सतत विकास ग्रामीण विकास का माध्यम मनरेगा

Submitted by editorial on Tue, 10/02/2018 - 14:50
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कुरुक्षेत्र, सितम्बर, 2018
मनरेगामनरेगा मनरेगा एक ऐसा कार्यक्रम है जिससे ग्रामीण क्षेत्रों का सतत विकास हुआ है और आम आदमी पर बहुत ही अच्छा प्रभाव पड़ा है। श्रमिकों को सौ दिन तक का रोजगार उपलब्ध हुआ है तथा शहरी पलायन पर भी रोक लगी है। मनरेगा ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिये महत्त्वपूर्ण काम किया है। इसने परेशानी के समय ग्रामीणों एवं श्रमिकों को बड़ी राहत पहुँचाई है और यह स्वतः ही रोजगार पैदा करने का जरिया बन गया है। वास्तव में मनरेगा गरीबी निवारण एवं सतत ग्रामीण विकास की दिशा में एक सार्थक कदम है।

सरकार द्वारा ग्रामीण क्षेत्र की बेरोजगारी दूर करने और ग्रामीण परिवारों को गरीबी रेखा से ऊपर उठाने के लिये महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी (मनरेगा) योजना की शुरुआत की गई थी ताकि भूख, कुपोषण, स्वास्थ्य सम्बन्धी चुनौतियों का आसानी से सामना किया जा सके और ग्रामीण जनता रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन ना करे। गाँव के गरीब लोगों को रोजगार मिलने से उनकी आय में वृद्धि होगी और वे समाज की मुख्यधारा में शामिल हो सकेंगे, साथ ही शहरों में भीड़-भाड़ से उत्पन्न आवास, बिजली, पानी और आधारभूत सुविधाओं की समस्या भी निजात पा सकेंगे। इस योजना में महिलाओं के विकास एवं कार्य की प्राथमिकता को बिना भेदभाव के रखा गया है, जिससे उनमें रोजगार प्राप्ति की सम्भावना बढ़ी है, जो आर्थिक स्वतंत्रता एवं स्वावलम्बन तथा महिला सशक्तीकरण की दिशा में एक सार्थक कदम है।

मनरेगा के अन्तर्गत गाँव में पंचायतों के माध्यम से कार्य मिलने पर उपयोगी परिसम्पत्तियों का निर्माण हुआ है तथा एक समतापूर्ण सामाजिक व्यवस्था की शुरुआत हुई है, जिससे एक सफल श्रमिक आन्दोलन को बल मिला है। श्रमिक अपने हितों की सुरक्षा कर पाने में सफल भी साबित हो रहे हैं, जबकि ग्रामीण रोजगार की दूसरी योजनाओं में प्रायः ऐसा नहीं हुआ है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह भी है कि इस योजना में विकास कार्यों की पुनरावृत्ति भी है ताकि एक बार कार्य करके उसको पुनः देखा व सम्भाला जा सके और उसके रख-रखाव के कार्य नियमित रूप से किये जा सकें। ग्रामीण बेरोजगार युवक खाली रहने से उनमें अापराधिक प्रवृत्ति विकसित हो रही है, जबकि मनरेगा के अन्तर्गत उन्हें काम मिलने पर उनकी इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगा है और सामाजिक व्यवस्था सामान्य हुई है।

मनरेगा ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिये महत्त्वपूर्ण काम किया है। इसने परेशानी के समय ग्रामीणों एवं श्रमिकों को बड़ी राहत पहुँचाई है और यह स्वतः ही रोजगार पैदा करने का जरिया बन गया है। सूखे के समय काम की माँग बढ़ जाती है। भुगतान सीधे श्रमिक के बैंक या पोस्ट अॉफिस खाते में जमा होता है, इसलिये दूसरी कल्याणकारी योजनाओं की तुलना में इसमें गड़बड़ी की आशंका बहुत कम है। यह योजना भारत में व्यापक अर्थों में हो रहे बड़े बदलाव में एक महत्त्वपूर्ण औजार साबित हो रही है। बड़ी संख्या में लोग कृषि से विनिर्माण या सेवा क्षेत्रों में जा रहे हैं या जाने को मजबूर हो रहे हैं। बहुत से लोग स्थायी रूप से काम न मिलने के कारण प्रतिवर्ष मौसमी पलायन करते थे।

