अधिकतम दोहन पर आधारित प्रबंधन नहीं है उचित

Submitted by HindiWater on Wed, 07/10/2019 - 15:18
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दैनिक जागरण, 7 जुलाई 2019

अधिकतम दोहन पर आधारित प्रबंधन नहीं है उचितअधिकतम दोहन पर आधारित प्रबंधन नहीं है उचित

भारत के पारम्परिक जल प्रबंधन की सबसे बड़ी खुबी है कि यह स्थानीय समझ, सामग्री और कौशल द्वारा संचालित होता रहा है। शासन की भूमिका सिर्फ उपलब्ध कराने की थी। आज फिर से हमें अपनी जड़ों की ओर लौटना होगा। तभी हम सब पानीदार हो सकेंगे।

भारत का वर्तमान जलचित्र एक ऐसे आईने की तरह है, जिसमें अतीत का अक्स देखे बगैर भविष्य का सुधार संभव नहीं है। तस्वीर कहती है कि स्वतंत्र भारत में पानी को लेकर खर्च भी खूब हुआ है और ढांचे भी खूब बने हैं। जल संसाधन, सिंचाई, कृषि, ग्रामीण विकास, शहरी विकास से लेकर पंचायतीराज व नगरपालिकाओं तक। जितने अधिक मंत्रालय, संस्थान पानी प्रबंधन में भागीदार हैं, शायद ही किसी और चीेज के इंतजाम में हों। फिर भी नतीजा यह है कि मर्ज बढ़ता गया, ज्यों-ज्यों दवा की।

बढ़ती आबादी और वर्षा में हो रही कमी इसके कई कारणों में से एक हैं। किंतु मूल कारण दोहन पर केंद्रित हो जाना है। जल संचयन और निकासी के बीच असंतुलन का नतीजा है, भारत का वर्तमान जल संकट। यदि हम चाहते हैं कि यह संतुलन सधे तो जितना और जैसा धरती को लौटाने के सिद्धांत को सख्ती से लागू तो करना ही होगा, साथ ही यह भी समझना होगा कि नहर, बांध और हर घर को नल से जल के बूते यह संभव नहीं। परंपरागत जल प्रबंधन तकनीकों और जलोपयोग का स्वानुशासन लाने से ही यह संभव होगा।  भारत के पारंपरिक जल प्रबंधन की सबसे बड़ी खुबी है कि यह स्थानीय समझ, सामग्री, और कौशल द्वारा संचालित होता रहा है। शासन की भूमिका सिर्फ भूमि उपलब्ध कराने की थी। धन की व्यवस्था करना, धर्मार्थ का काम माना जाता था। लिहाजा, ऐसा करने वाले धनवान को समाज महाजन की उपाधि देता था। इस प्रक्रिया में पानी के लिए परावलंबन नहीं, स्वावलंबन था। जल का स्वराज था, स्वानुशासन था। पानी पर एकाधिकार की संभावना नहीं थी। सामुदायिक व साझेपन के जिंदा रहने की संभावना हमेशा थी। चाल, खाल, पाल, झाल, लाल, कूल, कुंड, झील, बावड़ी, जोहड़ व ताज जैसे अनेक नाम व डिजाइन वाली प्रणालियां सदी-दर-सदी इसी तरह निर्मित व संचालित हुई।

सुखद है कि परंपरागत जल प्रणालियों तथा प्रबंधन की बात, प्रधानमंत्री जी के मन में आज है। पानी नीचे सरकता जा रहा है। कुंए और नलकूपों के हलक सूखने लगे हैं। पानी के आने-जाने के रास्त करें। शहरी लोग भी अपनी छतों को साफ कर पानी की व्यवस्था में जुट जाएं। यह काम बड़े-बड़े भवन, स्कूल परिसर तत्काल करें। वर्षा जल संचयन अनिवार्य घोषित इलाकों में जो भवन बारिश में इसका इंतजाम न कर पाएं तो उनके नल काट दिए जाएं। बोरवेल सील कर दिए जाएं। सरकारों को भी चाहिए कि उन सभी बाधाओं को हटाएं, जो समुदायों को उनके हिस्से के पानी का प्रबंधन खुद करने से हतोत्साहित करती हैं। स्थानीय पानी प्रबंधन से जुड़े समस्त कर्मचारियों को ग्राम सभाओं के अधीन किया जाए। परंपरा की सीख यही है। 

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