सृजन एवं साधना

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पहाड़, पिथौरागढ़-चम्पावत अंक (पुस्तक), 2010
पचास के दशक में सोर-पिथौरागढ़, एक छोटी पर आकर्षक बसासत थी। सैंणी (समतल) सोर में लहर काते हरियल खेतों का फैलाव, मध्य में बाजार व रिहायसी इलाके में चण्डाक की ओर जाती सड़क के किनारे ऊँचे होते देवदारु के वृक्ष, लकड़ी के लैम्प पोस्ट और बेगनबोलिया, चमेली व रातरानी की लताओं से घिरी चहरदीवारी के बीच झांकती ब्रिटिशकालीन (लायक साहब की) कोठी तब अनायास ही ध्यान खींचती थी। वह 1954 की शरद ऋतु थी, नारायण स्वामी हिमालय प्रवास से लौट दक्षिणी भारत की यात्रा में थे। पिथौरागढ़ पड़ाव में श्री घनश्याम पाण्डे, तत्कालीन कलक्टर के आवास में कीर्तन संध्या का आयोजन था। नारायण का सान्निध्य पाने के लिए नगर के गणमान्य व्यक्ति व भक्तजन यहाँ एकत्र हुए थे। वह एक सुखद संयोग ही था कि पिताजी मुझे भी इस कीर्तन में ले गए थे। नारायण स्वामी को निकट से देखने का सौभाग्य व अनुशासित कीर्तन मेरे बाल मन में ऐसी गहरी छाप छोड़ गया कि उन क्षणों की यादें जब-तब सजीव हो उठती है।

उस दिन कीर्तन जब सर्वोच्च सोपान में पहुँचा तो नारायण स्वामी के मधुर कण्ठ से प्रतिध्वनित होते नारायण, नारायण, नारायण ऊँ शब्द अधिक गम्भीर हो गए। स्वामी दोनों हाथों से करताल बजाते झूमते हुए अपने आसन से उठते जान पड़ नारायण-नारायण उच्चारित करते हुए भाव समाधि में चले गए। चौड़ा वक्ष, मांसलशरीर पहले शिथिल हुआ फिर एक अकड़न के साथ स्थिर। मांसपेशियाँ स्पन्दन रहित थी। आँखें कुछ चढ़ी हुई पर पुतलियाँ स्थिर थी। चेहरे से अनिवर्चनीय सात्विक सौन्दर्य प्रस्फुटित हो रहा था।

नारायण ने अपने जन्म, नाम, परिवार व बाल्यजीवन सम्बन्धी तथ्यों को कभी अक्षरशः उजागर नहीं किया। जो जानकारियाँ पिरोई जा सकीं उनके अनुसार नारायण का जन्म मार्गशीर्ष पूर्णिमा सन् 1908 को कर्नाटक के एक संभ्रान्त परिवार में हुआ। नारायण की परवरिश एवं शिक्षा-दीक्षा सम्पन्न परिस्थितियों में हुई। परिवार व धार्मिक वातावरण उनके आचरण में सुसंस्कृति के बीज बोने के लिए काफी था। विज्ञान से स्नातक स्तर तक शिक्षा ग्रहण करने के बाद मन भटकने लगा। सुदूर पूर्व बरमा, मलाया व सिंगापुर आदि की यात्रा के बाद घर पर अस्थिर चित्त इन्हें करांची ले चला। गुरूदेव में रमते हुए प्रतिदिन 108 श्री नारायण मंत्र लिख कर समुद्र में प्रवाहित करने का सिलसिला चला। समुद्र की लहरों से उद्वेलित मन परम की खोज में दिशा पाने लगा और अन्तःप्रेरणा इन्हें हिमालय के एकान्त में खींच लाई। उत्तरकाशी में भागीरथी तट पर ध्यान लगा। फिर संन्यास धारण कर लिया।

सघन साधना में लगभग पाँच वर्ष बिताए। सिद्धि के अनेक पायदानों पर चढ़ते नारायण ने कोई आध्यात्मिक ऊँचाई अवश्य प्राप्त कर ली थी। आत्मज्ञान की उस अनुभूति के बीच नारायण के मन में मानव सेवाधर्म का भाव और दरिद्रनारायण के उत्थान व सामाजिक जागरण हेतु कार्यों की इच्छा बलवती होने लगी थी। इसी कारण गंगोत्री की पावन भूमि को छोड़ अपनी कर्मस्थली की खोज में मैदानी क्षेत्र में उतर गए। गंगापुर राजस्थान, बड़ौदा, द्वारकाजी और फिर डुंडेश्वर आदि स्थानों में पहुँचे। पड़ाव नारायण रूपी परिव्राजक पुनः हिमशिखरों की ओर लौट चला।

