सवाल सुरक्षा का

Submitted by editorial on Sat, 06/09/2018 - 15:27
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डाउन टू अर्थ, मई, 2018


मलसीसर गाँव के बाँध में रिसावमलसीसर गाँव के बाँध में रिसाव (फोटो साभार - डाउन टू अर्थ)दोपहर डेढ़ बजे का वक्त था। विकास शर्मा उस दिन भी अपने गैराज में पंक्चर ठीक कर रहे थे। गर्मी और उमस से बुरा हाल था। तभी अचानक गाँव में अफरा-तफरी मच गई। इससे पहले विकास कुछ समझ पाते, उन्होंने खुद को पानी में घिरा पाया। चन्द पलों के भीतर कोई कमर तक तो कोई कन्धे तक पानी में अचानक डूब गया। लोग अपना सामान जहाँ-तहाँ छोड़कर भागे और किसी तरह अपनी जान बचाई।

राजस्थान के झुंझनूं जिले के मलसीसर गाँव में 31 मार्च की दोपहर ऐसा ही नजारा था। गाँव में तब अचानक हाहाकार मच गया जब पास में बना बाँध भरभराकर टूट गया और उसका पानी गाँव में तेजी से घुस आया। विकास बताते हैं कि अचानक पानी देखकर उन्हें कुछ सोचने-समझने का मौका नहीं मिला। गैराज का सामान वहीं छोड़कर जान बचाने के लिये वह वहाँ से किसी तरह भाग निकले। उनके गैराज में करीब 8 फुट पानी भर गया और सारा सामान खराब हो गया। नुकसान के बारे में पूछने पर वह कुछ देर हिसाब लगाकर बताते हैं कि करीब 5 लाख रुपए का नुकसान हो गया।

मलसीसर में ही रहने वाले रफीक हुकुमअली खां के घर में बाँध का पानी भरने से दरारें पड़ गई हैं। उन्होंने बताया, “बाँध टूटने की सूचना हमें कुछ देर पहले फोन पर मिल गई थी। हमने सामान दूसरे स्थान पर ले जाने के लिये तुरन्त गाड़ी भी मँगा ली थी लेकिन अचानक आये पानी के कारण सामान लोड नहीं कर पाये। सामान को मौके पर छोड़कर ही हमें गाँव से भागना पड़ा।”

ग्रामीण उम्मेद सिंह करणावत ने बताया कि गनीमत रही कि बाँध दोपहर में टूटा और लोगों को भागने का मौका मिल गया। अगर बाँध रात को टूटता तो जानमाल की भारी क्षति होती। उनका कहना है कि बाँध में दो दिन से रिसाव हो रहा था लेकिन गाँव में अलर्ट जारी नहीं किया गया। वह बताते हैं कि पानी भरने से सभी के सेप्टिक टैंक और समर्सिबल खराब हो गए हैं। दर्जनों घरों में दरारें आ गई हैं, कई घरों की दीवारें ढह गई हैं और बिजली से चलने वाले सभी उपकरण खराब हो गए हैं।

ग्रामीण प्रशासन पर नुकसान का गलत आकलन का आरोप लगा रहे हैं। गाँव में किराना की दुकान चलाने वाले अजीज सिरोहा बताते हैं, “प्रशासन ने सर्वे में मात्र छह घर प्रभावित बताए हैं। इन लोगों ने भी राहत लेने से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि पीड़ितों की संख्या काफी अधिक है। सबको मुआवजा मिलना चाहिए।” हालांकि एसडीएम अनीता धत्तरवाल ग्रामीणों के आरोप को नकारते हुए कहती हैं कि कुल 26 घर और कुछ बाड़े प्रभावित हैं। सर्वे कर लिस्ट बना ली गई है। उन्होंने बताया कि प्रभावित घरों की वीडियोग्राफी की गई है। फिर भी अगर किसी ग्रामीण को लगता है कि उसका नुकसान हुआ तो वह अपना आवेदन दे सकता है। उन्होंने कहा कि बाँध टूटने से सरकारी भवनों को भी काफी क्षति पहुँची है।

मलसीसर के पास बना यह बाँध इसी साल जनवरी में 588 करोड़ रुपए की लागत से तैयार हुआ था। कुम्भाराम लिफ्ट कैनाल परियोजना के तहत इस बाँध का निर्माण किया गया था। तारानगर में इन्दिरा गाँधी नहर से पाइपलाइन के जरिए इस बाँध में पानी भरा गया था। 11 मीटर गहरे बाँध की क्षमता 15 लाख क्यूबिक मीटर पानी की थी। जब बाँध टूटा तब 9 मीटर पानी भरा था। बाँध में उस वक्त 4,400 मिलियन लीटर पानी भरा था जिसमें से एक तिहाई बह गया। इस बाँध से झुंझनूं और खेतड़ी तहसील के 1,473 गाँवों को पीने के पानी की सप्लाई की जानी थी।

