मध्य प्रदेश के प्राकृतिक सौन्दर्य का दृश्य चित्रकारों द्वारा चित्रण

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कला एवं पर्यावरण - एक अध्ययन मध्य प्रदेश के प्रमुख दृश्य चित्रकारों के सन्दर्भ में (पुस्तक), 2014
Madhya Pradesh is Called the ‘HEART OF INDIA’ not only because of its location in the center of the country. It has been home to the culture heritage of Hinduism, Buddhism, Jainism and Islam Innumerable monuments exquisitely carved temples, stupes, forts and palaces are dotted all over the state. The natural beauty of the state is equally varied consisting largely of plateau, the state has everything spectacular mountain ranges, meandering rivers and miles and of dense forests, Infact a large part of the state is forested, offering a unique and exciting panorama of wildlife. In the national parks of Kanha, Bandhavgarh and Pench are in M.P.

मध्य प्रदेश में अधिकतर पठारी हिस्से में स्थित विन्ध्य और सतपुड़ा की पर्वत शृंखलाएँ इस प्रदेश को रमणीय बनाती हैं। ये पर्वत शृंखलाएँ नदियों के उद्गम स्थलों को जन्म देती हैं। ताप्ती, नर्मदा, चम्बल, सोन, बेतवा, महानदी जो यहाँ से निकलकर भारत के कई हिस्सों में बहती है। इस वैविध्यपूर्ण प्रकृति की देन की वजह से मध्य प्रदेश एक हरा-भरा खूबसूरत हिस्सा बनकर उभरता है। हालांकि 1956 में मध्य प्रदेश भारत के मानचित्र पर एक राज्य बनकर उभरा था, किन्तु यहाँ की संस्कृति प्राचीन और ऐतिहासिक है। असंख्य ऐतिहासिक धरोहरें विशेषतः उत्कृष्ट शिल्प और मूर्तिकला से सजे मन्दिर, स्तूप और स्थापत्य के अनूठे उदाहरण यहाँ के महल और किले यहाँ उत्पन्न हुए। राजा, महाराजाओं और उनके वैभवशाली काल तथा महान योद्धाओं, शिल्पकारों, कवियों, संगीतज्ञों के साथ-साथ हिन्दू, मुस्लिम और जैन साधकों की याद दिलाती है।

मध्य प्रदेश में इन धर्मों की चित्र संस्कृति हमें भित्ति चित्र, पुस्तक चित्र, पट चित्र तथा स्फुट चित्रों में दिखाई देती है। यही नहीं यह संस्कृति उत्सवों, मेले में अपना रंग भरती है। खजुराहो का वार्षिक नृत्य उत्सव, पचमढ़ी उत्सव तथा समृद्ध लोक उत्सव और आदिवासी उत्सव संस्कृति को सजीव बनाते हैं।

किसी भी शैली में चित्र निर्माण के लिये आवश्यक तत्व है सौन्दर्य। मध्य प्रदेश का सौन्दर्य यहाँ की अपार प्राकृतिक सम्पदा से सम्पन्न प्रदेश है। इसके अलावा आत्मिक सौन्दर्य धार्मिक भावना से ओत-प्रोत स्थलों, स्मारकों और वन्य सम्पदा से परिपूर्ण स्थलों में है। यहाँ जीवन-दायिनी नर्मदा, क्षिप्रा, बेतवा आदि नदियों किनारे अवस्थित ईश्वरीय महत्ता को दर्शाते धार्मिक स्थल और ऐतिहासिक स्थल प्राकृतिक सौन्दर्य में रमणीयता के दर्शन कराते हैं। मानव प्रकृति का एक महत्त्वपूर्ण घटक है। उसने प्रकृति प्रदत्त संसाधनों का उपयोग करते हुए भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति की। उसने झोपड़ी से लेकर महल अट्टालिकाएँ, किले, दुर्ग, सेतु तथा अनेक प्रकार के वास्तु बनाए, जो कि इस भू-भाग को समृद्धशाली और सौन्दर्यपूर्ण बनाने में सक्षम हैं। मन्दिर, मस्जिद, गिरजाघर आदि के सृजन में भारतीय धर्मों और संस्कारों का पता चलता है।

मध्य प्रदेश में मालवा, बुन्देलखण्ड, बघेलखण्ड संस्कृति विद्यमान है। यहाँ के त्यौहारों और धार्मिक उत्सवों से लोक संस्कृति का पता चलता है। इन लोक चित्रों में आकारात्मक सौन्दर्य की अपेक्षा भावनात्मक सौन्दर्य प्रधान होता है। इस प्रकार संस्कार और सौन्दर्य का अटूट सम्बन्ध है। किसी भी क्षेत्र की प्राकृतिक सम्पदा की विभिन्नता के कारण संस्कृति और सभ्यता में अन्तर दिखाई देता है।। टाइलर महोदय के अनुसार- “संस्कृति और सभ्यता वह इकाई है, जिसमें ज्ञान, विश्वास, कला, नैतिकता, कानून, रीति-रीवाज एवं समाज के सदस्य के रूप में अर्जित सभी योग्यताएँ सम्मिलित हैं। कला ही संस्कृति को सम्पन्न बनाती है। भारतीय धारणानुसार संस्कृति स्वयं जीवन का विस्तार है। संस्कृति गत्यात्मक है- बिना विरासत को अनदेखा किये लगातार आगे ही बढ़ता जाता है। संस्कृति सदा परिवर्तनशील है लेकिन कभी न समाप्त होने वाला प्रवाह है।”

कला और संस्कृति एक-दूसरे के पूरक हैं। जब तक मानव समाज है तब तक संस्कृति है। जब तक संस्कृति है तब तक कलाएँ हैं और जब तक कलाएँ हैं तब तक संस्कृति की निरन्तरता अपने उच्चतम स्वरूप में विद्यमान रहेगी। संस्कृति ही लोक कला और ललित कलाओं को पोषण प्रदान करती है। कला के मूल में प्रवृत्ति का सौन्दर्य ही निहित है। प्रकृति के विराट स्वरूप को मानव ने कभी भय तो कभी हर्ष से पूजना प्रारम्भ किया। यहीं से धर्म का बीज अंकुरित हुआ, जो आगे निरन्तर कई रूपों में विकसित होता चला गया। धर्म के मूल में ईश्वर रचित प्रकृति ही है। धर्म से ही संस्कृति अस्तित्व में आई और संस्कृति के पोषण में कलाओं का उद्भव और विकास हुआ।

कला के सानिध्य से ही प्रकृति के सौन्दर्यतम स्वरूप के दर्शन होते हैं। इस संसार में सौन्दर्य से परिपूर्ण नदी, पहाड़, झरने, इन्द्रधनुषी रंगों से युक्त बादल, हरे-भरे वृक्ष, बेल, लताएँ, फल-फूल, सुन्दर पक्षी और मानवीय अस्तित्व को रचा। प्रकृति का यही सौन्दर्य कलाकार की प्रथम प्रेरणा रहा है।

कलाकार प्रकृति के शिक्षणालय में सौन्दर्य बोध की शिक्षा पाता है, पर भावुक और कल्पना सम्पन्न होने के कारण सौन्दर्य सृष्टि में वह प्रकृति पर विजय पाता है। कला का प्रारम्भ अनुकृति से और परिणति एक नूतन सृष्टि होती है। इस नूतन सृष्टि का बोध किसी सहृदय (कलाकार) के मन में होता है। आरिस्टोटल के अनुसार- श्रेष्ठतम सौन्दर्य प्रकृति में है। इसलिये उसकी दृष्टि में कला का मुख्यतम लक्ष्य प्रकृति की यथा सम्भव अनुकृति करना है। हीगल ने मस्तिष्क को प्रकृति से श्रेष्ठ माना है। इसी आधार पर हीगल का कहना है कि-

The Beauty of art is the beauty that is born again, that is of the mind and by as much as mind and it’s products are higher than nature and it’s appearance, by so much is the beauty of art higher than the beauty of nature Art liberatis the real import of appearances form the semblance and deception of this bad and fleeting world and impart to phenomenal semblances a higher reality. The appearances of art have more genuine existence in compassion with realities of common lite.

डॉ. नगेन्द्र के अनुसार ‘सौन्दर्य वह गुण है जो वस्तु और व्यक्ति के बाह्य और अन्दर के सामंजस्य से उत्पन्न होता है।’

अर्थात प्रकृति और कलाकार के चेतन और अवचेतन मन में उत्पन्न अनुभूति और अभिव्यक्ति।

जयशंकर प्रसाद ने भी कहा है कि ‘मानव सौन्दर्य बोध के द्वारा ईश्वर की सत्ता का अनुभव करता है।’ कलाकार की प्रेरणा का आधार ही प्राकृतिक सौन्दर्य होता है। सौन्दर्यानुभूति का सम्बन्ध मूल रूप से हमारे भावात्मक संवेगों से मन की भावनाओं के साथ रहता है। कलाकार में निश्चित रूप से एक सामान्य व्यक्ति से अधिक सौन्दर्य के प्रति आकर्षण होता है, साथ ही सूक्ष्म गहन दृष्टि। इसी कारण प्रकृति के अनन्त अपार और व्यापक सौन्दर्य से परिपूर्ण संसार को वह अपनी दृष्टि से देखता है और कल्पनाओं के सम्मिश्रण से ऐसी अभिव्यक्ति देता है, जिससे श्रेष्ठतम और सुन्दरतम कलाओं का सृजन होता है। डॉ. भगवतशरण उपाध्याय कलाकार को ब्रह्मा के बाद सृष्टिकर्ता के रूप में स्पष्ट करते हुए कहते हैं- “कलाकार प्रकृति का यथा तथ्य रूपायन करता है। यह कार्य छायाकार या फोटोग्राफर का है। कला प्रकृति को अपनी दृष्टि से देखती है। कलाकार दृश्य में पैठ-कर प्रायः उससे एकी होकर देखता है, सिरजता है, वह प्रकृति को अपनी तूलिका, छेनी अथवा कूची से संवार देता है। नंगी प्रकृति स्थिति में कलावन्त जो अपने माध्यम से अन्तर डाल देता है, वही कला है।”

कलाकार, चिन्तक, सौन्दर्य शास्री व सृजनकर्ता होता है। वही कल्पना को आकार प्रदान करता है, वह असुन्दर को सुन्दर अपूर्ण को पूर्ण बनाने का सामर्थ्य रखता है। कलाकार भी एक योगी के समान होता है। जिस प्रकार योगी ध्यान में ईश्वर की कल्पना करता है उसी प्रकार कलाकार की ध्यानी अवस्था में जो कप बनते हैं, उसे चित्र और मूर्त रूप में आकार प्रदान करता है। स्वर्गीय डॉ. आनन्द कुमार स्वामी ने कहा है कि-

“Hindu view treats the practice of art as a form of yoga and identifies aesthetic emotion with that when self perceives the self.”

कलाकार की योग (ध्यान) अवस्था ही नवीनतम रूप रंग और निजता उत्पन्न कर सृजन करती है। कलाकार की गहनतम भावनाओं को प्रकृति और भी उद्वेलित कर देती है। प्रकृति का मनमोहक स्वरूप कला सृजन हेतु प्रेरित करता है। आकाश में इन्द्रधनुषी रंग कल-कल की ध्वनि करते झरने, खुशबूदार, फूलो-फलों से लदे वृक्ष, धूमिल रंगों वाली पर्वत शृंखलाएँ, काले-काले बादल, नृत्य की ताल में थिरकते मयूर, कुलांचे भरते हिरण, सूर्योदय और सूर्यास्त की पीताभ और लालिमायुक्त रश्मियाँ किसी भी सहृदय (कलाकार) को रोमांचित करने में सक्षम हैं। प्रकृति का मनमोहक स्वरूप कला सृजन के लिये प्रेरित करता है। वह प्रकृति का अनुकरण करता है तथा उस स्वरूप को सौन्दर्य की दृष्टि से प्राणबद्ध करने का प्रयास करता है। कला सृजन के लिये कल्पना तत्व का होना भी अति आवश्यक है, क्योंकि इसकी सहायता से ही कलाकार यथार्थ में कुछ स्वयं को जोड़कर नवीनता प्रकट करता है। चित्रकारों ने एक ही प्राकृतिक स्थल का चित्रण विभिन्न समय में होने वाले परिवर्तनों के आधार पर किया है। चीनी चित्रकला में दृश्य-कला का चित्रण क्षण-क्षण बदलते स्वरूप के आधार पर बहुतायत से हुआ। कू-काई-चिह ने फ्यूजी पर्वत के विभिन्न स्वरूपों को मसि से चित्रित किया है।

चित्रकार के लिये प्रकृति का सानिध्य और कल्पना शक्ति का योग नवीन कला सृष्टि करता है। मैथिलीशरण गुप्त अपनी काव्य पंक्तियों में कहते हैं-

सत्य सदा शिव होने पर भी
विरूपाक्ष भी होता है,
और कल्पना का मन केवल
सुन्दरार्थ ही रोता है।

दृश्य चित्रकार प्रकृति को देख प्रफुल्लित होता है। प्रकृति के अनन्त, अपार और व्यापक सौन्दर्य से परिपूर्ण संसार को वह अपनी दृष्टि से देखता है। मालवा इन्दौर के प्रख्यात दृश्य चित्रकार श्री श्रेणिक जैन का कहना है कि-

“कलाकार प्रकृति से प्रभावित होता है, उसमें विद्यमान विविध आकार जैसे पहाड़, जंगल, खाईयाँ और विशाल पेड़। प्रकृति के विभिन्न रंग, वातावरण, प्रकाश और समय का महत्त्वपूर्ण स्थान है। बारिश के दिनों में हरीतिमायुक्त धरती पर मानव, भैरव, पोस्ट बॉक्स तथा पुरातत्वीय खण्डहर आदि आकर्षक बिन्दुओं को महत्व दिया जाता है।”

अमृतलाल वेगड़, डी.जे.जोशी और राममनोहर सिन्हा ऐसे कलाकार हैं, जिन्हें नर्मदा से प्रेरणा प्राप्त हुई। अमृतलाल वेगड़ नर्मदा के अगाध प्रेम से प्रभावित हुए। नर्मदा सौन्दर्य से अभिमत होकर पैदल परिक्रमा की। राममनोहर सिन्हा ने नर्मदा जल और उसमें खिले कमल पुष्पों से प्रभावित होकर दृश्य चित्र और ‘Lotus-Series’ की संरचना की। डी.जे. जोशी की कला भी नर्मदा किनारे के जीवन को दृश्यांकित करती है। आपने ओमकारेश्वर, महेश्वर, नेमावर, भेड़ाघाट को कई रूपों में बनाया। यही नहीं नर्मदा के किनारे का जीवन-यापन भी चित्रित किया।

चित्रकारों ने पर्यटन स्थल से सम्बन्धित स्थानों को चित्रों में महत्व प्रदान किया।

मध्य प्रदेश पर्यावरणीय तथा ऐतिहासिक स्थलों से सम्पन्न क्षेत्र है, जिसमें प्राकृतिक और मानव निर्मित रमणीय स्थल हैं, जिनसे कलाकार प्रभावित हुए और दृश्य चित्रों का निर्माण किया। कलाकार सदैव बन्धनमुक्त रहकर कार्य करना चाहता है। सृष्टि के प्रत्येक कण में ईश्वर की उपस्थिति मानकर बड़ी-से-बड़ी पर्वत शृंखला, विस्तृत समुद्र, पशु-पक्षी, मानव तथा तुच्छ प्राणियों का चित्रण किया। मध्य प्रदेश में प्राकृतिक दृश्यों से परिपूर्ण स्थल निम्नलिखित हैं जिन्हें कलाकारों ने चित्रण योग्य समझा।

1. भोपाल

मध्य प्रदेश की राजधानी ‘भोपाल’ पर्यावरणीय सौन्दर्य की दृष्टि से बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। वर्तमान में यहाँ की पहाड़ियाँ छोटी तथा बड़ी झील, पेड़-पौधे और नियोजित शहर की मनोरमता को और अधिक बढ़ा देता है। भोपाल का सम्बन्ध परमार नरेश राजा भोज (1010-1055) से है। इनके नाम के आधार पर इस नगर का नाम ‘भोजपाल’ हुआ। कालान्तर में परिवर्तित होकर ‘भोपाल’ के नाम से जाना गया। यह स्थान तालाब किनारे एक बस्ती के रूप में था। अफगान से आये दोस्त मोहम्मद खान (1708-1740) ने रियासत की नींव डाली। इस प्रकार यहाँ हिन्दू-मुस्लिम, संस्कृति का सम्मिश्रित रूप दिखाई देता है। यह शहर पहाड़ियों पर बसा है। यहाँ छोटी झील, बड़ी झील, शाहपुरा झील, मोतिया तालाब आदि नैसर्गिक सौन्दर्य बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। रानी कमलापति का महल मनुआभान की टेकरी पर जैन मन्दिर, साईं मन्दिर, ताजुल मस्जिद, जामा मस्जिद, ताजमहल, गौहर महल, गुफा मन्दिर तथा बिड़ला मन्दिर भोपाल की पहचान है। बिड़ला मन्दिर की पहाड़ी से नये और पुराने भोपाल के सौन्दर्य को देखा जा सकता है। मध्य प्रदेश राज्य संग्रहालय, इन्दिरा गाँधी मानव संग्रहालय, जनजातीय संग्रहालय, स्वराज भवन, अलाउद्दीन खाँ कला एवं संगीत परिषद (कला परिषद) कला के महत्त्वपूर्ण केन्द्र रहे हैं। इसके अलावा एलियांस फ्रांसिस, स्वराज भवन, रंगायन आदि गैलरी हैं।

भोपाल के नैसर्गिक एवं वास्तु सौन्दर्य को देखकर ही कलाकार आकर्षित होकर भोपाल आये और यहीं आकार बस गये। जिनमें स्व. श्री सुशील पाल, लक्ष्मण भाण्ड, डॉ. लक्ष्मीनारायण भावसार, श्री सचिदा नागदेव आदि प्रमुख हैं।

भोजपुर

भोपाल के निकटवर्ती क्षेत्र में भोजपुर महत्त्वपूर्ण स्थानों में से एक है। यह भोपाल से 28 किमी. दूर है। यहाँ 14वीं सदी में बना प्रसिद्ध शिव मन्दिर है, जिसमें 7.5 फीट के एक पत्थर से बना शिवलिंग है जो 17.8 फीट ऊँची जलहरी पर अवस्थित है। इसे परमार नरेश राजा भोज ने बनवाया। इसमें परमार नवीन अलंकरण गर्भ-गृह के अन्दर और बाहर बने हुए हैं। यह धार्मिक, सांस्कृतिक और पर्यटन महत्व वाला स्थान है। चित्रकारों ने इसे अपने चित्रों में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है।

इस्लाम नगर

रियासत कालीन मुस्लिम संस्कृति महत्व का यह नगर भोपाल से ग्यारह कि.मी दूर है। जिसे दोस्त मोहम्मद खान ने बनाया था। इसका पुराना नाम जगदीशपुर था। यहाँ पर चमन महल और रानी महल में हिन्दू और मुस्लिम संस्कृति का स्थापत्य दिखाई देता है। ठंडे और गर्म पानी के हमाम, बावड़ी मुगल शैली के अनुसार बना पार्क मनोरम दृश्य उपस्थित करता है। यहाँ जनमानस पिकनिक की दृष्टि से आते हैं। इस स्थान पर कलाकार दृश्य चित्रण की दृष्टि से आते हैं।

