कि ऐसा भारत-भवन बने ताकि देश में जो प्रतिभा है पहाड़ों में, जंगलों में, रेगिस्तानों में उसे फलने-फूलने का अवसर मिले। पहले राज दरबारों के भरोसे शास्त्रीय कलाए होती थीं और लोगों के भरोसे लोक कलाएँ। अब राजा-महाराजा तो चले गए सारा बोझ लोगों पर है। इसके बीच में सरकार नहीं आ सकती। कलाकार और आम लोग इन्हीं दो का सम्बन्ध बनता है, जिसे हमें मजबूत करना चाहिए।”

यह स्वप्न पूरा करने का प्रयास मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह एवं अशोक बाजपेयी ने किया। इस भवन को प्रख्यात वास्तुविद चार्ल्स कोरिया ने डिजाइन किया। इसे अस्सी के दशक में बनने वाले संग्रहालयों के लिये विश्व पुरस्कार प्राप्त हुआ। भारत भवन की इस परिकल्पना में प्रख्यात विचारक चित्रकार निदेशक जगदीश स्वामीनाथन, हिन्दी के मूर्धन्य रंगकर्मी ब.व. कारन्त की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है।

इस भवन की रचना इस प्रकार की है कि कहीं से भी पूरा भवन नहीं दिखाई पड़ता, अतः इसे ‘अभवन’ कहा गया है। इसमें बहिरंग और अन्तरंग निर्मित हैं। वागार्थ में भारतीय कविता पुस्तकालय है। भारत भवन सभी कलाओं का घर होने के साथ भारतीय समकालीन कला का महत्त्वपूर्ण संग्रहालय है। यहाँ पर रूपंकर कला की तीन कला दीर्घाएँ हैं-

1. आधुनिक कला दीर्घा- समकालीन कला का स्थाई संग्रह
2. रूपाभ- आमंत्रित कलाकारों की प्रदर्शनी
3. लोक आदिवासी कला दीर्घा- लोक कला और आदिवासी कला का स्थाई संग्रह

वास्तु शिल्पी चार्ल्स कोरिया ने वातावरण का उचित प्रयोग किया। उन्होंने झील किनारे कई स्तरों वाली एक ऐसी इमारत बनाई जो नितान्त आधुनिक होते हुए भी प्राचीन वास्तुकला की याद दिलाती है। यह प्राचीन गुफा मन्दिर के समान प्रतीत होती है। यह आकर्षक भवन विविध ललित कलाओं का केन्द्र है जहाँ संगीत, चित्रकारी, नाटक, साहित्य और फिल्म की सम्भावनाओं को साकार किया जाता है। ‘आकार’ में कला शिविरों का आयोजन किया जाता है। यहाँ हर वर्ष पुनरावलोकी प्रदर्शनी आयोजित की जाती है एवं वर्षगाँठ के अवसर पर शिखर सम्मान से सम्मानित किया जाता है।

स्वराज भवन कलावीथिका

स्वराज भवन कला वीथिका पोलिटेक्निक चौराहे के पास रवीन्द्र भवन के सामने अवस्थित है, जिसके संचालक 2013 तक श्री राम तिवारी थे। यहाँ पर स्वतंत्रता सेनानियों से सम्बन्धित कला शिविर प्रतिवर्ष आयोजित किये जाते हैं और उन चित्रों की प्रदर्शनी की जाती है। इन शिविरों में श्री श्रेणिक जैन, डॉ. रामचन्द्र भावसार, डॉ. लक्ष्मी नारायण भावसार, श्री भगवानदास गुप्ता, श्री हरि भटनागर, मीरा गुप्ता, श्री सचिदा नागदेव सहित अन्य प्रदेशों के कलाकारों ने भी शिरकत की है। इन शिविरों के अलावा अन्य चित्रकार भी अपनी कलाकृतियों को जन-सामान्य के लिये प्रदर्शित कर सकते हैं। अन्य आर्ट गैलरियों में सरल एलियांस फ्रांसिस और रंगायन कला दीर्घा है।

सरल आर्ट गैलरी न्यू मार्कट स्थित भीड़-भरे माहौल में अवस्थित है।

एलियांस फ्रांसिस- यह गैलरी अरेरा कालोनी में है जहाँ चित्रकार अपनी कृतियों को प्रदर्शित कर सकते हैं।

रंगायन कला दीर्घा- महाराणा प्रताप नगर, भोपाल, जोन-1 में यह चित्र गैलरी है।

इन सभी गैलरियों के अलावा शिक्षण संस्थाओं में भी कला का प्रशिक्षण दिया जाता था। भोपाल में सबसे पुराना महारानी लक्ष्मीबाई कन्या महाविद्यालय है, जहाँ चित्रकला की स्नातकोत्तर स्तर तक शिक्षा दी जाती है। उस समय श्री सुशील पाल वहाँ के विभागाध्यक्ष थे। श्री लक्ष्मण भाण्ड के अथक प्रयासों से ‘ललित कला संस्थान’ की स्थापना हुई। यह आपके पिता स्व. एम.एस. भाण्ड के नाम से प्रख्यात हुई। मध्य प्रदेश में टेक्निकल बोर्ड के पाठ्यक्रम पर आधारित शिक्षा दी जाती थी। इस स्कूल को चलाने के लिये सचिदा नागदेव, डॉ. आर.सी. भावसार, श्री वी.आर. आप्टे, प्रभाकर घारे और शोभा घारे का विशेष योगदान था।

भोपाल में कलात्मक जागृति के लिये सन 1965 में ‘रिद्म आर्ट सोसायटी’ की स्थापना की, जिसमें राधाकृष्णमूर्ति वेलूरी का प्रमुख रूप से सहयोग रहा। इस सोसायटी द्वारा कलाकारों की कृतियों को बुलवाया जाता था तथा उनमें से श्रेष्ठ कृतियों को पुरस्कृत भी किया जाता था।

वर्तमान में भोपाल में कला की शिक्षा देने में महारानी लक्ष्मीबाई कन्या महाविद्यालय के अलावा शासकीय हमीदिया कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय, भोपाल, सरोजनी नायडू कन्या महाविद्यालय और गीतांजलि महाविद्यालय भोपाल संस्थाएँ प्रमुख हैं।

भोपाल ने अन्य स्थानों से आए कलाकारों का भी स्वागत किया। कलाकारों के व्यक्तिगत प्रयासों से भी कला को नये आयाम प्राप्त हुए। सचिदा नागदेव, सुरेश चौधरी ने अमूर्त दृश्यकला में अपना स्थान बनाया। वहीं डॉ. लक्ष्मी नारायण भावसार, श्री जी.एल. चौरागड़े और विनय सप्रे यथार्थवादी दृश्य चित्रण के लिये जाने जाते हैं वहीं डॉ प्रो. मंजूषा गांगुली ने कोलाज में अपना स्थान बनाया। रॉबिन डेविड ने अपने शिल्पों से भोपाल को समृद्ध किया।

मध्य प्रदेश के प्रमुख कलाकार

स्व. श्री देवलालीकर- स्व. श्री दत्तात्रेय दामोदर देवलालीकर मध्य प्रदेश में कला-संस्कृति को बढ़ाने के लिये नींव के पत्थर की तरह रहे। आपके अथक प्रयासों से ही इस राज्य में कला का प्रसार हो सका। आपका कला की दिशा निर्धारण में अभूतपूर्व योगदान रहा। श्री एम.एफ. हुसैन, श्री रजा, श्री देवकृष्ण जोशी, श्री बेन्द्रे जैसे सुप्रसिद्ध कलाकारों का आपने मार्गदर्शन किया है।

स्वर्गीय दत्तात्रेय देवलालीकर का जन्म 18 अप्रैल, 1893 को धार के पास स्थित बिड़वाल गाँव में हुआ था। उनके पिता बिड़वाल के कामदार थे। आपको 6 साल की अवस्था में चित्रकला के प्रति प्रेम जागृत हुआ। त्यौहार पर घर के द्वार पर बनी अल्पना और रंगोली की आकर्षकता ने चित्रकला की ओर प्रेरित किया। आपने बड़वानी के स्कूल से मिडिल पास किया और हाईस्कूल की शिक्षा के लिये इन्दौर के शिवाजी राव हाईस्कूल में प्रवेश लिया। सन 1910 में मैट्रिक पास किया। 1916 में बी.ए.की परीक्षा उत्तीर्ण की। आपने इन्दौर में अपने मामा श्री मिटबांवकर से चित्रकला का प्रारम्भिक ज्ञान अर्जित किया। बी.ए.की परीक्षा उत्तीर्ण करने पर आपके प्राचार्य श्री चामले ने कला की आगे पढ़ाई के लिये तुकोजी राव होल्कर से सिफारिश की। अतः उन्होंने छात्रवृत्ति प्रदान की और चित्रकला की शिक्षा के लिये जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट बाम्बे भेजा। वहाँ आपने मेयो मेडल प्राप्त किया, जो कि श्रेष्ठ विद्यार्थी के लिये प्रदान किया जाता है। उस समय आप यह कोर्स पूरा न कर पाए क्योंकि राज्य शासन ने आपको बीच में ही वापस बुला लिया। आपने शिवाजी राव हाईस्कूल में अध्यापन कार्य किया। आपको रामचन्द्र राव और प्रतापराव का आशीष प्राप्त था। आपके अथक प्रयासों से कला निखरती गई।

परिवार- आपका विवाह अल्पायु में हो गया था। आपकी पत्नी अहिल्या से दो पुत्री और तीन पुत्र हैं। पुत्रियाँ लीला, मुक्ता विवाहित थीं। पुत्र राजा, यशवन्त और मनोहर हैं। राजा की मृत्यु अल्पायु में हो गई। यशवन्त चित्रकार थे। श्री देवलालीकर अन्त तक बेटे मनोहर के साथ रहे। अन्तिम समय में आर्थिक तंगी में समय व्यतीत हुआ। बीमार रहते हुए 29 मई, 1978 में दिल्ली में देहावसान हुआ।

आपको अनेकों सम्मानों से सुशोभित किया गया। सन 1974 में कुक्षी में आपका सम्मान हुआ। मध्य भारत ने आपको ‘आर्ट्स अमेरिट्स’ की उपाधि प्रदान की तथा यशवन्तराव होल्कर द्वारा ‘रायरतन’ की पद्वी प्रदान की।

आप कला की शिक्षा के लिये काफी प्रयत्नशील रहे। कला शिक्षक के रूप में महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। सन 1927 में कला महाविद्यालय की स्थापना हुई। सन 1926 में आप इन्दौर आए थे। आपने प्राथमिक शिक्षा में चित्रकला को अनिवार्य किया। आपने पूर्ण समर्पण भाव से 1945 तक इस महाविद्यालय के मुख्य अध्यापक (सुपरिटेंडेंट) रहे। जी.डी. आर्ट्स की परीक्षा के लिये एनाटॉमी और पर्सपेक्टिव के अलावा सभी विषय आप स्वयं पढ़ाते थे।