क्यों टूटा बाँध

ग्रामीण बाँध टूटने की वजह भ्रष्टाचार और घटिया निर्माण सामग्री को बता रहे हैं। विकास शर्मा बताते हैं कि बाँध के निर्माण में पक्का काम नहीं किया गया था, नीचे बालू और मिट्टी भर दी गई थी जबकि ऊपर दिखाने के लिये टाइलें लगा दी गईं। नाम उजागर न करने की शर्त पर बाँध बनाने वाली नागार्जुन कंस्ट्रक्शन कम्पनी के एक कर्मचारी ने भी दबी जुबान में स्वीकार किया कि बाँध के निर्माण में घटिया सामग्री इस्तेमाल की गई थी।

विफलता का दायराहालांकि जिला कलेक्टर दिनेश कुमार यादव इन आरोपों को नकारते हुए बताते हैं कि बाँध के अन्दर से जो पाइपलाइन डाली गई थी, उसमें तकनीकी खामियाँ रह गईं। शायद यह ठीक से नहीं डाली गईं। इसी पाइपलाइन के साथ रिसाव शुरू हुआ। यादव के अनुसार, “कम्पनी ने लीकेज के बारे में प्रशासन को समय पर जानकारी नहीं दी। बाँध टूटने से पानी का जो नुकसान हुआ है, उसके लिये कम्पनी पर पौने तीन करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया गया है। इसके अलावा कम्पनी पर एफआईआर दर्ज कराई गई है और उसे ब्लैकलिस्ट करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। प्रोजेक्ट मैनेजर बी. प्रसाद को गिरफ्तार कर लिया गया है।”

बाँध को नए सिरे से बनाया जाएगा या टूटे हुए हिस्से की मरम्मत की जाएगी? यह सवाल पूछने पर यादव बताते हैं कि लोगों ने ढाँचे पर शक जता दिया है। इसलिये सरकार आईआईटी रुड़की के विशेषज्ञों से बाँध की जाँच कराएगी। उसकी रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। इसके अलावा तीन इंजीनियरों की टीम भी बाँध टूटने का कारणों का पता लगाएगी।

राजस्थान में सिंचाई विभाग में कार्यरत एक इंजीनियर ने नाम जाहिर न करने की शर्त पर बनाया कि मलसीसर में बने बाँध में तकनीकी खामियाँ थीं। पहली यह कि यह ऊँचाई पर बना था और तमाम प्रशासनिक इमारतें निचले इलाकों में थीं। दूसरी कम्पनी ने जलाशय से ट्रीटमेंट प्लांट तक जो पाइपलाइन डाली थी, उसे चारों तरफ से सीमेंट और कंक्रीट से कवर नहीं किया गया। इस कारण रिसाव शुरू हुआ और नमी आने लगी। कम्पनी ने शुरू में इसकी अनदेखी की जिसकी वजह से तटबन्ध टूट गया।

सुरक्षा पर सवाल

मलसीसर में नए नवेले बाँध टूटने की घटना ने बाँधों की सुरक्षा पर सवाल खड़े कर दिये हैं। केन्द्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) की डैम रिहैबिलिटेशन एंड इम्प्रूवमेंट (ड्रिप) परियोजना की “डैम सेफ्टी इन इण्डिया रिपोर्ट” बताती है कि बड़े बाँधों के विफल होने की देश में सर्वाधिक 11 घटनाएँ राजस्थान में घटी हैं। सिंचाई विभाग के एक इंजीनियर पहचान गुप्त रखने पर इसकी वजह समझाते हैं “राजस्थान में पहाड़ों में कई बाँध हैं और वहाँ ब्लास्टिंग करके पहाड़ तोड़ा जाता है। बाँध बनाने के लिये खनन के सारे कायदे तोड़े जा रहे हैं। नियम है कि निचले इलाकों में 1,500 मीटर तक माइनिंग नहीं होनी चाहिए। लेकिन यहाँ खनन विभाग ने 150 से 300 मीटर तक लीज दे रखी है। पहाड़ी क्षेत्रों में बाँध टूटने की यह सबसे बड़ी वजह है।” वह बताते हैं कि रेतीली इलाकों में बाँधों के टूटने की वजह लापरवाही और अनदेखी है। राजस्थान के जल संसाधन विभाग में बाँधों के लिये कोई निगरानी तंत्र नहीं है। इसके लिये स्टाफ ही नहीं है।

