पार्वती की नगरी मणिकर्ण

Submitted by editorial on Mon, 11/19/2018 - 12:44
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हिन्दुस्तान, 18 नवम्बर, 2018

एक ऐसी जगह, जहाँ सैकड़ों गर्म पानी के चश्मे हैं और उनमें अनाज पकाने का रिवाज है। कहीं शान्ति तो कहीं कोलाहल से भरी पार्वती नदी है, कई प्राचीन शिव मन्दिर हैं। प्रकृति का यह विस्मित कर देने वाला रूप देखने को मिलता है कुल्लू के मणिकर्ण में। यहाँ के बारे में बता रही हैं डॉ. कविता विकास

यादों के दश्तगाह में लम्हों के मोती हैं। हर लम्हा कुछ सीख देता है यहाँ जिस अविस्मरणीय लम्हे की बात हम करेंगे, उसे याद कर आज भी मन सुकून से भर जाता है। बदन में रोमांच भर जाता है।

यूँ तो सूर्यास्त डूबते सूरज का सन्देशा होता है, पर यह सूर्यास्त कुछ ऐसा था, जिसे देखकर लगता था कि पृथ्वी अपना भ्रमण रोक दे और मैं बर्फीली चोटियों के पीछे छुपते सूरज और पहाड़ों से टकरा कर बिखरने वाले सात रंगों को आँखों में बसा लूँ। क्या विलक्षण नजारा था! घने जंगलों से आच्छादित घाटियाँ, जिनके पीछे सफेद गगनचुम्बी चोटियाँ, जिन पर मेष की आकृति वाला मेघ किलोलें करता था और नीचे बहती सफेद धाराओं में निहुरता आकाश दृश्यमान था। मानो कोई अलग ही दुनिया हो।

ओडिशा का झारसुगुडा जिला अपनी चिलचिलाती गर्मी के लिये विख्यात है… वर्षों से हमारा वहीं बसेरा है। धरा की आग से बचने के लिये हमने पर्वतीय स्थल में कुछ दिन बिताने का निर्णय लिया और फिर शुरू हुआ इन्टरनेट पर होटलों की तलाश और कम समय में आराम से वहाँ पहुँचने का जरिया। सब कुछ फटाफट हो गया। बच्चों ने यह जिम्मेवारी ले ली थी। शिमला, कुल्लू और मनाली के साथ-साथ रोहतांग की यात्रा भी सुखद और यादगार रही। ज्यादातर यात्री इन्हें देखकर लौट जाते हैं, पर हमने मणिकर्ण जाने का फैसला किया। यह स्थान कुल्लू से 45 किलोमीटर दूर है। कुल्लू-मनाली की यात्रा में व्यास नदी ने रास्ते भर हमारा साथ दिया। जब मन हुआ गाड़ी रुकवा कर रिवर राफ्टिंग का मजा लिया और जब मन हुआ, वहाँ की नैसर्गिक सुन्दरता को कैमरे में समेट लिया।

पार्वती नदी का कोलाहल

मणिकर्ण में पार्वती नदी हमारी हमसफर बन गई। व्यास और पार्वती नदी के संगम पर बसा यह एक महत्त्वपूर्ण नगर है, जिसके बारे में पर्यटकों को कम ही पता है। भूंतर पार्वती घाटी का प्रवेश द्वार है। रास्ते में कसोल घाटी भी आती है, जहाँ मलाना संस्कृति विद्यमान है। चारों ओर चीड़, अनार, सेब आदि फलों के पेड़ तेजी से उठती पहाड़ियाँ, प्रदूषणरहित जलवायु तथा स्वच्छ जलधारा इस देवनगरी को मनोरम बनाते हैं।

कसोल होते हुए दोपहर में हम मणिकर्ण पहुँचे, जो कसोल से चार किलोमीटर की दूरी पर बसा हुआ है। पार्वती नदी के दाहिनी ओर बसे मणिकर्ण पहुँचने के लिये दो पुल पार करने पड़ते हैं। यहाँ इसकी धारा बेहद तीव्र हो जाती है। कौन जाने यह उसका रोष रूप है या प्रेम रूप। कहाँ से इतनी खूबसूरती समेटे हुए है यह धरती? आकाश लोक में केवल एक स्वर्ग है, पर धरती की बन्द परतों को झांकें तो अनेक स्वर्ग मिलेंगे। तन्हाई को किसने देखा है? यह तो महसूस करने की चीज है, लेकिन मणिकर्ण आकर देखें, सशरीर तन्हाई दिखाई देगी।

पुरानी कहावत के अनुसार एक दिन पार्वती जी इस स्थान पर जलक्रीड़ा कर रही थीं। तभी उनके कान की मणि गिर गई, जो पृथ्वी पर न टिक कर पाताल लोक में मणियों के स्वामी शेषनाग के पास जा पहुँची। शेषनाग ने उसे अपने पास रख लिया। शिवजी के गणों ने सब ओर ढूँढा पर मणि नहीं मिली। क्रोधवश शिवजी ने तीसरा नेत्र खोला, जिससे प्रलय आने लगी। तब शेषनाग ने जोर से फुंकारा और पार्वती की मणि को जल के बहाव के साथ पृथ्वी की ओर फेंका। इसलिये इस स्थान का नाम मणिकर्ण पड़ा। जल को विष्णु और शिव को अग्नि का रूप माना गया है।

