मौके का फायदा

Submitted by Hindi on Mon, 12/18/2017 - 13:59
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डाउन टू अर्थ, दिसम्बर 2017

राज्य, क्षतिपूर्ति वनरोपण निधि अधिनियम के नियम तैयार करने में हो रही देरी का फायदा उठा रहे हैं ताकि वन अधिकार अधिनियम के तहत समुदायों की भूमि पर अधिकार स्थापित किया जा सके।

ओडिशा के पिडिकिया गाँव में वन अधिकारियों ने फरवरी में वनाधिकार के तहत आने वाली 300 हेक्टेयर सामुदायिक भूमि पर 60,000 टीक के पौधे रोप दिएक्षति-पूर्ति वनरोपण निधि अधिनियम 2016 (सीएएफ) को संसद में पारित हुए एक साल से ज्यादा हो चुका है फिर भी पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफएंडसीसी) ने इसे कार्यान्वित करने के अनिवार्य नियम अभी तक नहीं बनाए हैं। यहाँ तक कि मंत्रालय ने इन नियमों को अन्तिम रूप देने के लिये अधीनस्थ विधायन सम्बन्धी राज्य सभा समिति से 3 जनवरी, 2018 तक का समय माँगा है जबकि इसकी समय सीमा जून 2017 में समाप्त हो चुकी है। महानिरीक्षण, वन, एमओईएफएंडसीसी तथा क्षति-पूर्ति वनरोपण निधि प्रबन्धन एवं योजना प्राधिकरण (सीएएमपीए) के सदस्य डी.के. सिन्हा का कहना है, “प्रस्तावित नियम अभी मंत्रालय के एकीकृत वित्तीय प्रभाग के पास हैं।”

नियमों के अभाव में कम-से-कम 15 राज्यों के वन विभाग एमओईएफएंडसीसी द्वारा 2009 में जारी किए गए राज्य सीएएफ दिशा-निर्देशों के अनुसार वनरोपण कर रहे हैं जिसमें इस बुनियादी सवाल का कोई जवाब नहीं दिया गया है कि इस कार्य के लिये किस प्रकार की भूमि का इस्तेमाल किया जा सकता है- वन अथवा राजस्व। परिणामस्वरूप ये वन विभाग सीएएफ के तहत मिलने वाली निधि का इस्तेमाल ऐसी वनभूमि पर अधिकार स्थापित करने के लिये कर रहे हैं जिन पर वन अधिकार अधिनियम, 2006 (एफआरए) के तहत समुदाय का स्वामित्व और प्रबन्धन माना जा रहा है। वन्य भूमि को गैर वन्य कार्यों के लिये इस्तेमाल करने की क्षति-पूर्ति के लिये वनरोपण को अनिवार्य बनाने वाली निधि वर्तमान में 42,000 करोड़ रुपए है जिनमें से 10 प्रतिशत राष्ट्रीय सीएएमपीए के पास होना चाहिए और शेष राज्य सीएएमपीए के पास होना चाहिए।

ओडिशा में आदिवासियों के अधिकारों के सम्बन्ध में कार्य करने वाले गैर-सरकारी संगठन वसुंधरा की संघमित्रा दुबे कहती हैं कि ओडिशा का वन विभाग सीएएफ का इस्तेमाल ऐसी भूमि पर बाड़ लगाने के लिये कर रहा है जिस पर स्थानीय समुदाय ने अपना दावा किया है। फिर वे उन भूमि पर पौधारोपण कर रहे हैं। संघमित्रा के आँकड़ों के अनुसार, वन विभाग ने कालाहांडी जिले के कम-से-कम 10 गाँवों की वन्यभूमि पर पौधारोपण शुरू कर दिया है। इसका कहना है कि दस में से नौ गाँवों के लोगों ने सामुदायिक वन अधिकारों के लिये आवेदन कर दिया है। संघमित्रा ने बताया कि वन विभाग ने क्षति-पूर्ति वनरोपण के लिये भूमि परिवर्तन से पहले एक गाँव के अलावा किसी भी गाँव की ग्राम सभा से परामर्श नहीं किया।