भीमबेटका

भीमबेटका भोपाल से 46 कि.मी दूर भोपाल होशंगाबाद मार्ग पर स्थित है। यहाँ आदि मानव गुफाओं में रहते थे। इसकी खोज का श्रेय श्री वी.एस.वाकणकर (विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन पुरातत्व संग्रहालय व उत्खनन अधीक्षक) को जाता है। यहाँ 600 से अधिक गुफाएँ हैं। इनमें 475 चित्रित गुफाएँ हैं। यहाँ पर गुफाओं में मानव समुदाय द्वारा उपयोग में लाये गये औजार व हथियार यहाँ दबे रह गये। यह स्थान विश्व पुरातत्व महत्व में सम्मिलित है। ये प्रकृति निर्मित गुफाएँ हैं। प्राकृतिक सौन्दर्य और चित्र सृजन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। श्री वाकणकर के नेतृत्व में इन शैल चित्रों की प्रतिकृतियाँ भी तैयार करवाई गईं।

पचमढ़ी

मध्य प्रदेश में पचमढ़ी हरा-भरा सुरम्य स्थान है। यहाँ की स्वास्थ्यवर्द्धक जलवायु और प्राकृतिक सौन्दर्य से आकर्षित होकर जनमानस आता है। इस स्थान के चित्रों को प्रकाश में लाने का श्रेय डी.एच. गॉर्डन महोदय को है। यह क्षेत्र भोपाल से 195 किलोमीटर दूर है। पचमढ़ी क्षेत्र में प्रागैतिहासिक चित्रों से सजे शैलाश्रय हैं जो कि प्रागैतिहासिक मानव ने प्राकृतिक रंगों से आखेटक और मनोरंजन से सम्बन्धित चित्र बने हैं। यहाँ पर इमली खोह, निम्बूभोज, लश्करिया खेल मांटेरोजा, काजरी झलाई, माड़ादेव, सोनभद्र, डोरोथीडीप, इशान शृंग, छोटा महादेव, बड़ा महादेव, मैथ्यू पीप केव आदि स्थान है।

मध्य प्रदेश में सबसे ऊँची चोटी धूपगढ़ (1350 मी) पचमढ़ी में सतपुड़ा पर्वत श्रेणी पर है। यहाँ के अन्य दर्शनीय स्थल चौरागढ़, जटाशंकर, पाण्डव गुफार तथा अप्सरा विहार आदि है। इसे पर्वतों की रानी भी कहा जाता है।

पचमढ़ी एक रमणीक स्थल है। इनकी मनोरमता से कलाकारों ने आकर्षित होकर अनेकों दृश्य चित्रों का सृजन किया।

साँची

विश्व प्रसिद्ध साँची पर्यटन और कलात्मक दृष्टि से विशिष्ट और महत्त्वपूर्ण है। यह मध्य प्रदेश में विदिशा के पास लगभग 91 मीटर ऊँची पहाड़ी पर स्थित है। प्राचीन काल में नये वेदिसगिरी, चेत्यगिरी तथा काकनाय आदि नामों से जाना जाता था। यह स्थान बौद्ध धर्म से सम्बन्धित है, जिसका निर्माण अशोक ने करवाया था। यह स्थान स्तूप, मन्दिर, स्तम्भ तथा तोरण द्वार के लिये जाना जाता है। यहाँ चैत्य और विहार है जो क्रमशः पूजा और रहने का स्थान है।

इन्दौर

इन्दौर शहर मध्य प्रदेश का ऐसा भव्य शहर है जो व्यावसायिक नगर होने के साथ-साथ भारत वर्ष की अद्भुत संगम स्थली है। इन्दौर का सबसे अधिक विकास होल्कर राजाओं के शासनकाल में हुआ। सन 1730 में मल्हार राव होल्कर को मराठों द्वारा उत्तर भारत का नेतृत्व सौंपा गया। इन्दौर में शहर के बीचों-बीच मल्हारराव ने एक राजप्रासाद ‘रजवाड़ा’ बनवाया। इसके निर्माण की नींव तो मल्हारराव ने रखी थी, किन्तु इनके देहावसान पश्चात इनकी पुत्रवधु देवी अहिल्याबाई द्वारा पूर्ण किया गया। इसमें मराठा और मुगल शैली की स्थापत्य कला दिखाई देती है।

महाराजा यशवन्तराव एक कला प्रेमी शासक थे। उनके समय में श्री देवलालीकर जैसे कलाकार सामने आये, जिन्होंने इन्दौर को कला का केन्द्र बनाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई। इन्होंने शहर में ‘कला स्कूल’ की स्थापना की। यहीं से श्रीधर नारायण, बेन्द्रे, हुसैन, रजा, डी.जे. जोशी, विष्णु चिंचालकर तथा श्रेणिक जैन जैसे चित्रकारों ने राष्ट्रीय, अन्तरराष्ट्रीय स्तर की ख्याति प्राप्त की। इन्दौर कला स्कूल के विद्यार्थी ही आगे जाकर देश के अन्य हिस्सों में बस गये और कला को आगे बढ़ाते रहे। यहाँ पर कला के विद्यार्थी इन्दौर तथा इसके आस-पास के क्षेत्रों को दृश्यांकित करते रहे। दृश्य चित्र ही तत्कालीन ऐतिहासिक तथा भौगोलिक परिस्थितियों से अवगत कराते हैं।

उज्जैन

उज्जैन इन्दौर से 55 किमी दूर क्षिप्रा नदी के तट पर बसा हुआ धार्मिक शहर है, जिसे पूर्व में अवन्तिका के नाम से जाना जाता था। यह शहर धर्म कला और साहित्य की दृष्टि से महत्व रखता है। यह कृष्ण की शिक्षा स्थली है। यहाँ महाकालेश्वर मन्दिर है, जो बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यही नहीं यह पूर्व से ही साहित्य और कला की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण रहा है। विक्रमादित्य के शासनकाल में अनेको विद्वान थे जिनमें से ‘कालिदास’ एक महान विद्वान थे जिन्होंने अनेकों काव्य ग्रन्थ और नाटकों की रचना की, जिनमें मेघदूत, ऋतुसंहार आदि प्रमुख काव्यग्रन्थ हैं। कला और साहित्य को बढ़ाने के लिये यहाँ कालिदास अकादमी की स्थापना की। जिसमें चित्र और मूर्तिकला की प्रदर्शनी और चयनित कलाकृतियों को पुरस्कृत किया जाता है। संस्कृत की श्रुतियों और श्लोकों का वाचन किया जाता है। वर्तमान में अनेकों कलात्मक संस्थान क्रियाशील हैं।

यहाँ अनेकों मनोरम स्थल विद्यमान हैं जो अनायास ही अपनी ओर आकर्षित करते हैं। आकर्षक स्थलों में महाकालेश्वर, चिन्तामन गणेश, भर्तृहरि गुफा, कालियादह महल, सिद्धपट, कालभैरव, सन्दीपनी आश्रम, गढ़कालिका मंगलनाथ, वैधशाला, विक्रमकीर्ति, गोपाल मन्दिर, नवग्रह मन्दिर, हरसिद्धि मन्दिर, पीर मत्स्येन्द्र नाथ मन्दिर, दुर्गादास की छत्री, रामजनार्दन मन्दिर, मल्लिकार्जुन तीर्ण, बिना नींव की मस्जिद तथा मौलाना रूमी का मकबरा, राम घाट तथा गंगा घाट आदि आकर्षक स्थल हैं। यहाँ हर बारह वर्षों में ‘कुम्भ-मेला’ लगता है, जहाँ विभिन्न स्थलों से आये जनमानस, साधु सन्त, हाथी-घोड़े आदि का समूह यहाँ की आकर्षकता को बढ़ा देता है।

क्षिप्रा नदी का प्रवाह, अडिग स्थापत्य, विभिन्न रंगों के वस्रों में स्नानार्थी और श्रद्धालुओं ने चित्रकारों को चित्रकारों को चित्रण हेतु प्रेरित किया। इन स्थलों से प्रभावित होकर चित्रकार चित्रण कार्य करते रहे। इन चित्रकारों में डॉ. आर.सी. भावसार, श्री वाकणकर, डॉ. श्री कृष्ण जोशी, डॉ. शिवकुमारी रावत, डॉ. बी.एल. सिंगरोड़िया आदि प्रसिद्ध चित्रकार और मूर्तिकार हुए हैं जिन्होंने उज्जैन को अपनी दृष्टि से देखा और निजी शैली में यहाँ के मनमोहक दृश्यों को चित्रित किया। कला की शिक्षा हेतु माधव कॉलेज और शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, उज्जैन सक्रिय हैं। इसके अलावा कलावर्त आदि संस्थाएँ क्रियाशील हैं जो कि कलाकारों को नया प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराती हैं।

माण्डव

माण्डव को ‘City of Joy’ भी कहा जाता है। यह इन्दौर से 99 किमी दूरी पर स्थित है। माण्डव पत्थरों पर रचा जीवन और आनन्द के उत्सव का प्रतिरूप है। यह स्थान कवि और राजा बाजबहादुर और उसकी सुन्दर रानी रूपमती के प्रेम का प्रतीक है। रानी रूपमती के महल का दृश्य बड़ा ही विहंगम दिखाई देता है, जो कि अफगानी वास्तुकला का अद्भुत नमूना है। माण्डू विन्ध्य की पहाड़ी में 2000 किमी. की ऊँचाई पर स्थित है। यह मूलतः मालवा के सुल्तानों शादियाबाद यानी खुशियों का शहर रख दिया। यहाँ के दर्शनीय स्थलों में जहाज महल, हिंडोला महल, शाही हमाम और नक्काशीदार गुम्बद वास्तुकला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यहाँ जामी मस्जिद और होशंगशाह के मकबरे से प्रेरणा लेकर शताब्दियों बाद महल बनवाया।

इस प्रकार माण्डव के सुन्दर दृश्यों में कलाकारों को अपनी ओर आकृष्ट किया। श्री चन्द्रेश सक्सेना और डी.जे. जोशी आदि कलाकारों ने यहाँ के दृश्यों को जीवन्त बनाया। प्रो. विष्णु चिंचालकर जी ने अपने दृश्य चित्र में सफेद इमली के वृक्ष को विशिष्टता के साथ चित्रित किया है। यहाँ लोहानी गुफाएँ और अनेक मन्दिरों के भग्नावेश और गुफा के सामने सूर्यास्त बिन्दु है, जो कि सुहानी शाम में माण्डव के ग्रामीण और सुरम्य परिवेश के दृश्य दिखाई देते हैं। माण्डव प्राकृतिक स्थल के रूप में आज भी अपनी पहचान बनाए हुए है।

ग्वालियर

ग्वालियर मध्य प्रदेश का एक प्रसिद्ध नगर है, जो आगरा के दक्षिण में 122 किमी. दूर स्थित है। यह मध्य प्रदेश प्रान्त का प्रमुख शहर है। यह उत्तर भारत के प्राचीन शहरों का केन्द्र रहा है। यह सदियों से प्राचीन राजधानी रहा है, चाहे वे प्रतिहार रहे हों या कछवाह या तोमर। इस शहर में इनके द्वारा छोड़े गये प्राचीन चिन्ह, स्मारकों, किलों तथा महलों के रूप में मिलते हैं। सहेज कर रखे गये प्राचीन स्मारक इस शहर को पर्यटन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण और कला की दृष्टि से सौन्दर्यपूर्ण बनाती है।

ग्वालियर शहर के नाम के पीछे एक इतिहास छिपा है। आठवीं शताब्दी में सूरसेन नामक राजा हुए, जो एक समय अज्ञात बीमारी से ग्रस्त थे, तब ग्वालिया नामक सन्त ने उन्हें ठीक कर जीवनदान दिया। उनके सम्मान में इस शहर की नींव पड़ी और ग्वालियर नाम दिया गया।

ग्वालियर में प्रमुख ऐतिहासिक स्मारक हैं-

किला- सैण्डस्टोन से बना ग्वालियर का किला सहर में निर्मित है।

यह स्मारक संग्राम और जौहर के लिये जाना जाता है। पहाड़ी पर जैन तीर्थंकरों को मूर्तियाँ बनी हुई हैं। किले के बाहर की ओर भव्य दीवार खड़ी है, जिसकी लम्बाई 2 मील और ऊँचाई 35 फीट है। यह भारत के अजेय किलो में से एक है। इसकी अनूठी संरचना देखकर मुगल सम्राट बाबर ने कहा है-

‘The pearl amongst the fortress of Hind.’

इसके अलावा यहाँ पर अन्य स्थानों में गुजरी महल, सूर्य मन्दिर, मान मन्दिर महल, सूरज कुण्ड, तेली का मन्दिर और सास बहु का मन्दिर, जय विलास महल और म्यूजियम, तानसेन की छत्री और घोस मोहम्मद खान की छत्री यहाँ के दृश्यों को महत्त्वपूर्ण बनाती है। इनके साथ ही ग्वालियर को यहाँ के स्वतंत्रता सेनानियों, झाँसी की रानी और तात्या टोपे पर भी गर्व है जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता के लिये योगदान दिया। यहाँ के ऐतिहासिक स्मारक कला परिदृश्य का अन्य परिदृश्यों से पृथक करते हैं।

शिवपुरी

शिवपुरी ग्वालियर से 112 कि.मी दूर है। यह सिंधिया राजवंश की ग्रीष्मकालीन राजधानी होती थी। यहाँ के घने जंगलों में मुगल शासक शिकार करते थे। पूर्व में बाघों का मुगल सम्राटों द्वारा शिकार किया जाता रहा, किन्तु वर्तमान में माधव नेशनल पार्क के रूप में संरक्षित किया गया।

ओरछा

ओरछा ग्वालियर से 119 किमी. और झाँसी से 16 किमी. दूर स्थित है। बुन्देला शासकों के द्वारा यहाँ महल और मन्दिर बनवाये गये। ओरछा की नींव 16वीं शताब्दी में बुन्देल शासक राजा रूद्र प्रताप सिंह द्वारा रखी गई। बेतवा नदी के किनारे राजा वीर सिंह ने यहाँ की वास्तुकला का निर्माण करवाया, जिसमें खूबसूरत छतरियों से घिरा जहाँगीर महल, राय प्रवीन महल तथा रामराजा महल प्रमुख है। इनके अन्दर बुन्देली शैली के चित्र दीवारों की शोभा बढ़ा रहे हैं। लक्ष्मीनारायण मन्दिर और चुतुर्भुज का अलंकरण की कलात्मकता किसी भी दर्शक को अपनी ओर आकर्षित करने में सक्षम है। चन्देरी और दतिया भी प्रमुख स्थानों में से एक है। चन्देरी की स्थापना सुल्तानों और बुन्देला राजपूतों द्वारा पहाड़ी क्षेत्र में हुई, जहाँ झीलों का सौन्दर्य देखने योग्य है। दतिया दिल्ली मद्रास मार्ग पर स्थित है जिसे राजा वीर सिंह देव ने विकसित किया। यहाँ पर ऐतिहासिक महल का निर्माण किया।

मध्य प्रदेश की सबसे अधिक प्रसिद्ध नदी नर्मदा प्राकृतिक सौन्दर्य की वृद्धि करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसके कारण ही शस्य-श्यामल धरती बनी है। नर्मदा नदी का उद्गम अमरकंटक से होता है। यह नदी प्रवाहित होते हुए जबलपुर, होशंगाबाद, ओंकारेश्वर, महेश्वर आदि स्थानों पर बहती है।

अमरकंटक

अमरकंटक नर्मदा नदी का उद्गम स्थल है। इसके साथ ही सोन और जोहिला नदी का भी उद्गम हुआ। यहाँ के प्रमुख स्थलों में कपिलाधारा, दुग्धधार, माई का मन्दिर आदि हैं। जबलपुर के श्री अमृतलाल वेगड़ ने नर्मदा को ही श्रद्धेय बनाया और सम्पूर्ण नर्मदा की परिक्रमा की। नर्मदा किनारे की उर्वरक भूमि ने इस प्रदेश को हरा-भरा और धार्मिक, सांस्कृतिक महत्व प्रदान किया है। यही कारण रहा कि चित्रकारों ने इस स्थान को चित्रित करने में उत्साह दिखाया और स्वयं के उद्गारों को व्यक्त किया।

ओमकारेश्वर

ओमकारेश्वर प्रसिद्ध शिवलिंग मन्दिर के आकार का दिखाई पड़ने के कारण इसका नाम ओमकारेश्वर पड़ा। ओमकारेश्वर इन्दौर से 78 किमी. दूर नर्मदा और कावेरी के संगम पर मान्धाता पहाड़ी पर स्थित है। यहाँ 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक ज्योतिर्लिंग अवस्थित है। यह भारत का एक मात्र ऐसा स्थान है जहाँ दो शिवलिंगों को संयुक्त रूप से एक ज्योतिर्लिंग का नाम दिया है। नर्मदा नदी के तटों पर अमलेश्वर और ओमकारेश्वर महादेव मन्दिर का निर्माण नागर शैली में किया गया। ओमकारेश्वर में शंकराचार्य गुफा, सिद्धनाथ मन्दिर, 24 अवतार, सनमात्रिक मन्दिर तथा गौरी सोमनाथ मन्दिर आदि महत्त्वपूर्ण मनमोहक स्थल हैं। यहाँ की सांस्कृतिक मनमोहक विरासत से अधिकांशतः चित्रकार अभिभूत हुए। जिनमें श्री डी.जे. जोशी, श्रेणिक जैन, डॉ. आर.सी. भावसार, डॉ. लक्ष्मीनारायण भावसार, श्री चन्द्रेश सक्सेना आदि प्रमुख हैं।

महेश्वर

महेश्वर इन्दौर से 90 किमी. दूर अवस्थित है। इसका महत्व नर्मदा नदी और किनारे पर बसे सुन्दर घाट और महलों के कारण है। 19वीं सदी में देवी अहिल्याबाई होल्कर ने इसे अपनी राजधानी बनाकर सुन्दर घाट और किले बनवाये। महेश्वर में नर्मदा तट और सहस्त्रधारा, प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण है। महेश्वर में अहिल्या संग्रहालय, राजेश्वर मन्दिर, पेशवाघाट और होल्कर की छत्रियाँ प्रमुख हैं।

महेश्वर घाट का सौन्दर्य देखते ही बनता है। श्री रामनारायण उपाध्याय ने बहुत सुन्दर कल्पना की है कि- महेश्वर के घाट ऐसे प्रतीत होते हैं मानों धरती के माथे पर सूरज का कुमकुम लगाने के लिये बहन कलात्मक आरती लिये खड़ी हो।

नर्मदा नदी के प्रवाह, लोगों के जनसमूह ने चित्रकारों को अपनी ओर खींचा है और चित्रण की प्रेरणा के कारण बने। जिसका सौन्दर्य चित्रों में दिखाई देता है।