सीडब्ल्यूसी की रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान के बाद मध्य प्रदेश में 10 और गुजरात में बड़े बाँधों के असफल होने की पाँच घटनाएँ हुई हैं। 2001 से 2010 के बीच देश में बाँध की असफलता के नौ मामले सामने आये (देखें विफलता का दायरा, पृष्ठ 19)। इससे पहले 1951 से 1960 की अवधि में ही इससे ज्यादा 10 घटनाएँ हुईं थीं। 1961-70 तक सात, 1971-80 तक तीन, 1981-90 तक एक और 1991-2000 के बीच बाँध विफलता के तीन मामले सामने आये। रिपोर्ट बताती है कि अधिकांश बाँध उस वक्त टूट गए जब उनमें पूरी क्षमता में पानी भरा गया। मलसीसर में बाँध इसी कारण टूटा। इससे पता चलता है कि बाँध के डिजाइन में खोट था या उसमें घटिया निर्माण सामग्री इस्तेमाल की गई थी। बाँध विफलता की 44.44 प्रतिशत घटनाएँ बाँध बनने के 0-5 वर्ष की अवधि के दौरान घटीं। देश भर में ऐसे कुल 16 मामले सामने आये हैं। पिछले साल 19 सितम्बर को बिहार के भागलपुर के कहलगाँव में बना बाँध उद्घाटन से महज एक दिन पहले टूट गया था। यह बाँध 389 करोड़ रुपए की लागत से बना था। रिपोर्ट के अनुसार, ज्यादातर राज्य बाँधों की सुरक्षा और मरम्मत के लिये पर्याप्त धनराशि उपलब्ध कराने में नाकाम रहे हैं। बाँध को सुरक्षित रखने के लिये इन राज्यों के पास तकनीकी और संस्थागत क्षमताएँ भी नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार, बाँध विफलता के मुख्य कारणों में अचानक आये बाढ़ के पानी से दरारें पड़ना (44 प्रतिशत), पानी की निकासी की अपर्याप्त व्यवस्था (25 प्रतिशत), त्रुटिपूर्ण पाइपिंग या काम (14 प्रतिशत) और अन्य परेशानियाँ (17 प्रतिशत) हैं।

सीडब्ल्यूसी की रिपोर्ट ही नहीं बल्कि नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट भी बाँधों की सुरक्षा पर गम्भीर सवाल खड़े करती है। पिछले साल जारी की गई सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार, 4,862 बड़े बाँधों में केवल 349 बाँधों यानी महज सात फीसदी में ही आपातकालीन आपदा कार्य योजना मौजूद थी। केवल 231 बाँधों (कुल बाँधों का पाँच प्रतिशत) पर ऑपरेटिंग मैनुअल मौजूद थे। सीएजी ने पाया कि 17 राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में केवल दो ने ही मानसून से पहले बाद में बाँधों की पूरी जाँच कराई और केवल तीन राज्यों ने आंशिक जाँच की जबकि 12 राज्यों ने ऐसा नहीं किया। सीएजी ने कई बड़े बाँधों की सुरक्षा में बड़ी चूकें पाईं। रिपोर्ट के अनुसार, बाँध सुरक्षा पर कानून बनाने के लिये अगस्त 2010 में केन्द्र सरकार ने बाँध सुरक्षा विधेयक संसद में पेश किया था। इस विधेयक को सुझावों और संशोधनों के लिये पार्लियामेंट्री स्टैंडिंग कमिटी के पास भेज दिया गया। बाद में बिल से हाथ खींच लिये गए और संसद में संशोधित विधेयक पेश किया गया। लेकिन इसके बाद 15वीं लोकसभा का कार्यकाल खत्म हो गया और विधेयक भी।