कुमाऊँ में जोहार घाटी यात्रा पथ से मिलन, ऊँटाधूरा, किंगरीबिंगरी होते हुए हिमालय पार कैलास मानसरोवर की यात्रा कर डाली। यात्रा के बाद तकलाकोट लीपूपास-व्यांस घाटी से लौटे तो तपोवन (दार्चुला) में डेरा डाला। तपोवन के छोटे से शिवालय में एकान्त साधना के क्षणों के नारायण को लगा कि हिमालयी अंचल ही उनका कार्य क्षेत्र होना चाहिए।

स्वामी के मन में आश्रम निर्माण की रूप-रेखा बन चुकी थी। इस सत विचार को तुरन्त कार्यरूप देने के लिए पण्डित ईश्वरी दत्त पाण्डे जैसा योग्य शिष्य व सहयोगी उन्हें मिल चुका था। गुरुदेव की प्रेरणा उन्हें पट्टी चौदांस के सोसा ग्राम तक ले गई। यहाँ सोसा के ग्रामवासियों ने नारायण के तेजस्वी व्यक्तित्व से प्रभावित होते हुए भूदान स्वीकार किया। आपी हिमशिखरों के दूधिया प्रकाश से दीप्तमान एकान्त में स्थित जो भूमि नारायण को भाई उसे उन्होंने हिमालय के इस ओर कैलास की संज्ञा दे डाली।

26 मार्च 1936 को आश्रम स्थापना वास्तुमुहुर्त सम्पन्न हुआ। आरम्भ में नारायण ने एक कुटिया बनवाई जिसमें वे ध्यान लगाते एवं भक्तजनों के साथ भजन- कीर्तन करते थे। 1939 में पक्के भवन निर्माण की प्रक्रिया आरम्भ हुई। गंगानगर, बड़ौदा, अहमदाबाद पूना व मुम्बई आदि स्थानों से नारायण भक्तों द्वारा धन की व्यवस्था की गई और स्थानीयजनों से सहयोग लेकर नारायण ने अपने निर्देशन में कीर्तन मन्दिर का निर्माण आरम्भ करवाया। तब हुनरमन्द कारीगरों की उपलब्धता कम थी। कोई दस वर्षों के सतत श्रम पर वास्तुशिल्प की दृष्टि से नायाब, दर्शनीय दो मंजिली इमारत तैयार हो पाई। अगस्त 1946 में मन्दिर में भगवान नारायण की मूर्ति स्थापित की और प्राण प्रतिष्ठा के अनुष्ठान पूरे किए।

अन्नापूर्णालय, वाचनालय, पण्डित जी की कुटिया, गोशाला आदि का निर्माण करवाया और अपने लिए पिरामिडीकल शून्यता कुटी बनवा ली। आश्रम से लगी चारों ओर की भूमि में सीढ़ीदार खेतों को काश्त, फल-फूल व सब्जी उत्पादन हेतु तैयार करवा लिया। कृषि, बगीचा, गोपालन, मौनपालन जैसे प्राथमिक उपक्रमों के सफल प्रयोग का आदर्श रखते हुए आश्रम-भजन- कीर्तन एवं सनातन धर्म के प्रति आस्था उत्पन्न करने वाले उत्प्रेरक केन्द्र के रूप में स्थापित हो सका।

श्री नारायण आश्रम न केवल लोकमंगलकारी था बल्कि इससे पूर्वी शौकांचल में सांस्कृतिक रूपान्तरण की प्रक्रिया प्रारम्भ हो पाई। ब्यांस, दारमा, चौदांस के शौका समाज को मुख्य जीवन धारा में ला पाने में सफल रहे। द्वितीय महायुद्ध की कठिन परिस्थितियों के बीच अपने शिष्यों से धन एवं संसाधन एकत्र कर आश्रम निर्माण में भारत व नेपाल के अत्यधिक गरीब सवर्ण एवं हरिजनों को रोजगार, भोजन व मजदूरी दे कर जीवन निर्वहन के अवसर प्रदान किए। पर्वतीय कृषक एवं पशुचारक समाज में सामाजिक चेतना जागृत की।