जबलपुर

जबलपुर नर्मदा नदी के कारण प्रारम्भ से ही संस्कृति और संस्कार का केन्द्र रहा। पूर्व में यह जाबलिपत्तन नाम से जाना जाता था। जिसका सम्बन्ध जाबालि ऋषि की तपस्या स्थली से है। इसे ही वर्तमान में जबलपुर नाम से जाना जाता है। यहाँ 12वी शताब्दी में गौंड़ शासकों का और बाद में कलचुरी शासकों का राज्य रहा। 1116 में राजा मदन शाह ने पहाड़ी पर महल एवं भवन बनवाया था। यह स्थल नैसर्गिक सौन्दर्य के कारण प्रसिद्ध है। जबलपुर से करीब 20 किमी. दूर भेड़ाघाट प्रसिद्ध दर्शनीय स्थल है। बानगंगा और नर्मदा की मिलन स्थली है। इसका सम्बन्ध भृगु ऋषि से है। संगमरमरी भित्तियों के कारण मध्य संकरे मार्ग से नर्मदा बहती है। बन्दर के कूदने के कारण ही इसे ‘बन्दरकूदनी’ कहा जाता है। नर्मदा का प्रसिद्ध प्रपात धुंआधार है। जबलपुर क्षेत्र में ही लमेटाघाट एक रमणीय स्थल है। इसके अलावा तिलवाराघाट, ग्वारीघाट, दरोगाघाट तथा ब्राह्मण घाट (बरमान घाट) नर्मदा तटवर्ती तीर्थ स्थल है। सप्तधारा नामक एक बहुत ही मनोरम स्थल है।

खजुराहो

मध्य प्रदेश के जिला छतरपुर में स्थित खजुराहो अपने मन्दिरों के लिये विख्यात है नवीं और बारहवीं शती के बीच निर्मित ये मन्दिर नागर शैली के बड़े उज्ज्वल कलात्मक स्वरूप हैं। खजुराहो आज एक ग्राम और दर्शनीय स्थल है। यह सागर अथवा निनौराताल नामक झील के दक्षिण पूर्व में बसा है। किसी समय यह विशाल और भव्य नगर था।

यहाँ पर लगभग 30 मन्दिर 950 ए.डी. से 1150 ए.डी. के मध्य चन्देल राजाओं द्वारा बनाए गये हैं। ये मन्दिर अपनी भव्यता को दर्शाते खड़े हुए हैं। प्रतिहार साम्राज्य के पश्चात चन्देल, कलचुरी तथा कच्छप आदि राजवंशों का उदय हुआ। प्रमुख मन्दिर- कन्दरिया महादेव का मन्दिर, लक्ष्मण, विश्वनाथ मन्दिर, देवी जगदम्बी और चित्रगुप्त मन्दिर, ये विशाल मन्दिर है। चौंसठ योगिनी, लालगुजा महादेव, मातंगेश्वर, नदी पार्वती बराह तथा महादेव मन्दिर आदि हैं। इनमें से कुछ बहुत छोटे हैं। इस समूह के सब मन्दिर हिन्दू धर्म के हैं। वैष्णव-शैव शाक्त और सौर सम्प्रदाय से सम्बन्धित है। पूर्वी समूह के मन्दिरों को धर्म की दृष्टि से दो समूह में बाँटा गया है-

1. हिन्दू मन्दिर 2. जैन मन्दिर

दक्षिण समूह में मात्र दो मन्दिर महत्त्वपूर्ण हैं एक दूलादेव और दूसरा चतुर्भुज मन्दिर। कुछ मन्दिरों में भग्नावशेष भी उपलब्ध है। कन्दरिया महादेव मन्दिर मध्य भारत स्थापत्य कला में सर्वोत्कृष्ट वास्तु कृतियों में अपना विशिष्ट स्थान रखता है। इसकी लम्बाई 102’3”x66’10’’x101’9’’ है। यह श्रेष्ठ मन्दिरों में से एक है।

चित्रकूट

झाँसी मानिकपुर रेलमार्ग पर चित्रकूट मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश राज्यों के अन्तर्गत आता है। चित्रकूट को ‘The hill of many wonders’ कहा गया है। यह क्षेत्र शान्तिपूर्ण विन्ध्य प्रदेश है जहाँ घने जंगल, चुपचाप बहने वाली नदी तथा कल-कल बहते झरने हैं। यह प्रवृत्ति का एक उपहार है। वनवास के समय राम लक्ष्मण सीता महर्षि अत्रि और अनुसुइया के यहाँ अतिथि बनकर रहे थे। महाकवि तुलसीदास भी अध्यात्म शान्ति हेतु यहाँ आये थे। अकबर के तीन नवरत्नों में से रहीम खान खाना ने जहाँगीर के क्रोध के कारण शरण ली थी।

मन्दाकिनी नदी किनारे रामघाट है जहाँ धार्मिक क्रियाकलाप होते हैं। यहाँ ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने बाल्य अवतार लिया था। तुलसीदास की कर्मस्थली भी रही है उनेक लिये प्रसिद्ध दोहा है-

चित्रकूट के घाट पर भई सन्तन की भीर।
तुलसीदास चन्दन घिसे तिलक देइ रघुवीर।।

रामघाट का दृश्य बड़ा ही मनोरम दिखाई देता है। मन्दाकिनी नदी का नील हरित रंग जिस पर नाव की सहायता से सैर किया जा सकता है। वहाँ के मनोरम दृश्यों को देखा जा सकता है।

इसके अलावा यहाँ कदमगिरी, अनसुइया आश्रम, गुप्त गोदावरी, हनुमान घाट तथा भरत कूप जैसे मनोरम स्थल हैं।

पर्यावरण को संरक्षित किये जाने के लिये वन और उसमें उपलब्ध वृक्षों और पशुओं को संरक्षित किया जाना आवश्यक है। मध्य प्रदेश का 95.2 हजार वर्ग किमी. क्षेत्र वनाच्छादित है। जिसका 35.8 प्रतिशत वन ही संरक्षित है। मध्य प्रदेश में वन्य प्राणियों से युक्त 9 राष्ट्रीय उद्यान हैं जैसे बाँधवगढ़, फॉसिल, कान्हा/ किसली, माधव, पन्ना, पेंच, सतपुड़ा, संजय तथा वन विहार। पूर्व में संत्रय (सीधी स्थित) राष्ट्रीय उद्यान सबसे बड़ा था परन्तु छत्तीसगढ़ निर्माण होने पर अधिकांश हिस्सा छत्तीसगढ़ में चला गया। वर्तमान में कान्हा किसली राष्ट्रीय उद्यान सबसे बड़ा है जो कि मण्डला जिले में 940 वर्ग किमी. क्षेत्र में फैला हुआ है।

इन सभी ऐतिहासिक, नैसर्गिक, सांस्कृतिक, धार्मिक स्थलों का अवलोकन कर उसके सौेन्दर्य से चित्रकार अभिभूत हुए। मध्य प्रदेश के स्थलों का महत्व उन्होंने अपनी तूलिका के माध्यम से व्यक्त किया। यदि हम मध्य प्रदेश के चित्रकारों की कला पर दृष्टि डालें तो यह अहसास होता है कि चित्रकारों ने यहाँ के सभी पहलुओं को लेकर चित्र बनाये हैं और प्रकृति (पर्यावरण) के सभी तत्वों को महत्व प्रदान किया है। वह नर्मदा का जल हो चाहे मालवा का पठार निमाड़ की धरती का सौन्दर्य और मानव जीवन, चाहे बुन्देलखण्ड का ओजपूर्ण सौन्दर्य या बघेलखण्ड का लोक-जीवन, सभी को अपने चित्रों में समाहित किया है। दृश्य चित्रकारों ने यहाँ की हरीतिमा के मध्य यहाँ के मन्दिर-मस्जिद, विभिन्न वास्तुकला, पुरातत्वीय महत्व के स्मारकों, जीव-जन्तु का चित्रण किया। चित्रकारों की दृष्टि ने नगण्य माने जाने वाले स्थलों को भी चुना। चित्रों द्वारा पर्यावरणीय महत्व के प्रति जागृत भी किया।

श्री डी.जे. जोशी की कला शैली

मध्य प्रदेश में चित्रकला के क्षेत्र में श्री डी.जे. जोशी देवकृष्ण जटाशंकर जोशी मालवा अंचल के प्रमुख चित्रकारों के रूप में जाने जाते हैं। इन्दौर चित्रकारों द्वारा स्थापित ‘फ्राइडे ग्रुप’ के संस्थापक सदस्य भी रहे। आप प्रकृति प्रेरित चित्रकार रहे और आप में प्रभावशाली शैली के गुण स्वतः आ गये। नर्मदा के झिलमिलाते सौन्दर्य ने आभासात्मक शैली की ओर प्रेरित किया। “आभासित चित्रकला प्राकृतिक रूपों को चित्रित करने की शैली है इसके द्वारा आसानी से व्यवहार कुशलता, चमत्कार, टेक्नीक के आधार पर प्रकृति के रूप बनाये जाते हैं, जो दूर से देखने पर स्वाभाविक लगते हैं।”

जिस प्रकार प्रकृति के रूप सूर्य के प्रकाश के परिवर्तन के साथ बदलते रहते हैं, उसी के अनुसार प्रकाश और छाया का सम्मिश्रण दृश्य अथवा वस्तु को कलात्मक स्वाभाविक रूप प्रदान कराता है। इस आभासिक (प्रभाववादी) चित्रकला में टेक्सचर को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है।

डी.जे. जोशी के चित्रों में रंगों के कतरों से विभिन्न पोत का निर्माण किया गया। अतः इन चित्रों को भारतीय प्रभाववादी शैली में रखा गया। अल्हड़पन ने महेश्वर के सौन्दर्य को देखने की निजी दृष्टि प्रदान की। नर्मदा नदी पर पड़ने वाली चमकीली सूर्य किरणों से उत्पन्न स्पन्दन और झिलमिलाहट का प्रभाव साथ ही अथाह जलराशि की बदलती रंगत और लहरों पर पड़ने वाले प्रकाश के रंग का प्रभाव उनके दिल दिमाग को उद्वेलित करता रहा। यही कारण था कि उनके चित्रों में प्रभाववादी शैली दृष्टिगत हुई। जोशी जी के चित्रों की एक ओर विशेषता यह है कि उनके द्वारा चित्रित परछाइयाँ भी स्याह न होकर पारदर्शी तथा स्पन्दन से झिलमिलाती प्रतीत होती हैं।

इसी प्रकार दृश्य चित्रों में नर्मदा जल का विस्तार, नौका में सवार लोग नर्मदा घाट, नीलाभ आकाश, पर्व स्नान, सुबह का सौन्दर्य, सेतु, पर्वत शिखर की नाटकीयता, विविध रंगों और परिधानों में जनसमूह एक नया दृश्य संसार रचता है। इन दृश्य चित्रण में दूर दृश्य-लघुता के दर्शन होते हैं।

डी.जे. जोशी ने कलात्मक जीवन काल में लगभग 3000 चित्रों की रचना की। चित्र हो या मूर्ति उनकी अपनी पहचान स्पष्ट दिखाई देती है। आपके प्रमुख चित्रों में निम्नलिखित दृश्य चित्र प्रमुख हैं-

1. ओंकारेश्वर, 2. महेश्वर, 3.पिछोरा झील, 4. धुँआधार, 5. अमरकंटक, 6. पर्व स्नान, 7. भेड़ाघाट, 8. अहिल्या घाट-महेश्वर, 9. मंडलेश्वर, 10. रेवा तट, 11. हाट बाजार, 12. सेतु, 13. सुबह का सौन्दर्य, 14. वटवृक्ष, 15. नर्मदा तट. 16. रेवा की रंगत. 17. धार की गली, 18. भोपाल गेट, 19. नेमावर (अन्तिम चित्र), 20. वार्सोवा, 21. नर्मदा तट, 22. स्नान, 23. जुमेराती भोपाल, 24. भीमबेटका, 25. हार्वेस्टिंग सीरिज, 26. गाँव का सबेरा, 27. व्हीट प्रोडक्शन, 28. डॉन ऑफ द न्यू एरा।

मालवा के चित्रकारों में आप अपनी मौलिक शैली के कारण पहचाने जाते हैं। मध्य प्रदेश शासन ने आपको अपनी निजी शैली में संरचित कार्यों के आधार पर ही 1981 में शिखर सम्मान प्रदान किया। हुसैन और बेन्द्रे तो प्रदेश छोड़ अन्तरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्ति की दौड़ में शामिल हुए। किन्तु डी.जे. जोशी ने अकेले ही मध्य प्रदेश में रहकर मध्य भारत का प्रतिनिधित्व किया। वे इस प्रदेश की महत्त्वपूर्ण हस्ती के रूप मे स्वीकारे गये।

आपने बहुत सी विधियों में चित्रण कार्य किये हैं जैसे-

1. रेखांकन
2. पारदर्शी विधि- जल रंग
3. अपारदर्शी विधि- पेस्टल एवं तेल रंग
4. टेम्परा विधि
5. मिश्रित विधि

डी.जे. जोशी की कला यात्रा बचपन से ही प्रारम्भ हो गई थी। वे सर्वप्रथम पर्यावरणीय सौन्दर्य को आत्मसात करने के उद्देश्य से यहाँ-वहाँ घूमते रहे। इस स्वच्छन्द प्रवृत्ति ने प्रकृति सौन्दर्य से अवगत कराया। सबसे पहले वे दृश्याकंन के लिये बिट्स की तलाश के लिये आदिवासी क्षेत्रों की यात्रा करते थे। सूक्ष्म निरीक्षण पश्चात ही वे चित्र बनाते थे। इसके लिये उन्होंने दो प्रविधियाँ अपनाई हैं-

1. स्वयं स्थल पर उपस्थित रहकर और
2. इनडोर वर्क

Outdoor work सामान्यतः स्केचेज और लघु आकार में चित्रण होता था। और Indoor work वृहदाकार में जिनका आधार स्केचेज ही होते थे। बिट्स तलाश के समय छोटी स्केच बुक सदैव साथ होती थी। उन्होंने एक रंगी और बहुरंगी रेखांकन किये। उनका मानना था कि स्केचिंग कम-से-कम इम्पीरियल साइज में अवश्य होनी चाहिए। रेखांकन में रेखाओं का अनवरत प्रवाह और परिप्रेक्ष्य दिखाई देता है। रेखाएँ आपस में उलझी हुई अस्पष्ट होती हैं, जिनमें आकृतियों का आभास ही दिखाई देता है, साथ ही दूरदृश्य लघुता (Perspective) के दर्शन होते हैं।

आपने जल रंग, तेल रंग, पेस्टल और मिश्रित रंगों में चित्रण कार्य किया। चित्र निर्माण के समय कलर पैलेट पर 32 रंगों को एक साथ रख कर उपयोग में लाने की विशेष विधा में प्रवीण थे। प्रारम्भिक भू-दृश्य जल रंग में और बाद के पोस्टर रंगों से ओपेक पद्धति में बनाये। चित्रों के लिये रंगीन कागज को लिया जाना अधिक पसन्द था। रंगों के रेखांकन के बीच से सांकते पेपर का अपना अलग महत्व था। रेखांकन के पश्चात शीघ्रता से चौड़े ब्रश से पूरी सतह भर दी जाती थी फिर छोटे ब्रश से पारदर्शी रंगों पर शुद्ध चटख रंग-संघात की प्रक्रिया शुरू होती थी। ये ब्रश संघात कहीं मानवाकृतियों का आभास देते थे तो कहीं प्रकाशीय स्थल का। छाया के लिये विशेषतः नीले रंगों का प्रयोग किया। आपके द्वारा सृजित भू-दृश्यों में सघन क्षेत्रों और शान्त जल विस्तार के सपाट क्षेत्रों का आकर्षक मेल दिखाई देता है।

श्री डी.जे. जोशी ने प्रारम्भ में प्रभाववादी और कालान्तर में निजी शैली विकसित की। जिसमें भारतीय चिन्तन और पाश्चात्य वास्तुपरकता दिखाई देती है। इसमें बड़े-बड़े धरातलों पर रंग को ट्यूब से सीधे निचोड़कर रेखाओं द्वारा ही आकार भरने की विधि अपनाई। प्लाईवुड पर टेम्परा विधि से चित्र बनाये। इसमें चित्रों की सतह को रगड़कर छितराये चिकने धब्बे उभारे गये। इस शैली में आभासात्मक प्रभाव के स्थान पर बाह्य रेखा अधिक प्रभावशाली हो गई है। ‘डॉन ऑफ एरा’ आधुनिक काल्पनिक चित्र भी बनाये ‘नेमावर’ आपका अन्तिम चित्र है।

इस प्रकार आपने अपनी समृद्धशाली चित्र शृंखला बनाई। आपके इन समृद्धशाली चित्रों का मूल्यांकन या व्याख्या किया जाना बहुत मुश्किल कार्य है। फिर भी शोधार्थी का एक छोटा सा प्रयास है।

दृश्य चित्रण


अहिल्या घाट महेश्वर-तेल चित्र

श्री देवकृष्ण जटाशंकर जोशी का तेल रंग में बना अहिल्या घाट महेश्वर का है। यह प्रभाववादी शैली में आयताकार रूप में बना है। ऐतिहासिक महत्व के इस चित्र में महेश्वर में नदी किनारे किला बना हुआ है। जो कि ऊर्ध्व और लम्बवत रेखाओं से बना है। स्नानार्थियों की भीड़ किले के द्वार पर आती-जाती प्रतीत हो रही है। नदी किनारे नाव में बैठे रंग बिरंगे परिधानों में आकर्षक प्रतीत हो रहे हैं।

चित्र में कलात्मक तत्वों के आधार पर यह विषम विभक्ति तल पर किले की Horizontal line उसके आधार प्रदान कर रही है वहीं इसकी Vertical line किले के वैभव को दिखा रही है। द्विआयामी तल पर त्रिआयामी प्रभाव दिखता किला अडिग खड़ा है। चित्र देखने में प्रभाववादी शैली में बना प्रतीत होता है। इस शैली में परिप्रेक्ष्य और प्रकाश का बड़ा महत्व है। यही उस किले को घनत्व प्रदान कर रहा है। यह चित्र सुबह के समय घाट का प्रतीत होता है। इस चित्र पर दृष्टि डालने पर आकर्षण का केन्द्र इस किले का द्वार है, जो सर्वाधिक प्रकाशित है। इसकी तरफ जाती हुई भीड़ केन्द्रीयकरण सिद्धान्त में सहयोग प्रदान कर रही है। इस स्थापत्य में पीछे की ओर बने गुम्बद और मन्दिर गहरे रंगों में बने हैं। आपने सामंजस्यपूर्ण रंगों का प्रयोग किया है। आकाश में लगाये गये रंग का प्रभाव नर्मदा के जल पर पड़ रहा है। नदी में नाव में बैठे लोगों के परिधान लाल पीले नीले रंग के कतरों को लगा कर बनाया गया है। स्थापत्य का गहराई वाला हिस्सा व Birnt Sienna और Burnt Umber के गहरे और हल्के तानों से बना है। इसके सरोखे और बुर्ज सन्तुलन बना रहे हैं। अतः यह कहा जा सकता है कि यह चित्र सृजन तत्वों से परिपूर्ण सामंजस्य प्रभावित करने वाला आकर्षक ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व को दर्शाता हुआ चित्र है।