श्री देवलालीकर सुशिक्षित थे। विदेशी कलाकारों की अनेक पुस्तकों का अध्ययन किया। कला मर्मज्ञ होने के साथ ही कला के अच्छे शिक्षक भी थे। आपका मानना था कि पेंटिंग के विद्यार्थी का लक्ष्य होता है स्वप्रयास द्वारा सामने दिखाई देने वाले दृश्य या मॉडल को उसके हाव-भाव रंगों और व्यक्तित्व या विशिष्टता की बारीकियों समेत सामने लगे बोर्ड पर उतारना। पुराने विद्यार्थियों की कलाकृतियाँ विद्यालय की दीवारों पर नहीं लगाई जाती थीं। उसका कारण यह था कि विद्यार्थियों के पास स्वयं के प्रयत्नों के अलावा कोई तरीका नहीं था। इस प्रकार विद्यार्थियों की मौलिकता सामने दिखाई देती थी। आपने सदैव अपने विद्यार्थियों को नई दिशा और नई सोच देने का प्रयत्न किया। वे विद्यार्थियों को उनके कागज पर करेक्शन न देकर दूसरे कागज पर करेक्शन देेते थे। वे बनाकर मिटा देते थे। विद्यार्थी की रूचि जिस दिशा में होती है, वे उसी दिशा में उसे आगे बढ़ने के लिये प्रोत्साहित करते थे। वे प्रत्यक्ष ज्ञान पर अधिक ध्यान देते थे।

आपको तेल रंग में चित्र बनाना पसन्द था क्योंकि आपका मानना था कि तेल रंग में ही रंग की सभी छटायें स्पष्ट नजर आती हैं। रंगों के सूखने पर भी इन रंगों को उसी रूप में देख पाना सम्भव होता है। श्री देवलालीकर जी ने श्री त्रिनाद और श्री धुरन्धर जैसे कलागुरूओं से शिक्षा प्राप्त की। राजा रवि वर्मा के चित्र भी आपने देखे थे आपको बंगाल की वाश तकनीक का भी ज्ञान था। आपको एनाटॉमी पर्सपेक्टिव का गहन अध्ययन था। सन 1963 में ग्वालियर में स्कूल ऑफ आर्टस प्रारम्भ किया। वहाँ के प्रथम प्राचार्य आप ही रहे हैं। यहीं से वे सेवानिवृत्त भी हुए। चपरासी को निर्देशित किया था कि विद्यार्थी जब भी स्कूल में आएँ जाने दिया जाए। श्री देवलालीकर जी अपने विद्यार्थियों को परीक्षा के लिये मुम्बई लेकर जाते थे। बड़ौदा के चित्र संग्रहालय को भी दिखाए थे। इस प्रकार श्री ए.एक्स.त्रिनाद, धुरन्धर, म्हात्रे आदि कलाकारों की कृतियों को दिखाकर चित्र सौन्दर्य से परिचित कराते थे। विद्यार्थियों से एक-एक विद्यार्थी पेंटिंग में करेक्शन स्वयं करते थे। लाइफ, पोर्ट्रेट, चित्र संयोजन, मेमोरी, ड्रॉइंग डिजाइन, दृश्य चित्रण, भित्ति चित्रण जैसी हर विधा का ज्ञान देते और जिस विधा में विद्यार्थी की रूचि होती उसे ही आगे बढ़ाते थे। उनके ब्रश संचालन की अपनी पद्धति थी। आपके अधिकांशतः चित्र धर्म, ऐतिहासिक प्रसंगों पर बने हैं। आपने सभी माध्यमों में कार्य किया। आपके चित्र कई बार कैलेण्डर, पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आप कला पारखी रहे हैं। यही कारण रहा कि आपके विद्यार्थियों में श्री बेन्द्रे, श्री हुसैन, श्री डी.जे. जोशी, श्री मनोहर जोशी, श्री सोलेगांवकर, श्री बावड़े आदि प्रसिद्ध राष्ट्रीय- अन्तरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कलाकार निकले। जिन्होंने व्यक्तिगत पहचान बनाई। आपने किसी भी शिष्य पर अपनी कला शैली अध्यारोपित नहीं की। ऐसे कला गुरुओं का मिलना दुर्लभ हैं। मध्य प्रदेश के मालवा में श्री देवलालीकर का कला के प्रति योगदान अतुलनीय है।

देवलालीकरदेवलालीकरश्री देवलालीकर की कला

उन्हीं के शब्दों में- “जब मैंने कला का अभ्यास करने का निश्चय किया तभी मैंने यह संकल्प किया कि कला के द्वारा मानव जीवन में जो दिव्य है उसी को चित्रित करने का प्रयत्न करूँगा। दिव्यत्व का एक बड़ा भाग मनुष्य के धर्म में निहित है। सभी महान कलाकारों ने यथा जापान, पुराना चीन, ग्रीस और इटली के कलाकारों ने अपनी कला द्वारा धार्मिक भावनाओं की अभिव्यक्ति की। शताब्दियों से भारत में भी अजन्ता, एलोरा जैसे महान विशेष यही बता रहे हैं। हमारे प्राचीन ग्रन्थों में जो दिव्य अलौकिक प्रसंग आए उन्होंने मुझे अभिभूत किया, वे ही बाद में मेरे विषय बन गए।”

सरस्वती, महाकाली, महालक्ष्मी, उद्धव और गोपियों, ऋगी ऋषि, ऋषि पत्नियाँ, सैनेन्ध्री का पतिशण्य, सीता का रावण के घर आत्मनिग्रह से अन्न त्याग और इन्द्राणी का उन्हें अमृत भेजना तथा शकुन्तला के प्रसंग पर निर्मित चित्रावली आदि में वे अपनी एकाग्रता, नैसर्गिक प्रेरणा और आस्था में एकनिष्ठ हैं।

अवध प्रेस लखनऊ से श्रीमद् भागवत के दो विशेषांक प्रकाशित हुए थे। इसमें प्रकाशित चित्रों का रेखांकन स्व. देवलालीकर ने ही किया था। गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित कल्याण के कृष्णाक, भक्तांक और गीतांक के वार्षिक विशेषांकों की चित्रमय सज्जा आपके द्वारा की गई। आपने लैण्डस्केप, पोर्ट्रेट, स्टैच्यू और स्केच बनाकर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। आप चित्रों में सधे हाथों से ब्रश-स्ट्रोक से कला की पृष्ठ भूमि को उभारते ही हैं साथ ही ऐसा रंग संयोजन करते हैं कि समग्र कलाकृति रंग से सराबोर हो जाती है। दिव्य सौन्दर्य और रूप छवियों के उभार से सूक्ष्मदर्शिता का प्रयोग किया। अंग प्रत्यंगों का उभार, केश सज्जा, वस्त्राभूषण के अनुरूप रंग प्रयोग आकर्षकता प्रदान करता है। आपके अधिकांश चित्र अध्यात्म पर आधारित हैं। विषयानुरूप संयोजन के साथ ही पृष्ठभूमि में चित्रित दृश्यों में वृक्ष, पशु-पक्षी, नदी, पहाड़ और आकाश का चित्रण होता है। आपने कई प्रकार के आकर्षक वृक्षों का चित्रण किया है। यही नहीं कुछ चित्रों में कक्ष के आन्तरिक दृश्य को भी दिखाया है। इस प्रकार यह विदित होता है कि आपको मानवीय संवेदनाओं के साथ प्रकृति के प्रति भी प्रेम था। मानवाकृतियों और दृश्य चित्रण में समुचित समन्वय दिखाई देता है।

नारायण श्री धर बेन्द्रे (21 अगस्त, 1910-1992)

नारायण श्रीधर बेन्द्रे समकालीन कलाकारों में अन्तरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कलाकार रहे हैं। आपका जन्म 21 अगस्त, 1910 को एक महाराष्ट्रीय ब्राह्मण परिवार में हुआ। आपके पिता श्रीधर बलवन्त बेन्द्रे इन्दौर के ब्रिटिश रेजीडेन्ट के कार्यालय में क्लर्क थे। चौदह भाई बहनों में नारायण श्रीधर इनके तीसरे नम्बर के पुत्र थे। नन्दलाल पुरा में मकान था और वहीं आड़ा बाजार में शेवड़े के बाड़े में लगने वाले मराठी स्कूल में चौथी कक्षा तक पढ़ाई की। बालक बेन्द्रे को बचपन से ही चित्र तथा मिट्टी की प्रतिमाएँ बनाने में रूचि थी। इन्हें प्रेरित करने में त्योहारों पर बनने वाली पारम्परिक कला रंगोली गोकुल अष्टमी पर कृष्ण, बलराम गायें आदि की मूर्तियाँ बनाने तथा नागपंचमी पर नाग-नागिन के चित्रों का सहयोग रहा।

1929 में मैट्रिक किया। स्कूल में हॉकी टीम के कैप्टन भी रहे। उन्होंने एलीमेन्ट्री तथा इण्टर ग्रेड की परीक्षाएँ भी उत्तीर्ण कीं। 1929 में बेन्द्रे को इन्दौर कला विद्यालय में प्रवेश मिला। उस समय वहाँ के प्रधान शिक्षक दत्तात्रेय दामोदर देवलालीकर थे। तत्कालीन विद्यार्थियों में भाऊ समर्थ, खोत, सत्तू, जाधव, तेन्दुलकर, नारायण पेढ़ारकर, सोलेगांवकर, मनोहर जोशी तथा डी.जे. जोशी थे। आपके गुरू देवलालीकर जी ने विद्यार्थियों को प्रातः काल, दोपहर, संध्याकाल तथा रात्रि में वास्तु चित्रण तथा स्थानों का चित्रण कराया। इस प्रकार प्रकाश में बदलते रंगों से अवगत हुए। 1933 में आगरा विश्वविद्यालय से स्नातक किया। कला गुरु देवलालीकर से शिक्षित होकर मुम्बई कला विद्यालय से 1934 में डिप्लोमा किया। जिप्सी के वेश में भाई का चित्र ‘घुमक्कड़’ को रजत सम्मान प्राप्त हुआ। 1935 में ‘गली का आकर्षण’ को रजत पदक प्राप्त हुआ। बॉम्बे आर्ट सोसायटी में एक दृश्य चित्र भी पुरस्कृत हुआ।