इसका मतलब है कि जिन महीनों में शहरों में काम न हो उन महीनों में गाँवों में काम उपलब्ध हो। इसके अलावा ऐसे लाखों मजदूरों के लिये जो गाँव छोड़कर जाना नहीं चाहते, मनरेगा ने खेती के कम व्यस्त समय में रोजगार उपलब्ध कराया है। मनरेगा के अन्तर्गत तालाबों और कुओं जैसे जलस्रोतों की खुदाई करने या फिर सड़कों के आस-पास बेतरतीब जगहों को समतल करने जैसे कार्यों को शुरुआत में शामिल किया गया था, इसमें जल संरक्षण, सिंचाई की नहरों का निर्माण और रख-रखाव, वनारोपण आदि भी शामिल किये गए ताकि सूखे की आशंका को कम किया जा सके। इसमें जलस्रोतों का जीर्णोंद्धार, जमीन को उपयोगी बनाना, सफाई से जुड़ा काम, ग्रामीण सड़क निर्माण, बाढ़ नियंत्रण, जलोत्सारण क्षेत्र का विकास और पेयजल का प्रबन्धन करने जैसे कार्य भी शामिल हैं।

विकल्पों की बड़ी सूची में से पंचायत के पास यह गुंजाईश होती है कि वह सबसे लोकप्रिय कार्य चुन ले, भले ही उसकी माँग कम क्यों न हो। पंचायतों को ऐसे कार्यों की सूची बनानी चाहिए जिसकी गाँव में सख्त जरूरत है और फिर उसके आधार पर मनरेगा के तहत कार्य का विभाजन किया जाये ताकि गाँव का विकास निरन्तर रूप से किया जा सके। मनरेगा कोई खैराती कार्यक्रम नहीं है। इसमें काम के बदले भुगतान किया जाता है और पारिश्रमिक के रूप में बड़ी राशि खर्च की जाती है। हमें स्थायी और टिकाऊ तरह की उपयोगी सम्पत्ति के निर्माण में इसका लाभ उठाना चाहिए। मनरेगा कार्यक्रम में इस तरह और बदलाव लाया जाये जिससे यह सामाजिक न्याय का स्मारक भी बन सके।

मनरेगा एक ऐसा कार्यक्रम है जिससे ग्रामीण क्षेत्रों का सतत विकास हुआ है और आम आदमी पर बहुत ही अच्छा प्रभाव पड़ा है। श्रमिकों को सौ दिन तक का रोजगार उपलब्ध हुआ है तथा शहरी पलायन पर भी रोक लगी है। मनरेगा के तहत अभी तक जो पूर्व निर्धारित काम कराए जाते थे उनमें ऐसा लगता था कि वे व्यर्थ हैं। जैसे कच्ची मिट्टी से सम्बन्धित कार्य जो एक बरसात के अन्दर ही समाप्त होते दिखाई देते हैं। ऐसे कार्यों से दोहरा नुकसान होता है। जो श्रमिक खेत में कार्यरत थे और कृषि उत्पादन कर रहे थे वे अब व्यर्थ के कामों में लगे दिखाई देते थे।

मनरेगा के तहत किये गए कार्यों के अनुत्पादक होने का एक और प्रमाण अमरीका की जॉर्ज वांशिगटन यूनिवर्सिटी द्वारा किया गया एक अध्ययन भी है। इसमें पता चला है कि बिहार में मनरेगा से गरीबी में मात्र एक प्रतिशत की कमी आई है जबकि 12 प्रतिशत की कमी अपेक्षित थी। इसका कारण श्रमिकों का अनुत्पादक कार्यों में लगा होना पाया गया। मनरेगा की एक और समस्या प्रशासनिक जटिलता भी है। इस तरह सरकार के सामने दो समस्याएँ खड़ी हैं। एक तरफ किसानों की आय को दोगुना करने का संकल्प है और दूसरी और मनरेगा की जटिलता एवं मनरेगा के तहत व्यर्थ के कामों से निजात पाने की चुनौती है। इस समस्या के हल के लिये सरकार ने बहुत ही सराहनीय एवं महत्त्वपूर्ण कदम उठाया है। अब तक मनरेगा में केवल सार्वजनिक कार्यों को करने की अनुमति थी जैसे सामूहिक उपयोग वाले तालाबों को गहरा करना।