सेवाधर्म अपना लेने और उसे अपना जीवन लक्ष्य बनाने तथा साधना स्तर में इसे कार्य रूप देने में नारायण ने कठिनाइयों को सहा। आश्रम तीर्थ यात्रियों का पड़ाव स्थल था। आश्रम की अतिथि सेवा अगली कठिन हिमालयी यात्रा के लिए नई स्फूर्ति प्रदान करने में समर्थ थी। साधनहीन यात्रियों, विपन्न सन्यासियों को स्वामी जी गरम वस्त्र तथा पाथेय तक सुलभ कराते। जरूरतमन्दों के लिए नारायण ने ताकलाकोट में मोहन सिंह गर्ब्याल की मदद से अन्न की व्यवस्था तक की थी।

नारायण कर्म के बिना साधना को अर्थहीन मानते थे। सामाजिक पुनरुत्थान एवं जनकल्याण के लिए आश्रम की गतिविधियाँ जब सुचारु रूप से चल पड़ीं तो स्वामी ने धरमघर- अस्कोट क्षेत्र में शिक्षा की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने की दृष्टि से एक महत्वाकांक्षी पहल की। स्वामी ने अस्कोट कस्बे से पश्चिम की ओर चढ़ती पहाड़ी के शीर्ष पर शिक्षण केन्द्र स्थापित करने का निर्णय लिया। लगभग 21 एकड़ भूमि को अधिग्रहीत कर 1948 में नारायण ने निर्माण का कार्य आरम्भ करवाया। अग्रेजी के ई शब्द की आकार में शिक्षा कक्ष व मध्य में सभागार शिल्पज्ञात एवं संरचना दृष्टि से ध्यान खींचने में समर्थ थे। विद्या भवन में भौतिक, रसायन एवं जीव विज्ञान की प्रयोगशालाएँ, वाचनालय में लकड़ी की बालकनी, संग्रहालय, सभागार में मंच एवं सजावट के साथ छात्रावास का निर्माण कार्य तेजी से करवाया। 1953 के आते-आते सुसज्जित इण्टर कालेज में कला एवं विज्ञान संवर्ग की कक्षाएँ चल पड़ी। बुनियादी तालीम की प्रासंगिकता को अनुभव करते हुए स्वामी ने संस्था का नाम श्री बापू महाविद्यालय रखा। प्रात:कालीन प्रार्थना वैष्णव जन तो तेने कहिए जे पीर पराई जाणे रे और साथ में नारायण, नारायण ऊँ की धुन के साथ शिक्षण एवं शिक्षणेतर क्रिया-कलापों के संचालन की परम्परा विकसित की।

संस्कारयुक्त शिक्षा देने के लिए जमीन तैयार हो रही थी। यही अपनी छोटी सी कुटिया, अनूठा मन्दिर व आने वालों के लिए अतिथि गृह निर्माण भी यहाँ करवा लिया। यह स्वप्निल शिक्षा केन्द्र शीघ्र ही नारायण नगर नाम से प्रतिष्ठित हुआ। पश्चिमी नेपाल व वृहद पर्वतीय संभाग इस शिक्षा केन्द्र की सुविधाओं से लाभान्वित हुआ। अभावग्रस्त, साधनहीन गरीब बच्चों को हर तरह से मदद देते। अध्यनरत छात्रों में 40 प्रतिशत से अधिक गरीब छात्र स्वामी जी से सीधी आर्थिक सहायता पाते थे। जो पौध यहाँ से निकली आज देश-विदेशों में उच्चस्थ पदों में कार्यरत हैं।

नारायण आश्रम तथा बापू विश्वविद्यालय के अतिरिक्त उन्होंने अपर प्राइमरी स्कूल जयकोट, प्राइमरी स्कूल खेला, हरिजन पाठशाला छलमछिलासों, पांगू हाईस्कूल, नन्दा देवी अपर प्राइमरी स्कूल जाड़ापानी, कमेेड़ी देवी संस्कृत पाठशाला, उत्तरकाशी विद्या पीठ, देवलथल स्कूल-वाचनालय, कांडा हाईस्कूल छात्रावास, क्रिश्चियन स्कूल बागेश्वर आदि शिक्षण संस्थाओं को चलाया था। इन्हें वित्त पोषित किया। शिक्षा के अतिरिक्त इस क्षेत्र में चिकित्सा सुविधाओं की कमी को अनुभव करते हुए सोसा ग्राम में शान्ता मेडिकल हाल-ऐलोपेथी अस्पताल, तपोवन (दार्चुला) में चलती-फिरती डिस्पेन्सरी, आश्रम से पेटेन्ट अंग्रेजी दवाओं का वितरण और इस सबके ऊपर पिथौरागढ़ नगर के सरकारी अस्पताल में पहला एक्स रे प्लान्ट लगवाया। नारायण जो कार्य कर गए वे सरकारें नहीं कर पाई। आधी शताब्दि बीत जाने के बाद आज तक दूसरी कोई ऐसी मिशाल इस अंचल में देखने नहीं बनती।