2. दृश्य चित्र-2
रेवा तट-जल रंग

यह आकर्षक चित्र रेवा तट का है। जिसमें आकाश का विस्तार, रेवा का जल विस्तार तट पर तिर्यक भूमि तथा नाव पर सवार यात्री दिखाई दे रहे हैं। नदी किनारे की जमीन पर बनी मानवाकृतियाँ अपेक्षाकृत बड़ी दिखाई दे रही हैं। दूरी पर बना पहाड़ दूर-दृश्य लघुता का आभास करा रहा है। Blue tone का यह आकर्षक चित्र जिसमें नदी की सतह को तिरछी काटती हुई भूमि बनी है, यही इस चित्र के आकर्षण का केन्द्र है। भूमि पर लयात्मक रेखाओं का प्रयोग किया है। छाया प्रकाश वाले धूमिल और चटख रंगों का प्रयोग दिखाई देता है। धूमिल रंगों के साथ प्रकाशित स्थलों पर पीला नारंगी और लाल रंग लगाया है। इन रंगों की तीक्ष्णता कम करने के लिये हरे और नीले रंग के ब्रशघात लगाये हैं। जामुनी नीले आकाश में उड़ते बादलों की उपस्थिति नाटकीय प्रभाव दर्शा रही है। जिसका प्रभाव जल पर भी दिखाई दे रहा है। नीले रंग की हल्की ताने प्रकाशवान सतह को दिखा रही है। जल की लहरों को काटती मानवाकृतियों से युक्त नावें लयात्मकता प्रस्तुत कर रही हैं। तट पर दूर खड़ी आकृतियाँ धुंधले रंगों में बनाई गई हैं। Cobalt blue में बनी पहाड़ी Atmospheric perspective का प्रभाव दे रही है।

इस सम्पूर्ण चित्र में आकाश का नाटकीय विस्तार, जल की चंचलता भूमि के लयात्मक आधार, रंगों की आकर्षकता, प्रकाशित और अप्रकाशित रंगों के ब्रशाघात, पूरक रंगों के प्रयोग से सामंजस्य उत्पन्न कर लयात्मकता प्रस्तुत की है। अतः यह चित्र निर्माण सिद्धान्तों के अनुरूप सृजित किया गया है।

3. दृश्य चित्र-3
सुबह का सौन्दर्य- जल रंग

श्री डी. जे. जोशी द्वारा जल रंग में बनाया गया ‘सुबह का सौन्दर्य’ नामक चित्र में भवनों के मध्य गली की सुबह दिखाई है। जिसमें दोनों और मकान बने हुए हैं। दूर बने मकान छोटे आकार के बने हैं। सीधे हाथ की तरफ मन्दिर है। सामने छज्जेदार दुकानें बनी है। चित्र के अग्रभाग में जनसमूह दिखाई दे रहा है।

जल रंग से ओपेक विधि में बना हुआ चित्र संरचना में स्थापत्य होने से सशक्त ज्यामितीय रेखाओं का आभास होता है। आयताकार, त्रिभुज अर्धवृत्त आकारों की उपस्थिति सार्थकता प्रकट करती है। चित्र के अग्र भाग में खड़ी एवं क्रियाशील मानवाकृतियाँ बनी हैं। श्री डी.जे. जोशी रंगों के कारण ही पहचाने जाते हैं। आकाश इस भीड़ भरे माहौल में आँखों को शान्ति प्रदान कर रहा है। आकाश की लालिमा सुबह के समय होने का आभास करा रही है। इसमें नारंगी, कोबाल्ट ब्ल्यू रंग के कतरों से बना आकाश है मन्दिर हल्के नारंगी रंग से बना है। यह सुबह के समय सूर्य से प्रकाशित हो रहा है। सुबह के समय में छाया के प्रभाव से सीधे हाथ की तरफ बने भवन और सम्भवतः मन्दिर की छतरी Brown, blue, green और Yellow ochre रंगों में बने हैं जो छाया के कारण कम प्रकाशवान हैं। भवन में Crimson और Purssion blue रंग किया है जो आकाश में सामंजस्य स्थापित कर रहा है। अग्रभूमि में चित्रित मानवाकृतियों का कुछ भाग दिखाई देता है कुछ छाया में विलीन हो जाता है। मानवाकृतियों का हुजूम जोशी जी के चित्रों की विशेषता है। इसमें आकार और रंगों का सामंजस्यपूर्ण चित्रण किया गया है।

यह चित्र कलात्मक विशेषताओं के साथ ही विषय की सार्थकता प्रकट कर रहा है।

4. दृश्य चित्र-4
सेतु

सेतु विषय को लेकर बनाया गया यह चित्र जल रंग से ओपेक विधि से बनाया हुआ है। नदी के ऊपर पुल आकर्षण का केन्द्र है। यह ऊर्ध्व आयताकार में बना हुआ है। इस चित्र में अधिकांश हिस्सा भू-आवेष्ठित है, तिरछी गहरे रंग में नदी बह रही है। इस नदी पर पुल बना हुआ है। यह पुल दो जगहों से मुड़ाव लिये हुए है। पुल के अग्र हिस्से में बनी मानवाकृतियाँ बड़ी हैं और पुल पर दूर जाती मानवाकृतियाँ अपेक्षाकृत छोटी बनाई हैं। जामुनी रंग की नदी पर हल्के रंग लगाये गये हैं। दूरी पर एक वृक्ष बना हुआ है उसके पार्श्व में मकान बने हैं।

इस दृश्य चित्र का संयोजन आपने बड़ी ही कलात्मकता से किया है। चित्र तल को भूमि और पुल के द्वारा विभक्त किया गया है। इस चित्र में लम्बवत रेखाओं से मानवाकृतियाँ और मकान बने हैं। कर्णवत रेखा से पुल और प्रवाही रेखाओं से तट भूमि जमीन विषम कोणीय रेखाओं द्वारा सृजित की है। अग्रभाग की मानवाकृतियाँ नारंगी सफेद रंग मेें बनी हैं जो पुल की रेखा को पार कर रही हैं जिससे पुल पर बनी आकृतियों से बड़ी प्रतीत हो रही है। इसमें रेखीय और वायवीय दोनों ही परिप्रेक्ष्य दिखाई दे रहे हैं। Left side में बना मन्दिर और सामने की भूमि में त्रिआयामी प्रभाव दृष्टिगोचर हो रहे हैं। आकारों और रंगों में रोचकता बनाये रखने के लिये सामने की ओर स्पष्ट तीव्र ब्रशघात लगाये गये हैं। नदी के पानी का रंग गहरा होने के कारण आकर्षकता बढ़ गई है। दूरी पर बनी भूमि और आकृतियों में मिश्रित ब्रशाघात लगाये गये हैं। इससे दूर दृश्यलघुता दिखाई देती है। रंगत के हल्के और गहरेपन का चातुर्य चित्र में दिखाई देता है।

इस चित्र में वर्णों की संगति और सन्तुलन का भली-भाँति प्रयोग किया है। रंगों में सौम्यता चंचलता और टेक्सचर दिखाई देते हैं। यही श्री जोशी के चित्रों की विशेषता है। कलात्मक तत्वों के आधार पर यह चित्र श्रेष्ठ है।

विष्णु चिंचालकरविष्णु चिंचालकर 2. श्री विष्णु चिंचालकर की कला शैली

श्री विष्णु चिंचालकर इन्दौर मध्य प्रदेश के मूर्धन्य कलाकारों में से हैं। आप प्रकृति प्रेमी तथा चित्रकार के रूप में जाने जाते हैं। बिम्बात्मक स्वरूपों को सुलभ संसाधनों से बनाना आपके रचनाकर्मों मे शामिल है। आपके सभी माध्यमों में कार्य किया है। पेन्सिल स्केच, जल रंग तथा तेल रंग आदि। आपने सबसे अच्छे और सर्वसुलभ नैसर्गिक साधनों में कलात्मक सौन्दर्य की खोज की। सूखी लकड़ी, टहनियाँ, सूखे पत्ते, सूखे मेवों की खोल, पौधों की जड़ें, आम की गुठलियाँ, तार की जाली, पेड़ों की छाल आदि रंगों के स्थान पर प्रयोग किये जाते थे। आपने इन सजीव-निर्जीव वस्तुओं को साकार किया। आपने पर्यावरणीय अपशिष्ट पदार्थों को कलाकृतियों का रूप प्रदान किया। यहाँ तक की Parallelism work में आने वाले व्यर्थ पदार्थ ने भी कलाकृति का रूप धारण किया। आपने यह सिद्ध कर दिया कि प्रकृति में उपस्थित कोई भी जीवित-अजीवित चीज सौन्दर्यपूर्ण आकार ग्रहण कर सकती है। आपने बच्चों के लिये ‘खुलते अक्षर लिखते फूल’ का सृजन किया। जमीन पर उपस्थित रहकर समस्त पर्यावरण आपके लिये पाठशाला थी। इसमें रहकर आपने पर्यावरण से सम्बन्धित सृजन कार्य किया। आपकी असंख्य कलाकृतियों में से कुछ कलाकृतियों का मूल्याकंन कला तत्वों के माध्यम से करना चाहूँगी।

दृश्य चित्रण
5. दृश्य चित्र-1 (Pencil Sketch)

रंगीन पेन्सिलों से बना आकर्षक दृश्य चित्र किसी का भी ध्यान आकर्षित करने में सक्षम है। कलात्मक गुणों से सम्पन्न चित्र पेन्सिलों (रंगीन) से बना है। इसमें लयात्मक रेखाओं से वृक्ष तथा कच्चे घर बनाये हैं। वृक्ष के पार्श्व में Darkish brown color का वृक्ष है। इसके नीचे मैदान में एक गाय खड़ी है जिसकी परछाई भी दिखाई दे रही है। इससे दोपहर के समय का पता चलता है। पार्श्व में दो झोपड़ियाँ हैं जिसके सामने कुछ वनस्पतियों की झाड़ियाँ हैं और पार्श्व में हरे रंग की पेन्सिलों की विभिन्न तानों से वृक्ष के होने का आभास कराया गया है। गाय की परछाई और घर की परछाई में समय का साम्य दिखाई दे रहा है।

यह चित्र पेन्सिल की सशक्त रेखाओं से सृजित है। सामने वाले वृक्ष झोपड़ी मैदान में त्रिआयामी प्रभाव दिखाया है। ऊर्ध्वागत वृक्ष को पेन्सिल चला कर रंग से त्रिआयामी प्रभाव दिखाने का प्रयत्न किया है।

इस चित्र में संयोजन में केन्द्रीयकरण का नियम अपनाया गया है। गाय पर ही हमारी प्रथम दृष्टि पड़ती है। पेड़ का तना और शाखाएँ इसमें सहयोग प्रदान कर रहे हैं। घर की दीवार पर परछाई बनी हुई है। इसमें चित्रित घर में त्रिआयामी प्रभाव है और घर के अन्दर की ओर की गहराई भी परिलक्षित हो रही है। यह सम्पूर्ण चित्र आकर्षण का केन्द्र है।

6. दृश्य चित्रण-2

यह दृश्य चित्र लकड़ी और फर्रों से बना है जो इनकी निजी शैली दर्शा रहा है। यह भारत भवन की कलादीर्घा में संग्रहित है। प्लाईवुड की एक सतह पर पुराने फर्रों से नदी किनारे की बड़ी बिल्डिंगें बनी हैं। जिसमें छाया प्रकाश समुचित रंगों की लकड़ी से बना है। इसमें जल का प्रवाह भी प्लाई की प्राकृत रेखाओं से बना है। सम्पूर्ण चित्र में एक टेक्सचर युक्त संयोजन है। जिसमें हल्की-गहरी-तानों से छाया प्रकाश दिखाया गया है। आकाश और जल चित्र में अन्तराल प्रदर्शित कर रहा है, जिससे चित्र में उपस्थित वास्तु स्पष्ट दिखाई दे रही है। सामने की ओर बनी तिर्यक दीवार से समरसता के साथ आकर्षण उत्पन्न हुआ है। अतः यह चित्र विशिष्ट शैली में होने के साथ ही कलात्मक नियमों को पूर्ण करता है। यह एक एप्लाइड दृश्य चित्र है, जिसमें मनोरमता, स्थायित्व, विशालता, स्पष्टता के गुण विद्यमान हैं।

7. दृश्य चित्रण-3

वाश शैली में बना यह चित्र माण्डव की प्रसिद्ध सफेद इमली का है जो पत्तियों से रहित है। इसके पीछे की ओर मकबरा बना है। इसके पास भी पत्तियाँ रहित इमली का पेड़ है अब बस झाड़ियां लगी हैं। प्रभाविता का सिद्धान्त दर्शाता इमली का वृक्ष है, जिसे दो बच्चे निहार रहे हैं।

यह चित्र कलात्मक दृष्टि से परिपूर्ण है। कलाकार ने इसे कलात्मक तत्वों का ध्यान रखते हुए शीतल-सौम्य रंगों से सृजित किया है। इससे रेखीय ओर वातावरणीय परिप्रेक्ष्य का ध्यान रखा है। पास का वृक्ष स्पष्ट, सशक्त रेखाओं से बना है। इस वृक्ष की एक शाखा नीचे की ओर से उर्ध्व में निकलकर सन्तुलन उत्पन्न कर रही है। इस वृक्ष के आस-पास किञ्चित सुखी और हरी-पीली घास दिखाई है। वृक्ष को त्रि-आयामी प्रभाव दिया गया है। इसके ऊपरी शाखाओं का फैलाव नृत्य की मुद्रा में प्रतीत होता है। इस वृक्ष को देखते हुए दो बच्चे चित्र में आकर्षक को बढ़ा रहे हैं। पीछे की ओर बना मकबरा और इमली का वृक्ष परिप्रेक्ष्य दिखा रहा है तो आकार में टी के अनुसार छोटा और धुंधले रंगों से बना है। चित्र तल के आधे से अधिक हिस्से में आकाश बनाया है, जिससे दृश्य में आकर्षण, महत्व, सन्तुलन उत्पन्न हुआ है। अतः यह उनका श्रेष्ठ दृश्य चित्र है।

8. दृश्य चित्रण-4

यह ऊर्ध्व आयताकार चित्र ब्राउन पेपर के धरातल पर पोस्टर रंगों से बना है। ईश्वर की महत्ता दर्शाता हुआ मन्दिर और उसके सामने लगी दुकानें और जनसमूह आकर्षकता उत्पन्न कर रहा है।

श्री विष्णु चिंचालकर का यह चित्र ब्राउन पेपर पर बना होने से सतह का भी अपना महत्व है। चित्र में ब्राउन पेपर का छूटा हुआ हिस्सा भी चित्र का ही भाग बन जाता है। आपने अनावश्यक वस्तुओं का भी चित्र में उपयोग किया है। कलात्मक दृष्टि से कलाकार ने कला के तत्व और सिद्धान्त का पालन किया है। मन्दिर और सामने लगी दुकानों के टेंट में रेखाओं की स्पष्टता है। ज्यामितीय आकारों में आयताकार त्रिभुज, विषम चतुर्भुज अर्ध वृत्ताकार और अनियमित आकारों का प्रयोग किया है। ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व प्रकट करता हुआ चित्र रंगों की आकर्षकता, सौम्यता और सन्तुलन को दर्शा रहा है। हल्के आसमानी रंग के आकाश में Burnt Sienna और White colour के मिश्रण से एवं हल्की गहरी तानों से मन्दिर है, जिसके परछाई युक्त स्थानों में आसमानी रंग के स्ट्रोक्स लगाकर सन्तुलन उत्पन्न किया है। टेन्ट में ज्यामितीय परिप्रेक्ष्य दिखाया गया है। अन्य कपड़ों के टेन्ट भी दुकानों में लगे हैं। गहरे रंगों के उपयोग से हल्के रंगों में उभार लाया गया है। सफेद, नीला, पीला, लाल रंग से मानवाकृतियों का चित्र जीवन्त हो रहा है।

इस प्रकार सम्पूर्ण चित्र मे रेखाओं की लयात्मकता, स्पष्टता अनुरूप आकार और रंगों का सन्तुलन, रंगों की स्वच्छता और सौम्यता दिखाई देती है। ब्रशाघातों से उत्पन्न टेक्सचर पर्याप्त अन्तराल चित्र को दृश्यात्मक और आकर्षक बनाता है।

3. श्री चन्द्रेश सक्सेना की कलाशैली

श्री चन्द्रेश सक्सेना अपने रंग आकारों से पहचाने जाते हैं। आपने लगभग सभी माध्यमों में चित्रण कार्य किया। कागज कैनवास और प्लाइवुड पर यथार्थ जिन्दगी से जुड़े विषयों को लेकर चित्र बनाये। दृश्य चित्रों में इन्दौर, उज्जैन और माण्डव के दृश्य चित्र प्रमुखतः बनाये हैं। आपके चित्रों के विषय मध्य भारत के ग्रामीण अंचलों के नजदीक हैं। माण्डव के दृश्य वहाँ की भौगोलिक स्थिति बयाँ करते हैं। चित्रों में धूसर और चटख रंगों का प्रयोग करते हैं। मनमोहक मिश्रित रंग के संयोजन से चित्र मनोहारी बन जाता है। माण्डव के खण्डहर, सफेद इमली के वृक्ष, निमाड़ी व्यक्ति (स्त्री पुरूष) आपके चित्रों में विशेष महत्व रखते हैं। आपने जल रंग (वाश तकनीक) और ओपेक दोनों पर ही पूर्ण नियंत्रण किया है। तेल रंगों से चित्रण में तीव्र तूलिकाघातों का प्रयोग करते थे। आपने अलंकारिक, प्रभाव, अमूर्त, अर्ध अमूर्त शैली में कार्य किया है।

चित्रण में उनके अपने रंग थे। कभी पेड़ लाल, कभी भूरे, कभी पीले तो कभी इमरल्ड ग्रीन पेड़ भी दिखाई देते थे। यही कारण था कि लोग उन्हें color blind भी कहा करते थे। उनके रंग उनके मनोभावों को व्यक्त करते थे। उनकी सुबह पीले और नारंगी रंग से आच्छादित होती थी। उज्जैन के मन्दिरों के दृश्य चित्रों में भक्तों की श्रद्धा-भक्ति दिखाती है। साथ ही मन्दिरों का वैभव भी परिलक्षित करती है।

दृश्य चित्रण
9. दृश्य चित्रण-1

श्री चन्द्रेश सक्सेना के दृश्य चित्रों की पहचान तीव्रता से लगाये गये ब्रश संघातों से है। इस दृश्य चित्र में भूमि के हिस्से के दोनों ओर बड़े-बड़े पेड़ लगे हैं। तीन स्त्रियाँ पर तगाड़ी रखे हैं। एक स्री की गोद में बच्चा है। उल्टे हाथ के पेड़ के नीचे दो पुरूषाकृतियाँ विश्राम कर रही हैं। कुछ आकृतियाँ दूर जाती हुई प्रतीत हो रही हैं।