अब सरकार ने व्यवस्था बनाई है कि मछली तालाबों को गहरा करने, पशुओं के रहने के स्थान के ऊपर टीनशेड लगाने, कुओं को गहरा करने, शौचालय बनाने इत्यादि व्यक्तिगत कार्यों के लिये भी मनरेगा के तहत काम किया जा सकेगा। इसका अर्थ है कि अपने खेत में मछली तालाब को स्वयं गहरा करने के लिये वेतन मनरेगा द्वारा मिलेगा।

इस बदलाव के पीछे मूल कारण एवं सोच यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में उपयोगी सार्वजनिक कार्य करने की एक सीमा है। मनरेगा में व्यर्थ के सार्वजनिक कार्य करने के स्थान पर किसानों को अपने खेत पर स्थायी कार्य करने की अनुमति दे दी जाये ताकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में निरन्तर सुधार हो सके। इसमें भी कोई सन्देह नहीं की व्यक्तिगत भूमि पर स्थायी कार्य करने की भी एक सीमा है। एक किसान स्थायी कार्यों को एक बार ही करेगा। इस प्रकार के कार्यों को प्रत्येक वर्ष नहीं किया जा सकता इसलिये मूल चिन्तन सही दिशा में होते हुए भी इसे और आगे ले जाने की आवश्यकता है। इस सन्दर्भ में सुझाव है कि मनरेगा के तहत खेती के सामान्य कार्यों को करने की भी छूट दे दी जाये। यदि किसान अपने खेत पर कृषि कार्य करता है तो उसके लिये उसका और साथ ही खेत मजदूर का वेतन मनरेगा द्वारा दिया जाये।

देश में तमाम ऐसे कृषि मजदूर हैं जिनके पास स्वयं की जमीन नहीं है। ऐसे कृषि मजदूरों के लिये मनरेगा के अन्तर्गत छूट दी जानी चाहिए कि वे यदि दूसरे किसान के खेत में मजदूरी का कार्य करें तो उसका भुगतान मनरेगा के द्वारा किया जाएगा। ऐसा सुधार करने से अनेक लाभ प्राप्त होंगे। पहला तो यह कि किसानों की आय में निश्चित रूप से इजाफा होगा। दूसरा, देश की ऊर्जा व्यर्थ के कार्यों को करने के स्थान पर कृषि कार्यों में लगेगी।

परिणामस्वरूप खेती लाभप्रद हो जाएगी और श्रमिकों के पलायन में भी कमी आएगी। तीसरा, न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने से अन्न के अधिक भण्डारण की समस्या से निजात मिलेगी। अतः सरकार को चाहिए कि मनरेगा के अन्तर्गत खेती के सामान्य कार्यों को भी शामिल करने की व्यवस्था करे तभी ग्रामीण क्षेत्रों का सतत विकास सम्भव हो पाएगा। इससे मनरेगा कार्यक्रम कहीं अधिक प्रभावी बनेगा।

वास्तव में मनरेगा गरीबी निवारण एवं सतत ग्रामीम विकास की दिशा में एक सार्थक कदम है। सरकार ने अपनी भूमिका को बदलकर स्वयं को मददगार के रूप में प्रस्तुत किया है। मनरेगा इतनी विशाल योजना है कि इससे आज अधिकांश ग्रामीण परिवार लाभार्थी के रूप में जुड़ चुके हैं। इस योजना से ग्रामीणों में जागृति आई है, सामूहिक सौदेबाजी बढ़ी है और उनके शोषण पर रोक लगी है। सरकार के सम्मुख निश्चय ही यह एक बहुत बड़ी चुनौती है। इसको पूरा करने के लिये सरकार को सकल घरेलू उत्पाद का 1 से 2 प्रतिशत अतिरिक्त व्यय करना पड़ सकता है।