चौथे दशक के अन्तिम वर्षों में कश्मीर सरकार के विजिटर्स ब्यूरो में चित्रकार और पत्रकार के पद पर कार्यरत रहे। यहाँ पर फूलों की घाटी के मनोरम दृश्य चित्र व रेखांकन किये। जिस समय आप इन्दौर में अध्ययन कर रहे थे उस समय होल्कर कॉलेज के आस-पास का परिवेश वहाँ के प्राकृतिक सौन्दर्य निःसन्देह जिसमें देवगराड़िया की टेकरी भी थी ने बेन्द्रे को अपनी ओर खींचा वे प्रकृति के खुले वातावरण का लुत्फ उठाते हुए प्रारम्भिक दृश्य चित्र बनाते रहे।

1936 में आप अपने मित्र के साथ कश्मीर गए वहाँ अनेकों चित्र बनाने के पश्चात गुलमर्ग की प्रदर्शनियों में इन्हें प्रदर्शित किया। उन्हें कश्मीर दर्शनार्थी संघ का सदस्य मनोनीत किया। यहाँ उन्हें लगा कि भारत में चलने वाले कला आन्दोलनों से कट गए हैं, तो उन्होंने मुम्बई में आने का विचार किया। यहाँ आकर फ्रीलांस चित्रकार की तरह कार्य किया। यहाँ पर आपने फिल्म जगत में कोयम्बतूर के एक स्टूडियों में कार्य किया इससे सन्तुष्ट न होने पर सर्विस छोड़ दी और चित्रों के जरिए अपनी जीविका चलाने का प्रयास किया। 1944 में इन्दौर साहित्य सभा ने उपलब्धियों के कारण उनका अभिनन्दन किया। ‘भारत छोड़ो’ शीर्षक चित्र पर 1946 में आर्ट सोसायटी ऑफ इण्डिया मुम्बई ने उन्हें ‘पटेल ट्रॉफी’ प्रदान की। 1945 में बेन्द्रे शान्ति निकेतन गए वहाँ उन्हें मुम्बई तथा इन्दौर से भिन्न पद्धति में कार्य करने को मिला। यहाँ पर उनकी कल्पना, सृजन एवं चिन्तन शक्तियों को लाभ मिला। 1947 में अमरीका गए वहाँ अनेक कलाकारों की कृतियों को देखा ग्राफिक तथा सिरेमिक कार्यशालाओं में भाग लिया। न्यूयॉर्क में चित्रों की प्रदर्शनी की। ‘आर्टिस्ट पत्रिका’ में ससम्मान चित्र छपा। इसके पश्चात हॉलैण्ड तथा पेरिस भी कला यात्रा पर गए। 1948 में पुनः स्वतंत्र भारत की धरती पर आए।

भारतीय कलाकारों पर पश्चिमी प्रभाव को लेकर उनका कहना था। “भारतीय कलाकारों पर पश्चिमी प्रभाव तब भी था और अब भी है। आधुनिक कला अनुसरण के जिन विचारों से सृजित हो रही है, मैं उनसे सहमत नहीं हूँ, इसलिये मैंने अपने ढंग से कार्य करने का निश्चय किया है। मेरी मान्यता है कि मैं ऐसा सृजन करूँ जिसमें से भारतीयता की गन्ध आती हो। कलाकार को चाहिए कि अपने विवेक तथा ज्ञान से सदैव ऐसा काम करे जो नया तो हो ही, मूल्यवान कलाकृति भी कहला सके।” 1950 में बड़ौदा में महाराजा सियाजीराव विश्वविद्यालय में ललितकला संकाय के रीडर तथा चित्रकला विभाग के अध्यक्ष पद पर बेन्द्रे की नियुक्ति हुई। 1959 ई. से 1966 तक (त्याग पत्र देने तक) आप ललित कला संकाय के डीन रहे। यहाँ रहकर आपने छात्रों को संस्कृति केे स्वरूप को समझने तथा आपने कलात्मक व्यक्तित्व में आत्मसात करने को प्रेरित किया। उन्होंने सुयोग्य शिक्षक व मार्ग निर्देशक की सफल भूमिका निभाई। ज्योति भट्ट, त्रिलोक कौल, शान्ति दवे, जी.आर. सन्तोष, रतन परिमू, गुलाम मोहम्मद शेख आदि प्रमुख शिष्यों में से थे। बडौदा में भी आपने नये-नये प्रयोग किये। 1960 तथा 1962 में अमूर्त शैली के चित्रों की प्रदर्शनी की। वे चीन, जापान, मध्यपूर्व तथा अमरीका भी गए वहाँ की कला परम्पराओं को समझने का प्रयास किया। इसके पश्चात चेकोस्लोवाकिया, टोरन्टो, यूगोस्लाविया, पोलैण्ड आदि देशों और भारत के महानगरों में प्रदर्शनियाँ की। 1969 में भारत सरकार ने ‘पद्म श्री’ उपाधि से विभूषित किया। 1971 में भारत में आयोजित द्वितीय त्रिनाले के जूरी के चेयरमेन चुने गए। 1974 में आपको राष्ट्रीय ललित कला अकादमी की फेलोशिप प्राप्त हुई। 1978 में खैरागढ़ यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर बने। पश्चिम बंगाल के विश्व भारती विश्वविद्यालय ने 1982 में ‘गगन अवनी अवॉर्ड’ से सम्मानित किया। 1983 में इन्दिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ (मध्य प्रदेश) से डी.लिट की मानद उपाधि देकर सम्मानित किया। 1984 में इन्दौर की आर्ट कम्यून नामक संस्था ने आमंत्रित कर सम्मानित किया। वे मुम्बई में रहते हुए भी मालवा को कभी नहीं भूले। वे मालवा के ग्रामीण अंचलों में आकर स्वयं को सन्तुष्ट पाते थे। उन्हें मध्य प्रदेश में माण्डव, पंचमढ़ी, शिवपुरी का नेशनल पार्क, कान्हा पार्क, बाघ की गुफाएँ तथा भीम बेटका बहुत पसन्द थी।

उनकी दृष्टि प्रकृति सौन्दर्य को तलाशती रहती थी। वे कला मर्मज्ञों एवं विद्यार्थियों को सदैव प्रेरित करते रहते थे। कला की सेवा करते हुए 1992 में आपका देहावसान हो गया।

कला शैली

श्री नारायण श्री धर बेन्द्रे ने अनवरत रूप से चित्रकर्म में रत रहते हुए निजी शैली विकसित की। उनकी जीवन शैली में प्रातः उठकर घूमने जाना, समाचार पत्र पढ़ना, स्नान नाश्ते के बाद चित्रण कार्य करना शामिल है। वे लगभग पाँच घंटे तक चित्रण कार्य अनिवार्य समझते हैं। उन्हें करीने से कार्य करना पसन्द है।

आपके चित्रों में रंग और प्रकाश की सौम्यता और आकर्षक रंगयोजना के दर्शन होते हैं। उनका कहना है कि “कला में शब्द नहीं उसमें रंग ही प्राथमिक महत्व की चीज हैं।” आपको सदैव चटख रंग पसन्द थे। विभिन्न समय में उनकी शैली बदलती रही। आपकी सम्पूर्ण कलायात्रा में तीन रूप दिखाई देते हैं-

1. वाश तथा ग्वाश पद्धति में बने दृश्य चित्र

अभिव्यंजनावादी शैली में बने दृश्य चित्र जो कि बनारस, हरिद्वार, कश्मीर तथा इन्दौर में बने हैं। चित्रों में प्रकृति का मौन सौन्दर्य प्रकाश व रंगों की ताजगी के साथ उपस्थित है।

2. टेम्परा पद्धति

शान्ति निकेतन की यात्रा के पश्चात टेम्परा विधि में रेखांकन का कुशल प्रयोग दिखाई देता है। इस समय के चित्र भी दो प्रकार के थे प्रथम मानवाकृतियों से सम्बन्धित और द्वितीय स्टिल लाइफ से सम्बन्धित। जल रंग, पेस्टल रंग, तेल या श्वेत श्याम रंगों से रंग आत्मविश्वास के साथ ज्वलन्त रूप में प्रस्तुत किये हैं। इसी समय बेन्द्रे ने बिन्दूवादी चित्रों का सृजन किया किन्तु सोरां से पृथक बड़े-बड़े तूलिकाघातों के साथ टोन, रंग व टेक्सचर का अनूठा प्रयोग।

3. अमूर्त अभिव्यंजनावादी प्रविधि

आपने 1960 के पश्चात अमूर्त अभिव्यंजनावादी प्रयोग किये बेन्द्रे तकनीकी औपचारिकता में विश्वास नहीं करते थे। वे मानते थे कि “मेरा ध्येय एक तो यह कि दूसरों से सम्भाषण कर सकूँ तथा दूसरा कला के माध्यम से स्वयं को व्यक्त कर सकूँ।”

प्रमुख चित्र- सहेलियाँ, कुएँ से पानी खींचती युवतियाँ, प्रतीक्षा गपशप, शृंगार, माँ बेटा, रूप विन्यास, श्रमिक, रंगोत्सव, हारमनी, स्टिल लाइफ, गन्ने वाली, उदासी, झूला और मुर्गियाँ, इसके अलावा नयनाभिराम दृश्य चित्र एवं रेखांकन आदि।

आपके चित्र नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट व ललित कला अकादमी नई दिल्ली, बड़ोदरा, चेन्नई व बंगलुरु म्यूजियम, ललित कला अकादमी मैसूर, सालरजंग म्यूजियम, हैदराबाद, एशिया इंस्टीट्यूट न्यूयार्क आदि स्थानों पर संग्रहित हैं।

विष्णु चिंचालकर (जन्म 1917)

मध्य प्रदेश के ख्याति प्राप्त कलाकार जो 1917 में देवास में जन्मे और इन्दौर कला विद्यालय से शिक्षित, गुरूजी के नाम से पहचाने जाने वाले कलाकार रहे हैं। आपने मुम्बई जी.डी. आर्ट से डिप्लोमा प्राप्त किया। आपने पर्यावरण से जुड़कर प्रकृति के प्राकृत रूपों को कला सौन्दर्य के रूप में देखा। प्रकृति में प्राप्त वृक्षों की छाल, लकड़ी की छीलन, वृक्षों की जड़, तना, सूखी विभिन्न रंगों की पत्तियाँ, टाट, तार की जाली, भुट्टा, सीप आदि का उपयोग कर कलाकृति बनाई। इन वस्तुओं से बिम्बाकृतियों का निर्माण किया। बोलते अक्षर में अक्षरों का पशु-पक्षियों, मछलियों, पुष्पों से सुशोभित किया। आपको रेखांकन करना बहुत पसन्द था। आप व्यक्ति चित्र बनाने में भी निपुण थे। आपने बच्चों के लिये कई चित्रात्मक पुस्तकें लिखी। वृक्ष संरक्षण के अभियान में संलग्न रहे। आपने चित्रकला के क्षेत्र में अनेकों समान प्राप्त किये। कोलकाता, दिल्ली, पटना, ग्वालियर में सम्मान के साथ स्वर्ण पदक भी प्राप्त किया। आपकी कलाकृतियाँ भारत भवन, कला स्कूल इन्दौर और अन्य कई स्थानों पर संग्रहित हैं। आपके व्यक्तित्व और कृतित्व पर डॉक्यूमेंट्री फिल्म भी बनाई गई है। अपने कार्यों से आपने कला जगत मध्य प्रदेश को सर्वोच्च स्थान दिलाने का प्रयास किया है। आपके व्यक्तित्व और कृतित्व का विस्तृत वर्णन अध्याय-चार और अध्याय-पाँच में किया गया है।

श्री डी.जे. जोशी (07 जुलाई 1911-1984 ई.)

