नर्मदा आन्दोलन के 31 साल पर सरकार का तोहफा, केवाड़िया फिर से विस्थापित

Submitted by RuralWater on Mon, 08/22/2016 - 12:30


.नर्मदा बचाओ आन्दोलन ने शान्तिपूर्ण आन्दोलन का 31 साल पूरा अगस्त महीने के 16 तारिख को किया। विस्थापितों के 31 साल। देश भर से इस अहिंसक आन्दोलन के समर्थक दिल्ली आये। जन्तर-मन्तर पर आन्दोलन के गीत, नारे, भाषणों के साथ दिन का समापन हुआ। विमल भाई, स्वामी अग्निवेश, झुग्गी झोपड़ीवासियों के लिये संघर्ष कर रहे जवाहर सिंह। सबने विस्थापितों के हक की बात की। जिनका घर नर्मदा माई के दायरे में आकर छूटा, उन्हें विस्थापित नर्मदा माई ने नहीं बल्कि सरकार ने किया है।

16 अगस्त से ही नर्मदा आन्दोलन के समर्थक देश भर में जहाँ-जहाँ हैं उनके बीच आन्दोलन के 31 साल होने पर अलग-अलग तरह से आन्दोलन के संघर्ष को याद किया जा रहा है। मध्य प्रदेश में नर्मदा नदी के किनारे बड़वानी में सत्याग्रही बैठे हुए हैं। उनका आन्दोलन जारी है। वे अपने अधिकार को पाये बिना उठने को तैयार नहीं हैं।

नर्मदा आन्दोलन से जुड़ी एक दुर्भाग्यपूर्ण खबर गुजरात के नर्मदा जिले के केवाड़िया से आई है। अपने विस्थापन को अपनी नीयति मानकर जी रहे केवाड़िया के लोगों को एक और विस्थापन की सूचना दी गई है। वे हैरान हैं। उसके बाद गुजरात के हजारों सरदार सरोवर विस्थापितों ने नदी के बाँध स्थल तक जाने वाला रास्ता वाघोड़िया गाँव के पुल के पास रोक दिया। इससे आवाजाही ठप हो गई। आन्दोलनकारियों ने मन बना लिया था कि वाहन हो या पर्यटक, हम बाँध की ओर नहीं जाने देंगे। आन्दोलनकारियों का मानना था कि उनके दुःख की कब्र पर सरकार का महल बाँधा जा रहा हैे।

नर्मदा में 15 जून 2016 से ही प्रदर्शनकारी धरने पर बैठे हुए थे, इन हजारों आदिवासी विस्थापितों ने प्रतिदिन 80 से 100 की संख्या में शृंखलाबद्ध होकर उपवास रखा। सत्याग्रह का एक मजबूत औजार उपवास है। जिसे महात्मा गाँधी से लेकर ईरोम चानू शर्मिला तक ने अपनाया। नर्मदा बचाओ आन्दोलन के अहिंसक लड़ाई का भी एक मजबूत शस्त्र उपवास ही है।

सत्याग्रहियों को इस दौरान ठोस जवाब अधिकारियों से नहीं मिला। 18 जून को एक बार चर्चा जरूर हुई थी, उसके बाद किसी ने सत्याग्रहियों की तरफ देखने की जरूरत भी नहीं समझी तो 21 अगस्त को हजारों विस्थापितों ने रास्ते पर उतरकर बाँध स्थल पर रास्ता रोकने की कार्यवाई की। खबर लिखे जाने तक, आन्दोलन स्थल पर बड़ी संख्या में विस्थापित जुट रहे थे, उसी दौरान पुलिस ने केवाड़िया कॉलोनी में करीबन 150 आदिवासियों को गिरफ्तार किया है। जिसके बाद उन्हें पुलिस थाने लेकर गई है।

वाघोड़िया के पास रास्ते पर बैठे 2500-3000 लोगों को पुलिस ने गाँधीनगर बातचीत होने का आश्वासन दिया है और कहा है कि हम आपके प्रश्नों पर निर्णय ले रहे हैं। वाघोड़िया से धरना स्थल तक का रास्ता उसके बाद पुलिस के घेरे में प्रदर्शनकारियों ने तय किया।

वह 1980 का साल था जब नर्मदा बाँध से विस्थापित मध्य प्रदेश के 19 गाँवों के आदिवासियों को अपना गाँव छोड़कर, गुजरात के नर्मदा जिलान्तर्गत केवाड़िया स्थित पुनर्वास काॅलोनी में आने को मजबूर होना पड़ा था। इस विस्थापन से उनका जीवन पूरी तरह से प्रभावित हुआ था। उनकी लड़ाई उसके बाद से लगातार जारी है। अपने हक की लड़ाई।

यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि उनके पुनर्वास के 36 सालों के बाद आज फिर गुजरात सरकार उन्हें पुनर्वास स्थल से यह कहकर विस्थापित करने का निर्णय ले रही है कि उनको गलत पात्रता के अन्तर्गत सारे लाभ दिये गए थे। ऐसे 1000 लोगों को गुजरात सरकार ने दुबारा विस्थापित करने की योजना बनाई है। एक तरफ नर्मदा बचाओ आन्दोलन अपनी लड़ाई के 31 साल पूरे कर रहा है और फिर नर्मदा जिलान्तर्गत केवाड़िया उन्हें अपने संघर्ष को फिर 31 साल पीछे ले जाने को विवश कर रहा है। केवाड़िया नर्मदा बचाओ आन्दोलन का संघर्ष फिर एक बार वहीं खड़ा हो गया है, जहाँ से यह शुरू हुआ था। फिर सैकड़ों परिवारों का जीवन दाँव पर है। फिर एक बार विस्थापित होना है उन्हें।
 

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. 24 दिसम्बर 1984 को बिहार के पश्चिम चम्पारण ज़िले में जन्मे आशीष कुमार ‘अंशु’ ने दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में स्नातक उपाधि प्राप्त की और दिल्ली से प्रकाशित हो रही ‘सोपान स्टेप’ मासिक पत्रिका से कॅरियर की शुरुआत की। आशीष जनसरोकार की पत्रकारिता के चंद युवा चेहरों में से एक हैं। पूरे देश में घूम-घूम

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