नारायण ने एक छोटा किन्तु साधना एवं सृजन पूर्ण जीवन जिया। 1072 में नारायण के सबसे प्रिय सहयोगी ईश्वरी दत्ता पाण्डे जी से मैंने स्वामी जी से जुड़े सन्दर्भों को जानना चाहा तो उनका कहना था कि यह नारायण का जादुई व्यक्तित्व ही था कि मुम्बई, पूना, मद्रास, बड़ौदा व अहमदाबाद के बड़े-बड़े औद्योगिक व व्यापारिक घरानों से जुड़े अपने शिष्यों में ऐसी आस्था जगा पाए कि उनकी धन-सम्पति का एक भाग धार्मिक व सामाजिक कार्यों में लगवा सकें। नारायण के मन में कोई कल्याणकारी कार्य करने की योजना बनती तो बिना साधन के इसे कार्य रूप में परिणित करने में जुट जाते।

पण्डित जी एक योग्य अध्यापक के रूप में जाने जाते थे अतः मैंने उनके जीवन में आये परिवर्तन पर जानना चाहा तो बोले तपोवन (दार्चुला) के शिवालय प्रांगण के एकान्त में स्वामी जी के पहले दर्शन और उसी मुलाकात में नारायण के स्पर्श का स्पन्दन पा कर मैं सुध बुध खो बैठा। उसी क्षण से मैं उनके साथ हो चला। नारायण भौतिक रूप में हमारे बीच नहीं है लेकिन मैं हर पल अपने पास ही पाता हूँ। स्वामी को नारायण की ऊँचाइयों में पहुँचाने में पण्डित जी का विशिष्ट योगदान रहा। उसे कमतर आँकना बेमानी होगी। नारायण ने पण्डित जी में अपना उत्तराधिकारी देखा था।

संग्रामी और गाँधीवादी शान्ति लाल त्रिवेदी जी बोले थे कि कुमाऊँ की धरती में अनेक साधू, संत-महात्माओं के दर्शन व सत्संग के सुअवसर मिले लेकिन नारायण का प्रभाव अपूर्व व अनोखा था। नारायण के हृदय में गरीबों के प्रति प्रेम व करुणा का स्रोत सतत बहता रहता था।

अनेक बार दारमा, ब्यांस, चौदांस के अन्तरवर्ती इलाकों में जाने का अवसर मिला तो नारायण की उपस्थिति सर्वत्र अनुभव की।

वे हमारे हिस्से के हिमालय मे नवजागरण के प्रणेता थे और इस अंचल के गुप-चुप पशुचारक, कृषक एवं आदिवासी समाज की सुप्त चेतना को जागृत करने में शीर्ष पुरुष भी।

(इस आलेख में नारायण स्वामी से सम्बन्धित अधिकांश जानकारियाँ जुलाई 1972 से जून 1974 के बीच पण्डित ईश्वरी दत्त पाण्डे, व्यवस्थापक नारायण-आश्रम तथा पिताश्री स्व. नन्द बिहारी पंत (तत्कालीन प्रधानाचार्य बापू महाविद्यालय नारायण नगर। से लम्बी वार्ताओं से प्राप्त हुई। नारायण के व्यक्तिगत चिकित्सक स्व. डॉ. त्रिलोकी नाथ पंत, स्व. गंगोत्री गर्ब्याल एवं स्व. आई. डी. पंत (संस्थापक प्रधानाचार्य बापू महाविद्यालय) के प्रति आभार सहित नमन, जिन्होंने नारायण को समझने में मेरी मदद की। यह आलेख पहाड़ प्रेमी अल्पायु में दिवंगत मित्र जितेन्द्र मुरारी तथा अनुज अशोक पंत एवं कवीन्द्र शेखर पंत को समर्पित है।)

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