देवकृष्ण जटाशंकर जोशी मध्य प्रदेश के महेश्वर में 07 जुलाई, 1911 के ब्राह्मण परिवार में जन्मे, लेकिन जोशी होते हुए भी ज्योतिष विद्या या कर्मकाण्डों में कभी रूचि नहीं थी। बचपन से ही नदी किनारे घूमना, सीप और आकर्षक वस्तुएँ एकत्रित करने का शौक था। नदी, पोखरों में तैरना, कुश्ती आदि उन्हें अधिक पसन्द था। बचपन से ही आपको चित्रकला का शौक था। कला शिक्षा के लिये इन्दौर कला विद्यालय गए, वहाँ कलागुरू देवलालीकर जी से कला शिक्षा प्राप्त की। सन 1933 में मुम्बई से जी.डी. आर्ट की उपाधि प्राप्त की।

आप एन.एस.बेन्द्रे, मनोहर जोशी के सहपाठी रहे हैं। आप मध्य प्रदेश परिदृश्य के ऐसे मंझे हुए कलाकार रहे हैं, जिनका कार्य क्षेत्र मध्य प्रदेश रहा और वे मालवांचल को छोड़कर कहीं बाहर नहीं गए। आप प्रसिद्ध दृश्य चित्रकारों में से एक हैं। इन्दौर, महेश्वर, नेमावर, धार तथा निमाड़ अंचल को दृश्य चित्रों में संजोया। आपके प्रारम्भिक दृश्य चित्र जलरंग में वाश शैली से बने थे। और बाद में चित्रों में छाया प्रकाश के कारण रंगों की प्रभाववादी झिलमिलाहट आ गई। अतः आपको मालवा के प्रभाववादी और प्रभावोत्तर वादी कलाकार के रूप में जाना गया। आपके चित्रों के रंग राजस्थान शैली के चित्रकारों की भाँति दमककते हुए लगाए हैं। आपके चित्र यथार्थवादी न होकर आभासात्मक शैली के हैं।

इन्दौर कला महाविद्यालय में आपकी कृति को र.कृ. फड़के जी ने देखा। इस मुखाकृति को देख फड़के जी बहुत प्रभावित हुए और देवलालीकर जी से आग्रह कर धार ले गए। वहाँ पर जोशी जी को शिल्पकला की शिक्षा प्राप्त हुई। उन्होंने देवी अहिल्याबाई की मूर्ति तथा अन्य कई मूर्तियों की रचना की। हजारों की संख्या में चित्रों को बनाया। आपकी इन श्रेष्ठताओं के कारण अनेक पदकों और सम्मानों से विभूषित किया गया। आपकी कृतियाँ शासकीय तथा व्यक्तिगत संग्रहालयों से संग्रहित हैं। आपने धार में प्रथम प्राचार्य और आर्ट स्कूल, इन्दौर में प्राचार्य के रूप में 1952-1968 तक सेवाएँ दी।

आपकी प्रमुख कृतियों में लाल पगड़ी, साप्ताहिक बाजार, भिखारी जलमहल उदयपुर, धार की एक गली, टोकरियाँ, चूड़ियाँ खरीदती दुल्हन, चौपाटी विजेता, नार्वे, गौरी त्योहार, ओंकारेश्वर, कुएँ पर तथा अन्तिम चित्र नेमावर है।

आपकी पहचान मध्य प्रदेश के दृश्य चित्रकारों में है। अतः आपने यहाँ के परिदृश्य को चित्रों के जरिये संजोेने की कोशिश की है। आपकी कला का विस्तार से वर्णन अध्याय-चार एवं पाँच में किया गया है।

मकबूल-फिदा हुसैन (17 सितम्बर, 1915- देहावसान 09 जून, 2011)

भारत के ‘पिकासो’, ‘पद्मश्री’, और ‘पद्मभूषण’ से अलंकृत मकबूल फिदा हुसैन भारत में ही नहीं बल्कि अन्य देशों में भी चर्चित रहे हैं। घोड़े को अनेक रूप से चित्रित करने वाले प्रसिद्ध चित्रकार थे। आपका जन्म 17 सितम्बर, 1915 को महाराष्ट्र के पंढ़रपुर जिले के शोलापुर में हुआ। माँ जैनब के देहान्त के पश्चात आपके पिता परिवार सहित इन्दौर आ गए। आपकी प्रारम्भिक शिक्षा इन्दौर में हुई। आपने इन्दौर के कला स्कूल में प्रवेश लिया। किन्तु आप यहाँ पूरी पढ़ाई नहीं कर पाए। मात्र एक वर्ष तक ही यहाँ रह कर शिक्षा अर्जित की। शेष शिक्षा आपने स्वयं चित्र कार्य में रत रहते हुए अर्जित की। आपने बहुत गरीबी में भी दिन व्यतीत किये। फुटपाथ पर रहे लेकिन जागरूक रहे। अनेक कष्टों का सामना करते हुए आपने 1935 में मुम्बई के जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स में प्रवेश लिया। 1947 तक आप छोटे-बड़े काम करते हुए चित्रकर्म से जुड़े रहे। सिनेमा के बैनर्स, पोस्टर बनाये, फर्नीचर और खिलौने के डिजाइन किये। प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप की स्थापना होने पर सूजा, आरा, रजा तथा गायतोंडे के साथ संस्थापक सदस्य बने। 1940 के दशक में पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। 1947 में पहली पेंटिंग प्रदर्शनी ‘सुनहरा संसार’ बाम्बे आर्टस सोसायटी में लगाई। आपकी दृश्य चित्रण में रुचि थी। आपने गुजरात के अनेकों दृश्य चित्र प्रभावशाली शैली में बनाये। उस समय उन्होंने प्रभाववादी शैली के चित्र देखे नहीं थे। 1941 में फाज़िला से शादी हो गई। आपने एक फर्नीचर वाले के यहाँ डिजाइनर की नौकरी की। सन 1946 में नौकरी छोड़ दी और जलरंगों में दृश्य चित्रण करने लगे। ‘पैग’ में स्थापक सदस्य होने के बाद उन्होंने अपनी शैली निर्मित की।

1953 में वे यूरोप भ्रमण पर गए और 1954 में ललित कला अकादमी, नई दिल्ली ने उन्हें एमिनेंट आर्टिस्ट के रूप में मनोनीत किया। 1955 में उन्हें ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया। इसके बाद आपने बहुत काम किया और प्रदर्शनियों का सिलसिला चल निकला। टोकियो, रोम, न्यूयार्क आदि में प्रदर्शनियाँ आयोजित की। 1971 में ब्राजील के ‘साओपाओलो’ में पिकासो के साथ हुसैन के चित्र प्रदर्शित हुए। उनकी एक फिल्म ‘Through eyes of a painter’ 1967 में बनी, जिसे गोल्डन बियर पुरस्कार मिला।

भारत सरकार ने पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया। श्री हुसैन प्रगतिशील चित्रकार के रूप में जाने जाते हैं। आपने अनेक शैलियों में कार्य किया। जैसे यथार्थवादी, घनवादी तथा अमूर्त शैली आदि। आप प्रागैतिहासिक चित्रों की रेखाओं से प्रभावित हुए। आकृतियों में सरलता और रेखाओं की बोल्डनेस दिखाई देती है। इनकी रंग योजना चटख रंगों की है। यह प्रेरणा उन्हें भारतीय लघु-चित्रों से मिली। वे छाया प्रकाश के बजाय विरोध मूलक रंगों को चौड़े-चौड़े स्पर्शों से लगाते थे। उन्होंने भारतीय नारी को विभिन्न रूप में देखा। मदर टेरेसा, माधुरी दीक्षित से प्रभावित होकर ‘गजगामिनी’ इस नाम से एक फिल्म बनाई। हुसैन ने तब्बू और अमृता राव पर एक फिल्म बनाने की सोची। आपने ममता बनर्जी पर ब्लैक एंड व्हाइट पेंटिंग बनाई।

1978 में सूफी पेंटिंग पर प्रदर्शनी लगाई। 1986 में राज्यसभा में सदस्य मनोनीत किया। 92 वर्ष की उम्र में उन्हें केरल सरकार ने ‘राजा रवि वर्मा पुरस्कार’ से सम्मानित किया। आपने घोड़ों से प्रभावित होकर अश्व-सीरीज बनाई। इसमें घोड़ों की मनःस्थिति, गतिशीलता, शक्ति को प्रदर्शित किया। मदर टेरेसा पर आपकी बहुत श्रद्धा थी। हुसैन किसी शैली से बंध कर नहीं रहे। स्वच्छन्द रूप से कार्य करने में आपको अच्छा लगता था। आपका स्टूडियों भी कभी एक नहीं था। कभी वे दिल्ली रहते कभी मुम्बई तो कभी कोलकाता।

जब ईराक पर युद्ध थोपा गया वहाँ जो नरसंहार हुआ। उससे आहत होकर आपने चित्र बनाये और अपने चित्र में मित्र सेनाओं पर व्यंग्य भी किये। श्री हुसैन जितने विराट रहे हैं उन्हें कुछ पक्तियों में बाँधना अति दुष्कर कार्य है।

भारतीय समकालीन चित्रकारों में सबसे चर्चित चित्रकार रहे हैं कभी नंगे पैर चलने के कारण और वातानुकूलित कक्षों में पेंटिंग बनाने के कारण, कभी भारत छोड़कर विदेश में रहने के कारण तो कभी भारतीय भगवान सरस्वती के चित्र बनाने के कारण, तो कभी सबसे महंगी पेंटिंग बिकने के कारण। बैटल ऑफ गंगा एण्ड यमुना महाभारत नाम की पेंटिंग 6.50 करोड़ में बिकी। लन्दन में 09 जून, 2011 को आपका देहावसान हो गया।

श्री सैयद हैदर रजा (जन्म 1922 में)