श्री चन्द्रेश सक्सेना का यह चित्र उनकी कलात्मक शैली की निजी विशेषता को प्रकट करता है। इस चित्र में सामने के वृक्ष के ट्रंक स्पष्ट बने हैं। तीन मानवाकृतियाँ रेखांकित की गई हैं। आपकी अपनी पहचान मौलिक रंगों से है। (आपने इस दृश्य चित्रण में हरा रंग नहीं लगाया है) फिर भी दूर से देखने से हरे रंग का आभास होता है। इसमें विशेषकर कोबाल्ट, पीले रंग की ऑरेंजिस रंगत का प्रयोग किया है। पेड़ों के तने परसियन ब्ल्यू की रंगत में बने हैं। सामने के वृक्ष में यलो ऑफर लगा कर तने को त्रिआयामी बनाया है। वृक्ष में बोल्ड स्ट्रोक के कारण वृक्ष आकर्षक बन गया है। गहरे रंग का प्रयोग वृक्षों के झुरमुट की गहराई देने के लिये किया है। मानवाकृतियों में हल्के रंगत से प्रकाश दिखाया है। भूमि बादामी रंगत की बनी है। इस चित्र में दूर दृश्यलघुता आभासी मानवाकृतियाँ और रंगों की आकर्षकता दृष्टिघात होती है। यह चित्र कलात्मक दृष्टि से नेत्रीय पटल के सिद्धान्त को प्रकट करता है।

10. दृश्य चित्र- 2

श्री चन्द्रेश सक्सेना द्वारा बनाया गया दृश्य चित्र रंगों के कारण विशिष्ट महत्व रखता है। प्रकृति में वृक्षों का रंग हरा होता है। लेकिन आपने इस दृश्य में नारंगी पीले, गुलाबी, बादामी रंगों का प्रयोग किया है। पानी के लिये जामुनी और गहरे नीले रंग को चित्र में स्थान दिया है।

यह दृश्य चित्र तालाब किनारे का है जिसमें किनारे पर बैठी और खड़ी मानवाकृतियाँ हैं। पत्थर की सीढ़ियाँ तालाब किनारे से वृक्षों के झुरमुट की ओर जाती बनी हुई हैं।

यह चित्र कलात्मक सिद्धान्त की पूर्ति करता है। केवल रंगों की सादृश्यता का न होना आबादी अपनी विशिष्ट शैली दर्शाता है। इस चित्र में समस्त पर्यावरणीय तत्व विद्यमान है। जल, भूमि, आकाश, अग्नि (प्रतीकात्मक रंग), प्रकृति तथा मानवाकृति आदि। इस चित्र में रेखांकन की लयात्मकता, शक्तिशाली प्रभाव दिखाई देता है। भूमि बादामी और मैपलिक पीला रंग किया है। वृक्षों के ट्रंक ब्राउन रंग के हैं और पत्तियों के झुरमुठ पीले बादामी और क्रीम रंग की रंगतों से बने हैं। गहराई और दूरी दिखाने के लिये गहरा ब्राउन और क्रिमसन रंग का प्रयोग किया है। इस दृश्य चित्र में कलात्मक तत्वों की उपस्थिति, वृक्षों के तनों और मानवाकृतियों में सामय (उर्ध्व आकार) भूमि का विस्तार, वृक्षों की दूरदृश्य लघुता, जल की तरलता और पारदर्शिता, रंगों की सौम्यता आदि चित्र को आकर्षक बनाती है। इन्हीं सब गुणों के कारण यह श्रेष्ठ चित्र है।

11. दृश्य चित्र-3
उज्जैन का घंटाघर

श्री चन्द्रेश सक्सेना द्वारा सृजित चित्र उज्जैन के घंटाघर का पोस्टर रंग में यथार्थावादी शैली में बना है। इस चित्र में आकर्षण का केन्द्र घंटाघर का स्थापत्य है, जो ज्यामितीय उर्ध्व आकार के कारण विकास और स्थायित्व दर्शा रहा है। आस-पास सीढ़ीयुक्त स्थापत्य (मकान) इस चित्र के संयोजन में सहायता कर रहे हैं। नीचे की ओर सौम्य परिधानों में स्री पुरूष मानवाकृतियाँ हैं। पशु आकृति पर सवार एक मानव भी दिखाई दे रहा है। मानवाकृतियों और स्थापत्य में Perspective स्पष्ट दिखाई दे रहा है जो किसी भी दृश्य चित्रण के लिये आवश्यक है। मानवाकृतियों को देखने से ज्ञात होता है कि यह चित्र ऊपर से देखकर बनाया गया होगा। इस चित्र में रेखाओं की स्पष्टता और रंगों की सौम्यता, छाया-प्रकाश के कारण उचित रंगों का प्रयोग, गहरे रंग लगाकर स्थापत्य की स्पष्टता और दूर के धुंधले मकान, आकृतियों का आभासात्मक शैली में बना होना ही इस चित्र की श्रेष्ठता दर्शाता है। अतः यह चित्र कलात्मक दृश्य चित्रों की श्रेणी में आता है।

12. दृश्य चित्रण-4

यह दृश्य चित्र एक गाँव का है जिसमें ज्यामितीय आकारों में परिप्रेक्ष्य युक्त मकान बने हैं। छप्पर के नीचे ग्रामीण मानवाकृतियाँ बैठी और खड़ी हुई बनी हैं। पास की आकृतियाँ बड़ी और दूर की छोटी हैं। सामने की भूमि और आकाश अन्तराल को इंगित कर रहा है जिससे मुख्य केन्द्र बिन्दु पर दृष्टि जा सके। गहरे हरे रंग का उपयोग सौम्य आकृतियों को उभारने के लिये किया गया। इस चित्र तल को कई Segments में विभक्त किया है। इसे ओपेक पद्धति में बनाया है। सफेद रंग से मिश्रित तानों का उपयोग किया गया है। यह पूरा चित्र आकर्षक और शीतल रंगों से बना है और कलात्मक नियमों को पूरा करता है।

4. श्री श्रेणिक जैन की कला शैली

5. डॉ. कर्ण सिंह की कलाशैली

डॉ. कर्ण सिंह समकालीन चित्रकारों में अपनी विशिष्ट पहचान स्वयं के सृजन कार्यों से बनाये हुए हैं। आप दृश्य चित्र और व्यक्ति चित्रण में समान रूप से सिद्धस्त कलाकारों के रूप में जाने जाते हैं। आपने जल रंग, तेल रंग, एक्रेलिक, पेस्टल आदि सभी माध्यमों में पेपर, कैनवस, बोर्ड आदि पर कार्य किया है। आपको दृश्य चित्रण करना विशेष प्रिय है। प्रकृति के सौन्दर्य को विभिन्न कोणों से आत्मसात कर चित्रित करने का प्रयास किया है। दृश्य चित्रों को सिद्धान्तों के अनुरूप बनाकर आकर्षकता और ठोसत्व प्रदान किया। आपने दृश्य चित्रों में अनेकों आकर्षक स्थलों का चित्रण किया है, जिनमें माण्डव का बहुतायत में चित्रांकित किया। 1977 में भीमबेटका में आयोजित दृश्य चित्रण कैम्प में हिस्सेदारी की। उज्जैन में आपको दृश्य चित्रण में ‘बेस्ट-अवॉर्ड’ प्राप्त हुआ। इन्दौर में रहकर इन्दौर के मुख्य स्थानों को चित्रित किया। ‘मेरा इन्दौर’ पेंटिंग प्रतियोगिता में आपके चित्र पुरस्कृत किये गये।

आपके दृश्य चित्रों में प्रकृति की विभिन्न छटायें उभरकर आती हैं। बादलों की नाटकीयता, प्रकाश का वास्तु, पर्वत शृंखला वनस्पति पर सुन्दर आक्षेप, गहरी तान से छाया का प्रभाव तथा मनुष्य और पशु पक्षियों की उपस्थिति दृश्य चित्रण में जीवन्तता ला देती है। यही नहीं खण्डहरों, गुम्बदों का सौन्दर्य, ऐतिहासिक उन्मुक्त गाथा गाता प्रतीत होता है। धरती कहीं समतल है, कहीं-कहीं ऊँची-नीची, कहीं छोटे पौधों से आच्छादित तो कहीं पत्थरों, चट्टानों की कठोरता लिये हुए। आपने यथार्थ और मस्तिष्क जनित दोनों प्रकार के दृश्य चित्र बनाये हैं। अमूर्त चित्र भी दृश्य चित्रण से प्रेरित जान पड़ते हैं। आपके उल्लेखनीय चित्रों में माण्डव के दृश्य चित्र प्रमुख रूप से हैं।

दृश्य चित्रण
17. दृश्य चित्र- 1 माण्डव खण्डहर

तेल रंग में निर्मित चित्र संयोजन की दृष्टि से श्रेष्ठ कृति है, जिसमें किसी महल का अवशेष भाग क्षितिज तक दिखाई देता है। लाल रंग के विभिन्न तानों से खण्डहर चित्रित है। जिसमें हल्की और गहरी तानों से त्रिआयामी बनाने का प्रयास किया है। वास्तुकला की संरचना से सशक्त रेखांकन का पता चलता है। खण्डहर की साम्यता के समान पृष्ठ भाग में शुष्क वृक्ष का अंकन किया है जो हरीतिमा रहित है। बादामी रंगत की धरती दूर तक जाती प्रतीत होती है। जो कि क्षैतिज रेखा तक चली गई है। इस चित्र में उपयोग में लाये गये रंग वायवीय प्रभाव दर्शा रहे हैं। दूर की पहाड़ी धुंधले रंगों में बनाई गई। सम्पूर्ण रूप से देखा जाये तो यह चित्र संयोजन के सिद्धान्तों में सटीक बैठता है। सौन्दर्य के महत्व को दर्शाता हुआ, यह एक श्रेष्ठ चित्र है।

18. दृश्य चित्र- 2
माण्डव

इस दृश्य चित्र में किसी किले का वास्तुशिल्प गौरव गाथा कह रहा है। किले की सशक्त दीवार में दूरदृश्य लघुता (Perspective) नियम का पालन चित्रकार ने किया है। किले का आकर्षक दरवाजे में प्रवेश करने के लिये चढ़ाईयुक्त सड़क है जिस पर गाड़ी, बैल और मानव पशुओं को ले जा रहे हैं। यह किला पहाड़ी पर बना है अतः एक ओर गहरी रंगतों से खाई बनी है। क्षितिज रेखा में अवस्थित पर्वत शृंखला पर सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति पीत रंगत से दर्शायी है। पर्वतों की ऊँचाई और जमीन की गहराई का आभास भूरे रंग से पता चलता है। बीहड़ में उपस्थित अल्प वनस्पति भी दर्शायी है,जो जीवन दर्शाती है। समतल सतह पर रंगतों से त्रिआयामी प्रभाव दर्शाने का प्रयास किया गया है। यह चित्र आकारों, रंगों, टेक्सचर की दृष्टि से एक सन्तुलित चित्र है इसलिये ही इसकी आकर्षकता विद्यमान है और कलात्मक दृष्टि से श्रेष्ठ चित्रों में से एक है।

19. दृश्य चित्र -3

चित्रकार कर्ण सिंह द्वारा बनाया गया दृश्य चित्र तेल रंगों से बना है। भूमि और वास्तु का संयोजन एक तिहाई हिस्से में किया गया है। भूमि पर बेतरतीब चट्टानें, गड्ढे और उभारयुक्त भूमि है। कहीं-कहीं हरे रंगत में झाड़ियाँ दिखाई दे रही हैं। घास का सुन्दर चित्रण भी है। पत्थरों के समूह भी बनाये हैं। छाया के लिये जामुनी रंग लगाया है। पार्श्व में ऐतिहासिक गुम्बद दिखाई दे रहा है।

इस चित्र में वायवीय परिप्रेक्ष्य, रंगों और विभिन्न तानों का उचित प्रयोग किया है। बादामी रंगत में बने चित्र में जामुनी रंगत की छाया का प्रयोग किया गया है। तान और पोत का सन्तुलित प्रयोग होने से चित्र आकर्षक बन गया है।

20. दृश्य चित्र - 4

यह चित्र आयताकार में तेल रंग से निर्मित है। इस चित्र में क्षैतिज रेखा ऊपर को चली गई है। आकाश के चित्रण में भी जामुनी रंगों की विभिन्न तानों से लयात्मकता दिखाई दे रही है। इस चित्र की अग्रभूमि ऊबड़-खाबड़ है। यह चित्र अर्ध आयामी शैली में बना है। इस चित्र से ही उनके चित्रों में काल्पनिकता का प्रवेश दिखाई पड़ता है। दूर की भूमि पर पहाड़ बना हुआ है और वही एक गुम्बद दिखाई दे रहा है। इस चित्र में रंगतों का हल्का गहरापन विद्यमान है। चित्र कलात्मक दृष्टि से अच्छा है। आकारों और रंगों का सन्तुलन दिखाई देता है। अग्र भूमि में सामान्यतया गहरी रंगतें और पार्श्व भूमि में हल्की रंगतों का प्रयोग दिखाई देता है।

डॉ. रामचन्द्र भावसारडॉ. रामचन्द्र भावसार 6. डॉ. रामचन्द्र भावसार की कला शैली

उज्जैन के ख्यात कलाकार डॉ. रामचन्द्र भावसार की कला मालवा की समृद्धशाली कलाओं में से है। दृश्य चित्रण कला आपको विशेष प्रिय है। पोर्ट्रेट, संयोजन और दृश्य चित्रण सभी में सिद्धहस्तता हासिल है। आपने मध्य प्रदेश के अनेक स्थानों को अपने चित्रों में बनाया है। जिनमें उज्जैन के घाट, मस्जिद, इन्दौर और भोपाल के रमणीय स्थल शामिल हैं। आपने Indoor और Outdoor दोनों प्रकार के चित्रों को बनाया है। Outdoor Lanscape छोटे आकार में और पेपर पर जल रंग से बनाये हैं जबकि Indoor Lanscape बड़े आकार में Oil या Acralic Color से बनाये हैं। आपने यथार्थवादी शैली में दृश्य चित्रण बहुतायत में किया है। प्रभाववादी शैली और अभिव्यंजनावादी शैली को भी आत्मसात किया है। आधुनिक कला से भी आप अछूते नहीं हैं। आपने दृश्य चित्रण के उद्देश्य को पूरा करने के लिये मध्य प्रदेश ही नहीं बल्कि उससे बाहर कश्मीर, कन्याकुमारी, नेपाल तक की यात्राएँ की। आपके चित्रों में दृष्टि डालने पर यह ज्ञात होता है कि आपने जल रंग, तेल रंग, एक्रेलिक और पेस्टल रंगों में चित्र बनाये हैं। दृश्य चित्रों में विषयों की विविधता दिखाई देती है जैसे ग्रामीण दृश्य, मन्दिर की ओर जाने वाले रास्ते, कश्मीर के दृश्य पर्वत शृंखलायें, नदी या तालाब के किनारे मन्दिर, नेपाल के बौद्धमठ और त्यौहार इत्यादि। आपने वॉश और ओपेक दोनों में ही बहुतायत काम किया है। तेल रंग में कार्य करना ज्यादा पसन्द है क्योंकि ऑयल कलर के रंगों की चमक अधिक समय तक बनी रहती है।

किसी भी दृश्य चित्र को आप मात्र 15 से 20 मिनट में पूर्ण कर देेते हैं। चित्र निर्माण शैली में द्रुत गति से चित्र तल को भर देते हैं। रंग लगाने में वे हाथ के अगूठे, ब्रश और कपड़े का भी प्रयोग करते हैं। सबसे बड़ी विशेषता यह है कि बिना स्केच किये दृश्य अथवा पोर्ट्रेट को सीधे ब्रश से पूर्ण कर लेते हैं। दृश्य चित्रण करे बारे में आपका मानना है कि दृश्य चित्र सृजन में जैसा दिख रहा है वैसा सृजन न कर कलाकार उसमें अपनी ओर से कुछ परिवर्तन कर नये प्रयोग करता है, कुछ जोड़ता है कुछ घटाता है। यही परिवर्तन उसकी व्यक्तिगत शैली बनाता है। यही नवीनता उसकी पहचान होती है। आपकी कला शैली की पहचान शीतल रंगों के साथ नारंगी, लाल, पीले उष्ण मालवी रंगों की उपस्थिति है। आपके दृश्य चित्र आकर्षक, कला सिद्धान्तों के अनुरूप और समृद्ध हैं। उनमें से कुछ चित्रों की व्याख्या की जा रही है।

दृश्य चित्र
21. दृश्य चित्र -1

डॉ. रामचन्द्र भावसार द्वारा सृजित दृश्य चित्र उज्जैन के माधव कॉलेज के चित्रकला कैम्प में बनाया गया है। यह एक माइन्ड स्केप है जो कैनवस पर एक्रेलिक रंगों से बनाया गया है। सतह को अनेकों भागों में विभक्त किया है इसमें एक बहुत ही सुन्दर दृश्य चित्र बना है, जिसमें एक बहती हुई नदी है, जिसके दोनों ओर नदी का किनारा है। पगडंडी पर मानवाकृतियाँ जा रही हैं। नदी किनारे हरे रंग का प्रफुल्लित प्रकृति पर्वतों के आगोश में बनाई गई है। पहाड़ में जामुनी रंग की रंगतें हैं तथा दूरस्थ पहाड़ हल्के नीले रंग का बना है। इसमें प्रकाश के कारण पर्वत का अधिकांश हिस्सा प्रकाशित हो रहा है। शीतल रंगों में बना यह मनोरम दृश्य कलात्मक रूपों से सृजित है और दृश्य चित्रण के नियमों में खरा उतरता है।

यह चित्र लयात्मक प्रवाहमान रेखाओं से अनियमित आकारों में बना है और कला के स्वर्णिम सिद्धान्तों को पूरा करता है। इसमें वातावरणीय परिप्रेक्ष्य दर्शित है। नदी में हरे रंग के पानी की निर्मलता प्रवाह और पारदर्शिता स्पष्ट दिखाई देती है। इसका प्रवाह सामने से पीछे की ओर दिखाया है। सामने के हिस्से में बड़े-बड़े पत्थर आकर्षक हिस्सा हैं। आसमान Light Cobalt Blue का है, जिसमें क्षितिज रेखा पर सफेद शुष्क संघात लगाकर आकाश को Rhythmetic बनाया गया है। रंगों, आकारों का सन्तुलन और आकर्षणता किसी भी दर्शक को आकर्षित करने में सक्षम है।

22. दृश्य चित्र- 2

यह दृश्य चित्र पर्वतों और झील के कारण मनोरम बना है, जिसमें नाव आकर्षण को बढ़ा रही है। नदी का किनारा हरे-पीले रंग की भूमि से बना है। इस पर दूर बनी हुई हरे रंग की वनस्पतियाँ बनी हैं। इस चित्र में छाया-प्रकाश का बड़ा महत्व दिखाई देता है। पहाड़ों में कोबाल्ट ब्ल्यू और सफेद के मिश्रण से नदी, आसमान और पहाड़ बनाये हैं। सूर्य प्रकाश का प्रभाव जल में दिख रहा है। यह चित्र भी कलात्मक दृष्टि से सम्पन्न है। इसमें रेखाओं की वर्तुलता, प्रवाह, रंगों का आकारों का सन्तुलन और परिप्रेक्ष्यता दिखाई गई है। भूमि में खड़ी मानवाकृतियाँ और नदी किनारे की बोट (नाव) चित्र के आकर्षण को बढ़ा कर नियमबद्ध कर रही है। अतः यह चित्र मनोरम और नियमानुकूल है।