जब डाउन टू अर्थ ने सीएएमपीए के मुख्य वन संरक्षक सुदीप्तो दास से बात की तो उन्होंने कहा कि उन्होंने अभी विभाग में पदभार सम्भाला है इसलिये उन्हें इस भूमि परिवर्तन की कोई जानकारी नहीं है। 2016-17 के दौरान राज्य के सीएएफ के तहत 241 करोड़ रुपए प्राप्त हुए थे जिसमें से लगभग 2.97 करोड़ रुपए 48 वनरोपण अभियानों पर खर्च हुए।

नमती एनवायरनमेंट जस्टिस प्रोग्राम, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च, नई दिल्ली की विधि अनुसंधान निदेशक कांची कोहली का मानना है, “एक अवधारणा के रूप में क्षति-पूर्ति वनरोपण में जन भागीदारी को भी शामिल नहीं किया गया। एआरए की शुरुआत से यह जटिल हो गया क्योंकि अब लोगों को वन्यभूमि पर अधिकार का दावा कर सकते हैं। अब दो कानूनों के बीच टकराव हो गया है।”

एक अन्य घटना में ओडिशा वन अधिकारियों ने 300 हेक्टेयर की वन्यभूमि का घेराव करके उस पर सागौन के 60,000 पौधे लगा दिए। यह वन्यभूमि पिडिकिया गाँव के लोगों की आजीविका का साधन है। ग्राम सभा ने राज्य के अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति विकास विभाग को पत्र लिखा जिसके बाद वन विभाग ने गाँव वालों को जंगल में प्रवेश करने की इजाजत दे दी। संघमित्रा कहती हैं कि परम्परागत रूप से इस जंगल में महुआ के पेड़ होते हैं। अब सागौन के पेड़ लगाने से पारिस्थितिकी तंत्र पर बुरा असर पड़ सकता है। इसके अलावा गाँव वाले सागौन नहीं बेच सकते क्योंकि भारत में इसे विनियमित किया जाता है और केवल वन विभाग ही इसे बेच सकता है। दास कहते हैं, सीएएफ के तहत पौधारोपण को संचालन समिति का अनुमोदन प्राप्त है और सभी नियमों का पालन किया जा रहा है।

झारखंड में भी पौधारोपण की ऐसी घटनाएँ हो रही हैं। जुलाई 2017 में गुमला जिले में 50 एकड़ वन्यभूमि को वनरोपण परियोजना के तहत लाया गया था। जिले के प्रभारी फॉरेस्ट रेंजर महादेव उरांव ने बताया, यहाँ सागौन, कीकर और शीशम के लगभग 50,000 पौधे लगाए गए हैं। यह पौधारोपण सीएएफ के तहत किया गया है।

इस बीच उत्तराखण्ड में वन विभाग वन पंचायत के अधिकार क्षेत्र में आने वाली जमीन पर पौधारोपण की योजना बना रहा है। उत्तराखण्ड के वन अधिकार कार्यकर्ता तरुण जोशी कहते हैं, जंगलों की कमी है इसलिये यह विचार उठा। अगस्त में प्रधान मुख्य वन संरक्षक और राज्य के वन मंत्री के बीच हुई बैठक में इस विचार पर चर्चा हुई थी। उत्तर गुजरात के साबरकांठा जिले, कर्नाटक के मैसूर जिले और छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले में भी सामुदायिक वन्य भूमि पर वनरोपण अभियान चलाए जा रहे हैं। हालांकि कार्यकर्ताओं का कहना है कि अभी यह पता नहीं चला है कि पौधारोपण सीएएफ के तहत किया जा रहा है अथवा नहीं।