सैयद हैदर रजा ने मध्य प्रदेश की समकालीन कला के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया और अपनी विशिष्ट पहचान बना कर विदेश में भी ख्याति अर्जित की। मध्य प्रदेश सरकार द्वारा 1978 में शिखर सम्मान से सम्मानित किया गया। आधुनिक भारतीय चित्रकला में प्रशस्ति में कहा है- “रजा ने कभी सतही नाटकीयता का सहारा न लेकर मध्य प्रदेश में बिताये गए बचपन की यादों, नर्मदा उद्गम के पास की रातों के रहस्य, आदिवासी हाट बाजारों की जीवन्तता, राजस्थानी मिनियेचर कला की सूक्ष्मता एवं प्राच्य दर्शन का अद्वैत लेकर कला के लिये ऐसा समृद्ध और अद्वितीय आधार लोक अर्जित किया है जो ऊर्जा और दृढ़ता में अप्रतिम है। हम सैयद हैदर रजा को अदम्य सृजनशक्ति, निर्भीक समकालीनता और अपने उद्गम से अटूट सम्बद्धता के लिये सम्मानित करते हैं।”

रजा का जन्म मध्य प्रदेश के दमोह कस्बे में हुआ था। 1939 से 1942 तक आपने नागपुर स्कूल ऑफ आर्ट में शिक्षा ग्रहण की। इसेक पश्चात मुम्बई के सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट में कला में डिप्लोमा प्राप्त किया। उसके बाद फ्रांस की राजधानी पेरिस के एकोलन सियोनाल देबोजार में 1950 से 1953 तक शिक्षा ग्रहण की और भारत लौट आए।

प्रकृति के सानिध्य में गोंड कबीले आदिवासियों के नृत्य, त्यौहार, हाट बाजार के बीच आपका बचपन बीता। सूर्य, नर्मदा का जल और हरीतिमा युक्त प्रकृति के बिम्ब उनके साथ सदैव रहे। रजा को अपना गाँव सदैव याद आता रहा। यही कारण रहा कि अब वे अपने गाँव में पेरिस से आने के बाद पुनः बस गए और मध्य प्रदेश की भूमि को सृजन भूमि बनाने में सहयोग किया।

आप प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप के सक्रिय सदस्यों में से हैं। आपने आधुनिक कला के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। आपकी कला दृश्य चित्रण से प्रारम्भ होकर बिम्बों पर आकर ठहरती है। मालवा के चटख रंग और रेखाओं की बोल्डनेस आपके चित्रों की विशेषता थी। आपके चित्र दर्शकों पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव छोड़ते हैं। चित्रों में वैज्ञानिक सिद्धान्तों का परिपालन किया है।

‘काला सूरज’ एक ऐसी ही कृति है। जब हम नेत्रों से सूर्य को देखते हैं फिर आँखें बन्द करते हैं तो जो सबसे अधिक चमकीला भाग होता है वह काला दिखाई देता है और उस परिमण्डल के चारों ओर की आभायें नीली हरी प्रतीत होती हैं। इसी अवधारणा को लेते हुए यह चित्र बनाया है।

एक अन्य कृति माँ में मानवता के पदचिन्ह देखे। इसके पश्चात उनकी कृति अमूर्तन की ओर प्रवृत्त हुई। कला का प्रारम्भ दृश्य चित्रों से होता है और बाद के चित्र बिम्बात्मक स्वरूप धारण करते हैं। आपके विषयों में ‘बिन्दु’ और सूर्य को लेकर अनेक चित्र बनाये।

रंग प्रयोग में रजा के रंग हमारी मानसिक जटिलताओं तथा प्राकृतिक रहस्यात्मकता से साक्षात्कार कराते हैं। उनके रंग अलंकारिक न होकर अनुभव और व्यवहारजन्य होते हैं। आपके चित्रों में चारों तरफ बनाई गई रंगों की पट्टी लघु चित्रों से प्रेरित दिखाई देती है। सफेद, नारंगी, पीला, लाल और काला रंग आपको पसन्द है। वे कभी चटख तो कभी धूमिल रंगों का प्रयोग करते हैं। उनके चित्रों में गहराई है जो हमें दूर तक झांकने में सहायक है।

प्रदर्शनी- आपने अनेकों एकल एवं सामूहिक कला प्रदर्शनियों में भाग लिया। जिसमें गैलरिये ओस्लो स्विट्जरलैण्ड 1980, लोब गैलरी बर्न स्विट्जरलैण्ड 1982, गैलरी कैमोल्ड मुम्बई 1984 एवं 1990 तथा नॉर्वे में प्रदर्शनी की। 1981 से 1988 तक अनेकों सामूहिक प्रदर्शनियों में भागीदारी की। अधिकाशतः विदेशी प्रदर्शनियाँ थी। डेनमार्क, लन्दन, ऑक्सफोर्ड, पेरिस, न्यूयार्क, स्विट्जरलैण्ड, फ्रांस, कोरिया तथा भारत आदि देशों में प्रदर्शनियाँ की।

उपलब्धियाँ- प्रिदला क्रितीक, पेरिस 1956, पद्मश्री भारत सरकार 1981, शिखर सम्मान मध्य प्रदेश सरकार, ललित कला अकादमी के रत्न सदस्य (फेलो) 1983

प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप के सदस्य रहकर आपने युवा पीढ़ी को अमूर्त शैली की राह दिखाई। आपकी जड़ें मध्य प्रदेश में हैं। कला रूपी वृक्ष को पल्लवित होने के लिये मध्य प्रदेश में ‘रजा पुरस्कार’ आपके द्वारा दिया जाता है। यह कला जगत के लिये महत्त्वपूर्ण योगदान है। आपका अधिकांश समय विदेश में व्यतीत हुआ। फिर भी आप भारत खासकर भोपाल अवश्य आते हैं।

स्व. श्री मुकुन्द सखाराम भाण्ड (अप्रैल 1984)

मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में कला परिदृश्य में स्व. श्री मुकुन्द सखाराम भाण्ड का महत्त्वपूर्ण स्थान है। चित्रकला की मशाल जलाए रखने वाले श्री मुकुन्द सखाराम भाण्ड का जन्म अप्रैल 1884 को महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण परिवार में हुआ। जीवन संघर्ष में रत होते हुए 1908-1909 में आपकी प्रारम्भिक शिक्षा रायपुर (जो अब छत्तीसगढ़ प्रदेश है) में हुई। सन 1918 में आप ग्वालियर आये और यहाँ आपने ‘लक्ष्मी पेंटिग हाउस’ की स्थापना की। आपने चित्रकला की व्यवस्थित शिक्षा प्राप्त नहीं की, किन्तु कला के प्रति नैसर्गिक अभिरुचि के कारण उनके हाथों में तूलिका आ गई। रंगोली फोटोग्राफी, मूर्तिकला के साथ-साथ आप चित्रकला में भी निपुण थे। आपकी कला को निखार तब मिला, जब बाघ गुफाओं के चित्रों की प्रतिकृतियों के निर्माण की योजना बनी। उनमें उनका मार्गदर्शन नन्दलाल बसु, वी.ए. आप्टे, ए.बी. भोंसले, एस.एन. धर तथा असित कुमार हल्दार जैसे कलाकारों के साथ श्री भांड को भी चुना गया।

सन 1931 में जब देश में क्रान्ति की लहर फैली, उसका प्रभाव भाण्ड की कला पर भी पड़ा। उन्होंने इस अवधि में ‘राष्ट्रयज्ञ’ और ‘नेता’ जैसी कालजयी कृतियों का निर्माण किया। श्री भाण्ड की यह राष्ट्रीय भावना उनकी परिस्थितियों तथा वातावरण के प्रतिकूल थी। बालचर संस्था में कुछ समय सेवा करने के पश्चात सन 1939 में श्री भाण्ड ने स्कूल ऑफ आर्ट खोला और कला की शिक्षा देने लगे। इससे पूर्व उज्जैन में 1953 तक रंगमहल में कला शिक्षा प्रदान की।

स्व. श्री भाण्ड ने इस काल में प्रचलित पौराणिक आख्यानों पर चित्रांकन करना उचित नहीं समझा, बल्कि वह अपने विषय नये भाव बोध को प्रमुखता देते रहे। इससे उनकी चित्रकला अन्य चित्रकारों से भिन्न और मौलिक दिखाई दी। ‘प्रलोभन’ शीर्षक से बना उनका चित्र गम्भीर चिन्तन, प्रशस्त कल्पना तथा उच्चकोटि की चित्रकला का उदाहरण प्रस्तुत करता है। माया का अदम्य आकर्षण, उसके प्रति आकर्षित होने वाली चेष्टाएँ तथा परिणति, साथ ही निर्लिप्त वीतराग द्वारा इस माया प्रपंच की वास्तविकता का दर्शन एक ही चित्र में एक खण्डकाव्य के समान दर्शक के सामने मूर्तिमन्त हो जाता है।

स्व. भाण्ड ने समाकालीन विषयों, पर आधारित अनेक चित्रों का निर्माण किया। इसमें नन्दनवन, सुहागरात, इक्कसवीं वर्षगांठ, छोटा भाई- जेठा भाई, जैसी कृतियाँ महत्त्वपूर्ण हैं। छोटा भाई-जेठा भाई चित्र में दो बछड़ों को गले मिलते हुए दिखाया है। यह पेंटिंग देखकर भ्रातप्रेम की भावना स्वतः साकार होती है। इस प्रकार उनके चित्रों में नायक राजा-रानी नहीं बल्कि पशु-पक्षी और प्रकृति चित्रण को महत्व दिया। 61वीं वर्षगांठ पर वृद्ध दम्पति के बीच 40-50 वर्ष पूर्व के जीवन की स्मृति से उत्पन्न अनुराग का अंकन है।

सामाजिक विषमताओं, जीवन संघर्षों ने उन्हें करुणा पूर्ण चित्र निर्माण के लिये प्रेरित किया। तूफान में कलाकार, विदाई के क्षण, आत्महत्या का दर्शन शास्त्र, एकाकी और बेचारा पेंशनर ऐसे चित्र हैं जो सामाजिक व्यवस्था की निष्ठुरता को दर्शाते हैं। जो कि भावुक हृदय में करुण रस प्रवाहित करने में सक्षम हैं। विदाई के क्षण नामक चित्र में बेटी की विदाई का दृश्य प्रस्तुत किया है। बेचारा पेंशनर भी उनकी भावनापूर्ण कलाकृति है। उन्होंने समाज की मनोवृत्ति पर भी गहरे कटाक्ष किये हैं। आजीवन समाज के लिये कठोर श्रम करने वाले गधे को उसके वृद्ध और शिथिल होने पर असहाय छोड़ दिया गया है। पार्श्व भूमि में चिता जल रही है और गधे की पीठ में घाव है जिसे कौआ नोंच रहा है।

मध्य प्रदेश की उपलब्धियों में श्री एम.एस. भाण्ड ने आर्ट स्कूल की स्थापना कर कलाकारों को शिक्षण का स्थान दिलाया। 19वीं सदी में ऐसे कलाकार थे। जो यथार्थवादी शैली (विचारधारा) को लेते हुए चित्रों की रचना की। आपने ज्वलंत विषयों पर अपनी तूलिका चलाई। प्रयोगधर्मी चित्रकार होते हुए चित्रकला को जन सामान्य के निकट ला खड़ा किया।

