डॉक्यूमेंटरी के जरिए स्वच्छता का सन्देश

Submitted by editorial on Sat, 06/09/2018 - 11:33
Source
अमर उजाला, 10 मई, 2018


विष्णु प्रिया सेनिटेशन डॉक्यूमेंटरीविष्णु प्रिया सेनिटेशन डॉक्यूमेंटरी (फोटो साभार - डेक्कन क्रॉनिकल)मेरा जन्म तमिलनाडु के मदुरै में हुआ। लेकिन पिता की नौकरी के सिलसिले में मेरी परवरिश मुम्बई से लेकर केन्या तक हुई। मैं पढ़ाई के सिलसिले मेें वापस भारत आई और चेन्नई में आर्किटेक्चर की पढ़ाई शुरू की। दो साल पहले यो ही दोस्तों के साथ बातचीत करते हुए एक दिन मुझे पता चल कि ग्रामीण इलाके की लड़कियाँ तब तक ही स्कूल जाती है, जब तक उन्हें मासिक धर्म की हकीकत से जूझना नहीं पड़ता। क्योंकि अधिकांश ग्रामीण स्कूलों में शौचालय की व्यवस्था नही होती। यह जानकर मैं थोड़ा हैरान हुई।

इस सिलसिले में मैंने खोजबीन की तो मुझे सच्चाई और भी भयावह लगी। मुझे एक ऐसी बच्ची के बारे में पता चला जिसने सिर्फ इसलिये दम तोड़ दिया था, क्योंकि खुले मेें शौच करने के शर्म से उसने शौच पर जाना ही छोड़ दिया था, जिससे उसके शरीर ऊतकों में संक्रमण हो गया और वह मर गई।

सच्चाई को और बेहतर तरीके से समझने के लिये मैंने कई ग्रामीण स्कूलों का दौरा किया। मैंने समस्या के पीछे की वजह जानने की कोशिश की, तो पता चला कि ग्रामीण इलाकों मेें पानी की कमी शौचालयों के निर्माण में असली बाधा है। मुझे यह भी जानकारी हुई कि कई अन्तरराष्ट्रीय संस्थाओं के पास और सरकारी इन्तजामों में ऐसे शौचालय बनाने की तकनीक उपलब्ध है, जिसमें पानी की बेहद कम जरूरत होती है।

मुझे पता चला कि त्रिची के पास एक गाँव मुसिरी में ऐसे विशेष डिजाइन वाले शौचालय अस्तित्व में हैं। पेशे से आर्किटेक्ट और एक सामाजिक समस्या दूर करने की इच्छा के सात मैं मुसिरी गई। मैं गई तो थी वहाँ के विशेष शौचालयों का निरीक्षण करने पर वहाँ पहुँचने के बाद मुझे कुछ और भी खास दिखा। उस छोटी-सी पंचायत में गन्दगी का नामों निशान नहीं था। कचरा प्रबन्धन ऐसा था कि बड़ी-बड़ी नगर पालिकाएँ भी हार जाये। मुझे दुख बस इस बात का हुआ कि इतनी अच्छी जगह के बारे में मुझ समेत ज्यादातर लोगों को अब तक कोई जानकारी नहीं थी।

कचरे के पहाड़ की अभ्यस्थ मेरी आँखों का अप्रत्याशित रूप से यह देखने को मिला था। मैंने उस गाँव का वीडियों बनाकर सोशल मीडिया के माध्यम से अपने दोस्तों के बीच साझा किया। यही से मेरे दिमाग में एक ख्याल आया कि लोगों को जागरूक करने के लिये क्यों न मैं पूरे भारत की गन्दगी की समस्या को एक डॉक्यूमेंटरी फिल्म के माध्यम से दिखाऊँ। इस काम के लिये मैंने पूरे भारत का भ्रमण किया।

मैंने दिल्ली में नाला बन चुकी यमुना की सच्चाई को भी कैमरे में कैद किया, तो लेह के पर्यटन स्थलों से इतर वहाँ के सुदूर क्षेत्रों की हकीकत को भी देखा। पिछले दो वर्षों से मैं खुद की बचत के पैसों से डॉक्यूमेंटरी निर्माण के लिये काम कर रही हूँ। अब जबकि मेरी डॉक्यूमेंटरी अपने अन्तिम चरण में है और कुछ ही दिनों बाद वह रिलीज हो जाएगी मुझे अपने पुराने काम यानी आर्किटेक्चर से भी जुड़ना है। मेरे परिवार ने मेरा साथ दिया है, पर शुरू में यह इतना आसान नहीं रहा।

मेरा अब तक का पूरा सफर इत्तेफाकों की कड़ी है। मेरे पास किसी भी काम की कोई विशेष योजना नहीं थी, लेकिन समाज के लिये कुछ करने की प्रेरणा ने मुझे गतिशील रखा। मगर अब मेरी एक योजना है, मैं चाहती हूँ कि मैं फिल्म वाले काम के बाद कुछ सरकारी स्कूलों को गोद लेकर उनके लिये उन्हीं विशेष डिजाइन वाले शौचालय बनाऊँ, ताकि कम से कम कुछ बच्चियाँ तो स्कूल न छोड़ें।
 

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