यदि समय पर नियम बना दिए जाते तो राज्य के वन विभागों द्वारा किए जा रहे इस शोषण को रोका जा सकता था। जब 8 मई, 2015 को राज्य सभा में विधेयक पेश किया गया था तब कई सदस्यों ने एफआरए के साथ इसकी भिन्नता, आजीविका के साधनों के न होने तथा बेदखली और क्षति-पूर्ति वनरोपण अभियानों के दौरान स्थानीय समुदायों की भागीदारी के अभाव पर चिन्ता प्रकट की थी। इसके जवाब में तत्कालीन केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री स्वर्गीय अनिल दवे ने आश्वासन दिया था कि नियमों में सभी सुझावों को शामिल किया जाएगा। उन्होंने यह भी वादा किया था कि पौधारोपण के बारे में निर्णय लेते समय ग्राम सभाओं से भी विचार-विमर्श किया जाएगा।

किन्तु अगस्त में महाराष्ट्र वन विभाग की वेबसाइट पर अपलोड किए गए मसौदा नियमों में ग्राम सभाओं के साथ-विमर्श का कोई जिक्र नहीं है। आलोचना होने पर एमओईएफएंडसीसी ने खुद को इस मसौदे से अलग कर लिया। किन्तु मंत्रालय में मौजूद एक सूत्र ने बताया कि अप्रैल में शून्य मसौदा नियम सभी राज्यों के साथ साझा किए गए थे। नियमों पर चर्चा के लिये 31 मई को मंत्रालय के सभी प्रभागों की आन्तरिक बैठक बुलाई गई थी। इसमें कई राज्यों के प्रधान मुख्य वन संरक्षक भी उपस्थित थे। बन्द कमरे में बैठक करने के बावजूद यह उम्मीद नहीं है कि मंत्रालय 3 जनवरी, 2018 तक बढ़ाई गई समय-सीमा तक भी नियम बना सकेगा क्योंकि मसौदा नियमों को कम-से-कम दो महीने तक जनता के बीच रखना होगा ताकि इन पर सुझाव प्राप्त किए जा सकें। तब तक जनता के अधिकारों पर तलवार लटकती रहेगी।

 

दूर तक उम्मीद नहीं


केन्द्र ने सीएएफ अधिनियम, 2016 के कार्यान्वयन के लिये अभी तक नियमों को अन्तिम रूप नहीं दिया है, ऐसे में वन विभाग सामुदायिक वन्यभूमि पर नियंत्रण के लिये 2009 के दिशा-निर्देशों का इस्तेमाल कर रहे हैं।

मई 2016

वन संरक्षण अधिनियम 1980 में क्षति-पूर्ति वनरोपण की अवधारणा सामने आने के 30 वर्ष बाद लोकसभा ने क्षति-पूर्ति वनरोपण निधि (सीएएफ) विधेयक पारित किया

जुलाई 2016

राज्य सभा ने विधेयक पारित किया। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा जुलाई 2017 तक नियम बनाए जाने की सम्भावना

फरवरी 2017

वन विभाग ने ओडिशा के पिडिकिया गाँव में वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत सामुदायिक अधिकार वाली वन्यभूमि पर वनरोपण अभियान शुरू किया

मई 2017

सीएएफ अधिनियम के कार्यान्वयन के नियमों पर चर्चा के लिये एमओईएफएंडसीसी की बैठक हुई

जुलाई 2017

झारखंड के गुमला गाँव में सामुदायिक भूमि पर वनरोपण अभियान चलाया गया।

अगस्त 2017

नियमों का शुरुआती मसौदा सभी राज्यों को भेजा गया

सितम्बर 2017

एमओईएफएंडसीसी ने नियमों को बनाने के लिये अधीनस्थ विधायन सम्बन्धी राज्य सभा समिति से जनवरी 2018 तक का समय माँगा

नवम्बर 2017

प्रस्तावित नियम एमओईएफएंडसीसी के एकीकृत वित्तीय प्रभाग को सौंपे गए

 


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