नर्मदा बचाओ आन्दोलन से जुड़े राहुल यादव बाँधों पर प्रश्न चिन्ह लगाते हुए बताते हैं “पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने बाँधों को विकास का प्रतीक बताया था और देश भर में बड़ी-बड़ी बाँध परियोजनाओं की आधारशिला रखी थी। जिस मकसद से बाँध बने थे, वे मकसद कभी पूरे ही नहीं हुए। इन बाँधों से न तो किसानों को सिंचाई के लिये पर्याप्त पानी मिल पाया और न ही पीने के पानी का इन्तजाम हुआ।” उन्होंने बताया कि हर बाँध की एक क्षमता और अवधि होती है। उसके अनुसार योजनाएँ नहीं बनतीं। इसी वजह से बाँध टूटने की घटनाएँ सामने आती हैं। वह बाँधों की जरूरत का विश्लेषण करने की वकालत करते हुए बताते हैं “बाँध के बजाय छोटे-छोटे चेकडैम बनाने और तालाबों, कुओं व नदियों को पुनर्जीवित करने की जरूरत है। तालाब और छोटी नदियों के संरक्षण के लिये ग्रामीण स्तर पर समिति बननी चाहिए।” उनका कहना है कि बड़े बाँध निजी कम्पनियों को फायदा पहुँचाने के मकसद से भी बनाए जाते हैं। कम्पनियाँ ज्यादा मुनाफे के लिये घटिया निर्माण सामग्री इस्तेमाल करती है और बाँधों की प्रशासनिक स्तर पर निगरानी नहीं की जाती।

पर्यावरणविदों और बाँध सुरक्षा की तमाम चिन्ताओं के बीच सरकारों का बाँध प्रेम कम नहीं हो रहा है। यही वजह है कि भारत में चीन और अमेरिका के बाद विश्व में सबसे ज्यादा बाँध हैं। नेशनल रजिस्टर ऑफ लार्ज डैम्स (एनआरएलडी) की 2017 की रिपोर्ट के अनुसार, देश में 5,254 बड़े बाँध बन चुके हैं और 447 निर्माणाधीन हैं। इन बाँधों के पानी भण्डारण की क्षमता 253 बीसीएम (बिलियन क्यूबिक मीटर है)। अन्य 51 बीसीएम क्षमता भण्डारण के लिये बाँधों का कार्य प्रगति पर है।

बाँध टूटने से हुआ जलभरावबाँधों का अध्ययन करने वाले पर्यावरणविद रामप्रताप गुप्ता बताते हैं कि देश में ज्यादातर बाँध असफल हो चुके हैं। जल दोहन की गलत तकनीक के कारण बाँधों में पानी का स्तर कम होता जा रहा है। वह बताते हैं कि जो लोग बाँध बनाते हैं कि वे किसी जलग्रहण क्षेत्र का पानी आगे स्थानान्तरित कर देते हैं। इससे एक क्षेत्र पानी से वंचित हो जाता है जबकि दूसरे क्षेत्र में पानी की उपलब्धता दोगुनी हो जाती है। चम्बल नदी पर बने गाँधी सागर बाँध का उदाहरण देते हुए वह बताते हैं कि इस बाँध के लिये पानी सुनिश्चित करने के लिये वर्षाजल के संग्रहण के लिये क्षेत्र में किसी संरचना पर प्रतिबन्ध लगाया गया है। इससे क्षेत्र बंजर बनता जा रहा है। गाँधी सागर बाँध भी 8-9 वर्ष में एक बार ही भर पाता है। उनके अनुसार, इस बाँध ने क्षेत्र में हजारों तालाब सुखा दिये जिन पर लोग निर्भर थे। गुप्ता गाँधी सागर परियोजना को समाप्त करने की वकालत करते हैं।

‘हिमाचल प्रदेश के जनसंघर्ष’ पुस्तक में जितेंद्र सिंह चाहर लिखते हैं “हमारे देश में बने 9.2 प्रतिशत बाँधों में दरारें पड़ चुकी हैं जो दुनिया के औसत से दोगुने से ज्यादा है। देश में 435 बाँधों में से 13 एकदम नाकामयाब रहे हैं।” वह आगे लिखते हैं “बाँधों के कारण बड़े क्षेत्र डूब में आएँगे, जंगल नष्ट होंगे, भूकम्प की सम्भावना बढ़ेगी, भूस्खलन होना, जैवविविधता खत्म होगी और जल की गुणवत्ता में जो कमी होगी उसकी पूर्ति असम्भव है।” किताब के अनुसार, “हिमाचल प्रदेश में 300 से अधिक स्थल विभिन्न परियोजनाओं के लिये चिन्हित कर लिये गए हैं और दर्जनों पर काम शुरू हो चुका है। एक ही नदी को 100-150 किलोमीटर के दायरे में बार-बार बाँधा जा रहा है और सुरंगों से निकाला जा रहा है। नदी के नैसर्गिक प्रवाह के साथ छेड़छाड़ की जा रही है। बिना सबक सीखे बाँध बनाने की बदहवास दौड़ जारी है।”

 

 

 

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