रूद्रहंजीरूद्रहंजीरूद्रहंजी (7 मई 1911-1980)

रूद्रहंजी मध्य प्रदेश के नहीं होकर भी अपने मध्य प्रदेश को अपनी कर्मस्थली बनाकर इस क्षेत्र को गौरवान्वित किया। विशेष कर ग्वालियर में ही रहे। आप कुछ पारम्परिक शैलियों के पालनकर्ता थे। इसी निष्ठा ने उपयोगी कला की रचना की।

आपका जन्म 07 मई, 1911 को तारिकेरे (कर्नाटक) में हुआ था। उन्होंने मैसूर से हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की। कला की ओर रूझान था। सी.एफ. एण्ड्रयूज की शान्ति निकेतन पर लिखी पुस्तक पढ़ कर, शान्ति निकेतन जाकर शिक्षा लेने की तीव्र इच्छा जागी। 1930 में शान्ति निकेतन में प्रवेश लिया और ‘नंदलाल बसु’ से चित्रकला और रामकिंकर से मूर्तिशिल्प में प्रशिक्षण प्राप्त किया। 1936 में बसन्त महाविद्यालय बनारस में कला शिक्षक नियुक्त हुए। 1944 में पद्मा विद्यालय के कला आचार्य के रूप में ग्वालियर आए और आजीवन ग्वालियर ही रहे। 06 एवं 07 फरवरी की मध्य रात्रि उनका देहावसान हुआ।

रूद्रहंजी को आदर से ‘रूद्रप्पा’ कहकर भी बुलाते थे। आप 1954 में अखिल भारतीय प्रतिनिधिमंडल के रूप में चीन की यात्रा पर और गर्मियों में एक पहाड़ों के ऊपर गए। गर्मी के अधिकांश समय चित्रकारी और मूर्तिकला के लिये ग्वालियर में ही व्यतीत किया।

आपके घर में लगी चीनी पेंटिंग घोड़े की और मुर्गे की सबका ध्यान आकर्षित करती है। यथार्थवादी शैली में बनी पेंटिंग यौवन और शक्ति का प्रतीक है।

आपको हिमालय से अति प्रेम था। आपने पिंडारी, ग्लेशियर, केदारनाथ या बद्रीनाथ की यात्रा के दौरान कई रेखा चित्र बनाये। केदारनाथ की एक पगडण्डी पर मूर्तियों के निर्माण की कल्पना की। आपके द्वारा बनाई गई ‘झेलम के गीत’ प्रसिद्ध Scroll painting है। जिसके निर्माण में कश्मीर के इतिहास का गहन अध्ययन किया तथा कल्हण की राजतरंगिणी का अध्ययन किया।

आप विशेषतः Sculptor थे। उनके प्रमुख मूर्तिशिल्पों में ‘कुल्लू के श्रमिक’ पक्षी के साथ युवती, सरस्वती, मयूर और युवती, यक्षिणी, माँ का बेटा, छः दन्त हाथी, एक लड़की तथा पद्मा विद्यालय का अलंकरण प्रमुख मूर्तिशिल्प है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि रूद्रहंजी प्रमुख मूर्ति शिल्पकार थे।

आपने चित्रों की प्रदर्शनी सन 1939 से लगानी शुरू की। ऑल एशिया आर्ट एक्जिबिशन, नई दिल्ली में सन 1949 में और अखिल भारतीय कालिदास चित्र एवं मूर्तिकला प्रदर्शनी, उज्जैन में 1958 में लगी। आपकी सृजनशीलता के लिये सन 1979 में भारत शासन के संस्कृति विभाग ने मूर्तिशिल्प की फेलोशिप प्रदान की। सन 1974-76 में आयोजित पंचम अखिल भारतीय मूर्तिकार शिविर में आपको संयोजक बनाया गया। सन 1975 में ही आप ‘स्कल्प्टर्स फोरम ऑफ इण्डिया’ के प्रथम अध्यक्ष भी बने। मध्य प्रदेश शासन ने कला परिषद द्वारा 1975 में सम्मानित किया। आपने चीन और नेपाल की भी सांस्कृतिक यात्राएँ की। आपकी पेंटिंग्स उपलब्ध हैं।

रूद्रहंजी देश के उन गिने-चुने कलाकारों में से एक थे जिन्होंने परम्परागत चित्र-शैली को कभी नहीं अपनाया, बल्कि अपनी कल्पनाशीलता को ही मूर्तरूप दिया, ताकि नये प्रयोग किये जा सकें। उन्होंने समकालीन जीवन को स्वतः स्फूर्त और सशक्त अभिव्यक्ति दी। मूर्तिकला को निखारने के लिये आपने सीमेंट, कंक्रीट जैसे कठिन माध्यम को चुना। उसी के अनुरूप आपने निजी मानवीय अनुपात की रचना की। उनकी कृतियाँ जीवन की अनुकृति नहीं बल्कि उसे उसकी विविधता में परिपोषित करने वाले प्रस्तर गीत हैं।

उनकी शास्त्रीय गरिमा को लयात्मक, मार्मिकता संयमित करती है। समकालीन मूर्तिकला में उनका मुहावरा अनायास ही नया है और बिना आक्रामक या विचित्र हुए प्रभावशाली और समकालीन है। समकालीन कला यत्न में परम्परा की सक्रिय और अथक रचनाशीलता के रूद्रहंजी एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण थे। आपका निधन ग्वालियर में सन 1980 में हुआ। रूद्रहंजी की जीवन्त मूर्तियाँ पद्मा विद्यालय में स्थित इमाम बाड़े में देखने लायक हैं।

एल.एस. राजपूत (जन्म 1919-1935)

आपका जन्म 06 अक्टूबर, 1919 को एक राजपूत परिवार में हुआ था। 1935 में जी. डी. आर्ट मुम्बई से डिप्लोमा लिया। इनके शुरुआती कामों पर बंगाल स्कूल का प्रभाव दिखाई देता है। वाश शैली में बनाये चित्रों में मिनिएचर अलंकरण भी है। आपने अमूर्त शैली में भी कार्य किया है। उनका अमूर्तन कोरा अमूर्तन नहीं है। उनके व्यव्हृत आकार वजनदार, रंग स्फूर्त और सौम्य हैं तथा उनका पूरा कलेवर संवेदनशील बन पड़ता है। इसके अलावा बहुत छोटे आकार के कागजों पर अमूर्त चित्रण जल रंग से चित्रण किये हैं। अमूर्त शैली की 70 चित्रों की शृंखला अमूर्त शैली का विशिष्ट पक्ष है। ‘वर्षा का आगमन’ श्रेष्ठ चित्रों में से है।

आपके कृतित्व के आधार पर 1969 में ‘वरदा उकील सम्मान’ से सम्मानित किया। मध्य प्रदेश में गणतंत्र दिवस पर 1959,60,62,64 में प्रथम पुरस्कार मिला। Agri expo 1977 से भी मध्य प्रदेश मण्डप पर द्वितीय पुरस्कार मिला।

1971 में टोक्यो त्रिनाले तथा अन्य अनेकों एकल और सामूहिक प्रदर्शनियों में भाग लिया। इस प्रकार आपने मध्य प्रदेश की आधुनिक प्रयोगवादी कला के विकास के लिये महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मध्य प्रदेश के कला परिदृश्य में प्रभात नियोगी, चन्द्रेश सक्सेना, बसन्त मिश्र, विजय मोहिते, लक्ष्मण भाण्ड, शम्भूदयाल श्रीवास्तव, बसन्त धुमाल तथा देेवेन्द्र जैन ने आधुनिक कलारूपों के नवीन प्रयोग किये।

श्री विष्णु श्री धर वाकणकर (05 मई 1919-4 अप्रैल 1988)

मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में जन-जागृति लाने वाले श्री विष्णु श्रीधर वाकणकर का जन्म 05 मई, 1919 को नीमच श्री सिद्धनाथ वाकणकर के यहाँ हुआ था। समकालीन कलाक्षेत्र में आपकी पहचान पुरातत्वाविद और चित्रकार के रूप में है। कलागुरू के रूप में आपको श्री यावलकर जी और श्री मुकुन्द राव जी भाण्ड का सानिध्य मिला। आपने डी.जे जोशी से कला की शिक्षा प्राप्त की। पुरातत्व की ओर झुकाव होने का मुख्य मार्ग आपके चाचा अनन्त राव ने प्रशस्त किया, जो भूगोल विषय के प्राध्यापक थे। आपने सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट, मुम्बई से डिप्लोमा प्राप्त किया। 1953 में भारतीय ‘कला भवन’ उज्जैन का प्रारम्भ किया। श्री रामचन्द्र केशव अम्बेडकर का सहयोग भी प्राप्त हुआ। आपके शिष्यों में सच्चिदानन्द नागदेव और जाटवा से कक्षाएँ प्रारम्भ की और बाद में मुजफ्फर कुरैशी, रहीम गुट्टीवाला, मोहन झाला, नगजी राम, श्री रामचन्द्र भावसार, शिवकुमारी रावत, जैसे महत्त्वपूर्ण शिष्य थे। कला-भवन के शिष्य मुम्बई परीक्षा देने जाते थे।

1956 में श्री वाकणकर जी को पुरातत्व में विशेष रूचि थी। आपने रामपुरा, भानपुरा में अनेक शैलाश्रयों की खोज की। भोपाल से 40 किमी. दूर औबेदुल्लागंज के निकट प्रागैतिहासिक चित्रों की खोज कर अपूर्व सौन्दर्य को संसार के समक्ष लाए। भीमबेटका आज विश्व धरोहर के रूप में ख्याति प्राप्त कर चुका है।

सन 1964 में माधव महाविद्यालय के प्राचार्य श्री शिवमंगल सिंह सुमन ने आपको पुरातत्ववेत्ता के रूप में नियुक्त किया। आपको भारत सरकार की ओर से 1977 में ‘पद्मश्री’ की उपाधि प्रदान की गई। आपका महत्त्वपूर्ण योगदान यह भी रहा कि वाकणकर जी ने उज्जैन में ‘कालीदास-समारोह’ प्रारम्भ कराया, जिसमें चित्र और शिल्पकला की प्रदर्शनी कर पुरस्कृत किया जाता है। आपने ही स्व. मास्टर मदनलाल जी की स्मृति में 02 अक्टूबर, 1968 में ‘निलय चित्रकला विद्यालय’ स्थापित किया।