23. दृश्य चित्र -3

शीतल रंगों में बना यह चित्र आयताकार कैनवस पर बना है। सम्भवतः यह ठंडे प्रदेश का चित्र है, जिसमें बर्फ से युक्त दूरस्थ पहाड़ आसमानी और सफेद रंग से बने हैं। इस चित्र तल को तीन लगभग समानान्तर भागों में विभक्त किया है। पहले ऊपरी हिस्से में आसमान और दृश्य-अदृश्य से बर्फीले पहाड़ हैं दूसरे हिस्से में नदी है तथा तीसरे छोटे हिस्से में जमीन बनी है, जिस पर पत्ते रहित दो वृक्ष बने हैं, जो नदी की रेखा को लम्बवत काटते हुए आकाश तक पहुँच रहे हैं। इन वृक्षों के पास ही दो मानवाकृतियाँ वृक्ष के आकार को सहयोग प्रदान कर रही हैं। नदी के दूसरे किनारे पर नीले धुंधले रंगों में वृक्षों का आभास हो रहा है। सफेद रंग से प्रकाशवान हिस्सों और जल की लहरों को बनाया है। भूरे और नारंगी वस्त्र पहने मानव इस शीतल रंग के चित्र को आकर्षक बना रहे हैं। यह चित्र आकर्षक और कलात्मक गुणों से युक्त है।

24. दृश्य चित्र- 4

उज्जैन में क्षिप्रा नदी का विहंगम दृश्य किसी पर्व सानी को दिखा रहा है। यह चित्र दो तिर्यक रेखाओं द्वारा तीन भागों में विभक्त है। नदी वास्तु और मानवाकृतियों का उल्टे हाथ की ओर बड़ी आकृतियों का बड़ापन और सीधे हाथ तरफ आकृतियों का छोटा होना परिप्रेक्ष्य की उपस्थिति दर्शाता है। नदी के घाट पर मन्दिरों का समूह और मानवों के झुण्ड धार्मिक अवसर को प्रदर्शित कर रहा है, जिस प्रकार श्री डी.जे. जोशी मानव समूह को बनाने में सिद्धहस्त थे उसी प्रकार श्री आस.सी. भावसार ने धार्मिक श्रद्धालुओं के समूह को चित्रित किया है। पास के किनारे के मानव बड़े आकारों में और दूर के मानव छोटे आकारों में बने हैं। यह रामघाट का दृश्य है इसमें मन्दिर दूरस्थ हरे वृक्ष बने हैं। क्षिप्रा का जल निर्मल पारदर्शी है किनारे पर हरे रंग का पानी है और दूरी पर किनारे पर बने वास्तुकला की परछाई पानी में दिखाई दे रही है। यह चित्र यथार्थवादी शैली में बना है। चित्रकार ने कला के सिद्धान्तों का पालन करते हुए बनाया है। अतः यह चित्र कलात्मक मूल्यों के अनुसार श्रेष्ठ है। यह नदी संस्कृति की आस्था प्रदर्शित कर रहा है।

अफज़ल पठानअफज़ल पठान10. अफजल की कला शैली

मध्य प्रदेश के कलाकारों में अफजल ‘देवास के कलाकार’ के रूप में पहचाने जाते हैं। सृजनशील, कर्मठ, दबंग प्रकृति के श्री अफजल का रचना संसार अनगिनत कलात्मक प्रवत्तियों से परिपूर्ण है। आपके दृश्य चित्रों में देवास की छवि दिखाई देती है। रेखांकन, दृश्य चित्रण, व्यक्ति चित्र, भित्ति चित्र, लाइफ स्टडी सभी का चित्रांकन सहज रूप में किया है। चित्रों की मूर्तता ने ही अमूर्त शैली को जन्म दिया। दृश्य चित्रण का छोटा सा हिस्सा अमूर्त संयोजन का रूप ले लेता है। आपने लगभग सभी माध्यमों में चित्रण कार्य किया। जल रंग, तेल रंग, पेस्टल, पेन्सिल सभी से रेखांकन एवं चित्रण किया। पेस्टल एवं तेल रंग दोनों में ही चित्र सृजन किया है। रतनलाल शर्मा से लैण्डस्केप की शिक्षा पाई। दृश्य चित्र बनाना आपको प्रारम्भ से ही पसन्द था। चित्र विषयों में मालवा की उर्वर भूमि हरितिमा को चित्रित किया है। चित्र शैली यथार्थवाद से होती हुई अमूर्तन की ओर उन्मुख हुई। यथार्थवादी शैली में मन्दिर, मस्जिद, देवास की टेकरी, गलियाँ, बस्तियाँ, पगडंडियाँ, नदी, तालाब, वनस्पतियों के झुरमुट के बीच से झाँकते स्थापत्य आदि प्रमुखतः हैं। मानवाकृतियों की आभासी उपस्थिति चित्र सौन्दर्य में चार चाँद लगा देती है। अफजल के रंग भूरे, कत्थई, नीले, काई रंग तथा हरितिमायुक्त हैं। रंगों की स्वच्छता और तीव्र रंगाघात के महत्व को प्रकट करता है। दृश्य चित्रण के तत्वों का उचित प्रयोग ही दर्शक को अपनी ओर खींचने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। रंगों का ब्रश-सन्धान विविध पोत बनाने में सहायक है और इस प्रकार नया प्रभाव उत्पन्न करते हैं। कला मानव की सहज अभिव्यक्ति हैं। मानव ने भित्तियों पर विभिन्न प्रयोग किये। ताड़पत्र छाल कपड़ा व कागज आदि जो भी मिला उसे ही सृजन का माध्यम बना लिया। वर्ण रूप पान के क्षेत्र में अनेक प्रयोग किये हैं। अफजल ऐसे कलाकार थे, जिसमें कला तत्व एवं उनका तालमेल (संयोजन) ही चित्रों में भिन्नता पैदा करता है। एक बिन्दु की भी अपनी शक्ति एवं ऊर्जा होती है। अफजल के दृश्य चित्रों को कला के तत्वों से परिभाषित करेंगे।

दृश्य चित्रण
37. दृश्य चित्र-1

सामने के दृश्य चित्र को देखते हुए एक आयताकार समतल कागज पर विभाजित कर स्थान की मौलिक वस्तुओं को क्षैतिज रेखाओं पर आकाश, भूमि, पेड़ एवं सीधा लम्बवत मन्दिर, पीछे पेड़, सामने स्त्रियों का झुण्ड, खड़े-बैठे, पार्श्व भूमि की प्रवाही रेखाओं का विभाजन है। रूप संयोजन में मन्दिर, स्त्रियाँ, पेड़ एवं भूमि का रूप अंकित है। प्रत्येक वस्तु विभिन्न रंग लिये हुए है। पास में पानी, जमीन, स्त्रियों के उपयुक्त रंगों का लेपन है। प्रकाश से ही तान का विभाजन ज्ञात होता है। मन्दिर सफेद है, पेड़ गहरा हरा निकट की भूमि और दूर की भूमि में द्विआयामी तल पर त्रिआयामी गुण दिखाई देता है। पानी में भी तान द्विआयामी प्रतीत होता है। स्त्रियों में भी वर्ण सहित तान से द्विआयामी आकृति दिखती है। चित्र भूमि पर अंकन कार्य ही स्थान होता है यह क्षेत्र रूप का निर्माण करता है। समस्त रूप संयोजन को एकता के रूप में पिरोए हुए है। चित्रकला सृजन में सभी तत्व मेल खाते हुए प्रतीत होते हैं। इस दृश्य में सभी तत्वों का समुचित रूप से वितरण है। चित्र में प्रभाविता का सिद्धान्त सर्वोपरि है। दृष्टि संयोजन के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्व पर सर्वप्रथम दृष्टि पड़ती है। आकृति और रंग के कारण गति की अनुभूति होती है। इस चित्र में क्षयवृद्धि पूर्ण रूप से दृष्टिगोचर होती है। यह सम्पूर्ण चित्र टेम्परा विधि से बना हुआ है।

38. दृश्य चित्र -2

यह चित्र तेल माध्यम में बना है, जिसे नाइफ से बनाया गया है। द्विआयामी तल पर ग्रामीण दृश्य मनोरमता के साथ प्रस्तुत किया गया है। चित्र एक संयोजन है जिसमें दृष्टिगत रूप तथा वर्णों आदि का प्रयोग होते हुए भी कलाकार अपनी प्रवृत्तियों का भी अंकन करता है। चित्र का कोई विषय नहीं होता कहानी नहीं होती, बल्कि चित्रकला में रेखा (line), रूप (Form), वर्ण (colour), तान (Texture), व अन्तराल (space) ही संयोजन का विषय है।

इन तत्वों के उचित संयोजन से ही अफजल के चित्र सृजन सफल हुए हैं। समय के अन्तर्गत इनको संजोने के ढंग से ही नई प्रविधि का जन्म हुआ है। यह आयताकार दृश्य चित्र तेल रंग से नाइफ द्वारा बनाया गया है। इसका विभाजन आकाश, समस्त भूमि पर, ग्रामीण मकान, मन्दिर, पेड़, डाली और मानव आकृतियाँ दर्शित हैं। चित्र का मूल्यांकन यदि कला के तत्वों के आधार पर करें तो इसमें सामान्यतया लम्बवत और कर्णवत रेखाएँ प्राप्त होती है जो गाँव के दोमंजिला मकान और अन्य घर तथा मन्दिरों को बनाती है। इसमें क्षैतिज कोणीय तथा चक्राकार रेखाओं आदि से तल विभाजन किया है। भूमि पर अंकन करते ही रूप का निर्माण होता है। मकान और छप्पर के रूप त्रिभुजाकार, विषम कोणीय, चतुर्भुज एवं पेड़ों के रूप विषम वृत्ताकार हैं। रूप की स्थिति अन्तराल के अनुपात से जानी जाती है। रेखांकन के ज्यादा रंगों का प्रभाव प्रकृति, मनोदशाओं तथा संवेदनाओं आदि से तय होता है। प्रकृति में सदैव कुछ-न-कुछ बदलाव अवश्य आता है। प्रकाश इस बदलाव का प्रमुख कारण है। इसकी उपस्थिति से ही रंगों की तान में परिवर्तन दृष्टिगत होता है। अफजल ने इस दृश्य चित्र में नाइफ से ओपेक प्रविधि से रंगों को लगाया है। आकाश में Redish gray colour मकानों में पीतवर्णीय प्रकाश का महत्व मकानों और झोपड़ियों में दृष्टिगोचर होता है। मन्दिर की चोटियाँ सफेद और मकान श्वेत, पीत छाया प्रकाश लिये हुए हैं। छप्पर हल्के नीले और भूरे रंग से बने हैं। मकानों को उभारने के लिये काले मिश्रित रंगों का उपयोग किया है। वृक्षों को गहरे हरे रंग से बनाया है। सम्पूर्ण चित्र को देखने से वर्णों की संगति (Harmony of colours) और सन्तुलन का भी उचित स्थान है। अफजल के रंगों की पद्धति, परिपक्वता तथा अनुभव के आधार पर सफल है। इस दृश्य चित्र में रंगत के हल्के और गहरेपन का आभास है। छाया-प्रकाश की रंगतों के कारण ही वे द्विआयामी तल पर त्रिआयामी प्रभाव उत्पन्न कर पाते हैं। नाइफ के उपयोग से विशेष पोत का सफल अंकन हुआ है। इस दृश्य चित्र में भूमि से आकाश का स्थान तीन चौथाई भाग छोड़ा है। इससे चित्र भूमि पर अन्तराल व आकारों का सम्बन्ध मधुर दिखाई देता है। अतः यह सम्पूर्ण दृश्य चित्र आकर्षण और प्रभाविता के गुणों से सम्पन्न है।

39.दृश्य चित्र -3
‘देवास की टेकरी’

यह चित्र आयताकार रूप में कागज पर चित्रित है। इस चित्र को अपारदर्शी जल रंग अर्थात पोस्टर रंगों से ही यह दृश्य चित्र बनाया है। चित्र का रेखांकन धनुषाकार की आकृति लिये हुए है। एक उठी हुई पहाड़ी इसके पीछे स्वच्छ आकाश, पहाड़ी पर दूरी का आभास कराते वृक्ष झुरमुट तथा आगे की ओर हरे रंग के कुछ बड़े वृक्ष, पहाड़ी के सामने पेड़ों की परछाई जिसमें कुछ लोग बैठे अथवा खड़ी स्थिति में हैं। उनके सामने और पीछे पीत हरित एवं बादामी रंग की भूमि दिखाई है। इस चित्र में धूप का विशेषतः अंकन है जो पहाड़ी की सबसे ऊपरी सतह पर है। इस धूप की तीव्रता से बचने के लिये मानवाकृतियों ने पेड़ों की शरण ली है। इस चित्र में रेखा की प्रखरता व चमक में दृढ़ता और सामीप्य प्रकट होता है, वहीं कोमल एवं मध्यम रेखाएँ सुकुमारता, मृदुता एवं दूरी को प्रकट करती हैं। पहाड़ी की कटान की रेखाओं में तीखापन है जबकि पहाड़ी की ढलान पर वनस्पति की उपस्थिति इसे मृदु बनाती है।

इस चित्र में पहाड़ी वृक्ष और मानवाकृतियों के रूप दर्शित है। पहाड़ी के ऊपर भी वृत्ताकार वृक्ष और नीचे की ओर विषम वृत्तकार वृक्ष हैं। पहाड़ी के नीचे और ऊपर के भाग के अन्तराल के कारण एकरसता उत्पन्न हो रही है।

प्रकाश किरणों के द्वारा ही हम वस्तु के रंग को देख पाते हैं। ऊँची पहाड़ी पीत वर्णीय प्रकाश है जिस पर अस्पष्ट रंगों के पेड़ हैं। ऊँचाई और दूरी के पेड़ हल्के रंगों में प्रतीत होते हैं। पास के पेड़ गहरे हरे प्रफुल्लित रंगों में त्रिआयामी तान में बने हैं। पेड़ों के तल में गहरे ब्राउन रंग के तान और उससे अधिक गहरे रंग के लोग बने हैं। रास्ते में गहरा लाल रंग का मान बढ़ाने के लिये एक मोटी लम्बवत रेखा से सन्तुलित किया है। हल्के तान वाले हरे रंग से भूमि में लेपन किया है उसी प्रकार आकाश में आसमानी तानों के ब्रश स्ट्रोक लगाये गये हैं। ब्रशाघातों से चित्र में पोत का निर्माण है और ब्रश आघातों में रंगों की गति और प्रवाह दिखाई देता है।

यह दृश्य चित्र की विशेषताएँ समाहित करते हुए सम्पूर्ण एवं आकर्षक है। जिसमें वातावरणीय परिप्रेक्ष्य (Perspective) स्पष्ट दृष्टिगोचर है। रंग लगाने की प्रभावशाली पद्धति डी.जे.जोशी के समान ही है बस इसमें बड़े स्ट्रोक्स का प्रयोग हुआ है।

40. दृश्य चित्र -4

अफजल के चित्र संसार सभी का मनमोह लेते हैं। यथार्थवादी शैली के बाद अमूर्तन शैली की ओर मुड़ गये। यह चित्र अमूर्तन शैली का है। यह विविध वर्णी छवि है। एक उजास के साथ रंग संघनता है। रंगों का वह रूप ही है जब आकाश से धरती पर सुबह की लाली फूटती है। निर्मल आकाश धरती पर सभी रंगों को उतार देता है। अफजल के अमूर्त दृश्य चित्रों की अभिव्यक्ति को बोधगम्य बना दिया है। यह उनकी निजी शैली बन गई है। अफजल के अमूर्त दृश्य चित्र खण्ड रूप में देखने को मिलते हैं। इनकी रचना विधि बिम्बों-आकारों रंग प्रयोगों में खासी विविधता है। कहीं वह रंगों का मोजैक बनाते हैं, रंगों की धारियों, लकीरों से रंग टपकने देते हैं, जाली की आकृति के पीछे रंग पृष्ठभूमि को झाँकने देेते हैं। अमूर्त दृश्य चित्रों में हरे-नीले-पीले आदि रंगतों के अमूर्तन रूप में विद्यमान हैं। इसके अतिरिक्त चपटे ब्रश के बड़े आकारों रेखाओं के साथ रूप का भी अपना अस्तित्व है। यह ब्रशाघात रेखाओं को विभिन्न दिशाओं में अपने अमूर्तन आकारों का प्रदर्शन करती है। हरा रंग पेड़ों का आभास देता है, पीला नारंगी रंग प्रकाश का और गतिमय ब्रश के आघातों से चित्र गतिमय हो जाता है। रंगों के टोन अपने आप बन जाते हैं। इस चित्र में टेक्सचर ने जान डाल दी है। जिससे चित्र दर्शक को अपनी ओर आकर्षित करता है। चित्र सृजन में मूलाधार एवं सिद्धान्तों का ध्यान रखा गया है। रेखा आकार वर्ण पोत आदि अपने परिणाम स्पष्टता व सृजन के आधार से मनोवैज्ञानिक प्रभाव उत्पन्न होता है। चित्र आकर्षक एवं सन्तुलन के गुणों को लिये हुए है।

अमृतलाल वेगड़अमृतलाल वेगड़12. श्री अमृतलाल वेगड़ की कला शैली

श्री अमृतलाल वेगड़ नर्मदा पदयात्री के रूप में जाने जाते हैं इस पदयात्रा से ही उन्हें सौन्दर्य दृष्टि प्राप्त हुई। कलात्मक यात्रा का प्रथम चरण रेखांकन होता है। रेखांकन की वे समस्त सामग्री अपने साथ में रखते हैं। इस दौरान उन्होंने अनेक रेखांकन बनाये। इन्ही रेखांकनों के आधार पर उन्होंने पहले जल रंग में चित्र बनाये और बाद में कोलाज बनाये। आपने Outdoor और Imagination दोनों प्रकार के स्केचेज किये। आप शान्ति निकेतन से प्रशिक्षित थे अतः प्रारम्भिक चित्र जल रंग में वाश तकनीकी से बनाये। इसकी शिक्षा दीक्षा शान्ति निकेतन में नन्दलाल बोस से प्राप्त की। प्राकृतिक रंगों में गोंद मिलाकर टेम्परा चित्र भी बनाए। आपके जीवन में कोलाज विधा का प्रवेश अनायास नहीं हुआ बल्कि 1977 में पदयात्रा के दौरान हुआ। प्रारम्भिक कोलाज सपाट रंग के ग्लेज्ड पेपर से बनाये हैं और बाद के कोलाजों में मैग्जीन के रंगीन पतले पेपरों का इस्तेमाल किया। इसके लिये नेशनल ज्योग्राफिक पत्रिका उपयोग में लाई गई है। आपने इस विधा में बहुत से दृश्य-चित्र, संयोजन आदि बनाये। इस प्रकार से आपने अपने कोलाजों में जल रंग, पेस्टल, तेल रंग और तिनोकर का प्रभाव लाने का प्रयास किया। इस विधा में अप्रत्याशित दृश्य चित्रों का सृजन किया है।