उम्मीद है कि सरकार अपने इस चुनौतीपूर्ण कार्य में खरी उतरेगी और भ्रष्टाचार तथा अन्य समस्याओं से निपटने में सक्षम होगी। मनरेगा से गरीब जनता एवं श्रमिकों को पूर्ण लाभ प्राप्त होगा तथा सामाजिक समतापूर्ण समाज का सृजन हो सकेगा। यदि सरकार मनरेगा के अन्तर्गत कृषि कार्यों को पूर्ण मान्यता प्रदान करती है तो आने वाले समय मे गरीबों के लिये निश्चय ही यह योजना वरदान साबित होगी और रोजगार प्राप्ति एवं विकास का सशक्त माध्यम बनेगी। साथ ही, ग्रामीण क्षेत्र में हो रहे सतत विकास को गति मिलेगी, जोकि आज की अहम आवश्यकता है।

मनरेगा के तहत किये गए महत्त्वपूर्ण कार्य संसाधन का निर्माण मनरेगा का अहम उद्देश्य है। बेशक शुरुआती वर्षों में इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया, फिर भी मनरेगा के तहत कुछ संसाधन जरूर विकसित किये गए हैं। पश्चिम बंगाल के नदिया जिले में लोगों के खेत के बीचों-बीच मनरेगा योजना के अन्तर्गत नाली खोदी गई, जिससे अब वही खेत पानी में नहीं डूबते और वहाँ भरपूर सब्जियों की खेती होती है। ऐसे ही राजस्थान के बूँदी में नहरें तो हैं लेकिन उनकी कभी सफाई नहीं हुई, जिससे पानी का बहाव रुक जाता है, उस क्षेत्र के गाँवों के बीच हर साल पानी को लेकर लड़ाई होती है और यह माला जिला प्रशासन व पुलिस तक भी पहुँच जाता है। मनरेगा योजना के अन्तर्गत नहरों की सफाई की गई जिससे कृषि उत्पादन बढ़ा, झगड़े कम हुए, तथा प्रशासन को भी राहत मिली।

गाँव के लोग जिनके लिये कच्ची सड़कों का काफी महत्त्व है, वे मनरेगा से बनी ऐसी सड़कों को तवज्जो देते हैं जहाँ मृतकों का अन्तिम संस्कार मुश्किल था, अब वहाँ बीमार व्यक्ति को साइकिल या मोटरसाइकिल पर बैठाकर अस्पताल ले जाया जा सकता है। सार्वजनिक रास्ता बन जाने से दलित समुदाय को भी राहत मिली है क्योंकि सड़क का अधिकार भी झगड़े का मुद्दा बनता था। सुन्दरवन में मिट्टी कार्य से लोगों की जानें बचाने का कार्य हुआ है। तटबन्ध के कार्यों से बाढ़ और वर्षा का पानी बस्तियों में नहीं आता इससे जानें भी बचेंगी और पर्यावरण भी। मनरेगा में चालीस प्रतिशत तक सामग्री पर खर्च कर प्रावधान है।

मछली पालने के लिये तालाब निर्माण ऐसे कार्य हैं जिनमें सामग्री पर भी खर्च हुआ है। साथ ही उनमें अंडे, मछलियों का भोजन, पानी, बिजली पर खर्च घटाकर लाखों रुपए का मुनाफा हो रहा है। मनरेगा के जरिए वृक्षारोपण कार्य भी खूब हुए हैं। सड़कों के किनारे, जंगल और पंचायत की जमीन पर, सरकारी परिसरों में और निजी जमीन पर फलदार पेड़ लगाए गए हैं। बेशक मनरेगा के बहुत से काम विफल भी हुए हैं लेकिन इन उदाहरणों से पता चलता है कि तकनीकी समर्थन हो तो सामग्री के बिना भी इससे अच्छे संसाधन विकसित किये जा सकते हैं। कई जगह तो ग्राम पंचायत में मनरेगा के जरिए ठोस कचरे का निष्पादन किया जाता है जो कि सराहनीय कदम है।

(लेखक साहूजन कॉलेज नजीबाबाद, बिजनौर (उत्तर प्रदेश) में वाणिज्य विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं।)

ई-मेलः drnps62@gmail.com


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