इस प्रकार मालवा की कला में जन-जागृति लाने में श्री वि. श्री वाकणकर का अमूल्य सहयोग रहा है। इस जागृति के परिणामस्वरूप सन 1964 में चित्रकला विषय में एम.ए. कक्षायें प्रारम्भ की गईं और नवें दशक में कन्या महाविद्यालय दशहरा मैदान ने स्नातकोत्तर कक्षायें प्रारम्भ की।

कला और देश की सेवा करते हुए आपका देहावसान 04 अप्रैल, 1988 को सिंगापुर में हुआ।

जे. स्वामीनाथन (1928-1994)

जगदीश स्वामीनाथन को मध्य प्रदेश की आदिवासी कला को एक छत के नीचे प्रदर्शित करने का श्रेय प्राप्त है। भारत भवन में जगदीश स्वामीनाथन ने मध्य प्रदेश के सुदूर अंचलों में फैली आदिम स्वरूप की समकालीन आदिवासियों की कला को महत्व प्रदान किया। रचना कर्मियों को एकत्र कर भोपाल लाया गया। इनकी कलाकृतियों को नागर कलाकृतियों के साथ प्रदर्शित किया गया।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी जे. स्वामीनाथन का जन्म शिमला में 21 जून, 1928 को एक अय्यर परिवार में हुआ था। आप एक चित्रकार, कवि, राजनैतिक समर्थक और एक अच्छे सृजक के रूप में पहचाने जाते थे। आप प्रारम्भिक दिनों में जिद्दी प्रवृत्ति वाले व्यक्ति थे।

1943 में आप कोलकाता भाग आये। यहाँ स्वयं के खर्च की पूर्ति के लिये सिनेमा के टिकट तथा फुटपाथ पर सिले हुए कपड़े बेचे। 1947 में अरुणा आसफ अली उग्रवादियों का समर्थन किया। साम्यवादी गतिविधियों में भाग लिया और इस पार्टी के लेखन में सहयोग प्रदान किया। इन विभिन्न क्रियाकलापों के साथ चित्रांकन भी करते रहते थे। साथ ही दिल्ली की कला जगत गतिविधियों के भी सम्पर्क में रहते थे। 1958 में वारसा (पौलैण्ड) की ग्राफिक कलाओं के अध्ययन के लिये 3 वर्ष की छात्रवृत्ति प्रदान की। इसे बीच में ही छोड़कर शैलोज चित्रकार से चित्र बनाना सीखा।

1963 में समान विचारधारा वाले साथियों के सहयोग से ‘group 1890’ की स्थापना की। 1970 में ‘आर्टिस्ट प्रोटेस्ट मूवमेंट’ के सचिव रहे। कांट्रा पत्रिका का प्रकाशन भी किया। आपने देश विदेश में अपने चित्रों की प्रदर्शनी भी की। आपको ‘नेहरू-फेलोशिप’ भी प्रदान की, जिसमें देश-विदेश में घूमकर शोध कार्य करने का प्रावधान था।

धीरे-धीरे भारतीय कला गतिविधियों में महत्त्वपूर्ण सहयोग दिया। उन्हें भोपाल में रूपंकर-भारत भवन का प्रथम निर्देशक नियुक्त किया। भारत भवन का उद्घाटन 13 फरवरी, 1982 को हुआ। यह भारत भवन दृश्यकलाओं, काव्य तथा मंचीय कलाओं के प्रदर्शन, चिन्तन और सृजन का एक घर है। यह एक अभवन (non building) है, जिसमें खुले वातावरण में अधिकांश कार्यक्रम होते हैं। यह ललित कलाओं के परिरक्षण का केन्द्र है। जहाँ आदिवासी, शास्त्रीय संगीत के 2500 से अधिक रिकॉर्ड हैं। यहाँ पर अनेकों अखिल भारतीय, अन्तरराष्ट्रीय प्रदर्शनियाँ, सेमिनार, ग्राफिक्स एवं सिरेमिक कार्यशालाएँ हो चुकी हैं। 13 फरवरी, 1995 में भारत भवन के एक समारोह में मरणोपरान्त ‘कालिदास सम्मान’ प्रदान किया गया।

जे. स्वामीनाथन की कला

जे. स्वामीनाथन ने एक विशिष्ट शैली के साथ कदम रखा, जिसे वे निरन्तर निखारते चले गए। वे कैनवस पर खास रूपकारों को निखारते थे जैसे चिड़िया, वृक्ष पर्वत श्रेणियाँ, शिलाएं, वनस्पति, तंत्र रूप, मोर तथा अन्य कई रंग-बिरंगे आकार उन्होंने खास अन्दाज में फलक पर प्रस्तुत किये हैं।

स्वामीनाथन की कवितायें भी चित्रात्मक रूप दिखाती थीं। जैसे उनकी कविता दूसरा पहाड़ का कुछ अंश-

यह जो सामने पहाड़ है
इसके पीछे एक और पहाड़ है
जो दिखाई नहीं देता
धार-धार चढ़ जाओ इसके ऊपर
राणा के कोट तक
और वहाँ से पार झांको
तो भी नहीं
कभी-कभी जैसे
यह पहाड़ धुन्ध में दुबक जाता है
और फिर चुपके से
अपनी जगह लौटकर ऐसे स्थिर हो जाता है
मानो कहीं गया ही न हो।

जे. स्वामीनाथन की कला मुख्यतः चार चरणों में दिखाई देती है। प्रथम चरण 1959 के लगभग आरम्भ हुआ। इसमें प्रागैतिहासिक काल तथा आदिम टोटेमिक संकेत भाषा से मेल खाते रूप रचे। उस समय वे जादुई प्रभावों का विचार करते थे। दूसरे चरण में वे ऐसे बिम्ब संकेतों की अवधारणा करते हैं जिनका प्रभाव जादुई है। उनका ध्यान भारत की लोक आदिवासी संस्कृतियों की ओर गया। 1960 के पश्चात भारतीय मिथकों का प्रयोग किया। इनमें स्वास्तिक, कमल, लिंग, सर्प तथा हाथ की छाप प्रमुख है। तृतीय चरण में काल्पनिक ज्यामितीय चित्रण किया। इन चित्रों को उन्होंने अन्तरिक्ष की रंग ज्यामितीय (Colour Geometry of Space) कहा है। इन आकृतियों के पीछे निश्चित रूप से तांत्रिक प्रभाव है। रंग योजनाएँ हल्की और पारदर्शी हैं। धीरे-धीरे आकार भवनों के ज्यामितीय रूप में परिवर्तित हो गए। उदाहरण के तौर पर मन्दिर की रचना करने में एक चतुर्भुज के ऊपर त्रिभुज बना देते हैं। इसमें दुनिया के आध्यात्मिक अनुभव के साथ ही प्रकृति के आइने को भी प्रकट करते हैं।

1968 में आपकी चित्र शैली का चौथा चरण दिखाई देता है। इन चित्रों में, जिनका दृश्य जगत आज तक वही है, वह प्रकृति से बिम्ब चुनते हैं। उनके चित्रों मे ये सारे चित्र हैं। ये टेढ़े मेढ़े पर्वत हैं जो कोमल, पारदर्शी और उत्तुंग है और आरोह तथा शाश्वतता के प्रतीक हैं। उनके चित्रों के पर्वतखण्ड हैं, मुक्ताकाश में उड़ती चट्टानें हैं जो गुरुत्वाकर्षण को चुनौती देती हुई सन्तुलन बनाये हैं। सामान्यतः उनके चित्रों में पहाड़ की तलहटी, पहाड़ी की गोद में एक पेड़ या पुष्पित झाड़ी, बसन्त के आगमन पर जन्म लेता पौधा नाजुक तुलसी, चेरी ब्लॉसम या गुलमोहर की झाड़ी होती है जो प्रकृति के समीप लाती है।

आपका मानना है कि कलाकार को सिर्फ पश्चिमी कला आन्दोलनों की नकल नहीं करना चाहिये। उनके अनुसार-

“पश्चिम का दृष्टिकोण कभी भी भारतीयों का दृष्टिकोण नहीं हो सकता क्योंकि हम भौतिकवादी नहीं है। हमारा चिन्तन सदैव दर्शन पर आधारित रहा है। हम जीवन और जगत का अध्ययन हमेशा अध्यात्मिक स्तर पर करते रहे हैं।”

इन्हीं विचारधाराओं को लेते हुए मध्य प्रदेश के भारत भवन में आदिवासी लोक कला और नागर कला को एक जगह एकत्रित किया। आधुनिक प्रयोगधर्मी कलाकार का निधन 24 अप्रैल, 1994 को हुआ। आपकी कलाकृतियाँ आज भी आपके द्वारा किये कार्यों और विकास की याद दिलाती हैं।

वर्तमान में मध्य प्रदेश के जिन युवा कलाकारों का काम रेखांकित किया गया है वे हैं- विवेक, जया विवेक, अखिलेश, अनवर, सीमा घुरैया, श्रीधर अय्यर और शोभा घारे आदि। इस प्रकार लोक रूपकों से अपनी भाषा गढ़ते हुए मध्य प्रदेश की कला ने अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान दर्ज की है। इस प्रकार अखिल भारतीय स्तर पर मध्य प्रदेश की कला चेतना अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है।

श्री रघुनाथ कृष्णराव फड़के (27 जनरी 1884)

पद्मश्री सम्मान से विभूषित र.कृ. फड़के साहब का जन्म 27 जनवरी, 1884 को मुम्बई के थाना जिले में वसई नामक स्थान पर हुआ। आप ‘अण्णा साहब’ के नाम से जाने जाते हैं। आपके पिता थाना कोर्ट में ‘नाजिर’ थे। आप जन्मजात कलाकार थे। कला की शिक्षा विधिवत स्कूल में प्राप्त नहीं हुई। सौन्दर्यपूर्ण वस्तु का अनुकरण करके ही आपने कलाकृतियाँ निर्मित की। उन्होंने राजा रवि वर्मा के चित्रों की नकल की और मूर्तियाँ बनाने के लिये सर्वप्रथम गणेश की प्रतिमा बनाई। 1911 में हरपन हल्ली के निर्देशन में ड्रॉइंग ग्रेड- 3 परीक्षा पास की। आपने वसई में ड्रॉइंग शिक्षक और मानचित्रकार के रूप में कार्य किया।

श्री फड़के साहब मूर्तिकार के रूप में ख्याति प्राप्त तो थे ही। साथ ही चित्रकला, संगीत और ज्योतिष शास्त्र में भी रुचि थी। उनके शिष्य श्री दिनकर विश्वनाथ देव का कहना है- “श्री फड़के सभी ललित कलाओं के ज्ञाताओं के लिये उस हाथी के समान थे, जिसे अलग-अलग कलाओं के चक्षुहीन सादृश्य कलाकार अंधेरे से प्रकट हुई।”