चट्टान से टकराकर पानी वापस आने के कारण उस स्थान को सफेद रंग का बनाया है। पहाड़ी Burnt umber और Black रंग से बनी है। स्पष्टता और गहराई दिखाने के लिये burnt umber में स्याह रंग मिश्रित किया है। चट्टानों के छोटे-बड़े तल आकर्षकता उत्पन्न करते हैं। दोनों पहाड़ियों को देखने से विस्तार और गहराई वाला परिप्रेक्ष्य नजर आता है। नाव में चार व्यक्ति हैं, जिनमें एक चप्पू चला रहा है। इस चित्र द्वारा कलाकार ने ईश्वरीय महत्ता को दिखाया है। चित्रकार ने आत्मा की आवाज को स्वीकृत कर प्रकृति की प्रत्यानुकृति कर परम्परा का निर्वाह किया है। साथ ही मौलिकता भी दिखाई है। अतः इस चित्र का सृजन दृश्य चित्रण के नियमों को ध्यान रखते हुए किया है।

अमृत लाल वेगड़ के चित्रों की समीक्षा
45. दृश्य चित्रण-1

दृश्य चित्र जल रंगों, तेल रंगों आदि रंगों के होते हैं, पर रंगे हुए कागज को चिपका कर दृश्य चित्र का सृजन करना अत्यन्त श्रमसाध्य कार्य है। जर्मनी भाषा में कोला अर्थात चिपकाना महान कलाकार पिकासो, ब्राक आदि ने त्रि-आयामी कला संयोजन कोलाज पद्धति से भी किये। नर्मदा परिक्रमा चित्रकार वेगड़जी ने नर्मदा नदी पर स्थान का मार्मिक दृश्य चित्र कोलाज पद्धति द्वारा बनाया है। यह चित्र कर्यावत और क्षितिज रेखीय आकार में बना है। क्षितिज बनाने के लिये हल्के नीले रंग का कागज चिपकाया गया, निकट किनारे कुछ गहरे रंग का कागज चिपकाया चित्र के आधे भाग में जमीन बनाने हेतु बहुत सी कतरनें हरे और हल्के हरे रंग की चिपकाई गई हैं साथ ही छोटे-बड़े पुरूष स्त्रियों के चित्र भी चिपकाए गये, जमीन के बीचो-बीच में कहीं-कहीं क्षितिज भूमि सृजित हुई है, भूमि और पानी चित्रित होते कागज से ही टेक्सचर बनाए गये हैं। चित्रकार द्वारा कला के तत्व और सिद्धान्तों का पूरा ध्यान रखकर सौन्दर्य और आकर्षक को निखारा गया है।

46. दृश्य चित्र -2

यह दृश्य चित्र प्रपात का है, ऊपरी पहाड़ी से जल निचली पहाड़ी पर बह रहा है, पहाड़ी बनाने के लिये Burnt umber रंग क्षितिज रेखा में चिपकाया गया है, बहते हुए पानी के लिये मटमैला नीला रंग का कागज और लम्बवत असीमित रेखाओं में सफेद टेक्सचर लिये हुए कागज चिपकाया गया है। ऊपर से नीचे आने वाला पानी बीच-बीच में पत्थर के लिये ब्राउन रंग का कागज चिपकाया गया है। भूमि तल पर नदी के प्रवाह हेतु सफेद कागज और समतल पहाड़ी पर लोगों को खड़ा दिखाने हेतु वैसा गहरे रंग का कागज चिपकाया गया है। इन सब कारणों से दृश्य चित्र सन्तुलित एवं आकर्षक है।

47. दृश्य चित्र -3

यह कोलाज माध्यम में बना दृश्य चित्र है जिसमें क्षैतिज रेखा चित्रतल के ऊपर पहुँच गई है। यह एक पहाड़ी क्षेत्र में बहती हुई दूधिया नदी है, जिसकी कलकल ध्वनि का आभास किया जा सकता है। अग्रभाग में मन्दिर और धार्मिक जन-समूह दिखाई दे रहे हैं। मन्दिर के ऊपर फहराती लाल रंग की पताका चित्र को आकर्षक बना रही है। मन्दिर में पेपर की कतरनों से पोतयुक्त त्रिआयामी प्रभाव दिखाई दे रहा है। पहाड़ को क्रीमिश रंग की कतरनों से बनाया गया है। नदी किनारे का हरा रंग उर्वरा शक्ति का घोतक है। कहीं-कहीं रंगों के सन्तुलन के लिये नीले रंग को भी लगाया गया है। यह चित्र तेल रंगों के ब्रशाघात युक्त दिखाई देता है। यही कारण है कि दृश्य चित्र रंगों की उपस्थिति के कारण श्रेष्ठ चित्र है।

48. दृश्य चित्र -4

भेड़ाघाट-अपारदर्शी (टेम्परा) माध्यम से सृजित हुआ है। लम्बवत दो पहाड़ियों जो अलग-अलग हैं, मटमैले रंगों से मार्बल जैसा प्रभाव बताया गया है। मोटी काले रंग की रेखाओं और हल्के यलोअफर रंगों से पेंट किया गया है, चित्र भूमि समतल, नीले पानी में नाव चलती बनाई गई है। क्षितिज में पहाड़ी और आकाश हल्के नीले रंग के टेक्सचर में चित्रित है। यह दृश्य चित्रकला के तत्वों और संयोजन के सिद्धान्तों से परिपूर्ण, सन्तुलित एवं आकर्षक है।

राम मनोहर सिन्हाराम मनोहर सिन्हा13. श्री राममनोहर सिन्हा की कलात्मक शैली

श्री राममनोहर सिन्हा मध्य प्रदेश के ख्याति प्राप्त चित्रकारों में से हैं जिन्होंने भारतीय विषयों को चीनी पद्धति से सृजित किया है। शान्ति निकेतन के शिक्षित होने से वॉश पद्धति से कार्य करने में विशेषज्ञ हैं। इस पारदर्शी विधि में शीघ्रता से चित्रण और मन पर नियंत्रण आवश्यक है। एक बार जो तूलिकाघात लगाया तो उसका परिवर्तन किया जाना सम्भव नहीं होता है। आपने जल रंग, तेल रंग एक्रेलिक, पेस्टल आदि सभी माध्यमों में कार्य किया। आपको मसि चित्रण अधिक पसन्द था। इसने ही आपको ख्याति दिलवाई। चीनी कला परम्परा में सुलेख का महत्त्वपूर्ण स्थान है। जिसे आपने अपने सृजन में स्थान दिया। आपके चित्र दो विषयों में अधिक शक्तिशाली रहे प्रथम नर्मदा का सौन्दर्य और द्वितीय कमल आपने इन दोनों की चित्र शृंखलाएँ तैयार की। कमल पुष्प की कोमलता, स्वच्छता और समयानुसार चित्रित किया है। स्याही से बने चित्रों में कहीं दहकते हुए कारमाइन रेड के पुष्प, मौसम आदि को चित्रित किया है। मध्य प्रदेश में नर्मदा शृंखला में दूर तक फैला नीला जल, पहाड़ काटकर बहती नर्मदा तथा मौेन खड़ा दर्शक उनके चित्रों में निहित होता है। यभि चित्रण में तूलिकाघातों का स्पर्श और उसका दबाव देकर गति देना ही प्रमुख है। स्याही से ही अनेकों बल उत्पन्न किये जाते हैं, आपके प्रमुख चित्रों में fall of narmada basics, Depth Cross image, brown marble, Escape, Palash in spring, Boat exploring the Goerge आदि हैं। आपके इन चित्रों में कुछ उल्लेखनीय चित्रों की व्याख्या कर रही हूँ।

पेज- 1 Green Water of Narmada

यह चित्र श्री राम मनोहर सिन्हा ने मध्य प्रदेश की जीवनदायिनी, नदी नर्मदा के सौन्दर्य का बनाया है, जिसे mounted rice paper पर स्याही (मसि) और जल रंग के मिश्रण से बनाया है। जबलपुर के पास भेड़ाघाट स्थित संगमरमर की चट्टानें हैं और उनके आस-पास बहती हुई निर्मल नदी नर्मदा है। चित्र में ऊपरी हिस्सा संगमरमर की चट्टानों से आच्छादित है, जो स्याही की सशक्त रेखाओं से बनी हैं। इसका रंग स्लेटी Gray और dark brown है। इसे बनाने के लिये चीनी-प्रविधि अपनाई है। चीनी चित्रकला में रेखाओं, अवकाश और ब्रशाघातों का महत्त्वपूर्ण योगदान है। इस चित्र सृजन के लिये सर्वप्रथम उस स्थल का अवलोकन कर चट्टानों की शक्तिमत्ता, कठोरता और जल की निर्मलता और सौन्दर्य का निरीक्षण किया होगा।

तत्पश्चात- mounted rice paper में सीधे ब्रश की सहायता से दृश्य चित्र का रेखांकन किया। तत्पश्चात उसमें स्याही अथवा brown colour को ब्रश के पास विभिन्न मान को लेते हुए विभिन्न तानें उत्पन्न की। रेरा से भरे हुए ब्रश के हल्के और दबाव पूर्ण स्पर्श से गहराई और उभार उत्पन्न किये। संगमरमर की चमक दिखाने के लिये चित्र सतह को वैसा ही छोड़ दिया। हरे रंग के पारदर्शी जल रंग से नर्मदा नदी बनाई। चीनी चित्रकला में पृष्ठभूमि का भी विशेष महत्व है। नीचे दाहिनी तरफ brown पृष्ठभूमि का भी विशेष महत्व है। नीचे दाहिनी तरफ brown चट्टानें हैं पानी के बीच में भी चट्टान का कुछ हिस्सा दिखाई दे रहा है।

इस चित्र की विशेषता यह है कि इसमें भारतीय और चीनी प्रविधि का मिलाजुला रूप है। आयताकार फलक पर संगमरमर की खड़ी और ढलावदार चट्टानों को बनाया है। चट्टानों के मध्य प्रवाहित नर्मदा नदी केन्द्र बिन्दु बन आकर्षण के कारण है।

यह चित्र भारतीय और चीनी षडंग द्वारा मूल्यांकित किया जा सकता है। चीनी सिद्धान्त का प्रथम नियम आत्मा अथवा प्राणवान छन्दगति से सम्बन्धित है। जो कि इस चित्र में रेखाओं और नदी के प्रवाह में दिखाई देती है। चित्र संयोजन में उचित प्रमाण दिखाया गया है। ब्रश संचालन और रंगों के उचित उपयोग से चित्र में सौन्दर्य बढ़ गया है। साथ ही ब्रश संचालन में रेखाओं की सरलता, शक्तिमत्ता, सुघड़ता और घनत्व दिखाई देता है। इस चित्र में सत ही पूरी परिप्रेक्ष्य दिखाई देता है। सम्पूर्ण चित्र को देखने से यह चित्र किया है।

पेज- 2 Water Fall View

यह दृश्य चित्र rice paper पर स्याही (मसि) से बनाया है। यह उर्ध्वाकार है। मध्य प्रदेश की नर्मदा नदी पहाड़ों संगमरमर की चट्टानों को काटती हुई बहती है। ऊँची चट्टानों से जब नीचे की ओर गिरती है तो झरने का रूप ले लेती है। इस चित्र की मुख्य विशेषता यह है कि चित्रकार ने कुछ ही ब्रश, स्पर्शों से इस चित्र को पूर्ण किया है। इस चित्र का मुख्य विषय water-fall में अवकाश को विशेष महत्व देते हुए उभारा है अर्थात चट्टान और जल-मग्न पत्थरों मे ही स्याही के स्पर्श से विभिन्न बल दर्शाये हैं। उर्ध्वआयताकार सतह पर नदी पत्थरों की समतल सतह पर धीरे-धीरे बढ़ती है और नीचे की ओर गिरती है। शून्य सतह पर विभिन्न बलों के स्ट्रोक से जल का गिरना दर्शित है। चित्र में बायीं ओर चट्टानें बनाई हैं। इसी ओर उनकी पहचान वाली लाल रंग की मुद्रा Seal लगी हुई है।

कलात्मक दृष्टि से भी यह श्रेष्ठ चित्र है। इसमें चीनी दृश्य चित्रण पद्धति का प्रभाव दिखाई देता है। रेखाओं की सश्क्यता, लयात्मकता, रूप का उचित संयोजन, स्याही में विभिन्न बलों की उपस्थिति से रंगों की विभिन्न तानों की उपस्थिति, छाया प्रकाशन का उचित संयोजन ही इस चित्र को विशिष्टता प्रदान करता है। यह चित्र मूल्यांकन करने वाले भारतीय ही नहीं चीनी षडंगों के अनुसार खरा उतरता है। अतः इसे श्रेष्ठ चित्र कहा जा सकता है।

51. दृश्य चित्र- 3 Lotus in rocky lake-ll

श्री राममनोहर सिन्हा के दो प्रिय विषय रहे हैं पहला नर्मदा और कमल। कलाकार की चित्र, प्रियता और सृजनशीलता का प्रतिनिधित्व करता चित्र Lotus in rocky lake-ll, mounted rice पेपर पर स्याही और सीमित रंगों से बना है। जल रंग में बना यह चित्र उर्ध्वाकार है, जिसमें चट्टानों के बीच में रंग कमल खिलते हुए दिखाया है। झील के पानी से इस चित्र में गहराई दिखाकर परिप्रेक्ष्य दिखाने का प्रयास किया है। इस चित्र में तिर्यक संयोजन दिखाया गया है। चित्र में नीचे बायीं ओर लाल रंग की कठोर चट्टानें हैं। जिन्हें स्तरीय दिखाने के लिये स्याही से चौड़े ब्रश-स्ट्रोक लगाये गये हैं जल की तरलता दिखाने के लिये cobalt-blue का प्रयोग किया है। साथ ही जल सतह को वैसा ही छोड़ दिया गया है। चीनी चित्रकला में पृष्ठभूमि बहुत महत्त्वपूर्ण होती है। यह पृष्ठभमि ही कमल को महत्व प्रदान कर रही है। कमल को कोमल रेखाओं द्वारा रेखांकित किया है। कमल के मध्य में पुंकेसर के स्थान पर light lemon yellow का अल्प प्रयोग किया है। कमल पत्र स्याही (मसि) के विभिन्न बलों से बनाये गये हैं। इन कमल पत्रों को पानी की उचित मात्रा में मिलाकर अलग रंग का बनाने का सफल प्रयास किया है। कमल पत्रों की कोमलता, परिपक्वता दिखाई देती है। तूलिका स्पर्श रेखाओं से इसकी शिरायें अंपदे दिखाई है। श्री राममनोहर सिन्हा की तूलिका स्पर्श में शुष्कता और सजलता के स्पष्ट गुण होने से छाया-प्रकाश सही स्थान पर दिखाई देता है। झील का नीला सफेद जल शीतलता और विस्तार दर्शाता है। वहीं poster-red चट्टानों की कठोरता ब्रश का लयात्मक संचालन प्राणवान छन्द गति उत्पन्न करता है। वहीं कमल, पत्र और चट्टानों जैसे रूपाकरों में सादृश्यता का गुण निहित है। रंगों की विभिन्न तानें रूप की सत्यता और घनत्व दर्शाता है। कमल पत्रों से घिरा कमल विषय के महत्व को कलात्मकता के साथ प्रस्तुत करता है।

52. दृश्य चित्र 4 Boat round the corner

श्री राममनोहर सिन्हा द्वारा बनाया गया यह चित्र उर्ध्वाकार जिसे जनरंग से हैण्डमेड पेपर पर बनाया है। जिसे उन्होंने पहाड़ी से ऊपर से नीचे की ओर देखते हुए बनाया है। नीचे की ओर नदी बह रही है, उसमें पहाड़ी में corner पर एक नाव में लोग नौका विहार कर रहे हैं। नौका के छोटे आकार से पहाड़ी की गहराई का पता चलता है। इस चित्र में राम मनोहर सिन्हा की प्रकृति की सूक्ष्म-निरीक्षण किये जाने की प्रवृत्ति का पता चलता है।

नदी के दोनों ओर ऊँची पहाड़ियाँ अवस्थित हैं। राम मनोहर की क्रियाशीलता इन पहाड़ियों के रंगाकन में दिखाई देती है। इस चित्र में सशक्त कोणीय रेखांकन है। ऊर्ध्वआयताकार हैण्डमेड पेपर की सतह पर संयोजित किया है। पहाड़ी में पर्त-दर-पर्त पत्थरों की चट्टानें हैं कहीं-कहीं पर पहाड़ पर उगने वाली वनस्पति स्याह रंग से बनाई है। इसमें गहरी दूरी वाला परिप्रेक्ष्य दिखाई देता है। उपरी चट्टानेें बड़ी और स्पष्ट हैं, जबकि निचली चट्टानें छोटी बनाई गई हैं। नदी का जल शान्त प्रतीत होता है। चट्टान के पास कोबाल्ट ब्लू इससे उसे मानसिक शान्ति प्राप्त होगी। इससे कलात्मक पर्यावरण नियंत्रित होगा। इस शोध प्रबन्ध का उद्देश्य भी यही है कि मध्य प्रदेश में साधनारत दृश्य चित्रकारों के सृजन से आने वाली पीढ़ी को अवगत कराया जाए। जिससे प्रेरित होकर वे सही दिशा में अग्रसर हों सकें। इस शोध द्वारा चित्रकारों की अनजानी कलाकृतियों को कला रसिकों के समक्ष लाकर शोध के लिये नवीन राह बनाना है। ये दृश्य चित्र सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहरों के साक्ष्य भी हैं और संरक्षित किये जाने वाले उपादान भी।

15. श्री सुशील पाल की कला शैली

20वीं शताब्दी के आरम्भ में यूरोपीय कला पद्धति ने भारतीय कला को प्रभावित किया है। भारतीय कला में अन्तर राष्ट्रीयवाद तथा व्यक्तिवाद की नवीन अवधारणाएँ स्थापित होने लगी थीं। भारतीय कलाकार स्व. सुशील पाल साहब ने 1940 ई. में प्रभाववादी प्रवृत्ति में दृश्य-चित्र बनाना प्रारम्भ किया, जिनमें अमिश्रित रंगों का प्रयोग, प्रकाश की क्रीड़ा का चित्रण, काले-भूरे रंगों की कमी तथा स्थिर जीवन और घटनास्थल पर जाकर प्रत्यक्ष चित्रण आदि महत्त्वपूर्ण विशेषताओं से चित्रण कार्य किया। जिन्होंने सपाट धरातल, लम्बी आकृतियाँ, व्यंजनापूर्ण रेखांकन तथा रंगों की ताजगी बनाए रखते हुये नवीन प्रयोग किये। आपके अधिकतर दृश्य चित्र भोपाल की किले-दीवारों के चित्र हैं और उसके आस-पास पर्यावरण से सम्बन्धित पेड़, पठार, सड़क, टूटे-फूटे मकान, खण्डहर आदि का चित्रण किया है।