अद्भुत सम्मोहन

नामकरण के पीछे चाहे जो भी तथ्य रहा हो, यह तो सर्विदित है कि ईश्वर में आस्था रखने वालों को प्रकृति की इस अनमोल देन में ईश्वर का साक्षात दर्शन होता है- द्रुमों की कतार को चीरती किरणों में, बर्फीली पहाड़ियों के पीछे डूबते सूरज में, पार्वती नदी की उफनती धाराओं में या फिर घनघोर वन में तपस्या में लीन मुनियों में ऐसा सम्मोहन केवल भगवान ही पैदा कर सकते हैं। मणिकर्ण में गर्म पानी के चश्मे जगह-जगह मिलते हैं, जो चट्टानों के नीचे से निकलते हैं और भारी दबाव के कारण ऊपर की ओर आते हैं। प्रवाह स्थल पर कठोर पपड़ी की परत मिलती है, जो कार्बोनेट की उपस्थिति का प्रमाण है। यहाँ पानी का तापमान 88 डिग्री से 94 डिग्री सेल्सियस तक है। पोटली में चावल और दाल रखकर लोग इन चश्मों में पकाते हैं और प्रसाद के रूप में ग्रहण भी करते हैं।

गर्म पानी के चश्मे

मणिकर्ण में नौ शिव मन्दिर पहले भी थे और अब भी हैं। यहीं पर करीब 11,000 वर्ष पुराना शिव मन्दिर भी है। प्रवेश द्वार के सामने शिवलिंग स्थापित है। पृष्ठ भूमि में शिव-पार्वती की मूर्तियाँ हैं। मन्दिर के नीचे एक बन्दकमरा है, जिसमें गर्म पानी के चश्मे हैं और नहाने की सुविधा है। इस उबलते जल को शिव का रुद्र रूप माना गया है।

एक दन्तकथा के अनुसार इसी स्थान पर शेषनाग द्वारा पाताल लोक से उछाली गयी कर्ण मणि प्रकट हुई थी। मणिकर्ण के मन्दिरों में राम मन्दिर का विशेष उल्लेख है। यह शिखर शैली का मन्दिर है, जिसके ऊपर स्लेट की छत है। इसे राजा जगत सिंह ने 1635 ईस्वी में बनवाया था। मन्दिर परिसर के साथ एक खुला तालाब है, जिसमें केवल पुरुष स्नान कर सकते हैं। हनुमान मन्दिर, नयना भगवती मन्दिर, कृष्ण मन्दिर और रघुनाथ मन्दिर भी आस्था के केन्द्र हैं। रघुनाथ मन्दिर में कमलासन पर विष्णु जी विराजमान हैं। मन्दिर के उत्तर-पश्चिम छोर पर एक ठंडे पानी की बावड़ी है। पूरे मणिकर्ण में सिर्फ यहीं पर ठंडे जल की बावड़ी मिलती है, बाकी सभी जगहों पर गर्म जल के चश्मे हैं। पार्वती की ठंडी धाराओं के नीचे या बगल में अगर गर्म चश्मे का मुँह मिलता है, तो सारा वातावरण इस मेल से धुँआ-धँआ हो जाता है। एक से डेढ़ दिन इन मन्दिरों को घुमने के लिये पर्याप्त है।

मणिकर्ण में तीन दिन रहने के बाद हमने वापसी की। लौटते समय बार-बार लग रहा था कि इस पावन नगरी में आने का विचार कहाँ से मन में आया था? यह देवी पार्वती की ही लीला थी, जिसने अज्ञात डोर से हमें खींच लिया था। मणिकर्ण की नैसर्गिक सुन्दरता अभी भी पर्यटकों की भीड-भाड़ से बची हुई है, शायद इसीलिये खामोशी के स्वर यहाँ बोलते हैं। कभी हवाओं में घुलती बुरांश की महमह गन्ध के साथ, कभी बर्फीली नदियों के कोलाहल संग तो कभी कोहरे से झाँकती भोर में असंख्य परिन्दों के सुर के साथ।

पार्वती नदी के ऊपर एक गुरुद्वारा भी है, जिसे सन्त श्री नारायण हरी ने कैमलपुर से आकर बनवाया था। जरा सोचिए ऐसी वीरान जगह में आज से 70-72 साल पहले किसी भवन का निर्माण कितना दुष्कर रहा होगा। गुरुद्वारे के अन्दर गर्म कुंड में स्नान की स्त्री पुरुष के लिये अलग-अलग व्यवस्था है। गुरुद्वारे के प्राचीर से बाहर का नजारा देखते हुए लगता था, मानो वृक्ष दल धरती का जर्रा-जर्रा चूमने को बेताब हैं। इन खास मन्दिरों के दर्शन के बाद आगे और भी दर्शनीय स्थल हैं, जैसे- ब्रह्म गंगा संगम, रूप गंगा, रुद्रनाग, खीर गंगा आदि। गुरुद्वारा साहिब में हर साल फरवरी माह में समागम होता है, जो सात दिन चलता है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहाँ आते हैं।

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