आप कवि नाटककार भी थे। आप विशेषकर शिल्पकार रहे हैं। महाराष्ट्र में मोम की मूर्तियाँ बनाई और प्रदर्शनी लगाई। बॉम्बे आर्ट सोसायटी की प्रदर्शनी में शिल्प को स्वर्ण पदक प्राप्त हुआ। आपके द्वारा बनाये शिल्प को धार की महारानी ने बहुत पसन्द किया। उन्होंने उदाजीराव महाराज की अश्वारोही प्रतिमा बनाने के लिये धार बुलाया। तब से 1935 में आप धार आ गए और यहीं के होकर रह गए। उन्होंने खाण्डेराव की टेकरी पर स्टूडियों बनाया। लक्ष्मी कला भवन आपकी प्रेरणा से बना। आपके शिष्यों में राजा भाऊ मेहुणकर, श्री धर राव मेहुणकार, श्री दिनकर राव देव एवं शंकर राव देव है। 1961 में पद्मश्री की उपाधि से विभूषित किया तथा सन 1970 में विक्रम विश्वविद्यालय ने डॉ. ऑफ लेटर्स की उपाधि से सम्मानित किया। आप एक अच्छे शिल्पकार के रूप में चर्चित रहे हैं।

मध्य प्रदेश का आदिवासी कला परिदृश्य

मध्य प्रदेश में जनजाति की बहुलता है। यहाँ इनकी अपनी सांस्कृतिक विरासत है। यहाँ ‘गोण्डवाना-प्रदेश’ भौगोलिक दृष्टि से प्राचीनतम क्षेत्रों में से एक है। यहाँ गोण्ड जनजाति निवास करती है। गोण्ड शब्द की उत्पत्ति तेलुगू भाषा के ‘kond’ शब्द से हुई है जिसका अर्थ है ‘पहाड़’ और ‘वाना’ अर्थात जंगल। ये लोग नर्मदा नदी घाटी और उत्तर गोदावरी क्षेत्र में पाये जाते हैं। मध्य प्रदेश में जबलपुर और मण्डला, सतपुड़ा रेंज में महादेव पहाड़ी और मैकल हिल्स भी गोंड क्षेत्र रहा है। छिन्दवाड़ा के रास्ते में ‘तामिया’ में गोण्डी निवास करते हैं।

गोण्ड जनजाति के पश्चात हमें भील दिखाई देते हैं। मध्य प्रदेश में जनजातियों के सामाजिक और सांस्कृतिक बहुलता के कारण इसे चार परिक्षेत्रों से जाना जाता है-

 

 

 

 

 

1.

पश्चिमी जनजाति क्षेत्र

झाबुआ, खरगोन, खण्डवा और रतलाम (भील संस्कृति)

2.

मध्य जनजाति क्षेत्र

मण्डला, बैतूल, सिवनी, छिन्दवाड़ा, बालाघाट, सागर, शहडोल (गोंड, कोरकू, कोल, बैगा जनजाति)

3.

उत्तर पूर्वीय जनजाति क्षेत्र

सरगुजा, रायगढ़, विलासपुर, सीधी (उराव, कोरवा, कोल और कमार जनजाति)

4.

उत्तर पश्चिम क्षेत्र

मुरैना, शिवपुरी और गुना (संवर और सहरिया)

 

जनजाति संस्कृति के दर्शन हमें विभिन्न अनुष्ठानों में दिखाई देता है। इनके जीवन का सौन्दर्य बोध चित्रों, शिल्पों, नृत्य और गीतों में दिखाई देता है। इनके चित्रों को देखने से पता चलता है कि ये आड़ी तिरछी रेखाएँ नहीं उनमें रंग और रेखाओं का अनन्त विस्तार दिखाई देता है। वे कला की पूर्ति के लिये प्रकृति से प्राप्त सहज सुलभ संसाधनों का उपयोग करते हैं। इनके चित्रों में रंगों का फैलाव, कहीं रेखाओं का उलझाव, कहीं बिन्दुओं का विस्तार, कहीं अभिप्रायों का विलक्षणता और कहीं सिर्फ आकारों की अनघड़ता के दर्शन होते हैं। चिड़िया, मोर, हिरण आदिवासियों के लिये सिर्फ पशु-पक्षी नहीं हैं, बल्कि इनका गाँव, घर और कृषि से गहरा सम्बन्ध होता है। इनका प्रकृति से निकट सम्बन्ध तो है ही, साथ ही कला जीवन का अनिवार्य अंग है।

भील जनजाति के लोग ‘पिथौरा’ मिथकीय घोड़े बनाते हैं। इसी प्रकार कोरकू की स्त्रियाँ दीवारों पर ‘थाठिया’ खड़िया या गेरू से बनाती है। भील, गोंड, परधान, राठ्या और बैगा जनजाति के लोग स्वयं के शरीर को ‘गुदने’ से अलंकृत कराते हैं। ये गुदने मात्र शारीरिक अलंकरण नहीं हैं, बल्कि प्रतीकात्मक रेखाओं के माध्यम से अन्वेषित अर्थों को सदियों और पीढ़ियों से जनजातियों ने अपने शरीर पर सुरक्षित रखा है। गुदना चित्र के पीछे यह मान्यता है कि मृत्यु के साथ मात्र ये चित्र ही होते हैं।

जनजाति चित्र प्रकृति प्रेरित होते हैं। सृष्टि में प्राप्त जीव-जन्तु जिनमें हाथी, गाय, बैल, घोड़ा, मगर, छिपकली, साँप, चिड़िया, मोर, हिरण, उल्लू और सुअर आदि को चित्रों में सृजित किया है। साथ ही काष्ठ एवं धातु शिल्प में उकेरा है। यह एक परम्परा है, जो पुरस्कार और सम्मान की मोहताज नहीं। फिर भी जनजातीय कलाकारों ने भारतीय आदिवासी कला को विदेशों तक पहुँचाया है। जनगण सिंह श्याम, व्यंकट श्याम, भूरीबाई, लाडो बाई आदि पुरस्कार ही नहीं बल्कि इनकी पेंटिंग न्यूयॉर्क, स्कॉटलैण्ड आदि स्थानों में लाखों में बिकी। कला-कर्म में संलग्न रहते हुए स्व. जनगण सिंह श्याम का देहावसान जापान में हुआ। गोंड और भील जनजाति के लोग पहले प्राकृतिक रंगों से भित्ति चित्र बनाते थे लेकिन बदलते समय के साथ सिन्थेटिक रंगों से कागज कैनवास पर उतारा है। विशेषकर ये चित्रकारी ‘परधान’ और ‘नोहडोरा’ कहलाती है।

इस जनजाति कला को भील और गोण्ड कलाकारों ने समृद्ध किया है।

जे. स्वामीनाथन ने मध्य प्रदेश के सुदूर अंचलों में फैली इस आदिम स्वरूप की कला के महत्व को पहचाना और इन कलाओं के समग्र अध्ययन हेतु भारत भवन में सहेजा। इन रचनाकर्मियों को एकत्र कर भोपाल लाया गया और इनकी कलाकृतियों को नागर कलाकृतियों के साथ एक छत के नीचे प्रदर्शित भी किया।

इन कलाकारों में निम्नलिखित प्रमुख हैं-

गोंड कलाकार

आनन्द सिंह श्याम, भज्जू श्याम, बीरबल सिंह उइके, छोटी तैकाम, धनैयाबाई, दुर्गाबाई, धवल सिंह उइके, दिलीप श्याम, गरीबा सिंह तैकाम, हरगोविन्द श्याम, उर्वेती, हीरालाल धुर्वे, इन्दुबाई मरावी, ज्योतिबाई उइके, कलाबाई, कमलेश कुमार उइके, लखनलाल भर्वे, मयंक कुमार श्याम तथा नर्मदा प्रसाद तैकाम आदि।

भील कलाकार

अनिता बारिया, भूरीबाई (पटोला), भूरीबाई (सेर), गंगूबाई, लाडोबाई, जोर सिंह, रमेश सिंह करटारिया, शेर सिंह, सुभाष भील, भीमा पारगी, चम्पा पारगी तथा प्रेमी आदि कलाकारों ने चित्र परम्परा को सहेजा है।

इन कलाकारों ने मध्य प्रदेश की कला को उन्नति की राह दिखाई। आदिवासी कला को विश्व नक्शे में स्थान दिलाने का प्रयास किया।

सन्दर्भ गन्थ सूची

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8. सक्सेना प्रोफेसर रणवीर- कला सौन्दर्य और जीवन- रेखा प्रकाशन कार्यालय, देहरादून- 1967, पृष्ठ-4
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10. अग्रवाल डॉ. गिर्राज किशोर-भारतीय चित्रकला का आलोचनात्मक इतिहास- कला और कलम, अशोक प्रकाशन मन्दिर, अलीगढ़- 2012, पृष्ठ- 11
11. चतुर्वेदी डॉ. गोपाल मधुकर- भारतीय चित्रकलाः ऐतिहासिक सन्दर्भ-जागृति प्रकाशन, अलीगढ़ 1982 पृष्ठ-26
12. शर्मा लोकेश चन्द्र- भारत की चित्रकला का संक्षिप्त इतिहास- कृष्णा प्रकाशन मीडिया (प्रा.लि.) गोयल पब्लिशिंग हाउस, मेरठ- 2011, पृष्ठ- 9
13. भाण्ड लक्ष्मण- मध्य प्रदेश में चित्रकला- संचालक, जनसम्पर्क मध्य प्रदेश, भोपाल-2006 पृष्ठ- 19
14.अग्रवाल डॉ. गिर्राज किशोर-भारतीय चित्रकला का आलोचनात्मक इतिहास- कला और कलम, अशोक प्रकाशन मन्दिर, अलीगढ़- 2012, पृष्ठ-14
15. अग्रवाल डॉ. गिर्राज किशोर-भारतीय चित्रकला का आलोचनात्मक इतिहास- कला और कलम, अशोक प्रकाशन मन्दिर, अलीगढ़- 2012, पृष्ठ-17
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20. अग्रवाल डॉ. गिर्राज किशोर- भारतीय चित्रकला का आलोचनात्मक इतिहास- अशोक प्रकाशन मन्दिर अलीगढ़- 2012, पृष्ठ- 21
21. भाण्ड लक्ष्मण- मध्य प्रदेश में चित्रकला- संचालक, जनसम्पर्क, मध्य प्रदेश, भोपाल- 2006, पृष्ठ-39
22. भाण्ड लक्ष्मण- मध्य प्रदेश में चित्रकला- संचालक, जनसम्पर्क, मध्य प्रदेश, भोपाल- 2006, पृष्ठ-70
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28. सर एच इलियड- भारत का इतिहास- पृष्ठ- 58,59
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38. www.jaganjosh.com
39. विवरणिका- मध्य प्रदेश कला परिषद, भोपाल से प्रकाशित-कला प्रदर्शनी
40. विवरणिका- 1982- उद्घाटन के अवसर पर प्रकाशित
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