दृश्य चित्रण
57. दृश्य चित्र -1

किले की दीवार जो लम्बवत मुद्रा में चित्र के बीचों-बीच में त्रिआयामी गुण लेकर चित्रित है। पत्थर कठोर होते हुए ब्राउन रंगों के तान स्पष्ट दृष्टिगोचर होते हैं, इसमें टेक्सचर का अपना ही महत्व है। उसके दोनों ओर पेड़ों के झुण्ड पीछे ही हॉरिजेन्टल दीवारों का सपोर्ट है, किले की सीढ़ियाँ ऊपर से नीचे की ओर आती हुई, कर्णवत सड़क के दोनों ओर हरी घास, पत्थर आदि चित्रित हैं। दीवार के पीछे ही आकाश है। रूप और अन्तराल की दृष्टि से संयोजन का महत्व देखते बनता है। किले का बुर्ज लाइट बर्नट साइना और पीले रंग से चित्रित है। दांये-बांये कुछ पेड़ हरे, पीले रंग मिक्स पद्धति और तने बर्नट अम्बर रंगों के हैं, रंगों से सन्तुलन के लिये गहरे हरे रंग के पेड़ से हल्का हरा रंग का पेड़ दिखाया गया है। पत्तियों के आकार में हल्के गहरे रंग के टोन दिये गये हैं। आकाश का रंग हल्का नीला है। संयोजन के सिद्धान्त से यह चित्र परिपूर्ण है। सन्तुलन और आकर्षण के सिद्धान्त इस दृश्य चित्र को समान रूप से प्रभावित करता है।

58. दृश्य चित्र -2
लाइट पोल

एक समय भोपाल में सड़क पर लाइट स्तम्भ लगाये जाते थे। चित्र में दोनों ओर से लम्बवत ऊँचाई के खम्बे बीच में त्रिआयामी काँच का बना हुआ लालटेन सफेद रंगों से चित्रित है। यह आधुनिक सिद्धान्तों से परिपूर्ण है। लालटेन घनवादी शैली की है। उसके पीछे घोर अन्धेरे में भवन का भाग नजर आता है। लालटेन के प्रकाश से दोनों लम्बवत खम्भे धूमिल रंगों के रिफ्लेक्शन से अमूर्त अवस्था में ब्रश के स्ट्रोक से नजर आ रहे हैं। चित्र रात्रि का है। कलाकार ने रात्रि को अपने ब्रश द्वारा पूर्ण रूप से पेन्ट किया है। पाल साहब के अमूर्त चित्रण में प्रभाववाद का रात्रि तत्व, घनवादका विश्लेषक बुद्धि तत्व और क्रियात्मक उत्साह घुल मिल गये हैं जिनसे कलाकार की आन्तरिक भावना को अभिव्यक्ति का अवसर मिला है।

59. दृश्य चित्र- 3

यह दृश्य चित्र वर्षा ऋतु पर्वत शृंखला का पानी के रंगों से बना नजर आता है। आपकी प्राकृतिक कला गहन संवेदना व रहस्यमयी गरिमा से ओत-प्रोत है। प्रकृति के प्रतिक्षण बदलते रूप तथा आध्यात्मिक भाव आपके चित्रण के आधार रहे। पर्वतों व घाटियों का अद्भुत लोक सृजन किया, जो ठोस, स्पष्ट तथा स्थायित्व पूर्ण दृष्टिगत होता है। कला तत्व की दृष्टि से आधुनिक कला के विकास में रेखाओं का भिन्न-भिन्न प्रभाव रहा है। रेखा की प्रखरता व चमक में अस्पष्टता, दृढ़ता एवं सामीप्य प्रकट होता है, कोमल एवं मध्यम रेखाएँ सुकुमारता, मृदुता एवं दूरी को प्रकट करती हैं। पाल साहब के चित्रों में यह सब गुण दिखाई देते हैं। रूप और रंगों की दृष्टि से अनियमित रूप के त्रिशूल गहरे और हल्के रंगों के लेपन से शीतलता, आनन्द पर्वतीय शृंखलाओं में जान पड़ता है। पहाड़ों की अस्पष्ट रेखाओं को दिखाने के लिये चित्रकार ने सफेद धुन्ध रूपी बादल पेन्ट किये हैं, आसमान गहरे नीले रंग का है। बादलों से पानी के प्रवाह में रंगों का रूप संयमित नहीं है, पेड़ों के रूप, मकानों के रूप सभी बदल गये हैं। पहाड़ी, सड़कों से गन्दा पानी बह रहा है। हरे और लाल रंग के संयोजन से दृश्यचित्र में प्रकाश एवं चमक का अनुभव हो रहा है। यह रंग इस चित्र में आकर्षण का केन्द्र है। इस दृश्य चित्र में संयोजन के सभी सिद्धान्त दिखाई देते हैं।

60. दृश्य चित्र -4
भोपाल का किला

यह दृश्य चित्र तेल माध्यम का है। चित्रकार ने प्रकृति का चित्रण मानवीय क्रिया-कलापों के परिप्रेक्ष्य में ही किया है। उनके वृक्ष, पर्वत तथा मेघ सभी सक्रिय रहते हैं। उनकी कला में एक अद्भुत वैचित्र्य, आकर्षक एवं रंगमयता है, जो अनन्त कल्पना को चमकीले रंगों में व्यंजित करती है। यह चित्र कैनवास के आधे से अधिक भाग में किले की दीवार चित्रित है जो बहुत मोटी जान पड़ती है, इससे लगी हुई डाइगुनल रेखा में ऊपरी भाग से नीचे को आती हुई है। सड़क और किले की दीवार के बीचों-बीच पेड़ों से चित्रित है। गहरे और हल्के हरे-पीले रंगों में यह पेड़ दिख रहे हैं, उसके नीचे ही पत्थर के टुकड़े पीले रंग के हैं, सड़क के दूसरी ओर भी बड़े-बड़े पत्थर जो काले हरे रंग के है। आकाश हल्के नीले सफेद रंग से चित्रित है। आकाश में नाइफ से टेक्सचर रंग के द्वारा बने हुए हैं, किले की दीवार भी नाइफ के टेक्सचर से ही बनी हुई है। रंगों में ही द्विआयामी लाइट एवं शेड में पीले, नारंगी और बर्नट साइना द्वारा बने हुए हैं। पेड़ गाढ़े और हल्के रंगों द्वारा चित्रित हैं। सड़क लाइट यलो हॉकर के टेक्सचर लिये हुए प्राकृतिक डिजाइन से बनी हुई है। कोणीय आकार में पत्थर द्विआयाम के अनुसार ठोस आकार में निर्मित है। यह चित्र कला के तत्वों एवं सिद्धान्तों से परिपक्व होते हुए सुन्दर है।

22. श्री देवेन्द्र जैन की कला शैली

देवेन्द्र जैन ऐसे चित्रकार हैं, जिनके चित्रांकन में प्रकृति, लोक जीवन और ग्रामीण परिवेश मुखरित होता है। उनके चित्र मानव और प्रकृति के मध्य गहरा सम्बन्ध स्थापित करते हैं। आपने अपनी कृतियों में सरलता को विशेष स्थान दिया। कलाकृतियों को देखकर कहा जा सकता है कि आपकी कला आमजन की कला है। आपने जल रंग, तेल रंग का विशेष प्रयोग किया। आपकी वॉश शैली विशेष प्रिय भी है। कम रंगों में विशिष्ट प्रभाव दिखाना आपकी विशेषता है। यह तकनीक आपने एल.एस. राजपूत से सीखी जोकि शान्ति निकेतन से पढ़े हुए थे। क्ले मॉडलिंग और प्रिन्ट मैकिंग का विशद ज्ञान रखने वाले श्री जैन की कुशलता स्टिल-लाइफ, पोर्ट्रेट और फुल लाइफ में है। आपके चित्रों में विभिन्न रंगों का प्रयोग मिलता है। हरा, लाल, बैंगनी, नीला और बैंगनी रंग आपके प्रिय रंग हैं। आपके द्वारा बनाई गई कलाकृतियों में लयात्मकता दिखाई देती है। रेखाओं का अनुपम सौन्दर्य उन्हें कला की दृष्टि से समृद्ध बनाता है। स्थल चित्रण (Landscape) जल रंग में अधिक बनाये हैं। जल रंगों का प्रयोग सूझ-बूझ से किया गया है। आपने वॉश और ओपेक दोनों शैलियों का उपयोग अपने चित्रों में किया है। आपके दृश्य चित्र ग्रामीण और प्राकृतिक दृश्यों से प्रभावित रहे हैं।

दृश्य चित्रण
83. दृश्य चित्र -1

कला मानव की सहज अभिव्यक्ति है। जब भी जो कुछ भी उसे मिला सृजन कार्य में लग गया। देवेन्द्र जैन मानवकृत एवं प्रकृति के चितेरे हैं। इनका ग्रामीण दृश्य चित्र जिसमें ज्यामितीय आकार के मकान आयताकार अन्तराल में स्थापित होते हैं, जिसका सम्बन्ध चित्रकार की अनुभूति से है। चित्र-भूमि के प्राथमिक विभाजन के आधार पर ही चित्र को पूर्ण किया गया है। प्रथम सीधी लम्बवत रेखाओं के प्रभाव से गौरव, शक्ति, स्थायित्व एवं शान्त चित्तता के गुणों का लाभ प्राप्त हुआ है। पड़ी रेखाओं के प्रभाव से विश्राम, स्थिरता, शान्ति मौन तथा सन्तुलन का बोध होता है। चित्र अनियमित रूप से सम्बन्धित है। रंगों का अपना एक प्रभाव है जो मानसिक भावनाओं को उद्वेलित करने की शक्ति है। काले व सफेद रंगों के द्वारा मस्तिष्क को एक स्थिर अनुभूति होती है। रंग में भूरापन और ग्रे से शुद्धता अथवा सघनता जान पड़ती है। रंगों की पुनरावृत्ति से एक प्रवाह जान पड़ता है और सन्तुलन दिखाई देता है। इस दृश्य चित्र में तान का भी अधिक महत्व है जिससे द्विआयामी तल पर त्रिआयामी गुण उत्पन्न हो रहा है। धरातल के गुण (पोत) को दिखाने हेतु चित्रकार ने एक पतले रंग का वाश दिया है। यह सभी कला तत्व और संयोजन के सिद्धान्त इस दृश्य चित्र में विद्यमान है। चित्र सन्तुलन और आकर्षण के सिद्धान्त को समान रूप से प्रभावित करता है।

84. दृश्य चित्र - 2

यह चित्र ग्वालियर के मोहल्ले की एक पुरानी सड़क का दृश्य चित्र है, जो वाश और पतले रंगों से बना हुआ है। रेखाओं का स्पन्दन देखते बनता है। प्रवाही रेखाओं में गति, लावण्य, माधुर्य प्रभाव दिखता है। आधुनिक कला के विकास में रेखाओं का अभूतपूर्व सहयोग रहा है। सीधी व वक्र रेखाओं के भिन्न-भिन्न प्रभाव है। रेखाओं की प्रखरता व चमक में अस्पष्टता, दृढ़ता एवं समीप्य प्रकट होता है, वहाँ कोमल एवं मध्यम रेखाएँ सुकुमारता, मृदुता एवं दूरी प्रकट कर रही हैं। पुराने ढंग के मकानों में रेखाओं से ही रंगों का सम्भलना हुआ है। इस दृश्य चित्र में रूप की दृष्टि से अनियमित रूप से प्रखरता है। रंग में भूरापन अथवा धूमिलता मिलती है। उदासीन धूमिल रंग मिला होने से उसकी सघनता कम हो गई है। चित्र में तान (tone) का विभाजन-छाया, मध्यम और प्रकाश से सम्बन्धित है। सफेद अथवा अधिक तान वाली रंगतों के साथ हल्की तथा धुन्धली तान तथा परछाई में अस्पष्ट तान के प्रयोग से वातावरण बन गया है। पोत के द्वारा चित्रकार ने पतले रंगों से वाश तथा रेखीय तल का प्रयोग किया है। स्पेस की दृष्टि से चित्र भूमि का विभाजन असम किया गया है। पर्सपेक्टिव के नियमों के मध्य, दूरी का भाव उत्पन्न होता है। सड़क पर मानव आकृतियाँ भी दृष्टिगोचर हो रही हैं। यह दृश्य चित्र संयोजन के आधार पर सन्तुलन एवं कला के तत्वों के सिद्धान्तों से संतोषजनक है।

85. दृश्य चित्र -3

ग्वालियर सम्भाग के मन्दिर दृश्य चित्रों में पतले रंगों का प्रयोग किया, जिनमें ताजगी व स्निग्धता है। इस चित्र का प्रमुख तत्व रेखा ही है। संयोजन में सीधी, खड़ी रेखाएँ गौरव व्यंजक हैं तो समतल रेखाएँ विश्राम व शान्ति का सहज वातावरण प्रस्तुत करती है। कलाकार के रेखांकन में एक स्पर्धा सी प्रतीत होती है। कहीं रेखाएँ एक-दूसरे की पूरक है तो कहीं सामंजस्यपूर्ण है। कला का प्रशिक्षण शासकीय ललित कला संस्थान, ग्वालियर में हुआ, किन्तु प्रेरणा भारतीय जनजीवन से ली। एक मन्दिर का रूप (Form) मानव सहित सफेद रंग में स्पष्टता, रेखाओं में शीघ्र संचालन का स्वतंत्र अबाध एवं मधुर विचरण अथवा गति उत्पन्न होती है। पेड़ गुलाबी रंगों के तान से बना हुआ है। पेड़ से ही रास्ता मन्दिर तक गया है। मन्दिर के बाएं ओर घने रंग का हरा और तान पीले रंग की दिखाई गई है जो मन्दिर के प्रभावित (Dominence) गुणों को बढ़ा देती है। रेखाओं का प्रवाह सभी रूपों को जोड़ देता है। ब्रश के स्ट्रोक से दृश्य चित्र में प्रवाह, रेखा, रूप, वर्ण अथवा तान सभी मिलाकर सुन्दरता एवं आकर्षण उत्पन्न करते हैं।

86. दृश्य चित्र- 4

यह चित्र ग्वालियर के मकबरे का तेल रंगों से निर्मित है। सम्भवतः यह चित्र प्रभाववाद शैली का है। इसकी रेखाओं के रूप में सीधी लम्बवत मीनारें और गुम्बद चित्रित है। लम्बवत रेखाओं को आधार प्रदान करती हुए रेखाएँ धूमिल गहरे हरे रंग से सफेद धूमिल रंग का विरोधाभास होता है। आकाश भी उसी तान में निर्मित है। कुछ मानव की भी आकृति दिखाई देती है। दृश्य चित्र का पूरा वातावरण हरे काले रंग से चयन किया गया है। ऐसा जान पड़ता है कि शाम के समय में बनाया गया चित्र है। इसमें वृक्ष भी अंकित किये गये हैं। सभी प्राकृतिक उपादानों में विविध और आकर्षक रंग भरे गये हैं। चित्र संयोजन के विभिन्न तत्वों में एकता के सूत्र में होते हुए सहयोग भाव का सृजन करते हैं। धूमिल गर्म रंगत किंचित स्थानों पर देकर रंगों में सहयोग उत्पन्न कर रही है। दर्शक को चित्र में सन्तुलन की अनुभूति भी हो रही है। इसका अंकन इस प्रकार किया गया है कि मुख्य आकृति मीनारें दर्शक का ध्यान आकर्षित कर रही है। (चित्र में प्रवाह और प्रमाण सहज ही सुन्दरता एवं आकर्षण उत्पन्न करते हैं।

1. Madhya Pradesh State Tourism Development Corporation Ltd.
2. www.mapsofindia.com/madhyapradesh/tourish/html
3. अग्रवाल जी.के.- कला औ कलम- संजय पब्लिकेशन्स शैक्षिक पुस्तक प्रकाशक- आगरा, पृष्ठ-101
4. श्रीवास्तव डॉ. लक्ष्मी- कला निनाद-विभा प्रकाशन-इलाहाबाद, पृष्ठ- 176
5. वाजपेयी राजेन्द्र-सौन्दर्य - हिन्दी ग्रन्थ अकादमी- भोपाल पृष्ठ- 83
6. श्रीवास्तव डॉ. लक्ष्मी- कला निनाद- विभा प्रकाशन- इलाहाबाद 2010 पृष्ठ- 138
7. टंकित शोध प्रबन्ध- जूही सोमवंशी- पश्चिमी और भारतीय परम्परागत शैली के मालव- कलाकार- विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन मध्य प्रदेश, पृष्ठ- 5
8. टंकित शोध प्रबन्ध- सोमवंश जूही- पश्चिमी और भारतीय परम्परागत शैली के मालव कलाकार- विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन (मध्य प्रदेश) पृष्ठ- 11
9. श्रीवास्तव डॉ. लक्ष्मी- कला निनाद- विभा प्रकाशन- इलाहाबाद 2010, पृष्ठ- 171
10. व्यक्तिगत साक्षात्कार- श्री श्रेणिक जैन- दिनाँक 16.03.11
11. शर्मा लोकेश चन्द्र- भारत की चित्रकला का संक्षिप्त इतिहास- कृष्णा प्रकाशन मीडिया ( प्रा.लि.) गोयल पब्लिशिंग हाउस- मेरठ, पृष्ठ -5
12. अग्रवाल गिर्राज किशोर- भारतीय चित्रकला का आलोचनात्मक अध्ययन कला और कलम- अशोक प्रकाशन मन्दिर- अलीगढ़ 2012, पृष्ठ-12
13. चतुर्वेदी डॉ. गोपाल मधुकर- भारतीय चित्रकला ऐतिहासिक सन्दर्भ- जागृति प्रकाशन, पृष्ठ- 30
14. पाठक ओम नारायण- मध्य प्रदेश सामान्य ज्ञान- साइंटिफिक पब्लिशर्स भोपाल 2009, पृष्ठ- 29
15. समाचार पत्र (राज एक्सप्रेस) - सैफ खान- 09 दिसम्बर, 2005 पृष्ठ -3
16. बोशियर- मध्य प्रदेश टूरिज्म- ग्वालियर
17. पाठक ओम नारायण- मध्य प्रदेश सामान्य ज्ञान- साइंटिफिक पब्लिशर्स भोपाल, पृष्ठ- 20
18. travel, sulekha.com/madhyapradesh_natural-beauty
19. द्विवेदी अयोध्या प्रसाद- संस्कृति- स्रोतस्वनी नर्मदा- मध्य प्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी भोपाल 1987, पृष्ठ-110
20. द्विवेदी अयोध्या प्रसाद- संस्कृति- स्रोतस्वनी नर्मदा- मध्य प्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी भोपाल 1987, पृष्ठ-108
21. National Council of Education Research and Training New Delhi, Page-55
22. शुक्ल रामचन्द्र- कला और आधुनिक प्रवृत्तियाँ- प्रकाशन शाखा सूचना विभाग-1958-पृष्ठ-138
23. डी.जे. जोशी की पुनरावलोकी प्रदर्शनी- 4 दिसम्बर 12 से 13 जनवरी 2013- आधुनिक कला दीर्घा रूपंकर भारत भवन भोपाल
24. साक्षात्कार दिनाँक 14.10.2013
25. कला दीर्घा- दृश्य कला की छमाही पत्रिका अप्रैल 2002 अंक 4 उत्कर्ष प्रतिष्ठान लखनऊ, पृष्ठ- 31


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